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बुधवार, 20 जनवरी 2016

मध्यप्रदेश का घोटाला पुराण


257 साइट्स को 12 करोड़ 73 लाख 23 हजार 527 रुपए    59 चैनलों को 80 करोड़ 53 लाख 68 हजार 306 रुपए का भुगतान 
लोकल चैनल को 73 करोड़
107 प्रचार संस्थाओं को 57 करोड़ 80 लाख 68 हजार 793
केवल एक ही संस्था को 21 करोड़ से ज्यादा

 किस चैनल को कितना भुगतान 
एबीपी न्यूज़              12 करोड़ 76 लाख
सहारा समय              12 करोड़ 50 लाख
इंडिया न्यूज़               8 करोड़ 68 लाख        
सीएनबीसी आवाज          6 करोड़ 50 लाख
ज़ी मीडिया                6 करोड़ 10 लाख
टाइम्स नाउ               1 करोड़ 39 लाख
न्यूज़ वर्ल्ड                1 करोड़ 28 लाख
टी वी उर्दू               लगभग 1 करोड़
एनडीटीवी                 12 लाख 84 हजार
 मध्यप्रदेश के स्थानीय चैनल
टीवी मध्यप्रदेश       13 करोड़
बंसल न्यूज़            11 करोड़ 57 लाख
साधना न्यूज़ मध्यप्रदेश   8 करोड़ 78 लाख
दूरदर्शन               मात्र 8 लाख

लोकल चैनल आपरेटर
हाथवे इंदौर                        50 लाख
सुदर्शन न्यूज़                      14 लाख
सिटी केबल                        84 लाख
भास्कर मल्टीनेट                    6 लाख 95 हजार
सेंट्रल इंडिया डिजिटल नेटवर्क          1 करोड़ 41 लाख

शनिवार, 17 अगस्त 2013

भगवद्गीता की राजनीति - नीति सही ना नीयत

फ़ल की इच्छा किए बगैर कर्म करने की सीख देने वाली भगवद्गीता का पाठ बच्चों को पढ़ाने की तैयारी में जुटी प्रदेश सरकार ने अपने इस राजनीतिक कर्म के "फ़ल" का अँदाज़ा लगते ही आनन-फ़ानन में कदम पीछे खींच लिए हैं। मदरसों में गीता पढ़ाने पर मचे बवाल के बाद रक्षात्मक मुद्रा में आई सरकार ने साफ किया कि जिन कक्षाओं की उर्दू पाठ्यपुस्तकों में इन पाठों को शामिल किया गया है, उनमें परीक्षा के आधार पर कक्षा में रोकने का प्रावधान नहीं है। फिर भी यदि किसी विद्यार्थी की रूचि इन पाठों को प़़ढने में नहीं है तो इन्हें वैकल्पिक माना जाएगा। वंदेमातरम और सूर्य नमस्कार के मुद्दे पर मुँह की खाने के बाद सरकार ने इसी तरह फ़ैसले पलटे थे। प्रदेश सरकार ने राज्य के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने वाला अपना आदेश वापस ले लिया है। गौरतलब है कि सरकार के इस आदेश पर धार्मिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। कुछ संगठनों ने कोर्ट में भी जाने की चेतावनी दी थी।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इसे लेकर जो विवाद पैदा हुआ वह सही नहीं था। उन्होंने कहा कि जिस आदेश के कारण विवाद की स्थिति पैदा हुई उसे वापस लिया जाता है। शिवराज का कहना है कि सरकारी आदेश से कुछ गलतफहमी हो गई थी, जिसके बाद मदरसों में भी नए सत्र की किताबों में गीता के अध्याय जोड़ दिए गए।
राज्य सरकार ने एक जुलाई को जारी अधिसूचना के जरिए प्रदेश के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने का आदेश जारी किया था। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद मुस्लिम संगठनों सहित काँग्रेस ने भी इसका भारी विरोध किया और इसे दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया था। इस सबके बीच सत्ता की हैट्रिक लगाने की चाहत पाले बैठे मुख्यमंत्री इस फैसले के व्यापक विरोध से बुरी तरह परेशान थे। उन्होंने मुख्य सचिव और अन्य आला अफसरों से चर्चा करने के बाद विवादित फैसले को निरस्त करने के आदेश दिए। इसके बाद इसी अगस्त माह की एक तारीख को जारी अधिसूचना पाँच दिन बाद निरस्त कर दी गई। नए आदेश के बाद अब सिर्फ हिन्दी की किताबों में ही गीता का पाठ जारी रहेगा।
 गौरतलब है कि राज्य सरकार ने पाठ्यपुस्तक अधिनियम में संशोधन कर मदरसों के उर्दू पाठ्यक्रम में गीता की शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। इसके तहत कक्षा 1 और 2 की विशिष्ट उर्दू तथा विशिष्ट अँग्रेजी के साथ इसी शिक्षण सत्र से भगवद्गीता के अध्याय पढ़ाए जाना थे। राज्य शिक्षा केंद्र और एमपी मदरसा बोर्ड से संबद्ध सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए यह नियम अनिवार्य किया गया था। कक्षा 3 से 8 तक गीता के अध्याय सामान्य हिन्दी के पाठयक्रम में जोड़े जाने की बात कही गई।
राज्य सरकार के इस फैसले की खिलाफ़त में मध्य प्रदेश कैथोलिक काउंसिल, मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ और मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच भी उतर आए थे। अल्पसंख्यक संगठनों ने चेतावनी दी थी कि फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाएँगे। उधर ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य आरिफ मसूद ने राज्यपाल रामनरेश यादव को सौंपे ज्ञापन में अधिसूचना निरस्त करने की माँग करते हुए कहा था कि एक धर्म की पुस्तक का पाठ पढ़ाया जाना संविधान के विपरीत है और मुस्लिम समाज इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रुप में देखता है।
मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ के संयोजक आनंद ने कहा था, 'हम इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर सकते हैं। धार्मिक मामलों से सरकार को दूर रहना चाहिए, यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा है। सरकार गलत परंपरा की शुरुआत कर रही है।'
राज्य सरकार का तर्क है कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जनवरी, 2012 में स्कूलों में गीता-सार पढ़ाए जाने के शासन के निर्णय के विरूद्ध कैथोलिक बिशप कौंसिल की याचिका पर व्यवस्था दी कि गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, न कि भारत के धर्म पर।
सरकारी बयान के मुताबिक पाठ्य-पुस्तकों में गीता आधारित सामग्री का निर्णय नया नहीं है। वर्ष 2011-12 से गीता के व्यावहारिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित विभिन्न पाठ्य सामग्री, कक्षा 1 से 12 की भाषा की पुस्तकों में समाहित की गई है। ये पुस्तकें पिछले दो वर्षों से शासकीय शालाओं के साथ ही अनुदान प्राप्त मदरसों में प्रचलित हैं, जिसके संबंध में किसी प्रकार की आपत्ति सामने नहीं आई है।
 गीता के व्यवहारिक जीवन में उपयोगी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जो पाठ स्कूली पुस्तकों में जोड़े गए हैं, उन्हें धार्मिक या साम्प्रदायिक नजरिए से देखना गलत है। यह मूलतः नैतिक शिक्षा तथा जिसे भावनात्मक परिपक्वताओं का शिक्षण कहा जाता है, उसके अनुरूप की गई कार्रवाई है। सरकारी विज्ञप्ति कहती है कि उपरोक्त वस्तु-स्थिति के आधार पर यह कहना कि, पाठ्य-पुस्तकों में चुनावी या धार्मिक भावना से कोई पाठ शामिल किया गया है, पूर्णतः भ्रामक एवं गलत होगा।
 ऎसे में लाख टके का सवाल यही है कि निर्णय सही और नीयत साफ़ है, तो फ़िर विरोध की सुगबुगाहट शुरू होते ही कदम क्यों खींचे ? समूचे घटनाक्रम पर नज़र डालें तो पाएँगे कि शिवराज सिंह चौहान नरेन्द्र मोदी से आगे निकलने की होड़ में आए दिन "गोड़" फ़ुड़वाने पर आमादा हैं। देश में कराए तमाम सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक भले ही भाजपा के लिए अभी दिल्ली दूर हो , लेकिन खुद को सर्वमान्य और हर वर्ग में स्वीकार्य बनाने की जुगत भिड़ा रहे शिवराज आए दिन नए-नए शिगूफ़े छोड़ते रहते हैं।
 सेक्युलर छबि बनाने की गरज से रमज़ान के मुकद्दस महीने में मुख्यमंत्री निवास में रोज़ा इफ़्तारी करते हैं, वे मोदी को निपटाने और हिन्दू मतों को साधने के फ़ेर में टोपी तो पहनते हैं- मगर "केसरिया"। इसी तरह ईद की मुबारकबाद के मौके पर पहले तो रज़ा मुराद को आगे कर अपनी मुराद साधने की कोशिश की और जब विवाद बढ़ा तो मोदी की शान में कसीदे पढ़ने लगे। मज़ेदार बात तो यह है कि जो शख्स आठ साल से निर्बाध और एकछत्र राजकाज संभालने के बावजूद अब तक ना तो पद के अनुरूप गंभीरता पैदा कर सका हो और ना ही सूबे के मुखिया के तौर पर काबिलियत साबित कर सका हो, वो सीधे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए प्रस्तुत है। शायद संत कबीर ने ऎसे ही किसी दौर की आहट को पढ़कर कहा होगा - "करम की गति न्यारी संतो, .................पंडित फ़िरत भिखारी।"
मुख्यमंत्री के हालिया फ़ैसले एक मर्तबा फ़िर साबित कर गए कि विरोध और दबाव का प्रतिरोध करने की सलाहियत उनमें रत्ती भर भी नहीं है। जब भी उनके फ़ैसलों पर सवाल उठे, जवाब देने की बजाय उन्होंने "खोल" में घुस जाना ही बेहतर समझा। वे किसी भी मुद्दे पर ज़्यादा वक्त कायम नहीं रह पाते और दबाव बढ़ने पर फ़ौरन से पेशतर हथियार डाल देते हैं। अँदरखाने पक्ष-विपक्ष के हर छोटे-बड़े नेताओं से डील कर भले ही शिवराज ने अपना कार्यकाल "स्वर्णिम" होने का मुगालता पाल लिया हो, हकीकतन इस स्वेच्छाचारिता ने प्रदेश के हर संवैधानिक पद और संस्थान की गरिमा को ध्वस्त कर दिया है।
अपना उल्लू सीधा करने के लिए कभी संघ से दूरी बनाने की कोशिश और ज़रूरत पड़ने पर  खुद को हिन्दुत्व का ध्वजवाहक बताने की चाहत में उनकी छबि निरंतर "लिजलिजीहोती चली जा रही है। वैसे शिवराज की एक कदम आगे चार कदम पीछे" की कार्यपद्धति ने उनकी नेतृत्व क्षमता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। सूबे के मुखिया के तौर पर वे किंकर्तव्यविमूढ़ ही नज़र आते रहे हैं। गीता पर पैदा हुए विवाद में मीडिया के काँधे पर सवार प्रधानमंत्री पद के स्वयंभू दावेदार ने हथियार डाल दिए।
हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने की नीयत से किए गए फ़ैसले का विरोध ज़ोर पकड़ते ही हिन्दुत्व पर आगे बढ़ने के इरादे को उन्होंने पल भर में ही तिलाँजलि दे डाली। वैसे सूबे की जनता को भी अब गंभीरता से सोचना होगा। सत्ता में एक दशक का सफ़र तय के बाद भी जो दल अब तक सूबे के लिए एक परिपक्व नेतृत्व तैयार नहीं कर सका हो, क्या उसके हाथ में तीसरी बार काँग्रेस के निकम्मेपन के चलते सत्ता सौंपना उचित रहेगा।  

सोमवार, 8 जुलाई 2013

सीडी की सियासत....!


मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री रहे राघवजी भाई को चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली बीजेपी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अस्सीवीं सालगिरह के मौके पर पचपन साल की सेवा के बदले में पार्टी की तरफ़ से दिया गया यह तोहफ़ा राघवजी भाई के लिए वाकई यादगार रहेगा। यूँ तो प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, अजय विश्नोई, ध्रुवनारायण सिंह समेत शिवराज मंत्रिमंडल के तमाम सदस्यों पर अनैतिक आचरण के आरोप लगते रहे हैं।लेकिन इससे पहले पार्टी ने कितने मामलों में सख्ती दिखाने की नज़ीर पेश की? फ़िर ऎसा भी नहीं है कि राघवजी पर इस तरह का आरोप पहली मर्तबा लगा हो। दो साल पहले भी अनैतिक यौनाचार के मामले में उन पर अँगुली उठी थी । तब भी सीडी की बात सामने आई थी लेकिन जल्दी ही मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

दरअसल यह नैतिक आचरण से ज्यादा सियासी मुद्दा है। भाजपा की अँदरुनी राजनीति के साथ ही पक्ष-प्रतिपक्ष के मिलीजुली "प्रदर्शन मुकाबले" के संकेत भी इस घटनाक्रम में साफ़ मिलते हैं। मध्यप्रदेश में पिछले सात सालों से जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसमें विपक्ष का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह वही ज़ुबान बोलते हैं, जो सूबे के मुखिया को रास आए। काँग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सत्ता में वापसी के लिए कोशिश करते हैं लेकिन अजय सिंह अपने बयानों या फ़िर अपने तौर तरीकों से इन प्रयासों में तुरंत ही पलीता लगा देते हैं ।

राघवजी के मामले में भी विशुध्द रूप से पटवा-सारंग गुट की सियासी शैली साफ़ झलकती है। इसी सियासी वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब चेले ने भी ऎन चुनावों के पहले वही दाँव फ़ेंका है। प्रधानमंत्री पद की रेस में अपना नाम खुद ही आगे बढ़ाने की जुगत में लगे सूबे के मुखिया इन दिनों किसी और ही गुणा-भाग में लगे हैं। वे विदिशा से अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा कर विधानसभा में पहुँचाने का इरादा रखते हैं। राघवजी के ५५ साल के राजनीतिक सफ़र को एक झटके में नगण्य कर दिया गया। लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी ने आनन फ़ानन में बगैर जाँच किए जिस तरह से राघवजी को बर्खास्त किया, वह भी कई संकेत छोड़ता है।

इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार के तौर पर शिवशंकर पटेरिया खुद सामने आए हैं । किसी जमाने में उमा भारती के खास रहे पटेरिया लम्बे वक्त से हाशिये पर हैं। वैसे वो मौके और वक्त की नज़ाकत के मुताबिक पाला बदलने में खासे माहिर हैं। इस सीडी कांड के बाद एकाएक सुर्खियों में आए पटेरिया "मुक्त कंठ" से जिस तरह "राग शिवराज" गा रहे हैं। नज़दीक आते चुनावों के मद्देनज़र उनकी उलट-बाँसी विधानसभा क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी को लेकर प्रदेश भाजपा में मचे घमासान का मुज़ाहिरा भी करती है।

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि हाल के दिनों में नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर सीधे और तीखे हमले किए थे। प्रदेश में परिवर्तन यात्राओं के दौरान अजय सिंह ने शिवराज सिह चौहान और उनकी पत्नी साधना सिंह पर कई आरोप लगाए और पत्र लिखकर जवाब भी माँगा। पावस सत्र के दौरान इस बार काँग्रेस एक बार फ़िर अविश्वास प्रस्ताव ला रही है। ऎसे में विपक्ष के आरोपों की धार को कुँद करने के लिए चला गया "अस्त्र" लगता है हमेशा की तरह निशाना पर लगा है। विपक्ष के वार की धा को भोथर करने में इसमें "फ़ूल छाप काँग्रेसियों" की भी भूमिका अहम है।

राघवजी के सीडी काँड के जरिए एक साथ कई निशाने साधे गए हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम पर सहमति जताने वाले संघ को भी इस बहाने अपनी ताकत का एहसास कराने की कोशिश की गई है। यानी इस समय सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है। 

शनिवार, 12 मई 2012

मध्यप्रदेश में शिव ”राज” नहीं, माफ़िया राज

नौ मई को मुरैना जिले के चिन्नौनी थाना क्षेत्र में चंबल नदी से अवैध रूप से रेत भरकर ले जा रही ट्रैक्टर –ट्रॉली रोकने पर पुलिस टीम पर कट्टे से फायर और पथराव ।


• मई में मुरैना जिले में खनिज माफ़िया द्वारा एक और पुलिस अधिकारी को ट्रेक्टर-ट्रॉली से
कुचलकर मारने की कोशिश ।


• मई की शुरुआत में राजधानी से लगे बड़ली गाँव में जंगल माफ़िया ने वन विभाग के अमले को घेर कर पीटा ; जंगल चोरों ने डिप्टी रेंजर सहित नौ वन कर्मियों को किया पीट-पीट कर अधमरा ।

• अप्रैल में देवास ज़िले की कन्नौद तहसील के कुसमनिया गाँव में महिला तहसीलदार को जेसीबी मशीन से रौंदने की खनन माफ़िया की कोशिश ।

घुन की तरह प्रदेश की नैसर्गिक संपदा को चट कर रहे खनन माफ़िया से टक्कर लेते हुए युवा आईपीएस नरेन्द्र कुमार ने होली के दिन शहादत दी । लेकिन सत्ता मद में चूर सरकार के रहनुमाओं ने युवा पुलिस अधिकारी की मौत को हादसा बताकर कुछ इस तरह की दलीलें पेश कीं, मानो सरकार को बदनाम करने की साज़िश रची जा रही हो ।प्रदेश सरकार की इस बेहयाई ने माफ़ियाओं के हौंसले इतने बुलंद कर दिये हैं कि अब जंगल, खनिज और रेत, ज़मीन,पानी, बिजली और शराब का गैरकानूनी धंधा करने वाले बेखौफ़ होकर सरकारी मुलाज़िमों को अपना निशाना बना रहे हैं । अवैध कारोबार पर नकेल कसने की कोशिश में सरकार के कारिंदे कहीं बँधक बनाये जा रहे हैं , कहीं सरेआम रौंदे जा रहे हैं या फ़िर बदमाशों के गोली, लाठी,डंडे खाने को मजबूर हैं । सत्ता का गुरुर अब मगरुरी में तब्दील होता जा रहा है । जो अधिकारी अपना ईमान और ज़मीर बेचने को राज़ी नहीं है, वो सत्ताधारी दल के लोगों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं । उन्हें झूठे आरोपों में फ़ँसाकर निलंबन या बार-बार तबादले की सज़ा दी जा रही है ।

यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि जब एक जाँबाज युवा पुलिस अधिकारी मुरैना में खनन माफियाओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने लहू की अंतिम बूँद भी धरती पर बहा रहा था... तब हमारे प्रदेश के मुखिया होली के रंगों में सराबोर हो रहे थे । जब उस युवा पुलिस अधिकारी की पत्नी अपनी कोख में साढ़े आठ माह के शिशु को लेकर अपने सुहाग को मुखाग्नि दे रही थी... फाग गाते, ढोल मँजीरे बजाते हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री की तस्वीरें अखबारों और चैनलों में छाई थीं ।

एक ऐसी हत्या, जिसकी चर्चा केवल प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश में हो रही हो, उस घटना पर सूबे के मुख्यमंत्री का बयान चौबीस घंटे बीत जाने के बाद आता है । अपनी पत्रकार वार्ता में भी वे इस बात पर ज्यादा खफा दिखाई पड़े कि बार बार माफियाओं का नाम लेकर प्रदेश को बदनाम किया जा रहा है । जब नरेन्द्र कुमार के पिता और आईएएस पत्नी इस हत्या के पीछे खदान माफियाओं का हाथ होने की बात बार-बार दोहरा रहे थे, तब मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई भी खदान माफिया न होने का दावा कर रहे थे

मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई खदान माफिया नहीं होने का जितना दावा करते हैं , राजनीतिक संरक्षण का भरोसा पाकर माफियाओं के हौंसले उतने ही बुलंद होते जा रहे हैं । सियासी आकाओं का प्रश्रय पाकर अब माफ़िया पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को अपना निशाना बना रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में 20 आईपीएस और आईएएस अधिकारियों सहित 65 पुलिस वालों पर हमले हुए हैं । ग्रामीण इलाकों में छोटे कर्मचारियों की पिटाई का आँकड़ा तो हज़ारों में है । हालत ये है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का मध्यप्रदेश से मोह भंग होने लगा है । हाल ही में नरेन्द्र कुमार की आईएएस पत्नी मधुरानी तेवतिया ने अपना भी कैडर बदलने का आवेदन दिया है ।

मुरैना जिले में खदान माफिया कलेक्टर आकाश त्रिपाठी और पुलिस अधीक्षक हरि सिंह पर भी फायरिंग कर चुके हैं । भिंड में भी शराब माफियाओं ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के साथ मारपीट की । खरगोन में एक आरक्षक की हत्या के साथ ही एएसआई पर जानलेवा हमला हुआ । सागर में अवैध खनन पकडऩे की कोशिश कर रहे टीआई पर माफिया ने गोलियाँ चलाईं और उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा । पन्ना में रेत माफिया ने नदी पर पुल बना डाला था, जिसे तोड़ने गए एसडीएम पर भी फायरिंग की गई । शहडोल में भाजपा नेता और पूर्व विधायक छोटेलाल सरावगी के बेटे ने कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह पर फायरिंग की थी, क्योंकि वह उनकी कोयले की चोरी रोकने की कोशिश कर रहे थे।

मध्यप्रदेश में सरकारी अमले पर हमलों की लगातार बढ़ रही वारदातें कहती हैं कि सूबे में हालात चिंताजनक है । तुर्रा ये कि यहाँ चोरी और सीनाज़ोरी में ना सत्ता पीछे है और ना ही संगठन । हाल ही में अपनी नाकाबिलियत के बावजूद प्रदेश संगठन की कमान सम्हालने के दो साल पूरे होने का जश्न सरकारी खर्च मनाने पर “आमादा“ प्रभात झा छाती ठोक कर दावा कर रहे थे कि प्रदेश में कोई माफ़िया नहीं है । मुख्यमंत्री भी मीडिया के “चोंगे“ पर आये दिन कुछ ऎसा ही आलापते सुनाई देते हैं । मगर शायद वे भूल गये कि सत्ता सम्हालते ही उन्होंने कहा था कि प्रदेश में सात किस्म के माफ़िया सक्रिय हैं । उन्होंने बाकायदा इन माफ़ियाओं के नाम भी गिनवाये थे । हाल की घटनाओं पर सरसरी नज़र डालते ही ’“रक्तबीज“ की तरह तेज़ी से फ़ैलते माफ़िया राज की हकीकत का खुलासा हो जाता है ।

वो शायद भूल गये कि वर्ष 2010 में शिवपुरी में दिए कथित बयान में उन्होंने भूमाफ़िया पर तोहमत जड़ी थी कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की साज़िश रची जा रही है । उनके इस बयान पर मचे बवाल के बाद विधानसभा में दंभ से भरे चौहान ने कहा था कि ”उन्हें हटाने का किसी माई के लाल में दम नहीं है और वे किसी से डरते नहीं हैं । न किसी में हिम्मत है कि उन्हें हटा सके । उन्होंने कहा, भूमाफियाओं पर कार्रवाई की बात मैं करता आया हूँ । भूमाफियाओं से मुझे कोई डर नहीं है । ” यह स्वीकारोक्ति सूबे में जड़े जमा चुके माफ़िया की मौजूदगी बताने के लिये काफ़ी है ।

श्री चौहान का दावा है कि प्रदेश में सब कुछ बढ़िया है । यहाँ कोई माफ़िया नहीं हैं । लेकिन हकीकत तो ये है कि उनके कार्यकाल में एक और किस्म का यानी मीडिया माफ़िया भी तेज़ी से पनपा है । करोड़ों के विज्ञापनों के ज़रिये छबि गढ़ने की कवायद ने इस ’अमरबेल” को खूब फ़लने-फ़ूलने का मौका दिया है । प्रदेश की पत्रकारिता मीडिया घरानों और चंद चापलूसों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है । ’’पत्रकारिता के बंध्याकरण” के कारखाने में तब्दील हो चुके जनसंपर्क विभाग के ज़रिये प्रदेश की खुशहाल तस्वीर पेश की जा रही है, जो हकीकत से कोसों दूर है । विज्ञापनों के बूते मीडिया घरानों का मुँह बंद कर और चंद तथाकथित बड़े पत्रकारों को ’एवज़ी’ देकर भले ही स्वर्णिम मध्यप्रदेश का ढ़ोल पीटा जा रहा हो, मगर सच्चाई तो यह है कि इस ढ़ोल में पोल ही पोल है ।

मुख्यमंत्री कहते हैं कि न तो प्रदेश में कोई खदान माफिया है और न ही सरकार माफियाओं के दबाव में है। लेकिन सरकारी आँकड़े ही उनके इस दावे की हवा निकालने के लिये काफ़ी हैं । प्रदेश के खनन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार राज्य के 27 जिलों में अवैध खनन के मामलों में 141.49 करोड़ रुपये का ज़ुर्माना लगाया गया । मगर 80.81 लाख रुपये की नाम मात्र की रकम वसूल कर मामले निबटा दिये गये । गौरतलब है कि वसूली गई राशि लगाये गये जुर्माने के 1 प्रतिशत से भी कम है । क्या इसके बाद भी किसी सबूत की जरूरत रह जाती है कि राज्य सरकार किसकी मुठ्ठी में है?

क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक है कि जिस मुरैना में दस महीनों में अवैध खनन का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ था , वहाँ नरेन्द्र कुमार के बानमौर के एसडीओपी बनने के चालीस दिन के भीतर 20 मामले दर्ज हुए । इन मामलों में 18 हज़ार 240 रुपये पैनल्टी लगाई गई ,लेकिन केवल 4 हज़ार 240 रुपये वसूल कर मामला रफा दफा कर दिया गया । पड़ोसी जिले भिंड में जहाँ नरेन्द्र कुमार की हत्या के दिन शराब माफियाओं ने एक दूसरे आईपीएस अधिकारी पर जानलेवा हमला किया था, वहाँ इसी साल 1.89 करोड़ रुपये की पैनल्टी अवैध खनन को लेकर की गई और आज तक वसूली नहीं हो सकी है । होशंगाबाद जिले में 4 करोड़ 52 लाख के ज़ुर्माने के एवज़ में 50 लाख 52 हजार रुपये की मामूली रकम वसूल कर मामलों खत्म कर दिया गया ।

खदान माफिया पूरे प्रदेश में फैले हुए हैं । अलीराजपुर जिले में तो खदान माफियाओं ने नकलीरसीदें छपवा रखी हैं । इन रसीदों के पकड़े जाने के बाद भी उन अपराधियों पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई है । रतलाम जिले की पिपलौदा तहसील के गांव चैरासी बड़ायला में तो एक फोरलेन सड़क बनाने वाली कंपनी ने पत्थर और मुरम की पूरी पहाड़ी खोद डाली , लेकिन रायल्टी के 3 करोड़ रुपये में से छदाम भी राज्य सरकार को नहीं दिया है । इसी दौरान नीमच जिले में खनिज अधिकारी वीके सांखला ने अवैध गिट्टी के 10 ट्रैक्टर पकड़ कर उन पर 47 लाख रुपये जुर्माना किया था । भाजपा नेता ने अपने रसूख के दम पर एक भी पैसा जुर्माना भरे बगैर ही इन ट्रैक्टरों को छुड़वा दिया । धार में नर्मदा नदी की रेत का अवैध खनन हो रहा है । इंदौर जिले में नेमावर और रंगवासा पहाडिय़ों को खनन माफिया ने लीज से कई गुना ज्यादा खोद डाला है ।

प्रदेश में न केवल खदान माफिया ही राज कर रहे हैं , बल्कि भाजपा नेता और राज्य सरकार के मंत्री भी या तो खुद खनन माफिया बने हुए हैं या फिर वे खनन माफियाओं को संरक्षण दे रहे हैं । बात सिर्फ मुरैना की नहीं है । मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर और उनके विधान सभा क्षेत्र भी रेत के अवैध खनन का अड्डा बना हुआ है । सवाल लाज़मी है कि मुख्यमंत्री के अपने जिले में ही प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट , क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव है? दमोह की खनिज अधिकारी दीपारानी ने मीडिया को बताया था कि किस तरह उन्हें कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया के दबाव में अवैध खनन में लगे वाहनों को छोडऩा पड़ा । लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह के खिलाफ अवैध खनन के मामले तो केन्द्र सरकार तक पहुँच चुके हैं ।

मुरैना में शहीद हुए नरेन्द्र कुमार के पिता भाजपा के राष्ट्रीय नेता और सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर को खदान माफिया बता रहे हैं । उधर खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ला सतना में किसानों को बेदखल कर हजारों एकड़ जमीन की लीज हथियाना चाहते हैं । एनडीए के संयोजक शरद यादव पहले ही पूरे विंध्य-महाकौशल में हर जिले में बैल्लारी होने की बात चुके हैं । लेकिन यदि मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि प्रदेश में खदान माफिया नहीं हैं, तो फिर कहना ही होगा कि प्रदेश में अब माफिया नहीं हैं , माफिया राज है ।

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

सता रहा है डम्पर घोटाले का जिन्न


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सितारे भले ही बुलंद हों, मगर बलात बोतल में बंद किया गया “डम्पर घोटाले” का जिन्न गाहेबगाहे बाहर आने को बेताब हुआ जाता है लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट के आधार पर इसी साल अगस्त में जिला अदालत ने शिवराज सिंह चौहान और उनकी पत्नी को चार साल की बेचैनी के बाद इस मामले में राहत दी है तिकड़मों और उठापटक के गुणा भाग पर लगता है जल्दी ही शनि-मंगल, राहु -केतु की आड़ी-टेढ़ी चाल असर दिखाने वाली है ग्रहों की “वक्र दृष्टि” से बचने के लिये किये गये तमाम उपाय फ़ौरी राहत देते ज़रुर मालूम होते हैं, मगर समय की चाल बदलते ही चार डम्परों की घरघराहट एक बार फ़िर चौहान दम्पति की रातों की नींद उड़ा सकती है लोकायुक्त से काला-पीला कराकर हासिल की गई खात्मा रिपोर्ट पर सवाल उठाने वालों को रोकने की नीयत से लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू को आरटीआई के दायरे से बाहर करने के सरकार के फ़ैसले पर हाईकोर्ट ने हाल ही में सामान्य प्रशासन और आयुक्त आरटीआई से चार हफ़्तों में जवाब तलब किया है वहीं देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ काम करने वाली संस्था भारत पुर्नोत्थान अभियान (आईआरआई) अब इस मामले का परीक्षण कर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ ज़ोरशोर से आवाज़ उठाती नज़र आने वाली प्रदेश सरकार ने २५ अगस्त को अधिसूचना जारी कर लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर कर दिया अब इन दोनों जाँच एजेंसियों के बारे में इस कानून के तहत जानकारियाँ नहीं माँगी जा सकेंगी सच्चाई का गला गुपचुप घोंटने के लिये राज्य सरकार ने वही वक्त चुना जब देश में अन्ना हज़ारे के आँदोलन की लहर थी और शिवराज सिंह इस मुहिम का खुलकर समर्थन कर रहे थे मगर कहते हैं ना, हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और”  फ़िर सरकारें भी किसी हाथी से कम थोड़े ही हैं एक ओर जहाँ पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाई जा रही है, ऎसे में मध्यप्रदेश सरकार का यह कदम भ्रष्टाचार के संरक्षण की पहल से इतर क्या माना जा सकता है ?

हाल ही में मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार मिटाने के लिये विशेष अदालतें गठित करने को लेकर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से भी मुलाकात कर चुके हैं विशेष न्यायालय विधेयक में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह व्यवस्था की गई है लोकायुक्त को नख-दँत विहीन करने में जुटी सरकार का दावा है कि इसके दायरे में पंचायत प्रतिनिधि से लेकर सीएम तक आएँगे इसमें आरोपियों की संपत्ति राजसात करने का भी प्रावधान है प्रदेश में पिछले दिनों लगभग साठ सरकारी मुलाज़िमों को रिश्वत लेते या जबरन उगाही करते पकड़ा गया और उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया गया। ये सभी पुलिस आरक्षक, पटवारी,कार्यालयों के बाबू और वनरक्षक जैसे छोटे कर्मचारी हैं ,  लेकिन बड़ी मछलियाँ और मगरमच्छ अभी भी भ्रष्टाचार के महासागर बेखौफ़ छपाके लगा रहे हैं छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई को उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार के लिये “पापमोचिनी गंगा” बनाकर स्वच्छ प्रशासन की छबि गढ़ी जा रही है

लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देने वाली सरकार ने तीन साल पहले भी तत्कालीन लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल की सिफारिश पर ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त को आरटीआई से बाहर कर दिया था लेकिन मप्र के मुख्य सूचना आयुक्त पद्मपाणि तिवारी ने कड़ी आपत्ति की इसके बाद राज्य सरकार को नियम में संशोधन वापस लेना पड़ा था विधि विभाग के प्रमुख सचिव रह चुके श्री तिवारी का तर्क था कि लोक सेवकों के भ्रष्टाचार पर निगाह रखने वाली जाँच एजेंसी को सूचना के अधिकार से बाहर कैसे रखा जा सकता है ? इन संस्थाओं की तुलना आईबी और रॉ से नहीं की जा सकती लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू  सरकारी स्तर पर होने वाली आर्थिक अनियमितताओं की जाँच एजेंसियाँ हैं, जबकि गुप्तचर एजेंसियों को सुरक्षा कारणों से आरटीआई से बाहर रखा गया है ताजा बदलाव पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब एक बार फिर विवाद गर्मा गया है

सच पूछा जाए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान डंपर घोटाले से बरी ज़रूर हो गए हैं, लेकिन अंदर से अब भी डरे हुए हैं यही कारण है कि उनकी सरकार ने लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो को सूचना के अधिकार से बाहर रखने का फैसला किया है संभवतः वे यह नहीं चाहते कि कोई आरटीआई एक्टिविस्ट यह जानने की कोशिश  करे कि भ्रष्टों को बरी करने का आधार क्या है ? अभी लोकायुक्त ने मुख्यमंत्री और एक मंत्री को क्लीन चिट दी है कल उन सभी दर्जन भर मंत्रियों को क्लीन चिट दी जा सकती है, जिनके विरुध्द जाँच विचाराधीन है

लोकायुक्त पी.पी. नावलेकर ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी साधना सिंह को दिसम्बर 2010 में बहुचर्चित डंपर खरीदी कांड में क्लीन चिट दे दी थी लोकायुक्त पुलिस ने अदालत में मामले को खत्म करने की सिफारिश की थी,जिसके आधार पर भोपाल की विशेष अदालत ने उनके हक में फ़ैसला सुनाया था। पूर्व लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल भी डंपर मामले की जाँच के दौरान विवादों में फ़ँसे थे उन पर भोपाल की सांसद-विधायकों की शानदार आवासीय कॉलोनी रिवेयरा टाउनशिप में मकान आवंटन कराने का मामला कोर्ट तक पहुँचा था

MP 17 HH 0179, MP 17 HH 0180, MP 17 HH 0181 और MP 17 HH 0208  ये वो चार रजिस्ट्रेशन नंबर हैं जो आरटीओ के दफ्तर में साधना सिंह वाइफ ऑफ एस आर सिंह, जेपीनगर प्लांट, रीवा के नाम से दर्ज हुए थे उमा भारती के साथ बीजेपी से बाहर गये प्रहलाद पटेल ने ये जानकारी परिवहन विभाग की साइट से निकाली थी अब प्रहलाद पटेल वापस बीजेपी में चुके हैं बवाल मचने पर 26 मई 2006 को खरीदे गए डंपरों का मालिकाना हक आनन फ़ानन में बदल गया चारों डंपर जेपी एसोसिएट को ही बेच दिये गये सवाल उठा कि लाखों की खरीद के लिये शिवराज की पत्नी के पास पैसा कहाँ से आया, मामला अदालत पहुंचा। विशेष अदालत के आदेश पर चार साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी पत्नी साधना सिंह, जेपी एसोसिएट के डायरेक्टर सन्नी गौर समेत पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ लोकायुक्त पुलिस ने जाँच मे पाया कि डंपरों की कीमत दो करोड़ की बजाय तकरीबन 74 लाख रुपये है और पाँचों आरोपियों के खिलाफ़ कोई अपराध नहीं बनता है

याचिकाकर्ता के मुताबिक लोकायुक्त ने असली मुद्दों की जाँच ही नहीं की इस मामले में सवाल कई हैं जिनके जवाब अब भी तलाशे जा रहे हैं मसलन साधना सिंह ने अपने पति का नाम एस आर सिंह क्यों लिखा \ जबकि मुख्यमंत्री का हर जगह शिवराज सिंह चौहान नाम चलता है फ़िर अपने गाँव जैत, भोपाल या फिर विदिशा की बजाय रीवा का आधा-अधूरा पता क्यों दिया गया \ अगर रोजी रोटी कमाने के लिये डंपर खरीदे भी थे तो बवाल मचने के बाद अचानक बेच क्यों दिये \

उधर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के लिये समर्थन जुटाने भोपाल आये भारत पुर्नोत्थान अभियान संस्था के तीन सदस्यों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह,  पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस कृष्णास्वामी, केरल के पूर्व डीजीपी उपेन्द्र वर्मा को एक कार्यक्रम में डंपर मामले की जानकारी देकर मदद माँगी गई संस्था के पदाधिकारियों ने संबंधित सारे दस्तावेज माँगे हैं उनका कहना है कि  इस मामले में उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के सबूत होने पर आगे की लड़ाई में मदद दी जाएगी आईआरआई मामले का परीक्षण कर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है संस्था का मानना है कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की तरफ चलता है और जब तक सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त रहेंगे तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है

इस बीच आईएएस राघव चन्द्रा के मामले में लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट के खिलाफ़ आये  सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने भी मुख्यमंत्री की नींद उड़ा दी होगी जस्टिस जीएस सिंघवी और एचएल बत्तू ने इस मामले में लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट को खारिज करते हुए केस रिओपन करने और चालान पेश करने के कटनी अदालत के आदेश को सही माना है। इस आदेश के बाद लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना चंद्रा के खिलाफ राज्य सरकार से अभियोजन स्वीकृति लेने की तैयारी कर रही है। कटनी के पूर्व कलेक्टर शहजाद खान और पूर्व कमिश्नर राघव चन्द्रा समेत पांच लोगों पर सुप्रीम कोर्ट ने भूमि घोटाले के आरोप में मामला दर्ज करने का आदेश दिया है वर्ष 2002 में कटनी के पूर्व कलेक्टर और पूर्व कमिश्नर के कार्यकाल में 10 लाख की जमीन अल्फर्ट कम्पनी द्वारा हाउसिंग बोर्ड को 7 करोड़ 20 में बेचने का मामला सामने आया था

 इसी तरह इंदौर के सुगनी देवी ज़मीन घोटाले में फ़रियादी सुरेश सेठ ने विशेष जज को लिखित में लोकायुक्त की निष्पक्षता से भरोसा उठने की बात कहकर सनसनी फ़ैला दी है लोकायुक्त पी पी नावलेकर के पुत्र संदीप नावलेकर की मुख्यमंत्री के नेतृत्व में चीन गए प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई यात्रा को लेकर काँग्रेस ने लोकायुक्त के खिलाफ कड़े तेवर अख्तियार करते हुए उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा तक माँग लिया इधर, सरकार ने सफाई दी है कि संदीप नावलेकर सीआईआई अध्यक्ष के तौर पर चीन गए थे और यात्रा का पूरा खर्च उनके द्वारा वहन किया गया प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने संदीप की चीन यात्रा को लेकर खड़े किए गए सवाल के बाद नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बयान जारी कर मुख्यमंत्री और लोकायुक्त के बीच साँठगाँठ का आरोप लगाया उन्होंने मुख्यमंत्री की चीन यात्रा को रहस्यमयी और संदेह के घेरे में करार देते हुए कहा कि लोकायुक्त अगस्त में डंपर कांड से मुख्यमंत्री को दोष मुक्त करते हैं और एक माह बाद ही उनके पुत्र मुख्यमंत्री के साथ सरकारी यात्रा पर चीन जाते हैं श्री सिंह ने कहा कि लोकायुक्त के पास सरकार के एक दर्जन मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की जाँच लंबित है, यह जाँच निष्पक्षता से होगी इसमें संदेह हैं

बहरहाल तमाम विरोधाभासों के बीच फ़िलहाल प्रदेश सरकार के मंसूबों की थाह पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ विशेष अदालतों के गठन के लिए विशेष न्यायालय विधेयक लाने को बेताब मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार क्या वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ तहेदिल से गंभीर है? अगर ऐसा ही है तो लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को आरटीआई की परिधि में रख कर उन्हें अधिकतम पारदर्शी बनाने से सरकार को आखिर परहेज क्यों है ?