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मंगलवार, 31 अगस्त 2010

जंगल-ज़मीन के बाद जल प्रबंधन भी ठेके पर

वेतन-भत्तों और सुविधाओं के विस्तार को लेकर लगातार हाय तौबा करने वाले जनप्रतिनिधि अब जनता की बुनियादी ज़रुरतों से पल्ला झाड़कर औद्योगिक घरानों की ताल पर थिरकते दिखाई दे रहे हैं । लोकतांत्रिक व्यवस्था में पानी,बिजली,स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ जुटाने का ज़िम्मा सरकारों को सौंपा गया है । मगर सरकारें अब जनहित के कामों को छोड़कर एक के बाद एक योजनाओं को निजी हाथों में सौंपती चली जा रही है,फ़िर चाहे वो प्राकृतिक संसाधन हों,ज़मीन हो या आम जनता की सेवा से जुड़े मुद्दे हों । इसी कड़ी में अब नेताओं और उद्योगपतियों को पानी मुनाफ़े का सौदा नज़र आने लगा है ।

मध्यप्रदेश में अब कॉर्पोरेट सेक्टर को जलग्रहण मिशन से जोड़ा जा रहा है । विज्ञापनों की सरकारी मलाई खाकर अपनी ही मस्ती में डूबा मीडिया प्रदेश सरकार के इस कदम को अभिनव पहल बताने में जुट गया है । भारतीय संस्कृति में जल संरक्षण सामाजिक और सामुदायिक ज़िम्मेदारी है । स्टील, टेलीकॉम, बिजली, सीमेंट, मोटर गाड़ी जैसे क्षेत्रों में मुकाम बना चुके टाटा, रिलायंस, बिड़ला जैसे औद्योगिक घराने खबर है कि मध्यप्रदेश के गाँवों में जल प्रबंधन की कमान संभालेंगे। सूत्रों के मुताबिक अब तक नौ कंपनियाँ जलग्रहण मिशन में काम करने की सहमति दे चुकी हैं । इनमें टाटा,रिलायंस,महिन्द्रा एंड महिन्द्रा,आईटीसी,ग्रेसिम,रामकी,रामकृष्ण एग्रो प्रोसेसिंग,ओरियंटल पेपर मिल और इंडिया ट्रेसीविलिटी सिस्टम लिमिटेड शामिल हैं ।

इन कंपनियों को परियोजना लागत का न्यूनतम दस फीसदी खर्चा ही उठाना होगा। साथ ही ब्लॉक मुख्यालय में ऑफिस बनाकर विशेषज्ञों की तैनाती भी करनी होगी। प्रोजेक्ट की अवधि पाँच साल रखी गई है । कंपनियों को पाँच हजार हेक्टेयर के क्लस्टर में काम करने दिया जाएगा । इसमें होने वाले काम उपयोगकर्ता दल,स्व-सहायता समूह और वाटरशेड कमेटी तय करेगी। परियोजना में सिंचित क्षेत्र, जलस्तर, आजीविका के साधन बढ़ाने के साथ वनों का विकास भी करना होगा । कॉर्पोरेट घराने परियोजना के पर्यवेक्षण के साथ निगरानी की जिम्मेदारी भी निभाएँगे । साथ ही वाटरशेड समितियों को प्रशिक्षण भी देंगे। जल संरक्षण परियोजनाओं में ग्रामीण विकास विभाग पहली बार स्व-सहायता समूह और वाटरशेड समितियों के साथ आउटकम एग्रीमेंट करेगा ।

बेशक जल संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सरसरी तौर पर योजना में कोई खामी नज़र नहीं आती, लेकिन यह भी समझना होगा कि जल केवल व्यावसायिक नीति नहीं,बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक जिम्मेदारी भी है। भारतीय जीवन दर्शन पानी जैसी जीवन की अनिवार्य वस्तु को समाज की साझा संपत्ति मानता आया है, न कि निजी मुनाफे की वस्तु। पानी की बिक्री और नगर में पेयजल व्यवस्था के प्रबंध के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ पानी जैसी अनिवार्य और नायाब वस्तु पर अपना कब्जा जमा रही हैं। देश के अनेक भागों में पानी की बढ़ती माँग और घटती उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन चुकी है। ऎसे में कॉर्पोरेट जगत की पानी के संरक्षण में बढ़ती दिलचस्पी नये किस्म के संकट की ओर संकेत करती है । हर काम को नफ़े-नुकसान के तराज़ू पर तौलने वाले औद्योगिक घराने एकाएक प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भला इतने गंभीर क्यों नज़र आ रहे हैं ? कहीं ये कोई अंतरराष्ट्रीय साज़िश की दस्तक तो नहीं ? क्या ये प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का नेताओं, सरकारी तंत्र और कंपनियों की साँठगाँठ का नया नुस्खा है ?

घटते जल स्रोतों के बीच लोगों की मानसिकता में भी तब्दीली आ रही है । उपभोक्तावादी संस्कृति की गिरफ़्त में आ चुके लोगों में बोतलबंद पानी के इस्तेमाल का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है । जिसकी जेब में पैसा हो वह पानी पिए–इस दर्शन के पीछे विश्व बैंक की प्रस्तावित जल योजना है। यह शिगूफ़ा ज़ोर पकड़ रहा है कि शुद्ध पानी वह पिए जिसकी जेब में उसका दाम चुकाने की क्षमता हो। पानी के निजीकरण से 40 करोड़ डॉलर के बाजार पर गिद्धों की निगाह है। पानी की मिल्कियत को लेकर देशों में झगड़े शुरु हो गए हैं। कनाडा की प्रांतीय सरकार ने जन आक्रोश के दबाव में ब्रिटिश कोलम्बिया से पानी का निर्यात रोक दिया तो निर्यात करने वाली अमेरिका की सन बेल्ट वाटर कारपोरेशन ने कनाडा सरकार पर हर्जाने का मुकदमा ठोंक दिया। बोलिविया में पानी के बढ़ते दाम के खिलाफ जनता ने रास्ते जाम कर दिए। विशाल जनांदोलन के बाद उन्हें बैक्टेल कंपनी से मुक्ति मिल सकी। दक्षिण अफ्रीका में जल प्रबंधन तथा जल निकास सेवाओं को फ्रांसीसी कंपनी को दिए जाने के विरुद्ध संघर्ष जारी है।

भारत में भी कई शहरों की जलापूर्ति व्यवस्था पर विदेशी कंपनियों ने कब्जा जमाना शुरू कर दिया है। राजधानी भोपाल में भी पिछले दो सालों से पानी की आपूर्ति दिनोंदिन घटती जा रही है और शुल्क में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है । राजधानी वासियों को एक दिन छोड़कर औसतन पाँच सौ लीटर पानी दिया जा रहा है,जबकि नगर निगम ने मासिक शुल्क साठ रुपए से बढ़ाकर एक सौ अस्सी रुपए कर दिया है । दो साल पहले की पेयजल आपूर्ति से तुलना की जाये तो भोपाल के लोग कम पानी की कई गुना ज़्यादा कीमत चुका रहे हैं । विदेशी कंपनी की मदद से अब तो चौबीस घंटे पानी देने की स्कीम लाई जा रही है । इसमें महीने में औसतन पचास हजार लीटर पानी खर्च करने पर लगभग पांच सौ रुपए अदा करने होंगे।

देश में शिक्षा,स्वास्थ्य सेवा के साथ भी यही किया गया । सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बेड़ा गर्क करने के बाद अब पानी भी वर्ग भेद की भेंट चढ़ने जा रहा है । अमीरों और गरीबों के स्कूलों तथा अस्पताल तो पहले ही अलग-अलग हो चुके थे, अब बँटवारा हो रहा है,अमीर-गरीब के पानी में। पानी की उपलब्धता और शुद्धता के सामूहिक दायित्व से जो समाज हाथ खींच रहा है, वह यह जान ले कि पानी के धंधे से बढ़कर भ्रष्टाचार और कहीं नहीं है।

मसला ये है कि जनता की बुनियादी ज़रुरतों को पूरा करने में सरकारों की दिलचस्पी ही खत्म होती जा रही है । ऎसे में बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि जनहित के मुद्दों से दूर होते जनता के नुमाइंदों के भरोसे जम्हूरियत कितने वक्त तक ज़िन्दा रह पायेगी ? जल, जंगल और ज़मीनों को ठेके पर देती जा रही सरकारें लोकतंत्र को ही बेमानी साबित कर रही हैं । औद्योगिक घरानों से नेताओं की जुगलबंदी का आलम यही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब संसद और विधानसभाओं की कुर्सियों को भी निजी हाथों के हवाले करने का कोई नुस्खा नये दौर के गज़नवी ढ़ूँढ़ ही निकालेंगे ।

शनिवार, 15 मई 2010

ज़रा ज़ुबान सम्हाल कर....!

भाजपा के नये मुखिया ने जोश-जोश में क्षेत्रीय पार्टियों के चंद नेताओं को आइना दिखा दिया,तो क्या गुनाह कर दिया ? वे अकेले तो नहीं हैं जिन्होंने इस तरह की भाषा का प्रयोग किया है । भारतीय राजनीति में यह सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है । एक ज़माने में स्वर्गीय राजीव गाँधी "नानी याद दिला देने" पर आमादा थे । बाद के सालों में "कुत्ते" के सर्वाधिकार मायावती के पास सुरक्षित थे । बदलते दौर के साथ देश में राजनीति कम और दलाली का दौर शुरु हुआ,तो इस स्वामीभक्त प्राणी के "हेय संबोधन" को जनप्रिय बनाने का पूरा-पूरा श्रेय राजनीतिक अड़ीबाज़ माननीय अमर सिंह्जी को जाता है ।
वैसे तो आज के दौर का कोई भी नेता बदज़ुबानी में किसी से पीछे नहीं है । मुलायम,लालू की हल्की बातों को मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये खूब भुनाया और उसके चटखारों से खूब मजमा जुटाया । मगर क्या मीडिया की हिमायत इनकी छिछली टिप्पणियों को जायज़ ठहरा सकती है ? काँग्रेस में भी सत्यव्रत चतुर्वेदी, दिग्विजय सिंह , मनीष तिवारी जैसे महारथियों की भरमार है,जो अपने काम से ज़्यादा ओछी टीका टिप्पणियों के लिये सुर्खियाँ बटोरते हैं ।
वैसे भी हिन्दी में मुहावरेदार भाषा का चलन है,जो बातचीत को रसीला और मज़ेदार बना देता है । फ़िर गडकरीजी ने अपनी बात को इशारों-इशारों में ही तो कहा था । मगर कहते हैं ना कि "चोर की दाढ़ी में तिनका"। लिहाज़ा लालू-मुल्लू ने तुरंत ही जान लिया कि तलवा कौन चाटता है ? बेचारे गडकरी ने तो अपने मुँह से उस स्वामीभक्त प्राणी का नाम भी नहीं उच्चारा था । बहरहाल लालू-मुल्लू सरीखे घाघ नेता ही नहीं गली-मोहल्ले के आवारा कुत्ते भी गडकरी से खफ़ा हो गये हैं । पूँछ में तख्ती टाँगे ये प्राणी भौंक-भौंक कर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं । इनका आरोप है कि गडकरी के बयान से इनकी साख पर बट्टा लग गया है । इन्हें लगता है कि भाजपा के मुखिया ने लालू-मुल्लू के साथ नाम जोड़कर इनकी कौम का मान मर्दन किया है । कई जोशीले नौजवान कुकुर तो गडकरी पर मानहानि का दावा ठोकने की तैयारी में लग गये हैं ।
भाजपा के सांसद रह चुके धर्मेन्द्र ने रुपहले पर्दे पर खलनायक को कुत्ते-कमीने के खिताब से नवाज़ कर खूब तालियाँ भी बटोरीं और खूब धन भी समेटा । कुते-कमीनों का खून पीने का सरे आम ऎलान कर लोकप्रियता के शिखर को छूने वाले धरमिन्दर पाजी बाद के सालों में संसद के गलियारे में भी दाखिल हो गये । गडकरी आरएसएस के आशीर्वाद से बीजेपी के मुखिया तो बन गये हैं , लेकिन चांडाल चौकड़ी के चलते वे गब्बरसिंग की महफ़िल में रस्सी से बँधे "वीरु" से जान पड़ते हैं । वही वीरु जो चिल्ला-चिल्ला बसंती को "कुत्तों के आगे नाचने" से रोकने की कोशिश करता है । पुराने फ़िल्मी गानों के शौकीन गडकरी ने मध्यप्रदेश में हुए भाजपा अधिवेशन के दौरान शिवराजसिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिला कर खूब मंच लूटा था । लगता है कार्यकर्ताओं को चाँडाल चौकड़ी के कब्ज़े से छुड़ा कर अपने खेमे में लाने के लिये गडकरी ने यह दाँव आज़माया होगा ।
वैसे नेताओं को समझना होगा कि सार्वजनिक जीवन में आचार-व्यवहार की मर्यादाओं का ध्यान रखना ही चाहिये । हल्के शब्द तात्कालिक तौर पर फ़ायदा देते दिखाई ज़रुर देते हैं,लेकिन ये ही शब्द व्यक्तित्व की गुरुता को घटाते भी हैं । "ज़ुबान की फ़िसलन" राजनीति की रपटीली ज़मीन पर बेहद घातक साबित हो सकती है । खासतौर से ये खतरा तब और भी बढ़ जाता है,जब विरोधी घर में ही मौजूद हों । देश के प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया की "ज़ुबान का फ़िसलना" और फ़िर "ज़ुबान से पलटना" ना तो खुद उनके लिये अच्छा है और ना ही भाजपा के लिए ....। लिहाज़ा गडकरीजी, ! ज़रा ज़ुबान संभाल कर .........।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

गरीब को बख्शो

आरुषि-हेमराज मामला एक बार फ़िर सुर्खियों में है । करीब अठारह महीने बाद अचानक चमत्कारिक रुप से आरुषि का मोबाइल बरामद होने से ठंडे पड़ चुके मामले ने एक बार फ़िर तूल पकड़ लिया है । लेकिन मोबाइल मिलने की टाइमिंग कई सवाल खड़े करती है । दर असल जब-जब मीडिया असली कातिल की ओर कदम बढ़ाता प्रतीत होता है , तब-तब मामले को भटकाने के लिये इस तरह की कारस्तानियाँ की जाती रही हैं । आरूषि की मौत के दिन से लेकर अब तक का घटनाक्रम खुद ही ये कहानी बयान करता है कि हत्यारा कोई आम नहीं बेहद रसूख वाला है । इतना कि ना केवल उसे तफ़्तीश से जुड़े हर पहलू की जानकारी होती है,बल्कि उसे दिशा मोड़ने का अख्तियार भी हासिल है ।

मुझे तो इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा दोषी मीडिया ही दिखाई देता है,जो हत्यारों को चैन की बँसुरी बजाने ही नहीं देता । अगर मीडिया ने बेवजह हो-हल्ला नहीं मचाया होता , तो नोएडा पुलिस की मदद से कब का मामला रफ़ा- दफ़ा कर दिया जाता । लेकिन इन दिलजलों को चैन कहाँ ? लाइव टेलीकास्ट के चक्कर में टिका दिये कैमरे और चना-चबैना लेकर डेरा डाल दिया जलवायु विहार के बाहर । दिन-रात की चौकसी के कारण हेमराज की लाश को ठिकाने लगाने का मौका ही नहीं मिल पाया । वरना हेमराज को आरुषि का कातिल बनाकर उसे फ़रार घोषित कर फ़ाइल के फ़ीते कस दिये जाते,लेकिन बुरा हो इन मीडियाई जोंकों का,जो पीछा ही नहीं छोड़तीं ।

वैसे इस केस के स्क्रिप्ट राइटर को तो मानना ही पड़ेगा । एक रिटायर्ड घाघ पुलिस अधिकारी ने क्या लाजवाब प्लाट तैयार किया कि मीडिया भी अब तक उसकी असलियत नहीं समझ सका । आए दिन चैनल पर आकर वह जाँच को थोड़ा और भटकाकर चला जाता है । हैरानी है कि मीडिया के धुरंधर उसकी कारस्तानी को आज तक भाँप नहीं सके ।

पूरा देश इसे मध्यमवर्गीय परिवारों की बदलती सोच और मान्यताओं से जोड़्कर देख रहा है । यह मामला सत्ता और समाज के संघर्ष को भी बयान करता है । अब तक की तहकीकात को बारीकी से समझें तो पायेंगे कि यह रसूखदार अमीर और संघर्षशील गरीब तबके की रस्साकशी में तब्दील हो चुका है । डेढ़ साल की प्रक्रिया को देखने वालों में से सबसे ज़्यादा नासमझ शख्स भी इस बात को बता सकता है कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ सीबीआई की लापरवाही नहीं सोची-समझी चाल है ।

आईबीएन सेवन ने पिछले कुछ दिनों से एक बार फ़िर आरुषि मामले पर बहस शुरु कर दी । इससे बौखलाकर दिल्ली पुलिस के ज़रिये मोबाइल जब्त करने की बात कहकर मामइस मामले को दिशा से भटकाने की कोशिश की गई है । काबिले गौर पहलू ये भी है कि इस मामले से दिल्ली पुलिस का दूर-दूर तक कोई वास्ता ही नहीं,तब उस तक मोबाइल का आईईएमआई नम्बर कैसे और क्यों पहुँचा ? आखिर वो कौन है जिसके इशारों पर नोएडा के ज़िला अस्पताल के डॉक्टरों से लेकर सीबीआई के आला अधिकारी तक काम करते दिखाई देते हैं ? क्या देश में हालात इतने बदल चुके हैं कि सामान्य लोग भी इनसे अपने मनमुताबिक काम करा सकें । क्या इस मामले में आरोपी बनाये गये कृष्णा,राजकुमार और मंडल का रसूख इतना बड़ा है ?

मीडिया से गुज़ारिश है कि या तो सीधे-सीधे मुहिम छेड़ दे असली कातिल को बेनकाब करने की या फ़िर भगवान के लिये इससे पल्ला झाड़ ले क्योंकि जब भी यह म्मुद्दा उछलेगा ताकतवर एकजुट होकर कानून का हवाला देकर निर्दोष गरीबों को फ़ँसायेंगे चाहे फ़िर वो कुसुम , रामभुल या व्यास हो । मीडिया वालों दम है तो खुल कर सामने आओ अपने फ़ायदे के लिये इन बेचारे गरीबों की ज़िन्दगियों से खिलवाड़ मत करो । गरीब को उसकी ज़िन्दगी जीने दो । मीडिया और सीबीआई गरीब को बख्शो ।

शनिवार, 15 अगस्त 2009

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

स्वाधीनता दिवस पर मन उदास है या बेचैन कह पाना बड़ा ही मुश्किल है । ख्याल आ रहा है कि राष्ट्रीय त्यौहार के मौके पर मन में उत्साह की गैर मौजूदगी कहीं नकारात्मकता और निरुत्साह का संकेत तो नहीं । सड़क पर सैकड़ों चौपहिया वाहनों की रैली में "सरफ़रोशी की तमन्ना लिये बाज़ू ए कातिल" को ललकारते आज के रणबाँकुरों का मजमा लगा है , मगर उनका यह राष्ट्रप्रेम मन में उम्मीद जगाने की बजाय खिन्नता क्यों भर रहा है ? खुली आर्थिक नीतियों और सामाजिक खुलेपन के बावजूद पिछले कुछ सालों से चारों तरफ़ जकड़न क्यों महसूस होने लगी है ? क्या यह वहीं देश है जिसे आज़ाद देखने के लिये हमारे पुरखों ने जान की बाज़ी लगा दी ? क्या हम सचमुच आज़ादी के मायने समझ सके हैं ? क्या हम आज़ाद कहलाने के काबिल रह गये हैं ?

लोकसभा में तीन सौ से ज़्यादा सांसद करोड़पति हैं और तमाम कोशिशों के बावजूद अपराधियों का संसद तथा विधानसभाओं की दहलीज़ में प्रवेश पाने का सिलसिला थमता नज़र नहीं आ रहा । देश का कृषि मंत्री क्रिकेट की अंतरराष्ट्रीय संस्था का प्रमुख बनने के लिये पैसा जुटाने की हवस में देश की ग़रीब जनता के मुँह से निवाला छीन लेने पर आमादा है । शरद पवार ने जब से विभाग संभाला है,तब से बारी-बारी रोज़मर्रा की ज़रुरत की चीज़ों के दामों में बेतहाशा उछाल आया है । एक बार कीमतें ऊपर जाने के बाद नीचे फ़िर कभी नहीं आ सकीं । जिस देश में अस्सी फ़ीसदी से ज़्यादा लोग बीस रुपए रोज़ से कम में गुज़ारा करने को मजबूर हैं,वहाँ दाल-रोटी तो दूर की बात चटनी-रोटी, नमक-रोटी या फ़िर प्याज़-रोटी की बात भी बेमानी हो चली है ।

नेता दिन - दूनी रात- चौगुनी रफ़्तार से अमीरी की पायदान पर फ़र्राटा भर रहे हैं और आम जनता जो संविधान के मुताबिक देश की ज़मीन , जंगल और प्राकृतिक संसाधनों की असली मालिक है,छोटी-छोटी ज़रुरतों से महरुम है । सरकारी ज़मीनों पर मंदिरों और झुग्गियों के नाम पर नेताओं का ही कब्ज़ा है । हम सब मुँह बाये कारवाँ गुज़रता देख रहे है । सरकारी खज़ाने की बँदरबाँट का सिलसिला दिनोंदिन तेज़ होता जा रहा है,मगर हम चुप हैं । बदलाव की आग सबके सीने में है,शुरुआत कब कौन और कैसे करे,ये सवाल सभी के कदम रोके हुए है ।

हाल ही में यात्रा के दौरान ट्रेन में 88 वर्षीय श्री झूमरलाल टावरीजी से बातचीत का मौका मिला । गौसेवा को अपना मिशन बना चुके टावरी जी गाँधी के ग्रामीण भारत के सपने को टूटता देखकर काफ़ी खिन्न हैं । आज के हालात पर चर्चा के ज़ार- ज़ार रोते टावरी जी ने माना कि ये वो देश नहीं जिसके लिये लोगों ने अपने प्राणों की आहूति दे दी । इसी दौरान महाराष्ट्र पुलिस और जीआरपी के जवानों का ट्रुप,जो छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में नक्सलियों की तलाश में बीस दिन गुज़ारने के बाद नेताओं के निर्देश पर खाली हाथ लौटने की छटपटाहट बयान कर रहे थे । वे बता रहे थे कि किस तरह नक्सलियों के करीब पहुँचते ही उन्हें वापसी का हुक्म सुना दिया जाता है । नेताओं की साँठगाँठ का नतीजा है नक्सलवाद और बिगड़ती कानून व्यवस्था ।

क्या इसी का नाम आज़ादी है । मीडिया चिल्ला रहा है कि चीन भारत के टुकड़े- टुकड़े करने की साज़िश रच रहा है । क्या वाकई......??? चीन को इतनी ज़हमत उठाने की ज़रुरत ही क्या है । ये देश तो यहाँ के नेताओं ने कई हिस्सों में कब से तकसीम कर दिया है । अखबार और समाचार चैनल इस बात की पुष्टि करते हैं । राज्यों के बाद अब छॊटे राज्यों का सवाल उठ खड़ा हुआ ।

भाषा के नाम पर हम वैसे ही अलग हैं । धर्म की बात तो कौन कहे । अब तो वर्ग,उपवर्गों पर भी संगठन बनाने का भूत सवार है । अगड़ों के कई संगठनों के साथ ही अग्रसेन,वाल्मिकी,आम्बेडकर,रविदास,सतनामी जैसे असंख्य वर्ग और उनकी राजनीति .....। देश है ही कहाँ ...??? लगता है आज़ादी हमारे लिये अभिशाप बन गई है । हे प्रभु ( यदि तू सचमुच है तो ) या तो किसी दिन पूरी उपस्थिति वाली संसद और विधान सभाओं पर आकाशीय बिजली गिरा दे या समाज से नेता की नस्ल का सफ़ाया ही कर दे । अगर ऎसा करने में तेरी हिम्मत भी जवाब दे जाती हो,तो हमें वो रहनुमा दे जो देश को इन काले अँग्रेज़ों से मुक्ति दिला सके ।

क्यों हर फूल अपनी

गंध के लिए चिंतित है यहां,

क्यों अपने स्वाद के लिए

नदी का पानी चिंतित है,

मछलियां चिंतित हैं

रसायनों की मार से,



चिंतित हैं मोर अपने मधुवनों के लिए,

वन खुद चिंतित हैं कि गायब

हो रही है उनकी हरियाली,

खेत भी कम चिंतित नहीं हैं

अपनी फसलों के लिए ।



सबके चेहरे उतरे हुए हैं,

डबडबाई हुई है सबकी आंख,

होंठ सूखे और बानी अवाक ।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

जनता करे काम, नेता खाएँ आम.......

भोपाल की बड़ी झील में श्रमदान का नाटक अब शर्मदान अभियान में तब्दील हो चुका है । झील का पानी सूखने के साथ ही नेताओं की आँखों का पानी भी सूखने लगा है । कल तक खुद को जनता का सेवक और पब्लिक को भगवान बताने वाले मुख्यमंत्री के तेवर भी बदलने लगे हैं । नाकारा और निठल्ले विपक्ष ने प्रदेश सरकार को बेलगाम होने की खुली छूट दे दी है ।

काँग्रेस का बदतर प्रदर्शन बताता है कि बीजेपी हर हाल में पच्चीस सीटें हासिल कर ही लेगी । ऎसे एकतरफ़ा मुकाबलों के बाद सत्ता पक्ष का निरंकुश होना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं होगी । शिवराज सिंह चौहान के बर्ताव में आ रहे बदलाव में आने वाले वक्त के संकेत साफ़ दिखाई दे रहे हैं । हाल ही में उन्होंने एक तालाब गहरीकरण समारोह में कहा कि सभी काम करना सरकार के बूते की बात नहीं । इसके लिये जनता को आगे आना होगा । समाज को अपना दायित्व समझते हुए कई काम खुद हाथ में लेना होंगे ।

अब बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि जब सभी काम जनता को ही करना हैं ,तो फ़िर इन नेताओं की ज़रुरत क्या है ? अपनी गाढ़ी कमाई से टैक्स भरे जनता । करोड़ों डकारें नेता .....! मेहनत करे आम लोग और हवा में सैर करें नेता ...? जब सब कुछ लोगों को ही करना है,तो इतनी महँगी चुनाव प्रक्रिया की ज़रुरत ही क्या है ? मंत्री बनें नेता,खुद के लिये मोटी तनख्वाह खुद ही तय कर लें फ़िर भी पेट नहीं भरे तो योजनाओं की रकम बिना डकार लिये हज़म कर जाएँ । लाखों रुपए बँगले की साज-सज्जा पर फ़ूँक दें । कभी न्याय यात्रा,कभी संकल्प यात्रा,कभी सत्याग्रह और कभी कोई और पाखंड ....। पिछले साल की जुलाई से प्रदेश सरकार सोई पड़ी है । कर्मचारियों को छठे वेतनमान के नाम पर मूर्ख बना दिया । दो- तीन हज़ार का लाभ भी कर्मचारियों को बमुश्किल ही मिल पाया है ।

अब चुनाव बाद सपनों के सौदागर शिवराज एक बार फिर प्रदेश की यात्रा पर निकलेंगे । दावा किया जा रहा है कि देश का नंबर-एक राज्य बनाने में आम जनता का सहयोग माँगने के लिए वे 'मध्यप्रदेश बनाओ यात्रा’ निकालेंगे । इसके तहत मुख्यमंत्री सप्ताह में तीन दिन सड़क मार्ग से विभिन्न क्षेत्रों में जाकर आम जनता को प्रदेश की तरक्की के सपने से जोड़ेंगे। इसके लिये सर्वसुविधायुक्त रथ बनाया गया है,जिसमें माइक के साथ जनता से जुड़ने का अन्य साजोसामान भी होगा ।

शिवराज की राय में अव्वल दर्जा दिलाने के लिए जनता को राज्य से जोड़ना जरूरी है। जब तक लोगों में प्रदेश के प्रति अपनत्व का भाव नहीं होगा,वे इसकी तरक्की में समुचित योगदान नहीं दे सकते । वे कहते हैं कि मध्यप्रदेश का नवनिर्माण ही अब उनका जुनून है । वे जनता और सरकार के बीच की दूरी खत्म कर यह काम करेंगे ।

मीडिया में अपने लिये जगह बनाने में शिवराज को महारत है । पाँव-पाँव वाले भैया के नाम से मशहूर शिवराज ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जनदर्शन शुरू किया था । साप्ताहिक "जनदर्शन"में वे किसी एक जिले में सड़क मार्ग से लगभग डेढ़ सौ किमी की यात्रा कर गांव और कस्बों के लोगों से मिलने जाते थे । इसके बाद आई जनआशीर्वाद यात्रा । विधानसभा चुनाव के ठीक पहले निकाली गई इस यात्रा में शिवराज ने सवा माह तक सड़क मार्ग से यात्रा कर लगभग पूरे प्रदेश को नापा ।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ,मीडिया मैनेजमैंट की बदौलत अब खुद एक ब्राँड में तब्दील हो चुके हैं । विधानसभा चुनावों के पहले से ही उनकी छबि गढ़ने का काम शुरु हो गया था । स्क्रिप्ट के मुताबिक शिवराज ने एक्ट भी बखूबी किया । अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों में खरीदी हुई स्पेस की मदद से देखते ही देखते वे लोकप्रिय जननायक बन बैठे । विधानसभा चुनावों के अप्रत्याशित नतीजों ने साबित कर दिया कि झूठ को सलीके से बेचा जाए,तो काठ की हाँडी भी बार-बार चढ़ाई जा सकती है ।

चुनाव नतीजे आने के बाद नेशनल समाचार चैनलों पर नर्मदा में छलाँग लगाते शिवराज को देखकर लगा कि मीडिया गुरुओं की सलाह और मीडिया की मदद से आज के दौर में क्या नहीं किया जा सकता । एक चैनल ने तो बाकायदा उनके सात फ़ेरों की वीडियो का प्रसारण किया और श्रीमती चौहान की लाइव प्रतिक्रिया भी ले डाली । सूबे के महाराजा-महारानी का परिणय उत्सव देखकर जनता भाव विभोर हो गई ।

दल बदलुओं की बाढ़ ने मौकापरस्तों का रेला बीजेपी की ओर बहा दिया है । अब राज्य में गुटबाज़ी की शिकार काँग्रेस अंतिम साँसे गिन रही है । निकट भविष्य में ऑक्सीजन मिलने के आसार दिखाई नहीं देते । मान लो जीवन दान मिल भी जाए , तो दमखम से जुझारु तेवर अपनाने में वक्त लगेगा । यानी चौहान विपक्ष की तरफ़ से पूरी तरह निश्चिंत हैं । सुषमा स्वराज को लेकर तरह- तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं,लेकिन विदिशा में राजकुमार पटेल ने सफ़ेद झंडा लहरा कर युद्ध सँधि कर ली । एक तीर से कई निशाने साधे गये और शिवराज की गद्दी हाल फ़िलहाल सुरक्षित हो गई ।

प्रदेश की जनता का भाग्य बाँचनेवाले बताते हैं कि आने वाले सालों में आम लोगों की मुश्किलें बढ़ने की आशंकाएँ प्रबल हैं । रेखाएँ कहती हैं कि जनता को हर मोर्चे पर संघर्ष पूर्ण इम्तेहान देना होगा । यदि इस अनिष्ट से बचना हो तो जनता को अभी से अनुष्ठान शुरु कर देना चाहिए । रास्ता महानुभाव जरनैल सिंह ने सुझा ही दिया है । लोग अपनी सुविधा के हिसाब से इसमें फ़ेर बदल कर हालात पर काबू पाने में कामयाब हो सकते हैं ।

सोमवार, 16 मार्च 2009

झील की मौत पर जश्‍न का माहौल

सूरज की तपिश बढ़ने के साथ ही भोपाल की बड़ी झील का आकार घटता जा रहा है । तालाब की बदहाली पर आँसू और गेंती-फ़ावड़ा लेकर श्रमदान में पसीना बहाने वाले तो कई मिल जाएँगे , लेकिन इन हालात के मूल कारणों को ना तो कोई जानना चाहता है और ना ही इन पर बात करना । जैसे - जैसे तालाब का अस्तित्व सिमट रहा है , झील की मौत का जश्‍न मनाने वालों की बाँछें खिलने लगी हैं ।

’अमृतम जलम’ , ’अपनी झील-अपनी धरोहर’ और ’जल सत्याग्रह’ के ज़रिए झील को नया जीवन देने के कागज़ी दावे किये जा रहे हैं । मीडिया घरानों के एफ़ एम रेडियो पर दिन भर तालाब के लिये पसीना बहाने का चर्चा रहता है । अखबारों के दबाव में नेता और सरकारी अधिकारी भी चुप लगाये तमाशा देख रहे हैं । अखबारों के पन्ने प्रतिदिन श्रमदान की तस्वीरों और खबरों से रंगे होते हैं । लगता है गेंती- फ़ावड़ा चलाते लोगों का पसीना ही तालाब लबालब कर देगा ।

‘ताल तो भोपाल का और सब तलैया‘ की देश भर में मशहूर कहावत जिस झील की शान में रची गई, वह अब बेआब और बेनूर हो गई है । इस पहाड़ी शहर की प्यास बुझाने के लिए राजा भोज ने 11वीं सदी में बड़ी झील बनवाई थी 17वीं शताब्दी में नवाब छोटे खां ने निस्तार के लिए छोटे तालाब का निर्माण कराया । इसके मूल में बड़े तालाब को संरक्षित रखने की सोच थी ।

बड़े-बूढे उम्रदराज़ी की दुआ देने के लिए कहा करते थे - "जब तक भोपाल ताल में पानी है, तब तक जियो ।" क़रीब एक हज़ार साल पुराने `भोपाल ताल´ का जिक्र लोगों की इस मान्यता का गवाह है कि बूढ़ा तालाब कभी सूख नहीं सकता । मगर हम अपने लालच पर काबू नहीं रख पाए और अंतत: बूढ़े तालाब की साँसें धीरे-धीरे टूटने की कगार पर हैं । शहर की गंदगी, कचरे और मिट्टी के जमाव ने झील को उथला कर दिया है जिससे इसकी जल भंडारण क्षमता घट गई है। 31 वर्ग किलोमीटर के विशाल दायरे से सिमटकर तालाब महज 5 वर्ग किलोमीटर रह गया है । वैसे बड़े तालाब का भराव क्षेत्र 31 वर्ग किलोमीटर और कैचमेंट एरिया 361 वर्ग किलोमीटर है।


बड़े तालाब का तकरीबन 26 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र खाली हो चुका है। आसपास के लोगों के अलावा भू-माफिया ने भी मौके का फ़ायदा उठा अवैध कब्जा कर अधिकांश हिस्से में खेती शुरू कर दी । इतना ही नहीं कुछ इलाकों में अतिक्रमण कर पक्के मकान बना लिए गए हैं। बेजा कब्जों और अवैध निर्माणों से भी झील का जल भराव क्षेत्र घटा है।


भोपाल की छोटी और बड़ी झील को प्रदूषण मुक्त करने और उनके संरक्षण के लिए जापान की मदद से वर्ष 1995 में भोज वेटलैंड परियोजना शुरु की गई थी । जेबीआईसी के सहयोग से भोपाल के तमाम छोटे -बड़े तालाबों के संवर्धन और प्रबंधन संबंधी कामों पर 247 करोड़ रुपए खर्च हुए । वर्ष 2004 में पूरी हुई इस परियोजना में तालाब गहरीकरण, जलकुंभी हटाने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने, हाई लेवल ब्रिज के निर्माण जैसे कार्य किए जाने की बात कही जा रही थी। परियोजना तो खत्म हो गई ,लेकिन तालाब के हालात बद से बदतर होते गए । सीवेज का पानी आज भी तालाब में मिल रहा है । भोपाल की झीलों की संरक्षण और प्रबंधन परियोजना
A. Date of agreement - 28 February 1995
B. Contract period - 12 April 2002
C. Project implementation period - April 1995 to March 2001
(Extended upto March 2002)
D. Project Cost - 247.02 Crore (8300 million yen)
1. Loan Amount by JBIC ( 85%) - 7055 million yen
(exchange rate 1 Rs. = 3.36 yen)
2. State Government Contribution - Rs. 370.5 million (1245 million yen)
3. Expenditure of State Govt. before 01.04.1995 - Rs. 243.7 million
4. Project Expenditure from 01.04.1995 to 31.05.2001 (in Indian Rupees) - Rs. 1006.5 million
5. Project Expenditure from 01.04.1995 to 31.05.2001 (Commitment procedure in yen) - Rs. 187.
"एप्को " से साभार
तहज़ीब का शहर माने जाने वाले भोपाल को तालों की नगरी भी कहा जाता है। यहाँ नवाबी दौर में वॉटर रिचार्ज सिस्टम के 14 तालाब हुआ करते थे । इनमें से अब केवल पाँच तालाब ही बचे हैं । अतिक्रमण ने शहर के नौ तालाबों को लील लिया है । मोतिया तालाब और मुंशी हुसैन खाँ तालाब के बीच बने सिद्दीक हसन खाँ में अब पानी की जगह घास-फ़ूस और झाड़-झँखाड़ हैं ही , आलीशान अट्टालिकाएँ भी शासन-प्रशासन को मुँह चिढा़ रही हैं । अच्छे खाँ की तलैया , गुरुबख्श की तलैया ,लेंडिया तालाब अब इतिहास के पन्नों में दफ़्न हो चुके हैं । चार सौ से ज़्यादा छोटी-बड़ी बावड़ियाँ शहर के लोगों की पीने के पानी और निस्तार की ज़रुरतों को पूरा करती थीं ।
ज़ुबानी जमा खर्च से ना तो आज तक कभी कुछ बदला है और ना ही आगे भी ऎसा होगा । तालाब बचाने की चाहत किसे है ? देश में जब भी कहीं आपदा आती है चील गिद्धों की फ़ौज की जीभें लपलपाने लगती हैं । भोपाल की झील की मौत का मातम नहीं जश्‍न मनाया जा रहा है । सिवाय ढोंग के कुछ नहीं हो रहा । ढाई सौ करोड रुपए खर्च होने के बाद अगर झील की ऎसी दुर्दशा है तो कौन ज़िम्मेदार है ? भोजवेट लैंड परियोजना के कर्ता धर्ताओं को तो सीखचों के पीछे होना चाहिए । फ़िलहाल जो नाटक चल रहा है उसके पीछे भी किसी बडे फ़ंड की जुगाड़ और उसे हज़म करने की साज़िश है । वरना कुछ अखबार मालिकों को अचानक जल ही जीवन है या फ़िर अमृतम जलम की सुध क्यों आ गई ? खैर इस देश में कभी कुछ नहीं बदलेगा । हर मौत किसी के लिए सौगात बन कर आती रही है आती रहेगी ।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

............प्यार के लिए मगर पैसा चाहिए !

दुनिया में आज तक सच्ची प्रेम कहानियों का दारुण अंत देखा गया है । लेकिन हाल ही में नये दौर के हीर -रांझा , शीरीं - फ़रहाद , लैला - मजनूं के तौर पर प्रचारित मोहब्बत की दास्तां के नए पहलू से रुबरु हुए । चांद के बादलों की ओट में जाते ही फ़िज़ा का रुख बदल गया । साथ जीने [ मरने नहीं...] की कसमें खाने वाली बला की खूबसूरत हसीना ने चार दिन भी प्रेमी के लौटने का इंतज़ार मुनासिब नहीं समझा और धर लिया चोट खाई नागिन सा रौद्र रुप ....।

फ़िज़ा के रवैये में एकाएक आये इस बदलाव को क्या समझा जाए ....? क्या प्रेम इतना छिछला होता है ...? या किसी खास मकसद के लिए इस शादी को अंजाम दिया गया था ? आखिर वो क्या
वजह रही होगी ,जिसके चलते शादी से लेकर खुदकुशी तक के घटनाक्रम का मीडिया गवाह बनाया गया ? कहीं ऎसा तो नहीं कि एक बार फ़िर टीआरपी का लालची "इलेक्ट्रानिक मीडिया" बेहद शातिराना तरीके से इस्तेमाल कर लिया गया । ऎसा मालूम होता है , मानो टाफ़ी -गोली का ईनाम पाने की चाहत में कोई अबोध बच्चा प्रेमी - प्रेमिका के बीच कासिद का किरदार निभा रहा हो ।

किसी ने गहराई से सोचा कि मुट्ठी भर नींद की गोलियां चबाने वाली महिला चौबीस घंटे भी नहीं गुज़रे और इतनी स्वस्थ कैसे हो गई ? दरअसल इस प्रेम कहानी में भरपूर मसाला है । मज़े की बात है कि इसमें भावनाएं कहां खत्म होती हैं ,राजनीति के पेंच कब उलझते हैं और पैसे की चमक कितना रंग दिखाती है, सब कुछ गड्ड्मड्ड है । सच पूछा जाए तो ये मेलोड्रामा पूरी तरह सोच समझ कर अंजाम तक पहुंचाया गया सा लगता है । मेरी इस आशंका की पुष्टि जाने माने पत्रकार आलोक तोमर की 30 जनवरी की पोस्ट करती है । इस आलेख के कुछ अंश यहां दिये गये हैं , जो बताते हैं कि " यार दिलदार तुझे कैसा चाहिए ,प्यार चाहिए या पैसा चाहिए ।" की तर्ज़ पर फ़िज़ा को वास्तव में चांद से क्या चाहिए था........

चंडीगढ़/मोहाली, 30 जनवरी- अनुराधा बाली उर्फ फिजा वास्तव में क्या विष कन्या हैं? चंद्र मोहन को चांद मोहम्मद बना कर उनसे शादी करने वाली अनुराधा के बहुत सारे प्रेमी और दोस्त सामने आए हैं जिन्होंने औपचारिक रूप से तो कुछ नहीं कहा लेकिन यह शिकायत जरूर की है कि अनुराधा ने उनके रिश्तों का फायदा उठा कर काफी आर्थिक लाभ उठाया और जब लाभ मिलना बंद हो गया तो उन्हें छोड़ दिया।
जो लोग अनुराधा बाली को आर्थिक लाभ पहुंचा सकते थे वे जाहिर है कि काफी बड़े आदमी रहे होंगे। इनमें हरियाणा के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री का भाई, एक मुख्य सचिव का बेटा और कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बताए जाते हैं। बहुत खूबसूरत अनुराधा बाली के पति ने भी तलाक की अर्जी देते वक्त अनुराधा पर यही आरोप लगाया था कि वे चारित्रिक रूप से गड़बड़ है।

अनुराधा बाली उर्फ़ फ़िज़ा किसी भी लिहाज़ से हमदर्दी के काबिल नहीं हैं । किसी महिला का घर संसार उजाड कर अपने सपनों का महल खडा करना क्या महिला अधिकारों के नाम पर जायज़ ठहराया जा सकता है । चंद्रमोहन जैसे कमज़ोर मानसिकता वाले लोग भारतीय राजनीति के लिए चिंता के सबब हैं । उप मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठा व्यक्ति चारित्रिक पतन की गिरफ़्त में आकर कल ना जाने क्या गुल खिला बैठे । ऎसे नेता देश के लिए खतरनाक हैं ।

इन लोगों का अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए मुस्लिम धर्म कबूल करना भी बेहद गंभीर मसला है । नीयत के खोट को धार्मिक आस्था से जोडकर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के गुनहगार हैं ये दोनों । इस्लाम के मानने वालों को भी इस घटना की जमकर मज़म्मत करना चाहिए ,ताकि आगे कोई मज़हब का मखौल ना बना सके ।

इस मसले पर एक टिप्पणी काबिले गौर है -
शादी-शुदा मर्द से ही नहीं औरत की गत हमेशा ही प्यार में बुरी होती है। रही बात फिजां की तो जब वे अपने चांद को ले कर दिल्ली पहुंची तो प्रेस क्लब में मैं भी मौजूद थी। मैंने सिर्फ एक सवाल पूछा, क्या आप हमारे लिए सुरह यासीन पढ़ देंगे। सुरह यासीन कुरान की पहली आयत है जो किसी नास्तिक हिंदू को गायत्री मंत्र याद रह जाने की तरह आसान है। सवाल चंद्रमोहन से पूछा गया था, लेकिन इस सामान्य सवाल पर वह ऐसे असामान्य तरीके से भड़की कि अगले दिन हर अखबार की सुर्खियों में यह खबर थी। उनका चलने का तरीका और बात करने का अंदाज ही बता रहा था कि उनके चेहरे पर उप मुख्यमंत्री पर फतह हासिल करने की चमक थी। अब यह चमक फीकी पड़ गई क्योंकि उनके मंसूबे कामयाब नहीं हो सके। नींद की दवाई खाने और फिर प्रेस कॉन्फेंस में एसएमएस पढ़ कर सुनाना ही बताता है कि वह अपने प्यार के मामले में कितनी गंभीर हैं। जिस व्यक्ति को प्यार किया जाता है, उसे सार्वजनिक तौर पर बेइज्जत को नहीं किया जाता। अनुराधा बाली ने अपने प्रेम को सार्वजनिक कर, चंद लम्हों की लोकप्रियता के लिए राष्ट्रीय मनोरंजन से ज्यादा कुछ नहीं किया है।

वैसे चांद अपनी दुनिया में लौट भी गया ,तो इससे क्या ...? फ़िज़ा के पास खुश होने के लिए अब भी बहुत कुछ है । प्रेम की यादें तो अब भी उनके पास हैं । कहते हैं मरा हाथी भी सवा लाख का होता है । दिल टूटा तो क्या हुआ पर 24 करोड की ज़बरदस्त लॉटरी भी तो लग गई । कनाडा की कंपनी इंडिया पैसिफ़िक मीडिया एंड मूवीज़ ने उन्हें फ़िल्म बनाने के अधिकार बेचने के एवज़ में करीब 24 करोड रुपए देने की पेशकश की है । कंपनी के प्रवक्ता ने खुलासा किया है कि बेवफ़ाई की मारी फ़िज़ा को फ़िल्म में हिरोइन का किरदार भी ऑफ़र किया गया है । मस्त रहिए , खुश रहिए , दिल का क्या है ..? शीशा हो या दिल हो , आखिर टूट जाता है ........।

रविवार, 18 जनवरी 2009

न्याय के मंदिर में चढावे का दस्तूर

लोकतंत्र की मज़बूती के लिए न्यायपालिका का निष्पक्ष , ईमानदार और सत्यनिष्ठ होना ज़रुरी है । ऎसा किताबों में कहा गया है और शायद लोकतांत्रिक व्यवस्था की ये आदर्श स्थिति कही जा सकती है । लेकिन ऎसा तभी हो सकता है जब इंसाफ़ का तराज़ू थामने वाला हाथ किसी भी सूरत में कांपे नहीं , हर हाल में संतुलित रह सके । उसे थामने वाले दिलो - दिमाग की बजाय न्याय की बात कहने का साहस कायम रख सकें ।

अलगू चौधरी और जुम्मन शेख की कहानी देश में इंसाफ़ की समृद्ध परंपरा को रेखांकित करती है । बताती है कि इंसाफ़ मानवीय सीमाओं से परे ईश्वर का आदेश है । यही वजह है जो हमने दूध का दूध और पानी का पानी करने वाले पंच को परमेश्वर का दर्ज़ा दिया । देश में आज भी न्यायाधीश का स्थान सर्वोपरि है । लोकतांत्रिक व्यवस्था के चार स्तंभों में एक न्यायपालिका भी है जिस पर जनता का भरोसा आज भी कायम है । मगर सामाजिक विकृतियों ने इसे भी नहीं बख्शा है ।

हाल ही में देश के प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन ने कहा है कि जज अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देने के लिए बाध्य नहीं है । उनके मुताबिक देश में ऎसा कोई कानून नहीं है जिसके तहत न्यायाधीशों के लिए संपत्ति घोषित करना अनिवार्य किया गया हो । गौरतलब है कि केन्द्रीय सूचना आयोग में आरटीआई दाखिल कर इस बाबत जानकारी मांगने पर इंकार के बाद अदालत में याचिका लगाई गई थी ।

ट्रांसपरेन्सी इंटरनेशनल की वैश्विक भ्रष्टाचार रिपोर्ट 2007 में कहा गया है कि भारत में 77 फ़ीसदी लोगों को न्यायपालिका के भ्रष्ट होने का यकीन है । रिपोर्ट के मुताबिक कानून से न्याय पाने के एवज़ में एक साल में 58 करोड अमरीकी डॉलर {2630 करोड रुपए } घूस दी जाती है । 61 प्रतिशत वकीलों , 29 फ़ीसदी अदालती कर्मचारियों और 5 फ़ीसदी बिचौलियों के ज़रिए यह धनराशि पहुंचाई जाती है ।

इससे पहले वर्ष 2001 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस. पी. भरुचा ने यह कहकर तहलका मचा दिया था कि " देश के बीस फ़ीसदी जज भ्रष्ट हैं ।" इसके बाद देश भर में न्यायपालिका की शुचिता पर बहस छिड गई थी । लोगों का मानना है कि जजों के कामकाज और उनकी संपत्ति की जांच का अधिकार भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाओं को सौंप दिया जाए तो अदालत के गलियारों में फ़ैले भ्रष्टाचार का वास्तविक स्वरुप आँखें फ़ाड देने वाला होगा ।

देश का दुर्भाग्य है कि सरकार और न्याय व्यवस्था में फ़ैले भ्रष्टाचार को देख कर भी इससे निजात पाने के तरीके खोजने की बजाय प्रधानमंत्री लाचारगी की मुद्रा में नज़र आते हैं । वर्ष 2008 में मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में मनमोहन सिंह ने कहा कि " सरकार और न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार एक चुनौती है ,जिससे हम जूझ रहे हैं ।" कुछ समय पहले अदालतों में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बार कॉउन्सिल ऑफ़ इंडिया ने भी राज्यों की बार कॉउन्सिल्स से अपनी राय देने को कहा था ।

ये किसी भीषण त्रासदी से कम नहीं कि उच्च पदस्थ जजों के कथित दुराचरण के मामले तेज़ी से हाल के वर्षों में सामने आए हैं , लेकिन इनके खिलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं हो सकी । आज तक यही होता आ रहा है कि "अदालत की अवमानना” का खौफ़ दिखा कर शिकायती आवाज़ों को तुरंत दफ़्न कर दिया जाता है । सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त हैं । ऎसे में आम लोगों में क्या वाकई न्याय के प्रति भरोसा कायम रह सकेगा ?

मौजूदा दौर लोकतंत्र के संकट का काल प्रतीत होता है । मीडिया पूरी तरह से बाज़ार की गिरफ़्त में है । चारों तरफ़ प्रेस की आज़ादी को लेकर शोरगुल सुनाई दे रहा है । लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं है कि क्या वास्तव में देश में मीडिया अपनी भूमिका सही तरह से निभा रहा है ...? प्रेस का जब देश की जनता या सामाजिक सरोकारों से कोई वास्ता ही नहीं रहा , तो लोकतंत्र का स्तंभ कहलाने का दंभ भी क्यों ...? विधायिका और कार्यपालिका पहले ही जनता का भरोसा खो चुकी हैं । यही हाल अब इंसाफ़ के मंदिरों का हो चुका है ।

मेरे एक परिचित ने इस बारे में बेहद चुटीली लेकिन गंभीर टिप्पणी की । वो मानते हैं कि पहले प्रजातंत्र के चारों खंबे अलग - अलग थे । अब इन पर छत पड चुकी है । ये सब एकजुट हो चुके हैं । इससे स्तंभों को मज़बूती भी मिली है और सभी निश्चिंत होकर एक दूसरे के हितों का भरपूर ख्याल रख रहे हैं । इस तरह देश का संभ्रांत वर्ग "जनता के माल" पर मिल बांट कर हाथ साफ़ कर रहे हैं । त्राहि - त्राहि करती जनता का ना तो किसी को ख्याल है और ना ही कोई डर ............।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

भारत - पाक युद्ध पर आमादा रणबाँकुरा मीडिया

भारत लगातार युद्ध टालने की कोशिश में जुटा है । पाकिस्तान भी युद्ध की धमकी तो देता है पर बीच बीच में उसके सुर में नरमी भी नज़र आने लगती है । ये और बात है कि सीमा पार सेना की तैनाती लगातार बढ रही है , मगर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री दोनों मुल्कों के बीच शांति और बेहतर ताल्लुकात की बात भी कर रहे हैं । कुल जमा नज़ारा कुछ ऎसा समझ में आता है - मुँह में राम बगल में छुरी ।

दोनों देशों के बीच युद्ध होगा या नहीं , इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं । इतना तो तय है कि वाक युद्ध में दोनों ओर से जमकर गोलाबारी हो रही है । इसी ज़बानी गर्मागर्मी को भारतीय मीडिया ने भुनाने का बंदोबस्त कर लिया है । युद्ध हो चाहे न हो मगर मीडिया खासतौर पर खबरिया चैनलों ने भारत और पाकिस्तान के बीच लडाई की हवा बनाना शुरु कर दी है । नौसीखिए नौजवान छोकरे- छोकरियाँ चैनलों पर लगातार पूरी ऊर्जा के साथ चीख रहे हैं । कहीं कुछ मिनट में युद्ध छिडने का दावा हो रहा है । कहीं नाभिकीय युद्ध की रुपरेखा बताई जा रही है , तो कोई हवाई और ज़मीनी हमलों से जुडे तथ्यों को लेकर बहस में मसरुफ़ है ।

नई पीढी ने तो भारत - पाक युद्ध नहीं देखा है । चैनलों की दीवानी युवा पीढी ने भारत - पाक युद्ध की थीम पर बनी ’बॉर्डर’ जैसी फ़िल्मों के माध्यम से ही जंग को जाना - समझा है । खिलौने के तौर पर हाथ में बंदूक लेकर वक्त गुज़ारने वाले नए दौर के बच्चों के लिए युद्ध एक रोमांचक घटना है । मीडिया इसी रहस्य - रोमांच को भुनाने की फ़िराक में है । आखिर इराक युद्ध दिखाकर ही सीएनएन कामयाबी की बुलंदियों को छू सका । इसलिए मंदी के दौर में दोनों देशों की सेनाएं भिडें और ज़बरदस्त फ़ुटेज मिले यह माहौल न्यूज़्ररुम्स में बन रहा है ।

चिंता की बात यह भी है कि मीडिया की तल्खियाँ दोनों देशों के बीच तनाव बढाने का सबब भी बन सकती हैं । कई तरह के कपोल कल्पित बयानों के हवाले से माहौल को उन्मादी बनाने में भी कोई कसर नहीं छोडी जा रही है । हालात ऎसे हैं कि हो सकता है दोनों देशों के राजनेता , अफ़सर और सैन्य अधिकारी ठंडे दिमाग से बात कर रहे हों , मगर मीडिया के जोशीले जवान खबरों के प्रसारण के दौरान तीखी टिप्पणियों के ज़रिए जांबाज़ी का प्रदर्शन करने को ही अपना पेशागत धर्म मान रहे हैं । कमोबेश यही हाल सीमापार के मीडिया का भी है ।

पिछले दो दशकों में जंग के कम से कम छह मौके आए लेकिन दोनों ओर के मीडिया के ताल्लुकात इतने खराब कभी नहीं रहे । आखिर मीडिया की इस तल्खी की क्या वजह हो सकती है ? क्या मीडिया वाकई जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है ? क्या मंदी की भंवर में फ़ंसा मीडिया खुद को इसकी जद से बाहर लाने की कोशिश में जुटा है ? क्या इसके पीछे टीआरपी का अर्थशास्त्र है ..? या फ़िर मीडिया पर युद्ध की नई टेक्नालॉजी के प्रयोग में सहयोग का कोई दबाव है ...? वजह चाहे जो भी हो पर मीडिया पहले समाज के प्रति जवाबदेह है । उसकी वफ़ादारी बाज़ार, सरकार और देश से भी पहले जनहित के लिए होना चाहिए , जिसकी चिंता के दावे पर ही मीडिया की विश्वसनीयता टिकी है ।

दरअसल , मीडिया वास्तविक अर्थों में तभी आज़ाद है, जब वह सरकार के अलावा मुनाफ़े के दबाव से भी मुक्त हो । मीडिया अपनी ताकत का इस्तेमाल युद्ध के विकल्प सुझाने में करे , तो शायद वह अपनी भूमिका को सार्थक कर सकेगा । युद्ध का माहौल बनाने से संभव है मीडिया का फ़ायदा बढ जाए लेकिन किस कीमत पर ...? इस वक्त सख्त ज़रुरत है दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और मसले को शान्ति से निपटाने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की ।

रविवार, 7 दिसंबर 2008

पाठक और पत्रकार , शोषण के शिकार

आज एक ब्लॉग पर वॉयस ऑफ़ इंडिया के दफ़्तर में चल रही उठापटक की खबर ने एक बार फ़िर सोच में डाल दिया । १९९२ की अप्रैल का महीना याद आ गया , जब वीओआई के मुकेश कुमार जी दैनिक नईदुनिया भोपाल में थे और अपने हक की लडाई लडने के संगीन जुर्म में मुझे बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी की जा रही थी । खबर पढकर लगा कि इतने बरसों बाद भी पत्रकारॊं की दुनिया में कोई उत्साहजनक बदलाव नहीं आया ।

इस व्यावसायिक दौर में भी सबकी खबर लेने और सबको खबर देने वाले पत्रकारों की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है । समाज के सभी वर्गों के शोषण को उजागर करने और उसके खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाले ज़्यादातर खबरनवीस मालिकों के आगे घुटने टेक देते हैं ।

आज़ादी की लडाई के दौर में मिशन मानी जाने वाली पत्रकारिता ने अब प्रोफ़ेशन का रुप ले लिया है । अब तो इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया उद्योग में तब्दील होने लगा है । समाचार पत्र छापने वाले प्रतिष्ठान कंपनी कहलाने लगे हैं । लेकिन बडी हैरत की बात है कि सरकारी छूट का लाभ उठाने वाले इन संस्थानों में पत्रकारों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । सरकारी नियम कायदों और श्रम कानूनों की धज्जियां उडाते हुए समाचार पत्र और चैनल लगातार फ़ल फ़ूल रहे हैं । पत्रकारों के नाम पर मिलने वाले फ़ायदों की बंदर बांट भी मालिकों में ही हुई है ।

ये और बात है कि समय के साथ परिपक्वता बढने की बजाय दिनों दिन यह पेशा बचकानापन अख्तियार करता जा रहा है । मालिक के चाटुकार पहले भी मौज उडाते थे और आज भी मलाई सूंत रहे हैं । लेकिन मूल्यों की वकालत करने वालों के लिए ना पहले जगह थी ,ना ही अब है ।
अखबार बाज़ार का हिस्सा बन चुके हैं । खबरों और आलेखॊं की शक्ल में तरह - तरह के प्राडक्ट के विज्ञापन दिखाई देते हैं । समझना मुश्किल है कि क्या समाचार है और क्या इश्तेहार ? सरकारी अंकुश को अपनी जेब में रखकर अखबार मालिक , पाठक और पत्रकार दोनों के ही शोषण पर आमादा हैं ।

पाठक को बेवजह वह सब पढने पर मजबूर किया जा रहा है , जिसमें उसकी कतई रुचि नहीं । लेकिन विज्ञापन दाताओं का बाज़ार बढाने के लिए ऎसी ही बेहूदा खबरें बनाई और बेची जा रही हैं । मुझे तो
कई बार लगता है कि दिन की शुरुआत में ही हम हर रोज़ ढाई से तीन रुपए की ठगी के शिकार हो जाते हैं । हम तो न्यूज़ पेपर लेते हैं खबरों के लिए , लेकिन वहां समाचार तो छोडिए कोई विचार भी नहीं होते । वहां तो होता है व्यापार .... या कोरी बकवास....... ।

कायदे से तो इन अखबार वालों से पाठकों को मासिक तौर पर नियमित पारिश्रमिक का भुगतान मिलना चाहिए । गहराई में जाएं , तो पाएंगे कि पाठक भी इस व्यवसाय का बराबर का भागीदार है । मेरी निगाह में सर्कुलेशन के आधार पर होने वाली विज्ञापन की आय का लाभांश का हकदार पाठक ही है । पाठकों को संस्थानों पर मुफ़्त में अखबार देने के लिए दबाव बनाना चाहिए या अपने शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए अखबारों का बहिष्कार करना चाहिए ,ताकि समाचारों के नाम पर छपने वाले कचरे से निजात मिल सके ।

यह गुलो बुलबुल का अफ़साना कहाँ
यह हसीं ख्वाबों की नक्काशी नहीं
है अमानत कौम की मेरी कलम
मेरा फ़न लफ़्ज़ों की अय्याशी नहीं ।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

सेना पर तोहमत से पहले , मीडिया झांके अपनी गिरेबां

मुम्बई हमले के बाद सरकार गाइड लाइन बनाकर खबरिया चैनलों पर लगाम कसने की तैयारी में जुट गई है । सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एडवायज़री को न्यूज़ चैनलों के संपादकों की संस्था ’ न्यूज़ ब्राडकास्टर्स अथारिटी ’ ने सिरे से खारिज कर दिया है । उलटा तोहमत जड दी है कि सरकार के नाकारापन और नेताओं की बददिमागी को जनता के सामने लाने से बौखला कर यह कदम उठाया जा रहा है । लेकिन बेलगाम और बेकाबू हो चुके खबरिया चैनलों का आरोप क्या सही है ?

ज़ी न्यूज़ पर नौसेना और कोस्ट गार्ड को निशाना बना कर एक ही खबर लगातार हर घंटे दिखाई जा रही है । धीर गंभीर नज़र आने वाले इन पत्रकारों में अचानक अपने पेशे के प्रति इतनी ईमानदारी कहां से पैदा हो गई ? सेना के खिलाफ़ मोर्चा खोलने का यही मौका मिला इन्हें ..? वैसे इन्हें देश की सुरक्षा एजेंसियों पर सरे आम कीचड उछालने का हक किसने दिया ? रक्षा संबधी दस्तावेज़ों को जगज़ाहिर कर महामना पुण्य प्रसून वाजपेयी पत्रकारिता के कौन से मानदंड स्थापित कर रहे है । ये तथ्य तो सभी ने मान लिया है कि केन्द्र सरकार के नाकारापन ने देश को ये दिन दिखाया है ,लेकिन चैनल देश की सेना का मनोबल तोड कर कौन से झंडे गाड रहे हैं ?

दाउद इब्राहीम ,अबू सलेम ,बबलू श्रीवास्तव जैसे लोगों की ’वीर गाथाए” गाने वालों को कोई हक नहीं बनता देश की सुरक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड करने का ..। राखी सावंत , मोनिका बेदी और ऎश्वर्या के प्रेम के चर्चे कर अपने खर्चे निकालने वाले बकबकिया चैनलों की देश को "घूस की तरह पोला " करने में खासी भूमिका रही है । प्रो. मटुकनाथ को ’ लव गुरु” के खिताब से नवाज़ कर सामाजिक दुराचार को प्रतिष्ठित करने वाले किस हक से सामाजिक सरोकारों का सवाल उठाते हैं ?

इलेक्ट्रानिक मीडिया को भाट - चारण भी नहीं कहा जा सकता । इन्हें मजमा लगाने वाला कहना भी ठीक नहीं होगा ,क्योंकि डुगडुगी बजा कर भीड जुटाने वाला मदारी भी तमाशबीनों के मनोरंजन के साथ - साथ बीच - बीच में सामाजिक सरोकारों से जुडी तीखी बात चुटीले अंदाज़ में कहने से नहीं चूकता । सदी के महानायक के इकलौते बेटे के विवाह समारोह में सार्वजनिक रुप से लतियाए जाने के बाद कुंईं -कुंई ..... करते हुए एक बार फ़िर उसी चौखट पर दुम हिलाने वाले ये लोग क्या वाकई देश के दुख में दुबले हो रहे हैं .........?

सबसे तेज़ होने का दम भरने वाले खबरची चैनल में काम कर चुके मेरे एक मित्र ने बताया था कि उन्हें सख्त हिदायत थी कि समाज के निचले तबके यानी रुख्रे - सूखे चेहरों से जुडे मुद्दों के लिए समाचार बुलेटिन में कोई जगह नहीं है । ये और बात है कि चैनल को नाग - नागिन के जोडे के प्रणय प्रसंग या फ़िर नाग के मानव अवतार से बातचीत का चौबीस घंटे का लाइव कवरेज दिखाने से गुरेज़ नहीं ।

क्या ये चैनल देश को भूत - प्रेत , तंत्र मंत्र , ज्योतिष , वास्तु की अफ़ीम चटाने के गुनहगार नहीं हैं ? इतना ही नहीं क्राइम और इस तरह की खबरों से परहेज़ का दावा करने वाले एक चैनल ने मानव अधिकारों और धर्म निरपेक्षता के नाम पर जहर फ़ैलाने के सिवाय कुछ नहीं किया । अमीरों और गरीबों के बीच की लकीर को गहरा करने का श्रेय भी काफ़ी हद तक इन्हीं को जाता है । इसी चैनल ने चमक - दमक भरे आधुनिक वातानुकूलित बाज़ारों में बिकने वाली चीज़ों का बखान कर मध्यम वर्ग को ललचाया । पहुंच से बाहर की चीज़ों को येन केन प्रकारेण हासिल करने की चाहत के नतीजे सबके सामने हैं । देश में ज़मीर की कीमत इतनी कम पहले कभी नहीं थी । तब भी नहीं जब लोगों के पास ना दो वक्त की रोटी थी और ना तन ढकने को कपडा ...। देश में फ़िलहाल सब कुछ बिकाऊ है ... सब कुछ .....जी हां सभी कुछ ..........।

इसका मतलब कतई ये नहीं कि सेना में अनियमितताएं नहीं हो रही । लेकिन मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास करना ही होगा , क्योंकि इस समय एकजुट होकर सबसे बडी समस्या का मुकाबला करने की दरकार है । मीडिया इतनी ही गंभीर है , तो ये बातें पहले क्यों नहीं उठाई या देश हित में कुछ दिन रुकने का संयम और सब्र क्यों नहीं रखा ? पहले जनता को रासरंग में डुबो कर गाफ़िल बनाया , फ़िर मुम्बई हमले के लाइव कवरेज और गैर ज़िम्मेदाराना बातों से देश की स्थिति को अंतरराष्ट्रीय स्तर कमज़ोर करने का पाप किया , इस कुकर्म को छिपाने के लिए नेताओं के खिलाफ़ बन रहे माहौल भुनाने में कोर कसर नहीं छोडी और अब किसी भी तरह के नियंत्रण से इंकार की सीनाज़ोरी ......।

बडा कनफ़्यूज़न है । चैनल देश के लिए वाकई चिंतित हैं या कमाई के लिए देश के दुश्मनों के हाथ का खिलौना बन चुके हैं कह पाना बडा ही मुश्किल है । हे भगवान [ अगर वाकई तू है तो ...] इन शाख पर बैठे उल्लुओं को सदबुद्धि दे । इन्हें बता कि देश हित में ही इनका हित है । देश में हालात माकूल होंगे तभी इनका तमाशा चमकेगा । अफ़रा तफ़री के माहौल में तो बोरिया बिस्तर सिमटते देर नहीं लगेगी । सेना देश का आत्म सम्मान और गौरव है । उसके खिलाफ़ संदेह के बीज बो कर जाने - अनजाने दुश्मनों के हाथ मज़बूत करना राष्ट्रद्रोह है........

आते - आते आएगा उनको खयाल
जाते - जाते बेखयाली जाएगी ।


चित्र - बीबीसी हिन्दी डाट काम से साभार