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शनिवार, 17 अगस्त 2013

भगवद्गीता की राजनीति - नीति सही ना नीयत

फ़ल की इच्छा किए बगैर कर्म करने की सीख देने वाली भगवद्गीता का पाठ बच्चों को पढ़ाने की तैयारी में जुटी प्रदेश सरकार ने अपने इस राजनीतिक कर्म के "फ़ल" का अँदाज़ा लगते ही आनन-फ़ानन में कदम पीछे खींच लिए हैं। मदरसों में गीता पढ़ाने पर मचे बवाल के बाद रक्षात्मक मुद्रा में आई सरकार ने साफ किया कि जिन कक्षाओं की उर्दू पाठ्यपुस्तकों में इन पाठों को शामिल किया गया है, उनमें परीक्षा के आधार पर कक्षा में रोकने का प्रावधान नहीं है। फिर भी यदि किसी विद्यार्थी की रूचि इन पाठों को प़़ढने में नहीं है तो इन्हें वैकल्पिक माना जाएगा। वंदेमातरम और सूर्य नमस्कार के मुद्दे पर मुँह की खाने के बाद सरकार ने इसी तरह फ़ैसले पलटे थे। प्रदेश सरकार ने राज्य के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने वाला अपना आदेश वापस ले लिया है। गौरतलब है कि सरकार के इस आदेश पर धार्मिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। कुछ संगठनों ने कोर्ट में भी जाने की चेतावनी दी थी।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इसे लेकर जो विवाद पैदा हुआ वह सही नहीं था। उन्होंने कहा कि जिस आदेश के कारण विवाद की स्थिति पैदा हुई उसे वापस लिया जाता है। शिवराज का कहना है कि सरकारी आदेश से कुछ गलतफहमी हो गई थी, जिसके बाद मदरसों में भी नए सत्र की किताबों में गीता के अध्याय जोड़ दिए गए।
राज्य सरकार ने एक जुलाई को जारी अधिसूचना के जरिए प्रदेश के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने का आदेश जारी किया था। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद मुस्लिम संगठनों सहित काँग्रेस ने भी इसका भारी विरोध किया और इसे दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया था। इस सबके बीच सत्ता की हैट्रिक लगाने की चाहत पाले बैठे मुख्यमंत्री इस फैसले के व्यापक विरोध से बुरी तरह परेशान थे। उन्होंने मुख्य सचिव और अन्य आला अफसरों से चर्चा करने के बाद विवादित फैसले को निरस्त करने के आदेश दिए। इसके बाद इसी अगस्त माह की एक तारीख को जारी अधिसूचना पाँच दिन बाद निरस्त कर दी गई। नए आदेश के बाद अब सिर्फ हिन्दी की किताबों में ही गीता का पाठ जारी रहेगा।
 गौरतलब है कि राज्य सरकार ने पाठ्यपुस्तक अधिनियम में संशोधन कर मदरसों के उर्दू पाठ्यक्रम में गीता की शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। इसके तहत कक्षा 1 और 2 की विशिष्ट उर्दू तथा विशिष्ट अँग्रेजी के साथ इसी शिक्षण सत्र से भगवद्गीता के अध्याय पढ़ाए जाना थे। राज्य शिक्षा केंद्र और एमपी मदरसा बोर्ड से संबद्ध सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए यह नियम अनिवार्य किया गया था। कक्षा 3 से 8 तक गीता के अध्याय सामान्य हिन्दी के पाठयक्रम में जोड़े जाने की बात कही गई।
राज्य सरकार के इस फैसले की खिलाफ़त में मध्य प्रदेश कैथोलिक काउंसिल, मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ और मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच भी उतर आए थे। अल्पसंख्यक संगठनों ने चेतावनी दी थी कि फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाएँगे। उधर ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य आरिफ मसूद ने राज्यपाल रामनरेश यादव को सौंपे ज्ञापन में अधिसूचना निरस्त करने की माँग करते हुए कहा था कि एक धर्म की पुस्तक का पाठ पढ़ाया जाना संविधान के विपरीत है और मुस्लिम समाज इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रुप में देखता है।
मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ के संयोजक आनंद ने कहा था, 'हम इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर सकते हैं। धार्मिक मामलों से सरकार को दूर रहना चाहिए, यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा है। सरकार गलत परंपरा की शुरुआत कर रही है।'
राज्य सरकार का तर्क है कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जनवरी, 2012 में स्कूलों में गीता-सार पढ़ाए जाने के शासन के निर्णय के विरूद्ध कैथोलिक बिशप कौंसिल की याचिका पर व्यवस्था दी कि गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, न कि भारत के धर्म पर।
सरकारी बयान के मुताबिक पाठ्य-पुस्तकों में गीता आधारित सामग्री का निर्णय नया नहीं है। वर्ष 2011-12 से गीता के व्यावहारिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित विभिन्न पाठ्य सामग्री, कक्षा 1 से 12 की भाषा की पुस्तकों में समाहित की गई है। ये पुस्तकें पिछले दो वर्षों से शासकीय शालाओं के साथ ही अनुदान प्राप्त मदरसों में प्रचलित हैं, जिसके संबंध में किसी प्रकार की आपत्ति सामने नहीं आई है।
 गीता के व्यवहारिक जीवन में उपयोगी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जो पाठ स्कूली पुस्तकों में जोड़े गए हैं, उन्हें धार्मिक या साम्प्रदायिक नजरिए से देखना गलत है। यह मूलतः नैतिक शिक्षा तथा जिसे भावनात्मक परिपक्वताओं का शिक्षण कहा जाता है, उसके अनुरूप की गई कार्रवाई है। सरकारी विज्ञप्ति कहती है कि उपरोक्त वस्तु-स्थिति के आधार पर यह कहना कि, पाठ्य-पुस्तकों में चुनावी या धार्मिक भावना से कोई पाठ शामिल किया गया है, पूर्णतः भ्रामक एवं गलत होगा।
 ऎसे में लाख टके का सवाल यही है कि निर्णय सही और नीयत साफ़ है, तो फ़िर विरोध की सुगबुगाहट शुरू होते ही कदम क्यों खींचे ? समूचे घटनाक्रम पर नज़र डालें तो पाएँगे कि शिवराज सिंह चौहान नरेन्द्र मोदी से आगे निकलने की होड़ में आए दिन "गोड़" फ़ुड़वाने पर आमादा हैं। देश में कराए तमाम सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक भले ही भाजपा के लिए अभी दिल्ली दूर हो , लेकिन खुद को सर्वमान्य और हर वर्ग में स्वीकार्य बनाने की जुगत भिड़ा रहे शिवराज आए दिन नए-नए शिगूफ़े छोड़ते रहते हैं।
 सेक्युलर छबि बनाने की गरज से रमज़ान के मुकद्दस महीने में मुख्यमंत्री निवास में रोज़ा इफ़्तारी करते हैं, वे मोदी को निपटाने और हिन्दू मतों को साधने के फ़ेर में टोपी तो पहनते हैं- मगर "केसरिया"। इसी तरह ईद की मुबारकबाद के मौके पर पहले तो रज़ा मुराद को आगे कर अपनी मुराद साधने की कोशिश की और जब विवाद बढ़ा तो मोदी की शान में कसीदे पढ़ने लगे। मज़ेदार बात तो यह है कि जो शख्स आठ साल से निर्बाध और एकछत्र राजकाज संभालने के बावजूद अब तक ना तो पद के अनुरूप गंभीरता पैदा कर सका हो और ना ही सूबे के मुखिया के तौर पर काबिलियत साबित कर सका हो, वो सीधे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए प्रस्तुत है। शायद संत कबीर ने ऎसे ही किसी दौर की आहट को पढ़कर कहा होगा - "करम की गति न्यारी संतो, .................पंडित फ़िरत भिखारी।"
मुख्यमंत्री के हालिया फ़ैसले एक मर्तबा फ़िर साबित कर गए कि विरोध और दबाव का प्रतिरोध करने की सलाहियत उनमें रत्ती भर भी नहीं है। जब भी उनके फ़ैसलों पर सवाल उठे, जवाब देने की बजाय उन्होंने "खोल" में घुस जाना ही बेहतर समझा। वे किसी भी मुद्दे पर ज़्यादा वक्त कायम नहीं रह पाते और दबाव बढ़ने पर फ़ौरन से पेशतर हथियार डाल देते हैं। अँदरखाने पक्ष-विपक्ष के हर छोटे-बड़े नेताओं से डील कर भले ही शिवराज ने अपना कार्यकाल "स्वर्णिम" होने का मुगालता पाल लिया हो, हकीकतन इस स्वेच्छाचारिता ने प्रदेश के हर संवैधानिक पद और संस्थान की गरिमा को ध्वस्त कर दिया है।
अपना उल्लू सीधा करने के लिए कभी संघ से दूरी बनाने की कोशिश और ज़रूरत पड़ने पर  खुद को हिन्दुत्व का ध्वजवाहक बताने की चाहत में उनकी छबि निरंतर "लिजलिजीहोती चली जा रही है। वैसे शिवराज की एक कदम आगे चार कदम पीछे" की कार्यपद्धति ने उनकी नेतृत्व क्षमता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। सूबे के मुखिया के तौर पर वे किंकर्तव्यविमूढ़ ही नज़र आते रहे हैं। गीता पर पैदा हुए विवाद में मीडिया के काँधे पर सवार प्रधानमंत्री पद के स्वयंभू दावेदार ने हथियार डाल दिए।
हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने की नीयत से किए गए फ़ैसले का विरोध ज़ोर पकड़ते ही हिन्दुत्व पर आगे बढ़ने के इरादे को उन्होंने पल भर में ही तिलाँजलि दे डाली। वैसे सूबे की जनता को भी अब गंभीरता से सोचना होगा। सत्ता में एक दशक का सफ़र तय के बाद भी जो दल अब तक सूबे के लिए एक परिपक्व नेतृत्व तैयार नहीं कर सका हो, क्या उसके हाथ में तीसरी बार काँग्रेस के निकम्मेपन के चलते सत्ता सौंपना उचित रहेगा।  

सोमवार, 8 जुलाई 2013

सीडी की सियासत....!


मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री रहे राघवजी भाई को चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली बीजेपी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अस्सीवीं सालगिरह के मौके पर पचपन साल की सेवा के बदले में पार्टी की तरफ़ से दिया गया यह तोहफ़ा राघवजी भाई के लिए वाकई यादगार रहेगा। यूँ तो प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, अजय विश्नोई, ध्रुवनारायण सिंह समेत शिवराज मंत्रिमंडल के तमाम सदस्यों पर अनैतिक आचरण के आरोप लगते रहे हैं।लेकिन इससे पहले पार्टी ने कितने मामलों में सख्ती दिखाने की नज़ीर पेश की? फ़िर ऎसा भी नहीं है कि राघवजी पर इस तरह का आरोप पहली मर्तबा लगा हो। दो साल पहले भी अनैतिक यौनाचार के मामले में उन पर अँगुली उठी थी । तब भी सीडी की बात सामने आई थी लेकिन जल्दी ही मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

दरअसल यह नैतिक आचरण से ज्यादा सियासी मुद्दा है। भाजपा की अँदरुनी राजनीति के साथ ही पक्ष-प्रतिपक्ष के मिलीजुली "प्रदर्शन मुकाबले" के संकेत भी इस घटनाक्रम में साफ़ मिलते हैं। मध्यप्रदेश में पिछले सात सालों से जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसमें विपक्ष का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह वही ज़ुबान बोलते हैं, जो सूबे के मुखिया को रास आए। काँग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सत्ता में वापसी के लिए कोशिश करते हैं लेकिन अजय सिंह अपने बयानों या फ़िर अपने तौर तरीकों से इन प्रयासों में तुरंत ही पलीता लगा देते हैं ।

राघवजी के मामले में भी विशुध्द रूप से पटवा-सारंग गुट की सियासी शैली साफ़ झलकती है। इसी सियासी वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब चेले ने भी ऎन चुनावों के पहले वही दाँव फ़ेंका है। प्रधानमंत्री पद की रेस में अपना नाम खुद ही आगे बढ़ाने की जुगत में लगे सूबे के मुखिया इन दिनों किसी और ही गुणा-भाग में लगे हैं। वे विदिशा से अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा कर विधानसभा में पहुँचाने का इरादा रखते हैं। राघवजी के ५५ साल के राजनीतिक सफ़र को एक झटके में नगण्य कर दिया गया। लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी ने आनन फ़ानन में बगैर जाँच किए जिस तरह से राघवजी को बर्खास्त किया, वह भी कई संकेत छोड़ता है।

इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार के तौर पर शिवशंकर पटेरिया खुद सामने आए हैं । किसी जमाने में उमा भारती के खास रहे पटेरिया लम्बे वक्त से हाशिये पर हैं। वैसे वो मौके और वक्त की नज़ाकत के मुताबिक पाला बदलने में खासे माहिर हैं। इस सीडी कांड के बाद एकाएक सुर्खियों में आए पटेरिया "मुक्त कंठ" से जिस तरह "राग शिवराज" गा रहे हैं। नज़दीक आते चुनावों के मद्देनज़र उनकी उलट-बाँसी विधानसभा क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी को लेकर प्रदेश भाजपा में मचे घमासान का मुज़ाहिरा भी करती है।

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि हाल के दिनों में नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर सीधे और तीखे हमले किए थे। प्रदेश में परिवर्तन यात्राओं के दौरान अजय सिंह ने शिवराज सिह चौहान और उनकी पत्नी साधना सिंह पर कई आरोप लगाए और पत्र लिखकर जवाब भी माँगा। पावस सत्र के दौरान इस बार काँग्रेस एक बार फ़िर अविश्वास प्रस्ताव ला रही है। ऎसे में विपक्ष के आरोपों की धार को कुँद करने के लिए चला गया "अस्त्र" लगता है हमेशा की तरह निशाना पर लगा है। विपक्ष के वार की धा को भोथर करने में इसमें "फ़ूल छाप काँग्रेसियों" की भी भूमिका अहम है।

राघवजी के सीडी काँड के जरिए एक साथ कई निशाने साधे गए हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम पर सहमति जताने वाले संघ को भी इस बहाने अपनी ताकत का एहसास कराने की कोशिश की गई है। यानी इस समय सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है। 

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

बिकाऊ विपक्ष के कँधे पर सवार "विकास पुरुष"


मध्यप्रदेश मे राजनीतिक और पत्रकारीय धर्म से मुँह फ़ेर चुके लोगों का बोलबाला होने से चारों ओर "धूरधानी" मची हुई है। बिकाऊ विपक्ष और बज़रिये जनसंपर्क विभाग सत्ता की चौखट पर कलम गिरवी रख चुके पत्रकारों की बदौलत प्रदेश विकास के ग्राफ़ पर कुलाँचे मारता दिखाई दे रहा है। मगर हकीकत के आइने में सत्ता पक्ष के साथ गलबहियाँ करते विपक्ष और पत्रकारों के बदनुमा चेहरों को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। हाल ही में राजनीतिक चिंतक के.एन. गोविन्दाचार्य ने मध्यप्रदेश सरकार के बारे मे कहा था प्रदेश की भाजपा सरकार पूर्व शासित काँग्रेस की दिग्विजय सरकार से ज्यादा भ्रष्ट है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार को रोकने में असफल साबित हुए हैं। गोविंदाचार्य ने कहा है कि इतना भ्रष्टाचार तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जमाने में भी नहीं था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मंत्रियों पर अँकुश नहीं रखने के कारण प्रदेश में भ्रष्टाचार में बेतहाशा वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार चलाने के लिए चौहान ने मंत्रियों को खुली छूट दे रखी है। उन्होंने कहा कि भाजपा के शासन में उद्योगपति और अधिकारी खुश हैं, जबकि किसान दुखी हैं।
गोविंदाचार्य की तस्दीक प्रदेश के हालात भी करते हैं। प्रदेश में काँग्रेस के बड़े नेता सत्ताधारी दल के साथ मिलकर जमकर फ़ायदा ले रहे हैं । नतीजतन विपक्ष का अँकुश पूरी तरह हट चुका है। जनसंपर्क विभाग ने सैकड़ों करोड़ के बजट के बूते कहीं विज्ञापनों के ज़रिए अखबार मालिकों, तो कहीं सीधे पत्रकारों को साध रखा है। जो पत्रकार सच बात कहने का " दुस्साहस " करते हैं, उन्हें सरकारी अधिमान्यता देने से भी इंकार कर दिया जाता है। उधर कई नौकरशाह सरकार के हमजोली बनकर हजारों करोड़ के आसामी बन चुके हैं। ये वो अधिकारी हैं, जो प्रदेश से कमाया धन दूसरे प्रदेशों की प्रॉपर्टी में निवेश कर रहे हैं और जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।
दूसरी तरफ़ अवैध खनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छोटे कर्मचारियों को शातिताना अँदाज़ में हमेशा के लिए खामोश किया जा रहा है। हाल ही में रतलाम में खनिज निेरीक्षक संजय भार्गव की सड़क हादसे में मौत हो गई। इससे पहले भोपाल से लगे बैरसिया के गाँव में पीडब्ल्यूडी के सब इंजीनियर रामेशवर प्रसाद चतुर्वेदी की भी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। सरसरी तौर पर ये सामान्य हादसे लगते हैं। लेकिन इन मौतों को बड़े ही शातिराना तरीके से अँजाम तक पहुँचाया गया, जिससे "हत्या" को हादसा साबित किया जा सके। इन दोनों ही मामलों में मु्ख्यमंत्री निवास में सीधे धमक रखने वाले प्रदेश के एक बड़े ठेकेदार का नाम सामने आ रहा है। इसी तरह पिछले साल होली पर मुरैना में खनन माफ़ियाओं ने एक होनहार आईपीएस नरेन्द्र कुमार को मौत के घाट उतार दिया था। मगर हुआ क्या ?
जिस सीबीआई पर काँग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है, उसी ने एक अदने से आदमी को अपराधी बनाकर पेश कर दिया। आनन-फ़ानन में अदालती फ़ैसला भी हो गया। जिस तरह आरुषि-हेमराज मामले में सीबीआई ने कृष्णा, राजकुमार और प्रदीप मंडल को फ़ाँसी का फ़ँदा पहनाने की पूरी तैयारी कर ली थी । उसी तरह शहला मसूद हत्याकांड में रसूखदार लोगों को बचाने के लिए ज़ाहिदा और सबा जैसे लोगों को बिला वजह फ़ँसाया जा रहा है। फ़र्क है तो सिर्फ़ इतना कि दिल्ली की मीडिया कृष्णा और राजकुमार की बेगुनाही साबित करने के किए उठ खड़ी हुई थी। मगर प्रदेश में सम्मानों, प्रोजेक्टों, विज्ञापनों, सस्ते प्लाटों और इसी तरह के कई अन्य फ़ायदों के बोझ तले दबे कलमवीरों का ज़मीर क्या कभी जाग पाएगा।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

युवराज की क्लास पर मचा बवाल

दलितों के घर खाना खाने और रात बिताने के बाद काँग्रेस के युवराज आजकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी की खाक छान रहे हैं । कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी  के विश्वविद्यालयों के दौरे से राजनीति गरमा गई है। बीजेपी सांसद अनिल दवे  काँग्रेस के युवराज से होड़ की ठान बैठे हैं । अब राहुल युवाओं के बीच कितनी पैठ बना पाये हैं , यह तो फ़िलहाल कह पाना मुश्किल है । लेकिन भाजपा संसाद अनिल माधव दवे ने विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को पत्र लिखकर राहुल की तर्ज पर बतौर सांसद उन्हें भी अपने यहां छात्रों से संवाद कायम करने के लिए आमंत्रित करने की माँगकर धर्मसंकट में डाल दिया है।

 मुख्यमंत्री का कॉलेज कैंपस को राजनीति से दूर रखने का बयान और सांसद का भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और सागर यूनिवर्सिटी के प्रमुखों को लिखा गया पत्र बताता है कि बीजेपी हाथ आये इस मुद्दे को हवा देकर राजनीतिक फ़ायदा लेना चाहती है । दवे ने पत्र में कहा है कि राहुल की तर्ज पर बतौर सांसद उन्हें भी छात्रों से संवाद कायम करने के लिए आमंत्रित किया जाये । हाल ही में कोपेनहेगन सम्मेलन से लौटे दवे का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग का विषय छात्रों में जाना समसामयिक है। इसलिए शिक्षण संस्थानों में राहुल गांधी की तरह उनका भी कार्यक्रम आयोजित हो।

इंदौर में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में राहुल के कार्यक्रम को लेकर राज्य सरकार के उच्च शिक्षा आयुक्त ने कुलपति और रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया है। उच्च शिक्षा आयुक्त ने कुलपति अजित सहरावत और रजिस्टार आरडी मुसलगांवकर को नोटिस जारी कर पूछा है कि कांग्रेस नेता के राजनीतिक कार्यक्रम की इजाजत किसने दी? मंगलवार को राहुल ने यहाँ विद्यार्थियों से रू-ब-रू होकर राजनीति में सक्रिय होने को कहा था। दूसरी ओर भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर ने गोवा विवि कैंपस में राहुल के राजनीतिक कार्यक्रम को अनुमति दिए जाने के लिए रजिस्टार को बर्खास्त करने की माँग की है। इससे पहले कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति राहुल गाँधी को कार्यक्रम के लिए आमंत्रित करने के मामले में मुख्यमंत्री मायावती के कोपभाजन बने थे ।

नोटिस के सवाल पर दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को अपने गिरेबाँ में झाँकने की नसीहत दे डाली है । दिग्विजय ने पलटवार करते हुए पूछा कि मुख्यमंत्री बताएं कि वे कितनी बार विश्वविद्यालयों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में गए हैं। जहां तक राहुल गांधी के विश्वविद्यालय के दौरों का सवाल है, तो उन्हें आमंत्रित किया गया था। सिर्फ नोटिस देने का कोई मतलब नहीं है, चौहान को राजनीतिक लड़ाई लड़ना चाहिए। राहुल के बचाव में उतरे एक अन्य काँग्रेस महासचिव और मध्यप्रदेश के प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा-धर्म के नाम पर और राम का नाम बेचकर राजनीति करने वाले मुख्यमंत्री को राहुल गांधी के नाम पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

नौजवानों के बीच जा-जाकर राहुल ने राजनीति में अपराधियों को आने से रोकने की बात कही । यूनिवर्सिटी के छात्रों को राहुल की क्लास में मजा आया लेकिन विपक्ष भी इस मुद्दे पर चुटकी लेने से नहीं चूका । बीजेपी का काँग्रेस को  मशविरा है कि अच्छे काम की शुरुआत घर से ही करना चाहिए। ग्वालियर में लक्ष्मी बाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षण संस्थान में राहुल ने नौजवानों से राजनीति में भाग लेने की अपील की।

राहुल ने छात्रों से कहा कि आप लोग एनएसयूआई या यूथ काँग्रेस से जुड सकते हैं लेकिन इसकी पहली शर्त है धर्मनिरपेक्ष सोच और साफ़ सुथरा चरित्र । आप राजनीति को गंदा न समझें जब अच्छे लोग या युवा राजनीति से जुड़ेंगे तभी राजनीति की स्वच्छ छवि बनेगी। उन्होंने कहा कि युवाओं को खुद आगे आकर राजनीति में अपना योगदान करना चाहिए। आने वाले समय में युवा ही भारत की नींव होंगे। मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में निष्पक्ष चुनाव और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को आगे लाने की वकालत करते हुए श्री गांधी ने कहा कि युवाओं का आह्वान किया कि राजनीति में सकारात्मक बदलाव के लिए उन्हें खुद आगे आते हुए इसका हिस्सा बनना चाहिए।

मध्यप्रदेश बीजेपी के अनुभवी नेताओं का एक नौसीखिये राजनीतिज्ञ के दौरे पर बौखलाना बेवजह है । जब तक दिग्विजय सिंह प्रदेश के बाहर की राजनीति कर रहे हैं और जब तक काँग्रेस की कमान जमुना देवी, सुरेश पचौरी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया सरीखे अपनी ढ़पली-अपना राग अलापने वालों के हाथ में रहेगी, बीजेपी सरकार का बाल भी बाँका नहीं हो सकता, जनता कितनी ही नाराज़ क्यों ना हो जाए। राहुल गाँधी की आँधी आई और चली गई । राज्य सरकार काँग्रेस की मदद से बदस्तूर बेखटके राजपाट चला सकती है । मौजूदा हालात पर उस चीड़िया और किसान की कहानी सटीक बैठती है , किसान के मुँह से गाँव वालों और फ़िर रिश्तेदारों-दोस्तों के भरोसे फ़सल काटने की बात सुनकर निश्चिंत रहने वाली चिड़िया अपने बच्चों को लेकर खेत से उस वक्त तक फ़ुर्र नहीं होती , जब तक किसान खुद फ़सल काटने की तैयारी नहीं कर लेता । लिहाज़ा बीजेपी के पास अभी पूरे-पूरे चार साल हैं -जल,जंगल और ज़मीन बेचकर अपनी झोली भरने के .......।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

राजनीति के अखाड़े में "मैच फ़िक्सिंग"

भोपाल नगर निगम में तीसरी पारी खेलने का सपना देख रही काँग्रेस ने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है । दर असल बाबूलाल गौर और कृष्णा गौर को मतदाताओं का शुक्रिया अदा करने से पहले काँग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी का भी एहसानमंद होना चाहिए, जिन्होंने गुमनाम चेहरे को टिकट देकर ससुर-बहू की "अलबेली जोड़ी" का ख्वाब पूरा करने में अप्रत्यक्ष तौर पर भरपूर मदद की । वरना बीजेपी के दिग्गजों और खुद मुख्यमंत्री ने गौर के बरसो से सँजोये ख्वाब को चकनाचूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी ।

भोपाल में बीजेपी की जीत का सेहरा काँग्रेस के सिर ही बाँधा जाना ठीक रहेगा । कृष्णा गौर को काँटे की टक्कर के बाद मिली जीत ने कई नये सवालों को जन्म दे दिया है । ये जीत "अँधों के हाथी" से कम नहीं । राजनीतिक विश्लेषक इसमें कई एंगल तलाश सकते हैं । संगठन और सत्ता की ताकत के बावजूद पार्टी को महापौर का चुनाव जीतने में पसीना आ गया। पार्टी का गढ़ माने जाने वाले विधानसभा क्षेत्रों में न केवल कांग्रेस ने सेंध लगाई बल्कि अपना वोट बढ़ाकर आखिरी तक भाजपा को साँसत में भी रखा। भाजपा नेताओं द्वारा बढ़त को लेकर किए गए दावे फेल हो गए।

इस सीट पर पूरे प्रदेश की निगाह लगी हुई थी। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हुए पार्टी ने तमाम अंतर्विरोध के बावजूद सामान्य महिला सीट पर पिछड़े वर्ग की कृष्णा गौर को मैदान में उतारा और स्थिति को अपने अनुकूल बनाने के प्रयास किए। हालाँकि गौर ने काँग्रेस उम्मीदवार आभा सिंह को काँटे की टक्कर में 15 हजार से अधिक मतों से हराकर प्रतिष्ठित महापौर सीट काँग्रेस से छीन ली । लेकिन वोटों का अँतर और काँग्रेस को मिले मतों की संख्या पर गौर करें, तो ये आँकड़े जीत के पीछे छिपी करारी शिकस्त की चुगली करते हैं । भाजपा प्रत्याशी कृष्णा गौर को 2 लाख 62 हजार 214 मत मिले, जबकि आभा सिंह को कुल 2 लाख 46 हजार 893 वोट हासिल हुए । यानी उन्होंने काँग्रेस उम्मीदवार आभा अखिलेश सिंह को 15 हजार 321 मतों से मात दी।

गौर करने वाली बात यह है कि भोपाल के सात विधान सभा क्षेत्रों में से छह पर बीजेपी का कब्ज़ा है । साथ ही लोकसभा सीट भी बीजेपी के ही पास है । इस तरह कहा जा सकता है कि फ़िलवक्त भोपाल पूरी तरह भगवा रंग में रंगा हुआ है । बाबूलाल गौर लम्बे समय से "जनता दरबार" सजाकर राजधानी के स्वयंभू नवाब बने बैठे हैं । आये दिन बहू को साथ लेकर भोपाल की नालियों और गली-कूचों का निरीक्षण करना उनका खास शगल रहा है । सरकारी और गैर कार्यक्रमों में शिरकत, भूमि पूजन, गेंती-फ़ावड़ा चलाते हुए फ़ोटो सेशन करा कर अखबारों में कमोबेश हर रोज़ जगह पाने वाली कृष्णा ने शहर के होर्डिंग्स और दीवारों पर भी पिछले चार साल से स्थायी कब्ज़ा जमा रखा था । इतने जानेमाने चेहरे का मुकाबला एक गुमनाम प्रतिद्वंद्वी से होने के बावजूद हार-जीत का फ़ासला महज़ सवा पंद्रह हज़ार वोट ...?

यहाँ यह जान लेना बेहद ज़रुरी हो जाता है कि शहर में कई मतदान केन्द्रों की मतपेटियों को लेकर रवाना हुए ट्रक ने दस मिनट के रास्ते को तय करने में पूरे साढ़े सात घंटे लगाये । साथ ही एक मतपेटी में कुल मतदाताओं की तादाद से भी ज़्यादा वोट पाये गये । आखिरी दो घंटों में जमकर वोटिंग की खबरें हैं । इस वोटिंग की खासियत यह रही कि मतदाताओं को अपनी पहचान बताने के लिये किसी दस्तावेज़ की ज़रुरत ही नहीं थी । खुले आम धाँधली और सरकारी मशीनरी के दुरपयोग के बीच जीत का मामूली अंतर बीजेपी और खास तौर पर बाबूलाल गौर के मुँह पर करारा तमाचा है । यहाँ आभा सिंह के प्रदर्शन की सराहना करना लाज़मी है,लेकिन ये समझना होगा कि काँग्रेस को मिला वोट वास्तव में बीजेपी, बाबूलाल गौर और कृष्णा गौर की खिलाफ़त का वोट है । यह नतीजे के पीछे का सच कहता है कि भोपाल की जनता ने कृष्णा गौर को बुरी तरह नकार दिया है । लेकिन लोकतंत्र में वोटों की तादाद ही असली ताकत है । इससे कोई मतलब नहीं कि आखिर ये वोट मतपेटी में आये किस तरह और डाले किसने ? लिहाज़ा कृष्णा गौर भोपाल की महापौर हैं ।

इतना ज़रुर तय है कि नगरीय प्रशासन विभाग ससुर के पास और भोपाल का मेयर पद बहू के पास हो और दोनों की जुगलबंदी का तमाशा जनता पिछले चार सालों से मुँह बाये देखने को बेबस हो , तो भोपाल के दुर्भाग्य पर अफ़सोस जताने के सिवाय कुछ बाकी नहीं रहता । भूमाफ़िया और बिल्डरों की दुलारी ससुर-बहू की जोड़ी की जुगलबंदी को वक्त रहते नहीं तोड़ा गया,तो वो दिन दूर नहीं जब भोपाल की झील पर बड़ी-बड़ी कोठियाँ बन जायेंगी और पेरिस की जगमगाहट भोपाल में लाने के लिये झील में बड़ा भारी मॉल खड़ा कर दिया जायेगा । राज्य सरकार को नैतिक आधार पर बाबूलाल गौर से नगरीय प्रशासन विभाग लेकर उन्हें कोई और महत्वपूर्ण दायित्व सौंप देना चाहिए । वैसे भी अब तक वे भोपाल के अलावा प्रदेश का कोई और हिस्सा देख ही नहीं पाये हैं ।

प्रदेश में जब से काँग्रेस का मुखिया बदला है,तब से राजनीति का एक नया चेहरा सामने आया है । अब मतदाताओं के पास जाने से पहले प्रतिद्वंद्वी पार्टी के साथ मिलकर "दोस्ताना मुकाबला" करने का चलन शुरु हो गया है । भोपाल में कृष्णा के खिलाफ़ उतारे गये उम्मीदवार का चयन इसी चलन की एक और बानगी है । इससे पहले सुषमा स्वराज के खिलाफ़ विदिशा में राजकुमार पटेल की कारगुज़ारी किसी से छिपी नहीं है । मतदाता इस ठगी से हैरान और परेशान है , लेकिन वो समझ नहीं पा रहा कि राजनीति के इन धूर्तों से कैसे निपटा जाये ? राजनीति में योग्यता की बजाय धन की बढ़ती ताकत के चलते काँग्रेस के दिग्गज नेता जनाधार की बजाय "धनाधार" बढ़ाने में जुट गये हैं । अब तक पार्टी के भीतर ही टिकटों की खरीद-फ़रोख्त हुआ करती थी, लेकिन अब एक घाघ खरीददार ने दिन में देखे सपने को साकार करने के लिये विपक्षी दल से हर कीमत पर सौदा कर लिया । राजनीति का यह नया "ट्रेंड" आने वाले वक्त में क्या गुल खिलायेगा ? वोटर इस दोस्ताना मुकाबलों से कैसे निजात पा सकेगा ? क्रिकेट के बाद राजनीति के अखाड़े में मैच फ़िक्सिंग का बढ़ता चलन लोकतंत्र को किस दिशा में ले जायेगा, यह तो आने वाले वक्त में ही साफ़ हो सकेगा ।

शनिवार, 2 मई 2009

"आयारामों" की आवभगत से बीजेपी में खलबली

चुनाव से पहले एकाएक पाला बदल कर बीजेपी का दामन थामने वालों की बाढ़ ने संगठन में असंतोष की चिंगारी सुलगा दी है । काँग्रेस,बीएसपी,सपा सरीखे दलों के नगीने अपने मुकुट में जड़ने की कवायद में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह को ज़बरदस्त कामयाबी हासिल हुई । वे दूसरे दलों के असंतुष्टों की बड़ी तादाद को अपने साथ जोड़ने में सफ़ल भी रहे ।

ये किसी कीर्तिमान से कम नहीं कि महज़ एक पखवाड़े में चार हज़ार से ज़्यादा नेताओं का विश्वास बीजेपी की नीतियों में बढ़ गया । इस हृदय परिवर्तन के कारण अपनी पार्टी में उपेक्षा झेल रहे नेताओं की पूछ-परख एकाएक बढ़ गई । आम चुनाव में प्रदेश में "क्लीन स्वीप" का मंसूबा पाले बैठे शिवराज ने अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने के लिये "दलबदल अभियान" को बखूबी अंजाम दिया । राजनीति के उनके इस अनोखे अंदाज़ की खूब चर्चा रही और इस घटनाक्रम में लोगों की दिलचस्पी भी देखी गई । लेकिन चुनावी खुमार उतरने के साथ ही दूसरे दलों से ससम्मान लाये गये नये साथियों को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनने लगी है । नये सदस्यों को अच्छी खातिर तवज्जो की उम्मीद है,वहीं पार्टी के कर्मठ और समर्पित नेताओं को इस पूछ-परख पर एतराज़ है ।

दल बदल कर आये सभी बड़े नेताओं को अभी तक पार्टी ने चुनाव में झोंक रखा था । इतनी बड़ी संख्या में आये लोगों की भूमिका को लेकर पार्टी के पुराने नेता चिंतित हैं । पार्टी से जुड़े नेता संशय में हैं कि कहीं उनकी निष्ठा और कर्मठता कुछ नेताओं की व्यक्तिगत आकांक्षाओं की भेंट ना चढ़ जायें । कुछ नेता तो यहाँ तक कह रहे हैं कि सक्रिय कार्यकर्ताओं का हक छीनकर यदि इन नवागंतुकों को सत्ता या संगठन में नवाज़ा गया,तो खुले तौर पर नाराज़गी ज़ाहिर की जायेगी ।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक भाजश नेता प्रहलाद पटेल,पूर्व काँग्रेसी मंत्री बालेन्दु शुक्ल,काँग्रेस के पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री नर्मदा प्रसाद शर्मा,पूर्व विधायक मोहर सिंह,सुशीला सिंह,कद्दावर दलित नेता फ़ूल सिंह बरैया,बीएसपी नेता भुजबल सिंह अहिरवार सरीखे कई दिग्गजों के साथ करीब चार हज़ार से ज़्यादा नेताओं ने बीजेपी का दामन थामा है । प्रहलाद पटेल की पार्टी में भूमिका पर फ़िलहाल कोई भी मुँह खोलने को तैयार नहीं है । पार्टी मानती है कि वे तो पहले भी भाजपा के सक्रिय सदस्य रहे हैं और पार्टी की रीति-नीति से बखूबी वाकिफ़ हैं । निश्चित ही वे प्रमुख भूमिका में नज़र आएँगे ।

हालाँकि संगठन दूसरे दलों से आये नेताओं को अपने रंग में रंगने के लिये प्रशिक्षण देने की बात कह रहा है । कहा जा रहा है कि उन्हें पार्टी के आचार-विचार से परिचित कराने के लिये ट्रेनिंग दी जायेगी । पार्टी की विचारधारा को पूरी तरह समझ लेने के बाद ही उनकी सक्रिय भूमिका के बारे में विचार किया जाएगा । मगर लाख टके का सवाल है,"टू मिनट नूडल" युग में किसी नेता के पास क्या इतना धैर्य और वक्त है ? घिस चुके बुज़ुर्गवार नेताओं को नये सिरे से ट्रेनिंग देने का तर्क हास्यास्पद है ।

पार्टी छोड़कर गये नेताओं की घर वापसी पर कार्यकर्ताओं और नेताओं को कोई आपत्ति नहीं है,लेकिन राजनीतिक कद बढ़ाने के लिये शिवराज की सबके लिये पार्टी के दरवाज़े खोल देने की रणनीति कई लोगों को रास नहीं आई । बेशक इस उठापटक से शिवराज को फ़ौरी फ़ायदा तो मिला ही है । आडवाणी और मोदी के साथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नाम शुमार होना उनके लिये खुली आँखों से देखे सपने के साकार होने से कम नहीं । मगर पेचीदा सवाल यही है कि पार्टी इस सपने की क्या और कितनी कीमत चुकाने को तैयार है ?

भुने चने खाकर दिन-दिन भर सूरज की तपिश झेलते हुए जिन लोगों ने पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने का काम किया है,उनकी नज़रों के सामने काजू-किशमिश के फ़क्के लगाने वालों के लिये "रेड कार्पेट वेलकम" क्या गुल खिलायेगा ? क्या संघर्ष की राह पर चल कर सत्ता तक पहुँचने वाले दल के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी पार्टी के लिये सुखद परिणिति कही जा सकेगी ? दिल्ली का ताज पाने के लिये संघर्ष पथ पर चल कर कुंदन बने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को दरकिनार कर दूसरे दलों की "इमीटेशन ज्वेलरी" के बूते बीजेपी कब तक राजनीति की पायदान पर आगे बढ़ सकेगी ? ये तमाम सवाल भविष्य के गर्भ में छिपे हुए हैं । गुज़रता वक्त ही इनका जवाब दे सकेगा ।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

बीजेपी में दलबदलुओं का सैलाब

प्रदेश में यात्राओं,घोषणाओं और महापंचायतों के लिये पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अब प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर के साथ मिल कर तोड़क-फ़ोड़क राजनीति की नई इबारत लिखने में व्यस्त हैं । भाजपा की जुगल जोड़ी " शिवराज- तोमर" ने दलबदल के नये कीर्तिमान बनाने का बीड़ा उठा लिया है । विचारधारा और राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर भाजपा ने सभी दलों के नेताओं के लिये अपने दरवाज़े खोल दिये हैं । घोषणावीर शिवराज इन दिनों " वसुधैव कुटुम्बकम" की अवधारणा को साकार करने के लिये रात-दिन एक किये हुए हैं ।

अपने दलों में उपेक्षित नेताओं के स्वागत में भाजपा ने पलक-पाँवड़े बिछा दिये हैं । हालाँकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस "भीड़ बढ़ाऊ" रणनीति पर नाखुशी ज़ाहिर कर रहे हैं । लम्बे समय तक प्रदेश संगठन मंत्री रहे कृष्ण मुरारी मोघे कहते हैं कि पार्टी में शामिल होने वालों के लिये मापदंड तय होना चाहिए । वे मानते हैं कि स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिये बगैर होने वाले फ़ैसले आगे चल कर परेशानी का सबब बन सकते हैं । पार्टी के संगठन महामंत्री माखन सिंह भी आने वालों की भीड़ को लेकर असहमति जता चुके हैं ।

मध्यप्रदेश में भाजपा पिछले लोकसभा चुनावों की पच्चीस सीटों के आँकड़े को बरकरार रखने के लिये जी जान लगा रही है । नेताओं के साथ संगठन के रणनीतिकारों ने भी पार्टी मुख्यालय की बजाय क्षेत्रों में डेरा जमा लिया है । प्रदेश भाजपा का थिंक टैंक रोज़ाना एक-एक सीट की समीक्षा में जुटा है और निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ गणित बिठाने की माथापच्ची में लगा है । लोकसभा चुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल करने की जद्दोजहद में कई नेता इधर से उधर हो गये हैं । ऎसे नेताओं की भी कमी नहीं जो हर विचारधारा में खुद को को फ़िट करने में वक्त नहीं लगाते ।

परिसीमन से बदले नक्शे के कारण कई दिग्गजों ने तो अपनी विचारधारा ही बदल डाली । दूसरे दलों के नेताओं को खींचकर पार्टी में लाने की ’प्रेशर पॉलिटिक्स’ भी खूब असर दिखा रही है । प्रमुख पार्टी काँग्रेस और बीएसपी के दिग्गजों के अलावा कई अन्य दलों के नेता और कार्यकर्ता भाजपा का रुख कर रहे हैं । अब तक करीब साढ़े तीन हज़ार नेता- कार्यकर्ता बीजेपी का दामन थाम चुके हैं ।

एक बड़े नेता का कहना है कि भाजपा के दरवाज़े अभी सबके लिये खुले हैं,जो भी चाहे आ सकता है । इस खुले आमंत्रण के बाद बीजेपी में आने से ज़्यादा लाने का दौर चल पड़ा है । दूसरे दलों के ’विभीषणों’का दिल खोलकर स्वागत सत्कार किया जा रहा है । बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और लोजपा नेता रहे फ़ूलसिंह बरैया भगवा रंग में रंग गये हैं । पार्टी से रुठ कर गये प्रहलाद पटेल ने भी घर वापसी में ही समझदारी जानी ।

काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और सिंधिया घराने के खासमखास बालेंदु शुक्ल भाजपा में शामिल हो गए । छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव विधानसभा क्षेत्र से काँग्रेस विधायक रहे हरीशंकर उइके मुख्यमंत्री के चुनावी दौरे के दौरान एक हजार कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा में आ गये । गुना के भाजश विधायक राजेन्द्र सलूजा के बाद अब सिलवानी के भाजश विधायक देवेंद्र पटेल भी बीजेपी की राह पकड़ चुके हैं । विदिशा जिले के पूर्व विधायक मोहर सिंह और उनकी पत्नी सुशीला सिंह भी पार्टी में लौट आये । काँग्रेस के प्रदेश महामंत्री रहे नर्मदा प्रसाद शर्मा ,पूर्व विधायक शंकरसिंह बुंदेला और बीएसपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भुजबल सिंह अहिरवार को भी बीजेपी में एकाएक खूबियाँ दिखाई देने लगी हैं ।

सागर लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी शैलेष वर्मा ने भी भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है । इसी तरह देवास-शाजापुर के पूर्व सांसद बापूलाल मालवीय के बेटे श्याम मालवीय ने शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में सदस्यता ग्रहण की । श्याम 2004 में भाजपा के वर्तमान सांसद थावरचंद गेहलोत के खिलाफ काँग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। देवास के अधिवक्ता श्याम मालवीय काँग्रेस के जिला महामंत्री भी हैं । सागर से काँग्रेस का टिकट नहीं मिलने से नाराज़ संतोष साहू भी अब भाजपा नेता बन गये हैं ।

भारतीय राजनीति में पाला बदलने का चलन नया नहीं है । आयाराम-गयाराम की संस्कृति का जन्म भी यहीं हुआ और इसे बखूबी परवान चढ़ते हम सभी ने देखा है । वैचारिक विशुद्धता के साथ राजनीति करने वाले बीजेपी और कम्युनिस्ट पार्टी जैसे काडर बेस्ड दल भी अब इससे अछूते नहीं रहे । भाजपा को कोस कर दाल रोटी चलाने वाले नेता अब बीजेपी की खूबियाँ "डिस्कवर" करके मलाई सूँतने का इंतज़ाम कर रहे हैं ।

रातोंरात हृदय परिवर्तन तो संभव नहीं है और ना ही इस बदलाव के पीछे कोई ठोस वैचारिक या सैद्धांतिक कारण दिखाई देता है । जो नेता पार्टी में आने को ललायित हैं वे न तो इसके एजेंडे से प्रभावित हैं और न ही उनकी प्रतिबद्धता है । ये वो लोग हैं जो एक वैचारिक पार्टी में भीड़ बढ़ा रहे हैं । इनके उतावलेपन की सिर्फ़ एक ही वजह है और वो है इनका पर्सनल एजेंडा । तात्कालिक तौर पर आकर्षक और रोचक लगने वाले इस घटनाक्रम के दूरगामी परिणाम पार्टी के लिये बेहद घातक साबित होंगे ।

गुटबाज़ी और हताशा की गिरफ़्त में आ चुकी प्रदेश काँग्रेस दिग्भ्रमित है और तीसरी ताकत के उदय की संभावनाएँ हाल फ़िलहाल ना के बराबर हैं । ऎसे में सत्ता के आसपास जमावड़ा लगना स्वाभाविक है । बेशक दल बदलुओं की जमात का दिल खोलकर स्वागत करने वाली भाजपा ने राजनीति में अपना रुतबा बढ़ा लिया हो,लेकिन "पार्टी विथ डिफ़रेंस" का दावा करने वाली बीजेपी के लिये क्या यह शुभ संकेत कहा जा सकता है ?

भारतीय राजनीति में वैचारिक एक्सक्लुसिव एजेंडा ही भाजपा के जन्म का आधार था । इसकी मूल ताकत हमेशा से ही समर्पित कार्यकर्ता रहे,जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से विचार ऊर्जा लेकर पार्टी की मज़बूती के लिये अपना खून-पसीना एक किया । दीनदयाल परिसर की ड्योढ़ी पर हर "आयाराम" के माथे पर तिलक और गले में पुष्पहार पहनाकर स्वागत के अनवरत सिलसिले का असर पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर क्या,कैसा और कितना पड़ेगा ये सोचने की फ़ुर्सत शायद किसी को नहीं है ।

कुल मिलाकर प्रदेश बीजेपी उस घाट की तरह हो चुकी है,जिस पर शेर के साथ ही भेड़-बकरियाँ भी पानी पी रहे हैं । लेकिन इसे रामराज्य की परिकल्पना साकार होने से जोड़कर देखना भूल होगी । क्योंकि यहाँ तपस्वी राम की नहीं अवसरवादी विभीषणों की पूछ परख तेज़ी से बढ़ गई है । रामकारज के लिये एक ही विभीषण काफ़ी था । इन असंख्य विभीषणों के ज़रिये स्वार्थ सिद्धि एक ना एक दिन पार्टी के जी का जँजाल बनना तय लगती है ।

बीजेपी के घाट पर भई दलबदलुओं की भीड़
तोमरजी चंदन घिसें, तिलक करें घोषणावीर।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

जनता करे काम, नेता खाएँ आम.......

भोपाल की बड़ी झील में श्रमदान का नाटक अब शर्मदान अभियान में तब्दील हो चुका है । झील का पानी सूखने के साथ ही नेताओं की आँखों का पानी भी सूखने लगा है । कल तक खुद को जनता का सेवक और पब्लिक को भगवान बताने वाले मुख्यमंत्री के तेवर भी बदलने लगे हैं । नाकारा और निठल्ले विपक्ष ने प्रदेश सरकार को बेलगाम होने की खुली छूट दे दी है ।

काँग्रेस का बदतर प्रदर्शन बताता है कि बीजेपी हर हाल में पच्चीस सीटें हासिल कर ही लेगी । ऎसे एकतरफ़ा मुकाबलों के बाद सत्ता पक्ष का निरंकुश होना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं होगी । शिवराज सिंह चौहान के बर्ताव में आ रहे बदलाव में आने वाले वक्त के संकेत साफ़ दिखाई दे रहे हैं । हाल ही में उन्होंने एक तालाब गहरीकरण समारोह में कहा कि सभी काम करना सरकार के बूते की बात नहीं । इसके लिये जनता को आगे आना होगा । समाज को अपना दायित्व समझते हुए कई काम खुद हाथ में लेना होंगे ।

अब बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि जब सभी काम जनता को ही करना हैं ,तो फ़िर इन नेताओं की ज़रुरत क्या है ? अपनी गाढ़ी कमाई से टैक्स भरे जनता । करोड़ों डकारें नेता .....! मेहनत करे आम लोग और हवा में सैर करें नेता ...? जब सब कुछ लोगों को ही करना है,तो इतनी महँगी चुनाव प्रक्रिया की ज़रुरत ही क्या है ? मंत्री बनें नेता,खुद के लिये मोटी तनख्वाह खुद ही तय कर लें फ़िर भी पेट नहीं भरे तो योजनाओं की रकम बिना डकार लिये हज़म कर जाएँ । लाखों रुपए बँगले की साज-सज्जा पर फ़ूँक दें । कभी न्याय यात्रा,कभी संकल्प यात्रा,कभी सत्याग्रह और कभी कोई और पाखंड ....। पिछले साल की जुलाई से प्रदेश सरकार सोई पड़ी है । कर्मचारियों को छठे वेतनमान के नाम पर मूर्ख बना दिया । दो- तीन हज़ार का लाभ भी कर्मचारियों को बमुश्किल ही मिल पाया है ।

अब चुनाव बाद सपनों के सौदागर शिवराज एक बार फिर प्रदेश की यात्रा पर निकलेंगे । दावा किया जा रहा है कि देश का नंबर-एक राज्य बनाने में आम जनता का सहयोग माँगने के लिए वे 'मध्यप्रदेश बनाओ यात्रा’ निकालेंगे । इसके तहत मुख्यमंत्री सप्ताह में तीन दिन सड़क मार्ग से विभिन्न क्षेत्रों में जाकर आम जनता को प्रदेश की तरक्की के सपने से जोड़ेंगे। इसके लिये सर्वसुविधायुक्त रथ बनाया गया है,जिसमें माइक के साथ जनता से जुड़ने का अन्य साजोसामान भी होगा ।

शिवराज की राय में अव्वल दर्जा दिलाने के लिए जनता को राज्य से जोड़ना जरूरी है। जब तक लोगों में प्रदेश के प्रति अपनत्व का भाव नहीं होगा,वे इसकी तरक्की में समुचित योगदान नहीं दे सकते । वे कहते हैं कि मध्यप्रदेश का नवनिर्माण ही अब उनका जुनून है । वे जनता और सरकार के बीच की दूरी खत्म कर यह काम करेंगे ।

मीडिया में अपने लिये जगह बनाने में शिवराज को महारत है । पाँव-पाँव वाले भैया के नाम से मशहूर शिवराज ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जनदर्शन शुरू किया था । साप्ताहिक "जनदर्शन"में वे किसी एक जिले में सड़क मार्ग से लगभग डेढ़ सौ किमी की यात्रा कर गांव और कस्बों के लोगों से मिलने जाते थे । इसके बाद आई जनआशीर्वाद यात्रा । विधानसभा चुनाव के ठीक पहले निकाली गई इस यात्रा में शिवराज ने सवा माह तक सड़क मार्ग से यात्रा कर लगभग पूरे प्रदेश को नापा ।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ,मीडिया मैनेजमैंट की बदौलत अब खुद एक ब्राँड में तब्दील हो चुके हैं । विधानसभा चुनावों के पहले से ही उनकी छबि गढ़ने का काम शुरु हो गया था । स्क्रिप्ट के मुताबिक शिवराज ने एक्ट भी बखूबी किया । अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों में खरीदी हुई स्पेस की मदद से देखते ही देखते वे लोकप्रिय जननायक बन बैठे । विधानसभा चुनावों के अप्रत्याशित नतीजों ने साबित कर दिया कि झूठ को सलीके से बेचा जाए,तो काठ की हाँडी भी बार-बार चढ़ाई जा सकती है ।

चुनाव नतीजे आने के बाद नेशनल समाचार चैनलों पर नर्मदा में छलाँग लगाते शिवराज को देखकर लगा कि मीडिया गुरुओं की सलाह और मीडिया की मदद से आज के दौर में क्या नहीं किया जा सकता । एक चैनल ने तो बाकायदा उनके सात फ़ेरों की वीडियो का प्रसारण किया और श्रीमती चौहान की लाइव प्रतिक्रिया भी ले डाली । सूबे के महाराजा-महारानी का परिणय उत्सव देखकर जनता भाव विभोर हो गई ।

दल बदलुओं की बाढ़ ने मौकापरस्तों का रेला बीजेपी की ओर बहा दिया है । अब राज्य में गुटबाज़ी की शिकार काँग्रेस अंतिम साँसे गिन रही है । निकट भविष्य में ऑक्सीजन मिलने के आसार दिखाई नहीं देते । मान लो जीवन दान मिल भी जाए , तो दमखम से जुझारु तेवर अपनाने में वक्त लगेगा । यानी चौहान विपक्ष की तरफ़ से पूरी तरह निश्चिंत हैं । सुषमा स्वराज को लेकर तरह- तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं,लेकिन विदिशा में राजकुमार पटेल ने सफ़ेद झंडा लहरा कर युद्ध सँधि कर ली । एक तीर से कई निशाने साधे गये और शिवराज की गद्दी हाल फ़िलहाल सुरक्षित हो गई ।

प्रदेश की जनता का भाग्य बाँचनेवाले बताते हैं कि आने वाले सालों में आम लोगों की मुश्किलें बढ़ने की आशंकाएँ प्रबल हैं । रेखाएँ कहती हैं कि जनता को हर मोर्चे पर संघर्ष पूर्ण इम्तेहान देना होगा । यदि इस अनिष्ट से बचना हो तो जनता को अभी से अनुष्ठान शुरु कर देना चाहिए । रास्ता महानुभाव जरनैल सिंह ने सुझा ही दिया है । लोग अपनी सुविधा के हिसाब से इसमें फ़ेर बदल कर हालात पर काबू पाने में कामयाब हो सकते हैं ।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

भाजपा का चुनावी "कॉरपोरेट कल्चर"

मध्यप्रदेश में बीजेपी के फ़रमान ने कई मंत्रियों की नींद उड़ा दी है । पिछले लोकसभा चुनावों की कामयाबी दोहराने के केन्द्रीय नेतृत्व के दबाव के चलते प्रदेश मंत्रिमंडल की बेचैनी बढ़ गई है । कॉरपोरेट कल्चर में डूबी पार्टी ने सभी को टारगेट दे दिया है । ’टारगेट अचीवमेंट” ही मंत्रिमंडल में बने रहने के लिये कसौटी होगी । प्रदेश में पचास ज़िले हैं और मंत्रियों की संख्य़ा महज़ बाईस है । ऎसे में सभी मंत्रियों को कम से कम दो - दो ज़िलों में अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन देना ज़रुरी है , ताकि बीजेपी केन्द्र में सत्ता के करीब पहुँच सके । पार्टी ने क्षेत्रीय विधायकों को भी "लक्ष्य आधारित काम" पर तैनात कर दिया है । प्रत्याशियों को जिताने का ज़िम्मा सौंपे जाने के बाद से इन नेताओं की बेचैनी बढ़ गई है ।

हाईप्रोफ़ाइल मानी जा रही विदिशा , गुना , रतलाम और छिंदवाड़ा सीट पर सभी की नज़रें लगी हैं । हालाँकि विदिशा में राजकुमार पटेल की ’मासूम भूल” के बाद परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है । सूत्रों का कहना है कि सुषमा की जीत पक्की करने के लिये विकल्प भी तय था यानी सुषमा का दिल्ली का टिकट कटाओ या मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करो । और फ़िर राजनीति में "साम-दाम-दंड-भेद" की नीति ने रंग दिखाया । अब सुषमा स्वराज के साथ ही बीजेपी भी पूरी तरह निश्चिंत हो गई है ।

कमलनाथ ,ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांतिलाल भूरिया को घेरने के लिये मुख्यमंत्री ने खुद ही मोर्चा संभाल लिया है । दिल्ली और मध्यप्रदेश की चार सर्वे एजेंसियों ने छिंदवाड़ा , गुना-शिवपुरी, रतलाम, बालाघाट , दमोह ,टीकमगढ़ , भिंड , धार ,होशंगाबाद और खरगोन सीट पर नज़दीकी मुकाबले की बात कही है । जीत सुनिश्चित करने के लिये काँटे की टक्कर वाले इन क्षेत्रों में मुख्यमंत्री ने सूत्र अपने हाथ में ले लिये हैं ।

अपने चहेतों को टिकट दिलाने के कारण मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दाँव पर लगी है । मंत्री रंजना बघेल के पति मुकाम सिंह किराड़े धार से उम्मीदवार हैं । बालाघाट से के. डी. देशमुख को टिकट मिलने के बाद मंत्री गौरी शंकर बिसेन और रीवा से चन्द्रमणि त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाने के बाद मंत्री राजेन्द्र शुक्ला पर दबाव बढ़ गया है । होशंगाबाद से रामपाल सिंह और सागर से भूपेन्द्र सिंह की उम्मीदवारी ने मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी बढ़ा दी है ।

उधर खेमेबाज़ी और आपसी गुटबाज़ी ने काँग्रेस को हैरान कर रखा है । आये दिन की फ़जीहत से बेज़ार हो चुके नेता अब चुप्पी तोड़ने लगे हैं । अब तक चुप्पी साधे रहे दिग्गज नेताओं का दर्द भी ज़ुबान पर आने लगा है । प्रदेश काँग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष अजय सिंह का कहना है कि इस तरह की राजनीति उनकी समझ से बाहर है । वे कहते हैं , "पार्टी हित में सभी नेताओं को मिलजुल कर आपसी सहमति से फ़ैसले लेना होंगे ।"

विधान सभा चुनाव में काँग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद आलाकमान ने सभी नेताओं को एकजुटता से काम करने का मशविरा दिया था । लेकिन पाँच महीने बाद भी हालात में सुधार के आसार नज़र नहीं आने से कार्यकर्ता निराश और हताश हैं । जानकारों की राय में प्रदेश काँग्रेस इस वक्त अस्तित्व के संकट के दौर से गुज़र रही है । संगठन में नेता तो बहुत हैं , नहीं हैं तो केवल कार्यकर्ता ।

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

काँग्रेस ने दिया सुषमा स्वराज को वॉक ओवर

मध्यप्रदेश में बैतूल और रायसेन के ज़िला निर्वाचन अधिकारियों के फ़ैसलों ने कहीं खुशी - कहीं ग़म की स्थिति बना दी है । भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज की उम्मीदवारी के कारण हाई प्रोफाइल बनी मध्यप्रदेश की विदिशा संसदीय सीट से काँग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल का पर्चा खारिज हो गया है । वहीं बैतूल में भाजपा उम्मीदवार ज्योति धुर्वे के हक में निर्णय आया है । काँग्रेस ने श्रीमती धुर्वे का जाति प्रमाणपत्र फ़र्ज़ी होने का आरोप लगाया था । जाँच और दोनों पक्षों की दलील के बाद उनका पर्चा सही पाया गया ।

काँग्रेस उम्मीदवार राजकुमार पटेल ने अपने नामजदगी के पर्चे के साथ फार्म ए की मूल प्रति के स्थान पर छाया प्रति जमा की जिसे निर्वाचन अधिकारी ने अमान्य कर दिया है। इस मामले पर पार्टी में ही कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। लेकिन सारे मामले में पटेल की "भूमिका" की जांच चुनाव के बाद ही होगी । बैकफुट पर नजर आ रही पार्टी अब अन्य विकल्प तलाशने के साथ ही प्रतिष्ठा बचाने के प्रयास में जुटी है।

पार्टी के नेता हैरान हैं कि भाजपा की राष्ट्रीय नेता के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी और पूर्व मंत्री श्री पटेल से ए फार्म समय पर दाखिल करने के मामले में चूक कैसे हो गयी ? साथ ही इस क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी श्रीमती स्वराज को वॉकओवर देने का मुद्दा गर्माने को लेकर भी पार्टी में खलबली मची हुई है । इस घटनाक्रम से कार्यकर्ता हताश और नेता हतप्रभ हैं ।

दुविधा में फ़ँसी पार्टी अब नाक बचाने के लिये दूसरे विकल्प तलाश रही है । निर्दलीय के तौर पर पर्चा भरने वाले श्री पटेल के भाई देव कुमार पटेल को समर्थन देने के मुद्दे पर भी पानी फ़िर गया है । देवकुमार पटॆल का नामांकन भी रद्द हो जाने से कांग्रेस को एक बार फ़िर निराशा ही हाथ लगी है । दोनों ही नामांकन खारिज होने के बाद अब यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सुषमा स्वराज को काँग्रेस वॉकओवर देने जा रही है । हालांकि काँग्रेस पटेल प्रकरण पर सकते में है । पार्टी उनके खिलाफ़ निष्कासन जैसी कड़ी कार्रवाई का मन बना रही है ।

वैसे पटेल ने नामांकन फ़ॉर्म जमा करते समय जिस तरह की मासूमियत दिखाई ,वह चौंकाने वाली है । काँग्रेस को इससे भारी फ़जीहत का सामना करना पड़ रहा है । विदिशा से सुषमा स्वराज का नाम सामने आने के बाद पार्टी ने किसी नए चेहरे पर दाँव लगाने की बजाय तज़ुर्बे को तरजीह देते हुए पटेल की दावेदारी को बेहतर समझा । काँग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि उम्मीदवारों को नामांकन फ़ॉर्म भरने से जुड़ी सभी ज़रुरी बातें अच्छी तरह समझाई जाती हैं । पटेल के मामले में जानकारों को साज़िश की बू आ रही है क्योंकि पटेल को खुद कई चुनाव लड़ने का अनुभव है ।

अब उनका इतिहास भी खंगाला जा रहा है । वे बुधनी से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ़ भी चुनाव लड़ चुके हैं । इसे दिलचस्प संयोग ही कहा जाए कि उस वक्त भी उन्होंने नामांकन पत्र में अपनी पार्टी का नाम ही ग़लत भर दिया था । वहाँ मौजूद कुछ वरिष्ठ लोगों ने तत्काल भूल सुधरवा दी थी । हारने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी ,लेकिन वे एक बार भी गवाही के लिये अदालत नहीं पहुँचे । लिहाज़ा मामले में एकतरफ़ा फ़ैसला सुना दिया गया ।

बहरहाल काँग्रेस प्रत्याशी श्री पटेल का कहना है कि वे कानूनी परामर्श के बाद कदम उठाएंगे । उन्होंने कहा कि जिला निर्वाचन अधिकारी ने अन्य प्रत्याशियों से तीन बजे के बाद भी दस्तावेज लिए लेकिन सिर्फ उन्हीं से फार्म ए नहीं लिया। फार्म ए कलेक्टर को तीन बजकर सात मिनट पर दिया गया था जबकि नामांकन पत्र 2 बजकर 14 मिनट पर जमा किया गया।

उधर सूत्रों का कहना है कि काँग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल ने शनिवार को दोपहर 4.10 बजे जिला निर्वाचन अधिकारी को एक आवेदन दिया था । जिसमें उन्होंने कहा था कि वे निर्धारित समय से विलंब से अपना "ए" फार्म जमा कर रहे हैं। इसे स्वीकार करने के बारे में जिला निर्वाचन अधिकारी का जो भी निर्णय होगा वह उन्हें मंजूर होगा । मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के सूत्रों के अनुसार प्रत्याशी को नामांकन पत्र दाखिल करने के साथ निर्धारित समयसीमा में फार्म ए भी निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। अन्यथा प्रत्याशी संबंधित राजनीतिक दल का नहीं माना जाएगा।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

चुनावी समर में काँग्रेस बनी रणछोड़दास

लोकसभा चुनावों को लेकर मध्यप्रदेश में बीजेपी हर मोर्चे पर बढ़त लेकर बुलंद हौंसलों के साथ आगे बढ़ रही है ,जबकि काँग्रेस टिकट बँटवारे को लेकर मचे घमासान में ही पस्त हो गई है । रणछोड़दास की भूमिका में आई काँग्रेस ने पूरे प्रदेश में थके-हारे नेताओं को टिकट देकर बीजेपी की राह आसान कर दी है । एकतरफ़ा मुकाबले से मतदाताओं की दिलचस्पी भी खत्म होती जा रही है । काँग्रेस की गुटबाज़ी को लेकर उपजे चटखारे ही अब इन चुनावों की रोचकता बचाये हुए हैं । बहरहाल जगह-जगह पुतले जलाने का सिलसिला और हाईकमान के खिलाफ़ नारेबाज़ी ही इस बात की तस्दीक कर पा रहे हैं कि प्रदेश में काँग्रेस का अस्तित्व अब भी शेष है ।

मध्यप्रदेश में अब तक लगभग सभी सीटों पर बीजेपी और काँग्रेस उम्मीदवारों की घोषणा से स्थिति स्पष्ट हो चली है । चुनाव की तारीखों से एक महीने पहले उम्मीदवारों का चयन पूरा कर लेने का दम भरने वाली काँग्रेस अधिसूचना जारी होने के बावजूद होशंगाबाद और सतना सीट के लिये अभी तक किसी नाम पर एकराय नहीं हुई है । गुटबाज़ी का आलम ये है कि काँग्रेस के दिग्गजों को बीजेपी से कम और अपनों से ज़्यादा खतरा है , लिहाज़ा वे अपने क्षेत्रों में ही सिमट कर रह गये हैं ।

भाजपा ने 29 लोकसभा सीटों में से 28 और कांग्रेस ने 27 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। अपनी घोषणा के अनुसार बीजेपी ने एक भी मंत्री को चुनाव मैदान में नहीं उतारा , अलबत्ता पूर्व मंत्री और दतिया के विधायक डा. नरोत्तम मिश्रा को गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ़ मैदान में उतारा है , जबकि कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए पांच विधायक , सज्जन सिंह वर्मा (देवास), सत्यनारायण पटेल (इंदौर), विश्वेश्वर भगत (बालाघाट), रामनिवास रावत (मुरैना) और बाला बच्चन (खरगोन) को चुनावी समर में भेजा है । मगर काँग्रेस दो मजबूत दावेदारों को भूल गई । प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष अजय सिंह सीधी से मजबूत प्रत्याशी माने जा रहे थे। चुनाव लड़ने के इच्छुक श्री सिंह पिछले तीन महीने से सीधी लोकसभा क्षेत्र में सक्रिय थे । इसी तरह विधानसभा में प्रतिपक्ष की नेता जमुना देवी के विधायक भतीजे उमंग सिंघार को भी लोकसभा का टिकिट नहीं मिला।

प्रदेश में काँग्रेस की दयनीय हालत का अँदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भोपाल सीट के लिए स्थानीय पार्षद स्तर के नेता भी टिकट की दावेदारी कर रहे थे । आखिरी वक्त पर टिकट कटने से खफ़ा पूर्व विधायक पीसी शर्मा तो बगावत पर उतारु हैं । विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाने पर श्री शर्मा ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऎलान कर दिया था । लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारी के वायदे पर मामला शांत हो गया था , लेकिन हाईकमान की वायदाखिलाफ़ी से शर्मा समर्थक बेहद खफ़ा हैं और ना सिर्फ़ सड़कों पर आ गये हैं , बल्कि इस्तीफ़ों का दौर भी शुरु हो चुका है ।

काँग्रेस की कार्यशैली को देखकर लगता है कि तीन महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाने के बावजूद मिली करारी शिकस्त से प्रदेश काँग्रेस और आलाकमान ने कोई सबक नहीं लिया । अब भी पार्टी के क्षत्रप शक्ति प्रदर्शन में मसरुफ़ हैं । हकीकत यह है कि प्रदेश में काँग्रेस की हालत खस्ता है । लोकसभा प्रत्याशियों की सूची पर निगाह दौड़ाने से यह बात पुख्ता हो जाती है । उम्मीदवारों के चयन में चुनाव जीतने की चिंता से ज़्यादा गुटीय संतुलन साधने की कोशिश की गई है । इस बात को तरजीह दी गई है कि सभी गुट और खासकर उनके सरदार खुश रहें । विधानसभा चुनाव में भी टिकट बँटवारे की सिर-फ़ुटौव्वल को थामने के लिये ऎसा ही मध्यमार्ग चुना गया था और उसका हश्र सबके सामने है ।

इस पूरी प्रक्रिया से क्षुब्ध वरिष्ठ नेता जमुना देवी ने जिला अध्यक्षों की बैठक में साफ़ कह दिया था कि प्रदेश में पार्टी को चार-पाँच सीटों से ज़्यादा की उम्मीद नहीं करना चाहिए । हो सकता है ,उनके इस बयान को अनुशासनहीनता माना जाये लेकिन उनकी कही बातें सौ फ़ीसदी सही हैं । सफ़लता का मीठा फ़ल चखने के लिए कड़वी बातों को सुनना - समझना भी ज़रुरी है , मगर काँग्रेस फ़िलहाल इस मूड में नहीं है ।

मंगलवार, 24 मार्च 2009

भाजपा से हर मोर्चे पर पिछड़ी काँग्रेस

मध्यप्रदेश में भाजपा ने धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए बढ़त हासिल कर ली है । उम्मीदवारों के चयन का मामला हो या चुनाव प्रचार में मुद्दे खड़े कर उन्हें भुनाने की कोशिश ... बीजेपी हर मोर्चे पर काँग्रेस से चार हाथ आगे ही है । बीजेपी अपने खिलाफ़ जाते माहौल को पक्ष में करने के लिये पूरे प्रदेश में न्याय यात्राएँ निकाल रही है । हर उम्मीदवार के साथ एक आईटी एक्सपर्ट तैनात कर दिया है । महिला मोर्चा , श्रमिक प्रकोष्ठ और किसान मोर्चा भी रणनीति बनाने में जुट गया है , जबकि काँग्रेस मुख्यालय में सुई पटक सन्नाटा पसरा है । कार्यालय म्रें नेता नदारद हैं , तो कार्यकर्ताओं का भी भला क्या काम ...?


काँग्रेस की चुनाव समिति ने मध्यप्रदेश के तीन और उम्मीदवारों के नामों पर मुहर लगा दी है । शनिवार को जारी तीसरी सूची में मंडला से दिग्विजय सरकार में मंत्री रहे बसोरी सिंह मरकाम और बैतूल से ओझाराम इवने के नाम शामिल हैं । विदिशा से राजकुमार पटेल भाजपा की दिग्गज सुषमा स्वराज के खिलाफ़ चुनाव मैदान में उतरे हैं । श्री पटेल और श्री ओझाराम के नाम पहले ही घोषित कर दिये गये थे लेकिन उन्हें पुनर्विचार के लिए रोक लिया गया था ।

इस तरह काँग्रेस ने 29 में से 22 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय कर दिये हैं ,जबकि भाजपा 26 संसदीय क्षेत्रों के लिये नामों की घोषणा कर चुकी है । भोपाल, इंदौर, देवास, होशंगाबाद, सीधी, सतना और राजगढ़ का मामला अभी भी अटका हुआ है। ये सभी सीटें कांग्रेस के दिग्गजों के प्रभाव क्षेत्र की हैं।

होशंगाबाद से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी को चुनाव मैदान में उतारने का फ़ैसला हाईकमान को करना है । पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह दस साल तक चुनाव नहीं लड़ने की प्रतिज्ञा लिये बैठे हैं , जबकि राजगढ़ में दिग्गी राजा के समर्थक किसी और नाम पर समझौते के लिये राज़ी नहीं हैं । इसी तरह सीधी से अर्जुन सिंह के बेटे और सतना से उनकी बेटी को टिकट देने का मामला भी उलझा है ।

भोपाल से मुस्लिम उम्मीदवार को उतारने की माँग भी ज़ोर पकड़ रही है । इसके अलावा भोपाल में कायस्थ मतदाताओं की भारी तादाद के मद्देनज़र कायस्थ प्रत्याशी के रुप में प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री का नाम भी चर्चा में है । यहाँ करीब पौने तीन लाख कायस्थ मतदाता हैं । वर्ष 1989 से लगातार भाजपा भोपाल सीट पर काबिज़ है । प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव सुशील चंद्र वर्मा ने भाजपा के टिकट से चुनाव लड़कर भोपाल सीट काँग्रेस के हाथों से छीनी थी । वे लगातार चार मर्तबा सांसद चुने गये । वर्मा से पहले काँग्रेस के के.एन.प्रधान ने दो बार संसद में भोपाल का प्रतिनिधित्व किया । ये दोनों ही नेता कायस्थ समाज से ताल्लुक रखते थे ।

विदिशा सीट पर जानकार मुकाबला एकतरफ़ा मान रहे हैं , जबकि कांग्रेस काँटे की टक्कर का दावा कर रही है । एक तरफ़ सुषमा राष्ट्रीय नेता हैं , ये और बात है कि वे अब तक कोई भी संसदीय चुनाव नहीं जीत सकी हैं । ऎसे में वे भी विदिशा जैसी सुरक्षित सीट से जीत कर अपना इतिहास बदलना चाहेंगी । दूसरी ओर काँग्रेस भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने का प्रयास कर निष्प्राण हो चुके संगठन में जोश भरने की कोशिश ज़रुर करेगी ।

विदिशा के लिये काँग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल बुधनी से एक बार विधायक रहे हैं । उन्होंने विधानसभा का एक चुनाव भोजपुर और एक चुनाव बुधनी से हारा है । वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा । वे एक मर्तबा बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा से विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। कांग्रेस में माना जा रहा है कि पटेल इस संसदीय क्षेत्र में श्रीमती स्वराज को कड़ी टक्कर देंगे । स्थानीय नेता का मुद्दा कितना ज़ोर लगा पायेगा यह कह पाना मुश्किल है ।

विदिशा भाजपा का अजेय दुर्ग माना जाता है । इस संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को पाँच बार संसद के गलियारों में दाखिल होने का मौका दिया । काँग्रेस विदिशा और भोपाल सीट को प्रतिष्ठा का प्रश्न मान कर चल रही है । इसीलिए अंतिम वक्त तक जिताऊ प्रत्याशियों की तलाश में मगजपच्ची की जा रही है ।

शनिवार, 21 मार्च 2009

उम्मीदवारों को लेकर काँग्रेस में घमासान

भाजपा में राजनीतिक स्तर पर सहमति बनने के बाद पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की शनिवार 21 मार्च को भोपाल में विधिवत घर वापसी हो गई । पार्टी से नाराज़ प्रहलाद ने उमा भारती के साथ मिलकर भारतीय जन शक्ति का गठन किया था । वे उमा के कामकाज के तौर तरीकों से खफ़ा थे । उमा से अनबन के चलते विधान सभा चुनावों से पहले भी उनकी बीजेपी में वापसी को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं ।

आज पार्टी मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में प्रहलाद ने अपने दल - बल के साथ पार्टी में पुनर्प्रवेश कर लिया । बीजेपी में इस बात को लेकर कश्मकश है कि पार्टी प्रहलाद का उपयोग किस तरह करे ? उन्हें छिंदवाड़ा से काँग्रेस उम्मीदवार कमलनाथ के खिलाफ़ मैदान में उतारने की चर्चाएँ भी चल रही हैं । हालाँकि श्री पटेल ने चुनाव लड़ने से इंकार किया है , लेकिन पार्टी ने फ़िलहाल छिंदवाड़ा ,खजुराहो और सीधी सीट पर प्रत्याशियों के नाम की घोषणा अब तक नहीं की है । इसके अलावा बालाघाट और बैतूल के लिए घोषित उम्मीदवारों को बदलने पर भी विचार चल रहा है ।

लोधी वोट बैंक में प्रहलाद और उमा की अच्छी पैठ है । उत्तर प्रदेश में कल्याणसिंह के बीजेपी से बाहर होने के बाद बुंदेलखंड, महाकौशल और यूपी के लोधी-लोधा मतदाताओं को पार्टी के पक्ष में लाने के लिए भारी माथापच्ची चल रही थी । बालाघाट प्रहलाद का प्रभाव क्षेत्र है , जहाँ से बीजेपी को अच्छी बढ़त मिलने की उम्मीद बन गई है ।

इधर बीजेपी का कुनबा फ़िर से भरापूरा दिखाई देने लगा है । विधानसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफ़लता ने नेता-कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद कर दिये हैं , वहीं अँदरुनी उठापटक से काँग्रेस की हालत पतली है । बीजेपी ने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा में भी बढ़त ले ली है । बहुजन समाज पार्टी ने भी सभी उनतीस सीटों से प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर ली है , जबकि काँग्रेस अब तक बीस सीटों पर ही उम्मीदवार तय कर पाई है । बची हुई नौ में से सात सीटों पर भारी घमासान है । भोपाल और होशंगाबाद में मुस्लिम नेता बाग़ी तेवरों के साथ टिकट का दावा ठोक रहे हैं ।

जिन क्षेत्रों के लिए नामों की घोषणा हुई है , वहाँ असंतोष फ़ूट पड़ा है । पैराशूटी उम्मीदवारों को लेकर उपजी नाराज़गी सड़कों पर आ गई है । सागर, मंदसौर और खजुराहो में विरोध प्रदर्शन के साथ ही पुतले जलाने का दौर भी खूब चला । सागर में असलम शेर खान को टिकट देने के विरोध में एक कार्यकर्ता ने अपनी कार ही आग के हवाले कर दी ।विरोध में कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ़ पुतले जलाये बल्कि काँग्रेस कार्यालय में पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष का एक बैनर भी लटका दिया । इसमें मैडम झपकी लेती दिखाई पड़ती हैं , उनकी नींद पाँच साल बाद टूटने की उम्मीद जताई गई है ।

इसी तरह युवक काँग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मीनाक्षी नटराजन को मंदसौर सीट की प्रत्याशी बनाना भी पार्टी का सिरदर्द बन गया है । नीमच क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने उन्हें थोपा हुआ नेता बता कर पुतले फ़ूँके । खजुराहो प्रत्याशी राजा पटैरिया के लिए भी स्थानीय नेता का मुद्दा भारी पड़ रहा है । हटा(दमोह) के निवासी पटैरिया को लोग बाहरी नेता करार दे रहे हैं । प्रदर्शन और जमकर नारेबाज़ी ने उनकी चिंताएँ बढ़ा दी हैं ।

मैदाने जंग में जाने से पहले ही आपसी कलह ने काँग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त कर दिये हैं । मध्यप्रदेश में काँग्रेस दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही । हाल के विधानसभा चुनावों से भी पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा । बीजेपी के खिलाफ़ मुद्दों की भरमार है लेकिन काँग्रेस के पास अब ऎसे नेता नहीं जो इन मुद्दों को वोट में तब्दील कर सकें । पिछली मर्तबा बीजेपी पच्चीस सीटों पर काबिज़ थी । चार सीटों से संतोष करने वाली काँग्रेस यदि वक्त रहते नहीं चेती तो प्रदेश में पार्टी का नामलेवा नहीं बचेगा ।