सोनिया गाँधी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सोनिया गाँधी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 16 मई 2011

महँगाई के मुद्दे पर राहुल-सोनिया भूमिगत

पेट्रोल के दाम एक बार फ़िर बढ़ा दिये गये। इस मर्तबा कीमतों में अब तक की सर्वाधिक सीधे पाँच रुपये की बढ़ोत्तरी ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है। यह वृद्धि आठ प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो सालों में पेट्रोल के दामों में प्रति लीटर 23 रूपयों की वृद्धि की जा चुकी है। गौरतलब है कि पिछले नौ महीनों में पेट्रोल की कीमत में नौ बार इज़ाफ़ा हो चुका है। इस तरह पेट्रोल की कीमत 47.93 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 63.37 रुपये हो गई है।

लेकिन दिन रात आम आदमी की दुहाई देने वाली केन्द्र सरकार पूरे मामले से पल्ला झाड़ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मुताबिक "पिछले वर्ष जून में हमने पेट्रोल कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का निर्णय लिया था। लिहाजा इन दिनों पेट्रोल कीमतों में वृद्धि या कमी का निर्णय सरकार नहीं लेती। पेट्रोल की ताजा मूल्य वृद्धि में सरकार ने कोई भूमिका नहीं निभाई है, क्योंकि कीमतें नियंत्रण मुक्त हो चुकी हैं। उन्होंने एक तरह से तेल विपणन कम्पनियों के निर्णय का पक्ष लेते हुए कहा कि पिछले 11 महीनों में कच्चे तेल की कीमत 42 डॉलर प्रति बैरल बढ़ गई हैं। वे कहते हैं कि जब पिछले जून में कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने का निर्णय लिया गया था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 68 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन आज यह दर बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।

इधर हमेशा की तरह भाजपा और वामपंथी दल गाल बजाकर अपने लोकतांत्रिक दायित्वों की पूर्ति का दम भरने में लगे हैं । दो-चार दिन सड़कों पर चक्काजाम करने या साइकल,बैलगाड़ी,घोड़ागाड़ी दौड़ाने से सरकार के कान पर जूँ रेंगती तो शायद हालात कुछ और होते। मगर बयान जारी कर चेहरा चमकाने की राजनीति के मौजूदा दौर में बीजेपी ने कहा कि केंद्र सरकार पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए चुनाव परिणामों का इंतज़ार कर रही थी। बीजेपी ने इसे पश्चिम बंगाल, केरल और असम में काँग्रेस की जीत का जनता को ‘‘तोहफा’’ बताया है । अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृध्दि के सरकार के तर्क की काट में भाजपा ने कहा कि सरकार पेट्रोल पर लगाए गए बेतहाशा केन्द्रीय करों को कम करके जनता को राहत दे सकती है। वामपंथी पार्टियों ने मूल्य वृद्धि को संप्रग सरकार का ‘क्रूर हमला’निरुपित करते हुए हर तरफ से महंगाई से त्रस्त लोगों को जबरदस्त झटका बताया है। साथ ही विनियमन नीति वापस लेने की माँग की है।

इस पूरे मसले में एक बात हैरान करने वाली है । जब भी महँगाई से जुड़े मुद्दे पर देश में बैचेनी बढ़ती है। सोनिया गाँधी और उनके सुपुत्र राहुल गाँधी भूमिगत हो जाते हैं । दलित के घर भोजन खाकर,कलावती का मुद्दा संसद में उठाकर,सिर पर मिट्टी ढ़ोकर और भट्टा पारसौल के किसानों के बीच जाकर गिरफ़्तारी देने वाले "काँग्रेस के युवराज" कब तक भारतीय जनमानस की भावनाओं से खेलते रहेंगे। आम जनता की रोज़ी-रोटी से जुड़े मुद्दों पर काँग्रेस के इस "पोस्टर ब्वाय" की चुप्पी आपराधिकता की श्रेणी में आती है। पेट्रोल, डीज़ल या रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी सिर्फ़ इन उत्पादों तक ही सीमित नहीं होती। इनका असर रोज़मर्रा की ज़रुरतों की हर छोटी बड़ी वस्तु पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पड़ता है।

बाज़ारीकरण की नीति पर चलकर आखिर देश जा कहाँ रहा है ? बिजली के बाद अब प्रकृति प्रदत्त संसाधन भी निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। प्याऊ लगाकर प्यासे कँठों को तर करने का पुण्य कमाने वाले देश में आज पानी एक "कमोडिटी" है। मुनाफ़े के इस धँधे में चाँदी काटने के इरादे से केन्द्र और राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारों पर नाच रही हैं। भोपाल के कोलार क्षेत्र में नगर पालिका बनाकर नेताओं की कमाई के लिये चारागाह तो तैयार कर दी गई, मगर यहाँ की पेयजल समस्या के निराकरण की कोई पहल नहीं की गई। यह जानकर कलेजा मुँह को आता है कि औसतन दस- बारह हज़ार रुपये महीना कमाने वाले परिवार को मकान किराया,बिजली,दूध और पेट्रोल जैसे ज़रुरी खर्च के अलावा पानी के इंतज़ाम पर औसतन हर महीने सात सौ से आठ सौ रुपये चुकाना पड़ रहे हैं । यही हाल सड़कों किनारे बनाई गई अँधाधुँध पार्किंग का है। पाँच-पाँच, दस-दस रुपये के ज़रिये लोग हर रोज़ ना जाने कितने रुपये चुकाते हैं। अब तो टोल नाकों के ज़रिये सड़कों पर चलने की भारी कीमत चुकाना पड़ रही है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। कोई नियम कायदा नहीं है।

दरअसल बाज़ारीकरण की व्यवस्था भ्रष्ट समाज में ही पुष्पित और पल्लवित हो सकती है। उपभोक्तावादी संस्कृति में नैतिकता और ईमानदारी का कोई मूल्य ही नहीं है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ईमानदारी अनमोल है,वास्तव में बाज़ारवाद की राह पर आगे बढ़ते समाज में यह "बेमोल" है । सत्ता चलाने वाले भी बखूबी जान चुके हैं कि इस भ्रष्ट तंत्र में कीमतों में इज़ाफ़े से किसी पर भी कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ज़रा सोच कर देखिये दाम बढ़ेगे तो व्यापारी से लेकर मज़दूर और डॉक्टर से लेकर ठेले वाले तक सभी अपने- अपने स्तर पर बढ़ती महँगाई से तालमेल बिठाने का एडजस्टमेंट कर लेते हैं। और कुछ दिनों के हँगामे के बाद गाड़ी फ़िर पटरी पर चलने लगती है।

इस चक्की में सिर्फ़ वही पिसने वाला है जिसे ईमानदारी से जीवन गुज़र बसर करने का भूत सवार है। देश की कुलाँचे मारती जीडीपी में वैसे भी ईमानदार जीवों का भला क्या योगदान है ? इन मरदूदों के भरोसे चले, तो देश की इकॉनॉमी का भट्टा बैठना तय है और औद्योगिक विकास की दर का गर्त में समाना लाज़िमी है। पूरी बात का लब्बेलुआब यह कि जनाब यह सतयुग नहीं कलिकाल है, जहाँ भोगवादियों का बोलबाला है। इस दौर के मार्गकँटकों (ईमानदारो) की विलुप्तप्राय प्रजाति को धरती से हटाने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है। देश की तरक्की और दुनिया का सिरमौर बनने के लिये भ्रष्टाचार ज़िन्दाबाद। और जब भ्रष्टाचार है, तो कीमतों में इज़ाफ़े से कैसा डर ? इस हाथ ले उस हाथ दे की अर्थव्यवस्था में महँगाई कोई समस्या नहीं है । यह तो महज़ एक सियासी दाँव है,जो सत्ता हथियाने के लिये राजनीतिक दल अपनी सहूलियत से समय-समय पर आज़माते हैं।

शनिवार, 21 मार्च 2009

उम्मीदवारों को लेकर काँग्रेस में घमासान

भाजपा में राजनीतिक स्तर पर सहमति बनने के बाद पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की शनिवार 21 मार्च को भोपाल में विधिवत घर वापसी हो गई । पार्टी से नाराज़ प्रहलाद ने उमा भारती के साथ मिलकर भारतीय जन शक्ति का गठन किया था । वे उमा के कामकाज के तौर तरीकों से खफ़ा थे । उमा से अनबन के चलते विधान सभा चुनावों से पहले भी उनकी बीजेपी में वापसी को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं ।

आज पार्टी मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में प्रहलाद ने अपने दल - बल के साथ पार्टी में पुनर्प्रवेश कर लिया । बीजेपी में इस बात को लेकर कश्मकश है कि पार्टी प्रहलाद का उपयोग किस तरह करे ? उन्हें छिंदवाड़ा से काँग्रेस उम्मीदवार कमलनाथ के खिलाफ़ मैदान में उतारने की चर्चाएँ भी चल रही हैं । हालाँकि श्री पटेल ने चुनाव लड़ने से इंकार किया है , लेकिन पार्टी ने फ़िलहाल छिंदवाड़ा ,खजुराहो और सीधी सीट पर प्रत्याशियों के नाम की घोषणा अब तक नहीं की है । इसके अलावा बालाघाट और बैतूल के लिए घोषित उम्मीदवारों को बदलने पर भी विचार चल रहा है ।

लोधी वोट बैंक में प्रहलाद और उमा की अच्छी पैठ है । उत्तर प्रदेश में कल्याणसिंह के बीजेपी से बाहर होने के बाद बुंदेलखंड, महाकौशल और यूपी के लोधी-लोधा मतदाताओं को पार्टी के पक्ष में लाने के लिए भारी माथापच्ची चल रही थी । बालाघाट प्रहलाद का प्रभाव क्षेत्र है , जहाँ से बीजेपी को अच्छी बढ़त मिलने की उम्मीद बन गई है ।

इधर बीजेपी का कुनबा फ़िर से भरापूरा दिखाई देने लगा है । विधानसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफ़लता ने नेता-कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद कर दिये हैं , वहीं अँदरुनी उठापटक से काँग्रेस की हालत पतली है । बीजेपी ने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा में भी बढ़त ले ली है । बहुजन समाज पार्टी ने भी सभी उनतीस सीटों से प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर ली है , जबकि काँग्रेस अब तक बीस सीटों पर ही उम्मीदवार तय कर पाई है । बची हुई नौ में से सात सीटों पर भारी घमासान है । भोपाल और होशंगाबाद में मुस्लिम नेता बाग़ी तेवरों के साथ टिकट का दावा ठोक रहे हैं ।

जिन क्षेत्रों के लिए नामों की घोषणा हुई है , वहाँ असंतोष फ़ूट पड़ा है । पैराशूटी उम्मीदवारों को लेकर उपजी नाराज़गी सड़कों पर आ गई है । सागर, मंदसौर और खजुराहो में विरोध प्रदर्शन के साथ ही पुतले जलाने का दौर भी खूब चला । सागर में असलम शेर खान को टिकट देने के विरोध में एक कार्यकर्ता ने अपनी कार ही आग के हवाले कर दी ।विरोध में कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ़ पुतले जलाये बल्कि काँग्रेस कार्यालय में पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष का एक बैनर भी लटका दिया । इसमें मैडम झपकी लेती दिखाई पड़ती हैं , उनकी नींद पाँच साल बाद टूटने की उम्मीद जताई गई है ।

इसी तरह युवक काँग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मीनाक्षी नटराजन को मंदसौर सीट की प्रत्याशी बनाना भी पार्टी का सिरदर्द बन गया है । नीमच क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने उन्हें थोपा हुआ नेता बता कर पुतले फ़ूँके । खजुराहो प्रत्याशी राजा पटैरिया के लिए भी स्थानीय नेता का मुद्दा भारी पड़ रहा है । हटा(दमोह) के निवासी पटैरिया को लोग बाहरी नेता करार दे रहे हैं । प्रदर्शन और जमकर नारेबाज़ी ने उनकी चिंताएँ बढ़ा दी हैं ।

मैदाने जंग में जाने से पहले ही आपसी कलह ने काँग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त कर दिये हैं । मध्यप्रदेश में काँग्रेस दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही । हाल के विधानसभा चुनावों से भी पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा । बीजेपी के खिलाफ़ मुद्दों की भरमार है लेकिन काँग्रेस के पास अब ऎसे नेता नहीं जो इन मुद्दों को वोट में तब्दील कर सकें । पिछली मर्तबा बीजेपी पच्चीस सीटों पर काबिज़ थी । चार सीटों से संतोष करने वाली काँग्रेस यदि वक्त रहते नहीं चेती तो प्रदेश में पार्टी का नामलेवा नहीं बचेगा ।