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सोमवार, 21 दिसंबर 2009

चेहरा बदला, क्या चाल-चरित्र बदलेगा ....?

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में हाल के दोनों में दो अहम बदलाव हुए हैं । भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ लोकसभा में विपक्ष का नेता भी बदल गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अब लालकृष्ण आडवाणी नहीं सुषमा स्वराज होंगी, तो राजनाथ सिंह के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान नितिन गडकरी ने संभाली है। इस साल लोकसभा चुनाव में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व युवा नेताओं के हाथ में सौंपने की माँग उठ रही थी । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या इस बदलाव से भाजपा का कुछ भला हो पाएगा ? क्या पार्टी इनके नेतृत्व में बुरे दौर से निकल पाएगी ? क्या आडवाणी की राजनीतिक पारी भी समाप्ति की ओर है?


गौरतलब है कि आडवाणी के लिए संसदीय दल के संविधान में संशोधन करके काँग्रेस की तर्ज़ पर विशेष जगह बनाई गई है । उनका राजनीतिक कैरियर सुरक्षित करने की गरज से उठाये गये इस कदम की बदौलत लालकृष्ण आडवाणी अब संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बन गए हैं। यानि सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार अब भी उनके पास सुरक्षित है। भाजपा के इस लौहपुरूष को पिघलाना आसान बात नहीं है, यह बात एक बार फिर साबित हो गयी है। भले ही संसदीय दल का नेता नहीं होने के कारण कैबिनेट मंत्री का दर्जा छिन गया हो, मगर लालकृष्ण आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष के रूप में पार्टी पर वर्चस्व बनाए रखेंगे। आडवाणी की राजनीतिक बुलंदियाँ छूने की महत्वाकांक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं, यह मानना भूल होगी। हिन्दुत्व के एजेंडे को बुलंद करते हुए भाजपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में आडवाणी का हाथ रहा, बावजूद इसके वे कभी प्रधानमंत्री पद पर नहीं पहुँच पाए। लोकसभा में पार्टी की सिमटती सीटों के बावजूद हार उन्होंने नहीं मानी है, विरोधियों को चतुराई से किनारे किया और वे अब भी बैक सीट ड्राइविंग करते हुए एक तरह से पार्टी को अपनी पसंद की राह पर चलवा रहे हैं। भाजपा का युवा अवतार कितनी दूर तक वरिष्ठों के कहे अनुसार चलेगा, यह देखने वाली बात रहेगी।

भारतीय जनता पार्टी संक्रमण के दौर में है। नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर दोहरे संकट को झेलती पार्टी को पटरी पर लाने के लिये नितिन गडकरी को संघ के समर्थन का नैतिक बल ज़रुर हासिल होगा । लेकिन इससे उनकी राह बहुत आसान नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा बड़ी हो गई है और बदल भी गई है । भाजपा के संक्रमण का एक पहलू यह भी है कि मौजूदा चुनौतियों के संदर्भ में एक सैद्धांतिक आधारभूमि भी तलाशना है । जिससे वह ऊर्जा ग्रहण कर एक राजनीतिक दल के रुप में सार्थक हो सके और अपने समर्थकों को इतना वेगवान बना सके कि वे राजनीतिक शून्यता भरने में कामयाब हो सकें ।

इसके बारे में संघ जितना बेपरवाह है उससे कहीं ज़्यादा उदासीनता भरा रवैया भाजपा का रहा है। भाजपा में पार्टी प्रतिबद्धता का हाल यह है कि संघ नेतृत्व खुलेआम कहने लगा है कि वहाँ कोई भी राष्ट्रीय नेता ऐसा नहीं है ,जो पार्टी और उसके भविष्य की सोचता है । हर कोई अपने में सिमट गया है। भाजपा के जिस विशेषता के लिए जानी जाती थी वह उससे बहुत दूर हो गई है । इसे संघ चाहे भी तो कैसे दूर करेगा ? क्या कोई नया संगठन मंत्री आकर जादूका छड़ी फेर सकता है ? इस समय जो संगठन मंत्री हैं वे बिगड़ी भाजपा के चेहरे हो गए हैं ।

गडकरी की छबि व्यवहार कुशल नेता की है। विचार का जहाँ तक सवाल है वे स्वदेशी के पैरोकार हैं पर वैश्वीकरण से उन्हें बैर भी नहीं है । शनिवार को दिल्ली में पार्टी की कमान संभालने के बाद उन्होंने कहा कि वे पाँच सालों में पहली बार दिल्ली में रात बिताएंगे। यानि उनकी राजनीति महाराष्ट्र के इर्द-गिर्द ही रही। अब एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण और सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। यह समय गठबंधन राजनीति का है। इस नाते तरह-तरह के दलों से पार्टी के संबंधों को मजबूती देना उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। लगातार सिमट रहे जनाधार से पार्टी कार्यकर्ताओं के पस्त पड़े हौसलों को नयी ऊर्जा देना भी एक बड़ा काम रहेगा और सबसे बड़ी चुनौती रहेगी पार्टी के भीतर मौजूद दिग्गजों के अहं को संतुष्ट करते हुए आपसी तालमेल बनाए रखते हुए भाजपा की सभी प्रदेश ईकाइयों को नया जोश देना।

गडकरी के जरिए संघ, भाजपा पर नियंत्रण रखना चाहता है। हालाँकि बदलती परिस्थितियों में यह कितना कारगर होगा, यह कहना कठिन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अपनी पसंद के नितिन गडकरी को बीजेपी में ले तो आये हैं, वे अभी तक राज्य स्तर के नेता रहे हैं लेकिन देश के मुख्य विपक्षी दल का अध्यक्ष होने की पात्रता उनमें कितनी है, यह अभी रहस्य बना हुआ है। अगर वे असफल होते हैं तो यह संघ नेतृत्व की असफलता कही जाएगी और ये आरोप लगेगा कि संघ के महाराष्ट्रीय ब्राह्मण नेतृत्व ने एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण को पार्टी पर भी थोप दिया।

भाजपा इस समय एक ऐसी पार्टी बन चुकी है जिसे अपनी दिशा मालूम नहीं और दो लोकसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि हिन्दुत्व की लाइन पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुई है। आम जनता हिन्दुत्व की राजनीति की निरर्थकता को समझ चुकी है और अब इससे निकलना चाहती है। लोग शायद अब जातिवाद की राजनीति से भी ऊब चुके हैं और उससे भी बाहर आने का रास्ता तलाशाना चाहते हैं। भाजपा विकास से ज़्यादा धर्म के एजेंडे पर ध्यान देती आई है लेकिन देश का आम आदमी अब जागरुक हो चुका है। लोग देश का विकास, शिक्षा और रोजगार चाहते हैं। बढ़ती महंगाई और रोज़गार के घटते अवसरों के बीच लोग समझ चुके हैं कि धर्म से पेट नहीं भरता। खराब बुनियाद पर बने घर,साम्प्रदायिक और धार्मिक नीति की बुनियाद पर बने राष्ट्र और साम्प्रदायिक और धार्मिक सोच से चलती पार्टी का अस्तित्व बहुत दिनों तक नहीं कायम नहीं रहता है ।

भाजपा के दो प्रमुख पदों पर परिवर्तन से कुछ होने वाला नहीं है. पार्टी तभी मजबूत होगी जब पार्टी का एजेंडा बदला जाए ।  मुखौटा बदलने की बजाए भाजपा को विचारधारा बदलने की आवश्यकता है । अब तक तीन वैचारिक लाइन ली हैं । गांधीवादी समाजवाद. इसे 1985 में छोड़ा और एकात्मक मानववाद को अपनाया । 1987 से वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लाइन पर है । इसने भाजपा को अयोध्या आंदोलन में एक भूमिका दी । लेकिन भाजपा की समस्या इसी से शुरू होती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वो ऐसे ठोस नारे में नहीं बदल सकी है जो लोगों के गले उतरे । इसके लिए जिस तरह की सैद्धांतिक समझ और चारित्रिक दृढ़ता चाहिए वो आज ना भाजपा में है ना ही संघ में । सतही सत्ता के खेल में उलझी भाजपा का वैचारिक द्वंद उस समय बेक़ाबू हो गया जब वह चुनाव में हारने लगी । भाजपा की अनेक धाराएँ हो गई हैं । खुलकर बहस की गुंजाइश ख़त्म है । असहमति को वहाँ विरोध समझ लिया जाता है, गिरोहबंदी में फंसी भाजपा को संघ का हंटर कितना सुधार सकेगा?

बीजेपी को पटरी पर लाने के लिये गडकरी को चाँडाल चौकड़ी से छुटकारा पाना होगा । उन्होंने सेतुबन्ध बनाकर कई दुर्गम राहों पर सफ़र आसान बनाने की योजनाओं को सफ़लता से साकार किया है । विकास की राजनीति वक्त की ज़रुरत है लेकिन गडकरी को समझना होगा कि जर्जर बुनियाद पर मज़बूत इमारतें खड़ी करना नामुमकिन होता है । इमारत की बुलंदी काफ़ी हद तक बुनियाद की मज़बूती पर निर्भर करती है । ज़ाहिर बात है कि विकास के इतिहास में विध्वंस की कहानी भी दर्ज़ होती है । कई मर्तबा पुख्ता ज़मीन तैयार करने के लिये डायनामाइट लगाना ज़रुरी हो जाता है । बीजेपी के लाइलाज मर्ज़ से निपटने के लिये गडकरी को सर्जरी की दरकार होगी । कुशल डॉक्टर जानता है कि जीवन सुरक्षित रहे तो अंगदान करने वालों की कमी नहीं रहती ।

शनिवार, 7 नवंबर 2009

"चीं" बोल चुकी बीजेपी का ई-आंदोलन

चुनावों में "चीं" बोलने वाला दल ई-आंदोलन की तैयारी में जुट गया है । इंटरनेट की बदौलत संसद में बहुमत पा जाने का सपना चकनाचूर होने के बाद भी लगता है बीजेपी की अकल पर पड़े ताले की चाबी कहीं खो गई है । संसदीय चुनाव के बाद हुए तीन राज्यों में भी मुँह की खाने के बावजूद पार्टी के होश ठिकाने पर नहीं आ सके हैं । तभी तो केंद्रीय सरकार की नीतियों के खिलाफ भाजपा की आईटी सेल ई-आंदोलन की तैयारी कर रही है। आई-टी सेल के प्रदेश महामंत्री सचिन खरे ने बताया कि 9 नवंबर से मध्यप्रदेश के सभी जिलों में सेल के सदस्य आंदोलन में भाग लेंगे। आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार की सभी ई-मेल, वेबसाइट, इंटरनेट, सोशल साइट, फेस बुक, ऑरकुट, ट्विटर और ब्लॉग पर जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके बाद भी यदि नीतियों को लेकर केंद्र सरकार नहीं जागी तो नेताओं के मोबाइल पर असीमित एसएमएस भेजे जाएंगे। आंदोलन में करीब दस हजार सदस्य भाग लेंगे।


इधर अपनी ही पीठ थपथपाने में माहिर प्रदेश के भाजपा नेता ना जाने किस खुशफ़हमी में जी रहे हैं । प्रदेश में ना बिजली है और ना ही पानी । गड्ढ़ों में सड़कों के अवशेष तलाश करना भूसे के ढ़ेर में सुई ढ़ूँढ़्ने से भी ज़्यादा दुरुह काम हो चुका है । सूबे के मुखिया का घोषणाएँ करने का विश्व रिकॉर्ड बनाकर नाम गिनीज़ बुक में दर्ज़ कराने पर आमादा हैं और फ़िर भी प्रदेश में अमन - चैन है । शिवराज भरी सभा में मान चुके हैं कि पूरे सूबे पर तरह-तरह के माफ़ियाओं ने कब्ज़ा कर लिया है । मगर फ़िर भी बीजेपी के नेता मानते हैं कि प्रदेश में रामराज्य की कल्पना को शिवराज ने पूरी तरह साकार कर दिखाया है ।

वन विभाग के नये मंत्री सरताजसिंह ने आते ही महकमे में चल रही पोलपट्टियाँ खोलकर रख दी हैं । गृहमंत्री खुद मान चुके हैं कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था बुरी तरह चरमरा रही है । मगर छह साल से शासन कर रहे दल के इन मंत्री महोदय की महानता तो देखिये वे इसका पूरा श्रेय अब भी काँग्रेस को देना नहीं भूलते । हाल ही में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की दो-दिवसीय बैठक बालाघाट में हुई। इसमें सभी नेताओं ने घोषणावीर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की शान में कसीदे पढ़े । वृंदावली गाने वालों ने प्रदेश में दूसरी बार सरकार बननेका श्रेय एक सुर से चौहान को ही दे डाला । आखिर अभी दो मंत्री पद खाली हैं और निगम-मंडलों में अध्यक्षों की नियुक्तियाँ भी होना हैं ।

प्रवचन की शैली में जनता को अपने कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने वाले शिवराज मलाई अपने ईष्ट मित्रों के साथ सूँतना चाहते हैं और काम का बोझ जनता के कँधे पर डाल देना चाहते हैं । अफ़सर भी इस चालाकी को अच्छी तरह भाँप चुके हैं, तभी तो वे पीपीपी(पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के नाम पर ऎसी स्कीम बना कर लाते हैं जो नेता का भला तो करें ही, वे भी बहती गंगा में ना सिर्फ़ हाथ धो सकें , बल्कि अच्छी तरह मल-मल कर नहा-धो सकें ।

प्रदेश में मंत्रिमंडल का विस्तार बताता है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने शिवराज को समझा दिया है कि बात की कीमत जाये चूल्हे में, दागी का मसला गया तेल लेने, खिसकते जनाधार को देखते हुए माल अँटी में करो और बढ़ लो , लिहाज़ा हम सब एक हैं की शैली ने सभी विरोधों को भुला कर हर गुट को बराबर मौका दिया है । इसीलिये भूमाफ़ियाओं को जेल की सलाखों के पीछे भेजने का एलान करने वाले मुख्यमंत्री ने झुग्गियों और मंदिरों के ज़रिये बेशकीमती ज़मीने कबाडने वालों को ऎलानिया संरक्षण दे रहे नेता को गृह मंत्री का ताज पहना दिया । सरकारी ज़मीनॊम की उद्योगपतियों और नेताओं की मिली भगत से लूट खसोट जारी है , मगर जनता चुप है । मेहमूद गज़नवी को पानी पी-पी कर कोसने वाले लोगों ज़रा इन गज़नवियों की फ़ौज पर भी नज़रे इनायत करें और बतायें कि साधु के भेष में दाखिल हुए इन लुटेरों से कैसे निजात पायें ?

बुधवार, 19 अगस्त 2009

बीजेपी को करना ही होगा "सच का सामना"

बीजेपी के बुज़ुर्ग नेता जसवंत सिंह की बेतरह बिदाई ने एक बार फ़िर पार्टी की अंतर्कलह और अंतर्द्वंद्व को सरेराह ला खड़ा किया है । जिन्ना मुद्दे पर पार्टी लाइन से अलग हटकर अपनी बेबाक राय जगज़ाहिर करने का खमियाज़ा आखिरकार जसवंत सिंह को भुगतना ही पड़ा । लेकिन चिंतन बैठक के नाम पर बीजेपी की पार्लियामेंटरी कमेटी का आनन फ़ानन में लिया गया फ़ैसला हैरान करने वाला है । साथ ही यह भी बताता है कि कॉडर बेस्ड पार्टी के तमगे से नवाज़ी जाने वाली पार्टी में बौद्धिक विचार विमर्श की गुँजाइश पूरी तरह खत्म हो चुकी है । पार्टी पर चाटुकार,चापलूस और खोखा-पेटी समर्पित करने का माद्दा रखने वालों का कब्ज़ा हो चुका है ।

जसवंत सिंह की पुस्तक उनकी निजी राय है । वे खुद भी कई बार इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं । ऎसे में किताब आने के बाद आनन फ़ानन में जसवंत की बिदाई और वो भी बेहद शर्मनाक तरीके से,बीजेपी के मानसिक दीवालियेपन को उजागर करती है । लगातार दो बार से केन्द्र में पराजय का मुँह देखने के बावजूद बीजेपी अपनी खामियों का पता लगाकर उनकी जड़ तक पहुँचने की बजाय शुतुरमुर्गी रवैया अख्तियार कर आत्मघात पर आमादा है । मध्यप्रदेश की ही बात की जाये तो शिवराज जैसे चिरकुट नेताओं की बन आई है,जो अपने नाकारापन को छिपाने के लिये केन्द्रीय नेतृत्व को खुश करने के तरीके आज़मा कर सरकारी खज़ाने को खाली किये दे रहे हैं ।

राष्ट्र भक्ति का दम भरने वाले आरएसएस में भी ऎसे कार्यकर्ताओं का बोलबाला हो चुका है , जो येनकेन प्रकारेण सत्तासुख में भागीदार हो जाना चाहते हैं । बरसों खून पसीना एक कर बीजेपी को इस मुकाम तक लाने वाले कार्यकर्ताओं की बजाय दलाल और गुंडा तत्वों के हावी हो जाने से वैचारिकता का संकट गहराने लगा है । विरोध के स्वर उठाने वालों को खरीद लो या तोड़ दो की नीति पर चलने वाली इस नई भाजपा का अंत सुनिश्चित जान पड़ता है । जिन्ना पर लिखी गई किताब एक संकेत मात्र है , जो बताता है कि हम सभी में "सच का सामना" करने की क्षमता आज तक विकसित नहीं हो सकी है ।

एक नागरिक और विचारवान व्यक्तित्व की हैसियत से जसवंत सिंह को अपनी बात रखने का पूरा हक है । उनके तर्कों पर सहमति-असहमति ज़ाहिर की जा सकती है , लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज़ तारीख को मिटाया या बदला नहीं जा सकता । इतिहास के सटीक विश्लेषण और पुरानी गल्तियों से सबक लेकर ही आगे की राह आसान बनाई जा सकती है । किसी मसले से नज़रें चुराकर या उससे दामन बचाकर निकलने से मुश्किलें खत्म नहीं होतीं , बल्कि वो नई शक्ल में पहले से कहीं ज़्यादा खतरनाक ढ़ंग से सामने आ खड़ी होती हैं । अटल बिहारी वाजपेयी के परिदृश्य से हटने और आडवाणी के कमज़ोर पड़ने के बाद से पार्टी पर दलाल किस्म के लोग काबिज़ हैं । अपनी कुर्सी बचाने और दूसरे को निपटाने में माहिर ये नेता सियासी दाँवपेंचों की बजाय खो-खो के खेल में जुटे हैं । उमा, कल्याण और अब जसवंत सरीखे नेताओं को घसीट कर बाहर फ़ेंक देने की कवायद पार्टी में खत्म होते लोकतंत्र की हकीकत बयान करते हैं ।

बीजेपी को वाकई आगे बढ़ना है , तो कई पहलुओं पर एक साथ काम करना होगा । मौजूदा दौर का बीजेपी मार्का " हिन्दुत्व" जिन्ना के जिन्न से कमतर नहीं । अपना हित साधने के लिये गले में भगवा कपड़ा डालकर गुंडई करने वालों के हिन्दुत्व से पार्टी को निजात दिलाना पहली ज़रुरत है । ये बात सही है कि फ़ंड के बिना पार्टियाँ नहीं चलतीं , लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा लूटने की नीयत से सत्ता में काबिज़ लोगों से भी पार्टियाँ ज़्यादा दूर तक नहीं चल सकतीं । पार्टी की दिशा और दशा तय करने वालों को इस बारे में भी सोचना होगा ।

राष्ट्र की ज़मीन, हवा,पानी, जंगल को बेरहमीं से बेच खाने पर आमादा लोग ना तो राष्ट्र भक्त हो सकते हैं और ना ही हिन्दू । इस तथ्य को सामने रख कर ही पार्टी को बचाया और बनाया जा सकता है । वरना फ़िलहाल बीजेपी की स्थिति काँग्रेस के बेहूदा और घटिया संस्करण से इतर कुछ नहीं । इन सत्ता लोलुपों की जमात पर जल्दी ही काबू नहीं पाया गया,तो "यादवी कलह" बीजेपी को पूरी तरह खत्म कर देगी ।

शनिवार, 2 मई 2009

"आयारामों" की आवभगत से बीजेपी में खलबली

चुनाव से पहले एकाएक पाला बदल कर बीजेपी का दामन थामने वालों की बाढ़ ने संगठन में असंतोष की चिंगारी सुलगा दी है । काँग्रेस,बीएसपी,सपा सरीखे दलों के नगीने अपने मुकुट में जड़ने की कवायद में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह को ज़बरदस्त कामयाबी हासिल हुई । वे दूसरे दलों के असंतुष्टों की बड़ी तादाद को अपने साथ जोड़ने में सफ़ल भी रहे ।

ये किसी कीर्तिमान से कम नहीं कि महज़ एक पखवाड़े में चार हज़ार से ज़्यादा नेताओं का विश्वास बीजेपी की नीतियों में बढ़ गया । इस हृदय परिवर्तन के कारण अपनी पार्टी में उपेक्षा झेल रहे नेताओं की पूछ-परख एकाएक बढ़ गई । आम चुनाव में प्रदेश में "क्लीन स्वीप" का मंसूबा पाले बैठे शिवराज ने अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने के लिये "दलबदल अभियान" को बखूबी अंजाम दिया । राजनीति के उनके इस अनोखे अंदाज़ की खूब चर्चा रही और इस घटनाक्रम में लोगों की दिलचस्पी भी देखी गई । लेकिन चुनावी खुमार उतरने के साथ ही दूसरे दलों से ससम्मान लाये गये नये साथियों को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनने लगी है । नये सदस्यों को अच्छी खातिर तवज्जो की उम्मीद है,वहीं पार्टी के कर्मठ और समर्पित नेताओं को इस पूछ-परख पर एतराज़ है ।

दल बदल कर आये सभी बड़े नेताओं को अभी तक पार्टी ने चुनाव में झोंक रखा था । इतनी बड़ी संख्या में आये लोगों की भूमिका को लेकर पार्टी के पुराने नेता चिंतित हैं । पार्टी से जुड़े नेता संशय में हैं कि कहीं उनकी निष्ठा और कर्मठता कुछ नेताओं की व्यक्तिगत आकांक्षाओं की भेंट ना चढ़ जायें । कुछ नेता तो यहाँ तक कह रहे हैं कि सक्रिय कार्यकर्ताओं का हक छीनकर यदि इन नवागंतुकों को सत्ता या संगठन में नवाज़ा गया,तो खुले तौर पर नाराज़गी ज़ाहिर की जायेगी ।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक भाजश नेता प्रहलाद पटेल,पूर्व काँग्रेसी मंत्री बालेन्दु शुक्ल,काँग्रेस के पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री नर्मदा प्रसाद शर्मा,पूर्व विधायक मोहर सिंह,सुशीला सिंह,कद्दावर दलित नेता फ़ूल सिंह बरैया,बीएसपी नेता भुजबल सिंह अहिरवार सरीखे कई दिग्गजों के साथ करीब चार हज़ार से ज़्यादा नेताओं ने बीजेपी का दामन थामा है । प्रहलाद पटेल की पार्टी में भूमिका पर फ़िलहाल कोई भी मुँह खोलने को तैयार नहीं है । पार्टी मानती है कि वे तो पहले भी भाजपा के सक्रिय सदस्य रहे हैं और पार्टी की रीति-नीति से बखूबी वाकिफ़ हैं । निश्चित ही वे प्रमुख भूमिका में नज़र आएँगे ।

हालाँकि संगठन दूसरे दलों से आये नेताओं को अपने रंग में रंगने के लिये प्रशिक्षण देने की बात कह रहा है । कहा जा रहा है कि उन्हें पार्टी के आचार-विचार से परिचित कराने के लिये ट्रेनिंग दी जायेगी । पार्टी की विचारधारा को पूरी तरह समझ लेने के बाद ही उनकी सक्रिय भूमिका के बारे में विचार किया जाएगा । मगर लाख टके का सवाल है,"टू मिनट नूडल" युग में किसी नेता के पास क्या इतना धैर्य और वक्त है ? घिस चुके बुज़ुर्गवार नेताओं को नये सिरे से ट्रेनिंग देने का तर्क हास्यास्पद है ।

पार्टी छोड़कर गये नेताओं की घर वापसी पर कार्यकर्ताओं और नेताओं को कोई आपत्ति नहीं है,लेकिन राजनीतिक कद बढ़ाने के लिये शिवराज की सबके लिये पार्टी के दरवाज़े खोल देने की रणनीति कई लोगों को रास नहीं आई । बेशक इस उठापटक से शिवराज को फ़ौरी फ़ायदा तो मिला ही है । आडवाणी और मोदी के साथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नाम शुमार होना उनके लिये खुली आँखों से देखे सपने के साकार होने से कम नहीं । मगर पेचीदा सवाल यही है कि पार्टी इस सपने की क्या और कितनी कीमत चुकाने को तैयार है ?

भुने चने खाकर दिन-दिन भर सूरज की तपिश झेलते हुए जिन लोगों ने पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने का काम किया है,उनकी नज़रों के सामने काजू-किशमिश के फ़क्के लगाने वालों के लिये "रेड कार्पेट वेलकम" क्या गुल खिलायेगा ? क्या संघर्ष की राह पर चल कर सत्ता तक पहुँचने वाले दल के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी पार्टी के लिये सुखद परिणिति कही जा सकेगी ? दिल्ली का ताज पाने के लिये संघर्ष पथ पर चल कर कुंदन बने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को दरकिनार कर दूसरे दलों की "इमीटेशन ज्वेलरी" के बूते बीजेपी कब तक राजनीति की पायदान पर आगे बढ़ सकेगी ? ये तमाम सवाल भविष्य के गर्भ में छिपे हुए हैं । गुज़रता वक्त ही इनका जवाब दे सकेगा ।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

बीजेपी में दलबदलुओं का सैलाब

प्रदेश में यात्राओं,घोषणाओं और महापंचायतों के लिये पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अब प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर के साथ मिल कर तोड़क-फ़ोड़क राजनीति की नई इबारत लिखने में व्यस्त हैं । भाजपा की जुगल जोड़ी " शिवराज- तोमर" ने दलबदल के नये कीर्तिमान बनाने का बीड़ा उठा लिया है । विचारधारा और राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर भाजपा ने सभी दलों के नेताओं के लिये अपने दरवाज़े खोल दिये हैं । घोषणावीर शिवराज इन दिनों " वसुधैव कुटुम्बकम" की अवधारणा को साकार करने के लिये रात-दिन एक किये हुए हैं ।

अपने दलों में उपेक्षित नेताओं के स्वागत में भाजपा ने पलक-पाँवड़े बिछा दिये हैं । हालाँकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस "भीड़ बढ़ाऊ" रणनीति पर नाखुशी ज़ाहिर कर रहे हैं । लम्बे समय तक प्रदेश संगठन मंत्री रहे कृष्ण मुरारी मोघे कहते हैं कि पार्टी में शामिल होने वालों के लिये मापदंड तय होना चाहिए । वे मानते हैं कि स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिये बगैर होने वाले फ़ैसले आगे चल कर परेशानी का सबब बन सकते हैं । पार्टी के संगठन महामंत्री माखन सिंह भी आने वालों की भीड़ को लेकर असहमति जता चुके हैं ।

मध्यप्रदेश में भाजपा पिछले लोकसभा चुनावों की पच्चीस सीटों के आँकड़े को बरकरार रखने के लिये जी जान लगा रही है । नेताओं के साथ संगठन के रणनीतिकारों ने भी पार्टी मुख्यालय की बजाय क्षेत्रों में डेरा जमा लिया है । प्रदेश भाजपा का थिंक टैंक रोज़ाना एक-एक सीट की समीक्षा में जुटा है और निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ गणित बिठाने की माथापच्ची में लगा है । लोकसभा चुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल करने की जद्दोजहद में कई नेता इधर से उधर हो गये हैं । ऎसे नेताओं की भी कमी नहीं जो हर विचारधारा में खुद को को फ़िट करने में वक्त नहीं लगाते ।

परिसीमन से बदले नक्शे के कारण कई दिग्गजों ने तो अपनी विचारधारा ही बदल डाली । दूसरे दलों के नेताओं को खींचकर पार्टी में लाने की ’प्रेशर पॉलिटिक्स’ भी खूब असर दिखा रही है । प्रमुख पार्टी काँग्रेस और बीएसपी के दिग्गजों के अलावा कई अन्य दलों के नेता और कार्यकर्ता भाजपा का रुख कर रहे हैं । अब तक करीब साढ़े तीन हज़ार नेता- कार्यकर्ता बीजेपी का दामन थाम चुके हैं ।

एक बड़े नेता का कहना है कि भाजपा के दरवाज़े अभी सबके लिये खुले हैं,जो भी चाहे आ सकता है । इस खुले आमंत्रण के बाद बीजेपी में आने से ज़्यादा लाने का दौर चल पड़ा है । दूसरे दलों के ’विभीषणों’का दिल खोलकर स्वागत सत्कार किया जा रहा है । बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और लोजपा नेता रहे फ़ूलसिंह बरैया भगवा रंग में रंग गये हैं । पार्टी से रुठ कर गये प्रहलाद पटेल ने भी घर वापसी में ही समझदारी जानी ।

काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और सिंधिया घराने के खासमखास बालेंदु शुक्ल भाजपा में शामिल हो गए । छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव विधानसभा क्षेत्र से काँग्रेस विधायक रहे हरीशंकर उइके मुख्यमंत्री के चुनावी दौरे के दौरान एक हजार कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा में आ गये । गुना के भाजश विधायक राजेन्द्र सलूजा के बाद अब सिलवानी के भाजश विधायक देवेंद्र पटेल भी बीजेपी की राह पकड़ चुके हैं । विदिशा जिले के पूर्व विधायक मोहर सिंह और उनकी पत्नी सुशीला सिंह भी पार्टी में लौट आये । काँग्रेस के प्रदेश महामंत्री रहे नर्मदा प्रसाद शर्मा ,पूर्व विधायक शंकरसिंह बुंदेला और बीएसपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भुजबल सिंह अहिरवार को भी बीजेपी में एकाएक खूबियाँ दिखाई देने लगी हैं ।

सागर लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी शैलेष वर्मा ने भी भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है । इसी तरह देवास-शाजापुर के पूर्व सांसद बापूलाल मालवीय के बेटे श्याम मालवीय ने शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में सदस्यता ग्रहण की । श्याम 2004 में भाजपा के वर्तमान सांसद थावरचंद गेहलोत के खिलाफ काँग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। देवास के अधिवक्ता श्याम मालवीय काँग्रेस के जिला महामंत्री भी हैं । सागर से काँग्रेस का टिकट नहीं मिलने से नाराज़ संतोष साहू भी अब भाजपा नेता बन गये हैं ।

भारतीय राजनीति में पाला बदलने का चलन नया नहीं है । आयाराम-गयाराम की संस्कृति का जन्म भी यहीं हुआ और इसे बखूबी परवान चढ़ते हम सभी ने देखा है । वैचारिक विशुद्धता के साथ राजनीति करने वाले बीजेपी और कम्युनिस्ट पार्टी जैसे काडर बेस्ड दल भी अब इससे अछूते नहीं रहे । भाजपा को कोस कर दाल रोटी चलाने वाले नेता अब बीजेपी की खूबियाँ "डिस्कवर" करके मलाई सूँतने का इंतज़ाम कर रहे हैं ।

रातोंरात हृदय परिवर्तन तो संभव नहीं है और ना ही इस बदलाव के पीछे कोई ठोस वैचारिक या सैद्धांतिक कारण दिखाई देता है । जो नेता पार्टी में आने को ललायित हैं वे न तो इसके एजेंडे से प्रभावित हैं और न ही उनकी प्रतिबद्धता है । ये वो लोग हैं जो एक वैचारिक पार्टी में भीड़ बढ़ा रहे हैं । इनके उतावलेपन की सिर्फ़ एक ही वजह है और वो है इनका पर्सनल एजेंडा । तात्कालिक तौर पर आकर्षक और रोचक लगने वाले इस घटनाक्रम के दूरगामी परिणाम पार्टी के लिये बेहद घातक साबित होंगे ।

गुटबाज़ी और हताशा की गिरफ़्त में आ चुकी प्रदेश काँग्रेस दिग्भ्रमित है और तीसरी ताकत के उदय की संभावनाएँ हाल फ़िलहाल ना के बराबर हैं । ऎसे में सत्ता के आसपास जमावड़ा लगना स्वाभाविक है । बेशक दल बदलुओं की जमात का दिल खोलकर स्वागत करने वाली भाजपा ने राजनीति में अपना रुतबा बढ़ा लिया हो,लेकिन "पार्टी विथ डिफ़रेंस" का दावा करने वाली बीजेपी के लिये क्या यह शुभ संकेत कहा जा सकता है ?

भारतीय राजनीति में वैचारिक एक्सक्लुसिव एजेंडा ही भाजपा के जन्म का आधार था । इसकी मूल ताकत हमेशा से ही समर्पित कार्यकर्ता रहे,जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से विचार ऊर्जा लेकर पार्टी की मज़बूती के लिये अपना खून-पसीना एक किया । दीनदयाल परिसर की ड्योढ़ी पर हर "आयाराम" के माथे पर तिलक और गले में पुष्पहार पहनाकर स्वागत के अनवरत सिलसिले का असर पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर क्या,कैसा और कितना पड़ेगा ये सोचने की फ़ुर्सत शायद किसी को नहीं है ।

कुल मिलाकर प्रदेश बीजेपी उस घाट की तरह हो चुकी है,जिस पर शेर के साथ ही भेड़-बकरियाँ भी पानी पी रहे हैं । लेकिन इसे रामराज्य की परिकल्पना साकार होने से जोड़कर देखना भूल होगी । क्योंकि यहाँ तपस्वी राम की नहीं अवसरवादी विभीषणों की पूछ परख तेज़ी से बढ़ गई है । रामकारज के लिये एक ही विभीषण काफ़ी था । इन असंख्य विभीषणों के ज़रिये स्वार्थ सिद्धि एक ना एक दिन पार्टी के जी का जँजाल बनना तय लगती है ।

बीजेपी के घाट पर भई दलबदलुओं की भीड़
तोमरजी चंदन घिसें, तिलक करें घोषणावीर।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

भाजपा का चुनावी "कॉरपोरेट कल्चर"

मध्यप्रदेश में बीजेपी के फ़रमान ने कई मंत्रियों की नींद उड़ा दी है । पिछले लोकसभा चुनावों की कामयाबी दोहराने के केन्द्रीय नेतृत्व के दबाव के चलते प्रदेश मंत्रिमंडल की बेचैनी बढ़ गई है । कॉरपोरेट कल्चर में डूबी पार्टी ने सभी को टारगेट दे दिया है । ’टारगेट अचीवमेंट” ही मंत्रिमंडल में बने रहने के लिये कसौटी होगी । प्रदेश में पचास ज़िले हैं और मंत्रियों की संख्य़ा महज़ बाईस है । ऎसे में सभी मंत्रियों को कम से कम दो - दो ज़िलों में अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन देना ज़रुरी है , ताकि बीजेपी केन्द्र में सत्ता के करीब पहुँच सके । पार्टी ने क्षेत्रीय विधायकों को भी "लक्ष्य आधारित काम" पर तैनात कर दिया है । प्रत्याशियों को जिताने का ज़िम्मा सौंपे जाने के बाद से इन नेताओं की बेचैनी बढ़ गई है ।

हाईप्रोफ़ाइल मानी जा रही विदिशा , गुना , रतलाम और छिंदवाड़ा सीट पर सभी की नज़रें लगी हैं । हालाँकि विदिशा में राजकुमार पटेल की ’मासूम भूल” के बाद परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है । सूत्रों का कहना है कि सुषमा की जीत पक्की करने के लिये विकल्प भी तय था यानी सुषमा का दिल्ली का टिकट कटाओ या मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करो । और फ़िर राजनीति में "साम-दाम-दंड-भेद" की नीति ने रंग दिखाया । अब सुषमा स्वराज के साथ ही बीजेपी भी पूरी तरह निश्चिंत हो गई है ।

कमलनाथ ,ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांतिलाल भूरिया को घेरने के लिये मुख्यमंत्री ने खुद ही मोर्चा संभाल लिया है । दिल्ली और मध्यप्रदेश की चार सर्वे एजेंसियों ने छिंदवाड़ा , गुना-शिवपुरी, रतलाम, बालाघाट , दमोह ,टीकमगढ़ , भिंड , धार ,होशंगाबाद और खरगोन सीट पर नज़दीकी मुकाबले की बात कही है । जीत सुनिश्चित करने के लिये काँटे की टक्कर वाले इन क्षेत्रों में मुख्यमंत्री ने सूत्र अपने हाथ में ले लिये हैं ।

अपने चहेतों को टिकट दिलाने के कारण मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दाँव पर लगी है । मंत्री रंजना बघेल के पति मुकाम सिंह किराड़े धार से उम्मीदवार हैं । बालाघाट से के. डी. देशमुख को टिकट मिलने के बाद मंत्री गौरी शंकर बिसेन और रीवा से चन्द्रमणि त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाने के बाद मंत्री राजेन्द्र शुक्ला पर दबाव बढ़ गया है । होशंगाबाद से रामपाल सिंह और सागर से भूपेन्द्र सिंह की उम्मीदवारी ने मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी बढ़ा दी है ।

उधर खेमेबाज़ी और आपसी गुटबाज़ी ने काँग्रेस को हैरान कर रखा है । आये दिन की फ़जीहत से बेज़ार हो चुके नेता अब चुप्पी तोड़ने लगे हैं । अब तक चुप्पी साधे रहे दिग्गज नेताओं का दर्द भी ज़ुबान पर आने लगा है । प्रदेश काँग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष अजय सिंह का कहना है कि इस तरह की राजनीति उनकी समझ से बाहर है । वे कहते हैं , "पार्टी हित में सभी नेताओं को मिलजुल कर आपसी सहमति से फ़ैसले लेना होंगे ।"

विधान सभा चुनाव में काँग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद आलाकमान ने सभी नेताओं को एकजुटता से काम करने का मशविरा दिया था । लेकिन पाँच महीने बाद भी हालात में सुधार के आसार नज़र नहीं आने से कार्यकर्ता निराश और हताश हैं । जानकारों की राय में प्रदेश काँग्रेस इस वक्त अस्तित्व के संकट के दौर से गुज़र रही है । संगठन में नेता तो बहुत हैं , नहीं हैं तो केवल कार्यकर्ता ।

शनिवार, 21 मार्च 2009

उम्मीदवारों को लेकर काँग्रेस में घमासान

भाजपा में राजनीतिक स्तर पर सहमति बनने के बाद पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की शनिवार 21 मार्च को भोपाल में विधिवत घर वापसी हो गई । पार्टी से नाराज़ प्रहलाद ने उमा भारती के साथ मिलकर भारतीय जन शक्ति का गठन किया था । वे उमा के कामकाज के तौर तरीकों से खफ़ा थे । उमा से अनबन के चलते विधान सभा चुनावों से पहले भी उनकी बीजेपी में वापसी को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं ।

आज पार्टी मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में प्रहलाद ने अपने दल - बल के साथ पार्टी में पुनर्प्रवेश कर लिया । बीजेपी में इस बात को लेकर कश्मकश है कि पार्टी प्रहलाद का उपयोग किस तरह करे ? उन्हें छिंदवाड़ा से काँग्रेस उम्मीदवार कमलनाथ के खिलाफ़ मैदान में उतारने की चर्चाएँ भी चल रही हैं । हालाँकि श्री पटेल ने चुनाव लड़ने से इंकार किया है , लेकिन पार्टी ने फ़िलहाल छिंदवाड़ा ,खजुराहो और सीधी सीट पर प्रत्याशियों के नाम की घोषणा अब तक नहीं की है । इसके अलावा बालाघाट और बैतूल के लिए घोषित उम्मीदवारों को बदलने पर भी विचार चल रहा है ।

लोधी वोट बैंक में प्रहलाद और उमा की अच्छी पैठ है । उत्तर प्रदेश में कल्याणसिंह के बीजेपी से बाहर होने के बाद बुंदेलखंड, महाकौशल और यूपी के लोधी-लोधा मतदाताओं को पार्टी के पक्ष में लाने के लिए भारी माथापच्ची चल रही थी । बालाघाट प्रहलाद का प्रभाव क्षेत्र है , जहाँ से बीजेपी को अच्छी बढ़त मिलने की उम्मीद बन गई है ।

इधर बीजेपी का कुनबा फ़िर से भरापूरा दिखाई देने लगा है । विधानसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफ़लता ने नेता-कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद कर दिये हैं , वहीं अँदरुनी उठापटक से काँग्रेस की हालत पतली है । बीजेपी ने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा में भी बढ़त ले ली है । बहुजन समाज पार्टी ने भी सभी उनतीस सीटों से प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर ली है , जबकि काँग्रेस अब तक बीस सीटों पर ही उम्मीदवार तय कर पाई है । बची हुई नौ में से सात सीटों पर भारी घमासान है । भोपाल और होशंगाबाद में मुस्लिम नेता बाग़ी तेवरों के साथ टिकट का दावा ठोक रहे हैं ।

जिन क्षेत्रों के लिए नामों की घोषणा हुई है , वहाँ असंतोष फ़ूट पड़ा है । पैराशूटी उम्मीदवारों को लेकर उपजी नाराज़गी सड़कों पर आ गई है । सागर, मंदसौर और खजुराहो में विरोध प्रदर्शन के साथ ही पुतले जलाने का दौर भी खूब चला । सागर में असलम शेर खान को टिकट देने के विरोध में एक कार्यकर्ता ने अपनी कार ही आग के हवाले कर दी ।विरोध में कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ़ पुतले जलाये बल्कि काँग्रेस कार्यालय में पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष का एक बैनर भी लटका दिया । इसमें मैडम झपकी लेती दिखाई पड़ती हैं , उनकी नींद पाँच साल बाद टूटने की उम्मीद जताई गई है ।

इसी तरह युवक काँग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मीनाक्षी नटराजन को मंदसौर सीट की प्रत्याशी बनाना भी पार्टी का सिरदर्द बन गया है । नीमच क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने उन्हें थोपा हुआ नेता बता कर पुतले फ़ूँके । खजुराहो प्रत्याशी राजा पटैरिया के लिए भी स्थानीय नेता का मुद्दा भारी पड़ रहा है । हटा(दमोह) के निवासी पटैरिया को लोग बाहरी नेता करार दे रहे हैं । प्रदर्शन और जमकर नारेबाज़ी ने उनकी चिंताएँ बढ़ा दी हैं ।

मैदाने जंग में जाने से पहले ही आपसी कलह ने काँग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त कर दिये हैं । मध्यप्रदेश में काँग्रेस दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही । हाल के विधानसभा चुनावों से भी पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा । बीजेपी के खिलाफ़ मुद्दों की भरमार है लेकिन काँग्रेस के पास अब ऎसे नेता नहीं जो इन मुद्दों को वोट में तब्दील कर सकें । पिछली मर्तबा बीजेपी पच्चीस सीटों पर काबिज़ थी । चार सीटों से संतोष करने वाली काँग्रेस यदि वक्त रहते नहीं चेती तो प्रदेश में पार्टी का नामलेवा नहीं बचेगा ।

बुधवार, 11 मार्च 2009

एनडीए के बिखराव से उलझन में आडवाणी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमज़ोर नेता और खुद को लौह पुरुष के तौर पर पेश करने वाले लालकृष्ण आडवाणी का तिलिस्म टूट रहा है । प्रधानमंत्री के रुप में देश का नेतृत्व सम्हालने का ख्वाब सँजोये बैठे आडवाणी सर्वमान्य नेता बनते नज़र नहीं आ रहे । एक-एक कर घटक दल छिटक रहे हैं और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन शीशे की मानिंद दरक रहा है । पिछली मर्तबा बाईस दलों के भरे पूरे कुनबे वाले एनडीए को अब छः घटकों को साथ रखने में भी पसीने छूट रहे हैं । लगता है कि एनडीए के सदस्य आडवाणी की रहनुमाई में अपना कोई भविष्य नहीं देख रहे हैं ।

आडवाणी के खैरख्वाह माने जाने वाले बालासाहेब ठाकरे ने जिस तरह बेरुखी अख्तियार की है , वो बीजेपी के लिए निराशाजनक और अन्य लोगों के लिए चौंकाने वाली है । हाल में ठाकरे ने मुम्बई आए आडवाणी को मिलने का वक्त नहीं देकर अपना रुख काफ़ी हद तक साफ़ कर दिया । शिवसेना ने मराठी मानुष शरद पवार को प्रधानमंत्री बनाने के मुद्दे पर कड़ा रवैया अपनाकर बीजेपी को तगड़ा झटका दिया है । आमची मुम्बई और मराठी मानुष का नारा उछालकर राजनीतिक पायदान चढी शिवसेना ने प्रधानमंत्री पद पर पवार का नाम बढा कर फ़िर प्रांतवाद का ओछा दाँव खेला है ।

उधर , गठबंधन के दूसरे बड़े दल बीजेडी ने सीटों के सवाल पर दोस्ती से किनारा कर लिया है । हालाँकि ऊपरी तौर पर महज़ सीटों के तालमेल का विवाद ही नज़र आता है , लेकिन पर्दे के पीछे कँधमाल की घटना सहित कई अन्य मामलों ने भी आपसी रिश्तों की खटास को कड़वाहट में बदल दिया है । करीब ग्यारह साल पुराना साथ छोड़कर नवीन पटनायक ने अब नये दोस्तों का हाथ थाम लिया है । दक्षिणपंथियों से मोहभंग के बाद पटनायक का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर होता नज़र आ रहा है । बीजू जनता दल ने अब भगवा चोला उतार कर लाल सलाम की तैयारी कर ली है ।

ये सवाल उठाया जा सकता है कि आस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेन्स को ज़िन्दा जलाये जाने से लेकर कँधमाल तक उड़ीसा में ईसाइयों पर ज़्यादती की वारदात बीजेडी के शासनकाल में लगातार होती रही हैं । ईसाइयों पर हमलों की बढती घटनाओं को लेकर पटनायक सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाले वामपंथी आज उनके हमराह बन गये हैं । इस नज़रिये से नवीन पटनायक का बीजेपी का दामन छोड़कर वामदलों से पींगें बढाना राजनीतिक अवसरवादिता का ताज़ातरीन उदाहरण लगता है ।

कभी नरेन्द्र मोदी तो कभी भैरोंसिंह शेखावत की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से भाजपा की अँदरुनी राजनीति में काफ़ी समय तक खलबली रही । लेकिन ऎन चुनाव के वक्त एनडीए में मची भगदड़ को महज़ सीटों के बँटवारे का विवाद कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । ये केवल सीटों की सौदेबाज़ी से उपजी बौखलाहट नहीं है । भाजपा और उसके सहयोगी दलों के सत्ता में पहुँचने और छाया प्रधानमंत्री रह चुके आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में कई अड़चनें साफ़ दिखाई देती हैं ।

वर्ष 2004 में जनता ने जब एनडीए को बाहर का रास्ता दिखाया तो अन्नाद्रमुक , तेलुगूदेशम , तृणमूल काँग्रेस ने भाजपा से किनारा कर लिया । इससे पहले नेशनल कॉन्फ़्रेंस ,एलजेपी, डीएमके , एमडीएमके और पीएमके जैसी पार्टियों ने भी बारी- बारी से बीजेपी का साथ छोड़कर नई राहें ढूँढ लीं । ऎसा मालूम होता है कि राष्ट्रीय पार्टियों पर क्षेत्रीय दलों के हावी होने की राजनीति का चलन बढ़ रहा है ।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिवसेना और बीजेडी के झटके के बाद जनता दल (यू) जैसे कई छोटे दलों की सीटों की सौदेबाज़ी की ताकत और बढ जाएगी । लेकिन इसके साथ ही बीजेपी को यह भी स्वीकार करना होगा कि लालकृष्ण आडवाणी तमाम क्षेत्रीय दलों के लिए वो नाम नहीं जिस पर वे अटल बिहारी वाजपेयी की तरह बिना किसी हीलाहवाले मंज़ूरी दे दें । लाख टके का सवाल है कि क्या एनडीए का बिखराव आडवाणी के बरसों पुराने ख्वाब की तामीर में खलल पैदा करेगा..... ? कहीं ऎसा ना हो कि प्रधानमंत्री पद के ख्वाहिशमंद आडवाणी को "प्यासा" फ़िल्म के मशहूर नग्मे " देखी ज़माने की यारी ,बिछड़े सभी बारी - बारी " से ही दिल बहलाना पड़े...........।

सोमवार, 9 मार्च 2009

प्यासे कंठ और तर होते बाग़ - बागीचे

दुनिया भर में भूमिगत जल का स्तर तेजी से घट रहा है और विकासशील देशों में तो स्थिति बेहद गंभीर है । इन देशों में जल स्तर गिरने की रफ़्तार लगभग तीन मीटर प्रति वर्ष है । प्रदेश के अधिकाँश हिस्सों में भू - जल स्तर गिरता ही जा रहा है । मॉनसून की बेरुखी और प्रचंड गर्मी के कारण पानी के वाष्पीकरण में तेज़ी आई है । मार्च के पहले हफ़्ते में ही भोपाल के तापमान ने 38 डिग्री सेल्सियस की लम्बी छलाँग लगाई है । बड़ी झील पहले ही हाथ खड़े कर चुकी है । ऎसे में आया है होली का त्योहार .......। भोपाल वासियों की प्यास बुझाने का ज़िम्मा सम्हाल रहे नगर निगम के हाथ - पाँव भी फ़ूल गये हैं । लोगों से सूखी होली खेलने का गुज़ारिश की जा रही है । निगम ने जनता को पानी के संकट की गंभीरता का एहसास कराने के लिए आज एक विज्ञापन प्रसारित किया है ।

दूसरी तरफ़ भोपाल के नए नवाब ( बाबूलाल गौर) शहर को गर्मियों में भी चमन बनाने पर आमादा हैं । हाल ही में उन्होंने हैदराबाद का दौरा किया और पाया कि वहाँ के निज़ाम की मखमली घास भोपाल की घास की बनिस्पत बेहद नर्म है , सो हैदराबादी घास शहर में लगाने का फ़रमान जारी कर दिया । भरी गर्मी में लाखों रुपए खर्च करके घास मँगाई गई है । अब लाखों की घास के रखरखाव और बचाव पर करोड़ों रुपए खर्च होंगे । लेकिन शहर के व्यस्ततम लिंक रोड नम्बर दो पर लग रही इस मुलायम घास पर चलने का मज़ा लेने के लिए लोगों को अपनी जान जोखिम में डालना ही होगी । वजह ये कि मखमली घास फ़ुटपाथ पर नहीं रोड डिवाइडर पर लगाई गई है । गौर साहब शहर में सौ नए बाग - बागीचे बनाने की योजना का खुलासा भी कर चुके हैं । अँधेर नगरी - चौपट राजा .......।

भोपाल में दो दिन में एक बार औसतन करीब 400-500 लीटर पानी सप्लाई किया जा रहा है । तीखी गर्मी में जब लोगों के प्यासे कंठ को पानी मिलना दुश्‍वार हो रहा है , तब बागीचे सजाने के जुनून को क्या कहा जाए ? वैसे मेरी कॉलोनी में भी पिछले चार सालों से राजपरिवार ( बीजेपी ) के प्रादेशिक स्तर के पदाधिकारी रहते हैं ।

उनके घर के सामने के मैदान पर कभी बच्चे खेला करते थे , मगर नेताजी के सरकारी खर्च पर बागीचा सजाने के शौक ने बच्चों से खेल का मैदान छीन लिया । अब बच्चे उस पार्क में खेल नहीं सकते , बुज़ुर्गों की तरह केवल बैठ सकते हैं ।

पार्क में लगे पौधों और घास को तर रखने के लिए कोलार की मेन पाइप लाइन में अवैध रुप से मोटी पाइप डलवा कर पानी लिया जा रहा है । मगर पार्क बड़ा और गर्मी तेज़ है , इसलिए पौधों की प्यास बुझाने के लिए नगर निगम के टेंकर भी कीचड़ हो जाने की हद तक मैदान की तराई में जुटे हैं । लोग प्यासे मरें तो क्या .....? आधुनिक युग के इन राजाओं के सभी शौक पूरे होना ही चाहिए , आखिर लोकतंत्र है । लोकशाही में जनता की सेवा का बेज़ा फ़ायदा उठाने की कूव्वत अगर नेता अपने में पैदा नहीं कर पाए , तो धिक्कार है ऎसे प्रजातंत्र और ऎसी नेतागीरी पर ....। आखिर कभी समझाकर ,कभी डराकर और कभी धमकाकर हर आवाज़ उठाने की कोशिश का गला दबाना ही तो प्रजातंत्र है ।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

देश को ’राम’ नहीं रोटी चाहिए.......

लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर राम मुद्दे को हवा दी है नागपुर में राष्ट्रीय परिषद की बैठक में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बनाने का शिगूफ़ा छोड कर मतदाताओं की नब्ज़ टटोलने की कोशिश की है । " कोई माँ का लाल भगवान राम में हमारी आस्था और निष्ठा को डिगा नहीं सकता "
राजनाथ सिंह ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार पर निशाना साधा कि पिछले पांच सालों में केंद्र सरकार ने राम जन्मभूमि विवाद सुलझाने के लिए पाँच मिनट का समय भी नहीं दिया । राजनाथ सिंह ने बडी ही चतुराई भरी चाल चली है । शब्दों पर गौर करें तो लगेगा कि उन्होंने काफ़ी सफ़ाई से मतदाताओं को भरमाने की कोशिश की है । बकौल राजनाथ "जिस दिन भाजपा को अपने बलबूते बहुमत मिलेगा, पार्टी इस मुद्दे पर एक क़ानून लाएगी ।" यानी ना नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी ।

मंदी की मार से बेहाल लोगों को रोज़गार के लाले पडे हैं और बीजेपी को कुर्सी की चाहत में राम याद आने लगे हैं । लोगों के मुंह से निवाले छिन रहे हैं और देश की दूसरी सबसे बडी पार्टी भव्य राम मंदिर बनाने का सपना जनता की आंखों में भर रही है । गरीब की दो वक्त की रोटी का जुगाड नहीं है और धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं को अपनी झोली में समेटने की जुगत भिडाई जा रही है । सही मायनों में इस देश को राम की नहीं रोज़ी की दरकार है ,रोटी की ज़रुरत है -"भूखे भजन ना होवे गोपाला , ये ले तेरी कंठी - माला ।" भूखे पेट राम नहीं रोटी याद आती है । गरीब के लिए ’राम’ रोटी में बसते हैं । अगर लोगों को रोटी देने का प्रबंध कर दिया जाए , तो भी बीजेपी को ’राम’ मिल ही जाएंगे ।

गौरतलब है कि 1998 में भारतीय जनता पार्टी ने जब केंद्र में अन्य पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाई थी, उस समय उसने अयोध्या, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और समान आचार संहिता जैसे विवादित मुद्दों को दरकिनार कर दिया था । लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी ने एक बार फिर राम मुद्दे पर बयान देना शुरू किया है । राम मंदिर के निर्माण का मामला विवादास्पद रहा है और हर बार चुनावों के समय विवाद गहरा जाता है । दिलचस्प बात है कि अयोध्या के ज़्यादातर मतदाताओं की नज़र में चुनाव का मुख्य मुद्दा 'विकास' है, न कि 'मंदिर निर्माण' । राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि दरअसल अयोध्या का आम आदमी मंदिर मुद्दे से कभी जुड़ ही नहीं पाया ।

अयोध्या के साधु-संतों ने भी भाजपा नेताओं को जमकर लताडा है । वे मानते हैं कि चुनाव के वक्त भाजपा को राम मंदिर याद आने लगता है । लेकिन सत्ता में आने के बाद मंदिर तो दूर राम भी याद नहीं रहते । हनुमान गढ़ी के महंत भवनाथ दास ने तो नागपुर में राम मंदिर की बात करने वालों को "वोटों का सौंदागर" तक करार दे डाला । गुस्साये महंत कहते हैं कि वोटों के लिए अब ये भगवान श्रीराम का भी सौदा करने निकले हैं। अब चुनाव आते ही भगवान राम के नाम पर राजनैतिक सौदेबाजी में जुट गए हैं। इन्हीं लोगों के कारण मंदिर निर्माण का मुद्दा हाशिए पर चला गया। सत्ता में थे तो अयोध्या झांकने तक नहीं आए। अब सत्ता की चाहत में मंदिर के नाम पर ठगने आ रहे हैं।

राम लहर पर सवार होकर केन्द्र की सत्ता में आ चुकी भारतीय जनता पार्टी को रह-रहकर सत्ता सुंदरी की याद सताने लगाती है । ऎसे में रह - रह कर याद आते हैं भगवान श्रीराम और उनका भव्य मंदिर । उत्तर प्रदेश में सबसे बुरी स्थिति में भाजपा ही है। जिसे देखते हुए संभवत: पार्टी ने एक बार फिर मंदिर का मुद्दा उठाया है। पर यह मुद्दा न राजनैतिक दलों को रास आ रहा है , न ही साधु-संतों और आम जनता को । राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा-यह तो राजनैतिक बयान है। अयोध्या में राम का मंदिर तो है ही और पूजा भी हो रही है। भव्य राम मंदिर बनने की बात का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। जब हिन्दू मानस जगेगा तो भव्य राम मंदिर का निर्माण हो ही जाएगा।

सरयू कुंज मंदिर के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कहा-राजनाथ सिंह का यह बयान भ्रमित करने वाला और धोखा देने वाला है। यह अदालत की अवमानना भी है। पार्टी असली मुद्दों बेरोजगारी, गरीबी और किसानों की उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण को लेकर कभी आगे नहीं आती।

दूसरी ओर अयोध्या की हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञान दास भावुक हो कर कहते हैं कि उन्हें ख़ून से सना नहीं , बल्कि दूध से बना मंदिर चाहिए । मंदिर आम राय से बने तभी उचित होगा । मुसलिम समुदाय की सहमति से निर्माण हो तभी भव्य मंदिर बन पाएगा। किसी को भी दुखी करके बनाए गए पूजा स्थल में ईश्वर का वास नहीं हो सकता ।

भाकपा बीजेपी के इस बयान में वोटों की सियासत देखती है । उसका कहना है कि इस पार्टी के पास देश के विकास का कोई माडल नहीं है । ये लोग अपने फ़ायदे के लिए राम का नाम बदनाम करने में जुटे हैं।

देश इस समय एक साथ कई तरह के संकटों से दो - चार हो रहा है । ऎसे वक्त में नई और व्यापक सोच की आवश्यकता है , जो ना केवल देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सके ,बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों में वैमनस्य की खाई को पाट सके । प्रजातंत्र की नींव को मज़बूत करने के लिए भ्रष्टाचार जैसी लाइलाज बीमारी का इलाज ढूंढना ज़रुरी है ।

लोगों का भरोसा न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका से जिस तेज़ी से उठ रहा है ,ये भी बेहद चिंता का विषय है । इस विश्वास को दोबारा कायम करना चुनौती भरा और दुरुह काम है । राजनीतिक दलों की पहली चिंता देश हित होना चाहिए । देश के नागरिकों की खुशहाली , सुशासन और ईमानदार समाज पार्टियों का एजेंडा होना चाहिए । नेताओं को ये याद रखना होगा कि देश है तभी तक उनकी सियासत है ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

मध्यप्रदेश में बीजेपी की "कॉर्पोरेट सरकार"

किसानों , गरीबों और कर्मचारियों का हितैषी होने का दावा करने वाली बीजेपी क्या बदल रही है ? प्रमोद महाजन जिस कॉर्पोरेट कल्चर को अपनाने का सपना लिए रुखसत हो गये क्या भाजपा ने उसे पूरी तरह अंगीकार करने का मन बना लिया है ? चाल ,चरित्र और चेहरे की बात करने वाला राजनीतिक दल क्या अब "कॉर्पोरेट गुरुओं" के इशारों पर चलेगा ? मध्यप्रदेश के मंत्रियों की पचमढी में आयोजित "पाठशाला" की खबर बताती है कि जननायक अब सीईओ संस्कृति के रंग में रंगने को बेताब हैं ।

प्रबंधन गुरुओं और प्रशासकों ने मंत्रियों को बेहतर नेतृत्व और कामकाज की कमान अपने हाथ में रखने के गुर सिखाये हैं । उबासी लेते नेताओं को इस अफ़लातूनी कवायद से वाकई कुछ हासिल हो सकेगा ...? आम जनता के लिए पैसे की तंगी का दुखडा सुनाने वाली सरकार ने दो दिन के लिए पचमढी की शानदार ग्लेन व्यू होटल को स्कूल में बदल दिया । मगर बुनियादी सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में मंत्री सीईओ हो सकता है ,जो उन्हें कॉर्पोरेट सेक्टर का एक्सपोज़र दिया जाए ? पब कल्चर को पाश्चात्य बताकर आसमान सिर पर उठाने वाली पार्टी कॉर्पोरेट कल्चर अपनाने के लिए इतनी उत्साहित क्यों है ?

विभाग अध्यक्ष ,सचिव ,सलाहकार बगैरह के रुप में बहुत से प्रबंधक मंत्रियों के अधीन रहते हैं । मंत्री का दायित्व नीति निर्धारण का है । कुशल प्रशासक के तौर पर प्रख्यात एम. एन. बुच की राय में मंत्री का काम नीति निर्धारण के बाद उसके क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी लेना है । वास्तव में मंत्रियों को सिर्फ़ यही पाठ पढाने की ज़रुरत है । नेतृत्व की कला मंत्री बखूबी जानते हैं । ये सभी राजनीति की रेलमपेल में टिकट लेने से लेकर चुनाव जीतने तक हर दांवपेंच आज़मा चुके हैं । केबिनेट में दाखिला पाना भी बच्चों का खेल नहीं ....। गलाकाट स्पर्धा में अव्वल नंबर हासिल करने के बाद ही मंत्री की कुर्सी मिल पाती है । उठापटक के बावजूद सियासी मैदान में "अंगद की तरह" जमे रहना हंसी मज़ाक नहीं है ।

राजनीति की खाक छानने वाले "गुरु घंटालों" को नई पीढी के सुविधाभोगी "कॉर्पोरेट गुरु" भला क्या पाठ पढा सकेंगे ?ये कहते "कागद की लेखी" , मंत्री कहता "आंखन की देखी "। नौंवी मर्तबा विधायक बने बाबूलाल गौर को भला ’कल का आया’ क्या नेतृत्व- कला सिखाएगा ?कई तरह की पंचायतों के ज़रिये अपनी "टारगेट-ऑडियंस" की पहचान कर अपनी सफ़ल मार्केटिंग करने वाले मुख्यमंत्री को एडवर्टाइज़िंग और मार्केटिंग की बारीकियां सीखने की क्या ज़रुरत है ।

यह पाठशाला सरकार की छबि गढने और जनता को भुलावे में रखने की कोशिश से इतर कुछ नहीं है । धोती - कुर्ते से सूट -टाई के सफ़र तक ही बात ठहरे तो कोई चिंता नहीं ,लेकिन पहनावे के साथ लोकतंत्र पर कॉर्पोरेट जगत का रंग चढने लगे तो ये चौकन्ना होने का सबब है ।

वैसे तो इस वक्त हर जगह घालमेल मचा है । अभिनेता सियासी गलियारों में चहल कदमी कर रहे हैं । नेता रुपहले पर्दे पर धूम मचाने को उतावले हैं । उद्योगपति प्रधानमंत्री पद का दावेदार तैयार करने में मसरुफ़ हैं । जिन्हें सीखचों के पीछे होना चाहिए वो कानून बनाने में भागीदारी निभा रहे हैं । अदालतों को न्याय देने की बजाय नालियों, सडकों और छोटे - मोटे मुद्दों पर नोटिस जारी करने से फ़ुर्सत नहीं है ।
कुल मिला कर हर चीज़ वहां ही नहीं है ,जहां उसे होना चाहिए । मुल्क की हालिया परिस्थितियों के सामने आम आदमी की बेबसी को दुष्यंत कुमार के शब्दों की चुभन ही बयान कर सकती है ।
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ,
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दआ

गिड़गिडाने का यहाँ कोई असर होता नहीं
पेट भर कर गालियाँ दो आह भर कर बद-दुआ

इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं हैं कोयले देंगे धुआँ
वैसे आदर्शवाद का सामान्य रूप से राजनीतिक क्षेत्र में क्षरण हुआ है तो भारतीय जनता पार्टी में भी वो क्षरण दिखाई पड़ता है । भाजपा को एक जनआधारित काडर संगठन बनना था मगर ये हुआ नहीं । सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि राजनीतिक दल मूल्यों और मुद्दों से भटक कर केवल सत्ता के निरंकुश खेल के हिस्से बन गए हैं । भाजपा भी इसकी अपवाद नहीं है । आज की तारीख़ में सभी पार्टियों में 19-20 का फ़र्क रह गया है । झंडे - बैनरों के फ़र्क के अलावा कांग्रेस - भाजपा में अंतर करना मुश्किल हो चला है । इस पार्टी में नेतृत्व और समर्थक के चिंतन और व्यवहार के स्तर पर बहुत अंतर आ चुका है ।

भाजपा की आज तक की यात्रा में हर मोड़ पर उसके फ़ैसलों को देखें तो उसमें एक ऐसा सूत्र है जो उसके मूल रोग को प्रगट करता है. वह है- तदर्थ या तात्कालिकता की राजनीति । इसी से भाजपा संचालित होती रही है । चाहे विश्वनाथ प्रताप सिंह के बोफोर्स मुद्दे का आंदोलन हो या अयोध्या का मसला या राजग के शासन का कार्यकाल या आजकल की घटनाएं हों उनमें भाजपा तात्कालिकता के चलते लोक लुभावन मुद्दों के पीछे भागने की राजनीति करती रही है ।

इसका नतीजा यह है कि सांप के केंचुली बदलने की तरह ही भाजपा ने विचारधारा को उतार फ़ेंकने में कभी गुरेज़ नहीं किया । गठबंधन के राजनीतिक धर्म का हवाला देकर सिद्धांतों से समझौता किया । जिससे भाजपा के विचारवान समझे जाने वाले नेताओं की कलई खुल गई और वैचारिक साख नष्ट हो गई । देखना दिलचस्प होगा कि मंदी के दौर में घोटालों और घपलों का कॉर्पोरेट कल्चर प्रदेश में क्या गुल खिलाता है........?

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

’राम राज्य’ की आस में शिव को सौंपा ताज

शिवराजसिंह चौहान की ताजपोशी के साथ बीजेपी सरकार की नई पारी की शुरुआत हो गई है । भोपाल के जम्बूरी मैदान पर उमडे अथाह जनसैलाब ने भाजपा को स्पष्ट संकेत दे दिये हैं कि छप्पर फ़ाड कर वोट देने के बाद जनता सरकार से जमकर काम लेने के लिए कमर कस चुकी है ।

प्रदेश की जनता ने जिस निष्ठा और विश्वास के साथ शिवराजसिंह चौहान पर भरोसा जताया है , उसकी कसौटी पर खरा उतरने के लिए मुख्यमंत्री को सूबे की कमान संभालते ही काम में जुट होगा । भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को दरकिनार कर राज्य की बागडोर भाजपा को सौंपने के पीछे सिर्फ़ एक ही कारण नज़र आता है कि मतदाताओं को शिवराज की कोशिशों में ईमानदारी दिखाई दी । लोगों ने ना पार्टी और ना ही स्थानीय नेता को चुना , बल्कि उन्होंने तो शिवराज के विकास के नारे पर अपने भरोसे की मोहर लगाई है ।

इस चुनाव में मतदाता ने स्पष्ट कर दिया है कि ना तो उसे बीजेपी से कोई खास लगाव है और ना ही कांग्रेस से कोई बैर । उसे मतलब है सिर्फ़ काम से । अच्छा काम करने की बात और विकास का वायदा तो लगभग सभी पार्टियों ने किया लेकिन मतदाताओं ने वायदा करने वालों की विश्वसनीयता को जांचा - परखा । यही वजह रही कि एक दूसरे को नीचा दिखाने में मशगूल कांग्रेस नेताओं के प्रति जनता ने बेरुखी अख्तियार कर ली । लोगों को लगा कि जब तक कांग्रेस अपना घर व्यवस्थित नहीं कर लेती , उसे प्रदेश का ज़िम्मा सौंपना ठीक नहीं होगा ।

दूसरी अहम बात रही शिवराज की विनम्र और ज़मीन से जुडे व्यक्ति की छबि । उन्होंने अपनी कमियाँ स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई । शायद इसीलिए तमाम खामियों के बावजूद शिवराज का जननायक के रुप में ’कायान्तरण” संभव हो सका । लेकिन अभी यह सफ़र का महज़ आगाज़ है । आगे का रास्ता काफ़ी कंटीला और दुर्गम है और यहीं से शुरु होगा जननायक की असली परीक्षा का दौर ...?

मध्यप्रदेश चुनावों की कुछ विशिष्टताओं पर विचार ज़रुरी है । हालांकि भाजपा के कई धडॆ इसे मानने को तैयार नहीं लेकिन हकीकतन आम जनता पर ’शिवराज फ़ेक्टर” हद दर्ज़े तक हावी रहा । गुजरात का ’मोदी माडल’ अपनी जगह है , मगर समाज के सभी वर्गों तक पहुंचने के लिए वायदों की बरसात के ’ शिवराज फ़ार्मूला’ का कामयाब होना आगामी चुनावों की रणनीति पर सभी दलों को फ़िर से काम करने के लिए बाध्य करेगा । इस माडल की खामियां और खूबियां तो अगले पांच साल ही बता सकेंगे , लेकिन फ़िलहाल यह माडल मोदी माडल की तुलना में ज़्यादा कारगर साबित हुआ है ।

जनता ने ज़्यादातर शिवराज को वोट दिया है फ़िर चाहे उम्मीदवार कोई भी रहा हो । अममून देखा गया है कि लोकप्रियता का बढता ग्राफ़ संकट का स्रोत भी बन जाता है । जनता जहाँ असीमित आशाएँ- अपेक्षाएँ पाल लेती है , वहीं पार्टी के भीतर भी ईर्ष्या और द्वेष के नाग फ़न फ़ैलाने लगते हैं । ऎसे में उन्हें खुद के बनाए माडल से भी सावधान और चौक्कना रहना होगा ।

शिवराज सरकार के सामने कडी चुनौती होगी चुनावी घोषणा पत्र में किए गये वायदों को पूरा करने की । बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र ’जन संकल्प पत्र’ में जो वायदे किए हैं यदि वे सारे के सारे आने वाले पाँच साल में पूरे कर दिए जाते हैं तो मध्यप्रदेश हकीकत में स्वर्ग बन जाएगा ।

पिछले कार्यकाल में शिवराज ने राजधानी में किस्म - किस्म की महापंचायतें आयोजित कर ज़बानी जमा खर्च की तमाम रेवडियाँ बाँटी । प्रदेश का एक बडा हिस्सा उन घोषणाओं को लेकर तरह तरह के सपने बुन कर बैठा है । वायदों को हकीकत में बदलने के लिए सरकार को आर्थिक मोर्चे पर विशेष कोशिशें करना होंगी । योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए आय के नए स्रोत तलाशने के साथ ही वित्तीय स्थिति में मज़बूती के लिए मितव्ययिता अपनाना होगी । लेकिन सूबे के मुखिया के ’राजतिलक” पर दिल खॊलकर किए गए खर्च को देखते हुए फ़िलहाल वित्तीय अनुशासन की बात कहना बेमानी लगता है ।

बहरहाल शिवराज एकछत्र नेता के रुप में उभरे हैं । उन्हें सकारात्मक समर्थन मिला है ,लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या वे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर सकारात्मक राजनीति और रचनात्मक सुशासन का माडल तैयार कर सकेंगे.....?

झूठे सिक्कों में भी उठा देते हैं अकसर सच्चा माल
शक्लें देख के सौदा करना काम है इन बंजारों का ।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

सियासी मैदान में ज़मीन तलाशती औरतें


आधी आबादी की भागीदारी में इज़ाफ़े के दावों - वादों के बीच सच्चाई मुंह बाये खडी है । हाशिए पर ढकेल दिया गया महिला वर्ग अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए आज भी राजनीतिक ज़मीन तलाश रहा है ।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढाने को लेकर लंबे चौडे भाषण दिये जाते हैं । सियासत में महिलाओं की नुमाइंदगी बढाने को लेकर गंभीर विचार विमर्श के दौर भी खूब चलते हैं । इस मसले पर मंचों से चिंता ज़ाहिर कर वाहवाही बटोरने वाले नेताओं की भी कोई कमी नहीं । लेकिन चुनावी मौसम में टिकिट बांटने के विभिन्न दलों के आंकडों पर नज़र डालें , तो महिलाओं को राजनीति में तवज्जोह मिलना दूर की कौडी लगता है । किसी भी राजनीतिक दल ने टिकट बाँटने में महिलाओं को प्राथमिकता सूची में नहीं रखा है ।

दो प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा हमेशा से महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण का समर्थन करते आए हैं लेकिन उम्मीदवारों की सूची में उनकी यह इच्छा ज़ाहिर नहीं होती ।
राजनीति में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण देने की ज़ोरदार वकालत करने वाले राजनीतिक दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के मध्यप्रदेश में २७ नवंबर को होने वाले चुनाव के टिकट वितरण में इसे भूल गए ।

मध्यप्रदेश में हुए टिकिट वितरण पर निगाह डालें , तो यही तस्वीर सामने आती है कि बीजेपी, कांग्रेस ,बसपा से लेकर प्रांतीय दलों की कसौटी पर भी महिलाएं खरी नहीं उतर सकी हैं ।किसी भी दल ने १३ फ़ीसदी से ज़्यादा महिला उम्मीदवारों में भरोसा नहीं जताया है । यह हालत तब है जब तीन प्रमुख दलों की अगुवाई महिलाएं कर रही हैं ।

भारतीय जनता पार्टी ने महिला प्रत्याशियों को मौका देने में कंजूसी बरती है । पार्टी ने १० फ़ीसदी यानी २३ प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है , जबकि प्रदेश संगठन का दावा था कि ३३ प्रतिशत टिकिट नहीं दे पाने की हालत में कम से कम हर ज़िले में एक सीट महिलाओं को दी जाएगी । लेकिन आंकडे बीजेपी के दावे को खोखला करार देते हैं ।

कांग्रेस ने इस मामले में कुछ दरियादिली दिखाई है ,मगर यहां भी गिनती २९ पर आकर खत्म हो जाती है । कुछ कद्दावर नेताओं के विरोध के बावजूद पार्टी ने १२.६० प्रतिशत महिला नेताओं पर जीत का दांव खेला है ।

मायावती की अगुवाई वाली बहुजन समाज पार्टी की महिलाओं के प्रति बेरुखी साफ़ दिखती है । २३० सीटों में से महज़ १३ यानी ५,२२ फ़ीसदी को ही बसपा ने अपना नुमाइंदा बनाया है । हालांकि सोशल इंजीनियरिंग के नए फ़ार्मूले के साथ राजनीति का रुख बदलने में जुटी मायावती से महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढाने को लेकर काफ़ी उम्मीदें थीं ।

उमा भारती की भारतीय जनशक्ति में भी पुरुषों का ही बोलबाला है । तंगदिली का आलम ये है कि २१६ सीटों में से १८ पर ही महिला उम्मीदवारों को मौ्का दिया गया है । समाजवादी पार्टी का हाल तो और भी बुरा है । सपा ने २२५ प्रत्याशी खडॆ किए हैं , जिनमें सिर्फ़ १६ महिलाएं हैं । इस तरह कुल तीन हज़ार एक सौ उन्यासी उम्मीदवारों में से केवल दो सौ बीस महिलाएं हैं ।

हालांकि पिछले चुनाव में १९ महिलाओं को विधानसभा में दाखिल होने का अवसर मिला था । इनमें से १५ बीजेपी की नुमाइंदगी कर रही थीं । ताज्जुब की बात यह थी कि ८ को मुख्यमंत्री और मंत्री पद से नवाज़ा गया । ये अलग बात है कि चार महिलाओं को अलग - अलग कारणों से मुख्यमंत्री और मंत्री पद गंवाना पडा । ये हैं - उमा भारती , अर्चना चिटनीस , अलका जैन और विधायक से सांसद बनीं यशोधरा राजे ।

दरअसल राजनीतिक दलों को लगता है कि महिला उम्मीदवारों के जीतने की संभावना कम होती है , लेकिन एक सर्वेक्षण के बाद सेंटर फॉर सोशल रिसर्च ने कहा है कि यह धारणा सही नहीं है. । सेंटर का कहना है कि १९७२ के बाद के आंकड़े बताते हैं कि महिला उम्मीदवारों के जीतने का औसत पुरुषों की तुलना में बहुत अच्छा रहा है ।

इस मुद्दे पर राजनीतिक दल सिर्फ़ ज़बानी जमा खर्च करते हैं । हकीकतन महिलाओं के साथ सत्ता में भागीदारी की उनकी कोई इच्छा नहीं है । महिलाओं की भागीदारी भले ही सीमित संख्या में बढ़ रही है लेकिन जो महिलाएँ राजनीति में आ रही हैं , उन्होंने महिला राजनीतिज्ञों के प्रति लोगों की राय बदलने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । गौर तलब है कि अब जो महिलाएँ चुनाव लड़ रही हैं उनमें से कम ही किसी राजनीतिज्ञ की पत्नी, बेटी या बहू हैं ।

भारत में आम तौर पर राजनीति शुरू से पुरुषों का क्षेत्र माना गया है और आज भी पुरुषों का वर्चस्व कायम है शायद कहीं न कहीं पुरुष राजनेता नहीं चाहते कि वो अपनी जगह छोड़ दें , लेकिन धीरे - धीरे ही सही वक्त करवट ले रहा है ।

व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि महिलाओं को आगे बढने के लिए किसी सहारे की ज़रुरत नहीं । महिलाओं में आगे बढने का जज़्बा भी है और हौसला भी । योग्यता बढाने के लिए अनुकूल माहौल की दरकार है । पर्याप्त मौके मिलते ही इन परवाज़ों को पंख मिल जाएंगे ऊंचे आसमान में लंबी उडान भरने के लिए ....। औरत किसी के रहमोकरम की मोहताज कतई नहीं ...। जिस भी दिन औरत ने अपने हिस्से का ज़मीन और आसमान हासिल करने का ठान लिया उस दिन राजनीति का नज़ारा कुछ और ही होगा ।

कद्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं ,बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू ह्कीकत भी है , दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे ।

रविवार, 9 नवंबर 2008

करोडपति बीडी मजदूर का राजनीतिक सफ़र

जनता की सेवकायी के लिए प्रदेश के धन कुबेर चुनावी मैदान में उतरे हैं । नामांकन दाखिल करते वक्त संपत्ति का ब्यौरा देने की मजबूरी ने जनसेवकों की माली हालत की जो तस्वीर पेश की है वह आंखें चुंधियाने के लिए काफ़ी है । ज़्यादातर नेता करोडपति हैं । कुछ तो ऎसे हैं , जो महज़ ५ - ७ साल पहले रोडपति थे अब करोडपति हैं । बचपन से सुनते आए हैं "सेवा करो , तो मेवा मिलेगा ।” शायद जनता की सेवकाई के वरदान स्वरुप ही नेताओं की माली हालत में रातों रात चमत्कारिक बदलाव आ जाता है ।

संपत्ति के खुलासे ने लोगों को चौंकाया है । कई नौजवान मुनाफ़े के इस व्यवसाय की ओर खिंचे चले आ रहे हैं । जनसेवा से मुनाफ़े की एक बानगी -
मुरियाखेडी में तेंदूपत्ता इकट्ठा करने वाला एक मजदूर महज़ दो साल में इतना पैसा कमा लेता है कि वह भोपाल में करोडों की जायदाद का मालिक बन जाता है । राजधानी की नरेला विधानसभा सीट से बीजेपी के उम्मीदवार की चुनाव आयोग को दी गई संपत्ति की जानकारी और उनके राजनीतिक सफ़र को मिलाकर देखने पर कुछ ऎसी ही सच्चाई नज़र आती है ।

अखबारों में छपे हर्फ़ों पर यकीन करें तो नामांकन पत्र के साथ अपनी सम्पत्ति की जानकारी देते हुए ’ गरीब बीडी मजदूर’ विश्वास सारंग ने जो शपथ-पत्र प्रस्तुत किया उसके अनुसार वे करोड़ों के कारोबार के स्वामी हैं । भोपाल, सीहोर व रायसेन में लाखों की जमीन है । भोपाल की निशात कालोनी में लगभग दो करोड़ साठ लाख की कीमत के आवासीय व व्यावसायिक भवन , अरण्यावली गृह निर्माण सहकारी समिति में ३२ लाख रुपए की जमीन, तीन गाँवों में सवा छह लाख की कृषि भूमि, मण्डीदीप स्थित विशाल पैकवेल इण्डस्ट्रीज में भागीदारी, कामदार काम्पलेक्स, दिल्ली के गोयला खुर्द में जमीन एग्रीमण्ट भी श्री सारंग के ही नाम पर है। नामांकन पत्र के साथ इन्होंने भोपाल नगरीय क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीबध्द होने के प्रमाण भी पेश किए हैं ।

अब मामले का दूसरा पहलू - विश्‍‍वास सारंग इन दिनों मध्य्प्रदेश लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष हैं । इस पद तक पहुंचने की पहली शर्त है - किसी प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति का नियमित सदस्य होना । इस समिति का सदस्य बनने के लिए दो शर्तें हैं । पहली - वह व्यक्ति उस सहकारी समिति के भौगोलिक क्षेत्राधिकार का स्थायी और नियमित निवासी हो । दूसरी - उस व्यक्ति के जीविकोपार्जन का आधार लघु वनोपज संग्रहण हो ।

श्री सारंग ने अध्यक्ष पद हासिल करने के लिए क्या - क्या पापड नहीं बेले । ‘प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति, मुरियाखेड़ी’ के भौगोलिक क्षेत्राधिकार वाले ग्राम और फड़ साँकल के निवासी श्री सारंग ने वन - वन भटक कर तेंदूपत्ता इकट्ठा किया । उन्होंने वर्ष २००७ में तेंदू पत्ता की ६०० और वर्ष २००८ में १२०५ गड्डियाँ संग्रहित कर २४ हज़ार तथा ४८ हज़ार २०० रुपये कमाए ।

लगभग सभी नेताओं की कहानी कमोबेश इसी तरह की है । सामान्य परिवारों के इन होनहार खद्दरधारी नेताओं का राजनीतिक सफ़र ज़्यादा लंबा भी नहीं है और ना ही किसी बडे पद पर कभी आसीन रहे । ऎसे में सवाल उठता है कि आखिर इस छ्प्पर फ़ाड ऎश्वर्य का राज़ क्या है ? राजनीति के सिवाय देश का कोई भी हुनर या पेशा इस रफ़्तार से दौलत कमाने की गारंटी नहीं दे सकता ।

देश के मतदाताओं अपने नेताओं की दिन दोगुनी रात चौगुनी बढती आर्थिक हैसियत का राज़ जानने के लिए ही सही , अब तो नींद से जागो । देखो किसे वोट दे रहे हो ....। तुम्हारा वोट किन - किन नाकाराओं को नोट गिनने और तिजोरियां भरने की चाबी थमा रहा है । मेरी राय में यदि कोई भी प्रत्याशी चुनाव के लायक ना हो ,तो वोट को बेकार कर दो , मगर वोट ज़रुर दो ।

लहू में खौलन , ज़बीं पर पसीना
धडकती हैं नब्ज़ें , सुलगता है सीना
गरज ऎ बगावत कि तैयार हूं मैं ।

[ यह पोस्ट माननीय विष्णु बैरागी जी के ब्लाग ’एकोsहम’ के आलेख से प्रेरित होकर लिखी गयी है । कुछ तथ्य उनकी पोस्ट ’ समाचार ना छपने का समाचार ’ से लिए गये हैं । ]

शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

नारों- वादों के शोर में मुद्दे हुए नदारद

मध्य प्रदेश में चुनाव सर पर हैं और प्रमुख पार्टियों में टिकट को लेकर मचे घमासान का नज़ारा जनता खूब चाव से देख रही है । हफ़्ते भर पहले तक उमा के तेवरों और कांग्रेस से कडी टक्कर मिलने की आशंका ने बीजेपी की बैचेनी बढा दी थी । मगर कांग्रेस ने चुके हुए नेताओं को टिकट देकर सत्तारुढ दल की मुश्किलें आसान कर दी हैं । रही बात उमा भारती की , तो वे अपनी दुश्मन खुद हैं । ह्फ़्ते भर पहले तक साध्वी मामले में खुलकर सामने आने के कारण उमा लीड लेती लग रही थीं ,लेकिन छिंदवाडा में पार्टी पदाधिकारी की सरेआम पिटाई ने किए कराए पर पानी फ़ेर दिया । उमा ने भगवा चोला भले ही धारण कर लिया हो ,मगर अब तक अपने स्वभाव को भी ठीक तरह से नहीं साध सकीं हैं।

मतदान को लगभग २० दिन बचे हैं । चुनावी माहौल ज़ोर पकडने लगा है । लेकिन इस बार के चुनाव कुछ अलग हैं । मैंने पहले भी चुनाव देखे हैं , रिर्पोटिंग भी की है । प्रदेश में पहली बार शायद ऎसा मौका आया है ,जब पार्टियों के पास जनता के बीच जाने के लिए कोई मुद्दा नहीं । प्रजातंत्र में इससे बुरा दौर और क्या हो सकता है ? मुद्दों का अकाल यानी लोकतंत्र के लिए संकट का काल । जनता रोज़मर्रा की दिक्कतों से बेज़ार है लेकिन नेता बेखबर । मुद्दाविहीन राजनीति नेताओं क्के लिए फ़ायदे का सौदा हो सकती है ,लेकिन लोकतंत्र के हित में ये संकेत शुभ नहीं ।

झंडे ,बैनर ,पोस्टर सज गये हैं । सडकों पर वाहन रैलियों और नारों का शोर है । मगर पिछले पांच सालों के कामकाज का लेखा जोखा मांगने की ना तो किसी को सुध है और ना ही हिसाब देने वालों को कोई परवाह । राजनीतिक दीवालिएपन का आलम ये है कि कांग्रेस और बीजेपी अब तक चुनावी घोषणा पत्र भी जनता के सामने नहीं रख सके हैं ।

मुझे लगता है कि प्रदेश की अवाम भी भ्रम की स्थिति में है । काग्रेसी उम्मीदवारों से किसी तरह की उम्मीद करना बेमानी है और बीजेपी की ओर से दागी मंत्रियों की लंबी फ़ेहरिस्त दोबारा चुनावी दंगल में भेजी गई है । टिकटों की खरीद फ़रोख्त की खबरें ज़ोरों पर रहीं । हर कोई विधायक पद का प्रबल दावेदार है । कोई धन के बूते , कोई धर्म के नाम पर । अब तो राजनीति कइयों के लिए खानदानी पेशा बन गया है । जातिगत गणित भी खूब काम कर रहा है । हमें चुनना है खराब में से कम खराब । यानी इधर नागनाथ , तो उधर सांपनाथ ।

मेरा नज़र में इस चुनाव में मुद्दों के साथ - साथ विकल्प का भी अकाल है ।, छोटे दलों के प्रत्याशी भी कुछ उम्मीद नहीं जगाते । टिकट ना मिलने से नाराज़ कई नेताओं ने बागी तेवर अपनाकर इन द्लों का रुख कर लिया है । ऎसे में प्रदेश के विकास की बात कौन करे ? राजनीति में धन बल , बाहुबल और जात -पांत के समीकरणों का तोड ढूंढने के की शुरुआत कब होगी और कैसे ? यह बुनियादी सवाल हर पांच साल बाद आ खडा होता है ...... जवाब की तलाश में....... ?

मुंह खुला है उधर खज़ाने का , मुड रहा है वरक ज़माने का
और इधर कहत दाने - दाने का , कस्द [निश्चय] फ़िर भी पहाड ढहाने का ।

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2008

मध्यप्रदेश के चुनावी दंगल में ’उमा फ़ेक्टर’ की दह्शत

उमा भारती ने चुनावी समर में हुंकार भर कर बीजेपी की नींद उडा दी है । साध्वी प्रज्ञा सिंह को भारतीय जन शक्ति पार्टी से चुनाव लडने का न्यौता देकर उन्होंने बीजेपी की जान सांसत में डाल दी है । उमा ने साध्वी के ज़रिए भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है और उसे उसी के हिन्दू कार्ड से मात देने की पूरी बिसात बिछा दी है । प्रज्ञा सिंह के मामले से कुछ दिन पहले तक पल्ला झाडती नज़र आ रही बीजेपी को मजबूरी में ही सही इस मसले पर सामने आना पडा है ।

उमा भारती के राजनीतिक भविष्य पर विराम की संभावनाएं तलाशते भाजपाई नेता दोबारा गद्दीनशीं होने का रास्ता सीधा - सपाट मान बैठे थे । मध्य प्रदेश कांग्रेस की आपसी सर फ़ुटौव्वल के कारण उनका ये खवाब हकीकत में बदलने की गुंजाइश भी साफ़ - साफ़ नज़र आ रही थी ,लेकिन हाशिए पर जा चुकी उमा ने प्रहलाद पटेल के साथ सुलह करके बीजेपी की राह में कांटे बिछा दिए हैं । बिखराव की राजनीति के सहारे आगे बढना नामुमकिन है , इस हकीकत से वाकिफ़ होने के बाद दोनों नेताओं ने समय रहते गिले - शिकवे भुलाकर ऎक साथ आने में ही भलाई समझी । दोनों का मकसद एक है और मंज़िल भी एक ही ।

भाजपा को कांग्रेस से कडी चुनौती तो मिलना तय है ,लेकिन चुनाव में उमा फ़ेक्टर को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता । उमा भी बीजेपी को हर हाल में सत्ता से बाहर रखने की जुगत भिडाने में लगी हैं । छोटे - छोटे दल भी सत्तारुढ पार्टी का सिरदर्द बन गये हैं । इस मर्तबा प्रदेश के चुनावी जंग में प्रमुख दलों के अलावा छोटी पार्टियां भी निर्णायक भूमिका निबाहेंगी ।

मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश में अपने पैर मज़बूती से जमा लिए हैं । इसके अलावा राष्ट्रीय जनता दल , गोंडवाना गणतंत्र पार्टी , लोक जनशक्ति पार्टी और वामपंथी दलों ने भी अपने स्तर पर बीजेपी और कांग्रेस को घेरने की तैयारी कर ली है । मुखतलिफ़ राजनीतिक विचारधारा के बावजूद सीटों के तालमेल पर उमा की प्रांतीय दलों से पटरी बैठ सकती है । ऎसे में मायावती का साथ यदि उमा को मिल गया , तो प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण बनेंगे । सत्ता की आस लगाए बैठी कांग्रेस तथा बीजेपी को नाकों चने चबाना होंगे ।

लगता है उमा का चुनावी मोटो है - हम तो डूबेंगे सनम ,तुम को भी ले डूबेंगे .......।