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शनिवार, 12 नवंबर 2011

मध्यप्रदेश में मलेरिया का कहर और सियासत

मध्य प्रदेश की सेहत इन दिनों काफ़ी खराब है । सीधी, मंदसौर और नीमच ज़िले में मलेरिया से मौतों का आँकड़ा बढ़ने के साथ ही सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। मलेरिया से करीब पचास लोगों की मौत के कारण सीधी जिला इन दिनों राजनीति के केंद्र में है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने इस मुद्दे को लेकर सीधी कलेक्ट्रेट के बाहर धरना दिया। इसके बाद जाकर सरकार के कानों पर जूँ रेंगी। मगर आये दिन उड़न खटोले में सवार होकर देश भर की सैर करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चौंकाने वाली टिप्पणी ने सबको सन्न कर दिया। जिस वक्त वे सचिन के सौवें शतक का शुभकामना संदेश प्रसारित कर रहे थे, तब वे प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों से बेखबर थे। विपक्ष के हर आरोप को हवा में उड़ाने वाले शिवराज की नींद तब टूटी जब ये मामला अखबारों की सुर्खियों में आया। अधिकारियों की बैठक में वे खूब बिफ़रे कि उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं दी गई है। प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की फ़ेहरिस्त में नाम शामिल कराने की जोड़तोड़ में लगे मुख्यमंत्रीजी से लाख टके का सवाल ये है कि जब उन्हें अपने प्रदेश की समस्याओं की कोई जानकारी ही नहीं रहती है, तो उनके सूबे का मुखिया बने रहने का औचित्य ही क्या है ?


आदिवासी बहुल सीधी जिले के कुछ गाँवों में मलेरिया कहर बनकर टूटा है। जिले में मलेरिया से हुई मौतों का आँकड़ा लगातार बढ़ रहा है। अब तक पचास मौतें हो चुकी हैं। तीन गाँवों में 30 सितंबर से एक नवंबर तक 35 लोगों की मौत हुई। नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि पैंतीस मृतकों में सत्रह बेटियाँ भी हैं, जिनको बचाने के लिए सरकार अभियान छेड़े हुए है। इन मौतों ने बेटी बचाओ अभियान के साथ-साथ स्वास्थ्य इंतजामों की कलई खोलकर रख दी है। हालाँकि यह बात सामने आने के बाद प्रशासन पूरी तरह से मामले को दबाने में लगा रहा।

नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि जिला मुख्यालय से मात्र 18 किलोमीटर दूर बसे गाँवों में मचे मौत के ताँडव से पूरा प्रशासन बेखबर बना रहा । उन्होंने विकास खंड के लगभग आधा दर्जन गाँवों का दौरा किया, तब हकीकत सामने आयी। जनजाति बहुल गाँव पडरी, चौफाल और सतनरा के लगभग हर घर में कम से कम एक व्यक्ति मलेरिया पीड़ित है। चूंकि सीधी अजय सिंह का गृह जिला है, लिहाजा वे प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठे और राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। मुख्यमंत्री को फोन करने के बाद प्रशासन हरकत में आया। उनके मुताबिक 47 मौतें होने के बाद भी कलेक्टर वहाँ नहीं पहुँचे थे। कमिश्नर को प्रकरण की जानकारी भी नहीं थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सीधी को मलेरिया प्रभावित जिला मानते हुए विशेष किट दिए हैं, लेकिन सरकार इनका उपयोग नहीं कर रही है।

बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का हवाला देते हुए नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को घेरे में लिया है। गौरतलब है कि चार साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीधी जिला गोद लिया था। बताते हैं कि सीधी जिले में सरकार ने डॉक्टरों के लिए 130 पद स्वीकृत किए हैं। मगर इनमें से 93 पद कई सालों से खाली हैं। अजय सिंह का आरोप है कि सीधी से लगे हुए गाँवों में जब मलेरिया प्रकोप बनकर फैल रहा है तो दूरदराज के क्षेत्रों के हालात की कल्पना की जा सकती है। ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सेवाओं के हालात समझने के लिये इतना जानना काफ़ी है कि डॉक्टर अपनी ड्यूटी पर शायद ही कभी जाते हैं। उनका कहना है कि सिमरिया के ब्लॉक मेडिकल अधिकारी अस्पताल नहीं जाते हैं। इसी तरह ज़िले में पदस्थ प्रदेश सरकार में मंत्री जगन्नाथ सिंह के सुपुत्र डेढ़ साल से नौकरी पर नहीं गये हैं।

प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों का सिलसिला नहीं थम रहा है। सीधी के बाद अब मंदसौर, नीमच (मालवा) में मलेरिया का संक्रमण फैल गया है। मालवा में मलेरिया बुखार से दो माह के भीतर 40 लोगों की जान गई है, जबकि मलेरिया से पीड़ित 50 लोगों का इलाज किया गया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार मंदसौर जिले के धावद, बगचाच, सावंत, नावली, बड़ौदिया, नावली, सावन कोठली और कोठरी टैंक गाँव में मलेरिया से संक्रमित हैं। जिले के प्रभारी सीएमएचओ के मुताबिक इन गाँवों में बीते दो माह में 21 लोगों की जानें गई हैं। शुरुआती जाँच में मौत की वजह मलेरिया है। वहीं नीमच जिले के ग्राम कोज्या, रूपपुरिया, परिछा, माना, मनोहरपुरा, प्रेमपुरा और कनोड़ में बीमारी की गंभीर स्थिति है। सीएमएचओ जिले में 19 लोगों की मौत मलेरिया से होने की पुष्टि कर रहे हैं।

प्रदेश की जनता ने जिस भरोसे से शिवराज सिंह को सत्ता की बागडोर सौंपी थी, वही आज उसके ज़ख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। हाल ही में उन्होंने गायत्री परिवार के हरिद्वार महाकुंभ हादसे में मारे गये लोगों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता का एलान किया। जबकि सीधी में मलेरिया से हुई मौतों पर मुख्यमंत्री ने महज़ दस-दस हज़ार रुपये की खैरात बाँटकर आखिर किस पर एहसान किया? सवाल है कि मीडिया से संवेदनशील और सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता का खिताब हासिल करने को बेताब मुखिया की मुट्ठी सूबे की जनता के लिये आखिर क्यों भिंच गई? सरकार फिजूल के अभियान और उत्सवों पर जनता के करोड़ों रुपये फूंक रही है मगर लोगों की बुनियादी जरूरतों की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं है। प्रदेश के स्थापना दिवस पर करोड़ों रुपये की आतिशबाज़ी फ़ूँकने या क्रिकेटरों और अन्य खिलाड़ियों को लाखों रुपये बतौर तोहफ़ा देकर खूब वाहवाही बटोरने वाले मुख्यमंत्री के हाथ आखिर प्रदेश की जनता से जुड़े मुद्दों पर ही खाली क्यों दिखाई देते हैं?

बहरहाल मलेरिया से हुई मौतों पर बवाल मचता देख मुख्यमंत्री आनन-फ़ानन में सीधी पहुँचे और कलेक्टर का तुरंत तबादला कर दिया। लेकिन सवाल फ़िर वही। क्या कलेक्टर का तबादला करने या कुछ छोटे कर्मचारियों को निलंबित करने मात्र से हालात सुधर जाएँगे? मालवा, चंबल और विंध्य क्षेत्र में मलेरिया से हो रही मौतों के लिये क्या छोटे मोटे प्रशासनिक फ़ेरबदल काफ़ी हैं? प्रदेश में क्या अदने कर्मचारियों की बलि लेकर स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य महकमे के आला अफ़सरों को ज़िम्मेदारी से बरी किया जा सकता है ? सरकार और नौकरशाहों का पूरा ध्यान महँगे उपकरण और दवा खरीदी, तो डॉक्टरों की दिलचस्पी ड्रग ट्रायल के मुनाफ़े और प्रायवेट अस्पतालों में मोटी फ़ीस पर सेवाएँ देने में ही सिमट कर रह गई है।

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने से बेखबर सूबे के मुखिया एक के बाद एक मुश्किलों में घिरते जा रहे हैं। विधानसभा सत्र के मुहाने पर विपक्ष के हाथ एक साथ कई मुद्दे लग गये हैं। डम्पर मामले को पुनर्विचार के लिये एक बार फ़िर हाईकोर्ट में ले जाकर याचिकाकर्ता रमेश साहू ने शिवराज की दिक्कतें बढ़ा दी हैं। उधर इस मामले में उन्हें क्लीन चिट देने वाले लोकायुक्त पी.पी.नावलेकर की नियुक्ति विवादों में है और अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है । उस पर जबलपुर ज़िले के सीहोरा तहसील के झीटी वन क्षेत्र की खदानों में लौह अयस्क के अवैध उत्खनन का मामला काँग्रेस ने भोपाल न्यायालय में पेश कर दिया है। इसमें मुख्यमंत्री,तीन मंत्रियों,एक सांसद सहित कुल सत्ताइस लोगों को नामजद किया गया है। काँग्रेस ने मामले की शिकायत लोकायुक्त में भी की है। साथ ही अब अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक जगदीश प्रसाद शर्मा ने सतना ज़िले के उचेहरा, नागौद आदि वन परिक्षेत्र में चल रहे उत्खनन की रिपोर्ट में भी खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अब तक विपक्ष को मृतप्राय मानकर मनमानी पर उतारु सरकार पर काँग्रेस चौतरफ़ा हमले कर रही है। कमोबेश पिछले आठ सालों से निर्बाध गति से दौड़ रहे अश्वमेधी रथ की वल्गाएँ यकबयक थामकर काँग्रेस ने सत्ता पक्ष में खलबली मचा दी है। विपक्ष से पहली बार मिल रही करारी चुनौती और अंदर ही अंदर बढ़ते जनाक्रोश से सत्ता पक्ष कैसे निपटता है आने वाले वक्त में सबकी निगाहें इसी पर लगी रहेंगी ।

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सरकारी खज़ाने पर भारी पडता मुख्यमंत्री का उत्सवधर्म

यूँ तो हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी हैं । मौसम का मिजाज़ बदले या फ़िर जीवन से जुड़ा कोई भी पहलू हो, हम पर्व मनाने का बहाना तलाश ही लेते है। साल में जितने दिन होते हैं उससे कहीं ज़्यादा पर्व और त्योहार हैं। अब तक लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर पर्व मनाये जाते रहे हैं। मगर उत्सव धर्मी मुख्यमंत्री के शौक के चलते अब प्रदेश में बारहों महीने सरकारी त्योहार मनाने की नई परंपरा चल पड़ी है। गणपति स्थापना के साथ शुरू हुए उत्सवी माहौल में नवरात्रि आने तक राज्य सरकार ने “बेटी बचाओ अभियान” का जो रंग भरा है,वो जल्दी ही फ़ीका पडता नही दीखता। राज्य में शासन की ओर से “बेटी बचाओ अभियान” नए सिरे से शुरू किया गया है। सरकारी खज़ाने से सौ करोड़ रुपये खर्च कर लिंगानुपात में आ रहे अंतर को पाटना और बालिकाओं को प्रोत्साहन देना मुहिम का खास मकसद बताया जा रहा है।

तूफ़ानी तरीके से चलाये जा रहे इस अभियान के मकसद पर कई बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अभियान ने मीडिया, विज्ञापन और प्रिंटिंग कारोबार में नई जान फ़ूँक दी है। मध्यप्रदेश में कुछेक ज़िलों को छोड़कर शायद ही कोई इलाका ऎसा हो जहाँ लिंगानुपात के हालात इतने चिंताजनक हों। दरअसल लिंग अनुपात में असंतुलन का मुख्य कारण विलुप्त हो रही भारतीय परंपराएँ और संस्कृति है। वाहनों पर चस्पा पोस्टर, बैनर और सड़क किनारे लगे होर्डिंग बेटियाँ बचाने में कारगर साबित होते, तो शायद देश को अब तक तमाम सामाजिक बुराइयों से निजात मिल जाती । जनसंपर्क विभाग की साइट पर अभी कुछ समय पहले एक प्रेस विज्ञप्ति पर नज़र पड़ी, जिसमें बताया गया है कि सरकार ने पानी बचाओ अभियान में गोष्ठी, परिचर्चा, कार्यशाला, सेमिनार और रैली जैसे आयोजनों के ज़रिये जनजागरुकता लाने पर महज़ तीन सालों में करीब नौ सौ तेरह करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिये। पानी के मामले में प्रदेश के हालात पर अब कुछ भी कहना-सुनना बेमानी है। वैसे भी देखने में आया है कि जिस भी मुद्दे पर सरकारी तंत्र का नज़रे-करम हुआ, उसकी नियति तो स्वयं विधाता भी नहीं बदल सकते। कहते हैं,जहँ-जहँ पैर पड़े संतन के,तहँ-तहँ बँटाढ़ार।

कुछ साल पहले बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी से मोहभंग की स्थिति में इस्तीफ़ा देते वक्त पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि बीजेपी को अब टेंट-तंबू वाले चला रहे हैं। मध्यप्रदेश में यह बात शब्दशः साबित हो रही है। सरकारी आयोजनों का लाभ जनता को कितना मिल पा रहा है, यह तो जगज़ाहिर है। मगर मुख्यमंत्री की उत्सवधर्मिता से कुछ चुनिंदा व्यवसायों से जुड़े लोगों की पौ-बारह है। राजनीतिक टोटकों और शिगूफ़ेबाज़ी से जनता को लम्बे समय तक भरमाये रखने का अगर कोई खिताब हो तो देश में बेशक शिवराजसिंह चौहान इसके एकमात्र और निर्विवाद दावेदार साबित होंगे।

उत्सवधर्मिता निभाने में सूबे के शाहखर्च मुखिया किसी से कमतर नहीं हैं। सत्ता सम्हालने के बाद से ही प्रदेश में जश्न का कोई ना कोई बहाना जुट ही जाता है। पहले महापंचायतों का दौर चला, इसके बाद इन्वेस्टर्स मीट के बहाने जश्न मनाये गये। यात्राओं और मंत्रियों को कॉर्पोरेट कल्चर से वाकिफ़ कराने के नाम पर भी जनता के पैसे में खूब आग लगाई गई। फ़िर बारी आई मुख्यमंत्री निवास में करवा चौथ, होली, दीवाली, रक्षाबंधन, ईद, रोज़ा इफ़्तार, क्रिसमस त्योहार मनाने की। जनता के खर्च पर धार्मिक आयोजनों के ज़रिये पुण्य लाभ अपने खाते में डालने का सिलसिला भी खूब चला। “आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश” जैसी शिगूफ़ेबाज़ी से भरपायी सरकार ने “स्वर्णिम मध्यप्रदेश“ का नारा ज़ोर शोर से बुलंद किया। पिछले दो सालों में प्रदेश स्वर्णिम बन सका या नहीं इसकी गवाही सड़कों के गड्ढ़ों, बिजली की किल्लत, बढ़ते अपराधों और किसानो की खुदकुशी के आँकड़ों से बेहतर भला कौन दे सकेगा ? मगर इतना तो तय है कि इस राजनीतिक स्टंट से नेताओं, ठेकेदारों, माफ़ियाओं, दलालों, उद्योगपतियों और मीडिया से जुड़े चंद लोगों की तिजोरियाँ सोने की सिल्लियों से ज़रुर “फ़ुल“ हो गईं हैं।

इसी तरह सत्ता पर येनकेन प्रकारेण पाँच साल काबिज़ रहने में कामयाब रहे शिवराजसिंह चौहान और जेब कटी जनता की। मुख्यमंत्री पद पर पाँच साल पूरे होने की खुशी में पिछले साल करीब चार करोड़ रुपये खर्च कर गौरव दिवस समारोह मनाया गया। संगठन के मुखिया प्रभात झा की कुर्सी प्राप्ति का सालाना जश्न भी मुख्यमंत्री निवास में धूमधाम से मना।

प्रदेश में एक के बाद एक आयोजनों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। मालूम होता है मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस समारोह की रंगीनियाँ जल्दी ही बेटी बचाओ अभियान को पीछे छोड़ देंगी। अब तक रावण वध से लेकर दीपावली की शुभकामना संदेशों तक हर मौके पर बेटी बचाने का संदेश प्रसारित करने में व्यस्त मुख्यमंत्री जी जल्दी ही मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के लिये जनता का आह्वान करते नज़र आयेंगे। उनके इस बर्ताव को देखकर बस इतना ही कहना मुनासिब होगा-आधी छोड़ पूरी को ध्यावै आधी मिले ना पूरी पावै।

बहरहाल खबर है कि भोपाल में होने वाले मुख्य समारोह में बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की नृत्य नाटिका और आशा भोंसले के नग़्मे जश्न में चार चाँद लायेंगे। वहीं लेज़र शो आयोजन का खास आकर्षण होगा। हर जश्न में लेज़र शो की प्रस्तुति का नया ट्रेंड भी शोध का विषय है। आजकल हर सरकारी समारोह में लेज़र शो और आतिशबाज़ी का भव्य प्रदर्शन सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर इन दोनों कारोबारों के साथ ही इवेंट मैनेजमेंट में किन बड़े भाजपा नेताओं का पैसा लगा है ? सवाल लाज़मी है कि कर्मचारियों को वेतन-भत्ते या जनता को करों में रियायत देकर महँगाई पर अँकुश लगाने के मुद्दे पर हाथ खींचने वाली राज्य सरकार आखिर इन जश्नों पर पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ?

फ़िज़ूलखर्ची का आलम ये है कि समारोह को भव्य बनाने के लिये चार लाख निमंत्रण पत्र छपवाए गये हैं,जबकि आयोजन स्थल लाल परेड ग्राउंड में एक लाख लोग भी बमुश्किल समा पायेंगे। माले मुफ़्त दिले बेरहम की तर्ज़ पर सरकार ने चार लाख कार्डों की छपाई पर चालीस लाख रुपये खर्च किये हैं । अमूमन सरकारी आयोजनों में लोगों की दिलचस्पी कम ही होती है। शाहखर्ची को जस्टिफ़ाय करने के लिये लोगों को घर-घर जाकर निहोरे खा-खा कर समारोह में आमंत्रित किया जा रहा है। बदहाल और फ़टेहाल प्रदेश की छप्पनवीं सालगिरह पर संस्कृति विभाग तीन करोड़ रुपए खर्च करने का इरादा रखता है। इनमें से दो करोड़ रुपये की होली भोपाल के मुख्य समारोह में जलाई जायेगी। संस्कृति विभाग में एक तृतीय श्रेणी की हैसियत रखने वाले व्यक्ति को तमाम नियम कायदों के विपरीत जाकर संचालक पद से नवाज़ा गया है।  अपनी अदभुत जुगाड़ क्षमता और संघ को साधने में महारत के चलते एक गैर आईएएस व्यक्ति एक साथ संस्कृति संचालक,वन्या प्रकाशन और स्वराज संस्थान प्रमुख जैसे अहम पदों पर काबिज़ है । सरकारी खज़ाने में सेंध लगाने के आये दिन नायाब नुस्खे ढ़ूँढ़ लाने में माहिर यह अफ़सर सरकार और संघ की आँखों का तारा बना हुआ है।

पूरे प्रदेश में वन, खनन, शिक्षा, ज़मीन की बँदरबाँट और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऎतिहासिक धरोहरों की लूटखसोट मची है। ऎसे हालात में चारों तरफ़ जश्न के माहौल को देखकर रोम में बाँसुरी बजाते नीरो को याद करने की बजाय मगध में घनानंद के राजकाज की यादें ताज़ा होना स्वाभाविक ही है । ऎसे घटाटोप में चाणक्य और चंन्द्रगुप्त के अवतरण का बस इंतज़ार ही किया जा सकता है ।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

चल रहा है प्रदेश बेचो अभियान.....!

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सनसनीखेज़ और उत्तेजक बयानों ने प्रदेश की राजनीति में तूफ़ान ला दिया है । जहाँ शिवपुरी में भूमाफ़ियाओं पर उन्हें हटाने के लिये धन इकट्ठा करने का बयान दे कर सबको हक्का बक्का कर दिया। वहीं सदन के भीतर भूमाफ़ियाओं को चुनौती देने की शिवराज की दंभ भरी हुँकार से लोग सन्न हैं । विरोधियों को चुनौती देने के लिये उन्होंने संसदीय मर्यादाओं को बलाये ताक रखकर जिस भाषा शैली का इस्तेमाल किया, उसका उदाहरण प्रदेश के इतिहास में शायद ही मिले ।
मुख्यमंत्री भूमाफ़ियाओं पर उन्हें हटाने के लिये धन इकट्ठा करने का आरोप लगा रहे हैं, मगर भाजपा सरकार की कामकाज की शैली पर नज़र डालें, तो राज्य सरकार खुद ही भूमाफ़िया की सरमायेदार नज़र आती है। शिवराज के सत्तारुढ़ होने के बाद से मंत्रिपरिषद के अब तक लिये गये फ़ैसले सरकार की शैली साफ़ करने के लिये काफ़ी हैं । हर चौथी-पाँचवीं बैठक में निजी क्षेत्र को सरकारी ज़मीन देने के फ़ैसले आम है । सदन में भूमाफ़ियाओं पर दहाड़ने वाले मुखिया का मंत्रिमंडल जिस तरह के फ़ैसले ले रहा है, उससे उद्योगपतियों, नेताओं और भूमाफ़िया ही चाँदी कूट रहे हैं । एक तरफ़ सरकारी ज़मीनों को कौड़ियों के भाव औद्योगिक घरानों के हवाले किया जा रहा है , वहीं दूसरी तरफ़ बड़े बिल्डरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है । सरकार के फ़ैसले से नाराज़ छोटे बिल्डरों को खुश करने के लिये भी नियमों को बलाए ताक रख दिया गया है । गोया कि सरकार नेताओं को चंदा देने वाली किसी भी संस्था की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती ।

सरकारी कायदों की आड़ में ज़मीनों के अधिग्रहण का खेल पुराना है , लेकिन अब मध्यप्रदेश में हालात बेकाबू हो चले हैं । मिंटो हॉल को बेचने के कैबिनेट के फ़ैसले ने सरकार की नीयत पर सवाल खडे कर दिये हैं । मध्यप्रदेश सरकार सूबे की संपत्ति को अपनी मिल्कियत समझकर मनमाने फ़ैसले ले रही है । मालदारों और रसूखदारों को उपकृत करने की श्रृंखला में अब बारी है भोपाल की शान मिंटो हॉल की , जिसे निजी हाथों में सौंपा जा रहा है । स्थापत्य कला के नायाब नमूने के तौर पर सीना ताने खड़ी नवाबी दौर की इस इमारत का ऎतिहासिक महत्व तो है ही, यह धरोहर एकीकृत मध्यप्रदेश की विधान सभा के तौर पर कई अहम फ़ैसलों की गवाह भी है । सरकारी जमीन लीज पर देने का अपने तरह का यह पहला मामला होगा। राज्य सरकार की प्री-क्वालीफिकेशन बिड में चार कंपनियाँ रामकी (हैदराबाद), सोम इंडस्ट्री (हैदराबाद) जेपी ग्रुप (दिल्ली) और रहेजा ग्रुप (बाम्बे) चुनी गई हैं । इनमें से रामकी ग्रुप बीजेपी के एक बड़े नेता के करीबी रिश्तेदार का है । यूनियन कार्बाइड का कचरा जलाने का ठेका भी इसी कंपनी को दिया गया है । जेपी ग्रुप पर बीजेपी की मेहरबानियाँ जगज़ाहिर हैं ।

भोपाल को रातोंरात सिंगापुर,पेरिस बनाने की चाहत में राज्य सरकार कम्पनियों को मनमानी रियायत देने पर आमादा है । इतनी बेशकीमती जमीन कमर्शियल रेट तो दूर,सरकार कलेक्टर रेट से भी कम दामों पर देने की तैयारी कर चुकी है । ऐसा लगता है कि सरकार किसी उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को अपने हिसाब से बना रही है। कलेक्टर रेट पर भी जमीन की कीमत लगभग 117.25 करोड़ है,जबकि 7.1 एकड़ के भूखंड की कीमत महज़ 85 करोड़ रुपए रखी गई है। शहर के बीचोबीच राजभवन के पास की इस जमीन की सरकारी कीमत सत्रह करोड़ रूपए प्रति एकड़ है। यहाँ जमीन का कामर्शियल रेट कलेक्टर रेट से तीन गुना से भी अधिक है। कीमत कम रखने के पीछे तर्क है कि उपयोग की जमीन मात्र साढ़े पांच एकड़ है। इतना ही नहीं 1.2 एकड़ में बने खूबसूरत पार्क को एक रूपए प्रतिवर्ष की लीज पर दिया जाएगा, जिसका उपयोग संबंधित कंपनी पार्टियों के साथ ही बतौर कैफेटेरिया भी कर पायेगी ।

सरकार की मेहरबानियों का सिलसिला यहीं नहीं थमता । उद्योगपतियों को लाभ देने के लिए 85 करोड़ की राशि चौदह साल में आसान किश्तों पर लेने का प्रस्ताव है। पहले चार साल प्रतिवर्ष ढ़ाई करोड़ रूपए सरकार को मिलेंगे, जबकि पांचवे साल से सरकार को 14.90 करोड़ रूपए मिलेंगे। इस दौरान कंपनी सरकार को राशि पर महज़ 8.5 फ़ीसदी की दर से ब्याज अदा करेगी। इतनी रियायतें और चौदह साल में 85 करोड़ रूपए की अदायगी का सरकारी फ़ार्मूला किसी के गले नहीं उतर रहा है। सरकार मिंटो हॉल को साठ साल की लीज पर देगी, जिसे तीस साल तक और बढ़ाया जा सकता है। गौरतलब है कि गरीबों और मध्यमवर्गियों को मकान बनाकर देने वाला मप्र गृह निर्माण मंडल अपने ग्राहकों से आज भी किराया भाड़ा योजना के तहत 15 फ़ीसदी से भी ज़्यादा ब्याज वसूलता है ।

इसी तरह पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर मप्र पर्यटन विकास निगम ने महज़ 27 हजार 127 रुपए की सालाना लीज पर गोविंदगढ़ का किला दिल्ली की मैसर्स मैगपी रिसोर्ट प्रायवेट लिमिटेड के हवाले कर दिया है। इस तरह करीब 3.617 हेक्टेयर में फ़ैले गोविंदगढ़ किले को हेरिटेज होटल में तब्दील करके सैलानियों की जेब हल्की कराने के लिये कंपनी को हर महीने सिर्फ़ 2 हज़ार 260 रुपए खर्च करना होंगे। उस पर तुर्रा ये कि निगम के अध्यक्ष बड़ी ही मासूमियत के साथ कंपनी का एहसान मान रहे हैं,जिसने कम से कम किला खरीदने की हिम्मत तो की । वरना कई बार विज्ञापन करने के बावजूद कोई भी कंपनी किले को खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी ।

"मुफ़्त का चंदन" घिसने में मुख्यमंत्री किसी से पीछे नहीं हैं । ज़मीनों की रेवड़ियाँ बाँटने में उनका हाथ काफ़ी खुला हुआ है । पिछले छह सालों में केवल भोपाल ज़िले में सेवा भारती सहित कई सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों को करीब 95एकड़ ज़मीन दे चुके हैं । इसमें वो बेशकीमती ज़मीनें शामिल नहीं हैं , जिन पर मंत्रियों और विधायकों से लेकर छुटभैये नेताओं के इशारों पर मंदिर,झुग्गियाँ तथा गुमटियाँ बन चुकी हैं ।

राजधानी के कमर्शियल एरिया महाराणा प्रताप नगर से लगी सरकारी ज़मीन पर बसे पट्टेधारी झुग्गीवासियों को बलपूर्वक खदेड़ दिया गया था । ज़मीन खाली कराने के पीछे प्रशासन का तर्क था कि सरकार को इसकी ज़रुरत है । विस्थापन के लिये सरकार ने झुग्गीवासियों को वैकल्पिक जगह दी और उनके विस्थापन का खर्च भी उठाया । बाद में मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल के दावे को दरकिनार करते हुए बीजेपी सरकार ने बेशकीमती ज़मीन औने-पौने में दैनिक भास्कर समूह को "भेंट कर" दी । आज वहाँ डीबी मॉल सीना तान कर बेरोकटोक जारी सरकारी बंदरबाँट पर इठला रहा है । हाल ही में इस मॉल के प्रवेश द्वार में तब्दीली के लिये कैबिनेट के फ़ैसले ने एक बार फ़िर व्यावसायिक परीक्षा मंडल को अपना आकार सिकोड़ने पर मजबूर कर दिया । तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए कई पेड़ों की बलि देकर बेशकीमती ज़मीन डीबी मॉल को सौंप दी गई । करीब पाँच साल पहले भोपाल विकास प्राधिकरण ने भी एक बिल्डर पर भी इसी तरह की कृपा दिखाई थी । सरकारी खर्च पर अतिक्रमण से मुक्त कराई गई करीब पाँच एकड़ से ज़्यादा ज़मीन के लिये बिल्डर को कई सालों तक आसान किस्तों में रकम अदायगी की सुविधा मुहैया कराई थी । इसी तरह राजधानी भोपाल के टीनशेड, साउथ टीटीनगर क्षेत्र के सरकारी मकानों को ज़मीनदोज़ कर ज़मीन कंस्ट्रक्शन कंपनी गैमन इंडिया के हवाले कर दी गई ।

राज्य सरकार सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षिक संस्थाओं के अलावा अब उद्योगपतियों पर भी मेहरबान हो रही है । राजधानी भोपाल,औद्योगिक शहर इंदौर,जबलपुर,ग्वालियर सहित कई अन्य शहरों में तमाम नियमों को दरकिनार कर सरकारी ज़मीन कौड़ियों के दाम नेताओं के रिश्तेदारों और उनके चहेते औद्योगिक घरानों को सौंपी जा रही हैं । 23 अप्रैल 2010 के पत्रिका के भोपाल संस्करण में सातवें पेज पर प्रकाशित ज़ाहिर सूचना में ग्राम सिंगारचोली यानी मनुआभान की टेकरी के आसपास की 1.28 एकड़ शासकीय ज़मीन एस्सार ग्रुप को कार्यालय खोलने के लिये आवंटित करने की बात कही गई है । नजूल अधिकारी के हवाले से प्रकाशित इस विज्ञापन में बेहद बारीक अक्षरों में पंद्रह दिनों के भीतर आपत्ति लगाने की खानापूर्ति भी की गई है ।

सरकार के कई मंत्री और विधायक शहरों की प्राइम लोकेशन वाली ज़मीनों पर रातों रात झुग्गी बस्तियाँ उगाने, शनि और साँईं मंदिर बनाने के काम में मसरुफ़ हैं । नेताओं की छत्रछाया में बेजा कब्ज़ा कर ज़मीनें बेचने वाले भूमाफ़िया पूरे प्रदेश में फ़लफ़ूल रहे हैं । भाजपा के करीबियों ने कोटरा क्षेत्र में सरकारी ज़मीन पर प्लॉट काट दिये । गोमती कॉलोनी के करीब चार सौ परिवार नजूल का नोटिस मिलने के बाद अपने बसेरे टूटने की आशंका से हैरान-परेशान घूम रहे हैं । असली अपराधी नेताओं के संरक्षण में सरकारी ज़मीनों को "लूटकर" बेच रहे हैं । आलम ये है कि सरकार की नाक के नीचे भोपाल में करोड़ों की सरकारी ज़मीनें निजी हाथों में जा चुकी है । कई मामलों में नेताओं और अफ़सरों की मिलीभगत के चलते सरकार को मुँह की खाना पड़ी है ।

राज्य सरकार ने काफी मशक्कत के बाद भोपाल के मास्टर प्लान को रद्द करने का निर्णय लेने का मन बना लिया है। नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय ने राज्य शासन को नगर तथा ग्राम निवेश की धारा 18 (3) के तहत प्लान को निरस्त करने का प्रस्ताव भेज दिया है।शहरों में जमीन की आसमान छू रही कीमतों और बढ़ते शहरीकरण के मद्देनजर आवास एवं पर्यावरण विभाग ने टाउनशिप विकास नियम-2010 का प्रारूप प्रकाशित कर दिया है। ऊपरी तौर पर सब कुछ सामान्य घटनाक्रम दिखता है, लेकिन पूरे मामले की तह में जाने पर सारी धाँधली साफ़ हो जाती है । टाउनशिप विकास नियम-2010 के प्रकाशन से पहले भोपाल के मास्टर प्लान को रद्द करने की मुख्यमंत्री की घोषणा की टाइमिंग भूमाफ़ियाओं से सरकार की साँठगाँठ की पोल खोल कर रख देती है ।

सरसरी तौर पर टाउनशिप विकास नियम-2010 में कोई खोट नज़र नहीं आती, लेकिन प्रारूप में एक ऎसी छूट शामिल कर दी गई है, जिससे शहरों के मास्टर प्लान ही बेमानी हो जाएँगे । मास्टर प्लान में कई नियमों से बँधे कॉलोनाइजरों और डेवलपरों के लिये स्पेशल टाउनशिप नियम राहत का पैगाम है। राज्य सरकार ने टाउनशिप नियमों का जो मसौदा तैयार किया है, उसमें स्पेशल टाउनशिप को मंजूरी देने के लिए मास्टर प्लान के नियम बाधा नहीं बनेंगे। जहां भी मास्टर प्लान का क्षेत्र होगा, यदि वहां उक्त प्रस्ताव के नियमों और मास्टर प्लान के नियमों में विरोधाभास हुआ तो टाउनशिप के नियम लागू होंगे। इस तरह राज्य सरकार ने स्पेशल टाउनशिप के ज़रिये मास्टर प्लान से भी छेड़छाड़ की छूट दे दी है।

टाउनशिप के निर्माण के लिए असीमित कृषि भूमि खरीदने और इस जमीन को कृषि जोत उच्चतम सीमा अधिनियम के प्रावधानों से भी मुक्त करने जैसी बड़ी रियायतें भी देने का प्रस्ताव है। साथ ही टाउनशिप के बीच में आने वाली सरकारी जमीन प्रचलित दरों या अनुसूची(क) की दरों अथवा कलेक्टर की ओर से तय दरों पर पट्टे पर देने का प्रस्ताव भी आगे चलकर किसके लिये मददगार बनेगा,बताने की ज़रुरत शायद नहीं है । खतरनाक बात यह है कि कृषि भूमि पर भी टाउनशिप खड़ी हो सकेगी। खेती को लाभ का धँधा बनाने के सब्ज़बाग दिखाने वाले सूबे के मुखिया ने खेती की ज़मीनों पर काँक्रीट के जंगल उगाने की खुली छूट दे दी है । किसान तात्कालिक फ़ायदे के लिये अपनी ज़मीनें भूमाफ़ियाओं को बेच रहे हैं । सरकार की नीतियों के कारण सिकुड़ती कृषि भूमि ने धरतीपुत्रों को मालिक से मज़दूर बना दिया है । इससे पहले राज्य सरकार हानि में चल रहे कृषि प्रक्षेत्रों, जिनमें नर्सरियाँ और बाबई कृषि फ़ार्म भी निजी हाथों में देने का फ़ैसला ले चुकी है ।

प्रारूप के नियमों में हर जगह लिखा गया है कि विकासकर्ता को अपने स्रोतों से ही टाउनशिप में सुविधाएँ उपलब्ध कराना होंगी जिनमें सड़क बिजली एवं पानी मुख्य है । वहीं यह भी जोड़ दिया कि वो चाहे तो इस कार्य में नगरीय निकाय की सहायता ले सकते हैं। नियम में इस शर्त को जोड़कर विकासकर्ता को खुली छूट दी गई है कि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर टाउनशिप का पूरा विकास सरकारी एजेंसी के खर्चे से करवा ले। आवास एवं पर्यावरण विभाग की वेबसाइट पर मसौदे को गौर से पढ़ा जाए तो इसमें शुरू से लेकर आखिर तक सिर्फ बिल्डरों को उपकृत करने की मंशा साफ़ नज़र आती है। विभाग ने अपने ही नियमों को धता बताते हुए इस नए नियम से बड़े कॉलोनाइजरों और डेवलपरों की खुलकर मदद की है।

स्पेशल टाउनशिप को पर्यावरण और खेती का रकबा घटने के लिये ज़िम्मेदार मानने वालों का तर्क है कि शहर के बाहर स्पेशल टाउनशिप बनाने के बजाए पहले सरकार को पुनर्घनत्वीकरण योजना के तहत शहर के पुराने, जर्जर भवनों के स्थान पर बहुमंजिला भवन बनाना चाहिए। अंग्रेजों द्वारा 1894 में बनाये गये कानून की आड़ में सरकारी ज़मीनों की खरीद फ़रोख्त का दौर वैसे ही उफ़ान पर है । ऎसे में खेती की ज़मीनों पर टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव आत्मघाती कदम साबित होगा । इस प्रस्ताव से कृषि भूमि के परिवर्तन के मामलों में अंधाधुंध बढ़ोतरी की आशंका भी पर्यावरण प्रेमियों को सताने लगी है ।

कृषि भूमि का अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने पर उतारु सरकार सरकारी संपत्ति की लूट खसोट के लिये जनता द्वारा सौंपी गई ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रही हैं । अरबों-खरबों के टर्नओवर वाली कंपनियों पर भी शिवराज सरकार की कृपादृष्टि कम नहीं है । इस बात को समझने के लिये इतना जानना ही काफ़ी होगा कि बीते एक साल के दौरान प्रदेश में बड़ी कंपनियों को सरकार 8000 हैक्टेयर से अधिक ज़मीन बाँट चुकी है । बेशकीमती ज़मीनें बड़ी कम्पनियों को रियायती दरों पर देने का यह खेल प्रदेश में उद्योग-धँधों को बढ़ावा देने के नाम पर खेला जा रहा है । पिछले एक साल में रिलायंस, बिड़ला समूह समेत 22 बड़ी कंपनियों को करीब 6400 हैक्टेयर निजी भूमि भू अर्जन के माध्यम से दी गई । वहीं 14 ऎसी कंपनियाँ हैं जिन्हें निजी के साथ ही करीब 1640 हैक्टेयर सरकारी ज़मीन भी उपलब्ध कराई गई है । इनमें भाजपा का चहेता जेपी ग्रुप भी शामिल है । अरबों के टर्नओवर वाली कंपनियों को रियायत की सौगात देने के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे लोगों को स्थानीय स्तर पर रोज़गार मिल सकेगा लेकिन अब तक सरकारी दावे खोखले ही हैं ।

सरकारी संपत्ति पर जनता का पहला हक है। आम लोगों को अँधेरे में रखकर सरकार पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली की तरह काम कर रही है । नवम्बर 2005 के बाद प्रदेश की भाजपा सरकार के फ़ैसले भूमाफ़ियाओं के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली के से जान पड़ते हैं । पिछले छः दशकों में आदिवासी तथा अन्य क्षेत्रों की खनिज संपदा का तो बड़े पैमाने पर दोहन किया गया है मगर इसका फायदा सिर्फ पूँजीपतियों को मिला है। जो आबादियाँ खनन आदि के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापित हुईं, अपनी जमीन से उजड़ीं, उन्हें कुछ नहीं मिला। यहाँ तक कि आजीविका कमाने के संसाधन भी नहीं मिले, सिर पर एक छत भी नहीं मिली और पारंपरिक जीवनपद्धति छूटी, रोजगार छूटा, सो अलग। सरकार को उसकी हैसियत बताने के लिये जनता को अपनी ताकत पहचानना होगा और जागना होगा नीम बेहोशी से ।.......क्योंकि ज़मीनों की इस बंदरबाँट को थामने का कोई रास्ता अब भी बचा है ?

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

अकेले नौकरशाह ज़िम्मेदार नहीं

मध्यप्रदेश में आईएएस दंपति के लॉकर सोने- चाँदी और हीरे जवाहरात उगल रहे हैं । उनके बंगले से मिली पाँच सौ और हज़ार के नोटों की गड्डियों को गिनने के लिये आयकर विभाग के अमले को पसीने आ गये । आलम ये रहा कि नोट गिनने वाली मशीन को भी अपना काम अंजाम देने में घंटों लग गये । छापे से जहाँ नौकरशाही में हड़कंप मचा है , वहीं आम जनता हैरान है । कई लोग तो दबी ज़ुबान में कह रहे हैं कि इतना कैश घर में रखने की ज़रुरत ही क्या थी ? लेकिन कुछ लोग ऎसे भी हैं जिनकी राय में यह तो प्रदेश ही क्यों समूचे देश में मचे भ्रष्टाचार के तांडव की बानगी भर है ।


सूबे के मुखिया सारे काम धाम छोड़कर आये दिन प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के अभियान पर निकल पड़ते हैं । ग्रामीणों को भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनने की सीख देते हैं । लोगों को काली कमाई से दूर रहने की सौगंध दिलाते हैं और थके माँदे राजधानी लौटकर अफ़सरशाही की मदद से अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लग जाते हैं । मौजूदा दौर में ये माना जा चुका है कि काम करने से सरकार नहीं चलती । सरकार की स्थिरता के लिये अपने आकाओं की खुशामद ज़रुरी है ।

नितिन गडकरी की ताजपोशी के बावजूद बीजेपी में आज भी एक साथ कई मुखिया हैं । लिहाज़ा "कुर्सी बचाने" के लिये इन सभी तक "खर्चा-पानी" पहुँचाना ज़रुरी है । नौकरशाही को भी लगने लगा है कि नेताओं के लिये जब कमाई करना ही है , तो क्यों ना बहती गंगा में हम भी हाथ धो लें । वे भी जानते हैं कि एक गुनाह की भी वही सज़ा है , जो हज़ार गुनाहों की । "फ़ंड के फ़ंडे" में उलझे नेताओं की हकीकत को जानने के बाद अब नौकरशाही पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है ।

मुख्यमंत्री शासन - प्रशासन को स्वच्छ कर देने के दावे तो आये दिन करते रहते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है । किसानों को खाद - बीज देने का मामला हो या सिंचाई नहरों का, गरीब ग्रामीण बेहाल और नेता, ठेकेदार, अफ़सरान मालामाल । आँकड़े गवाही देते हैं कि किस तरह ग्रामीण अंचलों में बच्चे कुपोषण और भूख से मर रहे हैं, लेकिन पोषाहार सप्लाई में मची बँदरबाँट से लोकतंत्र का ताकतवर गठजोड़ दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होता जा रहा है । जनता की गाढ़ी कमाई से इकट्ठा काली कमाई तिजोरियों का पेट भर रही रही है और प्राण लेने पर उतारु महँगाई की मार झेल रहा आम आदमी दो वक्त की रोटी के लिये भी जद्दोजहद कर रहा है । गरीबों के कल्याण के लिये बनी नरेगा जैसी तमाम योजनाएँ समाज के उच्च वर्ग की रातों को रंगीन, नशीला और रुमानी बनाने वाली साबित हो रही हैं ।

प्राइवेट कंपनियों की बीमा पॉलिसियाँ कारोबारियों,अफ़सरों और नेताओं की काली कमाई को उजला बनाने की " फ़ेयर एंड लवली" साबित हो रही है । लोगों से जीने का बुनियादी हक छीनने वाले जीवन सुरक्षा में निवेश कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये "कारु का खज़ाना" तैयार कर रहे हैं । काँग्रेस के एकछत्र राज्य में मचे घटाटोप में बीजेपी एक उम्मीद की किरण बन कर आई थी, लेकिन नाकारा नेतृत्व और सत्ताधारी दल के साथ मिल बाँट कर खाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने आम जनता के भरोसे का खून कर दिया है ।

प्याज के मुद्दे पर सरकार हिला देने की ताकत रखने वाली लोकशाही में दाल-रोटी ही नहीं, बिजली-पानी भी महँगा हो गया है । बेतहाशा फ़ैलते प्रदूषण ने लोगों का साँस लेना भी दूभर कर दिया है । लेकिन आम आदमी की आवाज़ उठाने की किसी को फ़िक्र भी नहीं है और ना ही फ़ुर्सत है । महँगाई से परेशान लोगों के आँसू निकलने लगे हैं । चारों तरफ़ हाहाकार मचा है, ऎसे में विपक्ष की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है । कहीं ये मौन लोकतंत्र के किसी नये गठबंधन का संकेत तो नहीं ? कहीं ऎसा तो नहीं कि वोट लेने के बाद सत्ता और विपक्ष में साँठगाँठ हो गई है । क्या विपक्ष चुप्पी साधने की कीमत वसूल कर आम आदमी की पीड़ा से मुँह फ़ेर चुका है ?

मौजूदा हालात तो लोकतंत्र के इस बदनुमा चेहरे को ही उजागर कर रहे हैं । लेकिन नेताओं को जनता के सब्र का इतना भी इंम्तेहान नहीं लेना चाहिए कि तकलीफ़ें उन्हें सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दे । मगरुर नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पीड़ा से तड़पती जनता जब सड़कों पर आती है, तो कई वटवृक्षों को जड़ से उखाड़ने की ताकत रखती है । बीजेपी नेतृत्व को समझना होगा कि सता चाहे जितनी मदमस्त क्यों ना हो विपक्ष के मज़बूत और बुलंद इरादों के सामने उसे घुटने टेकना ही पड़ते हैं । जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठाने के लिये पार्टी को नैतिक मूल्यों को दोबारा से प्रतिष्ठित करना होगा और इसके लिये ज़रुरत होगी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा साहसिक फ़ैसले लेकर उन्हें अमलीजामा पहनाने की ।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

गलत क्या कहा शिवराज ने ....?

मीडिया की मेहरबानी और ओछी राजनीति के चलते मध्यप्रदेश मे मुख्यमंत्री बैठे ठाले मुश्किल में पड़ गये हैं । स्थानीय लोगों को छोटॆ-मोटे रोज़गार की तलाश में अपना घर द्वार छोड़कर भटकना ना पड़े , इस इरादे से सूबे के मुखिया ने एक बात कह दी , जिसे मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मिर्च-मसाले के साथ परोस दिया । सियासी फ़ायदा उठाने वालों की तो जैसे बन आई । लिहाज़ा बिहार की अदालत में याचिका लगा दी गई । अब बेतिया ज़िले की अदालत के आदेश पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। बेतिया व्यवहार न्यायालय के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मिथिलेष कुमार द्विवेदी के आदेश पर मुख्यमंत्री के खिलाफ धारा 124 (ए), 153 (ए), 153 (बी), 181, 500 और 504 के तहत मामला कायम हुआ है। गौरतलब है कि नौ नवंबर को वकील मुराद अली ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में दाखिल याचिका में आरोप लगाया था कि सतना में बिहारियों के खिलाफ़ दिया गया शिवराज सिंह का भाषण मुख्यमंत्री बनने के समय लिए गए शपथ के विरूद्ध है । यह बिहारवासियों का अपमान है और इससे क्षेत्रवाद फैलेगा।


न्यायालय ने मामला दर्ज़ करने का आदेश दिया है,लेकिन इस पूरे मसले में शिवराजसिंह कहीं भी दोषी नज़र नहीं आते । मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मामले को बेवजह तूल दिया । उनके बयान को गौर से सुनें,तो उसमें ना तो कोई अलगाव पैदा करने वाली बात कही गई थी और ना ही मनसे नेता राज ठाकरे की तरह भड़काऊ बयान दिया गया था । उन्होंने सहज ही जो बात कही वो कतई गलत नहीं थी । बल्कि सूबे के मुखिया होने के नाते उनके नज़रिये में कोई खोट भी नहीं है ।

क्षेत्र में कारखाना और उद्योग लगे और वहाँ का युवा या कामगार दूसरी जगह जाकर काम की तलाश में भटके, तो फ़िर वही हालात पैदा होते हैं , जो फ़िलहाल यूपी-बिहार में हैं । बेरोज़गारी से पनपने वाला असंतोष सामाजिक असंतुलन और अपराधों का सबब बन जाता है । राज्य सरकारों का काम ही है अपने सूबे की तरक्की के लिये कोशिश करना । अगर मध्यप्रदेश में कारखाना लगेगा,तो ज़ाहिर सी बात है स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी ही जाना चाहिए । मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज ने स्थानीय लोगों को नौकरियों में पचास फ़ीसदी प्राथमिकता देने की बात कह भी दी ,तो कौन सा कहर ढ़हा दिया ?

यूपी और बिहार से आकर नौकरी करने वाले सरकारी अफ़सरों ने प्रदेश को लूटने खसोटने में जिस तरह के बुद्धि कौशल और चातुर्य का परिचय दिया है, उसने इन प्रदेशों की छबि देश भर में बिगाड़कर रख दी है । कहते हुए दिल दुखता है लेकिन भाई-भतीजावाद की इससे बेहतर मिसाल क्या होगी कि भिलाई स्टील प्लांट हो या बीएचईएल छोटे और औसत दर्ज़े के सत्तर से अस्सी फ़ीसदी पदों पर बाहरी लोगों का कब्ज़ा है, जबकि स्थानीय कामगार दूसरे शहरों की खाक छान रहे हैं ।
तकनीक के इस दौर में उच्च शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं के लिये देश ही नहीं विदेशों में भी रोज़गार के तमाम मौके हैं, मगर असंगठित और अप्रशिक्षित हाथों को दो जून की रोटी की तलाश में हज़ारों किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़े, महानगरों में नारकीय जीवन गुज़ारते हुए खोमचे लगाना पड़े या दिहाड़ी मज़दूरी करना पड़े,तो यह सरकारों की विकास योजनाओं पर करारे तमाचे से कमतर नहीं है । यूँ भी रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वालों की ज़्यादातर ऊर्जा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में खप जाती है । जिस क्षेत्र में कारखाना लगता है, वहाँ की आबोहवा, ज़मीन, जंगल, पानी पर उसी इलाके के लोगों का पहला हक है । यदि देश और समाज की तरक्की के लिये वे अपना हिस्सा सभी के साथ बाँटने को तैयार हैं,तो उनके जायज़ हक को सौंपने में इतनी तंगदिली क्यों ? किसी भी देश,प्रदेश या क्षेत्र को तरक्की करना है तो योग्यता के साथ-साथ स्थानीय प्रतिभा को प्राथमिकता देना ही चाहिए।

शिवराज के बयान को तंग नज़रिये से देखने की बजाय व्यापक दृष्टिकोण से समझने की ज़रुरत है । सरकारों को इस मुद्दे पर नीतिगत फ़ैसला लेना चाहिए । टटपूँजिये तरीके से बाल की खाल निकाल कर राजनीति तो चमकाई जा सकती है, लेकिन किस कीमत पर ? अब वो वक्त आ चुका है , जब देश के कालिदासों की सेनाओं को समझना चाहिए कि नोचने-खसोटने के लिये ज़्यादा कुछ बचा नहीं है । दमतोड़ते लोकतंत्र की लाश को नोचने की सीमा भी आने को है । सम्हलो-वरना जिस दिन देश का अनपढ़-अनगढ़ आदमी उठ खड़ा हुआ तो नेताओं की जमात का नामलेवा भी नहीं बचेगा ।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

आतंक और मौतों की सियासत

मध्यप्रदेश के खंडवा में एटीएस के आरक्षक सहित तीन लोगों को दिनदहाड़े गोलियों से भून देने के बाद सरकार ने जिस तरह घोषणाओं का पिटारा खोल दिया , उसमें मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदनाशीलता कम मामले का सियासी फ़ायदा उठाने की कुत्सित चेष्टा ज़्यादा दिखाई देती है । खंडवा में मारे गये लोगों की शवयात्रा को काँधा देने के लिये खुद मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, मंत्रिमंडल के कई और सदस्यों के साथ ही डीजीपी एस के राउत भी मौजूद थे । प्रशासन और पुलिस ने मामले में प्रतिबंधित संगठन सिमी का हाथ होने की बात कह कर सनसनी फ़ैला दी और सरकारी तंत्र पूरे लवाज़मे के साथ खंडवा पहुँच गया ।

अब तक पुलिस की गिरफ़्त से बाहर है । अब पुलिस "ऑपरेशन फ़ंदा" का ढ़ोंग करने में जुट गई है,मगर नतीजा सिफ़र ही है । कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया है ,लेकिन अब तक कुछ भी सामने नहीं आया है । अलबत्ता नगरीय निकायों के चुनाव ज़रुर सामने खड़े हैं । लिहाज़ा घोषणाओं का पिटारा खोलकर राजनीतिक माइलेज लेने में माहिर सूबे के मुखिया ने एक बार फ़िर बाज़ी मार ली । आनन फ़ानन में उन्होंने तीनों मृतकों को शहीद का दर्ज़ा दे डाला । सभी की राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई । आरक्षक के परिजनों को दस लाख रुपए और दो अन्य मृतकों के परिवारों को पाँच-पाँच लाख रुपए का मुआवज़ा और एक-एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति देने की घोषणा भी कर दी गई । गोया कि २६/११ के मुम्बई हमले से भी बड़ा कोई आतंकी हमला हो गया हो जिसमें आतंकियों से जूझते हुए आरक्षक सीताराम यादव , बैंक अधिकारी पारे और वकील पाल ने वीरगति प्राप्त की हो । सरकारी प्रेस नोट को पढ़ने के बाद तो कम से कम यही लगता है मानो सीमा पर रणबाँकुरों ने देश की हिफ़ाज़त के लिये प्राण न्यौछावर किये हों ।

आरक्षक यादव बेशक एटीएस के कर्तव्यपरायण और जाँबाज़ जवान रहे हैं । उनकी बहादुरी पर हम सभी को नाज़ है । इस बात से भी इंकार नहीं कि देश के लिये साहस के साथ अपने दायित्वों को निबाहने वालों को ना सिर्फ़ सम्मान मिलना चाहिए , बल्कि उनके परिजनों को बेहतर ज़िन्दगी देने का नैतिक दायित्व समाज और सरकार दोनों का होता है । लेकिन मूल सवाल यही है कि नेता आखिर कब तक बेहयाई से अपने फ़ायदे के लिये लोकतंत्र का बेहूदा मज़ाक बनाते रहेंगे । अभी तफ़्तीश चल रही है । फ़िलहाल कुछ भी साफ़ नहीं है । कल जाँच-पड़ताल के बाद मामला आपसी रंजिश या लेनदेन का निकले,तब सरकार कहाँ जाकर मुँह छिपाएगी ?

अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिये नेता लोकतंत्र और सत्ता को "चेरी" समझ बैठे हैं । उनका ध्यान समाज में व्यवस्था लाने से ज़्यादा अराजकता फ़ैलाकर चाँदी काटाने में लग गया है । गुज़रते वक्त के साथ मध्यप्रदेश में तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । मुख्यमंत्री खुद भरी सभा में मान चुके हैं कि सूबे में तरह - तरह के माफ़ियाओं का राज है । दोबारा सत्ता में आने के बाद से तो जैसे भाजपाइयों को "पर" ही लग गये हैं । भूमाफ़ियाओं का आतंक पूरे प्रदेश में फ़ैला हुआ है । इसकी परिणिति एक आईएएस अफ़सर एम जी रुसिया की मौत के रुप में सामने आ चुकी है । ऎसे कई मामले हैं जिनमें शक की सुई सीधे-सीधे सत्ताधारी दल के नेताओं पर आ टिकती है , लेकिन रुसिया की संदिग्ध हालात में हुई मौत के बाद से अफ़सरशाही चौकन्नी हो गई है । अब आलम यह है कि अधिकारी अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिये नियम - कायदों को ताक पर रख कर नेताओं की मनमानी को बर्दाश्त कर रहे हैं ।

राजधानी की व्यस्ततम सडक पर चलती कार में चार लोगों द्वारा में तथाकथित रेप का मामला प्रदेश के हालात बयान करने के लिये काफ़ी है । शहर में गैंगरेप जैसी कोई घटना हुई ही नहीं और पुलिस ने आरोपी भी ढ़ूँढ़ निकाला । पास के गाँव के एक निरीह और शरीफ़ इंसान से अपराध भी कबूलवा लिया । शायद उसकी किस्मत अच्छी थी जो गाँव के कुछ लोग उसके पक्ष में उठ खड़े हुए । करीब डेढ़ - दो महीने गुज़ारने के बाद एक बेकसूर युवक ज़मानत पर रिहा हो सका । बाद में पता चला कि कुछ लोगों को फ़ँसाकर रकम ऎंठने के इरादे से यह कहानी बुनी गई थी । इसे अँजाम देने के लिये मुम्बई के दलालों और कॉलगर्ल की मदद ली गई थी, वास्तव में ऎसी कोई वारदात उस रात भोपाल में हुई ही नहीं थी ।

ये एक बानगी है । खंडवा की वारदात के बाद आधी-अधूरी जानकारी के बूते सरकार की बेतहाशा घोषणाएँ करना गंभीर मसला है । आखिर नेता कब तक अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते रहेंगे । मुख्यमंत्री अपने अधकचरे सलाहकारों का मशविरा मानकर "इमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज़" के लिये जाने क्या-क्या घोषणाएँ करते रहते हैं । उन्हें अपने व्यक्तित्व में गंभीरता लाकर सोचना ही होगा कि जनता ने राज्य और समाज हित के कामों के लिये उन्हें सत्ता सौंपी थी । सरकारी खज़ाना उनकी निजी जायदाद या मिल्कियत नहीं है , जिसे वो जब चाहें ,जैसे चाहे लुटाते रहें , उड़ाते रहें । हालाँकि प्रदेश में विपक्षी दल काँग्रेस का निकम्मापन और मिल बाँटकर खाने की नीयत से साधी गई चुप्पी को सब भाँप चुके हैं , लेकिन हकीकत किसी ना किसी बहाने सामने आकर ही रहती है । अराजकता की सियासत के सहारे लम्बा सफ़र तय कर पाना नामुमकिन है ।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

बीजेपी में दलबदलुओं का सैलाब

प्रदेश में यात्राओं,घोषणाओं और महापंचायतों के लिये पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अब प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर के साथ मिल कर तोड़क-फ़ोड़क राजनीति की नई इबारत लिखने में व्यस्त हैं । भाजपा की जुगल जोड़ी " शिवराज- तोमर" ने दलबदल के नये कीर्तिमान बनाने का बीड़ा उठा लिया है । विचारधारा और राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर भाजपा ने सभी दलों के नेताओं के लिये अपने दरवाज़े खोल दिये हैं । घोषणावीर शिवराज इन दिनों " वसुधैव कुटुम्बकम" की अवधारणा को साकार करने के लिये रात-दिन एक किये हुए हैं ।

अपने दलों में उपेक्षित नेताओं के स्वागत में भाजपा ने पलक-पाँवड़े बिछा दिये हैं । हालाँकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस "भीड़ बढ़ाऊ" रणनीति पर नाखुशी ज़ाहिर कर रहे हैं । लम्बे समय तक प्रदेश संगठन मंत्री रहे कृष्ण मुरारी मोघे कहते हैं कि पार्टी में शामिल होने वालों के लिये मापदंड तय होना चाहिए । वे मानते हैं कि स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिये बगैर होने वाले फ़ैसले आगे चल कर परेशानी का सबब बन सकते हैं । पार्टी के संगठन महामंत्री माखन सिंह भी आने वालों की भीड़ को लेकर असहमति जता चुके हैं ।

मध्यप्रदेश में भाजपा पिछले लोकसभा चुनावों की पच्चीस सीटों के आँकड़े को बरकरार रखने के लिये जी जान लगा रही है । नेताओं के साथ संगठन के रणनीतिकारों ने भी पार्टी मुख्यालय की बजाय क्षेत्रों में डेरा जमा लिया है । प्रदेश भाजपा का थिंक टैंक रोज़ाना एक-एक सीट की समीक्षा में जुटा है और निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ गणित बिठाने की माथापच्ची में लगा है । लोकसभा चुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल करने की जद्दोजहद में कई नेता इधर से उधर हो गये हैं । ऎसे नेताओं की भी कमी नहीं जो हर विचारधारा में खुद को को फ़िट करने में वक्त नहीं लगाते ।

परिसीमन से बदले नक्शे के कारण कई दिग्गजों ने तो अपनी विचारधारा ही बदल डाली । दूसरे दलों के नेताओं को खींचकर पार्टी में लाने की ’प्रेशर पॉलिटिक्स’ भी खूब असर दिखा रही है । प्रमुख पार्टी काँग्रेस और बीएसपी के दिग्गजों के अलावा कई अन्य दलों के नेता और कार्यकर्ता भाजपा का रुख कर रहे हैं । अब तक करीब साढ़े तीन हज़ार नेता- कार्यकर्ता बीजेपी का दामन थाम चुके हैं ।

एक बड़े नेता का कहना है कि भाजपा के दरवाज़े अभी सबके लिये खुले हैं,जो भी चाहे आ सकता है । इस खुले आमंत्रण के बाद बीजेपी में आने से ज़्यादा लाने का दौर चल पड़ा है । दूसरे दलों के ’विभीषणों’का दिल खोलकर स्वागत सत्कार किया जा रहा है । बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और लोजपा नेता रहे फ़ूलसिंह बरैया भगवा रंग में रंग गये हैं । पार्टी से रुठ कर गये प्रहलाद पटेल ने भी घर वापसी में ही समझदारी जानी ।

काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और सिंधिया घराने के खासमखास बालेंदु शुक्ल भाजपा में शामिल हो गए । छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव विधानसभा क्षेत्र से काँग्रेस विधायक रहे हरीशंकर उइके मुख्यमंत्री के चुनावी दौरे के दौरान एक हजार कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा में आ गये । गुना के भाजश विधायक राजेन्द्र सलूजा के बाद अब सिलवानी के भाजश विधायक देवेंद्र पटेल भी बीजेपी की राह पकड़ चुके हैं । विदिशा जिले के पूर्व विधायक मोहर सिंह और उनकी पत्नी सुशीला सिंह भी पार्टी में लौट आये । काँग्रेस के प्रदेश महामंत्री रहे नर्मदा प्रसाद शर्मा ,पूर्व विधायक शंकरसिंह बुंदेला और बीएसपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भुजबल सिंह अहिरवार को भी बीजेपी में एकाएक खूबियाँ दिखाई देने लगी हैं ।

सागर लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी शैलेष वर्मा ने भी भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है । इसी तरह देवास-शाजापुर के पूर्व सांसद बापूलाल मालवीय के बेटे श्याम मालवीय ने शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में सदस्यता ग्रहण की । श्याम 2004 में भाजपा के वर्तमान सांसद थावरचंद गेहलोत के खिलाफ काँग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। देवास के अधिवक्ता श्याम मालवीय काँग्रेस के जिला महामंत्री भी हैं । सागर से काँग्रेस का टिकट नहीं मिलने से नाराज़ संतोष साहू भी अब भाजपा नेता बन गये हैं ।

भारतीय राजनीति में पाला बदलने का चलन नया नहीं है । आयाराम-गयाराम की संस्कृति का जन्म भी यहीं हुआ और इसे बखूबी परवान चढ़ते हम सभी ने देखा है । वैचारिक विशुद्धता के साथ राजनीति करने वाले बीजेपी और कम्युनिस्ट पार्टी जैसे काडर बेस्ड दल भी अब इससे अछूते नहीं रहे । भाजपा को कोस कर दाल रोटी चलाने वाले नेता अब बीजेपी की खूबियाँ "डिस्कवर" करके मलाई सूँतने का इंतज़ाम कर रहे हैं ।

रातोंरात हृदय परिवर्तन तो संभव नहीं है और ना ही इस बदलाव के पीछे कोई ठोस वैचारिक या सैद्धांतिक कारण दिखाई देता है । जो नेता पार्टी में आने को ललायित हैं वे न तो इसके एजेंडे से प्रभावित हैं और न ही उनकी प्रतिबद्धता है । ये वो लोग हैं जो एक वैचारिक पार्टी में भीड़ बढ़ा रहे हैं । इनके उतावलेपन की सिर्फ़ एक ही वजह है और वो है इनका पर्सनल एजेंडा । तात्कालिक तौर पर आकर्षक और रोचक लगने वाले इस घटनाक्रम के दूरगामी परिणाम पार्टी के लिये बेहद घातक साबित होंगे ।

गुटबाज़ी और हताशा की गिरफ़्त में आ चुकी प्रदेश काँग्रेस दिग्भ्रमित है और तीसरी ताकत के उदय की संभावनाएँ हाल फ़िलहाल ना के बराबर हैं । ऎसे में सत्ता के आसपास जमावड़ा लगना स्वाभाविक है । बेशक दल बदलुओं की जमात का दिल खोलकर स्वागत करने वाली भाजपा ने राजनीति में अपना रुतबा बढ़ा लिया हो,लेकिन "पार्टी विथ डिफ़रेंस" का दावा करने वाली बीजेपी के लिये क्या यह शुभ संकेत कहा जा सकता है ?

भारतीय राजनीति में वैचारिक एक्सक्लुसिव एजेंडा ही भाजपा के जन्म का आधार था । इसकी मूल ताकत हमेशा से ही समर्पित कार्यकर्ता रहे,जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से विचार ऊर्जा लेकर पार्टी की मज़बूती के लिये अपना खून-पसीना एक किया । दीनदयाल परिसर की ड्योढ़ी पर हर "आयाराम" के माथे पर तिलक और गले में पुष्पहार पहनाकर स्वागत के अनवरत सिलसिले का असर पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर क्या,कैसा और कितना पड़ेगा ये सोचने की फ़ुर्सत शायद किसी को नहीं है ।

कुल मिलाकर प्रदेश बीजेपी उस घाट की तरह हो चुकी है,जिस पर शेर के साथ ही भेड़-बकरियाँ भी पानी पी रहे हैं । लेकिन इसे रामराज्य की परिकल्पना साकार होने से जोड़कर देखना भूल होगी । क्योंकि यहाँ तपस्वी राम की नहीं अवसरवादी विभीषणों की पूछ परख तेज़ी से बढ़ गई है । रामकारज के लिये एक ही विभीषण काफ़ी था । इन असंख्य विभीषणों के ज़रिये स्वार्थ सिद्धि एक ना एक दिन पार्टी के जी का जँजाल बनना तय लगती है ।

बीजेपी के घाट पर भई दलबदलुओं की भीड़
तोमरजी चंदन घिसें, तिलक करें घोषणावीर।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

जनता करे काम, नेता खाएँ आम.......

भोपाल की बड़ी झील में श्रमदान का नाटक अब शर्मदान अभियान में तब्दील हो चुका है । झील का पानी सूखने के साथ ही नेताओं की आँखों का पानी भी सूखने लगा है । कल तक खुद को जनता का सेवक और पब्लिक को भगवान बताने वाले मुख्यमंत्री के तेवर भी बदलने लगे हैं । नाकारा और निठल्ले विपक्ष ने प्रदेश सरकार को बेलगाम होने की खुली छूट दे दी है ।

काँग्रेस का बदतर प्रदर्शन बताता है कि बीजेपी हर हाल में पच्चीस सीटें हासिल कर ही लेगी । ऎसे एकतरफ़ा मुकाबलों के बाद सत्ता पक्ष का निरंकुश होना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं होगी । शिवराज सिंह चौहान के बर्ताव में आ रहे बदलाव में आने वाले वक्त के संकेत साफ़ दिखाई दे रहे हैं । हाल ही में उन्होंने एक तालाब गहरीकरण समारोह में कहा कि सभी काम करना सरकार के बूते की बात नहीं । इसके लिये जनता को आगे आना होगा । समाज को अपना दायित्व समझते हुए कई काम खुद हाथ में लेना होंगे ।

अब बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि जब सभी काम जनता को ही करना हैं ,तो फ़िर इन नेताओं की ज़रुरत क्या है ? अपनी गाढ़ी कमाई से टैक्स भरे जनता । करोड़ों डकारें नेता .....! मेहनत करे आम लोग और हवा में सैर करें नेता ...? जब सब कुछ लोगों को ही करना है,तो इतनी महँगी चुनाव प्रक्रिया की ज़रुरत ही क्या है ? मंत्री बनें नेता,खुद के लिये मोटी तनख्वाह खुद ही तय कर लें फ़िर भी पेट नहीं भरे तो योजनाओं की रकम बिना डकार लिये हज़म कर जाएँ । लाखों रुपए बँगले की साज-सज्जा पर फ़ूँक दें । कभी न्याय यात्रा,कभी संकल्प यात्रा,कभी सत्याग्रह और कभी कोई और पाखंड ....। पिछले साल की जुलाई से प्रदेश सरकार सोई पड़ी है । कर्मचारियों को छठे वेतनमान के नाम पर मूर्ख बना दिया । दो- तीन हज़ार का लाभ भी कर्मचारियों को बमुश्किल ही मिल पाया है ।

अब चुनाव बाद सपनों के सौदागर शिवराज एक बार फिर प्रदेश की यात्रा पर निकलेंगे । दावा किया जा रहा है कि देश का नंबर-एक राज्य बनाने में आम जनता का सहयोग माँगने के लिए वे 'मध्यप्रदेश बनाओ यात्रा’ निकालेंगे । इसके तहत मुख्यमंत्री सप्ताह में तीन दिन सड़क मार्ग से विभिन्न क्षेत्रों में जाकर आम जनता को प्रदेश की तरक्की के सपने से जोड़ेंगे। इसके लिये सर्वसुविधायुक्त रथ बनाया गया है,जिसमें माइक के साथ जनता से जुड़ने का अन्य साजोसामान भी होगा ।

शिवराज की राय में अव्वल दर्जा दिलाने के लिए जनता को राज्य से जोड़ना जरूरी है। जब तक लोगों में प्रदेश के प्रति अपनत्व का भाव नहीं होगा,वे इसकी तरक्की में समुचित योगदान नहीं दे सकते । वे कहते हैं कि मध्यप्रदेश का नवनिर्माण ही अब उनका जुनून है । वे जनता और सरकार के बीच की दूरी खत्म कर यह काम करेंगे ।

मीडिया में अपने लिये जगह बनाने में शिवराज को महारत है । पाँव-पाँव वाले भैया के नाम से मशहूर शिवराज ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जनदर्शन शुरू किया था । साप्ताहिक "जनदर्शन"में वे किसी एक जिले में सड़क मार्ग से लगभग डेढ़ सौ किमी की यात्रा कर गांव और कस्बों के लोगों से मिलने जाते थे । इसके बाद आई जनआशीर्वाद यात्रा । विधानसभा चुनाव के ठीक पहले निकाली गई इस यात्रा में शिवराज ने सवा माह तक सड़क मार्ग से यात्रा कर लगभग पूरे प्रदेश को नापा ।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ,मीडिया मैनेजमैंट की बदौलत अब खुद एक ब्राँड में तब्दील हो चुके हैं । विधानसभा चुनावों के पहले से ही उनकी छबि गढ़ने का काम शुरु हो गया था । स्क्रिप्ट के मुताबिक शिवराज ने एक्ट भी बखूबी किया । अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों में खरीदी हुई स्पेस की मदद से देखते ही देखते वे लोकप्रिय जननायक बन बैठे । विधानसभा चुनावों के अप्रत्याशित नतीजों ने साबित कर दिया कि झूठ को सलीके से बेचा जाए,तो काठ की हाँडी भी बार-बार चढ़ाई जा सकती है ।

चुनाव नतीजे आने के बाद नेशनल समाचार चैनलों पर नर्मदा में छलाँग लगाते शिवराज को देखकर लगा कि मीडिया गुरुओं की सलाह और मीडिया की मदद से आज के दौर में क्या नहीं किया जा सकता । एक चैनल ने तो बाकायदा उनके सात फ़ेरों की वीडियो का प्रसारण किया और श्रीमती चौहान की लाइव प्रतिक्रिया भी ले डाली । सूबे के महाराजा-महारानी का परिणय उत्सव देखकर जनता भाव विभोर हो गई ।

दल बदलुओं की बाढ़ ने मौकापरस्तों का रेला बीजेपी की ओर बहा दिया है । अब राज्य में गुटबाज़ी की शिकार काँग्रेस अंतिम साँसे गिन रही है । निकट भविष्य में ऑक्सीजन मिलने के आसार दिखाई नहीं देते । मान लो जीवन दान मिल भी जाए , तो दमखम से जुझारु तेवर अपनाने में वक्त लगेगा । यानी चौहान विपक्ष की तरफ़ से पूरी तरह निश्चिंत हैं । सुषमा स्वराज को लेकर तरह- तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं,लेकिन विदिशा में राजकुमार पटेल ने सफ़ेद झंडा लहरा कर युद्ध सँधि कर ली । एक तीर से कई निशाने साधे गये और शिवराज की गद्दी हाल फ़िलहाल सुरक्षित हो गई ।

प्रदेश की जनता का भाग्य बाँचनेवाले बताते हैं कि आने वाले सालों में आम लोगों की मुश्किलें बढ़ने की आशंकाएँ प्रबल हैं । रेखाएँ कहती हैं कि जनता को हर मोर्चे पर संघर्ष पूर्ण इम्तेहान देना होगा । यदि इस अनिष्ट से बचना हो तो जनता को अभी से अनुष्ठान शुरु कर देना चाहिए । रास्ता महानुभाव जरनैल सिंह ने सुझा ही दिया है । लोग अपनी सुविधा के हिसाब से इसमें फ़ेर बदल कर हालात पर काबू पाने में कामयाब हो सकते हैं ।

शनिवार, 24 जनवरी 2009

कर्मचारियों के बहाने गौर ने साधा निशाना

मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर के एक बयान पर बवाल मचा गया है । प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके श्री गौर ने पिछले हफ़्ते कहा था कि " जिसे काम नहीं करना होता ,वह सरकारी नौकरी में आता है ।" उन्होंने ये भी कहा कि सरकारी कर्मचारी सुस्त हैं और प्रदेश के विकास में बाधक भी ।

उनके इस बयान से भडके कर्मचारी लामबंद हो गये हैं । कर्मचारी संगठनों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है । कर्मचारियों का कहना है कि नेता और मंत्री तो महज़ घोषणाएं करके वाहवाही लूटते हैं । सरकारी कामकाज तो कर्मचारियों के बूते ही होता है । लेकिन कर्मचारियों की नाराज़गी से बेपरवाह श्री गौर अब भी अपनी बात पर अडे हैं । उनकी निगाह में सरकारी मुलाज़िम अलाल और मुफ़्तखोरी के आदी हैं ।

जिन लोगों का सरकारी दफ़्तरों से साबका पडा है उन्हें गौर के बयान में शब्दशः सच्चाई दिखाई दे सकती है । ये भी सही है कि कार्यालयों में टेबलों पर पडी फ़ाइलों की महीनों धूल तक नहीं झडती । चाय - पान के ठेलों पर कर्मचारियों का मजमा जमा रहता है । ऑफ़िस का माहौल बोझिल और उनींदा सा बना रहता है । ऊंघते से लोग हर काम को बोझ की मानिंद बेमन से करते नज़र आते हैं । मगर इस सब के बावजूद सरकार का कामकाज चल रहा है तो आखिर कैसे ..?

गौर जैसे तज़ुर्बेकार और बुज़ुर्गवार नेता से इस तरह के गैर ज़िम्मेदाराना बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती । हो सकता है ज़्यादातर कर्मचारी अपने काम में कोताही बरतते हों । उनकी लापरवाही से कामकाज पर असर पडता हो । लेकिन कुछ लोग ऎसे भी तो होंगे जो अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार हों और अपने काम को पूरी मेहनत और लगन से बखूबी अंजाम देते हों । ऎसे में सभी को एक ही तराज़ू में तौलना कहां तक जायज़ है ? क्या ये ठीक माना जा सकता है कि सभी कर्मचारियों को निकम्मा और कामचोर करार दिया जाए ?

चलिए कुछ देर के लिए मान लिया जाए कि गौर जो कह रहे हैं वो हकीकतन बिल्कुल सही है , तो ऎसे में सवाल उठता है कि इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है ? क्या उस सरकार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती जिसमें गौर खुद शामिल हैं ? क्या सरकारी मुलाज़िम निठल्ले होने के साथ - साथ इतने ताकतवर हो चुके हैं कि वे मंत्रियों पर भारी पडने लगे हैं ? बकौल गौर कर्मचारी प्रदेश के विकास में बाधक हैं , तो क्या जिस विकास के दावे पर जनता ने भाजपा को दोबारा सत्ता सौंपी ,वो खोखला था ? और अगर विकास हुआ तो आखिर किसके बूते पर ....?

दरअसल इस मसले को बारीकी से देखा जाए तो इसके पीछे कहानी कुछ और ही जान पडती है । लगता है गौर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा एक बार फ़िर बलवती होने लगी है । छठा वेतनमान मिलने में हो रही देरी से प्रदेश के कर्मचारी बौखलाए हुए हैं । ऎसे समय में गौर के भडकाऊ बयान ने आग में घी का काम किया है । प्रदेश में शिवराज सिंह के विकास के नारे को जिस तरह से जनता ने वोट में तब्दील किया उससे पार्टी में उनका कद अप्रत्याशित रुप से एकाएक काफ़ी तेज़ी से बढा है । दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल से निराश हो चुके कर्मचारियों की समस्याओं को ना सिर्फ़ शिवराज ने सुना - समझा और उनकी वेतन संबंधी विसंगतियों को दूर करने के अलावा सेवा शर्तों में भी बदलाव किया । दिग्विजय सिंह भी स्वीकारते हैं कि शिवराज कर्मचारियों के लाडले हैं और उन्हीं की बदौलत वापस सत्ता हासिल कर सके हैं ।

गौर की बयानबाज़ी शिवराज की उडान को थामने की कोशिश से जोड कर भी देखी जाना चाहिए । इसे लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र कर्मचारियों में असंतोष की चिंगारी को हवा देकर दावानल में बदलने की कवायद भी माना जा सकता है । यदि लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन मनमाफ़िक नहीं रहा , तो शिवराज का विरोधी खेमा इस मौके को भुनाने से नहीं चूकेगा । मुख्यमंत्री पद की शोभा बढा चुके गौर वैसे तो "सूबे के मुखिया" होने के ’हैंग ओवर’ से अब तक बाहर नहीं आ पाए हैं । पिछली सरकार में वाणिज्य कर मंत्री रहते हुए वे गाहे बगाहे दूसरे महकमों के कामकाज में भी दखल देते रहे हैं ।

शिगूफ़ेबाज़ी कर मीडिया की सुर्खियां बटोरना उनका शगल है । कभी भोपाल को स्विटज़रलैंड बनाने का ख्वाब दिखा कर , कभी बुलडोज़र चलाकर , तो कभी इंदौर और भोपाल में मेट्रो ट्रेन चलाने की लफ़्फ़ाज़ी कर लोगों को लुभाने की कोशिश करने वाले गौर ने 2006 में प्रदेश को पॉलिथीन से पूरी तरह निजात दिलाने का शोशा छोडा था । कुछ दिन बाद पॉलिथीन निर्माता कंपनियों का प्रतिनिधिमंडल गौर से मिला । इसके बाद ना जाने क्या हुआ ....?????? प्रदेश में पॉलिथीन का कचरा दिनोंदिन पहाड खडे कर रहा है ।

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

’राम राज्य’ की आस में शिव को सौंपा ताज

शिवराजसिंह चौहान की ताजपोशी के साथ बीजेपी सरकार की नई पारी की शुरुआत हो गई है । भोपाल के जम्बूरी मैदान पर उमडे अथाह जनसैलाब ने भाजपा को स्पष्ट संकेत दे दिये हैं कि छप्पर फ़ाड कर वोट देने के बाद जनता सरकार से जमकर काम लेने के लिए कमर कस चुकी है ।

प्रदेश की जनता ने जिस निष्ठा और विश्वास के साथ शिवराजसिंह चौहान पर भरोसा जताया है , उसकी कसौटी पर खरा उतरने के लिए मुख्यमंत्री को सूबे की कमान संभालते ही काम में जुट होगा । भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को दरकिनार कर राज्य की बागडोर भाजपा को सौंपने के पीछे सिर्फ़ एक ही कारण नज़र आता है कि मतदाताओं को शिवराज की कोशिशों में ईमानदारी दिखाई दी । लोगों ने ना पार्टी और ना ही स्थानीय नेता को चुना , बल्कि उन्होंने तो शिवराज के विकास के नारे पर अपने भरोसे की मोहर लगाई है ।

इस चुनाव में मतदाता ने स्पष्ट कर दिया है कि ना तो उसे बीजेपी से कोई खास लगाव है और ना ही कांग्रेस से कोई बैर । उसे मतलब है सिर्फ़ काम से । अच्छा काम करने की बात और विकास का वायदा तो लगभग सभी पार्टियों ने किया लेकिन मतदाताओं ने वायदा करने वालों की विश्वसनीयता को जांचा - परखा । यही वजह रही कि एक दूसरे को नीचा दिखाने में मशगूल कांग्रेस नेताओं के प्रति जनता ने बेरुखी अख्तियार कर ली । लोगों को लगा कि जब तक कांग्रेस अपना घर व्यवस्थित नहीं कर लेती , उसे प्रदेश का ज़िम्मा सौंपना ठीक नहीं होगा ।

दूसरी अहम बात रही शिवराज की विनम्र और ज़मीन से जुडे व्यक्ति की छबि । उन्होंने अपनी कमियाँ स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई । शायद इसीलिए तमाम खामियों के बावजूद शिवराज का जननायक के रुप में ’कायान्तरण” संभव हो सका । लेकिन अभी यह सफ़र का महज़ आगाज़ है । आगे का रास्ता काफ़ी कंटीला और दुर्गम है और यहीं से शुरु होगा जननायक की असली परीक्षा का दौर ...?

मध्यप्रदेश चुनावों की कुछ विशिष्टताओं पर विचार ज़रुरी है । हालांकि भाजपा के कई धडॆ इसे मानने को तैयार नहीं लेकिन हकीकतन आम जनता पर ’शिवराज फ़ेक्टर” हद दर्ज़े तक हावी रहा । गुजरात का ’मोदी माडल’ अपनी जगह है , मगर समाज के सभी वर्गों तक पहुंचने के लिए वायदों की बरसात के ’ शिवराज फ़ार्मूला’ का कामयाब होना आगामी चुनावों की रणनीति पर सभी दलों को फ़िर से काम करने के लिए बाध्य करेगा । इस माडल की खामियां और खूबियां तो अगले पांच साल ही बता सकेंगे , लेकिन फ़िलहाल यह माडल मोदी माडल की तुलना में ज़्यादा कारगर साबित हुआ है ।

जनता ने ज़्यादातर शिवराज को वोट दिया है फ़िर चाहे उम्मीदवार कोई भी रहा हो । अममून देखा गया है कि लोकप्रियता का बढता ग्राफ़ संकट का स्रोत भी बन जाता है । जनता जहाँ असीमित आशाएँ- अपेक्षाएँ पाल लेती है , वहीं पार्टी के भीतर भी ईर्ष्या और द्वेष के नाग फ़न फ़ैलाने लगते हैं । ऎसे में उन्हें खुद के बनाए माडल से भी सावधान और चौक्कना रहना होगा ।

शिवराज सरकार के सामने कडी चुनौती होगी चुनावी घोषणा पत्र में किए गये वायदों को पूरा करने की । बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र ’जन संकल्प पत्र’ में जो वायदे किए हैं यदि वे सारे के सारे आने वाले पाँच साल में पूरे कर दिए जाते हैं तो मध्यप्रदेश हकीकत में स्वर्ग बन जाएगा ।

पिछले कार्यकाल में शिवराज ने राजधानी में किस्म - किस्म की महापंचायतें आयोजित कर ज़बानी जमा खर्च की तमाम रेवडियाँ बाँटी । प्रदेश का एक बडा हिस्सा उन घोषणाओं को लेकर तरह तरह के सपने बुन कर बैठा है । वायदों को हकीकत में बदलने के लिए सरकार को आर्थिक मोर्चे पर विशेष कोशिशें करना होंगी । योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए आय के नए स्रोत तलाशने के साथ ही वित्तीय स्थिति में मज़बूती के लिए मितव्ययिता अपनाना होगी । लेकिन सूबे के मुखिया के ’राजतिलक” पर दिल खॊलकर किए गए खर्च को देखते हुए फ़िलहाल वित्तीय अनुशासन की बात कहना बेमानी लगता है ।

बहरहाल शिवराज एकछत्र नेता के रुप में उभरे हैं । उन्हें सकारात्मक समर्थन मिला है ,लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या वे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर सकारात्मक राजनीति और रचनात्मक सुशासन का माडल तैयार कर सकेंगे.....?

झूठे सिक्कों में भी उठा देते हैं अकसर सच्चा माल
शक्लें देख के सौदा करना काम है इन बंजारों का ।