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गुरुवार, 30 अगस्त 2012

लोकतंत्र की दीमक


मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वक्त वो सब हो रहा है , जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । कल तक खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानकर शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ़ खेमेबंदी का झंडा उठाकर चलने वाले कैलाश विजयवर्गीय आज सरकार की झूठन समेट रहे हैं । चाहे वो मुरैना में हुई आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या का मामला हो , महज़ सात सालों में अरबपति बने दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के सीधे ताल्लुकात का मुद्दा हो या कोल ब्लॉक आवंटन मामले में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल हों । मुख्यमंत्री मुँह में दही जमा कर बैठे हैं और कैलाश विजयवर्गीय उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं । गोया कि सूबे के मुखिया बनने का ख्वाब हुआ हवा , अब तो आलम ये है कि कुर्सी बचाए रखने के लिए चौहान की चरणोदक पीने में भी गुरेज़ नहीं रहा ।

 रही सही कसर एमपीसीए के चुनाव में मिली करारी मात ने निकाल दी । धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए माधवराव सिंधिया ने क्लीन स्वीप कर दिया । कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र के सभी हथकंडे अपनाए ,मगर वो भूल गए कि गली-कूचों में “भिया और भिडु “ तैयार करके विधायकी हासिल करना अलग बात है , भद्र और कुलीन समाज का खेल माने जाने वाले क्रिकेट की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना और बात । 

इसी तरह देश के इतिहास में शायद ये पहला ही मौका होगा , जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो सौ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के हुजूम ने इंदौर में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल दिया । संघी मनोज परमार मामले के जाँच अधिकारी के एकाएक तबादले से नाराज़ थे । सूबे के मुखिया के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी कर रहे इन कार्यकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को प्रताड़ित कर रही है । इंदौर इन दिनों गैंगवार और माफ़िया की गिरफ़्त में फ़ँस कर कराह रहा है । मगर इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं । भाजपा समर्थक व्यापारी प्रशासन से गुँडाराज से छुटकारा दिलाने की गुहार लगा रहे हैं ।

प्रदेश के मुखिया हवाई सफ़र, विदेश भ्रमण, तीर्थाटन, देवदर्शन या फ़िर प्रदेश के रमणिक स्थलों पर परिवार के साथ सुस्ताने में व्यस्त रहते हैं । इन गतिविधियों से कभी कुछ वक्त मिल जाता है , तो मीडिया का चोंगा थाम कर देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपने “अनमोल वचन” प्रसारित करके उपस्थित दर्ज कराते रहते हैं । "मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थूकने" की प्रवृत्ति के पोषक मुख्यमंत्री प्रदेश की हर बड़ी घटना पर मुँह सिलकर बैठ जाते हैं । ऎसे मौके पर नरोत्तम मिश्र या कैलाश विजयवर्गीय को आगे कर दिया जाता है । लोग मायावती के प्रचार अभियान पर सरकारी खज़ाने के १२० करोड़ रुपए फ़ूँक दिए जाने पर गाल बजाते हैं । यदि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह की ब्रांडिंग पर जनसंपर्क, वन्या , खेल और तमाम अन्य महकमों के मद से लुटाए गए खज़ाने का अनुमान लाया जाए , तो ये किसी भी सूरत में ३५० करोड़ रुपए से कम नहीं बैठेगा ।

इसके अलावा यह भी एक दिलचस्प खबर है कि सूबे के मुखिया औसत हर रोज़ दो घंटे हवाई यात्रा में बिताते हैं । सब कुछ हवा में ही है, ज़मीन पर कुछ नहीं अगर है भी तो बस पोलपट्टी । यही नतीजा है कि भाजपा के ज़िला पदाधिकारी भी अपना सिर पीट रहे हैं । वे कहते हैं कि ज़िलों में ना सड़क है ना बिजली और ना ही पानी , बरसात में तो हालात बदतर हो चुके हैं , ऎसे में जनता को क्या जवाब दें ? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे चुनाव में जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएँगे ? अधिकांश पदाधिकारी मानते हैं कि इन्हीं मुद्दों को लेकर दिग्विजय सिंह को सत्ता से उखाड़ फ़ेंकने वाली जनता अब भाजपा को सबक सिखाने का मूड बना रही है । मगर दिल्ली की चाँडाल – चौकड़ी को हफ़्ता पहुँचाकर अपनी कुर्सी बचाए रखने वालों का जनता के सुख-दुख से क्या सरोकार ?

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ  के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी प्रदेश सरकार की कारगुज़ारियों पर अँगुली उठाते रहे हैं । ये अलग बात है कि  भाजपा सरकार की मुखालफ़त की उन्हें भारी कीमत चुकाना पड़ी । सच बोलने की सज़ा के तौर पर उन्हें असंवैधानिक तरीके से पद से हटा दिया गया , करीब पंद्रह दिन जेल की सलाखों के पीछे फ़ेंका गया सो अलग । हाल ही में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भोपाल में आयोजित अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम में पहुँचे श्री शर्मा ने प्रदेश सरकार को यूपीए सरकार से भी चार गुना ज़्यादा भ्रष्ट करार देकर सबको सकते में डाल दिया ।

 अपनी साफ़गोई के लिए पहचाने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा जैसे लोगों को सत्ता का रोग मानते हैं । खून- पसीने से पार्टी को सींच कर यहाँ तक पहुँचाने वालों की कतार में शामिल रहे श्री शर्मा का कहना है कि संकट के समय ये लोग नहीं दिखेंगे, उस समय काम आयेंगे त्यागी और सिद्धांतनिष्ठ कार्यकर्ता । मगर उनकी इस नसीहत की आखिर ज़रुरत किसे है? अपना तो क्या चाचा के मामा के ताऊ के फ़ूफ़ा  तक की पुश्तों का इंतज़ाम कर चुके इन सत्ताधीशों को क्या लेना देश से ,यहाँ की जनता से , भारत के लोकतंत्र से ।

दरअसल इस देश में इस तरह के लोकतंत्र की कोई ज़रुरत ही नहीं है । देश में भ्रष्टाचार के मूल में लोकतंत्र के नाम पर खड़े किये गये चूषक तंत्र ही हैं । मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आखिर इस देश में दिल्ली से लेकर गाँवों की गली-कूचों तक जनप्रतिनिधियों के नाम पर खड़े किए गए इन सत्ता के दलालों की ज़रुरत क्यों है ? अगर देश के नेता सिर्फ़ दलाली खाने के लिए ही हैं तो इनका खर्च जनता क्यों उठाए ? राष्ट्र्पति शासन में भी तो सरकारी मशीनरी बिना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बेहतर और सुचारु ढंग से काम करती है । गौर करने वाली बात यह भी है कि जब से नगर निगम और नगर पालिकाएँ बनीं तबसे अव्यवस्थाएँ और गंदगी फ़ैली । महापौर और पार्षद रातोंरात करोड़पति बन गए ,मगर शहरों की हालत बद से बदतर होती गई । यही हाल ग्राम स्वराज के नाम पर खड़ी की गई पंचायती राज व्यवस्था का है । पंच-सरपंच पजेरो में सैर कर रहे हैं लेकिन गरीब आदमी सूखे निवालों से भी महरुम है । यानी अब लोकतंत्र  की दीमकों से छुटकारा पाने के लिए सत्ता बदलने की नहीं , देश चलाने के लिए नय रास्ता तलाशने का वक्त है ।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

मध्यप्रदेश में शिव"ताँडव"

सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशोखरोश के साथ जश्न मनाने की तैयारियों में जुटी है । शिवराज सिंह प्रदेश की गैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऎसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं । इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है । ऎसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर "गौरव दिवस" मनाने पर आमादा है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । बीजेपी का "गौरव दिवस" मौका भी है सरकार की कार्यशैली की समीक्षा का । साथ ही पीछे मुड़कर यह देखने का कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया ।

शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं,दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये,तो वे राजनीति की "राखी सावंत" से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी फ़िदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है । घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी हकीकत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फ़ोड़ने की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के खिलाफ़ सत्याग्रह, धरने,प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं । दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नज़र आते हैं । वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं । वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं,बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में "अँधों में काना राजा" की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मजबूरी बन गये हैं ।

शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय काफ़ी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है । जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया । जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं भी कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना "मित्र धर्म" बखूबी निभाया ।

शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था कि प्रदेश में सात तरह के माफ़ियाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिलाकरही दम लेंगे । लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश में फ़ैले गुंडाराज की कहानी खुद बयान करती है । आज आलम ये है कि भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के फ़ायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है ।

भय,भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है । बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ "ढूँढ़ते रह जाओगे" के हालात में पहुँच गई हैं । केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तर्ज़ पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है । राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे ज़िम्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है । पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से "तर" सरकार आम जनता की परेशानियों से बेखबर है ।

पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई फ़ायदा मिला हो । "आगे पाठ पीछे सपाट" के फ़ार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगूफ़ेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है ।

कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोड़ने की कवायद के बाद शिवराज ने "स्वर्णिम मध्यप्रदेश" का शोशा छोड़ा । १ नवम्बर १९५६ को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने "आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश" की मुहिम छेड़ रखी है । मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अखबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है । मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश "स्वर्णिम" बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती इसके पहले ही वे इन दिनों वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं ।

बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की "चाचाजी" वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज "मामाजी" के तौर पर मकबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है । नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ रफ़्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से "प्रधानमंत्री कब बनोगे" सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंज़िल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे ।

छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के सफ़र में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान हैं। एक तरफ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है । जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है । प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बेफ़िक्र है । वोट बैंक की खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है । राजधानी भोपाल की ऎतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऎतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को साफ़ करती है । किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है । अवैध खनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है । वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह ज़िले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैध कटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से फ़लफ़ूल रहा है ।

दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऎसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढ़ंग अपनाना शुरु कर दिया । अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार,महिला उत्पीड़न,अपहरण,हत्या,लूट,चोरी,डकैती,फ़िरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्राफ़ लगातार कुलाँचे मार रहा है । प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्राफ़ रफ़्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही सफ़लता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कर्ज़ लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़ोरों पर है ।

तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की हकीकत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सिर्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षो में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।

उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सिर्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण,व्यावसायिक सहयोग,प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।

प्रदेश में गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। गरीबी यहाँ तेजी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जिलों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जिले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हजार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में गरीबी बढ़ने की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऎशो आराम पर दिल खोलकर खर्च रही है ।

भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढ़ने के फ़ेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने नगमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन "लागा चुनरी में दाग" गाकर महफ़िल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ ज़िलों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं । वैसे विजय शाह के साथ गले में ढ़ोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में फ़ँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन "तो दाग अच्छे हैं" की तरह अपने दामन पर लगे "डंपर कांड" के दाग को भी "जस्टिफ़ाई" कर रहे हैं ।

वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है । उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं । बहरहाल इस अनंतकथा को कम शब्दों में बखान करने के लिये फ़िलहाल इतना कहना ही काफ़ी होगा -"हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, बहु बिधि कहहिं सुनहिं सब सन्ता ।"

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

लोकतंत्र की लूटखसोट

पूरे देश में आईपीएल पर मीडियाई हाहाकार मचा हुआ है । हाल ही में शोएब सानिया और आयशा के लव ट्रायंगल पर दिन-रात पसीना बहाने वाले पत्रकारों ने दम भी नहीं लिय था कि मोदी ने अंतरजाल पर चहक-चहक कर अक्सर चहचहाने वाले शशि थरुर की बोलता बंद कर दी । सुनंदा की मित्रता थरुर की कुर्सी पर भारी पड़ गई । काँग्रेस ने नाक बचाने के लिये थरुर की बलि तो ले ली लेकिन अब वह मोदी को भी बख्शने के मूड में नहीं है । तभी तो तेल पानी लेकर पिल गई है मोदी को चारों खाने चित्त करने में ।
वैसे पहले सानिया-शोएब और अब आईपीएल का चखड़बा । देश की मूल समस्याओं की ओर अब किसी का ध्यान भी नहीं है । महँगाई का विरोध करने के लिये पानी की तरह पैसा बहाकर भीड़ जुटाने की बीजेपी की कोशिश भी कुछ रंग नहीं ल सकी । उल्टा हुआ ये कि एयरकंडीशनर की ठंडी हवा के आदी हो चुके नेताओं को गर्म लू के थपेड़ों की आदत ही नहीं रही , लिहाज़ा सूरज की तपिश से रुबरु होते ही गश खा कर गिर पड़े । अब कोई इन नेताओं से पूछे कि महँगाई की सुरसा तो पिछले कई महीनों से लगातार मुँह फ़ाड़ रही है , अब जाकर होश आया ....!!!! गर्म हवा के एक झोंके से चक्कर खाकर गिर जाने वालों से कोई ये भी पूछे कि करोड़ों रुपए फ़ूँक कर एक दिन मजमा जुटा लेने से क्या आम जनता को महँगाई से निजात मिल जायेगी ।
दरासल देश में अजीब सा "केओस" का माहौल है । आम आदमी के पेट में भले ही निवाला नहीं पहुँचे लेकिन संसद में आईपीएल पर बहस में समय ज़ाया करना ज़रुरी है । मीडिया भी बुनियादी समस्याओं से आम लोगों का ध्यान हटाने के लिये नेताओं के सुर में सुर मिलाकर फ़िज़ूल के मुद्दे बना रहा है और उन्हें बेवजह तूल दे रहा है । आखिर नेताओं और उद्योग घरानों की मदद से ही तो उनकी दुकान चलती रह सकती है ।
इधर प्रदेश के अखबार घरानों ने भी एक दूसरे को पटखनी देने के लिये नित नये दाँव खेलना सीख लिया है । अखबार जो कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ था आज लूटतंत्र में अन्य स्तंभों का हमजोली बन गया है । जब से एनजीओ के ज़रिये सरकारी कम कराने का चलन बढ़ा है, इन अखबार मालिकों को समाज सेवा का भी भूत सवार हो गया है । कोई तालाब बचाने के नाम पर पैसा बना रहा है, तो कोई पक्षियों को दाना-पानी देकर वाहवाही लूट रहा है । एक अखबार ने तो इन दिनों कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ़ मुहिम छेड़ रखी है । बेशक नेताओं के काले कारनामे जनता के सामने आना ही चाहिये , मगर इन घपलों को उजागर करने के तरीके अखबार की नीयत पर ही सवाल खड़े करते हैं । आखिर क्या वजह है कि इस अखबार को प्रदेश में सिर्फ़ एक ही मंत्री बेईमान नज़र आ रहा है । अखबार मुख्यमंत्री से न्याय की अपेक्षा कर रहा है , लेकिन क्या इस भोले-भंडारी को यह नहीं मालूम कि मुख्यमंत्री का "डंपर मामला" अब भी लोकायुक्त के पास धूल चाट रहा है । गर अखबार सचमुच प्रदेश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहता है,तो सरकार के मुखिया के कारनामों को उजागर करता ?
व्यक्ति विशेष के खिलाफ़ चलाई जा रही मुहिम में व्यक्तिगत दुर्भावना या विद्वेष की बू आती है । कहीं ऎसा तो नहीं कि इंदौर में पैर जमाने में अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से नाराज़ होकर मंत्री जी की बखिया उधेड़ी जा रही है या फ़िर इंदौर के बीजेपी अधिवेशन के सफ़ल आयोजन के बाद आलाकमान की नज़रों में विजयवर्गीय के नम्बर बढ़ने से खौफ़्ज़दा भाजपाइयों ने ही अखबार को "छू’ कर दिया हो ....! बहरहाल नैतिकता और व्यावसायिक प्रतिबद्धता का दावा करने वाले अखबारों का ये " ब्लेकमेलर" अंदाज़ बेहद शर्मनाक है । अगर अनियमितताओं से पर्दा हटाने क बीड़ा उठाया ही है तो फ़िर निष्पक्षता का हामी होना भी ज़रुरी है । राजनीतिक शुचिता के देश की मौजूदा व्यवस्था में शायद अब कोई जगह बची ही नहीं है ।
जो मुख्यमंत्री केबिनेट में शहर की सरकारी बेशकीमती ज़मीनें कई रसूखदारों को बाँट दे, जो खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हो , अधिकारियों और दिल्ली में बैठे नेताओं के हाथ की कठपुतली बना हुआ हो , वो सिर्फ़ लच्छेदार भाषण देकर लोगों को भरम सकता है, उनकी भलाई के बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठा सकता । कल यानी तेइस अप्रैल के पत्रिका के सातवें पन्ने पर एक सरकारी उदघोषणा प्रकाशित की गई है । इसमें शहर के महँगे इलाके सिंगारचोली की १.२८ एकड़ सरकारी ज़मीन मुम्बई के एस्सार ग्रुप को कार्यालय खॊलने के लिये आवंटित करने की बात कही गई है । नजूल अधिकारी ने पंद्रह दिन में आपत्तियाँ मँगाई हैं । क्या सरकारी ज़मीनें औने-पौने दामों में रामदेव जैसे योग के व्यापारी,धर्म या समाज का ठेकेदारों,फ़र्ज़ी समाजसेवी संस्थाओं को आवंटित करने का हक इन नेताओं महज़ इस लिये मिल जाना चाहिये क्योंकि ये येनकेन प्रकारेण सत्ता पर काबिज़ हैं । इस बँदरबाँट में राजनीतिक दलों का कोई भेद नहीं बचा है । सत्ता किसी भी पार्टी की हो, नेता सब बाँट कर खाने मामले में एक हो चुके हैं । सरकारी संपत्ति को इन लुटेरों से बचाने के लिये जनता को ही कोई रास्ता तलाशना होगा ।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

अकेले नौकरशाह ज़िम्मेदार नहीं

मध्यप्रदेश में आईएएस दंपति के लॉकर सोने- चाँदी और हीरे जवाहरात उगल रहे हैं । उनके बंगले से मिली पाँच सौ और हज़ार के नोटों की गड्डियों को गिनने के लिये आयकर विभाग के अमले को पसीने आ गये । आलम ये रहा कि नोट गिनने वाली मशीन को भी अपना काम अंजाम देने में घंटों लग गये । छापे से जहाँ नौकरशाही में हड़कंप मचा है , वहीं आम जनता हैरान है । कई लोग तो दबी ज़ुबान में कह रहे हैं कि इतना कैश घर में रखने की ज़रुरत ही क्या थी ? लेकिन कुछ लोग ऎसे भी हैं जिनकी राय में यह तो प्रदेश ही क्यों समूचे देश में मचे भ्रष्टाचार के तांडव की बानगी भर है ।


सूबे के मुखिया सारे काम धाम छोड़कर आये दिन प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के अभियान पर निकल पड़ते हैं । ग्रामीणों को भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनने की सीख देते हैं । लोगों को काली कमाई से दूर रहने की सौगंध दिलाते हैं और थके माँदे राजधानी लौटकर अफ़सरशाही की मदद से अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लग जाते हैं । मौजूदा दौर में ये माना जा चुका है कि काम करने से सरकार नहीं चलती । सरकार की स्थिरता के लिये अपने आकाओं की खुशामद ज़रुरी है ।

नितिन गडकरी की ताजपोशी के बावजूद बीजेपी में आज भी एक साथ कई मुखिया हैं । लिहाज़ा "कुर्सी बचाने" के लिये इन सभी तक "खर्चा-पानी" पहुँचाना ज़रुरी है । नौकरशाही को भी लगने लगा है कि नेताओं के लिये जब कमाई करना ही है , तो क्यों ना बहती गंगा में हम भी हाथ धो लें । वे भी जानते हैं कि एक गुनाह की भी वही सज़ा है , जो हज़ार गुनाहों की । "फ़ंड के फ़ंडे" में उलझे नेताओं की हकीकत को जानने के बाद अब नौकरशाही पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है ।

मुख्यमंत्री शासन - प्रशासन को स्वच्छ कर देने के दावे तो आये दिन करते रहते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है । किसानों को खाद - बीज देने का मामला हो या सिंचाई नहरों का, गरीब ग्रामीण बेहाल और नेता, ठेकेदार, अफ़सरान मालामाल । आँकड़े गवाही देते हैं कि किस तरह ग्रामीण अंचलों में बच्चे कुपोषण और भूख से मर रहे हैं, लेकिन पोषाहार सप्लाई में मची बँदरबाँट से लोकतंत्र का ताकतवर गठजोड़ दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होता जा रहा है । जनता की गाढ़ी कमाई से इकट्ठा काली कमाई तिजोरियों का पेट भर रही रही है और प्राण लेने पर उतारु महँगाई की मार झेल रहा आम आदमी दो वक्त की रोटी के लिये भी जद्दोजहद कर रहा है । गरीबों के कल्याण के लिये बनी नरेगा जैसी तमाम योजनाएँ समाज के उच्च वर्ग की रातों को रंगीन, नशीला और रुमानी बनाने वाली साबित हो रही हैं ।

प्राइवेट कंपनियों की बीमा पॉलिसियाँ कारोबारियों,अफ़सरों और नेताओं की काली कमाई को उजला बनाने की " फ़ेयर एंड लवली" साबित हो रही है । लोगों से जीने का बुनियादी हक छीनने वाले जीवन सुरक्षा में निवेश कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये "कारु का खज़ाना" तैयार कर रहे हैं । काँग्रेस के एकछत्र राज्य में मचे घटाटोप में बीजेपी एक उम्मीद की किरण बन कर आई थी, लेकिन नाकारा नेतृत्व और सत्ताधारी दल के साथ मिल बाँट कर खाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने आम जनता के भरोसे का खून कर दिया है ।

प्याज के मुद्दे पर सरकार हिला देने की ताकत रखने वाली लोकशाही में दाल-रोटी ही नहीं, बिजली-पानी भी महँगा हो गया है । बेतहाशा फ़ैलते प्रदूषण ने लोगों का साँस लेना भी दूभर कर दिया है । लेकिन आम आदमी की आवाज़ उठाने की किसी को फ़िक्र भी नहीं है और ना ही फ़ुर्सत है । महँगाई से परेशान लोगों के आँसू निकलने लगे हैं । चारों तरफ़ हाहाकार मचा है, ऎसे में विपक्ष की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है । कहीं ये मौन लोकतंत्र के किसी नये गठबंधन का संकेत तो नहीं ? कहीं ऎसा तो नहीं कि वोट लेने के बाद सत्ता और विपक्ष में साँठगाँठ हो गई है । क्या विपक्ष चुप्पी साधने की कीमत वसूल कर आम आदमी की पीड़ा से मुँह फ़ेर चुका है ?

मौजूदा हालात तो लोकतंत्र के इस बदनुमा चेहरे को ही उजागर कर रहे हैं । लेकिन नेताओं को जनता के सब्र का इतना भी इंम्तेहान नहीं लेना चाहिए कि तकलीफ़ें उन्हें सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दे । मगरुर नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पीड़ा से तड़पती जनता जब सड़कों पर आती है, तो कई वटवृक्षों को जड़ से उखाड़ने की ताकत रखती है । बीजेपी नेतृत्व को समझना होगा कि सता चाहे जितनी मदमस्त क्यों ना हो विपक्ष के मज़बूत और बुलंद इरादों के सामने उसे घुटने टेकना ही पड़ते हैं । जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठाने के लिये पार्टी को नैतिक मूल्यों को दोबारा से प्रतिष्ठित करना होगा और इसके लिये ज़रुरत होगी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा साहसिक फ़ैसले लेकर उन्हें अमलीजामा पहनाने की ।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

मध्यप्रदेश के जंगल बेचने की तैयारी

देश-दुनिया में टाइगर स्टेट के रुप में ख्याति पाने वाले मध्यप्रदेश को बाघ विहीन करने के लिये कुख्यात वन विभाग ने अब प्रदेश के जंगलों पर हाथ साफ़ करने का मन बनाया है । बरसों सरकारी तनख्वाह के साथ - साथ जंगल की कमाई खाने वाले अफ़सरों और नेताओं की नीयत एक बार फ़िर डोल गई है । प्रदेश के गठन के वक्त करीब चालीस फ़ीसदी वन क्षेत्र को साफ़ कर आठ प्रतिशत तक पहुँचाने वालों की निगाह अब जंगल की ज़मीन पर पड़ गई है ।

अफ़सरों ने मुख्यमंत्री और मंत्री को पट्टी पढ़ा दी है कि मंदी के दौर में अगर सरकार की आमदनी बढ़ानी है ,तो जंगल की ज़मीन निजी हाथों में सौंपने से बढ़िया कोई और ज़रिया नहीं है । जनता की ज़मीन को नेता ,अधिकारी और उद्योगपति अपनी बपौती मान बैठे हैं और इस दौलत की बंदरबाँट की तैयारी में जुट गये हैं । टाइगर रिज़र्व के नाम पर अरबों- खरबों रुपए फ़ूँकने के बाद बाघों को कागज़ों में समेट देने वालों को जंगल का सफ़ाया करके भी चैन नहीं आ रहा । अब वे औद्योगिक घरानों की मदद से घने जंगल तैयार करने की योजना को अमली जामा पहनाने में जुट गये हैं ।

इसी सिलसिले में कुछ तथाकथित जानकारों की राय जानने के लिये भोपाल में वन विभाग ने संगोष्ठी का आयोजन किया ,जिसमें रिलायंस, टाटा, आईटीसी, रुचि सोया जैसी नामी गिरामी कम्पनियों के प्रतिनिधि मौजूद थे । कार्यशाला का लब्बो लुआब यही था कि अगर वनों को बचाना है , तो इन्हें निजी हाथों में सौंप देना ही एकमात्र विकल्प है । क्योटो प्रोटोकॉल, क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज़्म के तहत वनीकरण और पुनर्वनीकरण परियोजनाओं पर केन्द्रित कार्यशाला में मुख्यमंत्री ने दलील दी कि सरकार प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर औद्योगिकीकरण नहीं करना चाहती । सरकार की कोशिश है कि जंगल बचाकर उद्योग-धंधे विकसित किये जाएँ । एक्सपर्ट ने एक सुर में सलाह दे डाली कि जंगल बचाना है ,तो निजी भागीदारी ज़रुरी है । यानी प्रदेश में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के ज़रिये जंगल बचाये और बढ़ाये जाने की बात हो रही है ।

सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान का मानना है कि पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन कायम रखना समाज की ज़िम्मेदारी है । मुख्यमंत्री हर काम की ज़िम्मेदारी जनता और समाज पर डालते रहे हैं । सवाल यही है कि जब हर काम समाज को ही करना है ,तो सरकार की ज़रुरत ही क्या है ? बँटाढ़ार करने,मलाई सूँतने के लिये मंत्री और सरकारी अमला है और कर का बोझा ढ़ोने तथा काम करने के लिये जनता है ।

उधर "अँधेर नगरी के चौपट राजा" के नवरत्नों की सलाह पर जंगल के निजीकरण के पक्ष में वन विभाग का तर्क है कि प्रदेश के करीब 95 लाख हैक्टेयर वन क्षेत्र में से 36 लाख हैक्टेयर की हालत खस्ता है । उसे फ़िर से विकसित करने के लिये करोड़ों रुपयों की दरकार होगी । सरकार के पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपने दम पर जंगल खड़ा कर सके । उनकी नज़र में धन्ना सेठों से बेहतर इस ज़िम्मेदारी को भला कौन अच्छे ढंग से अंजाम दे सकता है ? लिहाज़ा सरकार ने प्रदेश के जंगलों को प्राइवेट कंपनियों के हवाले करने का मन बना लिया है । वह दिन दूर नहीं जब प्रदेश के विशाल भू भाग के जंगल औद्योगिक घरानों की मिल्कियत बन जाएँगे । वैसे यहाँ इस बात का ज़िक्र बेहद ज़रुरी हो जाता है कि जनता की ज़मीन को ठिकाने लगाने की रणनीति जंगल विभाग के आला अफ़सरान काफ़ी लम्बे समय से तैयार करने में जुटे थे । करीब छह महीने पहले वन विभाग ने इसका खाका तैयार कर लिया था ।

सरकार को मंदी से उबारने के लिये अफ़सरों ने सुझाव दे डाला कि प्रदेश में जंगलों के नाम पर हज़ारों एकड़ ज़मीन बेकार पड़ी है ,यह ज़मीन ना तो विभाग के लिये उपयोगी है और ना ही किसी अन्य काम के लिये । रायसेन, विदिशा, ग्वालियर, शिवपुरी, कटनी सहित कई ज़िलों में हज़ारों एकड़ अनुपयोगी ज़मीन है । इसी तरह शहरों के आसपास के जंगलों की अनुपयोगी ज़मीन को व्यावसायिक उपयोग के लिये बेच कर चार से पाँच हज़ार करोड़ रुपए खड़े कर लेने का मशविरा भी दे डाला । इसके लिये केन्द्र सरकार से अनुमति लेकर बाकायदा नियम कायदे बनाने तक की बात कही गई थी ।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में वर्ष 1956-57 के दौरान करीब 39.5 फ़ीसदी वन क्षेत्र था , जो अब महज़ 8 प्रतिशत रह गया है । एक सर्वे के मुताबिक पिछले चार दशकों में प्रदेश के 18 हज़ार 98 वर्ग किलोमीटर से भी ज़्यादा वनों का विनाश हुआ है । पूरे देश में वनों के विनाश की तुलना में अकेले मध्यप्रदेश में 43 फ़ीसदी जंगलों का सफ़ाया कर दिया गया । इस बीच वन अमला कार्यों से ज़्यादा अपने कारनामों के लिये सुर्खियों में रहा है । वन रोपणियों के संचालन पर करोड़ों रुपए फ़ूँकने के बावजूद ना आमदनी बढ़ी और ना ही वन क्षेत्रों में इज़ाफ़ा हो सका ।

वन विभाग में आमतौर पर इमारती लकड़ी, बांस तथा खैर के व्यवसाय से होने वाली आय में प्रति वर्ष 15 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी होती है लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ। यह आय बढ़ने की बजाय पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 3 करोड़ रुपए घट गई। इसके विपरीत विभाग का खर्च 10 करोड़ बढ़ गया। वह तो भला हो तेंदूपत्ता व्यापार का, अनुकूल स्थिति के चलते उसकी आय में इजाफा हुआ और वन विभाग को अपनी इज्जत ढ़ाँकने का मौका मिल गया। इमारती लकड़ी, बांस तथा खैर के राजकीय व्यापार की आय में कमी से वन विभाग के आला अफसरों की मंशा पर उंगली उठने लगी है। आय में कमी की वजह अफसरों एवं ठेकेदारों के बीच सांठगांठ को माना जा रहा है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार वर्ष 2008 में वन विभाग को इमारती लकड़ी के राजकीय व्यापार से 483 करोड़, बांस से 37 तथा खैर के व्यापार से लगभग एक करोड़ रुपए अर्थात कुल 521 करोड़ रुपए की आय हुई थी। लेकिन वर्ष 2009 की जो आय वन राज्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने विधानसभा में बताई वह इमारती लकड़ी के व्यापार से 489 करोड़, बांस से 28 करोड़ तथा खैर के व्यापार से लगभग एक करोड़ है। आमतौर पर वन विभाग में इन मदों से होने वाली आय में 15 फीसदी की बढ़ोत्तरी होती है, इस लिहाज से आय 599 करोड़ होना चाहिए थी।

आय में कमी को बड़े घपले के रूप में देखा जा रहा है । हर वर्ष बढ़ने वाली यह आय क्यों नहीं बढ़ी, इसे लेकर विभाग के जानकार हैरान हैं । उनका कहना है, तेंदूपत्ता के व्यापार में तो प्रकृति का असर पड़ता है लेकिन इमारती लकड़ी, बांस और खैर पर प्राकृतिक प्रकोप असरकारी नहीं होता। मजेदार तथ्य यह भी है कि "आमदनी अठन्नी ,खर्चा रुपय्या" की तर्ज़ पर विभाग का खर्च 84 करोड़ से बढ़ कर 95 करोड़ हो गया । विधानसभा में दिये गये विभागीय आय के ब्यौरे से पता चलता है कि विभाग की इज्जत तेंदूपत्ता व्यापार की आमदनी ने बचाई।

जंगलों में बरसों से काबिज़ आदिवासियों को बेदखल करने में जुटी सरकार अफ़सरों की सलाह पर जनता की ज़मीन औद्योगिक घरानों को सौंपने जा रही है । वक्त रहते लोग नहीं चेते , तो वो दिन दूर नहीं साँस लेने के लिये विशुद्ध हवा लेने के भी दाम चुकाना होंगे और संभव है राज्य सरकार विशुध्द प्राणवायु देने के एवज़ में कर वसूली करने लगे ।

शनिवार, 9 मई 2009

कलाकार की आह और कराह, संस्कृति बनी चारागाह

शास्त्रीय संगीत के पुरोधा पंडित कुमार गंधर्व के बेटे और मशहूर ध्रुपद गायक मुकुल शिवपुत्र के भोपाल के एक मंदिर में बदहाल स्थिति में मिलने की खबर से कला जगत में मायूसी छा गई। सरकारी अमला एक बार फ़िर समस्या से मुँह चुराता और गंभीर मुख मुद्रा बनाये सच्चाई पर पर्दा डालता दिखाई दिया। अपनी धरोहरों और संस्कृतिकर्मियों का सरकार कितना खयाल रखती है, मुकुल का मामला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
कला और संस्कृति के संरक्षण का दम भरने वाली मध्य प्रदेश सरकार का ध्यान भी पाई-पाई के लिए मोहताज मुकुल पर तब गया ,जब उनका कोई पता नहीं चल रहा है। हालाँकि मुख्यमंत्री ने फ़क्कड़ तबियत मुकुल शिवपुत्र को ढ़ूँढ़ कर उनके सम्मानपूर्वक पुनर्वास की बात कही है। उन्होंने मुकुल को राज्य की सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए कहा कि उनका पता लगाने की हर संभव कोशिश की जाएगी।

कम उम्र में ही शास्त्रीय संगीत में ऊंचा मुकाम हासिल करने वाले मुकुल शिवपुत्र अब भीख माँगकर गुजारा करने पर मजबूर हैं। गौर तलब है कि 53 वर्षीय मुकुल पिछले कुछ दिनों से बदहाल हालत में भोपाल के साँईं बाबा मंदिर परिसर में रह रहे थे। यहाँ तीन दिन पहले ही उनकी पहचान उजागर हुई और इसके एक दिन बाद वह गायब हो गए। कला बिरादरी ने इस पर चिंता जताई है। लेकिन इस घटना ने एक साथ कई सवालों को हमारे सामने ला खड़ा किया है। मध्यप्रदेश में कला-संस्कृति के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। उसके बावजूद प्रदेश में कलाकारों की स्थिति दयनीय बनी हुई है।

चापलूस और चाटुकार अफ़सरों से घिरे नेता आखिरकार प्रदर्शनियों,मेलों,सेमिनारों और गोष्ठियों के उदघाटन में उलझकर रह गये हैं। कुछ अधिकारी नेताओं को साधने की काबिलियत के दम पर एक साथ कई महकमों को सम्हाले हुए हैं। फ़िल्म विकास निगम बंद होने के बाद श्रीराम तिवारी ने अचानक ऎसी कौन की योग्यता हासिल कर ली कि वे एक साथ वन्या प्रकाशन,स्वराज संस्थान और संस्कृति संचालक के पद पूरी कुशलता से सम्हाल रहे हैं ? महँगी पुस्तकें छपवाकर स्टोर रुम में दीमकों के हवाले करने,महँगे निमंत्रण पत्र छपवाकर वितरित करने या राजधानी के अखबारों के तीन-चार पत्रकारों को साधकर कला संस्कृति से जुड़ी खबरों का बेहतरीन डिस्प्ले ही कला जगत के विकास और उत्थान का पैमाना हो,तो बात दूसरी है ।

सरकारी उपेक्षा झेलते हुए ध्रुपद गायिका असगरीबाई के लिये जीने से ज़्यादा मरना मुश्किल हो गया था । सरकारी तंत्र अपनी भूल स्वीकारने या सुधारने की बजाय बेहयाई से उससे पल्ला झाड़ने का प्रयास करता रहा है । एक बारगी मान भी लिया जाये कि मुकुल शराब या किसी और तरह के नशे के आदी हैं,तो क्या उनके पुनर्वास का दायित्व सरकार का नहीं ..? इतने बड़े कलाकार को लोगों से दो-दो रुपए माँगना पड़े क्या ये सरकार के दामन पर दाग नहीं ? ये नौबत क्यों आई क्या इसका पता लगाना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं । कुमार गंधर्व की विरासत को सम्हालने वाले इतने नामचीन कलाकार की देखभाल का ज़िम्मा भी क्या संस्कृति महकमा नहीं उठा सकता? यह वाकया विभाग के अफ़सरों की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता की कलई खोलने के लिये काफ़ी है।

मुख्यमंत्री की छबि गढ़ने का श्रेय लेने वाले एक स्वनामधन्य कवि हृदय आला अफ़सर का तर्क है कि हर कलाकार का अपना अंदाज़ होता है । जिसे हम दुर्दशा मान रहे हों,हो सकता है मुकुल शिवपुत्र को उस तरह का जीवन रास आता हो । उन्हें सरकार की ओर से किये जा रहे प्रयासों में कोई कमी नज़र नहीं आती । बल्कि वे तो इस तरह की खबरें उजागर करने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं ।

इनकी समझ की दाद देना ही चाहिए। माना कि कलाकार मस्तमौला प्रकृति का होता है। संगीत शिरोमणि पं.कुमार गंधर्व के ज्येष्ठ चिरंजीव मुकुल शिवपुत्र के बारे में ये बात काफ़ी हद तक सच भी है। उन्हें बचपन से ही घर आँगन में सुर की संगत मिली । ख्याल के अलावा भक्ति और लोकगीत पसंद करने वाले मुकुल ने संस्कृत में भी संगीत रचनाएँ तैयार कीं। सूफ़ियाना तबियत के मुकुल ऐसे गायक हैं जिन्हें अपने आपको बताने और अपना गाना सुनाने की कोई उत्तेजना नहीं है । मन लग गया तो गाएंगे-आपके जी में आए जो कर लीजिये। जैसे एक कलाकार होता है फ़क्कड़ तासीर और बिना किसी उतावली वाला । वे पूछते हैं मन की वीणा के सुरों से कि आज परमात्मा का क्या आदेश है मेरे गले के लिये। वे ऐसे कलाकार हैं ,जो बस अपने आप को सुनना चाहते हैं।

मुकुल के बहाने प्रदेश के कला कर्मियों को मौका मिला है कि वे सीधे मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुँचा सकें । प्रदेश में सत्ता और प्रशासन से नज़दीकियाँ बढ़ाकर मलाई खाने वाले संस्कृति कर्मियों से कहीं बड़ी तादाद उन लोगों की है,जो सही मायनों में कला साधक और सृजक हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे संस्कृति विभाग में इनकी कोई सुनवाई नहीं ।

कोई कथा-कहानी के लिये कलम थामने की बजाय इलाज की खातिर खतो-किताबत में मसरुफ़ है, तो कोई दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में रचनाओं की बजाय घर का सामान एक-एक कर बेचने के लिये मजबूर है। कहते हैं साहित्यकार और कलाकार किसी भी राज्य की खुशहाली और समृद्धि का आईना होते हैं। कलाकारों की आह और कराह लेकर क्या कोई भी राज्य तरक्की के सोपान पर कदम आगे बढ़ा सकेगा ?

शनिवार, 24 जनवरी 2009

कर्मचारियों के बहाने गौर ने साधा निशाना

मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर के एक बयान पर बवाल मचा गया है । प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके श्री गौर ने पिछले हफ़्ते कहा था कि " जिसे काम नहीं करना होता ,वह सरकारी नौकरी में आता है ।" उन्होंने ये भी कहा कि सरकारी कर्मचारी सुस्त हैं और प्रदेश के विकास में बाधक भी ।

उनके इस बयान से भडके कर्मचारी लामबंद हो गये हैं । कर्मचारी संगठनों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है । कर्मचारियों का कहना है कि नेता और मंत्री तो महज़ घोषणाएं करके वाहवाही लूटते हैं । सरकारी कामकाज तो कर्मचारियों के बूते ही होता है । लेकिन कर्मचारियों की नाराज़गी से बेपरवाह श्री गौर अब भी अपनी बात पर अडे हैं । उनकी निगाह में सरकारी मुलाज़िम अलाल और मुफ़्तखोरी के आदी हैं ।

जिन लोगों का सरकारी दफ़्तरों से साबका पडा है उन्हें गौर के बयान में शब्दशः सच्चाई दिखाई दे सकती है । ये भी सही है कि कार्यालयों में टेबलों पर पडी फ़ाइलों की महीनों धूल तक नहीं झडती । चाय - पान के ठेलों पर कर्मचारियों का मजमा जमा रहता है । ऑफ़िस का माहौल बोझिल और उनींदा सा बना रहता है । ऊंघते से लोग हर काम को बोझ की मानिंद बेमन से करते नज़र आते हैं । मगर इस सब के बावजूद सरकार का कामकाज चल रहा है तो आखिर कैसे ..?

गौर जैसे तज़ुर्बेकार और बुज़ुर्गवार नेता से इस तरह के गैर ज़िम्मेदाराना बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती । हो सकता है ज़्यादातर कर्मचारी अपने काम में कोताही बरतते हों । उनकी लापरवाही से कामकाज पर असर पडता हो । लेकिन कुछ लोग ऎसे भी तो होंगे जो अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार हों और अपने काम को पूरी मेहनत और लगन से बखूबी अंजाम देते हों । ऎसे में सभी को एक ही तराज़ू में तौलना कहां तक जायज़ है ? क्या ये ठीक माना जा सकता है कि सभी कर्मचारियों को निकम्मा और कामचोर करार दिया जाए ?

चलिए कुछ देर के लिए मान लिया जाए कि गौर जो कह रहे हैं वो हकीकतन बिल्कुल सही है , तो ऎसे में सवाल उठता है कि इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है ? क्या उस सरकार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती जिसमें गौर खुद शामिल हैं ? क्या सरकारी मुलाज़िम निठल्ले होने के साथ - साथ इतने ताकतवर हो चुके हैं कि वे मंत्रियों पर भारी पडने लगे हैं ? बकौल गौर कर्मचारी प्रदेश के विकास में बाधक हैं , तो क्या जिस विकास के दावे पर जनता ने भाजपा को दोबारा सत्ता सौंपी ,वो खोखला था ? और अगर विकास हुआ तो आखिर किसके बूते पर ....?

दरअसल इस मसले को बारीकी से देखा जाए तो इसके पीछे कहानी कुछ और ही जान पडती है । लगता है गौर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा एक बार फ़िर बलवती होने लगी है । छठा वेतनमान मिलने में हो रही देरी से प्रदेश के कर्मचारी बौखलाए हुए हैं । ऎसे समय में गौर के भडकाऊ बयान ने आग में घी का काम किया है । प्रदेश में शिवराज सिंह के विकास के नारे को जिस तरह से जनता ने वोट में तब्दील किया उससे पार्टी में उनका कद अप्रत्याशित रुप से एकाएक काफ़ी तेज़ी से बढा है । दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल से निराश हो चुके कर्मचारियों की समस्याओं को ना सिर्फ़ शिवराज ने सुना - समझा और उनकी वेतन संबंधी विसंगतियों को दूर करने के अलावा सेवा शर्तों में भी बदलाव किया । दिग्विजय सिंह भी स्वीकारते हैं कि शिवराज कर्मचारियों के लाडले हैं और उन्हीं की बदौलत वापस सत्ता हासिल कर सके हैं ।

गौर की बयानबाज़ी शिवराज की उडान को थामने की कोशिश से जोड कर भी देखी जाना चाहिए । इसे लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र कर्मचारियों में असंतोष की चिंगारी को हवा देकर दावानल में बदलने की कवायद भी माना जा सकता है । यदि लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन मनमाफ़िक नहीं रहा , तो शिवराज का विरोधी खेमा इस मौके को भुनाने से नहीं चूकेगा । मुख्यमंत्री पद की शोभा बढा चुके गौर वैसे तो "सूबे के मुखिया" होने के ’हैंग ओवर’ से अब तक बाहर नहीं आ पाए हैं । पिछली सरकार में वाणिज्य कर मंत्री रहते हुए वे गाहे बगाहे दूसरे महकमों के कामकाज में भी दखल देते रहे हैं ।

शिगूफ़ेबाज़ी कर मीडिया की सुर्खियां बटोरना उनका शगल है । कभी भोपाल को स्विटज़रलैंड बनाने का ख्वाब दिखा कर , कभी बुलडोज़र चलाकर , तो कभी इंदौर और भोपाल में मेट्रो ट्रेन चलाने की लफ़्फ़ाज़ी कर लोगों को लुभाने की कोशिश करने वाले गौर ने 2006 में प्रदेश को पॉलिथीन से पूरी तरह निजात दिलाने का शोशा छोडा था । कुछ दिन बाद पॉलिथीन निर्माता कंपनियों का प्रतिनिधिमंडल गौर से मिला । इसके बाद ना जाने क्या हुआ ....?????? प्रदेश में पॉलिथीन का कचरा दिनोंदिन पहाड खडे कर रहा है ।