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बुधवार, 20 जनवरी 2016

मध्यप्रदेश का घोटाला पुराण


257 साइट्स को 12 करोड़ 73 लाख 23 हजार 527 रुपए    59 चैनलों को 80 करोड़ 53 लाख 68 हजार 306 रुपए का भुगतान 
लोकल चैनल को 73 करोड़
107 प्रचार संस्थाओं को 57 करोड़ 80 लाख 68 हजार 793
केवल एक ही संस्था को 21 करोड़ से ज्यादा

 किस चैनल को कितना भुगतान 
एबीपी न्यूज़              12 करोड़ 76 लाख
सहारा समय              12 करोड़ 50 लाख
इंडिया न्यूज़               8 करोड़ 68 लाख        
सीएनबीसी आवाज          6 करोड़ 50 लाख
ज़ी मीडिया                6 करोड़ 10 लाख
टाइम्स नाउ               1 करोड़ 39 लाख
न्यूज़ वर्ल्ड                1 करोड़ 28 लाख
टी वी उर्दू               लगभग 1 करोड़
एनडीटीवी                 12 लाख 84 हजार
 मध्यप्रदेश के स्थानीय चैनल
टीवी मध्यप्रदेश       13 करोड़
बंसल न्यूज़            11 करोड़ 57 लाख
साधना न्यूज़ मध्यप्रदेश   8 करोड़ 78 लाख
दूरदर्शन               मात्र 8 लाख

लोकल चैनल आपरेटर
हाथवे इंदौर                        50 लाख
सुदर्शन न्यूज़                      14 लाख
सिटी केबल                        84 लाख
भास्कर मल्टीनेट                    6 लाख 95 हजार
सेंट्रल इंडिया डिजिटल नेटवर्क          1 करोड़ 41 लाख

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

लोकतंत्र की दीमक


मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वक्त वो सब हो रहा है , जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । कल तक खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानकर शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ़ खेमेबंदी का झंडा उठाकर चलने वाले कैलाश विजयवर्गीय आज सरकार की झूठन समेट रहे हैं । चाहे वो मुरैना में हुई आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या का मामला हो , महज़ सात सालों में अरबपति बने दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के सीधे ताल्लुकात का मुद्दा हो या कोल ब्लॉक आवंटन मामले में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल हों । मुख्यमंत्री मुँह में दही जमा कर बैठे हैं और कैलाश विजयवर्गीय उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं । गोया कि सूबे के मुखिया बनने का ख्वाब हुआ हवा , अब तो आलम ये है कि कुर्सी बचाए रखने के लिए चौहान की चरणोदक पीने में भी गुरेज़ नहीं रहा ।

 रही सही कसर एमपीसीए के चुनाव में मिली करारी मात ने निकाल दी । धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए माधवराव सिंधिया ने क्लीन स्वीप कर दिया । कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र के सभी हथकंडे अपनाए ,मगर वो भूल गए कि गली-कूचों में “भिया और भिडु “ तैयार करके विधायकी हासिल करना अलग बात है , भद्र और कुलीन समाज का खेल माने जाने वाले क्रिकेट की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना और बात । 

इसी तरह देश के इतिहास में शायद ये पहला ही मौका होगा , जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो सौ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के हुजूम ने इंदौर में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल दिया । संघी मनोज परमार मामले के जाँच अधिकारी के एकाएक तबादले से नाराज़ थे । सूबे के मुखिया के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी कर रहे इन कार्यकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को प्रताड़ित कर रही है । इंदौर इन दिनों गैंगवार और माफ़िया की गिरफ़्त में फ़ँस कर कराह रहा है । मगर इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं । भाजपा समर्थक व्यापारी प्रशासन से गुँडाराज से छुटकारा दिलाने की गुहार लगा रहे हैं ।

प्रदेश के मुखिया हवाई सफ़र, विदेश भ्रमण, तीर्थाटन, देवदर्शन या फ़िर प्रदेश के रमणिक स्थलों पर परिवार के साथ सुस्ताने में व्यस्त रहते हैं । इन गतिविधियों से कभी कुछ वक्त मिल जाता है , तो मीडिया का चोंगा थाम कर देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपने “अनमोल वचन” प्रसारित करके उपस्थित दर्ज कराते रहते हैं । "मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थूकने" की प्रवृत्ति के पोषक मुख्यमंत्री प्रदेश की हर बड़ी घटना पर मुँह सिलकर बैठ जाते हैं । ऎसे मौके पर नरोत्तम मिश्र या कैलाश विजयवर्गीय को आगे कर दिया जाता है । लोग मायावती के प्रचार अभियान पर सरकारी खज़ाने के १२० करोड़ रुपए फ़ूँक दिए जाने पर गाल बजाते हैं । यदि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह की ब्रांडिंग पर जनसंपर्क, वन्या , खेल और तमाम अन्य महकमों के मद से लुटाए गए खज़ाने का अनुमान लाया जाए , तो ये किसी भी सूरत में ३५० करोड़ रुपए से कम नहीं बैठेगा ।

इसके अलावा यह भी एक दिलचस्प खबर है कि सूबे के मुखिया औसत हर रोज़ दो घंटे हवाई यात्रा में बिताते हैं । सब कुछ हवा में ही है, ज़मीन पर कुछ नहीं अगर है भी तो बस पोलपट्टी । यही नतीजा है कि भाजपा के ज़िला पदाधिकारी भी अपना सिर पीट रहे हैं । वे कहते हैं कि ज़िलों में ना सड़क है ना बिजली और ना ही पानी , बरसात में तो हालात बदतर हो चुके हैं , ऎसे में जनता को क्या जवाब दें ? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे चुनाव में जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएँगे ? अधिकांश पदाधिकारी मानते हैं कि इन्हीं मुद्दों को लेकर दिग्विजय सिंह को सत्ता से उखाड़ फ़ेंकने वाली जनता अब भाजपा को सबक सिखाने का मूड बना रही है । मगर दिल्ली की चाँडाल – चौकड़ी को हफ़्ता पहुँचाकर अपनी कुर्सी बचाए रखने वालों का जनता के सुख-दुख से क्या सरोकार ?

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ  के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी प्रदेश सरकार की कारगुज़ारियों पर अँगुली उठाते रहे हैं । ये अलग बात है कि  भाजपा सरकार की मुखालफ़त की उन्हें भारी कीमत चुकाना पड़ी । सच बोलने की सज़ा के तौर पर उन्हें असंवैधानिक तरीके से पद से हटा दिया गया , करीब पंद्रह दिन जेल की सलाखों के पीछे फ़ेंका गया सो अलग । हाल ही में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भोपाल में आयोजित अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम में पहुँचे श्री शर्मा ने प्रदेश सरकार को यूपीए सरकार से भी चार गुना ज़्यादा भ्रष्ट करार देकर सबको सकते में डाल दिया ।

 अपनी साफ़गोई के लिए पहचाने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा जैसे लोगों को सत्ता का रोग मानते हैं । खून- पसीने से पार्टी को सींच कर यहाँ तक पहुँचाने वालों की कतार में शामिल रहे श्री शर्मा का कहना है कि संकट के समय ये लोग नहीं दिखेंगे, उस समय काम आयेंगे त्यागी और सिद्धांतनिष्ठ कार्यकर्ता । मगर उनकी इस नसीहत की आखिर ज़रुरत किसे है? अपना तो क्या चाचा के मामा के ताऊ के फ़ूफ़ा  तक की पुश्तों का इंतज़ाम कर चुके इन सत्ताधीशों को क्या लेना देश से ,यहाँ की जनता से , भारत के लोकतंत्र से ।

दरअसल इस देश में इस तरह के लोकतंत्र की कोई ज़रुरत ही नहीं है । देश में भ्रष्टाचार के मूल में लोकतंत्र के नाम पर खड़े किये गये चूषक तंत्र ही हैं । मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आखिर इस देश में दिल्ली से लेकर गाँवों की गली-कूचों तक जनप्रतिनिधियों के नाम पर खड़े किए गए इन सत्ता के दलालों की ज़रुरत क्यों है ? अगर देश के नेता सिर्फ़ दलाली खाने के लिए ही हैं तो इनका खर्च जनता क्यों उठाए ? राष्ट्र्पति शासन में भी तो सरकारी मशीनरी बिना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बेहतर और सुचारु ढंग से काम करती है । गौर करने वाली बात यह भी है कि जब से नगर निगम और नगर पालिकाएँ बनीं तबसे अव्यवस्थाएँ और गंदगी फ़ैली । महापौर और पार्षद रातोंरात करोड़पति बन गए ,मगर शहरों की हालत बद से बदतर होती गई । यही हाल ग्राम स्वराज के नाम पर खड़ी की गई पंचायती राज व्यवस्था का है । पंच-सरपंच पजेरो में सैर कर रहे हैं लेकिन गरीब आदमी सूखे निवालों से भी महरुम है । यानी अब लोकतंत्र  की दीमकों से छुटकारा पाने के लिए सत्ता बदलने की नहीं , देश चलाने के लिए नय रास्ता तलाशने का वक्त है ।

शनिवार, 21 मई 2011

महँगाई से निपटने का एकमात्र हथियार-भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होने वाले आंदोलन अधिकतर भारतीयों की इसी सोच को साबित करते हैं कि देश में करप्शन दिनों-दिन बढ़ रहा है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी गैलप के मुताबिक वर्ष 2010 में करीब 47 फ़ीसदी लोगों ने माना कि 5 साल पहले की तुलना में भारत में करप्शन बढ़ा है,जबकि 27 प्रतिशत को घूसखोरी के पैटर्न में कोई तब्दीली नज़र नहीं आती। 78 प्रतिशत लोगों की राय में सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। वहीं 71 प्रतिशत लोगों का मानना है कि व्यापार जगत में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लोग भ्रष्टाचार को लेकर खुद को कितना असहाय महसूस कर रहे हैं और उनमें कैसी छटपटाहट है,इसकी एक मिसाल अप्रैल में दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन के दौरान देखने को मिली थी। हाल ही में जारी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की लड़ाई को मिले व्यापक जन समर्थन और इस तरह के आंदोलनों से भारतीयों की हताशा जाहिर होती है। रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादातर भारतीय इस समस्या की समाज में गहराई तक पैठ बनाने की सच्चाई को स्वीकार चुके हैं।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि बेरोज़गार और युवा तबका उम्मीदों के बोझ तले हालात के आगे घुटने टेकता दिखाई देता है। तकरीबन 65 प्रतिशत बेरोजगारों की राय में सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के ठोस कदम नहीं उठा रही है। सर्वे के अनुसार लोगों को नहीं लगता कि हालात सुधर रहे हैं और वे व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार से लड़ सकते हैं। सर्वे में 6 हज़ार वयस्कों से सीधे इंटरव्यू किया गया।

दूसरी तरफ़ वित्त और निवेश जगत की नामचीन हस्तियाँ कहने लगें कि भारत में शासन संबंधी स्थितियों को लेकर निराशा का माहौल बन गया है,तो ऎसे में देश की व्यवस्था संबंधी खामियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। मशहूर अमेरिकी फर्म जेपी मॉर्गन के एक प्रमुख अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह बेलाग कहा है कि आम तौर पर भारत को लेकर आज छवि नकारात्मक है और निवेशक अब हताश होने लगे हैं। उन्होंने यह बात विदेशी निवेशकों के संदर्भ में कही है,लेकिन भारत में लोगों की राय भी आज इससे बेहतर नहीं है।

सुरसा सा मुँह फ़ैलाती महँगाई की ओर से मुँह फ़ेर चुकी सरकारों को देखकर लगता है, मानो देश के औद्योगिक विकास के लिये देश में जान बूझकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया है। व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सबसे भ्रष्ट अफ़सरों की ज़बरदस्त पूछ है। सरकार की आवाज़ समझे जाने वाले महकमे में तो जैसे कलेक्शन सेंटर खोल दिया गया है। यथासमय दान-दक्षिणा पहुँचाने के एवज़ में लूटखसोट की खुली छूट दे दी गई है। देश के जाने माने शिक्षा संस्थान जहाँ मोटी फ़ीस लेकर पत्रकारिता की डिग्री देते हैं। वहीं इन सरकारी महकमों में ऎरे-गैरे नत्थू खैरे शुरुआती भेंट पूजा के साथ बाकायदा काम पा रहे हैं। आलम यह है कि असली पत्रकार धीरे-धीरे गायब हो चुके हैं। अब स्कूली शिक्षक, कपड़ा व्यापारी, अकाउंटेंट सरीखे लोगों का डंका बज रहा है। एक काँख में काँग्रेस और दूसरे में बीजेपी को दबाये घूमने, बड़े नेताओं को साधने और आला अफ़सरों को खरीदने का हुनर जानने वाले बरसों बरस एक ही जगह जमे रहकर मौज करते हैं और नियम कायदों पर चलने वालों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। वोट बैंक की खातिर समाज के आखिरी छोर पर खड़े लोगों को भी मुफ़्त बिजली,पानी,राशन,ज़मीन और मकान देकर खरीद लिया गया है।

अन्ना के अनशन से एक कारगर लोकपाल की स्थापना की उम्मीद बनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर जिस हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है, उसका क्या हल हो, इस सवाल पर आम लोग से लेकर विशेषज्ञ तक किंकर्तव्य्विमूढ़ हैं। इस असहायता से ही वह हताशा पैदा हो रही है, जिसका असर अब देश की विकास पर पड़ने लगा है। हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों पर न्यायपालिका ने जबरदस्त सख्ती से कई बड़े घोटालों की जाँच में चुस्ती आई है । नतीजतन कई धुरंधर सलाखों के पीछे हैं, मगर इससे आम आदमी का भरोसा लौटता नहीं दिख रहा है।

कहते हैं, जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। लिहाज़ा भ्रष्टाचार की हिस्सेदारी थोड़ी ही सही कमोबेश देश का हर नागरिक कर रहा है। कई मर्तबा लगता है मुफ़्तखोरी ने हमारे जेनेटिक कोड को ही खराब कर दिया है। ऎसे में सुधार की संभावनाएँ ना के बराबर हैं। सुनते हैं विध्वंस में ही सृजन छिपा है। विनाश में ही नई उम्मीद का बीज मौजूद है। कई भविष्यवक्ताओं ने आज २१ मई का दिन मुकर्रर किया था पृथ्वी के खात्मे के लिये, मगर शाम होने आई अब तक तो कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। भ्रष्टाचारियों की राह के रोड़े हम जैसे लोगों को अब अगली किसी तारीख का इंतज़ार करना होगा।

कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअययन है,नींद क्यों रात भर नहीं आती ।

गुरुवार, 4 जून 2009

भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते नौकरशाह

नौतपा कभी तीखे तो कभी नरम तेवर दिखाकर बिदा हो गया । उमस भरे माहौल में अब सभी लोग आसमान की ओर टकटकी लगाकर निहारने लगे हैं कि झूमकर कब बरसेंगे काले बादल ! मानसून के मौसम के आने की आहट ने सरकारी महकमों में भी हलचल मचा दी है । विधानसभा चुनावों की भारी सफ़लता पर इतराती भाजपा को आम चुनावों में मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया । अचानक मिले इस आघात को सत्तारुढ़ दल अब तक पचा नहीं पा रहा है । लेकिन हकीकत तो हकीकत ही रहेगी । सो आधे-अधूरे मन से सच्चाई को कभी स्वीकारते तो कभी नकारते हुए पार्टी आगे बढ़ चली है ।

कहावत है " कुम्हार कुम्हारिन से ना जीते,तो दौड़ गधैया के कान उमेठे ।" सो प्रदेश में भाजपा भी अपनी अँदरुनी कमियों की ओर से आँखें मूँदकर नौकरशाही और सरकारी अमले पर हार का ठीकरा फ़ोड़ने पर आमादा है । सरकारी अधिकारियों को हार के लिये ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है कि अमले ने सरकार की योजनाएँ ठीक तरह से जनता तक नहीं पहुँचाईं । ज़ाहिर है अपराध किया है तो दंड भी मिलेगा । सरकार की नाराज़गी मलाईदार पदों से हटाने की कवायद के तौर पर सामने आना लगभग तय है । एक स्थानीय चैनल मंदी के दौर में भी ’तबादला उद्योग’में एकाएक आई तेज़ी का ब्यौरा दे रहा था कि जैसा पद वैसी भेंट-पूजा । लिपिक वर्ग के लिये पच्चीस हज़ार से शुरु होने वाला आँकड़ा नौकरशाहों तक पहुँचते-पहुँचते लाखों में तब्दील हो जाता है ।

बहरहाल राजधानी में हींग लगे ना फ़िटकरी वाले इस मुनाफ़े के व्यवसाय के कर्ता-धर्ता सक्रिय हो चुके हैं । दलालों ने भी अपनी जुगाड़ लगाना शुरु कर दी है । कई छुटभैये नेता और पत्रकार तो तबादलों के मौसम में इतनी चाँदी काट लेते हैं कि उन्हें अगले कुछ साल हाथ-पैर हिलाने की कोई ज़रुरत ही नहीं । मगर हमेशा की तरह मेरी मोटी बुद्धि में यह बात नहीं घुस पाती कि तबादलों के ज़रिये प्रशासनिक सर्जरी के नाम पर हर साल तबादलों पर सरकारी खज़ाने से करोड़ों रुपए फ़ूँक दिये जाते हैं । महीने-दो महीने सारी मशीनरी ठप्प पड़ जाती है । कुछ दिन बाद पैसा ,पॉवर और संपर्कों के दम पर जहाँ था-जैसा था की स्थिति बन ही जाती है ।

ये बात गौर करने वाली है कि नौकरशाही का काम सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना नही,बल्कि उन्हें सही तरीके से अंजाम देना है । अगर वह अपने काम को बखूबी अंजाम देने में नाकाम रहती है तो राजनेता भी अपनी ज़िम्मेदारी से बरी नहीं हो सकते,क्योंकि घुड़सवारी का नियम कहता है कि घोड़े की क्षमता घुड़सवार की काबीलियत पर निर्भर करती है । बार- बार तबादले करने की रणनीति नेताओं की तिजोरी तो भर सकती है लेकिन सरकारी अमले के मनोबल और खज़ाने पर इसका विपरीत असर ही पड़ता है । तबादले दंडित करने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की चाहत अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के सिवाय कुछ भी नहीं ।

वैसे नौकरशाह भी कुछ कम नहीं । आमतौर पर नेताओं के भ्रष्टाचार को लेकर तो लोग खूब बातें करते हैं और गाहे बगाहे उनका गुस्सा फ़ूटते भी देखा गया है । लेकिन दीमक की तरह सरकारी खज़ाने को बरसों-बरस चट करने वाले नौकरशाहों का क्या कीजियेगा ? प्रक्रियात्मक पेचीदगियों के बूते कानून और अधिकारों को अपने कब्ज़े में रखने वाली नौकरशाही पर लगाम लगाना किसी भी सरकार के लिये आसान काम नहीं है । देश के विकास और जनकल्याण की राह में लालफ़ीताशाही सबसे बड़ा रोड़ा है ।

देश में नौकरशाहों के "नौ दिन चले अढ़ाई कोस" वाले रवैये से तो सब वाकिफ़ हैं ,लेकिन कामकाज और क्षमता के मामले में भी वे फ़िसड्डी साबित हुए हैं । दूर देश में हुए सर्वे की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है । एशिया के 12 देशों में काम कर रहे 1275 विशेषज्ञों रायशुमारी के आधार पर तैयार सर्वे कहता है कि भारत में आम आदमी को प्रशासनिक प्रणाली के सुस्त रवैये से हर दिन रुबरु होना पड़ता है । केन्द्र और राज्य स्तर के सभी अधिकार इन्हीं के पास रहते हैं । हांगकांग की पॉलिटिकल और इकॉनॉमिक रिस्क कंसलटेंसी की ओर से कराये गये सर्वे में सिंगापुर कामकाज के मामले में लगातार तीसरी बार अव्वल रहा,वहीं भारत बारह देशों के इस सर्वे में सबसे आखिरी पायदान पर है ।

वैसे एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि हमारे यहाँ के नौकरशाह काम करने के मामले चाहे जितने फ़िसड्डी हों लेकिन भ्रष्ट आचरण के मामले में नेताओं के साथ "ताल से ताल " मिलाते नज़र आते हैं । हाल के सालों में भ्रष्टाचार के शिखर पर काबिज़ राजनेताओं का अनुसरण करने में नौकरशाह ’बेजोड़’साबित हुए हैं । बर्लिन की संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर 2009 जारी किया है ,जिसके आँकड़े बताते हैं कि भारत में राजनीतिक दल सबसे भ्रष्ट संस्था है । सर्वे में 58 फ़ीसदी लोगों ने माना कि राजनीतिज्ञ सबसे ज़्यादा भ्रष्ट हैं । 13 लोगों ने नौकरशाहों को घूसखोरी के मामले में दूसरे नम्बर पर रखा है । ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल संगठन ने ही साल 2005 में एक अध्ययन कराया था जिसमें कहा गया था कि भारत में लोग बुनियादी सेवाएँ हासिल करने के लिए चार अरब अमरीकी डॉलर के बराबर रक़म हर साल रिश्वत के रूप में देते हैं । विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सालाना 210 अरब रुपए रिश्वत में दिए जाते हैं ।

एशिया के भ्रष्ट देशों की सूची में भारत नौवें स्थान पर है तो विश्व के 158 देशों की सूची में भारत 88वें स्थान पर है। भारत में भ्रष्टाचार की चर्चा जितनी चाहे हो चुकी हो फिर भी ये आंकड़े चौंका देते हैं । सुन कर लगता है मानो पूरे देश ने भ्रष्टाचार के सामने घुटने ही टेक दिए हों। हम इसके प्रति इतने उदासीन हो गए हैं कि भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है । मगर भ्रष्टाचार क्या देश की सांस्कृतिक सच्चाई बन गया है या इसके दूसरे कारण भी हैं ।

कई लोग कहते हैं कि देश में लोकतंत्र की परिपक्वता की कमी की वजह से भ्रष्टाचार फैल रहा है । दूसरी तरफ़ यह कड़वी सच्चाई है कि लोकतंत्र की जड़ें और कमज़ोर करने में भी भ्रष्टाचार की बड़ी भूमिका होती है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 40 प्रतिशत न्यायिक मामल रिश्वत के बल पर प्रभावित किए जाते हैं और भ्रष्ट सरकारी अमलों में पुलिस सबसे ऊपर है । यह समझने के लिए किसी अर्थशास्त्री की ज़रूरत नहीं है कि ग़रीबों का सबसे बड़ा दुश्मन भ्रष्टाचार ही है जो उसे रोटी,अवसर और अधिकारों से दूर करता है । नेताओं को तो चुनाव में जनता सबक सिखा ही देती है ,लेकिन नियुक्ति के बाद चालीस-पैंतालीस साल बेखौफ़ और बेफ़िक्र होकर सरकार को चूना लगानी वाली बेलगाम नौकरशाही की नाक में नकेल कौन कसेगा और कैसे ....??????

मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

नेताओं के आगे प्रजातंत्र की शिकस्त

सत्ता के सेमीफ़ायनल का नतीजा आ चुका है । कहा जा सकता है कि मुकाबला बराबरी का रहा । कांग्रेस के पास खोने को सिर्फ़ दिल्ली था , लेकिन दिल्ली के साथ राजस्थान मे मिली जीत ने पार्टी को उम्मीद से दुगना पाने के एहसास भर दिया है । बीजेपी तीन राज्यों की सत्ता फ़िसलने की आशंका से घिरी थी , मगर हार मिली सिर्फ़ राजस्थान में । यानि दोनों ही खेमों के पास खुशियां और गम मनाने के कारण मौजूद हैं ।

हिन्दी बेल्ट के मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ , राजस्थान और दिल्ली के नतीजों से जो बात उभर कर आई है , वह ये कि देश की राजनीति में व्यक्तिवाद की पुनर्स्थापना । इन चारों राज्यों में चुनाव कुछ व्यक्तियों के इर्द - गिर्द ही केन्द्रित रहे । इन सभी प्रदेशों में पार्टियां और उनके सिद्धांत भी हाशिए पर चले गए ।

फ़ौरी तौर पर व्यक्तिवाद भले ही राजनीतिक दलों के लिए फ़ायदेमंद साबित हो , लेकिन आगे चलकर यह पार्टियों के आंतरिक लोकतंत्र और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कतई फ़ायदेमंद नहीं कहा जा सकता । भले ही चुनाव हो गये , लेकिन मुद्दे अनुत्तरित हैं । वैसे जनतंत्र में लीडर से बडी पार्टी होती है लेकिन इन सबसे ऊपर है देश ...।

चुनाव नतीजों को लेकर बैचेनी काफ़ी बढ गई है । कई लोगों से बातचीत के बाद सामने आए तथ्य हैरान कर देने वाले हैं । कुछ साल पहले तक भ्रष्टाचार सामाजिक रुप से अनैतिक माना जाता था । धीरे - धीरे इसे मान्यता मिलने लगी और अब तो आलम ये है कि भ्रष्टाचारी ही समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानित है ।

मतदाताओं के लिए भ्रष्टाचार अब कोई मुद्दा ही नहीं है । हर शख्स चाहता है कि उसका हरेक काम , गलत हो या सही , हर हाल में होना ही चाहिए , चाहे फ़िर इसकी कोई भी कीमत चुकाना पडे । मुम्बई हमले पर हाहाकार मचाने वाला यह देश सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों से ईमानदारी चाहता है , लेकिन खुद कदम - कदम पर घूस लेना चाहता है । गलत को सही का जामा पहनाने के लिए पैसे का ज़ोर आज़माने से भी कोई परहेज़ नहीं ।

पैसों का लेन देन अब दस्तूर बन चुका है । इस लिए मंहगाई भी कोई मुद्दा नहीं रही । इस चुनाव में देश में अमन चैन यानि आतंकवाद से निजात के मसले पर निजी हित भारी पडते दिखाई दिए । लोगों की सोच इतनी संकुचित हो गई है कि देशहित कहीं पीछे ,काफ़ी पीछे छूट गया है । कुछ युवाओं से बातचीत में पता चला कि उन्होंने सत्तारुढ दल को लाने के लिए थोकबंद वोट दिए , ताकि कालेज में संचालित पाठ्यक्रम पर लटक रही स्टे की तलवार से छुटकारा मिल सके । कुछ ने नियमित होने की लालसा और कुछ ने गली की सडक के सुधरने की आस में मौजूदा सरकार को ही दोबारा सत्ता सौंपने का फ़ैसला लिया ।

नेताओं ने इसे जनतंत्र की जीत बताया है । लेकिन क्या वाकई गणतंत्र जीत गया । नेताओं के छलावे में आकर बडे मुद्दों को दरकिनार करके देश कितने सालों तक प्रजातंत्र का जश्न मना सकेगा ...? कल चाहे जो भी पार्टियां जीती हों लेकिन देश एक बार फ़िर हार गया । जनतंत्र की इतनी करारी हार पर मन बहुत व्यथित है । चुनाव परिणाम डॉक्टर की उस जांच रिपोर्ट की मानिंद लगते हैं , जिसमें मरीज़ को लाइलाज बीमारी से ग्रस्त पाया गया हो । ६३ बरस के भारत की जर्जर - बीमार देह को भलिभांति सेवा टहल की सख्त ज़रुरत है । लेकिन बूढों के लिए आश्रम बनाने वाले इस खुदगर्ज़ समाज से क्या ये उम्मीद वाजिब है ............?
मियाँ मैं हूँ शेर , शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मैं लहज़ा नर्म भी कर लूं, तो झुंझलाहट नहीं जाती
किसी दिन बेखयाली में कहीं सच बोल बैठा था
मैं कोशिश कर चुका हूँ , मुँह की कडवाहट नहीं जाती

रविवार, 9 नवंबर 2008

करोडपति बीडी मजदूर का राजनीतिक सफ़र

जनता की सेवकायी के लिए प्रदेश के धन कुबेर चुनावी मैदान में उतरे हैं । नामांकन दाखिल करते वक्त संपत्ति का ब्यौरा देने की मजबूरी ने जनसेवकों की माली हालत की जो तस्वीर पेश की है वह आंखें चुंधियाने के लिए काफ़ी है । ज़्यादातर नेता करोडपति हैं । कुछ तो ऎसे हैं , जो महज़ ५ - ७ साल पहले रोडपति थे अब करोडपति हैं । बचपन से सुनते आए हैं "सेवा करो , तो मेवा मिलेगा ।” शायद जनता की सेवकाई के वरदान स्वरुप ही नेताओं की माली हालत में रातों रात चमत्कारिक बदलाव आ जाता है ।

संपत्ति के खुलासे ने लोगों को चौंकाया है । कई नौजवान मुनाफ़े के इस व्यवसाय की ओर खिंचे चले आ रहे हैं । जनसेवा से मुनाफ़े की एक बानगी -
मुरियाखेडी में तेंदूपत्ता इकट्ठा करने वाला एक मजदूर महज़ दो साल में इतना पैसा कमा लेता है कि वह भोपाल में करोडों की जायदाद का मालिक बन जाता है । राजधानी की नरेला विधानसभा सीट से बीजेपी के उम्मीदवार की चुनाव आयोग को दी गई संपत्ति की जानकारी और उनके राजनीतिक सफ़र को मिलाकर देखने पर कुछ ऎसी ही सच्चाई नज़र आती है ।

अखबारों में छपे हर्फ़ों पर यकीन करें तो नामांकन पत्र के साथ अपनी सम्पत्ति की जानकारी देते हुए ’ गरीब बीडी मजदूर’ विश्वास सारंग ने जो शपथ-पत्र प्रस्तुत किया उसके अनुसार वे करोड़ों के कारोबार के स्वामी हैं । भोपाल, सीहोर व रायसेन में लाखों की जमीन है । भोपाल की निशात कालोनी में लगभग दो करोड़ साठ लाख की कीमत के आवासीय व व्यावसायिक भवन , अरण्यावली गृह निर्माण सहकारी समिति में ३२ लाख रुपए की जमीन, तीन गाँवों में सवा छह लाख की कृषि भूमि, मण्डीदीप स्थित विशाल पैकवेल इण्डस्ट्रीज में भागीदारी, कामदार काम्पलेक्स, दिल्ली के गोयला खुर्द में जमीन एग्रीमण्ट भी श्री सारंग के ही नाम पर है। नामांकन पत्र के साथ इन्होंने भोपाल नगरीय क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीबध्द होने के प्रमाण भी पेश किए हैं ।

अब मामले का दूसरा पहलू - विश्‍‍वास सारंग इन दिनों मध्य्प्रदेश लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष हैं । इस पद तक पहुंचने की पहली शर्त है - किसी प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति का नियमित सदस्य होना । इस समिति का सदस्य बनने के लिए दो शर्तें हैं । पहली - वह व्यक्ति उस सहकारी समिति के भौगोलिक क्षेत्राधिकार का स्थायी और नियमित निवासी हो । दूसरी - उस व्यक्ति के जीविकोपार्जन का आधार लघु वनोपज संग्रहण हो ।

श्री सारंग ने अध्यक्ष पद हासिल करने के लिए क्या - क्या पापड नहीं बेले । ‘प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति, मुरियाखेड़ी’ के भौगोलिक क्षेत्राधिकार वाले ग्राम और फड़ साँकल के निवासी श्री सारंग ने वन - वन भटक कर तेंदूपत्ता इकट्ठा किया । उन्होंने वर्ष २००७ में तेंदू पत्ता की ६०० और वर्ष २००८ में १२०५ गड्डियाँ संग्रहित कर २४ हज़ार तथा ४८ हज़ार २०० रुपये कमाए ।

लगभग सभी नेताओं की कहानी कमोबेश इसी तरह की है । सामान्य परिवारों के इन होनहार खद्दरधारी नेताओं का राजनीतिक सफ़र ज़्यादा लंबा भी नहीं है और ना ही किसी बडे पद पर कभी आसीन रहे । ऎसे में सवाल उठता है कि आखिर इस छ्प्पर फ़ाड ऎश्वर्य का राज़ क्या है ? राजनीति के सिवाय देश का कोई भी हुनर या पेशा इस रफ़्तार से दौलत कमाने की गारंटी नहीं दे सकता ।

देश के मतदाताओं अपने नेताओं की दिन दोगुनी रात चौगुनी बढती आर्थिक हैसियत का राज़ जानने के लिए ही सही , अब तो नींद से जागो । देखो किसे वोट दे रहे हो ....। तुम्हारा वोट किन - किन नाकाराओं को नोट गिनने और तिजोरियां भरने की चाबी थमा रहा है । मेरी राय में यदि कोई भी प्रत्याशी चुनाव के लायक ना हो ,तो वोट को बेकार कर दो , मगर वोट ज़रुर दो ।

लहू में खौलन , ज़बीं पर पसीना
धडकती हैं नब्ज़ें , सुलगता है सीना
गरज ऎ बगावत कि तैयार हूं मैं ।

[ यह पोस्ट माननीय विष्णु बैरागी जी के ब्लाग ’एकोsहम’ के आलेख से प्रेरित होकर लिखी गयी है । कुछ तथ्य उनकी पोस्ट ’ समाचार ना छपने का समाचार ’ से लिए गये हैं । ]