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सोमवार, 8 जुलाई 2013

सीडी की सियासत....!


मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री रहे राघवजी भाई को चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली बीजेपी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अस्सीवीं सालगिरह के मौके पर पचपन साल की सेवा के बदले में पार्टी की तरफ़ से दिया गया यह तोहफ़ा राघवजी भाई के लिए वाकई यादगार रहेगा। यूँ तो प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, अजय विश्नोई, ध्रुवनारायण सिंह समेत शिवराज मंत्रिमंडल के तमाम सदस्यों पर अनैतिक आचरण के आरोप लगते रहे हैं।लेकिन इससे पहले पार्टी ने कितने मामलों में सख्ती दिखाने की नज़ीर पेश की? फ़िर ऎसा भी नहीं है कि राघवजी पर इस तरह का आरोप पहली मर्तबा लगा हो। दो साल पहले भी अनैतिक यौनाचार के मामले में उन पर अँगुली उठी थी । तब भी सीडी की बात सामने आई थी लेकिन जल्दी ही मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

दरअसल यह नैतिक आचरण से ज्यादा सियासी मुद्दा है। भाजपा की अँदरुनी राजनीति के साथ ही पक्ष-प्रतिपक्ष के मिलीजुली "प्रदर्शन मुकाबले" के संकेत भी इस घटनाक्रम में साफ़ मिलते हैं। मध्यप्रदेश में पिछले सात सालों से जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसमें विपक्ष का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह वही ज़ुबान बोलते हैं, जो सूबे के मुखिया को रास आए। काँग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सत्ता में वापसी के लिए कोशिश करते हैं लेकिन अजय सिंह अपने बयानों या फ़िर अपने तौर तरीकों से इन प्रयासों में तुरंत ही पलीता लगा देते हैं ।

राघवजी के मामले में भी विशुध्द रूप से पटवा-सारंग गुट की सियासी शैली साफ़ झलकती है। इसी सियासी वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब चेले ने भी ऎन चुनावों के पहले वही दाँव फ़ेंका है। प्रधानमंत्री पद की रेस में अपना नाम खुद ही आगे बढ़ाने की जुगत में लगे सूबे के मुखिया इन दिनों किसी और ही गुणा-भाग में लगे हैं। वे विदिशा से अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा कर विधानसभा में पहुँचाने का इरादा रखते हैं। राघवजी के ५५ साल के राजनीतिक सफ़र को एक झटके में नगण्य कर दिया गया। लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी ने आनन फ़ानन में बगैर जाँच किए जिस तरह से राघवजी को बर्खास्त किया, वह भी कई संकेत छोड़ता है।

इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार के तौर पर शिवशंकर पटेरिया खुद सामने आए हैं । किसी जमाने में उमा भारती के खास रहे पटेरिया लम्बे वक्त से हाशिये पर हैं। वैसे वो मौके और वक्त की नज़ाकत के मुताबिक पाला बदलने में खासे माहिर हैं। इस सीडी कांड के बाद एकाएक सुर्खियों में आए पटेरिया "मुक्त कंठ" से जिस तरह "राग शिवराज" गा रहे हैं। नज़दीक आते चुनावों के मद्देनज़र उनकी उलट-बाँसी विधानसभा क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी को लेकर प्रदेश भाजपा में मचे घमासान का मुज़ाहिरा भी करती है।

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि हाल के दिनों में नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर सीधे और तीखे हमले किए थे। प्रदेश में परिवर्तन यात्राओं के दौरान अजय सिंह ने शिवराज सिह चौहान और उनकी पत्नी साधना सिंह पर कई आरोप लगाए और पत्र लिखकर जवाब भी माँगा। पावस सत्र के दौरान इस बार काँग्रेस एक बार फ़िर अविश्वास प्रस्ताव ला रही है। ऎसे में विपक्ष के आरोपों की धार को कुँद करने के लिए चला गया "अस्त्र" लगता है हमेशा की तरह निशाना पर लगा है। विपक्ष के वार की धा को भोथर करने में इसमें "फ़ूल छाप काँग्रेसियों" की भी भूमिका अहम है।

राघवजी के सीडी काँड के जरिए एक साथ कई निशाने साधे गए हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम पर सहमति जताने वाले संघ को भी इस बहाने अपनी ताकत का एहसास कराने की कोशिश की गई है। यानी इस समय सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है। 

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

लोकतंत्र की दीमक


मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वक्त वो सब हो रहा है , जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । कल तक खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानकर शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ़ खेमेबंदी का झंडा उठाकर चलने वाले कैलाश विजयवर्गीय आज सरकार की झूठन समेट रहे हैं । चाहे वो मुरैना में हुई आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या का मामला हो , महज़ सात सालों में अरबपति बने दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के सीधे ताल्लुकात का मुद्दा हो या कोल ब्लॉक आवंटन मामले में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल हों । मुख्यमंत्री मुँह में दही जमा कर बैठे हैं और कैलाश विजयवर्गीय उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं । गोया कि सूबे के मुखिया बनने का ख्वाब हुआ हवा , अब तो आलम ये है कि कुर्सी बचाए रखने के लिए चौहान की चरणोदक पीने में भी गुरेज़ नहीं रहा ।

 रही सही कसर एमपीसीए के चुनाव में मिली करारी मात ने निकाल दी । धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए माधवराव सिंधिया ने क्लीन स्वीप कर दिया । कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र के सभी हथकंडे अपनाए ,मगर वो भूल गए कि गली-कूचों में “भिया और भिडु “ तैयार करके विधायकी हासिल करना अलग बात है , भद्र और कुलीन समाज का खेल माने जाने वाले क्रिकेट की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना और बात । 

इसी तरह देश के इतिहास में शायद ये पहला ही मौका होगा , जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो सौ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के हुजूम ने इंदौर में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल दिया । संघी मनोज परमार मामले के जाँच अधिकारी के एकाएक तबादले से नाराज़ थे । सूबे के मुखिया के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी कर रहे इन कार्यकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को प्रताड़ित कर रही है । इंदौर इन दिनों गैंगवार और माफ़िया की गिरफ़्त में फ़ँस कर कराह रहा है । मगर इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं । भाजपा समर्थक व्यापारी प्रशासन से गुँडाराज से छुटकारा दिलाने की गुहार लगा रहे हैं ।

प्रदेश के मुखिया हवाई सफ़र, विदेश भ्रमण, तीर्थाटन, देवदर्शन या फ़िर प्रदेश के रमणिक स्थलों पर परिवार के साथ सुस्ताने में व्यस्त रहते हैं । इन गतिविधियों से कभी कुछ वक्त मिल जाता है , तो मीडिया का चोंगा थाम कर देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपने “अनमोल वचन” प्रसारित करके उपस्थित दर्ज कराते रहते हैं । "मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थूकने" की प्रवृत्ति के पोषक मुख्यमंत्री प्रदेश की हर बड़ी घटना पर मुँह सिलकर बैठ जाते हैं । ऎसे मौके पर नरोत्तम मिश्र या कैलाश विजयवर्गीय को आगे कर दिया जाता है । लोग मायावती के प्रचार अभियान पर सरकारी खज़ाने के १२० करोड़ रुपए फ़ूँक दिए जाने पर गाल बजाते हैं । यदि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह की ब्रांडिंग पर जनसंपर्क, वन्या , खेल और तमाम अन्य महकमों के मद से लुटाए गए खज़ाने का अनुमान लाया जाए , तो ये किसी भी सूरत में ३५० करोड़ रुपए से कम नहीं बैठेगा ।

इसके अलावा यह भी एक दिलचस्प खबर है कि सूबे के मुखिया औसत हर रोज़ दो घंटे हवाई यात्रा में बिताते हैं । सब कुछ हवा में ही है, ज़मीन पर कुछ नहीं अगर है भी तो बस पोलपट्टी । यही नतीजा है कि भाजपा के ज़िला पदाधिकारी भी अपना सिर पीट रहे हैं । वे कहते हैं कि ज़िलों में ना सड़क है ना बिजली और ना ही पानी , बरसात में तो हालात बदतर हो चुके हैं , ऎसे में जनता को क्या जवाब दें ? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे चुनाव में जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएँगे ? अधिकांश पदाधिकारी मानते हैं कि इन्हीं मुद्दों को लेकर दिग्विजय सिंह को सत्ता से उखाड़ फ़ेंकने वाली जनता अब भाजपा को सबक सिखाने का मूड बना रही है । मगर दिल्ली की चाँडाल – चौकड़ी को हफ़्ता पहुँचाकर अपनी कुर्सी बचाए रखने वालों का जनता के सुख-दुख से क्या सरोकार ?

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ  के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी प्रदेश सरकार की कारगुज़ारियों पर अँगुली उठाते रहे हैं । ये अलग बात है कि  भाजपा सरकार की मुखालफ़त की उन्हें भारी कीमत चुकाना पड़ी । सच बोलने की सज़ा के तौर पर उन्हें असंवैधानिक तरीके से पद से हटा दिया गया , करीब पंद्रह दिन जेल की सलाखों के पीछे फ़ेंका गया सो अलग । हाल ही में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भोपाल में आयोजित अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम में पहुँचे श्री शर्मा ने प्रदेश सरकार को यूपीए सरकार से भी चार गुना ज़्यादा भ्रष्ट करार देकर सबको सकते में डाल दिया ।

 अपनी साफ़गोई के लिए पहचाने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा जैसे लोगों को सत्ता का रोग मानते हैं । खून- पसीने से पार्टी को सींच कर यहाँ तक पहुँचाने वालों की कतार में शामिल रहे श्री शर्मा का कहना है कि संकट के समय ये लोग नहीं दिखेंगे, उस समय काम आयेंगे त्यागी और सिद्धांतनिष्ठ कार्यकर्ता । मगर उनकी इस नसीहत की आखिर ज़रुरत किसे है? अपना तो क्या चाचा के मामा के ताऊ के फ़ूफ़ा  तक की पुश्तों का इंतज़ाम कर चुके इन सत्ताधीशों को क्या लेना देश से ,यहाँ की जनता से , भारत के लोकतंत्र से ।

दरअसल इस देश में इस तरह के लोकतंत्र की कोई ज़रुरत ही नहीं है । देश में भ्रष्टाचार के मूल में लोकतंत्र के नाम पर खड़े किये गये चूषक तंत्र ही हैं । मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आखिर इस देश में दिल्ली से लेकर गाँवों की गली-कूचों तक जनप्रतिनिधियों के नाम पर खड़े किए गए इन सत्ता के दलालों की ज़रुरत क्यों है ? अगर देश के नेता सिर्फ़ दलाली खाने के लिए ही हैं तो इनका खर्च जनता क्यों उठाए ? राष्ट्र्पति शासन में भी तो सरकारी मशीनरी बिना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बेहतर और सुचारु ढंग से काम करती है । गौर करने वाली बात यह भी है कि जब से नगर निगम और नगर पालिकाएँ बनीं तबसे अव्यवस्थाएँ और गंदगी फ़ैली । महापौर और पार्षद रातोंरात करोड़पति बन गए ,मगर शहरों की हालत बद से बदतर होती गई । यही हाल ग्राम स्वराज के नाम पर खड़ी की गई पंचायती राज व्यवस्था का है । पंच-सरपंच पजेरो में सैर कर रहे हैं लेकिन गरीब आदमी सूखे निवालों से भी महरुम है । यानी अब लोकतंत्र  की दीमकों से छुटकारा पाने के लिए सत्ता बदलने की नहीं , देश चलाने के लिए नय रास्ता तलाशने का वक्त है ।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

क्या पहुँच पायेगी सीबीआई शहला मसूद के कातिलों तक

भोपाल का बहुचर्चित और सनसनीखेज़ शहला मसूद हत्याकांड भी अब नोयडा के आरुषि-हेमराज मामले की तर्ज़ पर आगे बढ़ रहा है। देश की सबसे काबिल जाँच एजेंसी सीबीआई ने शहला के कातिल का सुराग देने वाले को पाँच लाख का ईनाम देने की घोषणा के साथ ही इस मामले की नियति और परिणीति लगभग तय कर दी है । इससे पहले मध्यप्रदेश पुलिस ने कातिल तक पहुँचाने वाले को एक लाख रुपए देने का ऎलान किया था । तमाम भाजपा नेताओं के नाम सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ने आनन फ़ानन में जाँच सीबीआई को सौंपने की घोषणा तो कर दी,मगर कागज़ी खानापूर्ति नहीं होने के कारण पंद्रह दिनों तक  मामला अटका रहा । इस बीच स्थानीय पुलिस तफ़्तीश में जुटी रही । इस दौरान सबूत भी बखूबी खुर्द-बुर्द कर दिये गये और मामले का रुख भी बेहद चतुराई से दूसरी तरफ़ मोड़ दिया गया । सीबीआई अब तक इस मामले में करीब आधा दर्जन लोगों से पूछताछ कर चुकी है,पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है । पक्ष-विपक्ष की राजनीति को नज़दीक से समझने वाले आशंका जता चुके हैं कि इस मामले का हश्र भी रुसिया हत्याकांड  की तरह होना तय है । उस मामले में सुषमा स्वराज के करीबी विधायक जीतेन्द्र डागा का नाम उछलने के बाद सीबीआई जाँच कराई गई थी और जाँच में रुसिया की मौत को हादसा करार दिया गया था ।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद तरुण विजय और  वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से व्यक्तिगत जान पहचान रखने वाली शहला के भाजपा के साथ गहरे ताल्लुकात पर चर्चा का बाज़ार गर्म है । आरटीआई कार्यकर्ता शहला के भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से गहरे संबंधों ने पार्टी के सामने मुश्किलें खडी कर दी हैं । आज आलम यह है कि शहला मसूद  हत्याकांड भाजपा में अंदरूनी घमासान और एक-दूसरे को निबटाने का हथियार बन गया है । सबसे ज्यादा गंभीर बात यह है कि भोपाल से लेकर दिल्ली तक के कई भाजपा नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं । प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के कई नामचीन चेहरे शक के दायरे में हैं ।  प्रदेश की राजनीति में "चरित्र हनन" का ब्रह्मास्त्र चलाकर अपने प्रतिद्वंद्वियों को चित्त करने में माहिर खिलाड़ियों ने  तरूण विजय से शहला के अंतरंग संबंधों को लेकर मीडिया में कुछ इस तरह हवा बनाई कि अब असली कातिल तक पहुँचना सीबीआई के लिये आसान नहीं होगा ।

बहरहाल मामले में हर गुज़रते दिन के साथ नये-नये खुलासे हो रहे हैं । जानकार बता रहे हैं कि जाँच में कुछ ऐसी बातें सामने आ सकती हैं, जो प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दें । मामले की सीबीआई जाँच से शहला और प्रदेश की राजनीति से जुड़े कई अनछुए पहलू सामने आने की उम्मीद है। सूबे की राजनीति के साथ-साथ प्रशासन में हलचल मचाने वाले मामलों से भी पर्दा उठ सकता है । आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या के वक्त का चुनाव और उसका सबब पहेली बना हुआ है । इस हाईप्रोफाइल मामले की गुत्थी बेहद उलझी हुई है,जो कई दिग्गज नेताओं और अफसरों को लपेट सकती है। ।  विधायकों और सांसदों से लेकर चार आईएएस,दो आईपीएस अधिकारियों तथा एक जाने माने बिल्डर पर शक की सुई घूम रही है ।

१६ अगस्त की सुबह शहला मसूद की भोपाल में उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई थी । वह अपनी कार में ही मृत पाई गईं। शहला मसूद भोपाल की वह शख्सियत थी,जिसने सूचना के अधिकार का उपयोग करते हुए कई मंत्रियों तथा अधिकारियों को सीधे-सीधे घेरा । वे कई नेताओं की करीबी रहीं,तो कई नेताओं की किरकिरी भी बनी रहीं । शहला ने आरटीआई में आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के भ्रष्टाचार की जानकारी हासिल की थी । उन्होंने चार आईएएस अफसरों सहित शहर के एक बड़े बिल्डर द्वारा विभिन्न विभागों में किए जा रहे निर्माण कार्यों की जानकारी सूचना के अधिकार के अंतर्गत संबंधित विभागों से माँगी थी । इन तमाम जानकारियों में नेताओं और अफ़सरशाही की मिलीभगत उजागर हो सकती थी । वे इंडिया अगेंस्ट करप्शन की प्रदेश संयोजक भी थीं। ऎसा कहा जाता है कि हत्या वाले दिन यानी १६ अगस्त को ही बोट क्लब पर मध्य प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान शुरू कर भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों के नामों का खुलासा करने वाली थीं । सौ मीटर लम्बे बैनर पर हस्ताक्षर के ज़रिये यह जानने की कोशिश होने वाली थी कि प्रदेश का सबसे भ्रष्ट महकमा और अधिकारी कौन है? शहला अन्ना के आंदोलन की तर्ज पर एम.पी.अगेंस्ट करप्शन अभियान शुरू करने वाली थी। वो नेताओं और अफसरों के काले कारनामों को उजागर करतीं, उससे पहले उन्हें  दुनिया से रुखसत कर दिया गया।

इस सनसनीखेज़ हत्‍याकांड से मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के दफ्तर का नाम जुड़ने की चर्चा भी अब आम है । सीबीआई के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक एक अगस्त को शहला ने सीवीसी से मुख्यमंत्री औऱ प्रदेश सरकार की शिकायत की थी। बताया जा रहा है कि शहला ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि उन्‍हें मुख्‍यमंत्री के स्‍टाफ की ओर से धमकी मिली थी। हालाँकि जब एक न्यूज़ चैनल ने इस बारे में शिवराजसिंह से पूछा तो उन्‍होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।

शुरुआत में इस हत्या को आत्महत्या में बदलने की कोशिश भी की गई । शहला की कॉल डिटेल में दिल्ली के एक भाजपा नेता से लंबी बातचीत का रिकार्ड मिलने के बाद घबराई पुलिस मामले को खुदकुशी बताने की थ्योरी पर काम करने लगी थी । लेकिन शहला के परिजनों और नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह की ओर से सीबीआई जाँच की माँग सामने आते ही इसे तत्काल सीबीआई को सौंप दिया गया । केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी हत्यारों का जल्द पता लगाने के बारे में मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था । वहीं शहला के पिता मसूद सुल्तान के मुताबिक उनकी बेटी को जान का खतरा था,जिसे लेकर आईजी को पत्र भी लिखा था । उन्होंने आईजी पवन श्रीवास्तव,हीरा खनन कंपनी रियो-टिंटो के अफसर,बीजेपी नेता सहित कुछ अन्य लोगों पर भी हत्या का संदेह जताया है ।

सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद की हत्या के मामले में जाँच का एक बिंदु यह भी है कि सूचना के अधिकार के तहत जानकारी हासिल करने के दौरान ऐसे कितने और कौन-कौन लोग थे,जो शहला मसूद के दुश्मन बन गए? क्या दुश्मनी इस हद तक जा पहुँची थी कि कोई उनकी जान तक ले ले ? शहला की हत्या के बाद सामने आईं जानकारियों से पता चला है कि उन्होंने करीब एक हजार आवेदन विभिन्न महकमों में गड़बड़ियों से जुड़ी जानकारियाँ जुटाने में लगा रखे थे। इनमें बाघों के शिकार,वनों की अवैध कटाई और पुलिस की करतूतों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ चाही गई थीं ।

कहा जाता है कि शहला को छतरपुर जिले के सघन वनों में गैरकानूनी रूप से हीरे के खनन की जानकारी भी थी । यह जगह पन्ना टाइगर रिजर्व के पास बताई जाती है । शहला ने  पन्ना जिले में रियो-टिंटो कंपनी से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार के तहत हासिल की थी । १२ लाख रुपए खर्च कर अपनी लक्जरी कार में बार बनाने वाले रंगीनमिजाज़ मंत्री को उन्होंने जमकर घेरा था । सात सौ करोड़ के एक कथित घोटाले की तहकीकात में भी वे लगी हुई थी । बाँधवगढ़ में पिछले दिनों हुई एक बाघिन की हत्या में एक मंत्री तथा उनके भतीजे के खिलाफ वे मुहिम चला रही थी । खबर तो ये भी है कि शहला ने  शराब और शिकार के शौकीन प्रदेश के मंत्रियों के बेटों की हरकतों की एक सीडी तैयार कर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को दी थी । इस सीडी में बाँधवगढ़ में एक बाघिन की रहस्यमय ढंग से हुई मौत के राज़ हैं । इस मामले की एसटीएफ द्वारा जाँच की जा रही है । इसके लपेटे में दो वरिष्ठ आईएएस अफसर भी आ सकते हैं ।

शहला की जिंदगी से जुड़े सभी पहलुओं की बारीकी से पड़ताल भी कातिल तक  पहुँचाने में मददगार बन सकती है । जाँच तो इस बात की भी होना चाहिए कि कैसे मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की इवेंट मैनेजमेंट करते-करते भाजपा के नेताओं के करीब जा पहुँची ? लालकृष्ण आडवाणी,सुषमा स्वराज,नितिन गडकरी सरीखे नेताओं के साथ शहला के फ़ोटोग्राफ़ भाजपा में उसकी पैठ की गवाही देने के लिये काफ़ी हैं । ऎसे में ये सवाल बेहद मौजूँ हो जाता है कि महज़ दो-तीन सालों में एक आरटीआई कार्यकर्ता की सियासी गलियारों में सरगर्मियाँ कब,कैसे और क्यों बढ़ीं ? ये जाँच का विषय है कि उसे पार्टी के कद्दावर नेताओं से सबसे पहले किसने रूबरू कराया और वह किन नेताओं की खास रही, बाद में उसकी किन से और किन कारणों से अनबन हुई ?

दिल्ली से मास कम्युनिकेशन का डिप्लोमा करने के बाद भोपाल के सिटी केबल में बतौर एंकर काम कर चुकी शहला मसूद को पत्रकारिता ज्यादा रास नहीं आई और उसने "मिरेकल्स" नाम की कंपनी बनाकर इंवेंट मैनेजमेंट के क्षेत्र में कदम रखा । कुछ ही सालों में शहला को अपने संपर्को के बूते पर्यटन विकास निगम,संस्कृति विभाग जैसे सरकारी महकमों में लाखों के काम मिलने लगे । इस तथ्य को इसी से समझा जा सकता है कि शहला की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी और आरएसएस समर्थित ''श्यामा प्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट '' मिलकर दिल्ली,भोपाल,कश्मीर,कोलकाता में कई कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं । इस वज़ह से शहला का उठना-बैठना ओहदेदार और रसूखदार लोगों के साथ था । विधायक ध्रुव नारायण सिंह की एनजीओ "उदय" तो अब शहला ही चला रही थीं । जब ध्रुव नारायण पर्यटन निगम अध्यक्ष थे,तब शहला की कंपनी को कई काम मिले थे । हालाँकि भोपाल के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का टिकट नहीं मिलने के बाद से उसके मन में ध्रुव नारायण के प्रति खटास पैदा हो गई थी । आलम ये था कि  पर्यटन विकास निगम, जिसमें वे इवेंट मैनेज करने में लगी थी, वहीं कई शिकायतें उन्होंने कर रखी थी । ईको टूरिज्म पर हो रहे विकास कार्यो को लेकर उन्होंने सीधे वहां के एमडी को कठघरे में लिया था । ऐसी और भी शिकायतें थी,जिनको सूचना के अधिकार में लिया गया, लेकिन इसके बाद उनका क्या हुआ आज तक पता नहीं चला । 

सवाल ये उठ रहे हैं कि शहला मसूद की मौत की वजह कहीं उसकी भाजपा सांसद तरुण विजय से बढ़ती नजदीकी तो नहीं बनी? राजनीतिक हसरतें ही तो उसकी मौत का सबब नहीं बन गईं? कहते हैं,पार्षद का टिकट पाने में नाकाम शहला मसूद को अपनी राजनीतिक हसरतों को मंजिल तब दिखना शुरू हुई, जब वह तरुण विजय के संपर्क में आईं । दो साल में दोनों के बीच नजदीकी इतनी बढ़ी कि पिछले साल ईद पर मुबारकबाद देने के लिये तरुण शहला के घर पहुँचे । तरुण और शहला के बीच हत्याकांड के ठीक एक दिन पहले दो बार लंबी बातचीत हुई । पहले शहला ने फोन करके ४५ मिनट बात की तो बाद में तरुण विजय ने फोन लगाया और २७ मिनट बात की । हत्याकांड वाले दिन भी सुबह दोनों के बीच फोन पर बात हुई थी । करीबी दोस्त की हत्या के पन्द्रह दिन तक उनकी चुप्पी ने भी कई सवाल खड़े किये हैं । लेकिन ये तमाम तथ्य तरुण विजय को कठघरे में खड़ा करने के लिये पर्याप्त नहीं कहे जा सकते । ऎसा लगता है कि तरुण विजय और शहला के व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों के खुलासों को हवा देकर प्रदेश के कई घाघ नेताओं ने तोप का मुँह दिल्ली के नेताओं की ओर मोड़ कर हिसाब-किताब बराबर किया है । इसे "जाँच की आँच" से दामन बचाने की कोशिश के तौर भी देखा जा सकता है ।

तरुण विजय और शहला मसूद के बीच 'आर्थिक लेनदेन' को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं । मध्‍य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष २०१० में विजय के श्यामाप्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट को २५ लाख रुपए की आर्थिक मदद दी थी । राज्‍यसभा सदस्‍य और आरएसएस के मुखपत्र 'पांचजन्‍य' के पूर्व संपादक तरुण विजय इस एनजीओ के प्रमुख हैं। कहा जा रहा है कि विजय ने ही  शहला को इस एनजीओ से जोड़ा था। जानकारी के अनुसार हाल में ही शहला ने करीब ८० लाख रुपए की जमीन का सौदा किया था । उस सौदे में कई पेंच थे । मामले में दिलचस्पी रखने वाले अपने तईं तफ़्तीश में जुटे हैं कि जमीन खरीदने में शहला के साथ और कौन-कौन लोग शामिल थे? जमीन खरीदने के लिए रुपए कहाँ से और कैसे जुटाए थे? इस मामले में शहला के किन लोगों से मतभेद थे? ये तमाम बातें भी अब जाँच का हिस्सा बनेंगी ।

दरअसल अपने राजनीतिक संपर्को के बूते शहला की भाजपा में जाने की तैयारी हो गई थी । भोपाल के विधायक ध्रुवनारायण सिंह तथा राज्यसभा सदस्य तरुण विजय इसके प्रयास में थे । विजय ने शहला की भाजपा में एंट्री पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में बतौर चेयरमैन कराने की कवायद भी की थी, लेकिन अंडरवर्ल्ड और आईएसआई से तार जुड़े होने का पेंच फ़ँसाकर उस मुहिम की हवा निकाल दी गई । अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोड़ने की कवायद में जुटी भाजपा के पास दमखम वाले मुसलमान नेताओं का टोटा है । विजय विधानसभा चुनावों में शहला की  माडरेट मुस्लिम नेता की छवि को भुनाकर मुसलमानों को बीजेपी से जोड़ने की कोशिश में थे । तरुण विजय के जरिए शहला भाजपा और आरएसएस के शीर्षस्थ नेताओं के संपर्क में आई थी । सूत्रों के मुताबिक शहला राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच का तानाबाना खड़ा करने में मददगार बनी थी । यह मंच जम्मू-कश्मीर सहित पूरे उत्तर भारत में काम करता है। इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में भाजपा का जनाधार बढ़ाना और राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार करना है।

पुलिस जाँच में एक दिशा यह भी थी कि कहीं इसके पीछे कोई कट्टरपंथी कनेक्शन तो नहीं है ।  बिंदास जीवन शैली और  उदारवादी छबि के चलते शहला के संपर्कों का दायरा बहुत व्यापक था। उसके कई ऐसे लोगों से भी संपर्क थे जो कट्टरपंथी माने जाते हैं । यदि सूत्र इस दिशा में बढ़े तो यह मामला चौंकाने वाले राज से पर्दा हटा सकता है । इस संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता कि कहीं डबल क्रॉस तो शहला की मौत का कारण नहीं बना ? इन तारों को जोड़ने की भी कोशिश चल रही थी  कि पिछले दो ढाई साल में शहला के तरुण विजय जैसे नेताओं से नजदीकी संबंध और इसी दौरान प्रदेश में सिमी के नेटवर्क के कई लोग पुलिस की पकड़ में आने के बीच कोई संबंध तो नहीं है । इन हल्कों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक शहला की हत्या के सूत्र पिछले दिनों पूरे प्रदेश में पुलिस द्वारा सिमी के नेटवर्क को ध्वस्त करने की कोशिशों से जुड़ते नजर आ रहे हैं ।

दरअसल शहला की हत्या ने पुलिस से ज्यादा संघ और भाजपा से जुड़े लोगों को चौंकाया है। तमाम तथ्यों के सामने आने के बाद यह सवाल और भी पेचीदा हो जाता है कि आखिर शहला की हत्या क्यों हुई ? इसे पूरी तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वाले सिपाही की कुर्बानी मान लेना उन आरटीआई कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी, जो हर जोखिम उठाकर हर कीमत पर सच की मशाल को थामे रहते हैं । कनबतियों पर यकीन करें तो हज़ारों आरटीआई के ज़रिये हासिल की गई जानकारियाँ दुधारु गाय में तब्दील करने का हुनर हासिल करने के बाद शहला सियासी और सरकारी अमले के लिये सिरदर्द बन चुकी थी। कह पाना बड़ा मुश्किल है कि आरटीआई कार्यकर्ता होने की हैसियत ने उनके इवेंट मैनेजमेंट के कारोबार को आगे बढ़ाया या गड़बड़ियों के खुलासे की आड़ में मिल बाँटकर हिसाब कर लेने के हुनर ने। प्रदेश में चरित्र हनन की राजनीति के मँझे हुए खिलाड़ियों ने बड़ी ही सफ़ाई से जाँच का रुख दिल्ली की ओर मोड़ दिया है। जाँच रिपोर्ट सामने आने तक इस सनसनीखेज़ हत्याकांड पर लोग अपनी तरह से कयास लगाते रहेंगे आखिर क्यों गई शहला की जान ...? आरएसएस से जुड़ाव,बाघों के मौत के विरुद्ध आवाज़ उठाना,आपसी रंजिश या राजनीतिक महत्वाकांक्षा......मौत की वजह कोई भी हो सकती है।

सोमवार, 16 मई 2011

महँगाई के मुद्दे पर राहुल-सोनिया भूमिगत

पेट्रोल के दाम एक बार फ़िर बढ़ा दिये गये। इस मर्तबा कीमतों में अब तक की सर्वाधिक सीधे पाँच रुपये की बढ़ोत्तरी ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है। यह वृद्धि आठ प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो सालों में पेट्रोल के दामों में प्रति लीटर 23 रूपयों की वृद्धि की जा चुकी है। गौरतलब है कि पिछले नौ महीनों में पेट्रोल की कीमत में नौ बार इज़ाफ़ा हो चुका है। इस तरह पेट्रोल की कीमत 47.93 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 63.37 रुपये हो गई है।

लेकिन दिन रात आम आदमी की दुहाई देने वाली केन्द्र सरकार पूरे मामले से पल्ला झाड़ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मुताबिक "पिछले वर्ष जून में हमने पेट्रोल कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का निर्णय लिया था। लिहाजा इन दिनों पेट्रोल कीमतों में वृद्धि या कमी का निर्णय सरकार नहीं लेती। पेट्रोल की ताजा मूल्य वृद्धि में सरकार ने कोई भूमिका नहीं निभाई है, क्योंकि कीमतें नियंत्रण मुक्त हो चुकी हैं। उन्होंने एक तरह से तेल विपणन कम्पनियों के निर्णय का पक्ष लेते हुए कहा कि पिछले 11 महीनों में कच्चे तेल की कीमत 42 डॉलर प्रति बैरल बढ़ गई हैं। वे कहते हैं कि जब पिछले जून में कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने का निर्णय लिया गया था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 68 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन आज यह दर बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।

इधर हमेशा की तरह भाजपा और वामपंथी दल गाल बजाकर अपने लोकतांत्रिक दायित्वों की पूर्ति का दम भरने में लगे हैं । दो-चार दिन सड़कों पर चक्काजाम करने या साइकल,बैलगाड़ी,घोड़ागाड़ी दौड़ाने से सरकार के कान पर जूँ रेंगती तो शायद हालात कुछ और होते। मगर बयान जारी कर चेहरा चमकाने की राजनीति के मौजूदा दौर में बीजेपी ने कहा कि केंद्र सरकार पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए चुनाव परिणामों का इंतज़ार कर रही थी। बीजेपी ने इसे पश्चिम बंगाल, केरल और असम में काँग्रेस की जीत का जनता को ‘‘तोहफा’’ बताया है । अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृध्दि के सरकार के तर्क की काट में भाजपा ने कहा कि सरकार पेट्रोल पर लगाए गए बेतहाशा केन्द्रीय करों को कम करके जनता को राहत दे सकती है। वामपंथी पार्टियों ने मूल्य वृद्धि को संप्रग सरकार का ‘क्रूर हमला’निरुपित करते हुए हर तरफ से महंगाई से त्रस्त लोगों को जबरदस्त झटका बताया है। साथ ही विनियमन नीति वापस लेने की माँग की है।

इस पूरे मसले में एक बात हैरान करने वाली है । जब भी महँगाई से जुड़े मुद्दे पर देश में बैचेनी बढ़ती है। सोनिया गाँधी और उनके सुपुत्र राहुल गाँधी भूमिगत हो जाते हैं । दलित के घर भोजन खाकर,कलावती का मुद्दा संसद में उठाकर,सिर पर मिट्टी ढ़ोकर और भट्टा पारसौल के किसानों के बीच जाकर गिरफ़्तारी देने वाले "काँग्रेस के युवराज" कब तक भारतीय जनमानस की भावनाओं से खेलते रहेंगे। आम जनता की रोज़ी-रोटी से जुड़े मुद्दों पर काँग्रेस के इस "पोस्टर ब्वाय" की चुप्पी आपराधिकता की श्रेणी में आती है। पेट्रोल, डीज़ल या रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी सिर्फ़ इन उत्पादों तक ही सीमित नहीं होती। इनका असर रोज़मर्रा की ज़रुरतों की हर छोटी बड़ी वस्तु पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पड़ता है।

बाज़ारीकरण की नीति पर चलकर आखिर देश जा कहाँ रहा है ? बिजली के बाद अब प्रकृति प्रदत्त संसाधन भी निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। प्याऊ लगाकर प्यासे कँठों को तर करने का पुण्य कमाने वाले देश में आज पानी एक "कमोडिटी" है। मुनाफ़े के इस धँधे में चाँदी काटने के इरादे से केन्द्र और राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारों पर नाच रही हैं। भोपाल के कोलार क्षेत्र में नगर पालिका बनाकर नेताओं की कमाई के लिये चारागाह तो तैयार कर दी गई, मगर यहाँ की पेयजल समस्या के निराकरण की कोई पहल नहीं की गई। यह जानकर कलेजा मुँह को आता है कि औसतन दस- बारह हज़ार रुपये महीना कमाने वाले परिवार को मकान किराया,बिजली,दूध और पेट्रोल जैसे ज़रुरी खर्च के अलावा पानी के इंतज़ाम पर औसतन हर महीने सात सौ से आठ सौ रुपये चुकाना पड़ रहे हैं । यही हाल सड़कों किनारे बनाई गई अँधाधुँध पार्किंग का है। पाँच-पाँच, दस-दस रुपये के ज़रिये लोग हर रोज़ ना जाने कितने रुपये चुकाते हैं। अब तो टोल नाकों के ज़रिये सड़कों पर चलने की भारी कीमत चुकाना पड़ रही है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। कोई नियम कायदा नहीं है।

दरअसल बाज़ारीकरण की व्यवस्था भ्रष्ट समाज में ही पुष्पित और पल्लवित हो सकती है। उपभोक्तावादी संस्कृति में नैतिकता और ईमानदारी का कोई मूल्य ही नहीं है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ईमानदारी अनमोल है,वास्तव में बाज़ारवाद की राह पर आगे बढ़ते समाज में यह "बेमोल" है । सत्ता चलाने वाले भी बखूबी जान चुके हैं कि इस भ्रष्ट तंत्र में कीमतों में इज़ाफ़े से किसी पर भी कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ज़रा सोच कर देखिये दाम बढ़ेगे तो व्यापारी से लेकर मज़दूर और डॉक्टर से लेकर ठेले वाले तक सभी अपने- अपने स्तर पर बढ़ती महँगाई से तालमेल बिठाने का एडजस्टमेंट कर लेते हैं। और कुछ दिनों के हँगामे के बाद गाड़ी फ़िर पटरी पर चलने लगती है।

इस चक्की में सिर्फ़ वही पिसने वाला है जिसे ईमानदारी से जीवन गुज़र बसर करने का भूत सवार है। देश की कुलाँचे मारती जीडीपी में वैसे भी ईमानदार जीवों का भला क्या योगदान है ? इन मरदूदों के भरोसे चले, तो देश की इकॉनॉमी का भट्टा बैठना तय है और औद्योगिक विकास की दर का गर्त में समाना लाज़िमी है। पूरी बात का लब्बेलुआब यह कि जनाब यह सतयुग नहीं कलिकाल है, जहाँ भोगवादियों का बोलबाला है। इस दौर के मार्गकँटकों (ईमानदारो) की विलुप्तप्राय प्रजाति को धरती से हटाने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है। देश की तरक्की और दुनिया का सिरमौर बनने के लिये भ्रष्टाचार ज़िन्दाबाद। और जब भ्रष्टाचार है, तो कीमतों में इज़ाफ़े से कैसा डर ? इस हाथ ले उस हाथ दे की अर्थव्यवस्था में महँगाई कोई समस्या नहीं है । यह तो महज़ एक सियासी दाँव है,जो सत्ता हथियाने के लिये राजनीतिक दल अपनी सहूलियत से समय-समय पर आज़माते हैं।

शनिवार, 15 मई 2010

ज़रा ज़ुबान सम्हाल कर....!

भाजपा के नये मुखिया ने जोश-जोश में क्षेत्रीय पार्टियों के चंद नेताओं को आइना दिखा दिया,तो क्या गुनाह कर दिया ? वे अकेले तो नहीं हैं जिन्होंने इस तरह की भाषा का प्रयोग किया है । भारतीय राजनीति में यह सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है । एक ज़माने में स्वर्गीय राजीव गाँधी "नानी याद दिला देने" पर आमादा थे । बाद के सालों में "कुत्ते" के सर्वाधिकार मायावती के पास सुरक्षित थे । बदलते दौर के साथ देश में राजनीति कम और दलाली का दौर शुरु हुआ,तो इस स्वामीभक्त प्राणी के "हेय संबोधन" को जनप्रिय बनाने का पूरा-पूरा श्रेय राजनीतिक अड़ीबाज़ माननीय अमर सिंह्जी को जाता है ।
वैसे तो आज के दौर का कोई भी नेता बदज़ुबानी में किसी से पीछे नहीं है । मुलायम,लालू की हल्की बातों को मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये खूब भुनाया और उसके चटखारों से खूब मजमा जुटाया । मगर क्या मीडिया की हिमायत इनकी छिछली टिप्पणियों को जायज़ ठहरा सकती है ? काँग्रेस में भी सत्यव्रत चतुर्वेदी, दिग्विजय सिंह , मनीष तिवारी जैसे महारथियों की भरमार है,जो अपने काम से ज़्यादा ओछी टीका टिप्पणियों के लिये सुर्खियाँ बटोरते हैं ।
वैसे भी हिन्दी में मुहावरेदार भाषा का चलन है,जो बातचीत को रसीला और मज़ेदार बना देता है । फ़िर गडकरीजी ने अपनी बात को इशारों-इशारों में ही तो कहा था । मगर कहते हैं ना कि "चोर की दाढ़ी में तिनका"। लिहाज़ा लालू-मुल्लू ने तुरंत ही जान लिया कि तलवा कौन चाटता है ? बेचारे गडकरी ने तो अपने मुँह से उस स्वामीभक्त प्राणी का नाम भी नहीं उच्चारा था । बहरहाल लालू-मुल्लू सरीखे घाघ नेता ही नहीं गली-मोहल्ले के आवारा कुत्ते भी गडकरी से खफ़ा हो गये हैं । पूँछ में तख्ती टाँगे ये प्राणी भौंक-भौंक कर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं । इनका आरोप है कि गडकरी के बयान से इनकी साख पर बट्टा लग गया है । इन्हें लगता है कि भाजपा के मुखिया ने लालू-मुल्लू के साथ नाम जोड़कर इनकी कौम का मान मर्दन किया है । कई जोशीले नौजवान कुकुर तो गडकरी पर मानहानि का दावा ठोकने की तैयारी में लग गये हैं ।
भाजपा के सांसद रह चुके धर्मेन्द्र ने रुपहले पर्दे पर खलनायक को कुत्ते-कमीने के खिताब से नवाज़ कर खूब तालियाँ भी बटोरीं और खूब धन भी समेटा । कुते-कमीनों का खून पीने का सरे आम ऎलान कर लोकप्रियता के शिखर को छूने वाले धरमिन्दर पाजी बाद के सालों में संसद के गलियारे में भी दाखिल हो गये । गडकरी आरएसएस के आशीर्वाद से बीजेपी के मुखिया तो बन गये हैं , लेकिन चांडाल चौकड़ी के चलते वे गब्बरसिंग की महफ़िल में रस्सी से बँधे "वीरु" से जान पड़ते हैं । वही वीरु जो चिल्ला-चिल्ला बसंती को "कुत्तों के आगे नाचने" से रोकने की कोशिश करता है । पुराने फ़िल्मी गानों के शौकीन गडकरी ने मध्यप्रदेश में हुए भाजपा अधिवेशन के दौरान शिवराजसिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिला कर खूब मंच लूटा था । लगता है कार्यकर्ताओं को चाँडाल चौकड़ी के कब्ज़े से छुड़ा कर अपने खेमे में लाने के लिये गडकरी ने यह दाँव आज़माया होगा ।
वैसे नेताओं को समझना होगा कि सार्वजनिक जीवन में आचार-व्यवहार की मर्यादाओं का ध्यान रखना ही चाहिये । हल्के शब्द तात्कालिक तौर पर फ़ायदा देते दिखाई ज़रुर देते हैं,लेकिन ये ही शब्द व्यक्तित्व की गुरुता को घटाते भी हैं । "ज़ुबान की फ़िसलन" राजनीति की रपटीली ज़मीन पर बेहद घातक साबित हो सकती है । खासतौर से ये खतरा तब और भी बढ़ जाता है,जब विरोधी घर में ही मौजूद हों । देश के प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया की "ज़ुबान का फ़िसलना" और फ़िर "ज़ुबान से पलटना" ना तो खुद उनके लिये अच्छा है और ना ही भाजपा के लिए ....। लिहाज़ा गडकरीजी, ! ज़रा ज़ुबान संभाल कर .........।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

चेहरा बदला, क्या चाल-चरित्र बदलेगा ....?

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में हाल के दोनों में दो अहम बदलाव हुए हैं । भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ लोकसभा में विपक्ष का नेता भी बदल गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अब लालकृष्ण आडवाणी नहीं सुषमा स्वराज होंगी, तो राजनाथ सिंह के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान नितिन गडकरी ने संभाली है। इस साल लोकसभा चुनाव में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व युवा नेताओं के हाथ में सौंपने की माँग उठ रही थी । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या इस बदलाव से भाजपा का कुछ भला हो पाएगा ? क्या पार्टी इनके नेतृत्व में बुरे दौर से निकल पाएगी ? क्या आडवाणी की राजनीतिक पारी भी समाप्ति की ओर है?


गौरतलब है कि आडवाणी के लिए संसदीय दल के संविधान में संशोधन करके काँग्रेस की तर्ज़ पर विशेष जगह बनाई गई है । उनका राजनीतिक कैरियर सुरक्षित करने की गरज से उठाये गये इस कदम की बदौलत लालकृष्ण आडवाणी अब संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बन गए हैं। यानि सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार अब भी उनके पास सुरक्षित है। भाजपा के इस लौहपुरूष को पिघलाना आसान बात नहीं है, यह बात एक बार फिर साबित हो गयी है। भले ही संसदीय दल का नेता नहीं होने के कारण कैबिनेट मंत्री का दर्जा छिन गया हो, मगर लालकृष्ण आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष के रूप में पार्टी पर वर्चस्व बनाए रखेंगे। आडवाणी की राजनीतिक बुलंदियाँ छूने की महत्वाकांक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं, यह मानना भूल होगी। हिन्दुत्व के एजेंडे को बुलंद करते हुए भाजपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में आडवाणी का हाथ रहा, बावजूद इसके वे कभी प्रधानमंत्री पद पर नहीं पहुँच पाए। लोकसभा में पार्टी की सिमटती सीटों के बावजूद हार उन्होंने नहीं मानी है, विरोधियों को चतुराई से किनारे किया और वे अब भी बैक सीट ड्राइविंग करते हुए एक तरह से पार्टी को अपनी पसंद की राह पर चलवा रहे हैं। भाजपा का युवा अवतार कितनी दूर तक वरिष्ठों के कहे अनुसार चलेगा, यह देखने वाली बात रहेगी।

भारतीय जनता पार्टी संक्रमण के दौर में है। नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर दोहरे संकट को झेलती पार्टी को पटरी पर लाने के लिये नितिन गडकरी को संघ के समर्थन का नैतिक बल ज़रुर हासिल होगा । लेकिन इससे उनकी राह बहुत आसान नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा बड़ी हो गई है और बदल भी गई है । भाजपा के संक्रमण का एक पहलू यह भी है कि मौजूदा चुनौतियों के संदर्भ में एक सैद्धांतिक आधारभूमि भी तलाशना है । जिससे वह ऊर्जा ग्रहण कर एक राजनीतिक दल के रुप में सार्थक हो सके और अपने समर्थकों को इतना वेगवान बना सके कि वे राजनीतिक शून्यता भरने में कामयाब हो सकें ।

इसके बारे में संघ जितना बेपरवाह है उससे कहीं ज़्यादा उदासीनता भरा रवैया भाजपा का रहा है। भाजपा में पार्टी प्रतिबद्धता का हाल यह है कि संघ नेतृत्व खुलेआम कहने लगा है कि वहाँ कोई भी राष्ट्रीय नेता ऐसा नहीं है ,जो पार्टी और उसके भविष्य की सोचता है । हर कोई अपने में सिमट गया है। भाजपा के जिस विशेषता के लिए जानी जाती थी वह उससे बहुत दूर हो गई है । इसे संघ चाहे भी तो कैसे दूर करेगा ? क्या कोई नया संगठन मंत्री आकर जादूका छड़ी फेर सकता है ? इस समय जो संगठन मंत्री हैं वे बिगड़ी भाजपा के चेहरे हो गए हैं ।

गडकरी की छबि व्यवहार कुशल नेता की है। विचार का जहाँ तक सवाल है वे स्वदेशी के पैरोकार हैं पर वैश्वीकरण से उन्हें बैर भी नहीं है । शनिवार को दिल्ली में पार्टी की कमान संभालने के बाद उन्होंने कहा कि वे पाँच सालों में पहली बार दिल्ली में रात बिताएंगे। यानि उनकी राजनीति महाराष्ट्र के इर्द-गिर्द ही रही। अब एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण और सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। यह समय गठबंधन राजनीति का है। इस नाते तरह-तरह के दलों से पार्टी के संबंधों को मजबूती देना उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। लगातार सिमट रहे जनाधार से पार्टी कार्यकर्ताओं के पस्त पड़े हौसलों को नयी ऊर्जा देना भी एक बड़ा काम रहेगा और सबसे बड़ी चुनौती रहेगी पार्टी के भीतर मौजूद दिग्गजों के अहं को संतुष्ट करते हुए आपसी तालमेल बनाए रखते हुए भाजपा की सभी प्रदेश ईकाइयों को नया जोश देना।

गडकरी के जरिए संघ, भाजपा पर नियंत्रण रखना चाहता है। हालाँकि बदलती परिस्थितियों में यह कितना कारगर होगा, यह कहना कठिन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अपनी पसंद के नितिन गडकरी को बीजेपी में ले तो आये हैं, वे अभी तक राज्य स्तर के नेता रहे हैं लेकिन देश के मुख्य विपक्षी दल का अध्यक्ष होने की पात्रता उनमें कितनी है, यह अभी रहस्य बना हुआ है। अगर वे असफल होते हैं तो यह संघ नेतृत्व की असफलता कही जाएगी और ये आरोप लगेगा कि संघ के महाराष्ट्रीय ब्राह्मण नेतृत्व ने एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण को पार्टी पर भी थोप दिया।

भाजपा इस समय एक ऐसी पार्टी बन चुकी है जिसे अपनी दिशा मालूम नहीं और दो लोकसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि हिन्दुत्व की लाइन पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुई है। आम जनता हिन्दुत्व की राजनीति की निरर्थकता को समझ चुकी है और अब इससे निकलना चाहती है। लोग शायद अब जातिवाद की राजनीति से भी ऊब चुके हैं और उससे भी बाहर आने का रास्ता तलाशाना चाहते हैं। भाजपा विकास से ज़्यादा धर्म के एजेंडे पर ध्यान देती आई है लेकिन देश का आम आदमी अब जागरुक हो चुका है। लोग देश का विकास, शिक्षा और रोजगार चाहते हैं। बढ़ती महंगाई और रोज़गार के घटते अवसरों के बीच लोग समझ चुके हैं कि धर्म से पेट नहीं भरता। खराब बुनियाद पर बने घर,साम्प्रदायिक और धार्मिक नीति की बुनियाद पर बने राष्ट्र और साम्प्रदायिक और धार्मिक सोच से चलती पार्टी का अस्तित्व बहुत दिनों तक नहीं कायम नहीं रहता है ।

भाजपा के दो प्रमुख पदों पर परिवर्तन से कुछ होने वाला नहीं है. पार्टी तभी मजबूत होगी जब पार्टी का एजेंडा बदला जाए ।  मुखौटा बदलने की बजाए भाजपा को विचारधारा बदलने की आवश्यकता है । अब तक तीन वैचारिक लाइन ली हैं । गांधीवादी समाजवाद. इसे 1985 में छोड़ा और एकात्मक मानववाद को अपनाया । 1987 से वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लाइन पर है । इसने भाजपा को अयोध्या आंदोलन में एक भूमिका दी । लेकिन भाजपा की समस्या इसी से शुरू होती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वो ऐसे ठोस नारे में नहीं बदल सकी है जो लोगों के गले उतरे । इसके लिए जिस तरह की सैद्धांतिक समझ और चारित्रिक दृढ़ता चाहिए वो आज ना भाजपा में है ना ही संघ में । सतही सत्ता के खेल में उलझी भाजपा का वैचारिक द्वंद उस समय बेक़ाबू हो गया जब वह चुनाव में हारने लगी । भाजपा की अनेक धाराएँ हो गई हैं । खुलकर बहस की गुंजाइश ख़त्म है । असहमति को वहाँ विरोध समझ लिया जाता है, गिरोहबंदी में फंसी भाजपा को संघ का हंटर कितना सुधार सकेगा?

बीजेपी को पटरी पर लाने के लिये गडकरी को चाँडाल चौकड़ी से छुटकारा पाना होगा । उन्होंने सेतुबन्ध बनाकर कई दुर्गम राहों पर सफ़र आसान बनाने की योजनाओं को सफ़लता से साकार किया है । विकास की राजनीति वक्त की ज़रुरत है लेकिन गडकरी को समझना होगा कि जर्जर बुनियाद पर मज़बूत इमारतें खड़ी करना नामुमकिन होता है । इमारत की बुलंदी काफ़ी हद तक बुनियाद की मज़बूती पर निर्भर करती है । ज़ाहिर बात है कि विकास के इतिहास में विध्वंस की कहानी भी दर्ज़ होती है । कई मर्तबा पुख्ता ज़मीन तैयार करने के लिये डायनामाइट लगाना ज़रुरी हो जाता है । बीजेपी के लाइलाज मर्ज़ से निपटने के लिये गडकरी को सर्जरी की दरकार होगी । कुशल डॉक्टर जानता है कि जीवन सुरक्षित रहे तो अंगदान करने वालों की कमी नहीं रहती ।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

आतंक और मौतों की सियासत

मध्यप्रदेश के खंडवा में एटीएस के आरक्षक सहित तीन लोगों को दिनदहाड़े गोलियों से भून देने के बाद सरकार ने जिस तरह घोषणाओं का पिटारा खोल दिया , उसमें मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदनाशीलता कम मामले का सियासी फ़ायदा उठाने की कुत्सित चेष्टा ज़्यादा दिखाई देती है । खंडवा में मारे गये लोगों की शवयात्रा को काँधा देने के लिये खुद मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, मंत्रिमंडल के कई और सदस्यों के साथ ही डीजीपी एस के राउत भी मौजूद थे । प्रशासन और पुलिस ने मामले में प्रतिबंधित संगठन सिमी का हाथ होने की बात कह कर सनसनी फ़ैला दी और सरकारी तंत्र पूरे लवाज़मे के साथ खंडवा पहुँच गया ।

अब तक पुलिस की गिरफ़्त से बाहर है । अब पुलिस "ऑपरेशन फ़ंदा" का ढ़ोंग करने में जुट गई है,मगर नतीजा सिफ़र ही है । कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया है ,लेकिन अब तक कुछ भी सामने नहीं आया है । अलबत्ता नगरीय निकायों के चुनाव ज़रुर सामने खड़े हैं । लिहाज़ा घोषणाओं का पिटारा खोलकर राजनीतिक माइलेज लेने में माहिर सूबे के मुखिया ने एक बार फ़िर बाज़ी मार ली । आनन फ़ानन में उन्होंने तीनों मृतकों को शहीद का दर्ज़ा दे डाला । सभी की राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई । आरक्षक के परिजनों को दस लाख रुपए और दो अन्य मृतकों के परिवारों को पाँच-पाँच लाख रुपए का मुआवज़ा और एक-एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति देने की घोषणा भी कर दी गई । गोया कि २६/११ के मुम्बई हमले से भी बड़ा कोई आतंकी हमला हो गया हो जिसमें आतंकियों से जूझते हुए आरक्षक सीताराम यादव , बैंक अधिकारी पारे और वकील पाल ने वीरगति प्राप्त की हो । सरकारी प्रेस नोट को पढ़ने के बाद तो कम से कम यही लगता है मानो सीमा पर रणबाँकुरों ने देश की हिफ़ाज़त के लिये प्राण न्यौछावर किये हों ।

आरक्षक यादव बेशक एटीएस के कर्तव्यपरायण और जाँबाज़ जवान रहे हैं । उनकी बहादुरी पर हम सभी को नाज़ है । इस बात से भी इंकार नहीं कि देश के लिये साहस के साथ अपने दायित्वों को निबाहने वालों को ना सिर्फ़ सम्मान मिलना चाहिए , बल्कि उनके परिजनों को बेहतर ज़िन्दगी देने का नैतिक दायित्व समाज और सरकार दोनों का होता है । लेकिन मूल सवाल यही है कि नेता आखिर कब तक बेहयाई से अपने फ़ायदे के लिये लोकतंत्र का बेहूदा मज़ाक बनाते रहेंगे । अभी तफ़्तीश चल रही है । फ़िलहाल कुछ भी साफ़ नहीं है । कल जाँच-पड़ताल के बाद मामला आपसी रंजिश या लेनदेन का निकले,तब सरकार कहाँ जाकर मुँह छिपाएगी ?

अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिये नेता लोकतंत्र और सत्ता को "चेरी" समझ बैठे हैं । उनका ध्यान समाज में व्यवस्था लाने से ज़्यादा अराजकता फ़ैलाकर चाँदी काटाने में लग गया है । गुज़रते वक्त के साथ मध्यप्रदेश में तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । मुख्यमंत्री खुद भरी सभा में मान चुके हैं कि सूबे में तरह - तरह के माफ़ियाओं का राज है । दोबारा सत्ता में आने के बाद से तो जैसे भाजपाइयों को "पर" ही लग गये हैं । भूमाफ़ियाओं का आतंक पूरे प्रदेश में फ़ैला हुआ है । इसकी परिणिति एक आईएएस अफ़सर एम जी रुसिया की मौत के रुप में सामने आ चुकी है । ऎसे कई मामले हैं जिनमें शक की सुई सीधे-सीधे सत्ताधारी दल के नेताओं पर आ टिकती है , लेकिन रुसिया की संदिग्ध हालात में हुई मौत के बाद से अफ़सरशाही चौकन्नी हो गई है । अब आलम यह है कि अधिकारी अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिये नियम - कायदों को ताक पर रख कर नेताओं की मनमानी को बर्दाश्त कर रहे हैं ।

राजधानी की व्यस्ततम सडक पर चलती कार में चार लोगों द्वारा में तथाकथित रेप का मामला प्रदेश के हालात बयान करने के लिये काफ़ी है । शहर में गैंगरेप जैसी कोई घटना हुई ही नहीं और पुलिस ने आरोपी भी ढ़ूँढ़ निकाला । पास के गाँव के एक निरीह और शरीफ़ इंसान से अपराध भी कबूलवा लिया । शायद उसकी किस्मत अच्छी थी जो गाँव के कुछ लोग उसके पक्ष में उठ खड़े हुए । करीब डेढ़ - दो महीने गुज़ारने के बाद एक बेकसूर युवक ज़मानत पर रिहा हो सका । बाद में पता चला कि कुछ लोगों को फ़ँसाकर रकम ऎंठने के इरादे से यह कहानी बुनी गई थी । इसे अँजाम देने के लिये मुम्बई के दलालों और कॉलगर्ल की मदद ली गई थी, वास्तव में ऎसी कोई वारदात उस रात भोपाल में हुई ही नहीं थी ।

ये एक बानगी है । खंडवा की वारदात के बाद आधी-अधूरी जानकारी के बूते सरकार की बेतहाशा घोषणाएँ करना गंभीर मसला है । आखिर नेता कब तक अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते रहेंगे । मुख्यमंत्री अपने अधकचरे सलाहकारों का मशविरा मानकर "इमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज़" के लिये जाने क्या-क्या घोषणाएँ करते रहते हैं । उन्हें अपने व्यक्तित्व में गंभीरता लाकर सोचना ही होगा कि जनता ने राज्य और समाज हित के कामों के लिये उन्हें सत्ता सौंपी थी । सरकारी खज़ाना उनकी निजी जायदाद या मिल्कियत नहीं है , जिसे वो जब चाहें ,जैसे चाहे लुटाते रहें , उड़ाते रहें । हालाँकि प्रदेश में विपक्षी दल काँग्रेस का निकम्मापन और मिल बाँटकर खाने की नीयत से साधी गई चुप्पी को सब भाँप चुके हैं , लेकिन हकीकत किसी ना किसी बहाने सामने आकर ही रहती है । अराजकता की सियासत के सहारे लम्बा सफ़र तय कर पाना नामुमकिन है ।

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

काँग्रेस ने दिया सुषमा स्वराज को वॉक ओवर

मध्यप्रदेश में बैतूल और रायसेन के ज़िला निर्वाचन अधिकारियों के फ़ैसलों ने कहीं खुशी - कहीं ग़म की स्थिति बना दी है । भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज की उम्मीदवारी के कारण हाई प्रोफाइल बनी मध्यप्रदेश की विदिशा संसदीय सीट से काँग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल का पर्चा खारिज हो गया है । वहीं बैतूल में भाजपा उम्मीदवार ज्योति धुर्वे के हक में निर्णय आया है । काँग्रेस ने श्रीमती धुर्वे का जाति प्रमाणपत्र फ़र्ज़ी होने का आरोप लगाया था । जाँच और दोनों पक्षों की दलील के बाद उनका पर्चा सही पाया गया ।

काँग्रेस उम्मीदवार राजकुमार पटेल ने अपने नामजदगी के पर्चे के साथ फार्म ए की मूल प्रति के स्थान पर छाया प्रति जमा की जिसे निर्वाचन अधिकारी ने अमान्य कर दिया है। इस मामले पर पार्टी में ही कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। लेकिन सारे मामले में पटेल की "भूमिका" की जांच चुनाव के बाद ही होगी । बैकफुट पर नजर आ रही पार्टी अब अन्य विकल्प तलाशने के साथ ही प्रतिष्ठा बचाने के प्रयास में जुटी है।

पार्टी के नेता हैरान हैं कि भाजपा की राष्ट्रीय नेता के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी और पूर्व मंत्री श्री पटेल से ए फार्म समय पर दाखिल करने के मामले में चूक कैसे हो गयी ? साथ ही इस क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी श्रीमती स्वराज को वॉकओवर देने का मुद्दा गर्माने को लेकर भी पार्टी में खलबली मची हुई है । इस घटनाक्रम से कार्यकर्ता हताश और नेता हतप्रभ हैं ।

दुविधा में फ़ँसी पार्टी अब नाक बचाने के लिये दूसरे विकल्प तलाश रही है । निर्दलीय के तौर पर पर्चा भरने वाले श्री पटेल के भाई देव कुमार पटेल को समर्थन देने के मुद्दे पर भी पानी फ़िर गया है । देवकुमार पटॆल का नामांकन भी रद्द हो जाने से कांग्रेस को एक बार फ़िर निराशा ही हाथ लगी है । दोनों ही नामांकन खारिज होने के बाद अब यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सुषमा स्वराज को काँग्रेस वॉकओवर देने जा रही है । हालांकि काँग्रेस पटेल प्रकरण पर सकते में है । पार्टी उनके खिलाफ़ निष्कासन जैसी कड़ी कार्रवाई का मन बना रही है ।

वैसे पटेल ने नामांकन फ़ॉर्म जमा करते समय जिस तरह की मासूमियत दिखाई ,वह चौंकाने वाली है । काँग्रेस को इससे भारी फ़जीहत का सामना करना पड़ रहा है । विदिशा से सुषमा स्वराज का नाम सामने आने के बाद पार्टी ने किसी नए चेहरे पर दाँव लगाने की बजाय तज़ुर्बे को तरजीह देते हुए पटेल की दावेदारी को बेहतर समझा । काँग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि उम्मीदवारों को नामांकन फ़ॉर्म भरने से जुड़ी सभी ज़रुरी बातें अच्छी तरह समझाई जाती हैं । पटेल के मामले में जानकारों को साज़िश की बू आ रही है क्योंकि पटेल को खुद कई चुनाव लड़ने का अनुभव है ।

अब उनका इतिहास भी खंगाला जा रहा है । वे बुधनी से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ़ भी चुनाव लड़ चुके हैं । इसे दिलचस्प संयोग ही कहा जाए कि उस वक्त भी उन्होंने नामांकन पत्र में अपनी पार्टी का नाम ही ग़लत भर दिया था । वहाँ मौजूद कुछ वरिष्ठ लोगों ने तत्काल भूल सुधरवा दी थी । हारने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी ,लेकिन वे एक बार भी गवाही के लिये अदालत नहीं पहुँचे । लिहाज़ा मामले में एकतरफ़ा फ़ैसला सुना दिया गया ।

बहरहाल काँग्रेस प्रत्याशी श्री पटेल का कहना है कि वे कानूनी परामर्श के बाद कदम उठाएंगे । उन्होंने कहा कि जिला निर्वाचन अधिकारी ने अन्य प्रत्याशियों से तीन बजे के बाद भी दस्तावेज लिए लेकिन सिर्फ उन्हीं से फार्म ए नहीं लिया। फार्म ए कलेक्टर को तीन बजकर सात मिनट पर दिया गया था जबकि नामांकन पत्र 2 बजकर 14 मिनट पर जमा किया गया।

उधर सूत्रों का कहना है कि काँग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल ने शनिवार को दोपहर 4.10 बजे जिला निर्वाचन अधिकारी को एक आवेदन दिया था । जिसमें उन्होंने कहा था कि वे निर्धारित समय से विलंब से अपना "ए" फार्म जमा कर रहे हैं। इसे स्वीकार करने के बारे में जिला निर्वाचन अधिकारी का जो भी निर्णय होगा वह उन्हें मंजूर होगा । मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के सूत्रों के अनुसार प्रत्याशी को नामांकन पत्र दाखिल करने के साथ निर्धारित समयसीमा में फार्म ए भी निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। अन्यथा प्रत्याशी संबंधित राजनीतिक दल का नहीं माना जाएगा।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

चुनावी समर में काँग्रेस बनी रणछोड़दास

लोकसभा चुनावों को लेकर मध्यप्रदेश में बीजेपी हर मोर्चे पर बढ़त लेकर बुलंद हौंसलों के साथ आगे बढ़ रही है ,जबकि काँग्रेस टिकट बँटवारे को लेकर मचे घमासान में ही पस्त हो गई है । रणछोड़दास की भूमिका में आई काँग्रेस ने पूरे प्रदेश में थके-हारे नेताओं को टिकट देकर बीजेपी की राह आसान कर दी है । एकतरफ़ा मुकाबले से मतदाताओं की दिलचस्पी भी खत्म होती जा रही है । काँग्रेस की गुटबाज़ी को लेकर उपजे चटखारे ही अब इन चुनावों की रोचकता बचाये हुए हैं । बहरहाल जगह-जगह पुतले जलाने का सिलसिला और हाईकमान के खिलाफ़ नारेबाज़ी ही इस बात की तस्दीक कर पा रहे हैं कि प्रदेश में काँग्रेस का अस्तित्व अब भी शेष है ।

मध्यप्रदेश में अब तक लगभग सभी सीटों पर बीजेपी और काँग्रेस उम्मीदवारों की घोषणा से स्थिति स्पष्ट हो चली है । चुनाव की तारीखों से एक महीने पहले उम्मीदवारों का चयन पूरा कर लेने का दम भरने वाली काँग्रेस अधिसूचना जारी होने के बावजूद होशंगाबाद और सतना सीट के लिये अभी तक किसी नाम पर एकराय नहीं हुई है । गुटबाज़ी का आलम ये है कि काँग्रेस के दिग्गजों को बीजेपी से कम और अपनों से ज़्यादा खतरा है , लिहाज़ा वे अपने क्षेत्रों में ही सिमट कर रह गये हैं ।

भाजपा ने 29 लोकसभा सीटों में से 28 और कांग्रेस ने 27 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। अपनी घोषणा के अनुसार बीजेपी ने एक भी मंत्री को चुनाव मैदान में नहीं उतारा , अलबत्ता पूर्व मंत्री और दतिया के विधायक डा. नरोत्तम मिश्रा को गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ़ मैदान में उतारा है , जबकि कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए पांच विधायक , सज्जन सिंह वर्मा (देवास), सत्यनारायण पटेल (इंदौर), विश्वेश्वर भगत (बालाघाट), रामनिवास रावत (मुरैना) और बाला बच्चन (खरगोन) को चुनावी समर में भेजा है । मगर काँग्रेस दो मजबूत दावेदारों को भूल गई । प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष अजय सिंह सीधी से मजबूत प्रत्याशी माने जा रहे थे। चुनाव लड़ने के इच्छुक श्री सिंह पिछले तीन महीने से सीधी लोकसभा क्षेत्र में सक्रिय थे । इसी तरह विधानसभा में प्रतिपक्ष की नेता जमुना देवी के विधायक भतीजे उमंग सिंघार को भी लोकसभा का टिकिट नहीं मिला।

प्रदेश में काँग्रेस की दयनीय हालत का अँदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भोपाल सीट के लिए स्थानीय पार्षद स्तर के नेता भी टिकट की दावेदारी कर रहे थे । आखिरी वक्त पर टिकट कटने से खफ़ा पूर्व विधायक पीसी शर्मा तो बगावत पर उतारु हैं । विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाने पर श्री शर्मा ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऎलान कर दिया था । लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारी के वायदे पर मामला शांत हो गया था , लेकिन हाईकमान की वायदाखिलाफ़ी से शर्मा समर्थक बेहद खफ़ा हैं और ना सिर्फ़ सड़कों पर आ गये हैं , बल्कि इस्तीफ़ों का दौर भी शुरु हो चुका है ।

काँग्रेस की कार्यशैली को देखकर लगता है कि तीन महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाने के बावजूद मिली करारी शिकस्त से प्रदेश काँग्रेस और आलाकमान ने कोई सबक नहीं लिया । अब भी पार्टी के क्षत्रप शक्ति प्रदर्शन में मसरुफ़ हैं । हकीकत यह है कि प्रदेश में काँग्रेस की हालत खस्ता है । लोकसभा प्रत्याशियों की सूची पर निगाह दौड़ाने से यह बात पुख्ता हो जाती है । उम्मीदवारों के चयन में चुनाव जीतने की चिंता से ज़्यादा गुटीय संतुलन साधने की कोशिश की गई है । इस बात को तरजीह दी गई है कि सभी गुट और खासकर उनके सरदार खुश रहें । विधानसभा चुनाव में भी टिकट बँटवारे की सिर-फ़ुटौव्वल को थामने के लिये ऎसा ही मध्यमार्ग चुना गया था और उसका हश्र सबके सामने है ।

इस पूरी प्रक्रिया से क्षुब्ध वरिष्ठ नेता जमुना देवी ने जिला अध्यक्षों की बैठक में साफ़ कह दिया था कि प्रदेश में पार्टी को चार-पाँच सीटों से ज़्यादा की उम्मीद नहीं करना चाहिए । हो सकता है ,उनके इस बयान को अनुशासनहीनता माना जाये लेकिन उनकी कही बातें सौ फ़ीसदी सही हैं । सफ़लता का मीठा फ़ल चखने के लिए कड़वी बातों को सुनना - समझना भी ज़रुरी है , मगर काँग्रेस फ़िलहाल इस मूड में नहीं है ।

मंगलवार, 24 मार्च 2009

भाजपा से हर मोर्चे पर पिछड़ी काँग्रेस

मध्यप्रदेश में भाजपा ने धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए बढ़त हासिल कर ली है । उम्मीदवारों के चयन का मामला हो या चुनाव प्रचार में मुद्दे खड़े कर उन्हें भुनाने की कोशिश ... बीजेपी हर मोर्चे पर काँग्रेस से चार हाथ आगे ही है । बीजेपी अपने खिलाफ़ जाते माहौल को पक्ष में करने के लिये पूरे प्रदेश में न्याय यात्राएँ निकाल रही है । हर उम्मीदवार के साथ एक आईटी एक्सपर्ट तैनात कर दिया है । महिला मोर्चा , श्रमिक प्रकोष्ठ और किसान मोर्चा भी रणनीति बनाने में जुट गया है , जबकि काँग्रेस मुख्यालय में सुई पटक सन्नाटा पसरा है । कार्यालय म्रें नेता नदारद हैं , तो कार्यकर्ताओं का भी भला क्या काम ...?


काँग्रेस की चुनाव समिति ने मध्यप्रदेश के तीन और उम्मीदवारों के नामों पर मुहर लगा दी है । शनिवार को जारी तीसरी सूची में मंडला से दिग्विजय सरकार में मंत्री रहे बसोरी सिंह मरकाम और बैतूल से ओझाराम इवने के नाम शामिल हैं । विदिशा से राजकुमार पटेल भाजपा की दिग्गज सुषमा स्वराज के खिलाफ़ चुनाव मैदान में उतरे हैं । श्री पटेल और श्री ओझाराम के नाम पहले ही घोषित कर दिये गये थे लेकिन उन्हें पुनर्विचार के लिए रोक लिया गया था ।

इस तरह काँग्रेस ने 29 में से 22 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय कर दिये हैं ,जबकि भाजपा 26 संसदीय क्षेत्रों के लिये नामों की घोषणा कर चुकी है । भोपाल, इंदौर, देवास, होशंगाबाद, सीधी, सतना और राजगढ़ का मामला अभी भी अटका हुआ है। ये सभी सीटें कांग्रेस के दिग्गजों के प्रभाव क्षेत्र की हैं।

होशंगाबाद से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी को चुनाव मैदान में उतारने का फ़ैसला हाईकमान को करना है । पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह दस साल तक चुनाव नहीं लड़ने की प्रतिज्ञा लिये बैठे हैं , जबकि राजगढ़ में दिग्गी राजा के समर्थक किसी और नाम पर समझौते के लिये राज़ी नहीं हैं । इसी तरह सीधी से अर्जुन सिंह के बेटे और सतना से उनकी बेटी को टिकट देने का मामला भी उलझा है ।

भोपाल से मुस्लिम उम्मीदवार को उतारने की माँग भी ज़ोर पकड़ रही है । इसके अलावा भोपाल में कायस्थ मतदाताओं की भारी तादाद के मद्देनज़र कायस्थ प्रत्याशी के रुप में प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री का नाम भी चर्चा में है । यहाँ करीब पौने तीन लाख कायस्थ मतदाता हैं । वर्ष 1989 से लगातार भाजपा भोपाल सीट पर काबिज़ है । प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव सुशील चंद्र वर्मा ने भाजपा के टिकट से चुनाव लड़कर भोपाल सीट काँग्रेस के हाथों से छीनी थी । वे लगातार चार मर्तबा सांसद चुने गये । वर्मा से पहले काँग्रेस के के.एन.प्रधान ने दो बार संसद में भोपाल का प्रतिनिधित्व किया । ये दोनों ही नेता कायस्थ समाज से ताल्लुक रखते थे ।

विदिशा सीट पर जानकार मुकाबला एकतरफ़ा मान रहे हैं , जबकि कांग्रेस काँटे की टक्कर का दावा कर रही है । एक तरफ़ सुषमा राष्ट्रीय नेता हैं , ये और बात है कि वे अब तक कोई भी संसदीय चुनाव नहीं जीत सकी हैं । ऎसे में वे भी विदिशा जैसी सुरक्षित सीट से जीत कर अपना इतिहास बदलना चाहेंगी । दूसरी ओर काँग्रेस भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने का प्रयास कर निष्प्राण हो चुके संगठन में जोश भरने की कोशिश ज़रुर करेगी ।

विदिशा के लिये काँग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल बुधनी से एक बार विधायक रहे हैं । उन्होंने विधानसभा का एक चुनाव भोजपुर और एक चुनाव बुधनी से हारा है । वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा । वे एक मर्तबा बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा से विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। कांग्रेस में माना जा रहा है कि पटेल इस संसदीय क्षेत्र में श्रीमती स्वराज को कड़ी टक्कर देंगे । स्थानीय नेता का मुद्दा कितना ज़ोर लगा पायेगा यह कह पाना मुश्किल है ।

विदिशा भाजपा का अजेय दुर्ग माना जाता है । इस संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को पाँच बार संसद के गलियारों में दाखिल होने का मौका दिया । काँग्रेस विदिशा और भोपाल सीट को प्रतिष्ठा का प्रश्न मान कर चल रही है । इसीलिए अंतिम वक्त तक जिताऊ प्रत्याशियों की तलाश में मगजपच्ची की जा रही है ।

सोमवार, 23 मार्च 2009

काँग्रेस ही बनायेगी वरुण को बड़ा नेता

देश में आजकल मुद्दों पर राजनीति नहीं गर्माती । अब तो सियासत होती है खेलों , पुरस्कारों और बयानों पर । मालूम होता है भारत में चारों तरफ़ खुशहाली है । मुद्दे कोई शेष नहीं इसलिए लोग शगल के लिए बहस मुबाहिसे करते हैं । आई पी एल देश में हो या सात समुंदर पार इससे आम जनता को क्या ? लेकिन धनपशुओं का खेल दुनिया भर में भारत की नाक का सवाल बन गया है ।

खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाकामी हाथ आने पर नेता एक ही बात कहते सुनाई देते हैं कि खेलों को राजनीति से दूर रखा जाये , लेकिन खेल के मैदान राजनीति के अखाड़ों में तब्दील हो गये हैं । आईपीएल को लेकर चल रही उठापटक में अब तक राज्यों के पाले में गेंद डाल रहे गृहमंत्री पी. चिदाम्बरम नरेन्द्र मोदी के बयान के बाद आज अचानक मीडिया से मुखातिब हुए । गुजरात के मुख्यमंत्री ने अपने चिरपरिचित अँदाज़ में आईपीएल को देश की प्रतिष्ठा के प्रश्न से जोड़्कर केन्द्र को आड़े हाथों क्या लिया , यूपीए सरकार को मामले में सियासत की गँध आने लगी ।

दरअसल इस मुद्दे पर पहली चाल तो काँग्रेस ने ही चली थी । शरद पवार से महाराष्ट्र में सीटों के बँटवारे को लेकर चल रही खींचतान में दबाव की राजनीति के चलते आईपीएल को मोहरे की तरह इस्तेमाल करने का दाँव खुद काँग्रेस पर उलट गया । ना तो शरद पवार झुके और ना ही दबाव काम आया । बाज़ी पलटते देख केन्द्र सरकार को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा है ।

लगता है काँग्रेस के ग्रह नक्षत्र आज कल ठीक नहीं चल रहे । ’ उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ ना दवा ने काम किया ’ की तर्ज़ पर जहाँ हाथ डाला , वहीं बाज़ी उलट गई ।वरुण गाँधी को पीलीभीत में भड़काऊ भाषण देने के मामले में ऊपरी तौर पर यह चुनाव आयोग से जुड़ा मामला नज़र आता है लेकिन इसके सूत्र कहीं और से संचालित होते दिखाई दे रहे हैं । देश में पहली मर्तबा ऎसा हुआ है जब चुनाव आयोग ने सीधे किसी पार्टी को यह सलाह दे डाली है कि वह अमुक उम्मीदवार को टिकट ना दे ।

संविधान के जानकारों की राय में आयोग का दायित्व चुनाव प्रक्रिया के संचालन तक सीमित है ।गौर करने वाली बात यह भी है कि देश में इससे पहले क्या किसे ने तीखे भाषण नहीं दिये ? कहा तो यह भी जाता है कि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी का एक बयान दिल्ली में सिखों के कत्ले आम का सबब बना । ऎसा लगता है कि वरुण की बढ़ती लोकप्रियता ने किसी "माँ" की चिंताएँ बढ़ा दी हैं । दलितों के घर भोजन करके और सिर पर मिट्टी ढ़ोकर भी राहुल बाबा का राजनीतिक कद बढ़ना मुमकिन नहीं हो पाया है । एक आम भारतीय माँ की तरह सोनिया मैडम भी अपनी आँखों के सामने बेटे को सफ़लता से सत्तासूत्र सम्हाले देखना चाहती हैं , तो इसमें किसी को क्या दिक्कत है ?

" हारेगा जब कोई बाज़ी तभी तो होगी किसी की जीत " इसलिये राहुल को सत्ताशीर्ष तक पहुँचाने में एकाएक आ खड़ी हुई बाधा को किसी भी तरह से दूर तो करना ही होगा । असली - नकली गाँधी की लड़ाई में राजमोहन गाँधी की बजाय जनता ने भले ही दत्तक पुत्र के वंशजों को चुन लिया हो लेकिन अब जबकि इन्हीं वंशजों में से किसी एक को चुनने की बारी आएगी , तो जनता योग्यता के आधार चुनाव करेगी । सियासत में योग्यता का पैमाना लटके- झटके नहीं जनता के बीच पैठ होता है ।

मीडिया की मदद और सरकारी लवाजमे की पुरज़ोर कोशिशों के बावजूद राहुल गाँधी उस मुकाम पर अब तक नहीं पहुँच पाये हैं , जहाँ बरसो से निर्वासित जीवन जी रही मेनका गाँधी का बेटा एक झटके में पहुँच गया । यहाँ एक सवाल और भी है कि हिन्दू शब्द क्या वाकई भड़काऊ है ? अबू आज़मी , अमरसिंह , सैयद शहाबुद्दीन , बनातवाला , आज़म खाँ ऎसे नाम हैं जो जनसभाओं में तो आग उगलते ही रहे , संसद के भीतर भी ज़हर उगलने से बाज़ नहीं आये ।

अब तक ह्त्या,लूट, डकैती ,फ़िरौती ,धोखाधड़ी के मामलों में सज़ायाफ़्ता या अनुभवी जेल यात्री ही चुनाव लड़ते रहे हैं । लम्बे समय बाद कोई नेता सियासी दाँवपेंचों के चलते जेल की हवा खा ही आये , तो भी क्या ...? इससे लोकतंत्र का सीना गर्व से चौड़ा ही होगा । इन सभी बातों पर गौर करने के बाद हिन्दूवादियों से आग्रह है कि वे इसे "कहानी घर-घर की" समझ कर ही प्रतिक्रिया दें ।

हर मोर्चे पर लगातार पिट रही काँग्रेस को वरुण मामले में भी मुँह की खाना पड़ेगी । चाहे-अनचाहे मीडिया की नेगेटिव पब्लिसिटी धीरे-धीरे गाँधी खानदान के नवोदित सितारे को स्थापित कर देगी । ऎसे में जेल यात्रा का सौभाग्य मिल गया तो भाजपा की बल्ले-बल्ले और वरुण की चाँदी ही चाँदी .....????? लगता है काल का चक्र घूम रहा है । सियासी कुरुक्षेत्र में वक्त रुपी कृष्ण वरुण के पक्ष में खड़ा है ।

मामला ऎसे दिलचस्प मोड़ पर आ गया है कि हर हाल में फ़ायदा वरुण को ही मिलता दिखाई देता है । कहते हैं बुरे वक्त में साया भी साथ छोड़ देता है । पाँच साल सरकार में रहकर गलबहियाँ करने वाले क्षेत्रीय दलों ने चुनाव से पहले ठेंगा दिखा दिया है । जो कल तक हमसफ़र थे वे अब रक़ीब हैं ।

मंगलवार, 3 मार्च 2009

धूमधाम से मनेगा शिवराज का "प्रकटोत्सव"

सामंती युग में राज परिवारों में सालगिरह मनाने का रिवाज़ था । लोग तोहफ़े - नज़राने देकर राजा के प्रति अपनी निष्ठा का मुज़ाहिरा पेश करते थे । अब ज़माना कुछ और है । कहते - कहते ज़ुबान थक गई है , फ़िर भी याद बताना ज़रुरी है कि भारत में अब भी लोकतंत्र बरकरार है । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री तो इतने विनम्र और सेवाभावी हैं कि वे खुद को हमेशा जनता का सेवक बताते नहीं थकते । उनकी निगाह में जनता ही उनकी भगवान है और वे उस के सच्चे सेवक.....??????

बहरहाल , इस तरह की विनम्रता सिर्फ़ शिवराजजी को ही शोभा देती है । कहते हैं ना कि जिसमें जितनी गुरुता वो उतना विनम्र ..। सो पाँव - पाँव भैया भले ही उड़न खटोला खरीदने की हैसियत वाले हो गये हैं लेकिन विनम्रता का लबादा ओढे रहने में भी वे बेमिसाल हैं ।

अब आते हैं मूल मुद्दे पर । वन - वन भटकने वाले श्रीराम की तुलना में माखन चोर , चितचोर नटखट नटवर नागर , कन्हैया का जन्मदिन बड़े पैमाने पर धूमधाम से मनाने की प्राचीन परंपरा रही है । जय हो .. मीडिया की , जिसकी मेहरबानी से भोलेशंकर के विवाह उत्सव भी पूरे तामझाम के साथ धूमधड़ाके से मनाने की परंपरा भी अब ज़ोर पकड़ने लगी है । लेकिन फ़िर भी थोड़ी कसर तो रह ही गई , शिवशंकर का जन्मदिन धूमधाम से मनाने की । मगर मध्यप्रदेश के शिवराज भी किसी "भोले भंडारी" से कम नहीं । इसलिए पाँच मार्च को प्रदेश के उत्साही भाजपाइयों ने उनका पचासवाँ जन्मदिन हर्षोल्लास से मनाने की तैयारी कर ली है ।

राजसी ठाट बाट से शपथ ग्रहण के बाद अब भाजपा सरकार के मुखिया का जन्मदिन भी शानोशौकत से मनाने के लिए राजधानी के व्यापारियों से सहयोग की गुज़ारिश की गई है । हो सकता है ऎसा ही सहयोग हर छोटे बड़े शहर के व्यापारियों से भी माँगा जा रहा हो । पाँच मार्च को पूरा भोपाल शिवराज का जन्मदिन मनाता दिखे , इसके लिए जगह - जगह होर्डिंग- बैनर लगाने की योजना है । भाजपाइयों ने महाभोज की तैयारी भी की है ।

’ जिसकी जितनी श्रद्धा , उसका उतना चढावा और बदले में उतनी ही परसादी ’ की तर्ज़ पर व्यापारियों से कहा गया है कि वे शकर ,आटा ,चावल सहित अन्य ज़रुरी सामग्री पहुँचायें ।शिवराज के मुख्यमंत्री बनने से पहले तक पाँच मार्च एक गुमनाम तारीख थी लेकिन पिछले तीन सालों से जन्मदिन मनाने की भव्यता के साथ ही इसकी व्यापकता भी विस्तार पा रही है । पिछले साल तीन हज़ार भाजपाई ही " शिवराज जन्मोत्सव " के छप्पन भोग का रसास्वादन कर पाये थे । लेकिन " बर्थ डे ब्वाय " इस मर्तबा चाहे जितनी ना नुकुर कर लें , दस हज़ार कार्यकर्ताओं को "जिमाने" के लिए रसद पानी का इंतज़ाम तो जनता को करना ही होगा ।

जुम्मा - जुम्मा चार दिन नहीं बीते जब शिवराज तामझाम नहीं काम की सीख देते घूम रहे थे । सार्वजनिक मंचों पर फ़ूलमालाओं से होने वाले स्वागत - सत्कार से भी परहेज़ की बात करने वाले शिवराज का इस जन्मोत्सव के बारे में क्या खयाल है ? भई हम तो कुछ नहीं कहेंगे । चुप ही रहेंगे । मन ही मन गुनगुनाएँगे - भये प्रकट कृपाला दीनदयाला , कौसल्या (भाजपा) हितकारी , हर्षित महतारी मुनि मन हारी अदभुत रुप बिचारी ।

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

सियासी गलियारों में लडखडाहट भरे आगे बढते कदम

आज भोपाल में शिवराज मंत्रिमंडल का गठन हो गया । लोगों की उम्मीद के मुताबिक ज़्यादातर मंत्रियों के चेहरे जाने पहचाने हैं । मंत्रिमंडल में बडे पैमाने पर रद्दोबदल ना तो मुख्यमंत्री के बूते की बात है और ना ही पार्टी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र कोई बडा जोखिम लेने की स्थिति में है । शिवराज सिंह ने अपनी टीम में दो महिला विधायकों को भी शामिल किया है , लेकिन ये आंकडा आधी दुनिया की नुमाइंदगी के लिहाज से नाकाफ़ी लगता है ।

प्रदेश में सर्वाधिक 85 हज़ार 362 वोट बटोर कर बुरहानपुर सीट जीतने वाली अर्चना चिटनीस को मंत्री बनाया गया है । इसी तरह मनावर से जीती रंजना बघेल को राज्यमंत्री के तौर पर जगह मिली है । 13 वीं विधान सभा में राज्य की जनता ने 25 महिलाओं को अपने क्षेत्र की आवाज़ बुलंद करने का दायित्व सौंपा है । 230 सीटों की विधान सभा में 25 का आंकडा काफ़ी छोटा मालूम देता है , लेकिन प्रदेश में ऎसा तीसरी बार हुआ है ,जब दस फ़ीसदी से अधिक महिलाओं को विधान सभा में दाखिल होने का मौका मिल सका है ।

मध्यप्रदेश के इतिहास में विधान सभा पहुंचने वाली महिलाओं का आंकडा हमेशा ही निराशाजनक रहा है । अब तक सबसे अधिक 11.80 फ़ीसदी प्रत्याशी 1957 में जीतीं थी ,लेकिन इन आंकडों से तुलना बेमानी होगा क्योंकि तब छत्तीसगढ भी प्रदेश का ही हिस्सा था और सीटों की कुल संख्या 320 थी हालांकि ये संख्या काबिले गौर भी है ,क्योंकि ये उस दौर की बात है जब महिलाओं के लिए समाज में आगे बढने के अवसर बेहद सीमित थे । घर की चहारदीवारी में कैद महिलाओं के लिए सियासी मसले पेचीदा माने जाते रहे और राजनीति में महिलाओं के दखल को समाज में खास तवज्जो भी नही दी जाती थी । मौजूदा दौर में महिलाओं पर आधुनिकता का रंग तो खूब चढा लेकिन विधान सभा की दहलीज़ पर कदम रखने में अभी भी हिचकिचाहट बरकरार है ।

उत्साहजनक बात ये है कि इस बार 25 महिलाएं चुनकर आई हैं , जबकि पिछली मर्तबा 19 महिला विधायक थीं । बीजेपी से 15 महिलाओं को सफ़लता मिली है , जबकि 8 महिलाएं विधान सभा में कांग्रेस की नुमाइंदगी करेंगी । उमा भारती की भारतीय जन शक्ति और समाजवादी पार्टी ने भी एक - एक महिला विधायक को सदन तक पहुंचाने में कामयाबी पाई है ।

हाल ही में विधानसभा चुनावो में भाजपा को महिला मतदाताओं से मिलने वाले वोटों में इज़ाफ़ा हुआ है । सांगठनिक ढांचे में 33 फ़ीसदी आरक्षण देने वाली भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर मानते हैं ,“ भाजपा मानती है कि जब तक देश की 50 फ़ीसदी महिलाओं की आबादी सक्षम नहीं होगी तब तक देश का विकास अधूरा रहेगा ।”
तू फ़लातूनो- अरस्तू है तू ज़ुहरा परवीं
तेरे कब्ज़े में है गर्दूं , तेरी ठोकर में ज़मीं
हां , उठा , जल्द उठा पाए -मुकद्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं ,वक्त भी रुकने का नहीं
लडखडाएगी कहां तक कि संभलना है तुझे ।