पत्रकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पत्रकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 20 जनवरी 2016

मध्यप्रदेश का घोटाला पुराण


257 साइट्स को 12 करोड़ 73 लाख 23 हजार 527 रुपए    59 चैनलों को 80 करोड़ 53 लाख 68 हजार 306 रुपए का भुगतान 
लोकल चैनल को 73 करोड़
107 प्रचार संस्थाओं को 57 करोड़ 80 लाख 68 हजार 793
केवल एक ही संस्था को 21 करोड़ से ज्यादा

 किस चैनल को कितना भुगतान 
एबीपी न्यूज़              12 करोड़ 76 लाख
सहारा समय              12 करोड़ 50 लाख
इंडिया न्यूज़               8 करोड़ 68 लाख        
सीएनबीसी आवाज          6 करोड़ 50 लाख
ज़ी मीडिया                6 करोड़ 10 लाख
टाइम्स नाउ               1 करोड़ 39 लाख
न्यूज़ वर्ल्ड                1 करोड़ 28 लाख
टी वी उर्दू               लगभग 1 करोड़
एनडीटीवी                 12 लाख 84 हजार
 मध्यप्रदेश के स्थानीय चैनल
टीवी मध्यप्रदेश       13 करोड़
बंसल न्यूज़            11 करोड़ 57 लाख
साधना न्यूज़ मध्यप्रदेश   8 करोड़ 78 लाख
दूरदर्शन               मात्र 8 लाख

लोकल चैनल आपरेटर
हाथवे इंदौर                        50 लाख
सुदर्शन न्यूज़                      14 लाख
सिटी केबल                        84 लाख
भास्कर मल्टीनेट                    6 लाख 95 हजार
सेंट्रल इंडिया डिजिटल नेटवर्क          1 करोड़ 41 लाख

सोमवार, 20 जून 2011

कलम के सिपाही गोली के शिकार

पत्रकारिता हमेशा से जोखिम भरा काम रहा है, लेकिन इस खतरे में वैश्विक तौर पर लगातार इजाफा हो रहा है। जनहित और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले इन खतरों से बखूबी वाकिफ़ हैं। पूँजीवाद के दौर में कलम के सिपाहियों को माफ़ियाओं के साथ ही सत्ता के नशे में चूर राजनीतिज्ञों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है । आज खबर लेना और खबर देना दोनों खतरे में हैं। पत्रकारों पर बढ़ रहे ऐसे हमलों से प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती जा रही है। इस समय पत्रकारों को सरकार और गैर कानूनी काम करने वालों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। मुंबई में अँग्रेजी अखबार "मिड डे" के क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या और बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली के कपिल शर्मा का मामला ताजातरीन मिसाल है।

अभी पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शाहजाद की हत्या का पखवाड़ा भी नहीं बीता था कि मुम्बई में क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या कर दी गई। शहजाद जिस तरह आईएसआई और कट्टरपंथी तबकों की बखिया उधेड़ रहे थे। उसी तरह ज्योतिर्मय डे भी मुंबई की माफिया जमात पर अपनी खोजी रिपोर्टिंग से लगातार खतरे खड़े कर रहे थे। अपने साथियों के बीच "जेडे" के नाम से मशहूर क्राइम रिपोर्टर,बीते कुछ महीनों से डीजल माफिया के खिलाफ धारावाहिक खोज रिपोर्टों के जरिए अभियान चला रहे थे।मुम्बई में अंडरवर्ल्ड पर कई रिपोर्ट लिखने वाले जेडे की मोटरसाइकिल सवार चार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पहले बीते साल 20 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह घर लौट रहे थे। इस साल 23 जनवरी को नईदुनिया के पत्रकार उमेश राजपूत की मोटरसाइकिल सवार नकाबपोशों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

दूसरी तरफ़ हकीकत सामने लाने का साहस दिखाने वाले नामानिगारों को सबक सिखाने के लिये सरकारों के पास तमाम हथकंडे हैं। 11 और 12 जून 2011 की दरम्यिनी रात बिजनेस स्टैंडर्ड के पत्रकार कपिल शर्मा को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेकर प्रताड़ित करने का मामला भी सामने आया। इसी तरह 26/11 हमले में जब्त हथियार खुले में रखे होने के मामले को सामने लाने वाले मुम्बई के पत्रकार ताराकांत द्विवेदी को सरकारी गोपनीयता कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया । अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता उल्लंघन के मामलों पर निगरानी रखने वाले 'द फ्री स्पीच ट्रैकर' के अनुसार,देश में पत्रकारों पर हमले की वारदात तेज़ी से बढ़ रही हैं। सम्पादकों और लेखकों को लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। संगठन ने पत्रकारों पर हुए 14 हमलों का हवाला देते हुए कहा है कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में है ।

माफिया से टकराने की कीमत जेडे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनकी हत्या पेट्रोलियम माफिया ने की या किसी अंडरवर्ल्ड गिरोह ने या फिर उसके पीछे किसी नौकरशाह अथवा नेता का हाथ है। इस पर फ़िलहाल कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन मामले की जाँच में सामने आये तथ्य जेडे के खुलासों से माफिया जगत में मची खलबली की पुष्टि करते हैं। उन्हें मिल रही धमकियाँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। डीजल माफिया की शासन-प्रशासन से साँठ-गाँठ अब जगज़ाहिर है। कुछ लोग तो सप्रमाण कहते हैं कि छुटभैये नेता डीजल माफिया के पेरोल पर होते हैं । अपने कारोबार में आड़े आने वाले सरकारी मुलाज़िमों को रास्ते से हटाने में भी इन्हें कोई गुरेज़ नहीं होता।

जेडे तीसरे भारतीय पत्रकार थे, जिनकी पिछले छह माह में हत्या की गई। इन सभी मामलों में जाँच जारी है, लेकिन कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं आये हैं। पत्रकारों की हत्या के मामले तो सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन गुत्थियाँ अनसुलझी ही रह जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्था की ओर से बनाए गए ‘माफी सूचकांक 2011’ के अनुसार पत्रकारों की हत्या की गुत्थी न सुलझा सकने वाले देशों में भारत 13वें स्थान पर है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 10वें और बांगलादेश 11वें स्थान पर है। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (सीपीजे) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सात अनसुलझे मामलों के साथ 13वें स्थान पर है। एक साल में पूरी दुनिया में होने वाले कार्य संबंधी हत्याओं में 70 प्रतिशत मामले पत्रकारों के हैं। सूचकांक में पत्रकारों की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों का प्रतिशत जनसंख्या के अनुपात में निकाला गया है। यहाँ ऐसे मामलों को अनसुलझा माना गया है, जिसमें अभी तक कोई आरोपी पकड़ा नहीं गया है। फ़ेहरिस्त में इराक पहले स्थान पर है। वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों और खतरनाक अभियानों के दौरान बहुत ज्यादा संख्या में पत्रकारों की हत्या हुई है। इराक में 92 मामले अभी तक अनसुलझे हैं,जबकि फिलीपींस में इनकी संख्या 56 है। इसके बाद श्रीलंका और कोलंबिया का स्थान आता है।

दरअसल,विश्व भर में पत्रकारों की हत्याओं का सिलसिला किसी भी साल थमा नहीं है। भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अभिव्यक्ति के सिद्धांत पर अमल करते हुए पूरी दुनिया में हर साल सैकड़ों पत्रकार जान देते हैं।जेडे और शाहजाद इस मुहिम में अकेले नहीं रहे। संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक,वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2009 तक दुनिया में सच को आवाज़ देने की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए 247 पत्रकार कुर्बान हो गये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुहिम को कलम के माध्यम से आगे बढ़ाते हुए इस दौरान भारत में छह पत्रकार बलिदान हुए। यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन वर्षों में पत्रकारों की हत्या के मामलों से स्पष्ट है कि मीडिया से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं ।

ऐसा नहीं कि सिर्फ यूनेस्को ही ऐसी रिपोर्ट पेश कर रहा है। "विदाउट बॉर्डर्स" की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2010 में काम के दौरान 57 पत्रकार मारे गए। यह संख्या 2009 के 77 पत्रकारों की तुलना में कम है लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह है कि 2010 में 51 पत्रकारों को बंधक बनाया गया जो पिछले दो सालों की संख्या से कहीं ज्यादा है। "विदाउट बॉर्डर्स" के महासचिव जाँ फ्रांसोआ जूलियर्ड ने कहा भी कि पत्रकारों का बढ़ता अपहरण साबित करता है कि उनकी निष्पक्षता और काम का आदर अब नहीं किया जाता। उन्हें भी सत्ता का एक अंग समझा जाता है और अकसर उनका अपहरण सत्ता से कोई माँग पूरी करने के एवज में किया जाता है। पत्रकारों की हत्याओं ने इस सच्चाई से हमें रूबरू करा दिया है कि आर्थिक तरक्की और देश में एक लोकतांत्रिक सरकार के होते हुए भी पत्रकारों के लिए सुरक्षित जगह सिकुड़ती जा रही है। विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में भले ही अफगानिस्तान और नाइजीरिया को पत्रकारों के लिए सबसे असुरक्षित माना गया हो लेकिन भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं। फरवरी 2010 में जारी इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ने तो पत्रकारों के लिए दुनिया में सबसे खतरनाक जगह के रूप में भारत का स्थान मेक्सिको और फिलीपींस के साथ तीसरे नंबर पर रखा है।

जेडे हत्याकांड ने समाज में चलने वाली साजिशों,भ्रष्टाचार और गैरकानूनी धंधों को उजागर करने वाले पत्रकारों के लिए बढ़ते खतरे को एक बार फिर उजागर किया है। ये घटनाएँ यह बताती हैं कि किसी भी ताकतवर संस्था, व्यक्ति या गिरोह के कारनामों को जनता के सामने लाना कितना जोखिम भरा होता जा रहा है। सरकार एक तरफ "व्हिसल ब्लोअर बिल" लाकर गड़बड़ियों को सामने लाने वाले लोगों को संरक्षण देने की बात कर रही है और दूसरी तरफ पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे पत्रकारों को संरक्षण देने में नाकाम रही है। हत्यारों का मनोबल इसलिए बढ़ता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं। अगर इनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो पत्रकार ऐसे भ्रष्ट तत्वों का ‘आसान निशाना’ बने रहेंगे। सत्ता पक्ष मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहता है, इसलिए वह हमें भ्रष्ट भी कर रहा है।

चैनलों और समाचारपत्रों में ठेके की नौकरियों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। मीडिया हाउसों में श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, पर सरकार खामोशी से तमाशा देख रही है। दरअसल सरकारी तंत्र अपने काले कारनामों को छिपाने के लिये पत्रकारों को खरीदने या डराने का उपक्रम करता रहता है । सरकार खुद भी चाहती है कि पत्रकार असुरक्षित रहें, ताकि वे सत्ता के खिलाफ अपनी कलम नहीं चला सकें। वे नौकरी जाने की आशंका में अपना साहस और आत्मविश्वास खो दें। रोज़ी-रोटी के सवाल पर वे भीरू हो जाएं और अपना पैनापन खो बैठें। आर्थिक संकटों से जूझते खबरनवीसों का सत्ता पक्ष आज अपने लिए बेतरह इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल उठता है कि आखिर क्या कदम शासन उठाए कि कार्यरत पत्रकारों को अपेक्षित सुरक्षा उपलब्ध हो। पहला तो यही कि भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों में संशोधन किया जाये। पत्रकारों पर हमले को संज्ञेय और गैरजमानती अपराध करार दिया जाए। इससे कुछ तो बचाव होगा। कुछ लोग मुद्दा उठा सकते हैं कि ऐसी सहायता हर भारतीय नागरिक को मिले, केवल कार्यरत पत्रकारों को ही क्यों? यहाँ यह समझना होगा कि सीमा पर तैनात सैनिक की तरह ही पत्रकारों का काम भी खतरे भरा है, जहां हमले की आशंका निरन्तर है। आखिर पत्रकार जनसेवा में कार्यशील हैं। राष्ट्रहित और समाज को जागरुक करने में पत्रकार का योगदान किसी भी नज़रिये से सुरक्षा बलों या जननायकों से कमतर नहीं है।

भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कानून बनाने का मामला पिछले कई सालों से लंबित पड़ा है। अधिवेशनों में पत्रकार कानून बनाने की माँग उठाते रहे हैं। पत्रकार संगठनों द्वारा धरना-प्रदर्शन किया जाता है। सरकारें जल्द से जल्द कानून बनाने का आश्वासन देती हैं। नेता पत्रकारों पर होनेवाले हमले पर कानून बनाने की बात करते हैं। इस घटना में भी सब कुछ ऐसा ही हुआ है। जेडे के मारे जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा देने की बात कही है। असली सवाल फिर भी रह जाता है। क्या यह हकीकत नहीं है कि पत्रकारों पर होने वाले हमले को लेकर सरकार खुद ही कानून नहीं बनाना चाहती है ?

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

धोती- टीके वाले भी होते हैं तालिबानी

हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री की नव विवाहिता पत्नी ने नींद की गोलियां खा कर खुदकुशी की कोशिश क्या की , मीडिया को बैठे ठाले हफ़्ते भर का मसाला मिल गया । कल तक चांद की जगमगाती रोशनी में फ़िज़ा खुशनुमा थी , लेकिन तंगहाली के ग्रहण ने चांद को अपनी ओट में ले लिया । साथ जीने - मरने की कसमे टूटने की आशंका ने फ़िज़ा कुछ ऎसी बिगाडी कि अनुराधा बाली उर्फ़ फ़िज़ा को अस्पताल का रुख करना पड गया ।

न्यूज़ चैनलों को लंबे समय बाद इतना चटपटा और धमाकेदार मसाला मिला है । चांद मोहम्मद के घर से गायब होने की खबर आते ही लंबे समय से सूखॆ की मार झेल रहे खबरचियों ने डेरा डाल लिया और पल - पल की एक्सक्लूसिव तस्वीरें और खबर अपने दर्शकों तक पहुंचाने में जुट गये । अभी ज़्यादा वक्त नहीं बीता ,जब सरकारी नियंत्रण को मीडिया जगत पर हमला बताया था और आत्म नियंत्रण का भरोसा भी दिया था । लेकिन ये क्या ...? कल तक जो चैनल तालिबानी वीडियो दिखाने वाले चैनलों की पोल खोल रहा था , आज वो भी फ़िज़ा और चांद से जुडी खबरों को फ़िल्मी गानों की चाशनी में "पाग" कर दर्शकों को परोस रहा था । समाचार जानने के उत्सुक लोगों को वो टेबलेट्स दिखाई जा रही थी , जिनको खाकर फ़िज़ा ने मीडिया को इतनी ज़बरदस्त स्टोरी तैयार करने का मौका दिया ।

इस शोरशराबे में लेकिन एक अहम सवाल कहीं गुम हो गया है । औरत के अस्तित्व का सवाल । पूरा देश "शरीया कानून" की आड में मज़हब का मखौल उडाने का तमाशा देखता रहा । कहीं कोई आवाज़ नहीं , कोई चिंता नहीं । चार दिन बीते नहीं कि प्रेम का बुखार उतर गया ।

कानून की जानकार और अपने हक को बखूबी समझने वाली एक ऎसी औरत ,जो अपने प्यार को पाने के लिए हरियाणा जैसे रुढिवादी समाज से भी नहीं हारी ,अगर मौत को गले लगाने का फ़ैसला लेती है , तो क्या औरतों के हक के लिए लडने वालों के लिए चुनौती पेश नहीं करती । इस मामले के साथ देश में बडे पैमाने पर महिलाओं के हक से जुडे मुद्दों पर नई बहस होना चाहिए । साथ ही सभी को एक ही कानून के दायरे में लाने की बात भी होना चाहिए । " एक मुल्क - एक कानून " के ज़रिए ही देश को एकता के सूत्र में बांध कर रखा जा सकता है और कानून की आड में महिलाओं के जज़्बातों से खिलवाड करने वालों पर शिकंजा कसा जा सकता है ।

मंदी से उपजे संकट के दौर में लगता है एनडीटीवी ने नई सोच के साथ नई पहल की है । इसी कडी में मतदाताओं को सिखाने - पढाने के लिए रवीश कुमार के सौजन्य से प्रोग्राम बनाया गया । उनकी पेशकश की तारीफ़ करने को मन हो ही रहा था , तभी देश के मतदाताओं को पूजा - पाठ और धर्म के नाम पर ठगने वाले हिन्दुस्तानी तालिबानियों का ज़िक्र छेड दिया रवीश जी ने । लेकिन ये तालिबानी धोती - टीके वाले ही थे । टोपी और दाढी वालों का कोई ज़िक्र तक नहीं ....। आजकल मंदी के कारण नौकरी पर भारी पड रहे सर्कुलरों से खिसियाए खबरची क्या नया कहना चाहते हैं ....? आखिर क्या सिखाना चाहते हैं ...? "धोती - टीके वाले तालिबानी" का जुमला गढकर एक तबके को गरियाने से ही इस देश में सेक्यूलर कहलाया जा सकता है ? इन चैनलों ने जिस ढंग से हिन्दुओं की छबि गढ दी है , अब हिन्दू कहलाना किसी गाली से कम नहीं .....।

आज आज़मगढ के करीब एक हज़ार लोग एक ट्रेन में सवार होकर दिल्ली क्या पहुंचे , देश की राजनीति में उफ़ान आ गया । आईबीएन और सहारा समय लगातार ट्रेन और रेलवे प्लेटफ़ार्म की फ़ुटेज दिखा दिखा कर माहौल गर्माते रहे । गौर करने की बात है कि ट्रेन को उलेमा एक्सप्रेस का नाम तक दे दिया गया बैनर लगाकर । उस पर भी तुर्रा ये कि रेल प्रशासन और पुलिस पर प्रताडना का आरोप जड दिया । शिकायत थी कि ट्रेन जगह- जगह रोकी क्यों नहीं गई ।

बाटला हाउस एनकाउंटर मामले में आतंकवादियों की कारगुज़ारियों पर पर्दा डालने के लिए मौलाना अमर सिंह और अर्जुन सिंह के बोये बीज अब पनपने लगे हैं । उलेमाओं का जत्था दिल्ली पहुंचकर मामले की एक महीने में न्यायिक जांच का दबाव बना रहा है । उन्होंने सरकार को आगाह भी कर दिया है कि जल्दी जांच रिपोर्ट नहीं आने पर मुसलमान कांग्रेस को एक भी वोट नहीं देंगे । ये लोग कौन हैं ...? क्या ये वाकई इस देश के नागरिक हैं ...? अगर जवाब हां है , तो कैसे नागरिक हैं ,जिन्हें अपने शहर के लडके तो बेगुनाह और मासूम नज़र आते हैं , मगर दहशतगर्दी के शिकार लोगों के लिए इनके दिल में ज़रा भी हमदर्दी नहीं ? कल को मुल्क में कहीं भी आतंकी पकडे या मारे जाएंगे , तो हर मर्तबा यही सवाल खडे होंगे । पाकिस्तान या बांगला देश के रास्ते भारत आकर दहशत फ़ैलाने वाले ज़ाहिर सी बात है मुसलमान ही होंगे , तो क्या उनकी हिमायत में उठने वाली आवाज़ों के बूते उन्हें बेगुनाह मान लिया जाना चाहिए ?

एक न्यूज़ चैनल के जाने माने क्राइम रिपोर्टर के ब्लॉग पर बाटला हाउस मामले के आरोपी के घर की बदहाली का सजीव चित्रण देखा था । उनकी दलील को मान लिया जाए तो कोई भी गरीब अपराधी या दहशतगर्द नहीं हो सकता । लगभग वैसी ही परिस्थिति कसाब के परिवार की भी है , लिहाज़ा ये माना जा सकता है कि मोहम्मद अजमल कसाब भी मासूम है ?????? उस बेगुनाह का गुनाह है , तो महज़ इतना कि वो गरीब मुसलमान है ...?

वोट की खातिर नेता किस हद तक गिरेंगे , अंदाज़ा लगा पाना बडा ही मुश्किल है । लेकिन अपने फ़ायदे के लिए लोग सियासी दलों के साथ किस तरह का मोल भाव करेंगे ये चुनावी आहट मिलते साफ़ होने लगा है । देश के तथाकथित अल्पसंख्यक , जो कई हिस्सों में बहुसंख्यक हो चुके हैं , वे ही राजनीतिक दलों की नकेल कस रहे हैं । वोटों के गणित और सियासी नफ़े - नुकसान के चलते मुसलमान मतदाताओं को भेडों की तरफ़ हकालने का चलन देश के अंदरुनी हालात के लिए विस्फ़ोटक हो चला है । लालू ,मुलायम ,पासवान , मायावती ,कांग्रेस और कुछ हद तक अब बीजेपी भी मुसलमानों वोटों की खातिर तुष्टिकरण का भस्मासुर तैयार कर रही है , जो समूचे देश को ले डूबेगा ।

ये सभी घटनाएं देश में व्याप्त अराजकता और अव्यवस्था की ओर इशारा करती हैं । संविधान और कानून के प्रति लोगों की आस्था कहीं दिखाई नहीं देती । राजनीति के कंधे पर सवार होकर लोग मनचाहे ढंग से कानून तोड मरोड रहे हैं । लोगों की उम्मीद भरी निगाहें कभी न्याय की चौखट पर जाकर टिक जाती है , तो कभी संसद के गलियारों में भटक कर रह जाती है । मीडिया को आम लोगों की परवाह ही कहां रही । प्रशासन इन सबकी चाकरी बजाये या जनता की सुने ।

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

या इलाही ये माजरा क्या है ............

गणेश शंकर विद्यार्थी , माखनलाल चतुर्वेदी जैसे पत्रकारों ने कलम की खातिर नैतिकता के नए नए प्रतिमान स्थापित किए ।
खींचों ना तलवार ना कमान निकालो
जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो ।
संभवतः ऎसा ही कोई शेर है ,जो पत्रकारों को नैतिकता के साथ व्यवस्था के गुण दोष सामने लाने का हौंसला और जज़्बा देता है । पत्रकारिता आज़ादी के पहले तक , बल्कि आज़ादी के कुछ साल बाद तक मिशन हुआ करती थी । अब पत्रकारिता मशीन बन गई है , उगाही करने की मशीन ....। सबसे ज़्यादा चिंता की बात ये है कि अब मालिक ही अखबार के फ़ैसले लेते हैं और हर खबर को अपने नफ़े नुकसान के मुताबिक ना सिर्फ़ तोडते मरोडते हैं , बल्कि छापने या ना छापने का गणित भी लगाते हैं ।
भोपाल से निकलने वाले एक अखबार ने नए साल में पत्रकारिता के नए मानदंड स्थापित किए हैं । अपनी तरह का शायद ये पहला और शर्मनाक
मामला होगा । अपने आपको समाज का हित चिंतक बताने वाले इस अखबार ने दो जनवरी को एक समाचार दिया और फ़िर चार जनवरी को इसी समाचार पर U टर्न मार लिया । संभव है कि आने वाले सालों में पत्रकारिता जगत में आने वाले छात्र इसे कोर्स की किताबों में भी पाएं। कहानी पूरी फ़िल्मी है । आप ही तय करें ये सच है या वो सच था .........
दो जनवरी को प्रकाशित चार जनवरी को प्रकाशित



































































रविवार, 7 दिसंबर 2008

पाठक और पत्रकार , शोषण के शिकार

आज एक ब्लॉग पर वॉयस ऑफ़ इंडिया के दफ़्तर में चल रही उठापटक की खबर ने एक बार फ़िर सोच में डाल दिया । १९९२ की अप्रैल का महीना याद आ गया , जब वीओआई के मुकेश कुमार जी दैनिक नईदुनिया भोपाल में थे और अपने हक की लडाई लडने के संगीन जुर्म में मुझे बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी की जा रही थी । खबर पढकर लगा कि इतने बरसों बाद भी पत्रकारॊं की दुनिया में कोई उत्साहजनक बदलाव नहीं आया ।

इस व्यावसायिक दौर में भी सबकी खबर लेने और सबको खबर देने वाले पत्रकारों की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है । समाज के सभी वर्गों के शोषण को उजागर करने और उसके खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाले ज़्यादातर खबरनवीस मालिकों के आगे घुटने टेक देते हैं ।

आज़ादी की लडाई के दौर में मिशन मानी जाने वाली पत्रकारिता ने अब प्रोफ़ेशन का रुप ले लिया है । अब तो इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया उद्योग में तब्दील होने लगा है । समाचार पत्र छापने वाले प्रतिष्ठान कंपनी कहलाने लगे हैं । लेकिन बडी हैरत की बात है कि सरकारी छूट का लाभ उठाने वाले इन संस्थानों में पत्रकारों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । सरकारी नियम कायदों और श्रम कानूनों की धज्जियां उडाते हुए समाचार पत्र और चैनल लगातार फ़ल फ़ूल रहे हैं । पत्रकारों के नाम पर मिलने वाले फ़ायदों की बंदर बांट भी मालिकों में ही हुई है ।

ये और बात है कि समय के साथ परिपक्वता बढने की बजाय दिनों दिन यह पेशा बचकानापन अख्तियार करता जा रहा है । मालिक के चाटुकार पहले भी मौज उडाते थे और आज भी मलाई सूंत रहे हैं । लेकिन मूल्यों की वकालत करने वालों के लिए ना पहले जगह थी ,ना ही अब है ।
अखबार बाज़ार का हिस्सा बन चुके हैं । खबरों और आलेखॊं की शक्ल में तरह - तरह के प्राडक्ट के विज्ञापन दिखाई देते हैं । समझना मुश्किल है कि क्या समाचार है और क्या इश्तेहार ? सरकारी अंकुश को अपनी जेब में रखकर अखबार मालिक , पाठक और पत्रकार दोनों के ही शोषण पर आमादा हैं ।

पाठक को बेवजह वह सब पढने पर मजबूर किया जा रहा है , जिसमें उसकी कतई रुचि नहीं । लेकिन विज्ञापन दाताओं का बाज़ार बढाने के लिए ऎसी ही बेहूदा खबरें बनाई और बेची जा रही हैं । मुझे तो
कई बार लगता है कि दिन की शुरुआत में ही हम हर रोज़ ढाई से तीन रुपए की ठगी के शिकार हो जाते हैं । हम तो न्यूज़ पेपर लेते हैं खबरों के लिए , लेकिन वहां समाचार तो छोडिए कोई विचार भी नहीं होते । वहां तो होता है व्यापार .... या कोरी बकवास....... ।

कायदे से तो इन अखबार वालों से पाठकों को मासिक तौर पर नियमित पारिश्रमिक का भुगतान मिलना चाहिए । गहराई में जाएं , तो पाएंगे कि पाठक भी इस व्यवसाय का बराबर का भागीदार है । मेरी निगाह में सर्कुलेशन के आधार पर होने वाली विज्ञापन की आय का लाभांश का हकदार पाठक ही है । पाठकों को संस्थानों पर मुफ़्त में अखबार देने के लिए दबाव बनाना चाहिए या अपने शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए अखबारों का बहिष्कार करना चाहिए ,ताकि समाचारों के नाम पर छपने वाले कचरे से निजात मिल सके ।

यह गुलो बुलबुल का अफ़साना कहाँ
यह हसीं ख्वाबों की नक्काशी नहीं
है अमानत कौम की मेरी कलम
मेरा फ़न लफ़्ज़ों की अय्याशी नहीं ।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

नाकारा रहनुमाओं ने देश को किया शर्मसार

कभी ना थमने वाली मुम्बई की रफ़्तार पर २६ नवंबर की रात से लगा ब्रेक राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक है । मुम्बई के आतंकी हमलों ने देश के सुरक्षा इंतज़ामात और खुफ़िया तंत्र के कामकाज की पोल खोलकर रख दी है । हर आतंकी हमले के बाद अगली मर्तबा कडा रुख अपनाने का रटा रटाया जुमला फ़ेंकने के बाद केंन्द्र भी फ़ारिग हो गया ।

आतंक से लडने की बजाय नेता फ़िर एक दूसरे पर कीचड उछालने में मसरुफ़ हो गये हैं । प्रधानमंत्री देश को मुश्किल घडी में एकजुट करने और जोश - जज़्बे से भरने की बजाय भविष्य की योजनाओं का पुलिंदा खोल कर क्या साबित करना चाहते थे । पोची बातों को सुनते - सुनते देश ने पिछले आठ महीनों में पैंसठ से ज़्यादा हमले अपने सीने पर झेले हैं ।

गृह मंत्री का तो कहना ही क्या । अपनी पोषाकों के प्रति सजग रहने वाले पाटिल साहब देश की सुरक्षा को लेकर भी इतने ही संजीदा होते ,तो शायद आज हालात कुछ और ही होते । गृह राज्य मंत्रियों को संकट की घडी में भी राजनीति करने की सूझ रही है । बयानबाज़ी के तीर एक दूसरे पर छोडने वाले नेताओं के लिए ये हमला वोटों के खज़ाने से ज़्यादा कुछ नहीं ।

सेना के तीनों अंगों ने नेशनल सिक्योरिटी गार्ड और रैपिड एक्शन फ़ोर्स की मदद से पूरे आपरेशन को अंजाम दिया और बयानबाज़ी करके वाहवाही लूट रहे हैं आर आर पाटिल । महाराष्ट्र पुलिस के मुखिया ए. एन राय तो इस मीडिया को ब्रीफ़ करते रहे , मानो सारा अभियान पुलिस ने ही सफ़लता से अंजाम दिया हो ।

सुना था कि मुसीबत के वक्त ही अपने पराए की पहचान होती है । लेकिन भारत मां को तो निश्चित ही अपने लाडले सपूतों [ नेताओं ] की करतूत पर शर्मिंदा ही होना पडा होगा । आतंकियों के गोला बारुद ने जितने ज़ख्म नहीं दिए उससे ज़्यादा तो इन कमज़र्फ़ों की कारगुज़ारियों ने सीना छलनी कर दिया ।

रही सही कसर कुछ छद्म देशप्रेमी पत्रकार और उनके भोंपू [चैनल] पूरी कर रहे हैं । सरकार से मिले सम्मानों का कर्ज़ उतारने के लिए खबरची किसी का कद और स्तर नापने की कोशिश में खुद किस हद तक गिर जाते हैं , उन्हें शायद खुद भी पता नहीं होता । दूसरे को बेनकाब कर वाहवाही लूटने की फ़िराक में ये खबरची अपने घिनौने चेहरे से लोगों को रुबरु करा बैठते हैं । इन्हें भी नेताओं की ही तरह देश की कोई फ़िक्र नहीं है । इन्हें बस चिंता है अपने रुतबे और रसूख की ।

प्रजातंत्र के नाम पर देश को खोखला कर रहे इन ढोंगियों को अब लोग बखुबी पहचान चुके हैं । इस हमले ने रहे सहे मुगालते भी दूर कर दिए हैं । नेताओं की असलियत भी खुलकर सामने आ चुकी है और सेना की मुस्तैदी को भी सारी दुनिया ने देखा है ।

ऎसा लगता है देश के सड गल चुके सिस्टम को बदलने के लिए अब लोगों को सडकों पर आना ही होगा । रक्त पिपासु नेताओं के चंगुल से भारत मां को आज़ाद कराने के लिए अब ठोस कार्रवाई का वक्त आ चुका है । इनके हाथ से सत्ता छीन कर नया रहनुमा तलाशना होगा , नई राह चुनना होगी , नई व्यवस्था लाना होगी । इस संकल्प के साथ हम सभी को एक साथ आगे बढना होगा ।

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात ना फ़ुटपाथ पे नींद आएगी
सब उठो , मैं भी उठूं , तुम भी उठो ,तुम भी उठो
कोई खिडकी इसी दीवार में खुल जाएगी ।

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008

रावण के बढे भाव ........ हे राम .... !

बधाई , दशानन के अनुयायियों को ।
रावण इन दिनों डिमांड में है । सुना है कैकसी के पुत्र और कुबेर के भाई , लंकापति की बाज़ार में खासी मांग है । शेयर बाज़ार निवेशकों को चाहे जितना रुला रहा हो , स्टाक एक्सचेंज के धन कुबेर भले ही कंगाल हो चुके हों लेकिन समाचार पत्रों की मानें तो रावण के भाव आसमान छू रहे हैं । रामलीला में राम पर लंकेश भारी पड रहे है । राम का किरदार निभाने वालों की भारी तादाद के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम का मार्केट रेट नीचे आ गया है ।ये और बात है कि देश में ईमानदार चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलें । खबर है कि रावण का किरदार निभाने वाले कलाकार बीस हज़ार रुपए में भी नहीं मिल रहे ।
रावण का बढता कद अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया की सुर्खियां बटोर रहा है । भोपाल के नामी गिरामी मठाधीश रावण की मार्केटिंग कर लोगों को पुतला फ़ूंक जलसे में खींचने की जुगाड में लगे हैं । लंकाधिपति रावण की पैकेजिंग से लेकर उसके दहन से निकलने वाले आतिशी शोलों तक की पत्रकारों की जमात को एक्सक्लूसिव खबर मुहैया कराई जा रही है ।
कहीं पचपन फ़ुटा रावण भीड जुटाएगा , कहीं अस्सी फ़ुटे दशानन का दहन आयोजन की सफ़लता की गारंटी बनेगा , तो कहीं उसकी आंखों और भेजे से निकलने वाली आतिशबाज़ी मजमा लगायेगी । होर्डिंग और लुभावने इश्तेहारों के ज़रिए भीड का रुख अपनी ओर खींचने की कवायद की जा रही है । अपने -अपने खेमे , अपना - अपना रावण । कहीं बेशकीमती ज़मीन पर हाथ साफ़ करने की मंशा है , तो कहीं विजयादशमी के बहाने राजनीति चमकाने की कोशिश ।
वैसे तो विजयादशमी बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत के तौर पर देखा जाता है ,लेकिन हर तरफ़ धूम तो रावण की ही है । इस जलसे की सालाना रस्म अदायगी के बाद हम इस खुशफ़हमी में जीते हैं कि पुतला फ़ूंकते ही बुराइयां काफ़ूर हो गईं ।
समाज में रावण की बढती हैसियत कई कैफ़ियत चाहती है । क्या रावण की लोकप्रियता सामाजिक मूल्यों के बदलाव का इशारा है .....? हाल ही में इस मुद्दे पर बहस के दौरान एक नए नज़रिए या यूं कहें , फ़लसफ़े ने चौंका दिया । लोग अब मानने लगे हैं किस अच्छाई की अपनी कोई हैसियत ही नहीं । मेहरबानी बुराई की कि उसकी वजह से आज भी अच्छाई सांसे ले पा रही है । कहा तो यहां तक जाने लगा है कि राम का वजूद ही रावण से है । एक बडा तबका ऎसा भी तैयार हो चुका है , जो मानता है कि रावण के एक अवगुण को रेखांकित करके समाज में राम को मर्यादा पुरु्षोत्तम के तौर पर प्रतिष्ठित कर दिया गया ।
चिंता इस बात की भी है कि रावण की पापुलरिटी समाज का बुनियादी ढांचा ही तहस - नहस ना कर दे .... ? दाउद , अबु सलेम , राज ठाकरे ,अमर सिंह , राखी सावंत , मोनिका बेदी जैसे किरदार यक ब यक कामयाबी की पायदान चढते हुए समाज के रहनुमा बनते नज़र आते हैं । ज़हीन तबका गाल बजाता है और पुराणों की बातों को मानते हुए इस उम्मीद पर ज़िंदा है कि कलि के पापों से निजात दिलाने के लिए जल्दी ही कल्कि का अवतरण होगा । बहरहाल फ़िलहाल तो आलम ये है ..........
गलत कामों का अब माहौल आदी हो गया शायद
किसी भी बात पर कोई हंगामा नहीं होता ।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

शर्म हमको मगर नहीं आती




मध्य प्रदेश की सेहत इन दिनों काफ़ी खराब है इतनी ज़्यादा कि नौनिहालों का पेट भी नहीं भर पा रहा मज़बूत भविष्य का भरोसा दिला कर एक बार फ़िर सत्ता पर कब्ज़ा जमाने की जुगाड में लगी बीजेपी कार्यकर्ता महाकुंभ के ज़रिए शक्ति प्रदर्शन में लगी है वहीं दूसरे राजनीतिक दल बयानबाज़ी में मशगूल हैं



प्रदेश के सतना , छिंदवाडा , ग्वालियर ,इंदौर , धार और झाबुआ ज़िले में हालात बेकाबू हो चुके हैं पोषण आहार के अभाव में बच्चे कुपोषण का शिकार हो कर असमय ही मौत के आगोश में समा रहे हैं बच्चों को स्वस्थ रखना तो दूर सरकार इन कुपोषित बच्चों के इलाज का इंतज़ाम करने में भी नाकाम रही है

प्रदेश में बाल कल्याण और स्वास्थय सेवाओं का हाल इस कदर बिगड चुका है कि ऎन राजधानी में सरकार की नाक के नीचे ४० कुपोषित बच्चों को स्टाफ़ की कमी का रोना रोकर हमीदिया अस्पताल में दाखिल करने से इंकार कर दिया गया जब राजधानी के सूरते हाल इस कदर बिगड गये हैं तो दूर -दराज़ के इलाकों के हालात का अंदाज़ा लगा पाना कोई मुश्किल काम नहीं

इससे भी ज़्यादा गंभीर बात ये है कि सरकार ये मानने को तैयार ही नहीं कि कोई बच्चा कुपोषण का शिकार बना है अपनी खामियों पर पर्दा डालने में जुटे मंत्री इसे मौसमी बीमारी का नाम देकर अपना पल्ला झाड्ने की कोशिश में लगे है बेशर्मी की हद तो तब हो गई , जब एक मंत्री ने सतना में ४० और खंडवा में ५३ बच्चों की मौत को वायरल फ़ीवर और उल्टी - दस्त का मामला बता कर सरकार के नाकारापन को उजागर कर दिया


गरीबों की हितैषी होने का दम भरने वाली सरकार ने बच्चों की जान बचाने के लिए कोई कदम उठाने की बजाय मामले की लीपापोती की कवायद शुरु कर दी है अफ़सोसनाक है कि अपनी नाकामी छुपाने के लिए जनता के नुमाइंदों ने गरीब आदिवासियों को अंधविश्वासी बताने से भी गुरेज़ नहीं किया मंत्री जी ने राजधानी में पत्रकारों का मजमा जुटाकर फ़रमाया कि खंडवा के खालवा ब्लाक के कोरकू और सतना के कोल जनजाति के लोग इलाज के लिए आज भी झाड -फ़ूंक का सहारा लेते हैं और ये ही बच्चों की मौत की असली वजह है


ये तथ्य भी कम हैरान करने वाला नहीं कि किसी पत्रकार ने आखिर मंत्रीजी से ये जानने की ज़हमत क्यों नहीं उठाई कि बुढा चुके देश में यदि अंधविश्वास की जडें मज़बूत बनी हुई हैं , तो जवाबदेही किसकी बनती है ...? किसी खबरनवीस ने ये सवाल खडा क्यों नहीं किया कि आखिर वो आंकडे कहां हैं जो मंत्रीजी के बयान को सही ठहरा सकें मौसमी बुखार हाल के दिनों में प्रदेश में इस हद तक जानलेवा कब और कैसे हुआ और सरकार अंजान ही रही ...? ऎसे मुद्दे जब भी सामने आते हैं ,सरकार के साथ -साथ पत्रकारों की भूंमिका भी संदेह के दायरे में जाती है सरकारी कामकाज पर नकेल कसने वाला तबका ही उसके साथ गलबहियां करने लगे तो इसे क्या नाम दें ?