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रविवार, 20 मार्च 2011

योग गुरु नहीं पीटी मास्टर है बाबा रामदेव

रामदेव नाम का ढ़ोंगी बाबा देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं से खेल रहा है । अपना हित साधने वाले नेताओं ने उसे आधुनिक युग का विवेकानंद बताकर भारतीय मनीषियों और महापुरुषों का भी अपमान किया है । विवेक शून्य समाज को नये सिरे से यह समझाने की ज़रुरत है कि ढ़ोलक की थाप पर मंच पर उछल कूद योग नहीं होता । रामदेव के योग के दावों की पोल खुद बाबा की दाढ़ी के सफ़ेद बाल खोल रहे हैं । योगी के तौर पर इमेज बिल्डिंग के दौरान यह बाबा हर शिविर में नाखून रगड़ने की पैरवी करता था और इसका दावा था कि इस क्रिया से गंजे के सिर पर बाल आ जाते हैं । इतना ही नहीं साठ साल के बुढ्ढे की सूखे भूसे सी दाढ़ी भी साल-छह महीने में स्याह काली हो जाती है । अगर यह सच है तो बाबा की दाढ़ी बढ़ती उम्र की चुगली क्यों कर रही है ।
दुनिया भर के दिल के मरीज़ों का इलाज अपने योग से करने का दावा ठोकने वाले बाबाजी के सबसे करीबी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई और एक दिन पहले तक साथ घूमने वाला योगाचार्य अपने साथी के दिल के हाल को भाँप भी नहीं सका ? दर असल यह बाबा देश की भोली भाली जनता को बरगला कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है । आखिर एक योगी ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा की क्या ज़रुरत ? योग तो लोगों का भय दूर करता है । जो व्यक्ति इतना डरा हुआ हो वो दुनिया का डर कैसे दूर कर सकता है ? सही मायनों में यह एक ढ़ोंगी बाबा है । आसाराम बापू का ही परिष्कृत रुप है रामदेव बाबा ।
काले धन और भ्रष्टाचार से भारत को आज़ादी दिलाने की बात करता है लेकिन क्या वह इस बात को कहने का नैतिक बल रखता है ? इसने मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री की बाँह मरोड़कर बेशकीमती ज़मीन मुफ़्त में आवंटित कराई है । अपना कारोबार जमाने के लिये सरकारी ज़मीन हड़पना क्या भ्रष्टाचार नहीं है । मप्र सरकार भी जवाब दे कि किस हैसियत से जनता की संपत्ति एक दवा कारोबारी को सौंपी गई है ? लोगों को याद रखना चाहिये कि साधुता एक प्रवृत्ति है और हर गेरुए कपड़े पहनने वाला साधु नहीं होता । रावण ने भी सीता हरण के लिये गेरुआ चोला ही धारण किया था । इस लुटेरे साधु की असलियत उजागर होना बेहद ज़रुरी है । वैसे अभी तक तो यह भी तय नहीं हो सका है की रामदेव साधु है या बाबा है या संत है या फ़िर स्वामी । अभी वो यह भी ठीक से तय नहीं कर पाये हैं कि उन्हें योगी बनना है या भोगी ? कभी कभी तो लगता है कि अचानक हाथ आयी माया ने उन्हें रोगी भी बना दिया है । आने वाला वक्त बतायेगा कि कारुँ के खज़ाने को हासिल करने वाले बाबाजी दिल के रोगी होंगे या मनोरोगी।

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008

रावण के बढे भाव ........ हे राम .... !

बधाई , दशानन के अनुयायियों को ।
रावण इन दिनों डिमांड में है । सुना है कैकसी के पुत्र और कुबेर के भाई , लंकापति की बाज़ार में खासी मांग है । शेयर बाज़ार निवेशकों को चाहे जितना रुला रहा हो , स्टाक एक्सचेंज के धन कुबेर भले ही कंगाल हो चुके हों लेकिन समाचार पत्रों की मानें तो रावण के भाव आसमान छू रहे हैं । रामलीला में राम पर लंकेश भारी पड रहे है । राम का किरदार निभाने वालों की भारी तादाद के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम का मार्केट रेट नीचे आ गया है ।ये और बात है कि देश में ईमानदार चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलें । खबर है कि रावण का किरदार निभाने वाले कलाकार बीस हज़ार रुपए में भी नहीं मिल रहे ।
रावण का बढता कद अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया की सुर्खियां बटोर रहा है । भोपाल के नामी गिरामी मठाधीश रावण की मार्केटिंग कर लोगों को पुतला फ़ूंक जलसे में खींचने की जुगाड में लगे हैं । लंकाधिपति रावण की पैकेजिंग से लेकर उसके दहन से निकलने वाले आतिशी शोलों तक की पत्रकारों की जमात को एक्सक्लूसिव खबर मुहैया कराई जा रही है ।
कहीं पचपन फ़ुटा रावण भीड जुटाएगा , कहीं अस्सी फ़ुटे दशानन का दहन आयोजन की सफ़लता की गारंटी बनेगा , तो कहीं उसकी आंखों और भेजे से निकलने वाली आतिशबाज़ी मजमा लगायेगी । होर्डिंग और लुभावने इश्तेहारों के ज़रिए भीड का रुख अपनी ओर खींचने की कवायद की जा रही है । अपने -अपने खेमे , अपना - अपना रावण । कहीं बेशकीमती ज़मीन पर हाथ साफ़ करने की मंशा है , तो कहीं विजयादशमी के बहाने राजनीति चमकाने की कोशिश ।
वैसे तो विजयादशमी बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत के तौर पर देखा जाता है ,लेकिन हर तरफ़ धूम तो रावण की ही है । इस जलसे की सालाना रस्म अदायगी के बाद हम इस खुशफ़हमी में जीते हैं कि पुतला फ़ूंकते ही बुराइयां काफ़ूर हो गईं ।
समाज में रावण की बढती हैसियत कई कैफ़ियत चाहती है । क्या रावण की लोकप्रियता सामाजिक मूल्यों के बदलाव का इशारा है .....? हाल ही में इस मुद्दे पर बहस के दौरान एक नए नज़रिए या यूं कहें , फ़लसफ़े ने चौंका दिया । लोग अब मानने लगे हैं किस अच्छाई की अपनी कोई हैसियत ही नहीं । मेहरबानी बुराई की कि उसकी वजह से आज भी अच्छाई सांसे ले पा रही है । कहा तो यहां तक जाने लगा है कि राम का वजूद ही रावण से है । एक बडा तबका ऎसा भी तैयार हो चुका है , जो मानता है कि रावण के एक अवगुण को रेखांकित करके समाज में राम को मर्यादा पुरु्षोत्तम के तौर पर प्रतिष्ठित कर दिया गया ।
चिंता इस बात की भी है कि रावण की पापुलरिटी समाज का बुनियादी ढांचा ही तहस - नहस ना कर दे .... ? दाउद , अबु सलेम , राज ठाकरे ,अमर सिंह , राखी सावंत , मोनिका बेदी जैसे किरदार यक ब यक कामयाबी की पायदान चढते हुए समाज के रहनुमा बनते नज़र आते हैं । ज़हीन तबका गाल बजाता है और पुराणों की बातों को मानते हुए इस उम्मीद पर ज़िंदा है कि कलि के पापों से निजात दिलाने के लिए जल्दी ही कल्कि का अवतरण होगा । बहरहाल फ़िलहाल तो आलम ये है ..........
गलत कामों का अब माहौल आदी हो गया शायद
किसी भी बात पर कोई हंगामा नहीं होता ।