नौकरशाह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नौकरशाह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 12 नवंबर 2011

मध्यप्रदेश में मलेरिया का कहर और सियासत

मध्य प्रदेश की सेहत इन दिनों काफ़ी खराब है । सीधी, मंदसौर और नीमच ज़िले में मलेरिया से मौतों का आँकड़ा बढ़ने के साथ ही सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। मलेरिया से करीब पचास लोगों की मौत के कारण सीधी जिला इन दिनों राजनीति के केंद्र में है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने इस मुद्दे को लेकर सीधी कलेक्ट्रेट के बाहर धरना दिया। इसके बाद जाकर सरकार के कानों पर जूँ रेंगी। मगर आये दिन उड़न खटोले में सवार होकर देश भर की सैर करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चौंकाने वाली टिप्पणी ने सबको सन्न कर दिया। जिस वक्त वे सचिन के सौवें शतक का शुभकामना संदेश प्रसारित कर रहे थे, तब वे प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों से बेखबर थे। विपक्ष के हर आरोप को हवा में उड़ाने वाले शिवराज की नींद तब टूटी जब ये मामला अखबारों की सुर्खियों में आया। अधिकारियों की बैठक में वे खूब बिफ़रे कि उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं दी गई है। प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की फ़ेहरिस्त में नाम शामिल कराने की जोड़तोड़ में लगे मुख्यमंत्रीजी से लाख टके का सवाल ये है कि जब उन्हें अपने प्रदेश की समस्याओं की कोई जानकारी ही नहीं रहती है, तो उनके सूबे का मुखिया बने रहने का औचित्य ही क्या है ?


आदिवासी बहुल सीधी जिले के कुछ गाँवों में मलेरिया कहर बनकर टूटा है। जिले में मलेरिया से हुई मौतों का आँकड़ा लगातार बढ़ रहा है। अब तक पचास मौतें हो चुकी हैं। तीन गाँवों में 30 सितंबर से एक नवंबर तक 35 लोगों की मौत हुई। नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि पैंतीस मृतकों में सत्रह बेटियाँ भी हैं, जिनको बचाने के लिए सरकार अभियान छेड़े हुए है। इन मौतों ने बेटी बचाओ अभियान के साथ-साथ स्वास्थ्य इंतजामों की कलई खोलकर रख दी है। हालाँकि यह बात सामने आने के बाद प्रशासन पूरी तरह से मामले को दबाने में लगा रहा।

नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि जिला मुख्यालय से मात्र 18 किलोमीटर दूर बसे गाँवों में मचे मौत के ताँडव से पूरा प्रशासन बेखबर बना रहा । उन्होंने विकास खंड के लगभग आधा दर्जन गाँवों का दौरा किया, तब हकीकत सामने आयी। जनजाति बहुल गाँव पडरी, चौफाल और सतनरा के लगभग हर घर में कम से कम एक व्यक्ति मलेरिया पीड़ित है। चूंकि सीधी अजय सिंह का गृह जिला है, लिहाजा वे प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठे और राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। मुख्यमंत्री को फोन करने के बाद प्रशासन हरकत में आया। उनके मुताबिक 47 मौतें होने के बाद भी कलेक्टर वहाँ नहीं पहुँचे थे। कमिश्नर को प्रकरण की जानकारी भी नहीं थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सीधी को मलेरिया प्रभावित जिला मानते हुए विशेष किट दिए हैं, लेकिन सरकार इनका उपयोग नहीं कर रही है।

बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का हवाला देते हुए नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को घेरे में लिया है। गौरतलब है कि चार साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीधी जिला गोद लिया था। बताते हैं कि सीधी जिले में सरकार ने डॉक्टरों के लिए 130 पद स्वीकृत किए हैं। मगर इनमें से 93 पद कई सालों से खाली हैं। अजय सिंह का आरोप है कि सीधी से लगे हुए गाँवों में जब मलेरिया प्रकोप बनकर फैल रहा है तो दूरदराज के क्षेत्रों के हालात की कल्पना की जा सकती है। ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सेवाओं के हालात समझने के लिये इतना जानना काफ़ी है कि डॉक्टर अपनी ड्यूटी पर शायद ही कभी जाते हैं। उनका कहना है कि सिमरिया के ब्लॉक मेडिकल अधिकारी अस्पताल नहीं जाते हैं। इसी तरह ज़िले में पदस्थ प्रदेश सरकार में मंत्री जगन्नाथ सिंह के सुपुत्र डेढ़ साल से नौकरी पर नहीं गये हैं।

प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों का सिलसिला नहीं थम रहा है। सीधी के बाद अब मंदसौर, नीमच (मालवा) में मलेरिया का संक्रमण फैल गया है। मालवा में मलेरिया बुखार से दो माह के भीतर 40 लोगों की जान गई है, जबकि मलेरिया से पीड़ित 50 लोगों का इलाज किया गया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार मंदसौर जिले के धावद, बगचाच, सावंत, नावली, बड़ौदिया, नावली, सावन कोठली और कोठरी टैंक गाँव में मलेरिया से संक्रमित हैं। जिले के प्रभारी सीएमएचओ के मुताबिक इन गाँवों में बीते दो माह में 21 लोगों की जानें गई हैं। शुरुआती जाँच में मौत की वजह मलेरिया है। वहीं नीमच जिले के ग्राम कोज्या, रूपपुरिया, परिछा, माना, मनोहरपुरा, प्रेमपुरा और कनोड़ में बीमारी की गंभीर स्थिति है। सीएमएचओ जिले में 19 लोगों की मौत मलेरिया से होने की पुष्टि कर रहे हैं।

प्रदेश की जनता ने जिस भरोसे से शिवराज सिंह को सत्ता की बागडोर सौंपी थी, वही आज उसके ज़ख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। हाल ही में उन्होंने गायत्री परिवार के हरिद्वार महाकुंभ हादसे में मारे गये लोगों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता का एलान किया। जबकि सीधी में मलेरिया से हुई मौतों पर मुख्यमंत्री ने महज़ दस-दस हज़ार रुपये की खैरात बाँटकर आखिर किस पर एहसान किया? सवाल है कि मीडिया से संवेदनशील और सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता का खिताब हासिल करने को बेताब मुखिया की मुट्ठी सूबे की जनता के लिये आखिर क्यों भिंच गई? सरकार फिजूल के अभियान और उत्सवों पर जनता के करोड़ों रुपये फूंक रही है मगर लोगों की बुनियादी जरूरतों की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं है। प्रदेश के स्थापना दिवस पर करोड़ों रुपये की आतिशबाज़ी फ़ूँकने या क्रिकेटरों और अन्य खिलाड़ियों को लाखों रुपये बतौर तोहफ़ा देकर खूब वाहवाही बटोरने वाले मुख्यमंत्री के हाथ आखिर प्रदेश की जनता से जुड़े मुद्दों पर ही खाली क्यों दिखाई देते हैं?

बहरहाल मलेरिया से हुई मौतों पर बवाल मचता देख मुख्यमंत्री आनन-फ़ानन में सीधी पहुँचे और कलेक्टर का तुरंत तबादला कर दिया। लेकिन सवाल फ़िर वही। क्या कलेक्टर का तबादला करने या कुछ छोटे कर्मचारियों को निलंबित करने मात्र से हालात सुधर जाएँगे? मालवा, चंबल और विंध्य क्षेत्र में मलेरिया से हो रही मौतों के लिये क्या छोटे मोटे प्रशासनिक फ़ेरबदल काफ़ी हैं? प्रदेश में क्या अदने कर्मचारियों की बलि लेकर स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य महकमे के आला अफ़सरों को ज़िम्मेदारी से बरी किया जा सकता है ? सरकार और नौकरशाहों का पूरा ध्यान महँगे उपकरण और दवा खरीदी, तो डॉक्टरों की दिलचस्पी ड्रग ट्रायल के मुनाफ़े और प्रायवेट अस्पतालों में मोटी फ़ीस पर सेवाएँ देने में ही सिमट कर रह गई है।

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने से बेखबर सूबे के मुखिया एक के बाद एक मुश्किलों में घिरते जा रहे हैं। विधानसभा सत्र के मुहाने पर विपक्ष के हाथ एक साथ कई मुद्दे लग गये हैं। डम्पर मामले को पुनर्विचार के लिये एक बार फ़िर हाईकोर्ट में ले जाकर याचिकाकर्ता रमेश साहू ने शिवराज की दिक्कतें बढ़ा दी हैं। उधर इस मामले में उन्हें क्लीन चिट देने वाले लोकायुक्त पी.पी.नावलेकर की नियुक्ति विवादों में है और अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है । उस पर जबलपुर ज़िले के सीहोरा तहसील के झीटी वन क्षेत्र की खदानों में लौह अयस्क के अवैध उत्खनन का मामला काँग्रेस ने भोपाल न्यायालय में पेश कर दिया है। इसमें मुख्यमंत्री,तीन मंत्रियों,एक सांसद सहित कुल सत्ताइस लोगों को नामजद किया गया है। काँग्रेस ने मामले की शिकायत लोकायुक्त में भी की है। साथ ही अब अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक जगदीश प्रसाद शर्मा ने सतना ज़िले के उचेहरा, नागौद आदि वन परिक्षेत्र में चल रहे उत्खनन की रिपोर्ट में भी खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अब तक विपक्ष को मृतप्राय मानकर मनमानी पर उतारु सरकार पर काँग्रेस चौतरफ़ा हमले कर रही है। कमोबेश पिछले आठ सालों से निर्बाध गति से दौड़ रहे अश्वमेधी रथ की वल्गाएँ यकबयक थामकर काँग्रेस ने सत्ता पक्ष में खलबली मचा दी है। विपक्ष से पहली बार मिल रही करारी चुनौती और अंदर ही अंदर बढ़ते जनाक्रोश से सत्ता पक्ष कैसे निपटता है आने वाले वक्त में सबकी निगाहें इसी पर लगी रहेंगी ।

शनिवार, 6 जून 2009

पर्यावरण की चिंता या चिंता का नाटक

देश- दुनिया में कल का दिन पर्यावरण के नाम रहा । लोगों ने बिगड़ते पर्यावरण पर खूब आँसू बहाये, बड़े होटलों में सेमिनार किये, भारी भरकम शब्दावली के साथ बिगड़ते मौसम की चिंता की,मिनरल वॉटर के साथ सेंडविच-बर्गर का स्वाद लिया और इतनी थका देने वाली कवायद के साथ ही दुनिया की आबोहवा में खुशनुमा बदलाव आ गया । देश-दुनिया का तो पता नहीं लेकिन हमारे भोपाल में तो नौकरशाह और नेताओं में पर्यावरण के प्रति जागरुकता लाने की होड़ सी मची रही । नेता वृक्ष लगाते हुए फ़ोटो खिंचा कर ही संतुष्ट नज़र आए वहीं स्वयंसेवी संगठनों की राजनीति कर रहे वरिष्ठों की सफ़लता से प्रेरणा लेते हुए कुछ नौकरशाहों ने पर्यावरण के बैनर वाली दुकान सजाने की तैयारी कर ली ।

हमारे शहर का चार इमली (वास्तविक नाम चोर इमली) नौकरशाहों के बसेरे के लिये जाना जाता है । जिस जगह इन आला अफ़सरों की आमद दर्ज़ हो जाती है,उसके दिन फ़िरना तो तय है । इसलिये चार इमली का सुनसान इलाका अब चमन है और कई खूबसूरत पार्कों से घिरा है । पास ही एकांत पार्क है,कई किलोमीटर में फ़ैला यह उद्यान नौकरशाहों की पहली पसंद है और यहाँ की "सुबह की सैर" का रसूखदार तबके में अपना ही महत्व है । लिहाज़ा लोग दूर-दूर से मॉर्निंग वॉक के लिये मँहगी सरकारी गाड़ियों में सवार होकर पार्क पहुँचते हैं और हज़ारों लीटर पेट्रोल फ़ूँकने के बाद ये लोग गाड़ी से उतर कर पार्क में चर्बी जलाते हैं । मज़े की बात है कि सुबह की शुद्ध हवा में पेट्रोल-डीज़ल के धुएँ का ज़हर घोलने वाले ही कुछ खास मौकों पर पर्यावरण के सबसे बड़े पैरोकार बन जाते हैं ।

बहरहाल नौकरशाहों और रसूखदार लोगों की संस्था ग्रीन प्लेनेट साइकिल राइडर्स एसोसिएशन ने कल का दिन नो कार-मोटर बाइक डे के रुप में मनाया । इसके लिये अपने संपर्कों और रसूख का इस्तेमाल करते हुए संचार माध्यमों के ज़रिये माहौल बनाया गया । ऑस्ट्रेलिया से आयातित साइकलों पर सवार होकर मंत्रालय जाते हुए वीडियो तैयार कराये गये । सेना को भी इस मुहिम में शामिल किया गया । सो सेना के ट्रकों में लाद कर रैली स्थल तक साइकलें पहुँचाई गई । भोपाल से दिल्ली तक इस रैली की फ़ुटेज और आयोजक की बाइट दिखाई गई । लेकिन सवाल फ़िर वही कि क्या वास्तव में ये लोग पर्यावरण को लेकर गंभीर हैं ? क्या सचमुच बिगड़ता मौसम इन्हें बेचैन करता है या यह भी व्यक्तिगत दुकान सजाकर रिटायरमेंट के बाद का पक्का इंतज़ाम करने और प्रसिद्धि पाने की कवायद मात्र है ।

प्रदेश में हर साल बरसात में हरियाली महोत्सव मनाया जाता है । ज़ोर-शोर से बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण समारोह होते हैं । मंत्री और अधिकारी पौधे लगाते हुए फ़ोटो खिंचवाते हैं । हर ज़िले के वृक्षारोपण के लम्बे चौड़े आँकड़े अखबारों की शोभा बढ़ाते हैं । यदि इन में से चौथाई पेड़ भी अस्तित्व में होते, तो अब तक मध्यप्रदेश में पैर रखने को जगह मिलना मुश्किल होता । इधर मुख्यमंत्री जी कह रहे हैं कि वे और उनके मंत्रिमंडल के सभी सदस्य अब हर समारोह की शुरुआत पेड़ लगा कर करेंगे । लेकिन मुद्दे की बात यह भी है कि केवल पौधा लगा देने ही से तो काम नहीं बनता । शुरुआती सालों में उसकी देखभाल का ज़िम्मा कौन लेगा ? जंगलों में राजनीतिक संरक्षण में चल रही कटाई को कौन रोकेगा ?

बाघों और अन्य वन्य प्राणियों की मौतों के बढ़ते ग्राफ़ के लिये चर्चा में रहने वाले वन विभाग ने भी जानवरों के बाद अब पेड़ों को गोद देने की स्कीम तैयार की है । मध्यप्रदेश सरकार में इन दिनों एक अजीब सी परंपरा चल पड़ी है । घोषणावीर मुख्यमंत्री ने कहना शुरु कर दिया है कि हर काम सरकार के बूते की बात नहीं । जनता को भी आगे बढ़कर सहयोग करना होगा । ये बात कुछ हज़म नहीं हुई । जनता के पैसों पर सत्ता- सुख भोगें आप ,सरकारी खज़ाने को दोनों हाथों से लूटे सरकार और आखिर में काम करे जनता.....!!! ऎसे में सरकार या नेताओं की ज़रुरत ही कहाँ है ? जनता से सहयोग चाहिये,तो योजनाओं का पैसा सीधे जनता के हाथों में सौंपा जाए ।


मैं आज तक यह समझ नहीं पाई कि सड़कों पर नारे लगाने,रैली निकालने या सेमिनार करने से कोई भी समस्या कैसे हल हो पाती है । पर्यावरण नारों से नहीं संस्कारों से बचाया जा सकता है । बच्चों को शुरु से ही यह बताने की ज़रुरत होती है कि इंसानों की तरह ही हर जीव और वनस्पति में भी प्राण होते हैं । हमारी ही तरह वे सब भी धरती की ही संतानें हैं । इस नाते धरती पर उनका भी उतना ही हक है जितना हमारा ...???

हमें समझना होगा की प्रकृति और इंसानी संसार में ज़मीन आसमान का फ़र्क है । पर्यावरण तभी सुधरेगा जब हम अपने खुद के प्रति ईमानदार होंगे । हमारी दुनिया में हर चीज़ पैसे के तराज़ू पर तौली जाती है,लेकिन प्रकृति ये भेद नहीं जानती । वह कहती है कि तुम मुझसे से भरपूर लो लेकिन ज़्यादा ना सही कुछ तो लौटाओ । अगर वो भी ना कर सको तो कम से कम जो है उसे तो मत मिटाओ ।

खैर, प्राकृतिक संसाधनों और धरोहरों को सहेजने का जज़्बा रखने वाले लोगों को प्रकृति किस तरह नवाज़ती है । इसकी बानगी देखी जा सकती है जमशेदपुर में , जहाँ तालाब करा रहा है गरीब कन्याओं का विवाह -
पैसे के लिए अपनों से भी बैरभाव को आम बात मानने वाले इस भौतिकवादी युग में आपसी सहयोग और सहकारिता की अनूठी मिसाल पेश करने वाला एक गांव ऐसा है जहाँ स्वयं की निर्धनता को भूल ग्रामीण पिछले लगभग डे़ढ़ दशक से सामूहिक मछलीपालन के जरिए गरीब लडकियों की शादी करा रहे हैं। झारखंड के नक्सल प्रभावित पूर्वी सिंहभूम जिले के ब़ड़ाजु़ड़ी गांव के ग्रामीणों ने यह अनुकरणीय मिसाल पेश की है। लीज पर लिये सरकारी तालाब में मछलीपालन के जरिए अब तक एक सौ से अधिक निर्धन लड़कियों के हाथ पीले किये गये हैं । ७९ सदस्यों की प्रबंधन कमेटी संयुक्त बैंक खाते में जमा रकम की देखरेख करती है। ग्रामीणों ने तालाब में सामूहिक मछलीपालन की योजना लगभग पंद्रह साल पहले उस समय बनाई थी जब पैसे के अभाव में एक गरीब कन्या के विवाह में कठिनाई पैदा हो गई थी। गांव के कुछ लोगों की पहल पर तालाब लीज पर लिया गया तथा प्रबंधन कमेटी बनाई गई। इस कमेटी ने मछलीपालन की कमाई से पहले ही साल सात निर्धन कन्याओं की शादी कराई थी। अब तक यह आंक़ड़ा एक सौ की संख्या को पार कर गया है। ग्रामीण बुलंद हौसले के साथ अब भी इस नेक काम में लगे हैं।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

सियासी डगर पर नौकरशाहों के कदम

नौकरशाही का सफ़र तय करते हुए राजनीति की डगर पर बढ़ने वालों की फ़ेहरिस्त में डॉक्टर भागीरथ प्रसाद का नाम भी जुड़ गया है । इंदौर के देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ. भागीरथ प्रसाद चंबल घाटी के भिंड संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी हैं । पार्टी से हरी झंडी मिलते ही उन्होंने फौरन अपने पद से इस्तीफा दे दिया था । संभवत: यह पहला मौका होगा जब मध्यप्रदेश में किसी कुलपति ने यूनिवर्सिटी का कैंपस छोड़कर चुनावी मैदान में खम ठोका हो । वे 32 साल की नौकरशाही के बाद आईएएस से इस्तीफा देकर डीएवीवी के कुलपति बने और अब उन्होंने कुलपति पद से इस्तीफा देकर सियासत की डगर पकड़ ली है। मूलत: भिंड जिले से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस उम्मीदवार का मुकाबला मुरैना से चार बार से सांसद अशोक अर्गल से होना है। यह एक नेता और अफसर के प्रबंधकीय कौशल की परख वाला चुनाव होगा।

देखा जाए तो अफसरों की राजनीतिक प्रतिबद्घता कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब यह खुले रूप में सामने आने लगी है । बरसों सरकारी नौकरी में रहकर नेताओं को अपनी कलम की ताकत के बूते फ़ाइलों में उलझाने वाले नौकरशाह अब सियासी दाँव-पेंच आज़माने में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं । बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और राजनीतिक मजबूरियों ने नेताओं और अफ़सरों को नज़दीक ला खड़ा किया है । जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण को साधने के लिए राजनीतिक दलों को इन अफ़सरों की ज़रुरत है और सुविधाभोगी नौकरशाहों को सियासी गलियारों में प्रवेश करने की चाहत । एक दूसरे के पूरक बन चुके ये दोनों तबके एक ही धुन पर कदमताल कर रहे हैं ।

वैसे मध्यप्रदेश में अफसरों और राजनेताओं की जुगलबंदी काफी पुरानी है। ज्यादातर अफसर परदे के पीछे रहकर पार्टियों और उनके नेताओं के मददगार बने रहे । लेकिन कुछ अफ़सरों पर बड़े नेताओं से गठजोड़ का ठप्पा भी लगा । प्रदेश में लंबे समय तक काँग्रेस का राज रहने के कारण काँग्रेस समर्थक अफसरों की तादाद ज्यादा होना स्वाभाविक है , लेकिन अब हालात बदल रहे हैं । पिछले कुछ सालों से अफ़सरों को भगवा रंग भी खूब लुभा रहा है । आरक्षित वर्ग के अधिकारियों का रुझान मायावती की बीएसपी की तरफ़ बढ़ रहा है । बहरहाल ज्यादातर अफसर काँग्रेस और भाजपा के टिकट पर ही चुनावी समर में उतरे हैं ।

नौकरशाह से सफ़ल नेता बनने की फ़ेहरिस्त में सबसे ऊपर अजीत जोगी और उनके बाद सुशीलचंन्द्र वर्मा का नाम आता है । इंदौर के कलेक्टर रहे अजीत जोगी के लिये काँग्रेस की राजनीति में एक मुकाम बनाने में अर्जुनसिंह की नज़दीकी खासी मददगार साबित हुई । अजीत जोगी राज्यसभा सदस्य रहे और १९९८ में बेहद कड़े मुकाबले में वे रायगढ़ से लोकसभा चुनाव महज़ चार हजार वोटों के अंतर से जीते । अगले साल ही शहडोल से लोकसभा चुनाव हारने वाले जोगी मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने । उन्होंने मरवाही विधानसभा सीट से रिकार्ड मतों से जीत हासिल की। २००४ के लोकसभा चुनाव में जोगी ही छत्तीसगढ़ के एकमात्र नेता थे जिन्होंने लोकसभा चुनाव में विद्याचरण शुक्ल सरीखे दिग्गज नेता को शिकस्त दी थी ।

इसी तरह प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव सुशील चंद्र वर्मा ने भाजपा के टिकट से चुनाव लड़कर भोपाल सीट काँग्रेस के हाथों से छीनी थी । वे लगातार चार मर्तबा सांसद चुने गये । कार्यकर्ताओं से जीवंत संपर्क रखने वाले सादगी पसंद श्री वर्मा ने वर्ष १९८९ से १९९८ तक भोपाल का प्रतिनिधित्व किया। पोस्टकार्ड के जरिए लोगों से जीवंत संपर्क रखने की खूबी उनकी सफलता की खास वजह रही ।

कुशल प्रशासक के तौर पर पहचान बनाने वाले आईएएस अफसर महेश नीलकंठ बुच वर्ष १९८४ में बैतूल संसदीय क्षेत्र से भाग्य आज़मा चुके हैं । हालांकि निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे श्री बुच को हार का सामना करना पड़ा , लेकिन उन्होंने काँग्रेस प्रत्याशी असलम शेर खान को कड़ी टक्कर देते हुए जीत का फ़ासला ४० हजार मतों पर समेट दिया।

भाजपा ने २००३ के विधानसभा चुनावों में दो भारतीय पुलिस सेवा अफसरों को चुनावी दंगल में उतारा । रूस्तम सिंह ने तो बाकायदा नौकरी छोड़कर मुरैना सीट से चुनाव लड़ा और सीधे केबिनेट मंत्री की कुर्सी सम्हाली । गुर्जर समुदाय को अपनी तरफ खींचने के इरादे से बीजेपी ने रूस्तम सिंह पर दाँव खेला था। लेकिन बीजेपी को भी फ़ायदा नहीं हुआ और शिवराज लहर के बावजूद श्री सिंह को करारी हार झेलना पड़ी । पार्टी ने २००३ में ही आईपीएस पन्नालाल को सोनकच्छ से चुनाव लड़ाया लेकिन सख्त पुलिस अफ़सर की छबि वाले पन्नालाल मतदाताओं को रिझाने में नाकाम रहे। काँग्रेस ने पिछले आमचुनाव में न्यायमूर्ति शंभूसिंह को राजगढ़ संसदीय सीट से चुनाव लड़ाया लेकिन वे सफल नहीं हो पाए।