सोमवार, 20 जून 2011

कलम के सिपाही गोली के शिकार

पत्रकारिता हमेशा से जोखिम भरा काम रहा है, लेकिन इस खतरे में वैश्विक तौर पर लगातार इजाफा हो रहा है। जनहित और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले इन खतरों से बखूबी वाकिफ़ हैं। पूँजीवाद के दौर में कलम के सिपाहियों को माफ़ियाओं के साथ ही सत्ता के नशे में चूर राजनीतिज्ञों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है । आज खबर लेना और खबर देना दोनों खतरे में हैं। पत्रकारों पर बढ़ रहे ऐसे हमलों से प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती जा रही है। इस समय पत्रकारों को सरकार और गैर कानूनी काम करने वालों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। मुंबई में अँग्रेजी अखबार "मिड डे" के क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या और बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली के कपिल शर्मा का मामला ताजातरीन मिसाल है।

अभी पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शाहजाद की हत्या का पखवाड़ा भी नहीं बीता था कि मुम्बई में क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या कर दी गई। शहजाद जिस तरह आईएसआई और कट्टरपंथी तबकों की बखिया उधेड़ रहे थे। उसी तरह ज्योतिर्मय डे भी मुंबई की माफिया जमात पर अपनी खोजी रिपोर्टिंग से लगातार खतरे खड़े कर रहे थे। अपने साथियों के बीच "जेडे" के नाम से मशहूर क्राइम रिपोर्टर,बीते कुछ महीनों से डीजल माफिया के खिलाफ धारावाहिक खोज रिपोर्टों के जरिए अभियान चला रहे थे।मुम्बई में अंडरवर्ल्ड पर कई रिपोर्ट लिखने वाले जेडे की मोटरसाइकिल सवार चार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पहले बीते साल 20 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह घर लौट रहे थे। इस साल 23 जनवरी को नईदुनिया के पत्रकार उमेश राजपूत की मोटरसाइकिल सवार नकाबपोशों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

दूसरी तरफ़ हकीकत सामने लाने का साहस दिखाने वाले नामानिगारों को सबक सिखाने के लिये सरकारों के पास तमाम हथकंडे हैं। 11 और 12 जून 2011 की दरम्यिनी रात बिजनेस स्टैंडर्ड के पत्रकार कपिल शर्मा को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेकर प्रताड़ित करने का मामला भी सामने आया। इसी तरह 26/11 हमले में जब्त हथियार खुले में रखे होने के मामले को सामने लाने वाले मुम्बई के पत्रकार ताराकांत द्विवेदी को सरकारी गोपनीयता कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया । अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता उल्लंघन के मामलों पर निगरानी रखने वाले 'द फ्री स्पीच ट्रैकर' के अनुसार,देश में पत्रकारों पर हमले की वारदात तेज़ी से बढ़ रही हैं। सम्पादकों और लेखकों को लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। संगठन ने पत्रकारों पर हुए 14 हमलों का हवाला देते हुए कहा है कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में है ।

माफिया से टकराने की कीमत जेडे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनकी हत्या पेट्रोलियम माफिया ने की या किसी अंडरवर्ल्ड गिरोह ने या फिर उसके पीछे किसी नौकरशाह अथवा नेता का हाथ है। इस पर फ़िलहाल कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन मामले की जाँच में सामने आये तथ्य जेडे के खुलासों से माफिया जगत में मची खलबली की पुष्टि करते हैं। उन्हें मिल रही धमकियाँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। डीजल माफिया की शासन-प्रशासन से साँठ-गाँठ अब जगज़ाहिर है। कुछ लोग तो सप्रमाण कहते हैं कि छुटभैये नेता डीजल माफिया के पेरोल पर होते हैं । अपने कारोबार में आड़े आने वाले सरकारी मुलाज़िमों को रास्ते से हटाने में भी इन्हें कोई गुरेज़ नहीं होता।

जेडे तीसरे भारतीय पत्रकार थे, जिनकी पिछले छह माह में हत्या की गई। इन सभी मामलों में जाँच जारी है, लेकिन कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं आये हैं। पत्रकारों की हत्या के मामले तो सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन गुत्थियाँ अनसुलझी ही रह जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्था की ओर से बनाए गए ‘माफी सूचकांक 2011’ के अनुसार पत्रकारों की हत्या की गुत्थी न सुलझा सकने वाले देशों में भारत 13वें स्थान पर है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 10वें और बांगलादेश 11वें स्थान पर है। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (सीपीजे) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सात अनसुलझे मामलों के साथ 13वें स्थान पर है। एक साल में पूरी दुनिया में होने वाले कार्य संबंधी हत्याओं में 70 प्रतिशत मामले पत्रकारों के हैं। सूचकांक में पत्रकारों की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों का प्रतिशत जनसंख्या के अनुपात में निकाला गया है। यहाँ ऐसे मामलों को अनसुलझा माना गया है, जिसमें अभी तक कोई आरोपी पकड़ा नहीं गया है। फ़ेहरिस्त में इराक पहले स्थान पर है। वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों और खतरनाक अभियानों के दौरान बहुत ज्यादा संख्या में पत्रकारों की हत्या हुई है। इराक में 92 मामले अभी तक अनसुलझे हैं,जबकि फिलीपींस में इनकी संख्या 56 है। इसके बाद श्रीलंका और कोलंबिया का स्थान आता है।

दरअसल,विश्व भर में पत्रकारों की हत्याओं का सिलसिला किसी भी साल थमा नहीं है। भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अभिव्यक्ति के सिद्धांत पर अमल करते हुए पूरी दुनिया में हर साल सैकड़ों पत्रकार जान देते हैं।जेडे और शाहजाद इस मुहिम में अकेले नहीं रहे। संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक,वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2009 तक दुनिया में सच को आवाज़ देने की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए 247 पत्रकार कुर्बान हो गये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुहिम को कलम के माध्यम से आगे बढ़ाते हुए इस दौरान भारत में छह पत्रकार बलिदान हुए। यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन वर्षों में पत्रकारों की हत्या के मामलों से स्पष्ट है कि मीडिया से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं ।

ऐसा नहीं कि सिर्फ यूनेस्को ही ऐसी रिपोर्ट पेश कर रहा है। "विदाउट बॉर्डर्स" की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2010 में काम के दौरान 57 पत्रकार मारे गए। यह संख्या 2009 के 77 पत्रकारों की तुलना में कम है लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह है कि 2010 में 51 पत्रकारों को बंधक बनाया गया जो पिछले दो सालों की संख्या से कहीं ज्यादा है। "विदाउट बॉर्डर्स" के महासचिव जाँ फ्रांसोआ जूलियर्ड ने कहा भी कि पत्रकारों का बढ़ता अपहरण साबित करता है कि उनकी निष्पक्षता और काम का आदर अब नहीं किया जाता। उन्हें भी सत्ता का एक अंग समझा जाता है और अकसर उनका अपहरण सत्ता से कोई माँग पूरी करने के एवज में किया जाता है। पत्रकारों की हत्याओं ने इस सच्चाई से हमें रूबरू करा दिया है कि आर्थिक तरक्की और देश में एक लोकतांत्रिक सरकार के होते हुए भी पत्रकारों के लिए सुरक्षित जगह सिकुड़ती जा रही है। विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में भले ही अफगानिस्तान और नाइजीरिया को पत्रकारों के लिए सबसे असुरक्षित माना गया हो लेकिन भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं। फरवरी 2010 में जारी इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ने तो पत्रकारों के लिए दुनिया में सबसे खतरनाक जगह के रूप में भारत का स्थान मेक्सिको और फिलीपींस के साथ तीसरे नंबर पर रखा है।

जेडे हत्याकांड ने समाज में चलने वाली साजिशों,भ्रष्टाचार और गैरकानूनी धंधों को उजागर करने वाले पत्रकारों के लिए बढ़ते खतरे को एक बार फिर उजागर किया है। ये घटनाएँ यह बताती हैं कि किसी भी ताकतवर संस्था, व्यक्ति या गिरोह के कारनामों को जनता के सामने लाना कितना जोखिम भरा होता जा रहा है। सरकार एक तरफ "व्हिसल ब्लोअर बिल" लाकर गड़बड़ियों को सामने लाने वाले लोगों को संरक्षण देने की बात कर रही है और दूसरी तरफ पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे पत्रकारों को संरक्षण देने में नाकाम रही है। हत्यारों का मनोबल इसलिए बढ़ता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं। अगर इनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो पत्रकार ऐसे भ्रष्ट तत्वों का ‘आसान निशाना’ बने रहेंगे। सत्ता पक्ष मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहता है, इसलिए वह हमें भ्रष्ट भी कर रहा है।

चैनलों और समाचारपत्रों में ठेके की नौकरियों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। मीडिया हाउसों में श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, पर सरकार खामोशी से तमाशा देख रही है। दरअसल सरकारी तंत्र अपने काले कारनामों को छिपाने के लिये पत्रकारों को खरीदने या डराने का उपक्रम करता रहता है । सरकार खुद भी चाहती है कि पत्रकार असुरक्षित रहें, ताकि वे सत्ता के खिलाफ अपनी कलम नहीं चला सकें। वे नौकरी जाने की आशंका में अपना साहस और आत्मविश्वास खो दें। रोज़ी-रोटी के सवाल पर वे भीरू हो जाएं और अपना पैनापन खो बैठें। आर्थिक संकटों से जूझते खबरनवीसों का सत्ता पक्ष आज अपने लिए बेतरह इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल उठता है कि आखिर क्या कदम शासन उठाए कि कार्यरत पत्रकारों को अपेक्षित सुरक्षा उपलब्ध हो। पहला तो यही कि भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों में संशोधन किया जाये। पत्रकारों पर हमले को संज्ञेय और गैरजमानती अपराध करार दिया जाए। इससे कुछ तो बचाव होगा। कुछ लोग मुद्दा उठा सकते हैं कि ऐसी सहायता हर भारतीय नागरिक को मिले, केवल कार्यरत पत्रकारों को ही क्यों? यहाँ यह समझना होगा कि सीमा पर तैनात सैनिक की तरह ही पत्रकारों का काम भी खतरे भरा है, जहां हमले की आशंका निरन्तर है। आखिर पत्रकार जनसेवा में कार्यशील हैं। राष्ट्रहित और समाज को जागरुक करने में पत्रकार का योगदान किसी भी नज़रिये से सुरक्षा बलों या जननायकों से कमतर नहीं है।

भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कानून बनाने का मामला पिछले कई सालों से लंबित पड़ा है। अधिवेशनों में पत्रकार कानून बनाने की माँग उठाते रहे हैं। पत्रकार संगठनों द्वारा धरना-प्रदर्शन किया जाता है। सरकारें जल्द से जल्द कानून बनाने का आश्वासन देती हैं। नेता पत्रकारों पर होनेवाले हमले पर कानून बनाने की बात करते हैं। इस घटना में भी सब कुछ ऐसा ही हुआ है। जेडे के मारे जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा देने की बात कही है। असली सवाल फिर भी रह जाता है। क्या यह हकीकत नहीं है कि पत्रकारों पर होने वाले हमले को लेकर सरकार खुद ही कानून नहीं बनाना चाहती है ?

सोमवार, 6 जून 2011

"शठ योगी" बाबा का हठ योग

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई महाभारत के बाद पूरे देश में घमासान मच गया है । रामदेव के मुद्दे ने राष्ट्रीय राजनीति में मृतप्राय हो चली बीजेपी के लिये संजीवनी बूटी का काम किया है । चारों तरफ़ रामदेव के हाईटेक और पाँचसितारा सत्याग्रह पर हुए पुलिसिया ताँडव की बर्बरता पर हाहाकार मचा है । लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन के ज़रिये अपनी बात सरकार तक पहुँचाने वालों का दमन किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता,लेकिन संवैधानिक अधिकार की आड़ में बाबा के कुकृत्यों पर पर्दा डालना भी आत्मघाती कदम से कम नहीं होगा । मीडिया बाबा को हठयोगी,महायोगी और ना जाने कौन-कौन सी पदवी से नवाज़ रहा है,मगर हाल के दिनों की उनकी करतूतें रामदेव को "शठ योगी" ही ठहराती हैं ।


बीती बातों को बिसार कर बाबाजी के हाल के दिनों के आचरण पर ही बारीकी से नज़र डालें,तो रामदेव के योग की हकीकत पर कुछ भी कहने-सुनने को बाकी नहीं रह जाता । योग का सतत अभ्यास सांसारिक उलझनों में फ़ँसे लोगों के मन, वचन और कर्म की शुद्धि कर देता है, तो फ़िर संसार त्याग चुके संन्यासियों की बात ही कुछ और है। मगर रामदेव के आचरण और वाणी में यम,नियम,तप,जप, योग,ध्यान,समाधि,और न्यास का कोई भी भग्नावशेष दिखाई नहीं दिये। योगी कभी दोगला या झूठा नहीं हो सकता मगर बाबा बड़ी सफ़ाई से अपने भक्तों और देश के लोगों को बरगलाते रहे। बाबा जब सरकार से डील कर ही चुके थे,तो फ़िर इतनी सफ़ाई से मीडिया के ज़रिये पूरे देश को बेवकूफ़ बनाने की क्या ज़रुरत थी ? वास्तव में बाबा का काले धन के मुद्दे से कोई सरोकार है ही नहीं। अचानक हाथ आये पैसे और प्रसिद्धि से बौराए बाबाजी को अब पॉवर हासिल करने की उतावली है। इसीलिये एक्शन-इमोशन-सस्पेंस से भरा मेलोड्रामा टीआरपी की भूखे मीडिया को नित नये अँदाज़ में हर रोज़ परोस रहे हैं ।

पँडाल में मनोज तिवारी देश भक्ति के गीतों से लोगों में जोश भर रहे थे और बाबाजी भी उनके सुर में सुर मिलाकर अलाप रहे थे "मेरा रंग दे बसंती चोला" और " सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है " लेकिन जब पुलिस पकडने आई , तो आधुनिक युग के भगत सिंग मंच पर गुंडों की तरह इधर-उधर भागते दिखाई दिए । ऎसे ही सरफ़रोश थे, तो गिरफ़्तारी से बचने के लिये समर्थकों को अपनी हिफ़ाज़त के लिये घेरा बनाने को क्यों कह रहे थे ? सत्याग्रह जारी रखने की "भीष्म प्रतिज्ञा" लेने वाले रामदेव इतने खोखले कैसे साबित को गये कि पुलिस की पहुँच से बचने के लिये महिलाओं की ओट में जा छिपे ।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने बाबाजी को नये दौर का स्वामी विवेकानंद ठहराया है । मगर सवाल यह भी है कि बसंती चोला रंगाने की चाहत रखने वाले बाबाजी ने गेरुआ त्याग सफ़ेद बाना क्यों पहना ? मुसीबत के वक्त ही व्यक्तित्व की सही पहचान होती है । मगर बाबाजी की शख्सियत में ना धीरता दिखी और ना ही गंभीरता । देश का नेतृत्व करने की चाहत रखने वाला बाबा खाकी के रौब से इतना खौफ़ज़दा हो गया कि अपने समर्थकों को मुसीबत में छोड़कर भेस बदलकर दुम दबाकर भाग निकला । ऎसे ही आँदोलनकारी थे, देशभक्त थे,क्राँतिकारी थे,तो मँच से शान से अपनी गिरफ़्तारी देते और भगतसिंग की तरह "रंग दे बसंती" का नारा बुलंद करते । बाबाजी अब तो आप जान ही गये होंगे कि जोश भरे फ़िल्मी गीतों पर एक्टिंग करना और हकीकत में देश के लिये जान की बाज़ी लगाने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है । आँदोलन के अगुवाई के लिये पुलिस का घेरा तोड़ने की गरज से भेस बदलने के किस्से तो खूब देखे-सुने थे,मगर "आज़ादी की दूसरी लड़ाई" के स्वयंभू क्राँतिकारी का यह रणछोड़ अँदाज़ बेहद हास्यास्पद है। गनीमत है ऎसे फ़िल्मी केरेक्टर स्वाधीनता सँग्राम के दौर में पैदा नहीं हुए ।

बाबा का चोरी और सीनाज़ोरी का अँदाज़ भी बड़ा निराला है। अब वे अपने हर कृत्य को कुछ राजनीतिक दलों की शह पर ग्लैमर का जामा पहनाने पर उतारु हैं। एक नेताजी ने किसी चैनल पर बोलते हुए क्ल्यू दे दिया, तो अब बाबाजी ने अपने सुर बदल दिये । कल तक तो जान बचाने के लिये "माताओं-बहनों" के कपड़े मजबूरन इस्तेमाल करने की दुहाई देने वाले बाबाजी अब तेवर दिखा रहे हैं । अ वे पुलिस पर चीर हरण का आरोप लगा रगे हैं । वे इतने पर ही नहीं रुकते । वे सरकार पर पँडाल को लाक्षागृह बनाने, बम फ़ेंकने, उनकी हत्या या एनकाउंटर करने का षडयंत्र रचने का आरोप भी लगा रहे हैं ।

केन्द्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों के स्वार्थ के चलते देश में रामदेव जैसे तमाम फ़र्ज़ी बाबाओं की पौ बारह है । सरकारें अपने राजनीतिक हित साधने के लिये इन बाबाओं आगे बढ़ाती हैं,जिसका खमियाज़ा देश की भोलीभाली जनता को उठाना पड़ता है । मीडिया की साँठगाँठ भी इस साज़िश में बराबर की हिस्सेदार है । बाबा के अनर्गल प्रलाप का पिछले चर दिनों से लाइव कवरेज दिखाने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में क्या सारे बिकाऊ या अधकचरे लोग भरे पड़े हैं,जो बाबा के चेहरे से टपकी धूर्तता को देखकर भी देख नहीं पा रहे हैं । सजीव तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलतीं । उस रात मंच पर कुर्सियाँ फ़ाँदते, भीड़ में छलाँग लगाते, शाम से लोगों को मरने-मारने के लिये उकसाते और पुलिस से बचने के लिये महिलाओं की आड़ लेने का पेशेवराना तरीका कुछ और ही कह रहा है। आज तो बाबा ने हद ही कर दी । प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान उन्होंने किसी की वल्दियत तक पर सवाल खड़ा कर दिया । जिस अँदाज़ में उन्होंने इस वाक्यांश का इस्तेमाल किया, वह हरियाण,पंजाब,राजस्थानके हिस्सों में अपमानजनक समझा जाता है । ऎसे ही कल एक चैनल पर पँडाल में बाबा के विश्राम के लिये बनाये गये कक्ष में अत्याधुनिक साज-सज्जा और डनलप का गद्दा देखकर आँखें फ़टी रह गईं । हमने तो सुना था कि योगियों का आधुनिक सुख-सुविधाओं से कोई वास्ता नहीं होता ।

मूल सवाल वही है कि जिसका वाणी पर संयम नहीं,जिसके विचार स्थिर और शुध्द नहीं, जिसके मन से लोभ-लालच नहीं गया, जिसमें भोग विलास की लिप्सा बाकी है,जिसके आचरण में क्रूरता, कुटिलता और धूर्तता भरी पड़ी हो वो क्या वो योगी हो सकता है ? खास तौर से जो शख्स करीब तीस सालों से भी ज़्यादा वक्त से लगातार योगाभ्यास का दावा कर रहा हो और अपने योग के ज़रिये देश को स्वस्थ बनाने का दम भरता हो, उसका इतना गैरज़िम्मेदाराना बर्ताव उसकी ठग प्रवृत्ति की गवाही देने के लिये पर्याप्त हैं । ये मुद्दे भी आम जनता के सामने लाने की ज़रुरत है। बाबाजी ने पिछले तीन दिनों के घटनाक्रम के दौरान खुद ही आमजनता और मीडिया को अपने छिपे हुए रुप या यूँ कहें कि असली रुप की झलक बारंबार दी है। बाबाजी तो अपना नकाब उतार चुके अब यदि लोग हकीकत को देखकर भी नज़र अँदाज़ कर दें तो ये लोगों की निगाहों का ही कसूर होगा ।

रविवार, 29 मई 2011

संघ-भाजपा के सितमों से आचार्य धर्मेन्द्र आगबबूला

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और आरएसएस को इन दिनों हिन्दुत्व के अलंबरदार और तेज़तर्रार विहिप नेता आचार्य धर्मेन्द्र का कोपभाजन बनना पड़ रहा है । गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के कब्ज़े से छुड़ाने के लिए सागर में करीब एक हफ़्ते का अनशन नाकाम होने से आचार्य बेहद बिफ़रे हुए हैं । दरअसल आचार्य धर्मेन्द्र पिछले रविवार को सागर में अनशन पर बैठे थे। पर सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और किसी नतीजे के पहले ही उन्हें छह दिन बाद गाय का दूध पीकर अपना आमरण अनशन खत्म करना पड़ा। अपनों के सितम से बेज़ार आचार्य संघ और भाजपा पर मतलबपरस्ती की तोहमत लगा रहे हैं।

बगैर कुछ हासिल किए मजबूरी में अनशन तोड़ने के बाद अब आचार्य धर्मेन्द्र भाजपा सरकार और आरएसएस को कोस रहे हैं। गुस्साये हिन्दूवादी नेता ने सरस्वती शिशु मंदिर पर तीखे प्रहार करते हुए संगठन को शिक्षा माफ़िया तक बता डाला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर विश्वासघात का आरोप लगाने वाले आचार्य धर्मेन्द्र की निगाह में संघ अब 'परिवार' नहीं रहा बल्कि 'तंत्र' बन गया है । संघ में भावना, समर्पण,त्याग व प्रेम की जगह धनलोलुपता का जोर बढ़ रहा है। उन्होंने आमरण अनशन के बेनतीजा समाप्त होने को अपनी पराजय न मानते हुए संघ पर लगा कभी न मिटने वाला कलंक बताया।

कहते हैं लोहा,लोहे को काटता है। लिहाज़ा प्रदेश सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी । इस घटनाक्रम से गौ और गंगा के नाम पर हिन्दुओं को भरमाने वाली भाजपा की इन मुद्दों पर गंभीरता का सहज ही अँदाज़ा लगाया जा सकता है। आचार्य धर्मेंद्र मानते हैं,इससे हिंदुत्व और गाय के लिए नारा लगाने वालों की असलियत सामने आ गई है। उनका अनशन जमीन के लिए नहीं,बल्कि गौ-माता के लिए था। उन्होंने कहा कि स्कूल द्वारा दबाई गई जमीन गौ सेवा संघ की है। भाजपा और आरएसएस की भूमिका से खफ़ा हिन्दू नेता इसे अपने जीवन का सबसे कड़वा अनुभव बता रहे हैं। अनशन की नाकामी से निराश आचार्य इसे संघ और भाजपा की हार करार देने से भी नहीं चूकते।

आचार्य धर्मेन्द्र के मुताबिक वे वर्ष 1980 से सागर के गौ सेवा संघ के संरक्षक हैं और आरएसएस से भी जुडे़ रहे हैं, लेकिन गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर संगठन के कब्जे से मुक्त कराने के मामले में संघ ने उनके साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि संघ का अनुषांगिक संगठन सरस्वती शिशु मंदिर छल, षड़यंत्रों व कुचक्रों का जाल बुनने वाला शिक्षा माफिया है। संघ के अनुषांगिक संगठनों के समूह को संघ परिवार कहा जाता रहा है, लेकिन सागर के जहरीले अनुभव के बाद अब वह संघ परिवार को 'संघ तंत्र' कहने को विवश हैं। संघ पर "यूज एंड थ्रो" की पश्चिमी संस्कृति अपनाने का आरोप जड़ते हुए उन्होंने कहा कि अपनों ने मुझे खो दिया। उन्हें अब मेरी जरूरत नहीं है।

गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। जानकारों का कहना है कि गौ सेवा संघ को 1927 में पचास हजार वर्ग फीट से अधिक जमीन दान में मिली थी। इसे गौ शाला बनाने और गौ संरक्षण के उद्देश्य से दिया गया था। 1972 में गौ सेवा संघ ने सरस्वती शिशु मंदिर को दो कमरे किराए पर दिए थे। इसके बाद वर्ष 1980 में सरस्वती शिशु मंदिर के पदाधिकारियों ने उनसे ही शिशु मंदिर के नए भवन का शिलान्यास करा लिया और लगातार विकास करते रहे। जब आचार्य धर्मेन्द्र को जमीन हथियाने की सूचना मिली तो उन्होंने आरएसएस के लोगों से बात की पर नतीजा नहीं निकला। पंचखंड पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच चल रहे भूमि विवाद को सुलझाने के मकसद से सागर आए थे। जमीन मुक्त कराने के लिये सरस्वती शिशु मंदिर के प्रवेश द्वार पर 21 मई से सत्याग्रह शुरू किया था, जो 24 मई को आमरण अनशन में तब्दील हो गया। सरकार की बेरुखी के कारण आमरण अनशन 27 मई को बेनतीजा खत्म करना पड़ा।

आचार्य धर्मेन्द्र सरीखे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के कटु अनुभव संघ और भाजपा पर सत्ता क सुरुर चढ़ने की पुष्टि करते हैं। वैसे भी जिसे पीने का शऊर और आदत भी नहीं हो,उस पर नशा कुछ जल्दी ही तारी हो जाता है। जनता को संस्कारों की घुट्टी पिलाने वाले संघी सत्ता के मद में इस कदर चूर हो चुके हैं कि अपनी ही नीतियों और सिद्धांतों को रौंदते हुए बढ़े चले जा रहे हैं,गोया कि प्रदेश में सत्ता की चाबी महज़ पाँच सालों के लिये नहीं आने वाली कई पुश्तों को सौंप दी गई है। लोकतंत्र में नये किस्म का सामंतवाद लाने वालों को आगाह ही किया जा सकता है। बहरहाल आचार्य धर्मेन्द्र के आक्रोश को नसीहत समझकर सबक सीखने की गुंजाइश तो रखना ही चाहिए। और फ़िर -

कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय|
जा खावत बौरात है,वा पावत बौराय ।|

शनिवार, 21 मई 2011

महँगाई से निपटने का एकमात्र हथियार-भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होने वाले आंदोलन अधिकतर भारतीयों की इसी सोच को साबित करते हैं कि देश में करप्शन दिनों-दिन बढ़ रहा है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी गैलप के मुताबिक वर्ष 2010 में करीब 47 फ़ीसदी लोगों ने माना कि 5 साल पहले की तुलना में भारत में करप्शन बढ़ा है,जबकि 27 प्रतिशत को घूसखोरी के पैटर्न में कोई तब्दीली नज़र नहीं आती। 78 प्रतिशत लोगों की राय में सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। वहीं 71 प्रतिशत लोगों का मानना है कि व्यापार जगत में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लोग भ्रष्टाचार को लेकर खुद को कितना असहाय महसूस कर रहे हैं और उनमें कैसी छटपटाहट है,इसकी एक मिसाल अप्रैल में दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन के दौरान देखने को मिली थी। हाल ही में जारी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की लड़ाई को मिले व्यापक जन समर्थन और इस तरह के आंदोलनों से भारतीयों की हताशा जाहिर होती है। रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादातर भारतीय इस समस्या की समाज में गहराई तक पैठ बनाने की सच्चाई को स्वीकार चुके हैं।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि बेरोज़गार और युवा तबका उम्मीदों के बोझ तले हालात के आगे घुटने टेकता दिखाई देता है। तकरीबन 65 प्रतिशत बेरोजगारों की राय में सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के ठोस कदम नहीं उठा रही है। सर्वे के अनुसार लोगों को नहीं लगता कि हालात सुधर रहे हैं और वे व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार से लड़ सकते हैं। सर्वे में 6 हज़ार वयस्कों से सीधे इंटरव्यू किया गया।

दूसरी तरफ़ वित्त और निवेश जगत की नामचीन हस्तियाँ कहने लगें कि भारत में शासन संबंधी स्थितियों को लेकर निराशा का माहौल बन गया है,तो ऎसे में देश की व्यवस्था संबंधी खामियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। मशहूर अमेरिकी फर्म जेपी मॉर्गन के एक प्रमुख अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह बेलाग कहा है कि आम तौर पर भारत को लेकर आज छवि नकारात्मक है और निवेशक अब हताश होने लगे हैं। उन्होंने यह बात विदेशी निवेशकों के संदर्भ में कही है,लेकिन भारत में लोगों की राय भी आज इससे बेहतर नहीं है।

सुरसा सा मुँह फ़ैलाती महँगाई की ओर से मुँह फ़ेर चुकी सरकारों को देखकर लगता है, मानो देश के औद्योगिक विकास के लिये देश में जान बूझकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया है। व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सबसे भ्रष्ट अफ़सरों की ज़बरदस्त पूछ है। सरकार की आवाज़ समझे जाने वाले महकमे में तो जैसे कलेक्शन सेंटर खोल दिया गया है। यथासमय दान-दक्षिणा पहुँचाने के एवज़ में लूटखसोट की खुली छूट दे दी गई है। देश के जाने माने शिक्षा संस्थान जहाँ मोटी फ़ीस लेकर पत्रकारिता की डिग्री देते हैं। वहीं इन सरकारी महकमों में ऎरे-गैरे नत्थू खैरे शुरुआती भेंट पूजा के साथ बाकायदा काम पा रहे हैं। आलम यह है कि असली पत्रकार धीरे-धीरे गायब हो चुके हैं। अब स्कूली शिक्षक, कपड़ा व्यापारी, अकाउंटेंट सरीखे लोगों का डंका बज रहा है। एक काँख में काँग्रेस और दूसरे में बीजेपी को दबाये घूमने, बड़े नेताओं को साधने और आला अफ़सरों को खरीदने का हुनर जानने वाले बरसों बरस एक ही जगह जमे रहकर मौज करते हैं और नियम कायदों पर चलने वालों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। वोट बैंक की खातिर समाज के आखिरी छोर पर खड़े लोगों को भी मुफ़्त बिजली,पानी,राशन,ज़मीन और मकान देकर खरीद लिया गया है।

अन्ना के अनशन से एक कारगर लोकपाल की स्थापना की उम्मीद बनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर जिस हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है, उसका क्या हल हो, इस सवाल पर आम लोग से लेकर विशेषज्ञ तक किंकर्तव्य्विमूढ़ हैं। इस असहायता से ही वह हताशा पैदा हो रही है, जिसका असर अब देश की विकास पर पड़ने लगा है। हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों पर न्यायपालिका ने जबरदस्त सख्ती से कई बड़े घोटालों की जाँच में चुस्ती आई है । नतीजतन कई धुरंधर सलाखों के पीछे हैं, मगर इससे आम आदमी का भरोसा लौटता नहीं दिख रहा है।

कहते हैं, जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। लिहाज़ा भ्रष्टाचार की हिस्सेदारी थोड़ी ही सही कमोबेश देश का हर नागरिक कर रहा है। कई मर्तबा लगता है मुफ़्तखोरी ने हमारे जेनेटिक कोड को ही खराब कर दिया है। ऎसे में सुधार की संभावनाएँ ना के बराबर हैं। सुनते हैं विध्वंस में ही सृजन छिपा है। विनाश में ही नई उम्मीद का बीज मौजूद है। कई भविष्यवक्ताओं ने आज २१ मई का दिन मुकर्रर किया था पृथ्वी के खात्मे के लिये, मगर शाम होने आई अब तक तो कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। भ्रष्टाचारियों की राह के रोड़े हम जैसे लोगों को अब अगली किसी तारीख का इंतज़ार करना होगा।

कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअययन है,नींद क्यों रात भर नहीं आती ।

सोमवार, 16 मई 2011

महँगाई के मुद्दे पर राहुल-सोनिया भूमिगत

पेट्रोल के दाम एक बार फ़िर बढ़ा दिये गये। इस मर्तबा कीमतों में अब तक की सर्वाधिक सीधे पाँच रुपये की बढ़ोत्तरी ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है। यह वृद्धि आठ प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो सालों में पेट्रोल के दामों में प्रति लीटर 23 रूपयों की वृद्धि की जा चुकी है। गौरतलब है कि पिछले नौ महीनों में पेट्रोल की कीमत में नौ बार इज़ाफ़ा हो चुका है। इस तरह पेट्रोल की कीमत 47.93 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 63.37 रुपये हो गई है।

लेकिन दिन रात आम आदमी की दुहाई देने वाली केन्द्र सरकार पूरे मामले से पल्ला झाड़ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मुताबिक "पिछले वर्ष जून में हमने पेट्रोल कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का निर्णय लिया था। लिहाजा इन दिनों पेट्रोल कीमतों में वृद्धि या कमी का निर्णय सरकार नहीं लेती। पेट्रोल की ताजा मूल्य वृद्धि में सरकार ने कोई भूमिका नहीं निभाई है, क्योंकि कीमतें नियंत्रण मुक्त हो चुकी हैं। उन्होंने एक तरह से तेल विपणन कम्पनियों के निर्णय का पक्ष लेते हुए कहा कि पिछले 11 महीनों में कच्चे तेल की कीमत 42 डॉलर प्रति बैरल बढ़ गई हैं। वे कहते हैं कि जब पिछले जून में कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने का निर्णय लिया गया था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 68 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन आज यह दर बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।

इधर हमेशा की तरह भाजपा और वामपंथी दल गाल बजाकर अपने लोकतांत्रिक दायित्वों की पूर्ति का दम भरने में लगे हैं । दो-चार दिन सड़कों पर चक्काजाम करने या साइकल,बैलगाड़ी,घोड़ागाड़ी दौड़ाने से सरकार के कान पर जूँ रेंगती तो शायद हालात कुछ और होते। मगर बयान जारी कर चेहरा चमकाने की राजनीति के मौजूदा दौर में बीजेपी ने कहा कि केंद्र सरकार पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए चुनाव परिणामों का इंतज़ार कर रही थी। बीजेपी ने इसे पश्चिम बंगाल, केरल और असम में काँग्रेस की जीत का जनता को ‘‘तोहफा’’ बताया है । अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृध्दि के सरकार के तर्क की काट में भाजपा ने कहा कि सरकार पेट्रोल पर लगाए गए बेतहाशा केन्द्रीय करों को कम करके जनता को राहत दे सकती है। वामपंथी पार्टियों ने मूल्य वृद्धि को संप्रग सरकार का ‘क्रूर हमला’निरुपित करते हुए हर तरफ से महंगाई से त्रस्त लोगों को जबरदस्त झटका बताया है। साथ ही विनियमन नीति वापस लेने की माँग की है।

इस पूरे मसले में एक बात हैरान करने वाली है । जब भी महँगाई से जुड़े मुद्दे पर देश में बैचेनी बढ़ती है। सोनिया गाँधी और उनके सुपुत्र राहुल गाँधी भूमिगत हो जाते हैं । दलित के घर भोजन खाकर,कलावती का मुद्दा संसद में उठाकर,सिर पर मिट्टी ढ़ोकर और भट्टा पारसौल के किसानों के बीच जाकर गिरफ़्तारी देने वाले "काँग्रेस के युवराज" कब तक भारतीय जनमानस की भावनाओं से खेलते रहेंगे। आम जनता की रोज़ी-रोटी से जुड़े मुद्दों पर काँग्रेस के इस "पोस्टर ब्वाय" की चुप्पी आपराधिकता की श्रेणी में आती है। पेट्रोल, डीज़ल या रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी सिर्फ़ इन उत्पादों तक ही सीमित नहीं होती। इनका असर रोज़मर्रा की ज़रुरतों की हर छोटी बड़ी वस्तु पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पड़ता है।

बाज़ारीकरण की नीति पर चलकर आखिर देश जा कहाँ रहा है ? बिजली के बाद अब प्रकृति प्रदत्त संसाधन भी निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। प्याऊ लगाकर प्यासे कँठों को तर करने का पुण्य कमाने वाले देश में आज पानी एक "कमोडिटी" है। मुनाफ़े के इस धँधे में चाँदी काटने के इरादे से केन्द्र और राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारों पर नाच रही हैं। भोपाल के कोलार क्षेत्र में नगर पालिका बनाकर नेताओं की कमाई के लिये चारागाह तो तैयार कर दी गई, मगर यहाँ की पेयजल समस्या के निराकरण की कोई पहल नहीं की गई। यह जानकर कलेजा मुँह को आता है कि औसतन दस- बारह हज़ार रुपये महीना कमाने वाले परिवार को मकान किराया,बिजली,दूध और पेट्रोल जैसे ज़रुरी खर्च के अलावा पानी के इंतज़ाम पर औसतन हर महीने सात सौ से आठ सौ रुपये चुकाना पड़ रहे हैं । यही हाल सड़कों किनारे बनाई गई अँधाधुँध पार्किंग का है। पाँच-पाँच, दस-दस रुपये के ज़रिये लोग हर रोज़ ना जाने कितने रुपये चुकाते हैं। अब तो टोल नाकों के ज़रिये सड़कों पर चलने की भारी कीमत चुकाना पड़ रही है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। कोई नियम कायदा नहीं है।

दरअसल बाज़ारीकरण की व्यवस्था भ्रष्ट समाज में ही पुष्पित और पल्लवित हो सकती है। उपभोक्तावादी संस्कृति में नैतिकता और ईमानदारी का कोई मूल्य ही नहीं है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ईमानदारी अनमोल है,वास्तव में बाज़ारवाद की राह पर आगे बढ़ते समाज में यह "बेमोल" है । सत्ता चलाने वाले भी बखूबी जान चुके हैं कि इस भ्रष्ट तंत्र में कीमतों में इज़ाफ़े से किसी पर भी कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ज़रा सोच कर देखिये दाम बढ़ेगे तो व्यापारी से लेकर मज़दूर और डॉक्टर से लेकर ठेले वाले तक सभी अपने- अपने स्तर पर बढ़ती महँगाई से तालमेल बिठाने का एडजस्टमेंट कर लेते हैं। और कुछ दिनों के हँगामे के बाद गाड़ी फ़िर पटरी पर चलने लगती है।

इस चक्की में सिर्फ़ वही पिसने वाला है जिसे ईमानदारी से जीवन गुज़र बसर करने का भूत सवार है। देश की कुलाँचे मारती जीडीपी में वैसे भी ईमानदार जीवों का भला क्या योगदान है ? इन मरदूदों के भरोसे चले, तो देश की इकॉनॉमी का भट्टा बैठना तय है और औद्योगिक विकास की दर का गर्त में समाना लाज़िमी है। पूरी बात का लब्बेलुआब यह कि जनाब यह सतयुग नहीं कलिकाल है, जहाँ भोगवादियों का बोलबाला है। इस दौर के मार्गकँटकों (ईमानदारो) की विलुप्तप्राय प्रजाति को धरती से हटाने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है। देश की तरक्की और दुनिया का सिरमौर बनने के लिये भ्रष्टाचार ज़िन्दाबाद। और जब भ्रष्टाचार है, तो कीमतों में इज़ाफ़े से कैसा डर ? इस हाथ ले उस हाथ दे की अर्थव्यवस्था में महँगाई कोई समस्या नहीं है । यह तो महज़ एक सियासी दाँव है,जो सत्ता हथियाने के लिये राजनीतिक दल अपनी सहूलियत से समय-समय पर आज़माते हैं।

गुरुवार, 12 मई 2011

पाले का मुआवज़ा पाकर खूब लहलहाईं फ़सलें

मध्यप्रदेश की मंडियों में आजकल गेंहूँ की बम्पर आवक ने सरकार के होश फ़ाख्ता कर रखे हैं। सरकारी खरीद के अनाज को रखने के लिये गोदाम कम पड़ रहे हैं। इस मर्तबा हुई बम्पर पैदावार ने एक बार फ़िर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की नीयत पर सवाल खड़े कर दिये हैं। बीती सर्दियों में सूबे की सरकार पाले और तुषार का रोना रोकर किसानों की चिंता करने में लगी थी, वो अब गेंहूँ की बम्पर पैदावार से हैरान है। अभी ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा है,जब प्रदेश में पाले से कहीं सत्तर तो कहीं सौ फ़ीसदी फ़सल चौपट होने की हवा बनाई गई थी। बात-बात में केन्द्र सरकार पर तोहमत जड़ने के आदी शिवराजसिंह किसानों को भरपूर मुआवज़ा देने की माँग को लेकर अपने संवैधानिक दायित्वों को बलाये ताक रखकर आमरण अनशन पर आमादा थे।

मंडियों और खरीदी केन्द्रों पर इतना गेंहूँ पहुँच रहा है कि जानकारों को शंका होने लगी है कि मध्यप्रदेश में पाला पड़ा भी था या नहीं ? और पाला अगर पड़ा था तो क्या उसने फ़सलों के लिये "टॉनिक" का काम किया ? सरकारी आँकड़ों पर यकीन करें तो मध्यप्रदेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर इस साल गेंहूँ खरीद का नया रिकॉर्ड बना है। राज्य में गेंहूँ की सरकारी खरीदी का पिछला रिकॉर्ड ध्वस्त हो चुका है। मंडियों में इस मौसम का कुल गेंहूँ खरीद आँकड़ा 36 लाख 39 हजार मीट्रिक टन जा पहुँचा है। इससे पहले प्रदेश में गेंहूँ की सबसे ज्यादा खरीद पिछले साल ही 35 लाख 37 हजार टन रही थी। खास बात यह है कि खरीदी का सिलसिला 31 मई तक चलना है । लिहाजा आँकड़ा 45 लाख मीट्रिक टन तक पहुँचने का अनुमान है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि बढ़ी खरीद के सुरक्षित भंडारण के लिये प्रदेश में पहली बार अब तक कोई 100 रेल्वे रेक्स का इस्तेमाल किया जा चुका है। समर्थन मूल्य पर गेंहूँ खरीदी की पूरी कार्रवाई को अंजाम दे रही नोडल एजेंसी राज्य नागरिक आपूर्ति निगम अब तक 26 लाख 50 हजार टन और एक अन्य प्रमुख एजेंसी राज्य सहकारी विपणन संघ 9 लाख 89 हजार टन गेंहूँ खरीद चुकी है। गौर तलब है कि समर्थन मूल्य पर गेंहूँ की सरकारी खरीदी में मध्यप्रदेश का नंबर पंजाब, हरियाणा के बाद तीसरे स्थान पर है। किसान को समर्थन मूल्य पर 150 रूपए प्रति क्विंटल बोनस दिया जा रहा है। ऐसा करने वाला वह एकमात्र राज्य है। सीधे किसानों के खाते में राशि जमा करवाने वाला भी यह इकलौता राज्य है। अभी तक 3500 करोड़ रूपए सीधे खातों में जमा कराये जा चुके हैं।

जादूगरी देखते हुए अक्सर यह भ्रम हो जाता है कि जो कुछ दिखाया जा रहा है, वही सच है । दर्शक आश्चर्य चकित रह जाता है कि क्या ऐसा भी हो सकता है? लेकिन अपनी लफ़्फ़ाज़ी से आम जनता को पिछले पाँच सालों से मूर्ख बनाते चले आ रहे शिवराज भी राजनीति में हाथ की सफ़ाई के हुनरमंद बाज़ीगर साबित हुए हैं। यक़ीन नहीं आता तो मध्यप्रदेश सरकार के उस दावे को देख लीजिए जिसमें कहा गया था कि प्रदेश में पाला और शीतलहर के प्रकोप से फसलों को खासा नुकसान हुआ है और इसलिए केंद्र सरकार को राहत जल्द से जल्द देना चाहिए। इस प्रकार राज्य सरकार ने बर्बाद फसल की जो तस्वीर दिखाई थी, उससे लग रहा था कि आने वाला समय किसानों के लिए बेहद मुश्किल गुज़रने वाला है, लेकिन आज जब हम बम्पर उत्पादन के आंकड़े देख रहे हैं तो तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नज़र आ रही है। इस पर भी यदि राजनीतिज्ञ से बयान देने को कहेंगे तो वह यही कहेगा कि वो उस समय का सच था और यह आज का सच है। कुल मिलाकर हकीकत की रोशनी में अब यह स्पष्ट हो गया है यह दबाव की राजनीति का ही एक हिस्सा था ।

कहावत है "नाई-नाई बाल कितने,जजमान सामने आयेंगे।" इसी तरह मंडियों में गेंहूँ की ज़बरदस्त आवक ने "सरकारी पाले" की पोल-खोल कर दी है। मगर असल और सफ़ल राजनीतिज्ञ वही है, जो हर मुद्दे के अच्छे-बुरे पहलू को अपने पक्ष में कर उसे भुनाने का माद्दा रखता हो । लिहाज़ा सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन यह तो मान रहे हैं कि मध्यप्रदेश में इस बार पाला पड़ने के बावजूद गेंहूँ की बंपर फसल हुई है। लेकिन इस रिकॉर्ड तोड़ उपज के पीछे उनके अपने तर्क हैं। वे बताते हैं कि एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में प्रति हैक्टेयर पैदावार बढ़ गई है। होशंगाबाद और हरदा जिलों ने तो इस बार पंजाब और हरियाणा को मात दे दी है। इन जिलों में गेंहूँ की पैदावार प्रति हैक्टेयर 60 क्विंटल हुई है। उनका ये तर्क भी काबिले गौर है कि कई स्थानों पर पाले और तुषार ने गेंहूँ को जबरदस्त फायदा पहुँचाया है। पाले से अरहर, मसूर, गन्ना को नुकसान हुआ है। सवाल घूम फ़िर कर वही कि जब बम्पर उत्पादन हुआ है तो पाले से हुए नुकसान का मुआवज़ा बेमानी था ।

सरकारी रेवड़ियाँ पाकर "जी हुज़ूरी" में लगे मीडिया घरानों की मदद से पाले के प्रचंड प्रकोप की कहानी बनाई गई और ज़ोर-शोर से फ़ैलाई गई । खबर थी कि शीतलहर और पाले की चपेट में आकर प्रदेश के 17 जिलों की फसलें नष्ट हो गई । प्रदेश में ज़्यादातर नेता, व्यापारी और नौकरशाह खेती की ज़मीन के बड़े-बड़े रकबे के मालिक हैं। इसलिये मुआवज़े के लिये खूब हाय तौबा मची ।
कहते हैं कि झूठ को सौ बार दोहराया जाये तो वो सच लगने लगता है । इसलिये मीडिया के कँधे पर सवार होकर झूठ की राजनीति करने वाले शिवराज ने भारी भरकम मुआवज़ा राशि देने की माँग कर केन्द्र सरकार पर दबाव बनाया । हमेशा की तरह एक बार फ़िर झूठ और दबाव की राजनीति काम कर गई और केन्द्र ने 425 करोड़ रुपये मुहैया करा दिये । हालाँकि 2,442 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की माँग कर रहे शिवराज सिंह चौहान ने इस धनराशि को नाकाफ़ी बताकर केन्द्र को जी भर कर कोसा और फसलों का नुकसान झेलने वाले किसानों के हक में आंदोलन की पेशकश तक कर डाली । प्रदेश सरकार ने दावा किया कि पाले की वजह से 5 जिलों में गेंहूँ, सरसों और चने की फसलों को तगड़ी क्षति पहुँची और 35 लाख हैक्टेयर रकबे की फसल बर्बाद हो गई। प्रदेश सरकार के मुताबिक फसलों का जबरदस्त नुकसान होने की वजह से किसान खुदकुशी पर मजबूर हैं।

पाला और तुषार से सर्वाधिक प्रभावित 17 जिलों में कृषि रकबा कम होने के बावजूद अफसरशाही का कमाल देखिए, सबसे ज्यादा मुआवजा भोपाल में ही बाँट दिया गया। राजधानी में पाला पीड़ित किसानों की सूची में नेता और नौकरशाहों के भी नाम शामिल हैं। हैरत की बात यह है कि जिन लोगों को मुआवजा बाँटा गया , उनमें आईएएस, पूर्व प्रशासनिक अफसर, विधायक सहित कई नेता और पुलिस अफसर भी शामिल हैं। खेती-बाड़ी के शौकीन नेताओं और आला अफसरों का ही प्रभाव है कि भोपाल में 31 करोड़ रुपए से ज़्यादा का मुआवज़ा बाँट कर प्रशासन ने प्रदेश में नया रिकॉर्ड बना डाला।

राजधानी के 15 हाईप्रोफाइल किसानों को जिला प्रशासन ने लाखों रुपए बाँट दिए। एक किसान को अधिकतम 40 हजार रुपए देने के सरकारी प्रावधान को धता बताते हुए इन हाई प्रोफाइल किसानों में कई गुना ज्यादा धनराशि बाँट दी गई। जबकि असली किसान हज़ार-पाँच सौ के चैक लेकर उन्हें भुनाने के लिये अब तक भटक रहे हैं। रसूखदार किसानों में पूर्व मुख्य सचिव राकेश साहनी, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक सुखराज सिंह, पुलिस महानिरीक्षक संजय राणा, प्रमुख सचिव पुखराज मारू, नूतन कॉलेज की प्राचार्य शोभना बाजपेयी मारू, विधायक जितेंद्र डागा, पूर्व आईपीएस शकील रजा, सीपीए के अधीक्षण यंत्री जवाहर सिंह की पत्नी अनुपमा सिंह शामिल है। इन सभी की जमीनें बिशनखेड़ी, प्रेमपुरा, रातीबड़ सहित आसपास के क्षेत्रों में है। विधायक जितेंद्र डागा को दो अलग-अलग रकबे 0.405 और 0.718 हेक्टेयर जमीन पर लगी फसल का 95 हजार 29 रुपए, पूर्व पुलिस महानिदेशक शकील रजा को 121.673 हैक्टेयर जमीन पर लगी फसल का 8 लाख 71 हजार 770 रुपए का चेक बना । मुआवज़ा राशि में फ़र्ज़ीवाड़े के किस्से कमोबेश पूरे सूबे में हैं ।

कागज़ की नाव पर सवार होकर रेत में चप्पू चलाने में माहिर शिवराज सिंह चौहान सूबे के मुखिया के तौर पर मध्यप्रदेश के माथे पर दुर्भाग्य की गहरी लकीरें खींचने के सिवाय कुछ नहीं कर रहे हैं। ये सच है कि शिवराज के झूठ इन दिनों “भारी कीमती” दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इनके दूरगामी नतीजे बेहद नुकसान देने वाले हैं। इसे बदकिस्मती ही कहा जाएगा कि प्रदेश का मुखिया अपने मातहतों को नुकसान बढ़ाचढ़ाकर पेश करने की हिदायत दे। जबकि होना तो यह चाहिए कि हालात को समझकर समस्या का समाधान खोजा जाए। यह न हो कि अपनी ख़ामियों और कमज़ोरियों को छिपाने के लिए बेवजह मुद्दे बनाए जाएं और सभी को भ्रमित किया जाए। अतीत की आवाज़ को समझने वाले जानते हैं कि भाट-चारण विरुदावली तो गा सकते हैं, मगर इतिहास की निर्मम कलम किसी भी किरदार को बख्शती नहीं।

मंगलवार, 3 मई 2011

प्रकृति और मानव की कीमत पर हरित क्रांति

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में कीटनाशक एंडोसल्फान की बिक्री और उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश देने संबंधी एक याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किए हैं । याचिकाकर्ता डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया ने न्यायालय से आग्रह किया कि वह केंद्र सरकार को मौजूदा रूप में एंडोसल्फान की बिक्री और उत्पादन पर रोक लगाने के निर्देश दे। याचिकाकर्ता की दलील है कि अनेक ऎसे अध्ययन सामने आए हैं जिनसे यह पता चलता है कि एंडोसल्फान मानव विकास को भी प्रभावित कर सकता है। इन दलीलों को सुनने के बाद खंडपीठ ने नोटिस जारी करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब तलब किया। कपास, कॉफी, मक्का सहित कई फसलों की खेती में कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल होने वाला एंडोसल्फान जीव-जंतुओं और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एंडोसल्फ़ान को स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है ।

इस बीच भारत सहित कई विकासशील देशों को जहरीले कीटनाशक एंडोसल्फान के उत्पादन और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के लिए 11 साल का समय मिल गया है। साथ ही उन्हें कई अन्य रियायतें हासिल करने में कामयाबी मिली है। हाल ही में जिनेवा में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत और अन्य देशों ने जिन छूटों की माँग की थी, उन पर सहमति बन गई है। इधर कृषि मंत्री शरद पवार पहले ही कह चुके हैं कि एंडोसल्फ़ान पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक नहीं है । सवाल है कि एंडोसल्फ़ान कीटनाशक पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा सकता ?

जिस तरह सरकारों की चकाचौंध वाली विकास नीति के दायरे में यह बात कोई खास मायने नहीं रखती कि देश का राजस्व कौन किस तरह हड़प रहा है। उसी तरह उनकी कृषि नीति में भी आमतौर पर इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि खेतों में कीटनाशकों और रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल खेती की जमीन की उर्वरता किस तरह बर्बाद करता है और इंसान की सेहत के लिए भी कितना घातक होता है। यही वजह है कि एंडोसल्फान नामक अत्यंत घातक कीटनाशक के खिलाफ उठ रही चौतरफा आवाजों का हमारी सरकारों पर कोई असर नहीं हो रहा है। भोपाल ने वर्ष 1984 में दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदी झेली, जिसमें हजारों लोग काल के गाल में समा गए थे और लाखों लोग जीवनभर के लिए बीमार हो गए। इस मानव निर्मित त्रासदी के दुष्प्रभावों से भी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया । कीड़ों से बचाव के लिए खेतों में कीटनाशकों का उपयोग कोई नई बात नहीं है लेकिन एंडोसल्फान को दूसरे कीटनाशकों के बराबर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इसके इस्तेमाल के दौरान और बाद में भी लोगों ने त्वचा और आँखों में जलन तथा शरीर के अंगों के निष्क्रिय होने तक की शिकायतें की हैं।

इस कीटनाशक के इस्तेमाल से होने वाली घातक बीमारियाँ सैकड़ों लोगों को मौत के मुँह में धकेल चुकी हैं और कई पक्षियों और कीट-पंतगों की प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं। इस कीटनाशक के घातक प्रभाव की सबसे ज्यादा शिकायतें केरल से आई हैं और केरल सरकार को पीड़ितों को मुआवजा तक देना पड़ा है। इसके बावजूद कृषि मंत्रालय ने निष्ठुरतापूर्वक कह दिया है कि इस कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है। सवाल उठता है कि आखिर क्यों संभव नहीं है? हाल ही में केरल के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मिलकर इस पर पाबंदी लगाने की माँग की थी ।

इसी माँग को लेकर केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने एक दिन का उपवास भी रखा था लेकिन प्रधानमंत्री का रवैया टालमटोल वाला ही रहा। सरकार की दलील है कि इस कीटनाशक पर प्रतिबंध से पैदावार में कमी आएगी। सवाल उठता है कि ऐसी बम्पर पैदावार किस काम की, जो लोगों को बीमार बनाती हो और मौत के मुँह में धकेलती हो। यह मुद्दा मानवीय सरोकारों से जुड़ा है। केन्द्र सरकार और कांग्रेस वामदलों पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यह अकारण नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर को भी कहना पड़ रहा है कि इस मामले में प्रधानमंत्री उदासीनता बरत कर संविधान प्रदत्त जनता के जीवन के अधिकार का हनन कर रहे हैं।

इस कीटनाशक को 1950 में पेश किया गया था। इसका सब्जियों, फ़लों, धान, कपास, काजू, चाय, कॉफ़ी और तंबाकू जैसी 70 फ़सलों में इस्तेमाल होता है। केरल में इस कीटनाशक पर 2003 से प्रतिबंध है। कर्नाटक सरकार ने भी दो माह पहले इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी है,जबकि आंध्र प्रदेश भी सभी कीटनाशकों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने की प्रक्रिया में हैं। मुमकिन है कि अगले कुछ साल में वहां भी इस रसायन के इस्तेमाल पर पाबंदी लग ही जाएगी। कीटनाशक दवा एंडोसल्फान के खिलाफ केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन द्वारा शुरू की गई मुहिम में मध्य प्रदेश भी खुल कर साथा गया है। प्रदेश के कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया भी समूची प्रकृति और इंसानों के लिये घातक साबित हो रहे इस कीटनाशक पर पाबंदी लगाने की पैरवी कर चुके हैं। कुसमरिया ने अच्युतानंदन को पत्र लिखकर उनके अभियान को देश व मानवीय हित में बताते हुए अपना समर्थन जताया है। उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र में अत्याधिक जहरीले रसायनों का इस्तेमाल समूची मानव जाति और आसपास के परिवेश पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है । इसी हफ़्ते हरदा ज़िले के वन क्षेत्र में खेतों में घुसकर फ़सल खाने से दुर्लभ प्रजाति के चार काले हिरनों की मौत हो गई । कीटों से फ़सलों की हिफ़ाज़त के लिये छिड़के गये कीटनाशक ने िन बेज़ुबानों की जान ले ली ।

केरल के कृषि मंत्री मुल्लाकरा रत्नाकरन ने केंद्र सरकार से भी एंडोसल्फान के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की गुहार लगाई है, जिससे केरल में इसकी तस्करी नहीं हो सके। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एंडोसल्फान पर प्रतिबंध की मांग कर रहे राज्यों को भरोसा दिलाया कि अगर अध्ययन में इसके हानिकारक होने के सबूत मिलते हैं तो इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इस पर रत्नाकरन का तर्क है कि क्या जहर को जहर साबित करने के लिए सबूतों की जरूरत होती है? अध्ययन से सिर्फ यह पता चल सकता है कि फलां रसायन से क्या नुकसान हो सकता है। रत्नाकरन कहते हैं कि केरल में इस रसायन के असर के आधार पर इन देशों ने अपने यहां एंडोसल्फान की बिक्री पर रोक लगा दी है लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि भारत में हम इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए अभी तक सबूतों का इंतजार कर रहे हैं। यह फलां रसायन हानिकारक है यह साबित करने के लिए क्या आधे देश का मरना जरूरी है ? कृषि मंत्री शरद पवार ने इस नुकसान के लिए केरल के किसानों को ही जिम्मेदार ठहराया है। पवार के अनुसार सरकारी दिशानिर्देशों के उलट केरल के किसानों ने एंडोसल्फान का हवाई छिड़काव करना जारी रखा।

पिछले दो दशक के दौरान कई देशों ने एंडोसल्फ़ान के स्वास्थ्य पर पडने वाले नुकसान को स्वीकार किया है । एंडोसल्फान दवा के इस्तेमाल पर दुनिया के अनेक देशों में प्रतिबंध है। ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और इंडोनेशिया उन 80 देशों की सूची में शामिल हैं, जिन्होंने एंडोसल्फान के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई हुई है। 12 अन्य देशों में इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं है। यहा तक कि बाग्लादेश, इंडोनेशिया, कोलम्बिया, श्रीलंका सहित अन्य देशों ने भी इसे सर्वाधिक प्रतिबंधित दवाओं की सूची में शामिल किया है। इसके बावजूद एंडोसल्फान भारत के अधिकतर राज्यों में धड़ल्ले से बिक रही है। इसके बेजा उपयोग से इंसानों और पर्यावरण पर बहुत बुरा असर हो रहा है। कीटनाशक पर पाबंदी की माँग करने वालों का आरोप है कि सरकार लोगों के बजाय कंपनियों को बचाने की कोशिश कर रही है। एंडोसल्फान का निर्माण बेयर और हिंदुस्तान इंसेक्टिसाइड्स लिमिटेड जैसी नामी कंपनियां करती हैं। देश में एंडोसल्फ़ान का सालाना उत्पादन 9,000 टन है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के स्टॉकहोम सम्मेलन के तहत 12 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाया गया है। ये सभी कीटनाशक सतत जैविक प्रदूषक का काम करते हैं। अब इन प्रतिबंधित 12 कीटनाशकों की सूची में एंडोसल्फान को भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

केरल में एंडोसल्फान के इस्तेमाल से कासरगोड़ में कई सौ लोगों के दिमाग में खराबी आने के सबूत मिले हैं और इसी आधार पर राज्य ने इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है। एंडोसल्फ़ान के खिलाफ़ संघर्ष करने वाले कासरगोड जिले में लोगों के स्वास्थ्य पर पड़े इसके खतरनाक प्रभावों का उदाहरण देते हैं। कासरगोड जिले के गाँवों में बच्चों पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया है कि एंडोसल्फ़ान के संपर्क में आने से लडकों की यौन परिपक्वता में देरी आ रही है। जिन गाँवों में एंडोसल्फान का छिड़काव किया जाता है, इसके इस्तेमाल से वहां रहने वाले लोगों के मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। बच्चों का शारीरिक विकास रुक गया है और दिमागी विकास दर भी बेहद कम हो गई है। इनका दावा है कि पहाड़ी क्षेत्रों में काजू की खेती में एंडोसल्फ़ान एकमात्र रसायन है जिसका इस्तेमाल 20 वर्षों से होता रहा और इसकी वजह से गांव का पर्यावरण दूषित हो गया है । यह रंगहीन ठोस पदार्थ अपनी विषाक्तता, जैव संग्रहण क्षमता और, अंतस्रावी ग्रंथियों की कार्य प्रणाली में बाधा पहुंचाने में भूमिका के लिए काफ़ी विवादास्पद कृषि रसायन के तौर पर उभरा है। गौरतलब है कि केरल के कासरगोड जिले में श्री पद्रे ने काजू के पेड़ों पर एंडोसल्फ़ान नामक रसायन नहीं छिड़कने सम्बन्धी अभियान को सफ़लतापूर्वक चलाया और किसानों को इसके खतरों तथा उसकी वजह से फ़ैल रहे जल प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरों के सम्बन्ध में समझाया तथा इसका छिड़काव रुकवाने में सफ़लता हासिल की। इसी वजह से एण्डोसल्फ़ान के दुष्प्रभावों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया।

पंजाब में एंडोसल्फान के इस्तेमाल का औसत राष्ट्रीय औसत से भी कई गुना अधिक है। पंजाब में हुए एक शोध के मुताबिक खेती में कीटनाशकों के इस्तेमाल से लोगों के डीएनए को नुकसान पहुँच सकता है। पटियाला विश्वविद्यालय के शोध के मुताबिक खेत में काम कर रहे मजदूरों में कैंसर का कारण भी यही कीटनाशक हो सकते हैं। इस नए अध्ययन में पंजाब के किसानों के डीएनए में परिवर्तन पाया गया जिससे उन्हें कैंसर होने की संभावना ब़ढ़ जाती है। इस शोध का निष्कर्ष चिंता का सबब है। किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। किसानों को विकल्प मुहैया कराना सरकार के लिए चुनौती है। आधी दुनिया के मर जाने का इंतजार करने के बजाय सतर्कता बरतते हुए इस पर प्रतिबंध लगाना ज्यादा बेहतर है। जहर का इस्तेमाल करने के बजाय हज़ारों विकल्प हो सकते हैं। किसानों को ये स्वस्थ विकल्प मुहैया कराना सरकार और वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है और किसान इस बात से सहमत ही होंगे।

पूरे विश्व में अनाज, सब्जियां, फल, फूल और वनस्पतियों की सुरक्षा करने का नारा देकर कई प्रकार के कीटनाशक और रसायनों का उत्पादन किया जा रहा है; किन्तु इन कीटों, फफूंद और रोगों के जीवाणुओं की कम से कम पांच फीसदी तादाद ऐसी होती है जो खतरनाक रसायनों के प्रभावों से जूझ कर इनका सामना करने की प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेती है। ऐसे प्रतिरोधी कीट धीरे-धीरे अपनी इसी क्षमता वाली नई पीढ़ी को जन्म देने लगते हैं जिससे उन पर कीटनाशकों का प्रभाव नहीं पड़ता है और फिर इन्हें खत्म करने के लिये ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा जहरीले रसायनों का निर्माण करना पड़ता है। कीटनाशक रसायन बनाने वाली कम्पनियों के लिये यह एक बाजार है। लेकिन भरपूर पैदावार पाने की चाह देश के अन्नदाताओं के लिये जानलेवा साबित हो रही है ।

इस स्थिति का दूसरा पहलू भी है। जब किसान अपने खेत में उगने वाले टमाटर,आलू,सेब,संतरे,चीकू,गेहूँ,धान और अंगूर जैसे खाद्य पदार्थों पर इन जहरीले रसायनों का छिड़काव करता है तो इसके घातक तत्व फल,सब्जियों एवं उनके बीजों में प्रवेश कर जाते हैं। फिर इन रसायनों की यात्रा भूमि की मिट्टी,नदी के पानी,वातावरण की हवा में भी जारी रहती है। यह भी कहा जा सकता है कि मानव विनाशी खतरनाक रसायन सर्वव्यापी हो जाते हैं। हमारे भोजन से लेकर के हर तत्व में ज़हर के अंश पैर जमा चुके हैं,फ़िर चाहे वो अनाज हो या फ़्ल-सब्ज़ियाँ। वास्तव में पानी और श्वांस के जरिये हम अनजाने में ही जहर का सेवन भी करते हैं। यह जहर पसीने,श्वांस,मल या मूत्र के जरिये हमारे शरीर से बाहर नहीं निकलता है बल्कि कोशिकाओं में जड़ें जमाकर कई गंभीर रोगों और लाइलाज कैंसर को जन्म देता है।

साल दर साल किसानों की आर्थिक दशा बद से बदतर होती जा रही है। साथ ही कृषि भूमि किसानों के लिए अलाभकारी होकर उनकी मुसीबतें बढ़ा रही है। रासायनिक खाद के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी जहरीली हो रही है। अनुदानित हाइब्रिड फसलें मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रही हैं और भूजल स्तर को गटक रही हैं। इसके अलावा इन फसलों में रासायनिक कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल न केवल भोजन को विषाक्त बना रहा है,बल्कि और अधिक कीटों को पनपने का मौका भी दे रहा है। परिणामस्वरूप किसानों की आमदनी घटने से वे संकट में आर्थिक संकट के दलदल में फ़ँस रहे हैं। खाद, कीटनाशक और बीज उद्योग किसानों की जेब से पैसा निकाल रहा है,जिसके कारण किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं। कर्ज के इस भयावह चक्र से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि किसान हरित क्रांति के कृषि मॉडल का त्याग कर दें। हरित क्रांति कृषि व्यवस्था में मूलभूत खामियां हैं। इसमें कभी भी किसान के हाथ में पैसा नहीं टिक सकता।