रविवार, 29 मई 2011

संघ-भाजपा के सितमों से आचार्य धर्मेन्द्र आगबबूला

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और आरएसएस को इन दिनों हिन्दुत्व के अलंबरदार और तेज़तर्रार विहिप नेता आचार्य धर्मेन्द्र का कोपभाजन बनना पड़ रहा है । गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के कब्ज़े से छुड़ाने के लिए सागर में करीब एक हफ़्ते का अनशन नाकाम होने से आचार्य बेहद बिफ़रे हुए हैं । दरअसल आचार्य धर्मेन्द्र पिछले रविवार को सागर में अनशन पर बैठे थे। पर सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और किसी नतीजे के पहले ही उन्हें छह दिन बाद गाय का दूध पीकर अपना आमरण अनशन खत्म करना पड़ा। अपनों के सितम से बेज़ार आचार्य संघ और भाजपा पर मतलबपरस्ती की तोहमत लगा रहे हैं।

बगैर कुछ हासिल किए मजबूरी में अनशन तोड़ने के बाद अब आचार्य धर्मेन्द्र भाजपा सरकार और आरएसएस को कोस रहे हैं। गुस्साये हिन्दूवादी नेता ने सरस्वती शिशु मंदिर पर तीखे प्रहार करते हुए संगठन को शिक्षा माफ़िया तक बता डाला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर विश्वासघात का आरोप लगाने वाले आचार्य धर्मेन्द्र की निगाह में संघ अब 'परिवार' नहीं रहा बल्कि 'तंत्र' बन गया है । संघ में भावना, समर्पण,त्याग व प्रेम की जगह धनलोलुपता का जोर बढ़ रहा है। उन्होंने आमरण अनशन के बेनतीजा समाप्त होने को अपनी पराजय न मानते हुए संघ पर लगा कभी न मिटने वाला कलंक बताया।

कहते हैं लोहा,लोहे को काटता है। लिहाज़ा प्रदेश सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी । इस घटनाक्रम से गौ और गंगा के नाम पर हिन्दुओं को भरमाने वाली भाजपा की इन मुद्दों पर गंभीरता का सहज ही अँदाज़ा लगाया जा सकता है। आचार्य धर्मेंद्र मानते हैं,इससे हिंदुत्व और गाय के लिए नारा लगाने वालों की असलियत सामने आ गई है। उनका अनशन जमीन के लिए नहीं,बल्कि गौ-माता के लिए था। उन्होंने कहा कि स्कूल द्वारा दबाई गई जमीन गौ सेवा संघ की है। भाजपा और आरएसएस की भूमिका से खफ़ा हिन्दू नेता इसे अपने जीवन का सबसे कड़वा अनुभव बता रहे हैं। अनशन की नाकामी से निराश आचार्य इसे संघ और भाजपा की हार करार देने से भी नहीं चूकते।

आचार्य धर्मेन्द्र के मुताबिक वे वर्ष 1980 से सागर के गौ सेवा संघ के संरक्षक हैं और आरएसएस से भी जुडे़ रहे हैं, लेकिन गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर संगठन के कब्जे से मुक्त कराने के मामले में संघ ने उनके साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि संघ का अनुषांगिक संगठन सरस्वती शिशु मंदिर छल, षड़यंत्रों व कुचक्रों का जाल बुनने वाला शिक्षा माफिया है। संघ के अनुषांगिक संगठनों के समूह को संघ परिवार कहा जाता रहा है, लेकिन सागर के जहरीले अनुभव के बाद अब वह संघ परिवार को 'संघ तंत्र' कहने को विवश हैं। संघ पर "यूज एंड थ्रो" की पश्चिमी संस्कृति अपनाने का आरोप जड़ते हुए उन्होंने कहा कि अपनों ने मुझे खो दिया। उन्हें अब मेरी जरूरत नहीं है।

गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। जानकारों का कहना है कि गौ सेवा संघ को 1927 में पचास हजार वर्ग फीट से अधिक जमीन दान में मिली थी। इसे गौ शाला बनाने और गौ संरक्षण के उद्देश्य से दिया गया था। 1972 में गौ सेवा संघ ने सरस्वती शिशु मंदिर को दो कमरे किराए पर दिए थे। इसके बाद वर्ष 1980 में सरस्वती शिशु मंदिर के पदाधिकारियों ने उनसे ही शिशु मंदिर के नए भवन का शिलान्यास करा लिया और लगातार विकास करते रहे। जब आचार्य धर्मेन्द्र को जमीन हथियाने की सूचना मिली तो उन्होंने आरएसएस के लोगों से बात की पर नतीजा नहीं निकला। पंचखंड पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच चल रहे भूमि विवाद को सुलझाने के मकसद से सागर आए थे। जमीन मुक्त कराने के लिये सरस्वती शिशु मंदिर के प्रवेश द्वार पर 21 मई से सत्याग्रह शुरू किया था, जो 24 मई को आमरण अनशन में तब्दील हो गया। सरकार की बेरुखी के कारण आमरण अनशन 27 मई को बेनतीजा खत्म करना पड़ा।

आचार्य धर्मेन्द्र सरीखे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के कटु अनुभव संघ और भाजपा पर सत्ता क सुरुर चढ़ने की पुष्टि करते हैं। वैसे भी जिसे पीने का शऊर और आदत भी नहीं हो,उस पर नशा कुछ जल्दी ही तारी हो जाता है। जनता को संस्कारों की घुट्टी पिलाने वाले संघी सत्ता के मद में इस कदर चूर हो चुके हैं कि अपनी ही नीतियों और सिद्धांतों को रौंदते हुए बढ़े चले जा रहे हैं,गोया कि प्रदेश में सत्ता की चाबी महज़ पाँच सालों के लिये नहीं आने वाली कई पुश्तों को सौंप दी गई है। लोकतंत्र में नये किस्म का सामंतवाद लाने वालों को आगाह ही किया जा सकता है। बहरहाल आचार्य धर्मेन्द्र के आक्रोश को नसीहत समझकर सबक सीखने की गुंजाइश तो रखना ही चाहिए। और फ़िर -

कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय|
जा खावत बौरात है,वा पावत बौराय ।|

शनिवार, 21 मई 2011

महँगाई से निपटने का एकमात्र हथियार-भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होने वाले आंदोलन अधिकतर भारतीयों की इसी सोच को साबित करते हैं कि देश में करप्शन दिनों-दिन बढ़ रहा है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी गैलप के मुताबिक वर्ष 2010 में करीब 47 फ़ीसदी लोगों ने माना कि 5 साल पहले की तुलना में भारत में करप्शन बढ़ा है,जबकि 27 प्रतिशत को घूसखोरी के पैटर्न में कोई तब्दीली नज़र नहीं आती। 78 प्रतिशत लोगों की राय में सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। वहीं 71 प्रतिशत लोगों का मानना है कि व्यापार जगत में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लोग भ्रष्टाचार को लेकर खुद को कितना असहाय महसूस कर रहे हैं और उनमें कैसी छटपटाहट है,इसकी एक मिसाल अप्रैल में दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन के दौरान देखने को मिली थी। हाल ही में जारी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की लड़ाई को मिले व्यापक जन समर्थन और इस तरह के आंदोलनों से भारतीयों की हताशा जाहिर होती है। रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादातर भारतीय इस समस्या की समाज में गहराई तक पैठ बनाने की सच्चाई को स्वीकार चुके हैं।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि बेरोज़गार और युवा तबका उम्मीदों के बोझ तले हालात के आगे घुटने टेकता दिखाई देता है। तकरीबन 65 प्रतिशत बेरोजगारों की राय में सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के ठोस कदम नहीं उठा रही है। सर्वे के अनुसार लोगों को नहीं लगता कि हालात सुधर रहे हैं और वे व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार से लड़ सकते हैं। सर्वे में 6 हज़ार वयस्कों से सीधे इंटरव्यू किया गया।

दूसरी तरफ़ वित्त और निवेश जगत की नामचीन हस्तियाँ कहने लगें कि भारत में शासन संबंधी स्थितियों को लेकर निराशा का माहौल बन गया है,तो ऎसे में देश की व्यवस्था संबंधी खामियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। मशहूर अमेरिकी फर्म जेपी मॉर्गन के एक प्रमुख अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह बेलाग कहा है कि आम तौर पर भारत को लेकर आज छवि नकारात्मक है और निवेशक अब हताश होने लगे हैं। उन्होंने यह बात विदेशी निवेशकों के संदर्भ में कही है,लेकिन भारत में लोगों की राय भी आज इससे बेहतर नहीं है।

सुरसा सा मुँह फ़ैलाती महँगाई की ओर से मुँह फ़ेर चुकी सरकारों को देखकर लगता है, मानो देश के औद्योगिक विकास के लिये देश में जान बूझकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया है। व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सबसे भ्रष्ट अफ़सरों की ज़बरदस्त पूछ है। सरकार की आवाज़ समझे जाने वाले महकमे में तो जैसे कलेक्शन सेंटर खोल दिया गया है। यथासमय दान-दक्षिणा पहुँचाने के एवज़ में लूटखसोट की खुली छूट दे दी गई है। देश के जाने माने शिक्षा संस्थान जहाँ मोटी फ़ीस लेकर पत्रकारिता की डिग्री देते हैं। वहीं इन सरकारी महकमों में ऎरे-गैरे नत्थू खैरे शुरुआती भेंट पूजा के साथ बाकायदा काम पा रहे हैं। आलम यह है कि असली पत्रकार धीरे-धीरे गायब हो चुके हैं। अब स्कूली शिक्षक, कपड़ा व्यापारी, अकाउंटेंट सरीखे लोगों का डंका बज रहा है। एक काँख में काँग्रेस और दूसरे में बीजेपी को दबाये घूमने, बड़े नेताओं को साधने और आला अफ़सरों को खरीदने का हुनर जानने वाले बरसों बरस एक ही जगह जमे रहकर मौज करते हैं और नियम कायदों पर चलने वालों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। वोट बैंक की खातिर समाज के आखिरी छोर पर खड़े लोगों को भी मुफ़्त बिजली,पानी,राशन,ज़मीन और मकान देकर खरीद लिया गया है।

अन्ना के अनशन से एक कारगर लोकपाल की स्थापना की उम्मीद बनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर जिस हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है, उसका क्या हल हो, इस सवाल पर आम लोग से लेकर विशेषज्ञ तक किंकर्तव्य्विमूढ़ हैं। इस असहायता से ही वह हताशा पैदा हो रही है, जिसका असर अब देश की विकास पर पड़ने लगा है। हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों पर न्यायपालिका ने जबरदस्त सख्ती से कई बड़े घोटालों की जाँच में चुस्ती आई है । नतीजतन कई धुरंधर सलाखों के पीछे हैं, मगर इससे आम आदमी का भरोसा लौटता नहीं दिख रहा है।

कहते हैं, जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। लिहाज़ा भ्रष्टाचार की हिस्सेदारी थोड़ी ही सही कमोबेश देश का हर नागरिक कर रहा है। कई मर्तबा लगता है मुफ़्तखोरी ने हमारे जेनेटिक कोड को ही खराब कर दिया है। ऎसे में सुधार की संभावनाएँ ना के बराबर हैं। सुनते हैं विध्वंस में ही सृजन छिपा है। विनाश में ही नई उम्मीद का बीज मौजूद है। कई भविष्यवक्ताओं ने आज २१ मई का दिन मुकर्रर किया था पृथ्वी के खात्मे के लिये, मगर शाम होने आई अब तक तो कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। भ्रष्टाचारियों की राह के रोड़े हम जैसे लोगों को अब अगली किसी तारीख का इंतज़ार करना होगा।

कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअययन है,नींद क्यों रात भर नहीं आती ।

सोमवार, 16 मई 2011

महँगाई के मुद्दे पर राहुल-सोनिया भूमिगत

पेट्रोल के दाम एक बार फ़िर बढ़ा दिये गये। इस मर्तबा कीमतों में अब तक की सर्वाधिक सीधे पाँच रुपये की बढ़ोत्तरी ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है। यह वृद्धि आठ प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो सालों में पेट्रोल के दामों में प्रति लीटर 23 रूपयों की वृद्धि की जा चुकी है। गौरतलब है कि पिछले नौ महीनों में पेट्रोल की कीमत में नौ बार इज़ाफ़ा हो चुका है। इस तरह पेट्रोल की कीमत 47.93 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 63.37 रुपये हो गई है।

लेकिन दिन रात आम आदमी की दुहाई देने वाली केन्द्र सरकार पूरे मामले से पल्ला झाड़ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मुताबिक "पिछले वर्ष जून में हमने पेट्रोल कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का निर्णय लिया था। लिहाजा इन दिनों पेट्रोल कीमतों में वृद्धि या कमी का निर्णय सरकार नहीं लेती। पेट्रोल की ताजा मूल्य वृद्धि में सरकार ने कोई भूमिका नहीं निभाई है, क्योंकि कीमतें नियंत्रण मुक्त हो चुकी हैं। उन्होंने एक तरह से तेल विपणन कम्पनियों के निर्णय का पक्ष लेते हुए कहा कि पिछले 11 महीनों में कच्चे तेल की कीमत 42 डॉलर प्रति बैरल बढ़ गई हैं। वे कहते हैं कि जब पिछले जून में कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने का निर्णय लिया गया था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 68 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन आज यह दर बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।

इधर हमेशा की तरह भाजपा और वामपंथी दल गाल बजाकर अपने लोकतांत्रिक दायित्वों की पूर्ति का दम भरने में लगे हैं । दो-चार दिन सड़कों पर चक्काजाम करने या साइकल,बैलगाड़ी,घोड़ागाड़ी दौड़ाने से सरकार के कान पर जूँ रेंगती तो शायद हालात कुछ और होते। मगर बयान जारी कर चेहरा चमकाने की राजनीति के मौजूदा दौर में बीजेपी ने कहा कि केंद्र सरकार पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए चुनाव परिणामों का इंतज़ार कर रही थी। बीजेपी ने इसे पश्चिम बंगाल, केरल और असम में काँग्रेस की जीत का जनता को ‘‘तोहफा’’ बताया है । अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृध्दि के सरकार के तर्क की काट में भाजपा ने कहा कि सरकार पेट्रोल पर लगाए गए बेतहाशा केन्द्रीय करों को कम करके जनता को राहत दे सकती है। वामपंथी पार्टियों ने मूल्य वृद्धि को संप्रग सरकार का ‘क्रूर हमला’निरुपित करते हुए हर तरफ से महंगाई से त्रस्त लोगों को जबरदस्त झटका बताया है। साथ ही विनियमन नीति वापस लेने की माँग की है।

इस पूरे मसले में एक बात हैरान करने वाली है । जब भी महँगाई से जुड़े मुद्दे पर देश में बैचेनी बढ़ती है। सोनिया गाँधी और उनके सुपुत्र राहुल गाँधी भूमिगत हो जाते हैं । दलित के घर भोजन खाकर,कलावती का मुद्दा संसद में उठाकर,सिर पर मिट्टी ढ़ोकर और भट्टा पारसौल के किसानों के बीच जाकर गिरफ़्तारी देने वाले "काँग्रेस के युवराज" कब तक भारतीय जनमानस की भावनाओं से खेलते रहेंगे। आम जनता की रोज़ी-रोटी से जुड़े मुद्दों पर काँग्रेस के इस "पोस्टर ब्वाय" की चुप्पी आपराधिकता की श्रेणी में आती है। पेट्रोल, डीज़ल या रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी सिर्फ़ इन उत्पादों तक ही सीमित नहीं होती। इनका असर रोज़मर्रा की ज़रुरतों की हर छोटी बड़ी वस्तु पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पड़ता है।

बाज़ारीकरण की नीति पर चलकर आखिर देश जा कहाँ रहा है ? बिजली के बाद अब प्रकृति प्रदत्त संसाधन भी निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। प्याऊ लगाकर प्यासे कँठों को तर करने का पुण्य कमाने वाले देश में आज पानी एक "कमोडिटी" है। मुनाफ़े के इस धँधे में चाँदी काटने के इरादे से केन्द्र और राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारों पर नाच रही हैं। भोपाल के कोलार क्षेत्र में नगर पालिका बनाकर नेताओं की कमाई के लिये चारागाह तो तैयार कर दी गई, मगर यहाँ की पेयजल समस्या के निराकरण की कोई पहल नहीं की गई। यह जानकर कलेजा मुँह को आता है कि औसतन दस- बारह हज़ार रुपये महीना कमाने वाले परिवार को मकान किराया,बिजली,दूध और पेट्रोल जैसे ज़रुरी खर्च के अलावा पानी के इंतज़ाम पर औसतन हर महीने सात सौ से आठ सौ रुपये चुकाना पड़ रहे हैं । यही हाल सड़कों किनारे बनाई गई अँधाधुँध पार्किंग का है। पाँच-पाँच, दस-दस रुपये के ज़रिये लोग हर रोज़ ना जाने कितने रुपये चुकाते हैं। अब तो टोल नाकों के ज़रिये सड़कों पर चलने की भारी कीमत चुकाना पड़ रही है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। कोई नियम कायदा नहीं है।

दरअसल बाज़ारीकरण की व्यवस्था भ्रष्ट समाज में ही पुष्पित और पल्लवित हो सकती है। उपभोक्तावादी संस्कृति में नैतिकता और ईमानदारी का कोई मूल्य ही नहीं है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ईमानदारी अनमोल है,वास्तव में बाज़ारवाद की राह पर आगे बढ़ते समाज में यह "बेमोल" है । सत्ता चलाने वाले भी बखूबी जान चुके हैं कि इस भ्रष्ट तंत्र में कीमतों में इज़ाफ़े से किसी पर भी कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ज़रा सोच कर देखिये दाम बढ़ेगे तो व्यापारी से लेकर मज़दूर और डॉक्टर से लेकर ठेले वाले तक सभी अपने- अपने स्तर पर बढ़ती महँगाई से तालमेल बिठाने का एडजस्टमेंट कर लेते हैं। और कुछ दिनों के हँगामे के बाद गाड़ी फ़िर पटरी पर चलने लगती है।

इस चक्की में सिर्फ़ वही पिसने वाला है जिसे ईमानदारी से जीवन गुज़र बसर करने का भूत सवार है। देश की कुलाँचे मारती जीडीपी में वैसे भी ईमानदार जीवों का भला क्या योगदान है ? इन मरदूदों के भरोसे चले, तो देश की इकॉनॉमी का भट्टा बैठना तय है और औद्योगिक विकास की दर का गर्त में समाना लाज़िमी है। पूरी बात का लब्बेलुआब यह कि जनाब यह सतयुग नहीं कलिकाल है, जहाँ भोगवादियों का बोलबाला है। इस दौर के मार्गकँटकों (ईमानदारो) की विलुप्तप्राय प्रजाति को धरती से हटाने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है। देश की तरक्की और दुनिया का सिरमौर बनने के लिये भ्रष्टाचार ज़िन्दाबाद। और जब भ्रष्टाचार है, तो कीमतों में इज़ाफ़े से कैसा डर ? इस हाथ ले उस हाथ दे की अर्थव्यवस्था में महँगाई कोई समस्या नहीं है । यह तो महज़ एक सियासी दाँव है,जो सत्ता हथियाने के लिये राजनीतिक दल अपनी सहूलियत से समय-समय पर आज़माते हैं।

गुरुवार, 12 मई 2011

पाले का मुआवज़ा पाकर खूब लहलहाईं फ़सलें

मध्यप्रदेश की मंडियों में आजकल गेंहूँ की बम्पर आवक ने सरकार के होश फ़ाख्ता कर रखे हैं। सरकारी खरीद के अनाज को रखने के लिये गोदाम कम पड़ रहे हैं। इस मर्तबा हुई बम्पर पैदावार ने एक बार फ़िर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की नीयत पर सवाल खड़े कर दिये हैं। बीती सर्दियों में सूबे की सरकार पाले और तुषार का रोना रोकर किसानों की चिंता करने में लगी थी, वो अब गेंहूँ की बम्पर पैदावार से हैरान है। अभी ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा है,जब प्रदेश में पाले से कहीं सत्तर तो कहीं सौ फ़ीसदी फ़सल चौपट होने की हवा बनाई गई थी। बात-बात में केन्द्र सरकार पर तोहमत जड़ने के आदी शिवराजसिंह किसानों को भरपूर मुआवज़ा देने की माँग को लेकर अपने संवैधानिक दायित्वों को बलाये ताक रखकर आमरण अनशन पर आमादा थे।

मंडियों और खरीदी केन्द्रों पर इतना गेंहूँ पहुँच रहा है कि जानकारों को शंका होने लगी है कि मध्यप्रदेश में पाला पड़ा भी था या नहीं ? और पाला अगर पड़ा था तो क्या उसने फ़सलों के लिये "टॉनिक" का काम किया ? सरकारी आँकड़ों पर यकीन करें तो मध्यप्रदेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर इस साल गेंहूँ खरीद का नया रिकॉर्ड बना है। राज्य में गेंहूँ की सरकारी खरीदी का पिछला रिकॉर्ड ध्वस्त हो चुका है। मंडियों में इस मौसम का कुल गेंहूँ खरीद आँकड़ा 36 लाख 39 हजार मीट्रिक टन जा पहुँचा है। इससे पहले प्रदेश में गेंहूँ की सबसे ज्यादा खरीद पिछले साल ही 35 लाख 37 हजार टन रही थी। खास बात यह है कि खरीदी का सिलसिला 31 मई तक चलना है । लिहाजा आँकड़ा 45 लाख मीट्रिक टन तक पहुँचने का अनुमान है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि बढ़ी खरीद के सुरक्षित भंडारण के लिये प्रदेश में पहली बार अब तक कोई 100 रेल्वे रेक्स का इस्तेमाल किया जा चुका है। समर्थन मूल्य पर गेंहूँ खरीदी की पूरी कार्रवाई को अंजाम दे रही नोडल एजेंसी राज्य नागरिक आपूर्ति निगम अब तक 26 लाख 50 हजार टन और एक अन्य प्रमुख एजेंसी राज्य सहकारी विपणन संघ 9 लाख 89 हजार टन गेंहूँ खरीद चुकी है। गौर तलब है कि समर्थन मूल्य पर गेंहूँ की सरकारी खरीदी में मध्यप्रदेश का नंबर पंजाब, हरियाणा के बाद तीसरे स्थान पर है। किसान को समर्थन मूल्य पर 150 रूपए प्रति क्विंटल बोनस दिया जा रहा है। ऐसा करने वाला वह एकमात्र राज्य है। सीधे किसानों के खाते में राशि जमा करवाने वाला भी यह इकलौता राज्य है। अभी तक 3500 करोड़ रूपए सीधे खातों में जमा कराये जा चुके हैं।

जादूगरी देखते हुए अक्सर यह भ्रम हो जाता है कि जो कुछ दिखाया जा रहा है, वही सच है । दर्शक आश्चर्य चकित रह जाता है कि क्या ऐसा भी हो सकता है? लेकिन अपनी लफ़्फ़ाज़ी से आम जनता को पिछले पाँच सालों से मूर्ख बनाते चले आ रहे शिवराज भी राजनीति में हाथ की सफ़ाई के हुनरमंद बाज़ीगर साबित हुए हैं। यक़ीन नहीं आता तो मध्यप्रदेश सरकार के उस दावे को देख लीजिए जिसमें कहा गया था कि प्रदेश में पाला और शीतलहर के प्रकोप से फसलों को खासा नुकसान हुआ है और इसलिए केंद्र सरकार को राहत जल्द से जल्द देना चाहिए। इस प्रकार राज्य सरकार ने बर्बाद फसल की जो तस्वीर दिखाई थी, उससे लग रहा था कि आने वाला समय किसानों के लिए बेहद मुश्किल गुज़रने वाला है, लेकिन आज जब हम बम्पर उत्पादन के आंकड़े देख रहे हैं तो तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नज़र आ रही है। इस पर भी यदि राजनीतिज्ञ से बयान देने को कहेंगे तो वह यही कहेगा कि वो उस समय का सच था और यह आज का सच है। कुल मिलाकर हकीकत की रोशनी में अब यह स्पष्ट हो गया है यह दबाव की राजनीति का ही एक हिस्सा था ।

कहावत है "नाई-नाई बाल कितने,जजमान सामने आयेंगे।" इसी तरह मंडियों में गेंहूँ की ज़बरदस्त आवक ने "सरकारी पाले" की पोल-खोल कर दी है। मगर असल और सफ़ल राजनीतिज्ञ वही है, जो हर मुद्दे के अच्छे-बुरे पहलू को अपने पक्ष में कर उसे भुनाने का माद्दा रखता हो । लिहाज़ा सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन यह तो मान रहे हैं कि मध्यप्रदेश में इस बार पाला पड़ने के बावजूद गेंहूँ की बंपर फसल हुई है। लेकिन इस रिकॉर्ड तोड़ उपज के पीछे उनके अपने तर्क हैं। वे बताते हैं कि एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में प्रति हैक्टेयर पैदावार बढ़ गई है। होशंगाबाद और हरदा जिलों ने तो इस बार पंजाब और हरियाणा को मात दे दी है। इन जिलों में गेंहूँ की पैदावार प्रति हैक्टेयर 60 क्विंटल हुई है। उनका ये तर्क भी काबिले गौर है कि कई स्थानों पर पाले और तुषार ने गेंहूँ को जबरदस्त फायदा पहुँचाया है। पाले से अरहर, मसूर, गन्ना को नुकसान हुआ है। सवाल घूम फ़िर कर वही कि जब बम्पर उत्पादन हुआ है तो पाले से हुए नुकसान का मुआवज़ा बेमानी था ।

सरकारी रेवड़ियाँ पाकर "जी हुज़ूरी" में लगे मीडिया घरानों की मदद से पाले के प्रचंड प्रकोप की कहानी बनाई गई और ज़ोर-शोर से फ़ैलाई गई । खबर थी कि शीतलहर और पाले की चपेट में आकर प्रदेश के 17 जिलों की फसलें नष्ट हो गई । प्रदेश में ज़्यादातर नेता, व्यापारी और नौकरशाह खेती की ज़मीन के बड़े-बड़े रकबे के मालिक हैं। इसलिये मुआवज़े के लिये खूब हाय तौबा मची ।
कहते हैं कि झूठ को सौ बार दोहराया जाये तो वो सच लगने लगता है । इसलिये मीडिया के कँधे पर सवार होकर झूठ की राजनीति करने वाले शिवराज ने भारी भरकम मुआवज़ा राशि देने की माँग कर केन्द्र सरकार पर दबाव बनाया । हमेशा की तरह एक बार फ़िर झूठ और दबाव की राजनीति काम कर गई और केन्द्र ने 425 करोड़ रुपये मुहैया करा दिये । हालाँकि 2,442 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की माँग कर रहे शिवराज सिंह चौहान ने इस धनराशि को नाकाफ़ी बताकर केन्द्र को जी भर कर कोसा और फसलों का नुकसान झेलने वाले किसानों के हक में आंदोलन की पेशकश तक कर डाली । प्रदेश सरकार ने दावा किया कि पाले की वजह से 5 जिलों में गेंहूँ, सरसों और चने की फसलों को तगड़ी क्षति पहुँची और 35 लाख हैक्टेयर रकबे की फसल बर्बाद हो गई। प्रदेश सरकार के मुताबिक फसलों का जबरदस्त नुकसान होने की वजह से किसान खुदकुशी पर मजबूर हैं।

पाला और तुषार से सर्वाधिक प्रभावित 17 जिलों में कृषि रकबा कम होने के बावजूद अफसरशाही का कमाल देखिए, सबसे ज्यादा मुआवजा भोपाल में ही बाँट दिया गया। राजधानी में पाला पीड़ित किसानों की सूची में नेता और नौकरशाहों के भी नाम शामिल हैं। हैरत की बात यह है कि जिन लोगों को मुआवजा बाँटा गया , उनमें आईएएस, पूर्व प्रशासनिक अफसर, विधायक सहित कई नेता और पुलिस अफसर भी शामिल हैं। खेती-बाड़ी के शौकीन नेताओं और आला अफसरों का ही प्रभाव है कि भोपाल में 31 करोड़ रुपए से ज़्यादा का मुआवज़ा बाँट कर प्रशासन ने प्रदेश में नया रिकॉर्ड बना डाला।

राजधानी के 15 हाईप्रोफाइल किसानों को जिला प्रशासन ने लाखों रुपए बाँट दिए। एक किसान को अधिकतम 40 हजार रुपए देने के सरकारी प्रावधान को धता बताते हुए इन हाई प्रोफाइल किसानों में कई गुना ज्यादा धनराशि बाँट दी गई। जबकि असली किसान हज़ार-पाँच सौ के चैक लेकर उन्हें भुनाने के लिये अब तक भटक रहे हैं। रसूखदार किसानों में पूर्व मुख्य सचिव राकेश साहनी, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक सुखराज सिंह, पुलिस महानिरीक्षक संजय राणा, प्रमुख सचिव पुखराज मारू, नूतन कॉलेज की प्राचार्य शोभना बाजपेयी मारू, विधायक जितेंद्र डागा, पूर्व आईपीएस शकील रजा, सीपीए के अधीक्षण यंत्री जवाहर सिंह की पत्नी अनुपमा सिंह शामिल है। इन सभी की जमीनें बिशनखेड़ी, प्रेमपुरा, रातीबड़ सहित आसपास के क्षेत्रों में है। विधायक जितेंद्र डागा को दो अलग-अलग रकबे 0.405 और 0.718 हेक्टेयर जमीन पर लगी फसल का 95 हजार 29 रुपए, पूर्व पुलिस महानिदेशक शकील रजा को 121.673 हैक्टेयर जमीन पर लगी फसल का 8 लाख 71 हजार 770 रुपए का चेक बना । मुआवज़ा राशि में फ़र्ज़ीवाड़े के किस्से कमोबेश पूरे सूबे में हैं ।

कागज़ की नाव पर सवार होकर रेत में चप्पू चलाने में माहिर शिवराज सिंह चौहान सूबे के मुखिया के तौर पर मध्यप्रदेश के माथे पर दुर्भाग्य की गहरी लकीरें खींचने के सिवाय कुछ नहीं कर रहे हैं। ये सच है कि शिवराज के झूठ इन दिनों “भारी कीमती” दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इनके दूरगामी नतीजे बेहद नुकसान देने वाले हैं। इसे बदकिस्मती ही कहा जाएगा कि प्रदेश का मुखिया अपने मातहतों को नुकसान बढ़ाचढ़ाकर पेश करने की हिदायत दे। जबकि होना तो यह चाहिए कि हालात को समझकर समस्या का समाधान खोजा जाए। यह न हो कि अपनी ख़ामियों और कमज़ोरियों को छिपाने के लिए बेवजह मुद्दे बनाए जाएं और सभी को भ्रमित किया जाए। अतीत की आवाज़ को समझने वाले जानते हैं कि भाट-चारण विरुदावली तो गा सकते हैं, मगर इतिहास की निर्मम कलम किसी भी किरदार को बख्शती नहीं।

मंगलवार, 3 मई 2011

प्रकृति और मानव की कीमत पर हरित क्रांति

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में कीटनाशक एंडोसल्फान की बिक्री और उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश देने संबंधी एक याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किए हैं । याचिकाकर्ता डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया ने न्यायालय से आग्रह किया कि वह केंद्र सरकार को मौजूदा रूप में एंडोसल्फान की बिक्री और उत्पादन पर रोक लगाने के निर्देश दे। याचिकाकर्ता की दलील है कि अनेक ऎसे अध्ययन सामने आए हैं जिनसे यह पता चलता है कि एंडोसल्फान मानव विकास को भी प्रभावित कर सकता है। इन दलीलों को सुनने के बाद खंडपीठ ने नोटिस जारी करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब तलब किया। कपास, कॉफी, मक्का सहित कई फसलों की खेती में कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल होने वाला एंडोसल्फान जीव-जंतुओं और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एंडोसल्फ़ान को स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है ।

इस बीच भारत सहित कई विकासशील देशों को जहरीले कीटनाशक एंडोसल्फान के उत्पादन और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के लिए 11 साल का समय मिल गया है। साथ ही उन्हें कई अन्य रियायतें हासिल करने में कामयाबी मिली है। हाल ही में जिनेवा में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत और अन्य देशों ने जिन छूटों की माँग की थी, उन पर सहमति बन गई है। इधर कृषि मंत्री शरद पवार पहले ही कह चुके हैं कि एंडोसल्फ़ान पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक नहीं है । सवाल है कि एंडोसल्फ़ान कीटनाशक पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा सकता ?

जिस तरह सरकारों की चकाचौंध वाली विकास नीति के दायरे में यह बात कोई खास मायने नहीं रखती कि देश का राजस्व कौन किस तरह हड़प रहा है। उसी तरह उनकी कृषि नीति में भी आमतौर पर इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि खेतों में कीटनाशकों और रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल खेती की जमीन की उर्वरता किस तरह बर्बाद करता है और इंसान की सेहत के लिए भी कितना घातक होता है। यही वजह है कि एंडोसल्फान नामक अत्यंत घातक कीटनाशक के खिलाफ उठ रही चौतरफा आवाजों का हमारी सरकारों पर कोई असर नहीं हो रहा है। भोपाल ने वर्ष 1984 में दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदी झेली, जिसमें हजारों लोग काल के गाल में समा गए थे और लाखों लोग जीवनभर के लिए बीमार हो गए। इस मानव निर्मित त्रासदी के दुष्प्रभावों से भी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया । कीड़ों से बचाव के लिए खेतों में कीटनाशकों का उपयोग कोई नई बात नहीं है लेकिन एंडोसल्फान को दूसरे कीटनाशकों के बराबर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इसके इस्तेमाल के दौरान और बाद में भी लोगों ने त्वचा और आँखों में जलन तथा शरीर के अंगों के निष्क्रिय होने तक की शिकायतें की हैं।

इस कीटनाशक के इस्तेमाल से होने वाली घातक बीमारियाँ सैकड़ों लोगों को मौत के मुँह में धकेल चुकी हैं और कई पक्षियों और कीट-पंतगों की प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं। इस कीटनाशक के घातक प्रभाव की सबसे ज्यादा शिकायतें केरल से आई हैं और केरल सरकार को पीड़ितों को मुआवजा तक देना पड़ा है। इसके बावजूद कृषि मंत्रालय ने निष्ठुरतापूर्वक कह दिया है कि इस कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है। सवाल उठता है कि आखिर क्यों संभव नहीं है? हाल ही में केरल के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मिलकर इस पर पाबंदी लगाने की माँग की थी ।

इसी माँग को लेकर केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने एक दिन का उपवास भी रखा था लेकिन प्रधानमंत्री का रवैया टालमटोल वाला ही रहा। सरकार की दलील है कि इस कीटनाशक पर प्रतिबंध से पैदावार में कमी आएगी। सवाल उठता है कि ऐसी बम्पर पैदावार किस काम की, जो लोगों को बीमार बनाती हो और मौत के मुँह में धकेलती हो। यह मुद्दा मानवीय सरोकारों से जुड़ा है। केन्द्र सरकार और कांग्रेस वामदलों पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यह अकारण नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर को भी कहना पड़ रहा है कि इस मामले में प्रधानमंत्री उदासीनता बरत कर संविधान प्रदत्त जनता के जीवन के अधिकार का हनन कर रहे हैं।

इस कीटनाशक को 1950 में पेश किया गया था। इसका सब्जियों, फ़लों, धान, कपास, काजू, चाय, कॉफ़ी और तंबाकू जैसी 70 फ़सलों में इस्तेमाल होता है। केरल में इस कीटनाशक पर 2003 से प्रतिबंध है। कर्नाटक सरकार ने भी दो माह पहले इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी है,जबकि आंध्र प्रदेश भी सभी कीटनाशकों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने की प्रक्रिया में हैं। मुमकिन है कि अगले कुछ साल में वहां भी इस रसायन के इस्तेमाल पर पाबंदी लग ही जाएगी। कीटनाशक दवा एंडोसल्फान के खिलाफ केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन द्वारा शुरू की गई मुहिम में मध्य प्रदेश भी खुल कर साथा गया है। प्रदेश के कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया भी समूची प्रकृति और इंसानों के लिये घातक साबित हो रहे इस कीटनाशक पर पाबंदी लगाने की पैरवी कर चुके हैं। कुसमरिया ने अच्युतानंदन को पत्र लिखकर उनके अभियान को देश व मानवीय हित में बताते हुए अपना समर्थन जताया है। उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र में अत्याधिक जहरीले रसायनों का इस्तेमाल समूची मानव जाति और आसपास के परिवेश पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है । इसी हफ़्ते हरदा ज़िले के वन क्षेत्र में खेतों में घुसकर फ़सल खाने से दुर्लभ प्रजाति के चार काले हिरनों की मौत हो गई । कीटों से फ़सलों की हिफ़ाज़त के लिये छिड़के गये कीटनाशक ने िन बेज़ुबानों की जान ले ली ।

केरल के कृषि मंत्री मुल्लाकरा रत्नाकरन ने केंद्र सरकार से भी एंडोसल्फान के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की गुहार लगाई है, जिससे केरल में इसकी तस्करी नहीं हो सके। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एंडोसल्फान पर प्रतिबंध की मांग कर रहे राज्यों को भरोसा दिलाया कि अगर अध्ययन में इसके हानिकारक होने के सबूत मिलते हैं तो इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इस पर रत्नाकरन का तर्क है कि क्या जहर को जहर साबित करने के लिए सबूतों की जरूरत होती है? अध्ययन से सिर्फ यह पता चल सकता है कि फलां रसायन से क्या नुकसान हो सकता है। रत्नाकरन कहते हैं कि केरल में इस रसायन के असर के आधार पर इन देशों ने अपने यहां एंडोसल्फान की बिक्री पर रोक लगा दी है लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि भारत में हम इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए अभी तक सबूतों का इंतजार कर रहे हैं। यह फलां रसायन हानिकारक है यह साबित करने के लिए क्या आधे देश का मरना जरूरी है ? कृषि मंत्री शरद पवार ने इस नुकसान के लिए केरल के किसानों को ही जिम्मेदार ठहराया है। पवार के अनुसार सरकारी दिशानिर्देशों के उलट केरल के किसानों ने एंडोसल्फान का हवाई छिड़काव करना जारी रखा।

पिछले दो दशक के दौरान कई देशों ने एंडोसल्फ़ान के स्वास्थ्य पर पडने वाले नुकसान को स्वीकार किया है । एंडोसल्फान दवा के इस्तेमाल पर दुनिया के अनेक देशों में प्रतिबंध है। ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और इंडोनेशिया उन 80 देशों की सूची में शामिल हैं, जिन्होंने एंडोसल्फान के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई हुई है। 12 अन्य देशों में इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं है। यहा तक कि बाग्लादेश, इंडोनेशिया, कोलम्बिया, श्रीलंका सहित अन्य देशों ने भी इसे सर्वाधिक प्रतिबंधित दवाओं की सूची में शामिल किया है। इसके बावजूद एंडोसल्फान भारत के अधिकतर राज्यों में धड़ल्ले से बिक रही है। इसके बेजा उपयोग से इंसानों और पर्यावरण पर बहुत बुरा असर हो रहा है। कीटनाशक पर पाबंदी की माँग करने वालों का आरोप है कि सरकार लोगों के बजाय कंपनियों को बचाने की कोशिश कर रही है। एंडोसल्फान का निर्माण बेयर और हिंदुस्तान इंसेक्टिसाइड्स लिमिटेड जैसी नामी कंपनियां करती हैं। देश में एंडोसल्फ़ान का सालाना उत्पादन 9,000 टन है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के स्टॉकहोम सम्मेलन के तहत 12 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाया गया है। ये सभी कीटनाशक सतत जैविक प्रदूषक का काम करते हैं। अब इन प्रतिबंधित 12 कीटनाशकों की सूची में एंडोसल्फान को भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

केरल में एंडोसल्फान के इस्तेमाल से कासरगोड़ में कई सौ लोगों के दिमाग में खराबी आने के सबूत मिले हैं और इसी आधार पर राज्य ने इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है। एंडोसल्फ़ान के खिलाफ़ संघर्ष करने वाले कासरगोड जिले में लोगों के स्वास्थ्य पर पड़े इसके खतरनाक प्रभावों का उदाहरण देते हैं। कासरगोड जिले के गाँवों में बच्चों पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया है कि एंडोसल्फ़ान के संपर्क में आने से लडकों की यौन परिपक्वता में देरी आ रही है। जिन गाँवों में एंडोसल्फान का छिड़काव किया जाता है, इसके इस्तेमाल से वहां रहने वाले लोगों के मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। बच्चों का शारीरिक विकास रुक गया है और दिमागी विकास दर भी बेहद कम हो गई है। इनका दावा है कि पहाड़ी क्षेत्रों में काजू की खेती में एंडोसल्फ़ान एकमात्र रसायन है जिसका इस्तेमाल 20 वर्षों से होता रहा और इसकी वजह से गांव का पर्यावरण दूषित हो गया है । यह रंगहीन ठोस पदार्थ अपनी विषाक्तता, जैव संग्रहण क्षमता और, अंतस्रावी ग्रंथियों की कार्य प्रणाली में बाधा पहुंचाने में भूमिका के लिए काफ़ी विवादास्पद कृषि रसायन के तौर पर उभरा है। गौरतलब है कि केरल के कासरगोड जिले में श्री पद्रे ने काजू के पेड़ों पर एंडोसल्फ़ान नामक रसायन नहीं छिड़कने सम्बन्धी अभियान को सफ़लतापूर्वक चलाया और किसानों को इसके खतरों तथा उसकी वजह से फ़ैल रहे जल प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरों के सम्बन्ध में समझाया तथा इसका छिड़काव रुकवाने में सफ़लता हासिल की। इसी वजह से एण्डोसल्फ़ान के दुष्प्रभावों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया।

पंजाब में एंडोसल्फान के इस्तेमाल का औसत राष्ट्रीय औसत से भी कई गुना अधिक है। पंजाब में हुए एक शोध के मुताबिक खेती में कीटनाशकों के इस्तेमाल से लोगों के डीएनए को नुकसान पहुँच सकता है। पटियाला विश्वविद्यालय के शोध के मुताबिक खेत में काम कर रहे मजदूरों में कैंसर का कारण भी यही कीटनाशक हो सकते हैं। इस नए अध्ययन में पंजाब के किसानों के डीएनए में परिवर्तन पाया गया जिससे उन्हें कैंसर होने की संभावना ब़ढ़ जाती है। इस शोध का निष्कर्ष चिंता का सबब है। किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। किसानों को विकल्प मुहैया कराना सरकार के लिए चुनौती है। आधी दुनिया के मर जाने का इंतजार करने के बजाय सतर्कता बरतते हुए इस पर प्रतिबंध लगाना ज्यादा बेहतर है। जहर का इस्तेमाल करने के बजाय हज़ारों विकल्प हो सकते हैं। किसानों को ये स्वस्थ विकल्प मुहैया कराना सरकार और वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है और किसान इस बात से सहमत ही होंगे।

पूरे विश्व में अनाज, सब्जियां, फल, फूल और वनस्पतियों की सुरक्षा करने का नारा देकर कई प्रकार के कीटनाशक और रसायनों का उत्पादन किया जा रहा है; किन्तु इन कीटों, फफूंद और रोगों के जीवाणुओं की कम से कम पांच फीसदी तादाद ऐसी होती है जो खतरनाक रसायनों के प्रभावों से जूझ कर इनका सामना करने की प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेती है। ऐसे प्रतिरोधी कीट धीरे-धीरे अपनी इसी क्षमता वाली नई पीढ़ी को जन्म देने लगते हैं जिससे उन पर कीटनाशकों का प्रभाव नहीं पड़ता है और फिर इन्हें खत्म करने के लिये ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा जहरीले रसायनों का निर्माण करना पड़ता है। कीटनाशक रसायन बनाने वाली कम्पनियों के लिये यह एक बाजार है। लेकिन भरपूर पैदावार पाने की चाह देश के अन्नदाताओं के लिये जानलेवा साबित हो रही है ।

इस स्थिति का दूसरा पहलू भी है। जब किसान अपने खेत में उगने वाले टमाटर,आलू,सेब,संतरे,चीकू,गेहूँ,धान और अंगूर जैसे खाद्य पदार्थों पर इन जहरीले रसायनों का छिड़काव करता है तो इसके घातक तत्व फल,सब्जियों एवं उनके बीजों में प्रवेश कर जाते हैं। फिर इन रसायनों की यात्रा भूमि की मिट्टी,नदी के पानी,वातावरण की हवा में भी जारी रहती है। यह भी कहा जा सकता है कि मानव विनाशी खतरनाक रसायन सर्वव्यापी हो जाते हैं। हमारे भोजन से लेकर के हर तत्व में ज़हर के अंश पैर जमा चुके हैं,फ़िर चाहे वो अनाज हो या फ़्ल-सब्ज़ियाँ। वास्तव में पानी और श्वांस के जरिये हम अनजाने में ही जहर का सेवन भी करते हैं। यह जहर पसीने,श्वांस,मल या मूत्र के जरिये हमारे शरीर से बाहर नहीं निकलता है बल्कि कोशिकाओं में जड़ें जमाकर कई गंभीर रोगों और लाइलाज कैंसर को जन्म देता है।

साल दर साल किसानों की आर्थिक दशा बद से बदतर होती जा रही है। साथ ही कृषि भूमि किसानों के लिए अलाभकारी होकर उनकी मुसीबतें बढ़ा रही है। रासायनिक खाद के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी जहरीली हो रही है। अनुदानित हाइब्रिड फसलें मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रही हैं और भूजल स्तर को गटक रही हैं। इसके अलावा इन फसलों में रासायनिक कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल न केवल भोजन को विषाक्त बना रहा है,बल्कि और अधिक कीटों को पनपने का मौका भी दे रहा है। परिणामस्वरूप किसानों की आमदनी घटने से वे संकट में आर्थिक संकट के दलदल में फ़ँस रहे हैं। खाद, कीटनाशक और बीज उद्योग किसानों की जेब से पैसा निकाल रहा है,जिसके कारण किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं। कर्ज के इस भयावह चक्र से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि किसान हरित क्रांति के कृषि मॉडल का त्याग कर दें। हरित क्रांति कृषि व्यवस्था में मूलभूत खामियां हैं। इसमें कभी भी किसान के हाथ में पैसा नहीं टिक सकता।

रविवार, 20 मार्च 2011

योग गुरु नहीं पीटी मास्टर है बाबा रामदेव

रामदेव नाम का ढ़ोंगी बाबा देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं से खेल रहा है । अपना हित साधने वाले नेताओं ने उसे आधुनिक युग का विवेकानंद बताकर भारतीय मनीषियों और महापुरुषों का भी अपमान किया है । विवेक शून्य समाज को नये सिरे से यह समझाने की ज़रुरत है कि ढ़ोलक की थाप पर मंच पर उछल कूद योग नहीं होता । रामदेव के योग के दावों की पोल खुद बाबा की दाढ़ी के सफ़ेद बाल खोल रहे हैं । योगी के तौर पर इमेज बिल्डिंग के दौरान यह बाबा हर शिविर में नाखून रगड़ने की पैरवी करता था और इसका दावा था कि इस क्रिया से गंजे के सिर पर बाल आ जाते हैं । इतना ही नहीं साठ साल के बुढ्ढे की सूखे भूसे सी दाढ़ी भी साल-छह महीने में स्याह काली हो जाती है । अगर यह सच है तो बाबा की दाढ़ी बढ़ती उम्र की चुगली क्यों कर रही है ।
दुनिया भर के दिल के मरीज़ों का इलाज अपने योग से करने का दावा ठोकने वाले बाबाजी के सबसे करीबी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई और एक दिन पहले तक साथ घूमने वाला योगाचार्य अपने साथी के दिल के हाल को भाँप भी नहीं सका ? दर असल यह बाबा देश की भोली भाली जनता को बरगला कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है । आखिर एक योगी ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा की क्या ज़रुरत ? योग तो लोगों का भय दूर करता है । जो व्यक्ति इतना डरा हुआ हो वो दुनिया का डर कैसे दूर कर सकता है ? सही मायनों में यह एक ढ़ोंगी बाबा है । आसाराम बापू का ही परिष्कृत रुप है रामदेव बाबा ।
काले धन और भ्रष्टाचार से भारत को आज़ादी दिलाने की बात करता है लेकिन क्या वह इस बात को कहने का नैतिक बल रखता है ? इसने मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री की बाँह मरोड़कर बेशकीमती ज़मीन मुफ़्त में आवंटित कराई है । अपना कारोबार जमाने के लिये सरकारी ज़मीन हड़पना क्या भ्रष्टाचार नहीं है । मप्र सरकार भी जवाब दे कि किस हैसियत से जनता की संपत्ति एक दवा कारोबारी को सौंपी गई है ? लोगों को याद रखना चाहिये कि साधुता एक प्रवृत्ति है और हर गेरुए कपड़े पहनने वाला साधु नहीं होता । रावण ने भी सीता हरण के लिये गेरुआ चोला ही धारण किया था । इस लुटेरे साधु की असलियत उजागर होना बेहद ज़रुरी है । वैसे अभी तक तो यह भी तय नहीं हो सका है की रामदेव साधु है या बाबा है या संत है या फ़िर स्वामी । अभी वो यह भी ठीक से तय नहीं कर पाये हैं कि उन्हें योगी बनना है या भोगी ? कभी कभी तो लगता है कि अचानक हाथ आयी माया ने उन्हें रोगी भी बना दिया है । आने वाला वक्त बतायेगा कि कारुँ के खज़ाने को हासिल करने वाले बाबाजी दिल के रोगी होंगे या मनोरोगी।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

मध्यप्रदेश में शिव"ताँडव"

सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशोखरोश के साथ जश्न मनाने की तैयारियों में जुटी है । शिवराज सिंह प्रदेश की गैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऎसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं । इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है । ऎसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर "गौरव दिवस" मनाने पर आमादा है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । बीजेपी का "गौरव दिवस" मौका भी है सरकार की कार्यशैली की समीक्षा का । साथ ही पीछे मुड़कर यह देखने का कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया ।

शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं,दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये,तो वे राजनीति की "राखी सावंत" से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी फ़िदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है । घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी हकीकत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फ़ोड़ने की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के खिलाफ़ सत्याग्रह, धरने,प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं । दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नज़र आते हैं । वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं । वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं,बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में "अँधों में काना राजा" की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मजबूरी बन गये हैं ।

शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय काफ़ी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है । जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया । जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं भी कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना "मित्र धर्म" बखूबी निभाया ।

शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था कि प्रदेश में सात तरह के माफ़ियाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिलाकरही दम लेंगे । लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश में फ़ैले गुंडाराज की कहानी खुद बयान करती है । आज आलम ये है कि भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के फ़ायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है ।

भय,भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है । बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ "ढूँढ़ते रह जाओगे" के हालात में पहुँच गई हैं । केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तर्ज़ पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है । राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे ज़िम्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है । पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से "तर" सरकार आम जनता की परेशानियों से बेखबर है ।

पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई फ़ायदा मिला हो । "आगे पाठ पीछे सपाट" के फ़ार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगूफ़ेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है ।

कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोड़ने की कवायद के बाद शिवराज ने "स्वर्णिम मध्यप्रदेश" का शोशा छोड़ा । १ नवम्बर १९५६ को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने "आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश" की मुहिम छेड़ रखी है । मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अखबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है । मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश "स्वर्णिम" बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती इसके पहले ही वे इन दिनों वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं ।

बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की "चाचाजी" वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज "मामाजी" के तौर पर मकबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है । नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ रफ़्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से "प्रधानमंत्री कब बनोगे" सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंज़िल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे ।

छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के सफ़र में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान हैं। एक तरफ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है । जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है । प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बेफ़िक्र है । वोट बैंक की खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है । राजधानी भोपाल की ऎतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऎतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को साफ़ करती है । किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है । अवैध खनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है । वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह ज़िले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैध कटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से फ़लफ़ूल रहा है ।

दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऎसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढ़ंग अपनाना शुरु कर दिया । अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार,महिला उत्पीड़न,अपहरण,हत्या,लूट,चोरी,डकैती,फ़िरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्राफ़ लगातार कुलाँचे मार रहा है । प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्राफ़ रफ़्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही सफ़लता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कर्ज़ लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़ोरों पर है ।

तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की हकीकत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सिर्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षो में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।

उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सिर्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण,व्यावसायिक सहयोग,प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।

प्रदेश में गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। गरीबी यहाँ तेजी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जिलों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जिले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हजार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में गरीबी बढ़ने की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऎशो आराम पर दिल खोलकर खर्च रही है ।

भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढ़ने के फ़ेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने नगमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन "लागा चुनरी में दाग" गाकर महफ़िल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ ज़िलों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं । वैसे विजय शाह के साथ गले में ढ़ोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में फ़ँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन "तो दाग अच्छे हैं" की तरह अपने दामन पर लगे "डंपर कांड" के दाग को भी "जस्टिफ़ाई" कर रहे हैं ।

वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है । उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं । बहरहाल इस अनंतकथा को कम शब्दों में बखान करने के लिये फ़िलहाल इतना कहना ही काफ़ी होगा -"हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, बहु बिधि कहहिं सुनहिं सब सन्ता ।"