मंगलवार, 3 मई 2011

प्रकृति और मानव की कीमत पर हरित क्रांति

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में कीटनाशक एंडोसल्फान की बिक्री और उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश देने संबंधी एक याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किए हैं । याचिकाकर्ता डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया ने न्यायालय से आग्रह किया कि वह केंद्र सरकार को मौजूदा रूप में एंडोसल्फान की बिक्री और उत्पादन पर रोक लगाने के निर्देश दे। याचिकाकर्ता की दलील है कि अनेक ऎसे अध्ययन सामने आए हैं जिनसे यह पता चलता है कि एंडोसल्फान मानव विकास को भी प्रभावित कर सकता है। इन दलीलों को सुनने के बाद खंडपीठ ने नोटिस जारी करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब तलब किया। कपास, कॉफी, मक्का सहित कई फसलों की खेती में कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल होने वाला एंडोसल्फान जीव-जंतुओं और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एंडोसल्फ़ान को स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है ।

इस बीच भारत सहित कई विकासशील देशों को जहरीले कीटनाशक एंडोसल्फान के उत्पादन और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के लिए 11 साल का समय मिल गया है। साथ ही उन्हें कई अन्य रियायतें हासिल करने में कामयाबी मिली है। हाल ही में जिनेवा में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत और अन्य देशों ने जिन छूटों की माँग की थी, उन पर सहमति बन गई है। इधर कृषि मंत्री शरद पवार पहले ही कह चुके हैं कि एंडोसल्फ़ान पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक नहीं है । सवाल है कि एंडोसल्फ़ान कीटनाशक पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा सकता ?

जिस तरह सरकारों की चकाचौंध वाली विकास नीति के दायरे में यह बात कोई खास मायने नहीं रखती कि देश का राजस्व कौन किस तरह हड़प रहा है। उसी तरह उनकी कृषि नीति में भी आमतौर पर इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि खेतों में कीटनाशकों और रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल खेती की जमीन की उर्वरता किस तरह बर्बाद करता है और इंसान की सेहत के लिए भी कितना घातक होता है। यही वजह है कि एंडोसल्फान नामक अत्यंत घातक कीटनाशक के खिलाफ उठ रही चौतरफा आवाजों का हमारी सरकारों पर कोई असर नहीं हो रहा है। भोपाल ने वर्ष 1984 में दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदी झेली, जिसमें हजारों लोग काल के गाल में समा गए थे और लाखों लोग जीवनभर के लिए बीमार हो गए। इस मानव निर्मित त्रासदी के दुष्प्रभावों से भी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया । कीड़ों से बचाव के लिए खेतों में कीटनाशकों का उपयोग कोई नई बात नहीं है लेकिन एंडोसल्फान को दूसरे कीटनाशकों के बराबर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इसके इस्तेमाल के दौरान और बाद में भी लोगों ने त्वचा और आँखों में जलन तथा शरीर के अंगों के निष्क्रिय होने तक की शिकायतें की हैं।

इस कीटनाशक के इस्तेमाल से होने वाली घातक बीमारियाँ सैकड़ों लोगों को मौत के मुँह में धकेल चुकी हैं और कई पक्षियों और कीट-पंतगों की प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं। इस कीटनाशक के घातक प्रभाव की सबसे ज्यादा शिकायतें केरल से आई हैं और केरल सरकार को पीड़ितों को मुआवजा तक देना पड़ा है। इसके बावजूद कृषि मंत्रालय ने निष्ठुरतापूर्वक कह दिया है कि इस कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है। सवाल उठता है कि आखिर क्यों संभव नहीं है? हाल ही में केरल के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मिलकर इस पर पाबंदी लगाने की माँग की थी ।

इसी माँग को लेकर केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने एक दिन का उपवास भी रखा था लेकिन प्रधानमंत्री का रवैया टालमटोल वाला ही रहा। सरकार की दलील है कि इस कीटनाशक पर प्रतिबंध से पैदावार में कमी आएगी। सवाल उठता है कि ऐसी बम्पर पैदावार किस काम की, जो लोगों को बीमार बनाती हो और मौत के मुँह में धकेलती हो। यह मुद्दा मानवीय सरोकारों से जुड़ा है। केन्द्र सरकार और कांग्रेस वामदलों पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यह अकारण नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर को भी कहना पड़ रहा है कि इस मामले में प्रधानमंत्री उदासीनता बरत कर संविधान प्रदत्त जनता के जीवन के अधिकार का हनन कर रहे हैं।

इस कीटनाशक को 1950 में पेश किया गया था। इसका सब्जियों, फ़लों, धान, कपास, काजू, चाय, कॉफ़ी और तंबाकू जैसी 70 फ़सलों में इस्तेमाल होता है। केरल में इस कीटनाशक पर 2003 से प्रतिबंध है। कर्नाटक सरकार ने भी दो माह पहले इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी है,जबकि आंध्र प्रदेश भी सभी कीटनाशकों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने की प्रक्रिया में हैं। मुमकिन है कि अगले कुछ साल में वहां भी इस रसायन के इस्तेमाल पर पाबंदी लग ही जाएगी। कीटनाशक दवा एंडोसल्फान के खिलाफ केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन द्वारा शुरू की गई मुहिम में मध्य प्रदेश भी खुल कर साथा गया है। प्रदेश के कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया भी समूची प्रकृति और इंसानों के लिये घातक साबित हो रहे इस कीटनाशक पर पाबंदी लगाने की पैरवी कर चुके हैं। कुसमरिया ने अच्युतानंदन को पत्र लिखकर उनके अभियान को देश व मानवीय हित में बताते हुए अपना समर्थन जताया है। उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र में अत्याधिक जहरीले रसायनों का इस्तेमाल समूची मानव जाति और आसपास के परिवेश पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है । इसी हफ़्ते हरदा ज़िले के वन क्षेत्र में खेतों में घुसकर फ़सल खाने से दुर्लभ प्रजाति के चार काले हिरनों की मौत हो गई । कीटों से फ़सलों की हिफ़ाज़त के लिये छिड़के गये कीटनाशक ने िन बेज़ुबानों की जान ले ली ।

केरल के कृषि मंत्री मुल्लाकरा रत्नाकरन ने केंद्र सरकार से भी एंडोसल्फान के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की गुहार लगाई है, जिससे केरल में इसकी तस्करी नहीं हो सके। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एंडोसल्फान पर प्रतिबंध की मांग कर रहे राज्यों को भरोसा दिलाया कि अगर अध्ययन में इसके हानिकारक होने के सबूत मिलते हैं तो इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इस पर रत्नाकरन का तर्क है कि क्या जहर को जहर साबित करने के लिए सबूतों की जरूरत होती है? अध्ययन से सिर्फ यह पता चल सकता है कि फलां रसायन से क्या नुकसान हो सकता है। रत्नाकरन कहते हैं कि केरल में इस रसायन के असर के आधार पर इन देशों ने अपने यहां एंडोसल्फान की बिक्री पर रोक लगा दी है लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि भारत में हम इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए अभी तक सबूतों का इंतजार कर रहे हैं। यह फलां रसायन हानिकारक है यह साबित करने के लिए क्या आधे देश का मरना जरूरी है ? कृषि मंत्री शरद पवार ने इस नुकसान के लिए केरल के किसानों को ही जिम्मेदार ठहराया है। पवार के अनुसार सरकारी दिशानिर्देशों के उलट केरल के किसानों ने एंडोसल्फान का हवाई छिड़काव करना जारी रखा।

पिछले दो दशक के दौरान कई देशों ने एंडोसल्फ़ान के स्वास्थ्य पर पडने वाले नुकसान को स्वीकार किया है । एंडोसल्फान दवा के इस्तेमाल पर दुनिया के अनेक देशों में प्रतिबंध है। ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और इंडोनेशिया उन 80 देशों की सूची में शामिल हैं, जिन्होंने एंडोसल्फान के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई हुई है। 12 अन्य देशों में इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं है। यहा तक कि बाग्लादेश, इंडोनेशिया, कोलम्बिया, श्रीलंका सहित अन्य देशों ने भी इसे सर्वाधिक प्रतिबंधित दवाओं की सूची में शामिल किया है। इसके बावजूद एंडोसल्फान भारत के अधिकतर राज्यों में धड़ल्ले से बिक रही है। इसके बेजा उपयोग से इंसानों और पर्यावरण पर बहुत बुरा असर हो रहा है। कीटनाशक पर पाबंदी की माँग करने वालों का आरोप है कि सरकार लोगों के बजाय कंपनियों को बचाने की कोशिश कर रही है। एंडोसल्फान का निर्माण बेयर और हिंदुस्तान इंसेक्टिसाइड्स लिमिटेड जैसी नामी कंपनियां करती हैं। देश में एंडोसल्फ़ान का सालाना उत्पादन 9,000 टन है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के स्टॉकहोम सम्मेलन के तहत 12 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाया गया है। ये सभी कीटनाशक सतत जैविक प्रदूषक का काम करते हैं। अब इन प्रतिबंधित 12 कीटनाशकों की सूची में एंडोसल्फान को भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

केरल में एंडोसल्फान के इस्तेमाल से कासरगोड़ में कई सौ लोगों के दिमाग में खराबी आने के सबूत मिले हैं और इसी आधार पर राज्य ने इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है। एंडोसल्फ़ान के खिलाफ़ संघर्ष करने वाले कासरगोड जिले में लोगों के स्वास्थ्य पर पड़े इसके खतरनाक प्रभावों का उदाहरण देते हैं। कासरगोड जिले के गाँवों में बच्चों पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया है कि एंडोसल्फ़ान के संपर्क में आने से लडकों की यौन परिपक्वता में देरी आ रही है। जिन गाँवों में एंडोसल्फान का छिड़काव किया जाता है, इसके इस्तेमाल से वहां रहने वाले लोगों के मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। बच्चों का शारीरिक विकास रुक गया है और दिमागी विकास दर भी बेहद कम हो गई है। इनका दावा है कि पहाड़ी क्षेत्रों में काजू की खेती में एंडोसल्फ़ान एकमात्र रसायन है जिसका इस्तेमाल 20 वर्षों से होता रहा और इसकी वजह से गांव का पर्यावरण दूषित हो गया है । यह रंगहीन ठोस पदार्थ अपनी विषाक्तता, जैव संग्रहण क्षमता और, अंतस्रावी ग्रंथियों की कार्य प्रणाली में बाधा पहुंचाने में भूमिका के लिए काफ़ी विवादास्पद कृषि रसायन के तौर पर उभरा है। गौरतलब है कि केरल के कासरगोड जिले में श्री पद्रे ने काजू के पेड़ों पर एंडोसल्फ़ान नामक रसायन नहीं छिड़कने सम्बन्धी अभियान को सफ़लतापूर्वक चलाया और किसानों को इसके खतरों तथा उसकी वजह से फ़ैल रहे जल प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरों के सम्बन्ध में समझाया तथा इसका छिड़काव रुकवाने में सफ़लता हासिल की। इसी वजह से एण्डोसल्फ़ान के दुष्प्रभावों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया।

पंजाब में एंडोसल्फान के इस्तेमाल का औसत राष्ट्रीय औसत से भी कई गुना अधिक है। पंजाब में हुए एक शोध के मुताबिक खेती में कीटनाशकों के इस्तेमाल से लोगों के डीएनए को नुकसान पहुँच सकता है। पटियाला विश्वविद्यालय के शोध के मुताबिक खेत में काम कर रहे मजदूरों में कैंसर का कारण भी यही कीटनाशक हो सकते हैं। इस नए अध्ययन में पंजाब के किसानों के डीएनए में परिवर्तन पाया गया जिससे उन्हें कैंसर होने की संभावना ब़ढ़ जाती है। इस शोध का निष्कर्ष चिंता का सबब है। किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। किसानों को विकल्प मुहैया कराना सरकार के लिए चुनौती है। आधी दुनिया के मर जाने का इंतजार करने के बजाय सतर्कता बरतते हुए इस पर प्रतिबंध लगाना ज्यादा बेहतर है। जहर का इस्तेमाल करने के बजाय हज़ारों विकल्प हो सकते हैं। किसानों को ये स्वस्थ विकल्प मुहैया कराना सरकार और वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है और किसान इस बात से सहमत ही होंगे।

पूरे विश्व में अनाज, सब्जियां, फल, फूल और वनस्पतियों की सुरक्षा करने का नारा देकर कई प्रकार के कीटनाशक और रसायनों का उत्पादन किया जा रहा है; किन्तु इन कीटों, फफूंद और रोगों के जीवाणुओं की कम से कम पांच फीसदी तादाद ऐसी होती है जो खतरनाक रसायनों के प्रभावों से जूझ कर इनका सामना करने की प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेती है। ऐसे प्रतिरोधी कीट धीरे-धीरे अपनी इसी क्षमता वाली नई पीढ़ी को जन्म देने लगते हैं जिससे उन पर कीटनाशकों का प्रभाव नहीं पड़ता है और फिर इन्हें खत्म करने के लिये ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा जहरीले रसायनों का निर्माण करना पड़ता है। कीटनाशक रसायन बनाने वाली कम्पनियों के लिये यह एक बाजार है। लेकिन भरपूर पैदावार पाने की चाह देश के अन्नदाताओं के लिये जानलेवा साबित हो रही है ।

इस स्थिति का दूसरा पहलू भी है। जब किसान अपने खेत में उगने वाले टमाटर,आलू,सेब,संतरे,चीकू,गेहूँ,धान और अंगूर जैसे खाद्य पदार्थों पर इन जहरीले रसायनों का छिड़काव करता है तो इसके घातक तत्व फल,सब्जियों एवं उनके बीजों में प्रवेश कर जाते हैं। फिर इन रसायनों की यात्रा भूमि की मिट्टी,नदी के पानी,वातावरण की हवा में भी जारी रहती है। यह भी कहा जा सकता है कि मानव विनाशी खतरनाक रसायन सर्वव्यापी हो जाते हैं। हमारे भोजन से लेकर के हर तत्व में ज़हर के अंश पैर जमा चुके हैं,फ़िर चाहे वो अनाज हो या फ़्ल-सब्ज़ियाँ। वास्तव में पानी और श्वांस के जरिये हम अनजाने में ही जहर का सेवन भी करते हैं। यह जहर पसीने,श्वांस,मल या मूत्र के जरिये हमारे शरीर से बाहर नहीं निकलता है बल्कि कोशिकाओं में जड़ें जमाकर कई गंभीर रोगों और लाइलाज कैंसर को जन्म देता है।

साल दर साल किसानों की आर्थिक दशा बद से बदतर होती जा रही है। साथ ही कृषि भूमि किसानों के लिए अलाभकारी होकर उनकी मुसीबतें बढ़ा रही है। रासायनिक खाद के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी जहरीली हो रही है। अनुदानित हाइब्रिड फसलें मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रही हैं और भूजल स्तर को गटक रही हैं। इसके अलावा इन फसलों में रासायनिक कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल न केवल भोजन को विषाक्त बना रहा है,बल्कि और अधिक कीटों को पनपने का मौका भी दे रहा है। परिणामस्वरूप किसानों की आमदनी घटने से वे संकट में आर्थिक संकट के दलदल में फ़ँस रहे हैं। खाद, कीटनाशक और बीज उद्योग किसानों की जेब से पैसा निकाल रहा है,जिसके कारण किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं। कर्ज के इस भयावह चक्र से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि किसान हरित क्रांति के कृषि मॉडल का त्याग कर दें। हरित क्रांति कृषि व्यवस्था में मूलभूत खामियां हैं। इसमें कभी भी किसान के हाथ में पैसा नहीं टिक सकता।

रविवार, 20 मार्च 2011

योग गुरु नहीं पीटी मास्टर है बाबा रामदेव

रामदेव नाम का ढ़ोंगी बाबा देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं से खेल रहा है । अपना हित साधने वाले नेताओं ने उसे आधुनिक युग का विवेकानंद बताकर भारतीय मनीषियों और महापुरुषों का भी अपमान किया है । विवेक शून्य समाज को नये सिरे से यह समझाने की ज़रुरत है कि ढ़ोलक की थाप पर मंच पर उछल कूद योग नहीं होता । रामदेव के योग के दावों की पोल खुद बाबा की दाढ़ी के सफ़ेद बाल खोल रहे हैं । योगी के तौर पर इमेज बिल्डिंग के दौरान यह बाबा हर शिविर में नाखून रगड़ने की पैरवी करता था और इसका दावा था कि इस क्रिया से गंजे के सिर पर बाल आ जाते हैं । इतना ही नहीं साठ साल के बुढ्ढे की सूखे भूसे सी दाढ़ी भी साल-छह महीने में स्याह काली हो जाती है । अगर यह सच है तो बाबा की दाढ़ी बढ़ती उम्र की चुगली क्यों कर रही है ।
दुनिया भर के दिल के मरीज़ों का इलाज अपने योग से करने का दावा ठोकने वाले बाबाजी के सबसे करीबी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई और एक दिन पहले तक साथ घूमने वाला योगाचार्य अपने साथी के दिल के हाल को भाँप भी नहीं सका ? दर असल यह बाबा देश की भोली भाली जनता को बरगला कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है । आखिर एक योगी ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा की क्या ज़रुरत ? योग तो लोगों का भय दूर करता है । जो व्यक्ति इतना डरा हुआ हो वो दुनिया का डर कैसे दूर कर सकता है ? सही मायनों में यह एक ढ़ोंगी बाबा है । आसाराम बापू का ही परिष्कृत रुप है रामदेव बाबा ।
काले धन और भ्रष्टाचार से भारत को आज़ादी दिलाने की बात करता है लेकिन क्या वह इस बात को कहने का नैतिक बल रखता है ? इसने मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री की बाँह मरोड़कर बेशकीमती ज़मीन मुफ़्त में आवंटित कराई है । अपना कारोबार जमाने के लिये सरकारी ज़मीन हड़पना क्या भ्रष्टाचार नहीं है । मप्र सरकार भी जवाब दे कि किस हैसियत से जनता की संपत्ति एक दवा कारोबारी को सौंपी गई है ? लोगों को याद रखना चाहिये कि साधुता एक प्रवृत्ति है और हर गेरुए कपड़े पहनने वाला साधु नहीं होता । रावण ने भी सीता हरण के लिये गेरुआ चोला ही धारण किया था । इस लुटेरे साधु की असलियत उजागर होना बेहद ज़रुरी है । वैसे अभी तक तो यह भी तय नहीं हो सका है की रामदेव साधु है या बाबा है या संत है या फ़िर स्वामी । अभी वो यह भी ठीक से तय नहीं कर पाये हैं कि उन्हें योगी बनना है या भोगी ? कभी कभी तो लगता है कि अचानक हाथ आयी माया ने उन्हें रोगी भी बना दिया है । आने वाला वक्त बतायेगा कि कारुँ के खज़ाने को हासिल करने वाले बाबाजी दिल के रोगी होंगे या मनोरोगी।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

मध्यप्रदेश में शिव"ताँडव"

सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशोखरोश के साथ जश्न मनाने की तैयारियों में जुटी है । शिवराज सिंह प्रदेश की गैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऎसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं । इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है । ऎसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर "गौरव दिवस" मनाने पर आमादा है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । बीजेपी का "गौरव दिवस" मौका भी है सरकार की कार्यशैली की समीक्षा का । साथ ही पीछे मुड़कर यह देखने का कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया ।

शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं,दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये,तो वे राजनीति की "राखी सावंत" से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी फ़िदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है । घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी हकीकत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फ़ोड़ने की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के खिलाफ़ सत्याग्रह, धरने,प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं । दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नज़र आते हैं । वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं । वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं,बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में "अँधों में काना राजा" की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मजबूरी बन गये हैं ।

शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय काफ़ी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है । जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया । जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं भी कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना "मित्र धर्म" बखूबी निभाया ।

शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था कि प्रदेश में सात तरह के माफ़ियाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिलाकरही दम लेंगे । लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश में फ़ैले गुंडाराज की कहानी खुद बयान करती है । आज आलम ये है कि भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के फ़ायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है ।

भय,भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है । बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ "ढूँढ़ते रह जाओगे" के हालात में पहुँच गई हैं । केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तर्ज़ पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है । राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे ज़िम्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है । पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से "तर" सरकार आम जनता की परेशानियों से बेखबर है ।

पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई फ़ायदा मिला हो । "आगे पाठ पीछे सपाट" के फ़ार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगूफ़ेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है ।

कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोड़ने की कवायद के बाद शिवराज ने "स्वर्णिम मध्यप्रदेश" का शोशा छोड़ा । १ नवम्बर १९५६ को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने "आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश" की मुहिम छेड़ रखी है । मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अखबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है । मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश "स्वर्णिम" बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती इसके पहले ही वे इन दिनों वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं ।

बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की "चाचाजी" वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज "मामाजी" के तौर पर मकबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है । नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ रफ़्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से "प्रधानमंत्री कब बनोगे" सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंज़िल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे ।

छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के सफ़र में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान हैं। एक तरफ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है । जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है । प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बेफ़िक्र है । वोट बैंक की खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है । राजधानी भोपाल की ऎतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऎतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को साफ़ करती है । किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है । अवैध खनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है । वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह ज़िले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैध कटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से फ़लफ़ूल रहा है ।

दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऎसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढ़ंग अपनाना शुरु कर दिया । अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार,महिला उत्पीड़न,अपहरण,हत्या,लूट,चोरी,डकैती,फ़िरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्राफ़ लगातार कुलाँचे मार रहा है । प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्राफ़ रफ़्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही सफ़लता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कर्ज़ लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़ोरों पर है ।

तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की हकीकत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सिर्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षो में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।

उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सिर्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण,व्यावसायिक सहयोग,प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।

प्रदेश में गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। गरीबी यहाँ तेजी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जिलों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जिले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हजार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में गरीबी बढ़ने की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऎशो आराम पर दिल खोलकर खर्च रही है ।

भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढ़ने के फ़ेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने नगमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन "लागा चुनरी में दाग" गाकर महफ़िल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ ज़िलों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं । वैसे विजय शाह के साथ गले में ढ़ोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में फ़ँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन "तो दाग अच्छे हैं" की तरह अपने दामन पर लगे "डंपर कांड" के दाग को भी "जस्टिफ़ाई" कर रहे हैं ।

वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है । उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं । बहरहाल इस अनंतकथा को कम शब्दों में बखान करने के लिये फ़िलहाल इतना कहना ही काफ़ी होगा -"हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, बहु बिधि कहहिं सुनहिं सब सन्ता ।"

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

जंगल-ज़मीन के बाद जल प्रबंधन भी ठेके पर

वेतन-भत्तों और सुविधाओं के विस्तार को लेकर लगातार हाय तौबा करने वाले जनप्रतिनिधि अब जनता की बुनियादी ज़रुरतों से पल्ला झाड़कर औद्योगिक घरानों की ताल पर थिरकते दिखाई दे रहे हैं । लोकतांत्रिक व्यवस्था में पानी,बिजली,स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ जुटाने का ज़िम्मा सरकारों को सौंपा गया है । मगर सरकारें अब जनहित के कामों को छोड़कर एक के बाद एक योजनाओं को निजी हाथों में सौंपती चली जा रही है,फ़िर चाहे वो प्राकृतिक संसाधन हों,ज़मीन हो या आम जनता की सेवा से जुड़े मुद्दे हों । इसी कड़ी में अब नेताओं और उद्योगपतियों को पानी मुनाफ़े का सौदा नज़र आने लगा है ।

मध्यप्रदेश में अब कॉर्पोरेट सेक्टर को जलग्रहण मिशन से जोड़ा जा रहा है । विज्ञापनों की सरकारी मलाई खाकर अपनी ही मस्ती में डूबा मीडिया प्रदेश सरकार के इस कदम को अभिनव पहल बताने में जुट गया है । भारतीय संस्कृति में जल संरक्षण सामाजिक और सामुदायिक ज़िम्मेदारी है । स्टील, टेलीकॉम, बिजली, सीमेंट, मोटर गाड़ी जैसे क्षेत्रों में मुकाम बना चुके टाटा, रिलायंस, बिड़ला जैसे औद्योगिक घराने खबर है कि मध्यप्रदेश के गाँवों में जल प्रबंधन की कमान संभालेंगे। सूत्रों के मुताबिक अब तक नौ कंपनियाँ जलग्रहण मिशन में काम करने की सहमति दे चुकी हैं । इनमें टाटा,रिलायंस,महिन्द्रा एंड महिन्द्रा,आईटीसी,ग्रेसिम,रामकी,रामकृष्ण एग्रो प्रोसेसिंग,ओरियंटल पेपर मिल और इंडिया ट्रेसीविलिटी सिस्टम लिमिटेड शामिल हैं ।

इन कंपनियों को परियोजना लागत का न्यूनतम दस फीसदी खर्चा ही उठाना होगा। साथ ही ब्लॉक मुख्यालय में ऑफिस बनाकर विशेषज्ञों की तैनाती भी करनी होगी। प्रोजेक्ट की अवधि पाँच साल रखी गई है । कंपनियों को पाँच हजार हेक्टेयर के क्लस्टर में काम करने दिया जाएगा । इसमें होने वाले काम उपयोगकर्ता दल,स्व-सहायता समूह और वाटरशेड कमेटी तय करेगी। परियोजना में सिंचित क्षेत्र, जलस्तर, आजीविका के साधन बढ़ाने के साथ वनों का विकास भी करना होगा । कॉर्पोरेट घराने परियोजना के पर्यवेक्षण के साथ निगरानी की जिम्मेदारी भी निभाएँगे । साथ ही वाटरशेड समितियों को प्रशिक्षण भी देंगे। जल संरक्षण परियोजनाओं में ग्रामीण विकास विभाग पहली बार स्व-सहायता समूह और वाटरशेड समितियों के साथ आउटकम एग्रीमेंट करेगा ।

बेशक जल संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सरसरी तौर पर योजना में कोई खामी नज़र नहीं आती, लेकिन यह भी समझना होगा कि जल केवल व्यावसायिक नीति नहीं,बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक जिम्मेदारी भी है। भारतीय जीवन दर्शन पानी जैसी जीवन की अनिवार्य वस्तु को समाज की साझा संपत्ति मानता आया है, न कि निजी मुनाफे की वस्तु। पानी की बिक्री और नगर में पेयजल व्यवस्था के प्रबंध के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ पानी जैसी अनिवार्य और नायाब वस्तु पर अपना कब्जा जमा रही हैं। देश के अनेक भागों में पानी की बढ़ती माँग और घटती उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन चुकी है। ऎसे में कॉर्पोरेट जगत की पानी के संरक्षण में बढ़ती दिलचस्पी नये किस्म के संकट की ओर संकेत करती है । हर काम को नफ़े-नुकसान के तराज़ू पर तौलने वाले औद्योगिक घराने एकाएक प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भला इतने गंभीर क्यों नज़र आ रहे हैं ? कहीं ये कोई अंतरराष्ट्रीय साज़िश की दस्तक तो नहीं ? क्या ये प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का नेताओं, सरकारी तंत्र और कंपनियों की साँठगाँठ का नया नुस्खा है ?

घटते जल स्रोतों के बीच लोगों की मानसिकता में भी तब्दीली आ रही है । उपभोक्तावादी संस्कृति की गिरफ़्त में आ चुके लोगों में बोतलबंद पानी के इस्तेमाल का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है । जिसकी जेब में पैसा हो वह पानी पिए–इस दर्शन के पीछे विश्व बैंक की प्रस्तावित जल योजना है। यह शिगूफ़ा ज़ोर पकड़ रहा है कि शुद्ध पानी वह पिए जिसकी जेब में उसका दाम चुकाने की क्षमता हो। पानी के निजीकरण से 40 करोड़ डॉलर के बाजार पर गिद्धों की निगाह है। पानी की मिल्कियत को लेकर देशों में झगड़े शुरु हो गए हैं। कनाडा की प्रांतीय सरकार ने जन आक्रोश के दबाव में ब्रिटिश कोलम्बिया से पानी का निर्यात रोक दिया तो निर्यात करने वाली अमेरिका की सन बेल्ट वाटर कारपोरेशन ने कनाडा सरकार पर हर्जाने का मुकदमा ठोंक दिया। बोलिविया में पानी के बढ़ते दाम के खिलाफ जनता ने रास्ते जाम कर दिए। विशाल जनांदोलन के बाद उन्हें बैक्टेल कंपनी से मुक्ति मिल सकी। दक्षिण अफ्रीका में जल प्रबंधन तथा जल निकास सेवाओं को फ्रांसीसी कंपनी को दिए जाने के विरुद्ध संघर्ष जारी है।

भारत में भी कई शहरों की जलापूर्ति व्यवस्था पर विदेशी कंपनियों ने कब्जा जमाना शुरू कर दिया है। राजधानी भोपाल में भी पिछले दो सालों से पानी की आपूर्ति दिनोंदिन घटती जा रही है और शुल्क में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है । राजधानी वासियों को एक दिन छोड़कर औसतन पाँच सौ लीटर पानी दिया जा रहा है,जबकि नगर निगम ने मासिक शुल्क साठ रुपए से बढ़ाकर एक सौ अस्सी रुपए कर दिया है । दो साल पहले की पेयजल आपूर्ति से तुलना की जाये तो भोपाल के लोग कम पानी की कई गुना ज़्यादा कीमत चुका रहे हैं । विदेशी कंपनी की मदद से अब तो चौबीस घंटे पानी देने की स्कीम लाई जा रही है । इसमें महीने में औसतन पचास हजार लीटर पानी खर्च करने पर लगभग पांच सौ रुपए अदा करने होंगे।

देश में शिक्षा,स्वास्थ्य सेवा के साथ भी यही किया गया । सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बेड़ा गर्क करने के बाद अब पानी भी वर्ग भेद की भेंट चढ़ने जा रहा है । अमीरों और गरीबों के स्कूलों तथा अस्पताल तो पहले ही अलग-अलग हो चुके थे, अब बँटवारा हो रहा है,अमीर-गरीब के पानी में। पानी की उपलब्धता और शुद्धता के सामूहिक दायित्व से जो समाज हाथ खींच रहा है, वह यह जान ले कि पानी के धंधे से बढ़कर भ्रष्टाचार और कहीं नहीं है।

मसला ये है कि जनता की बुनियादी ज़रुरतों को पूरा करने में सरकारों की दिलचस्पी ही खत्म होती जा रही है । ऎसे में बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि जनहित के मुद्दों से दूर होते जनता के नुमाइंदों के भरोसे जम्हूरियत कितने वक्त तक ज़िन्दा रह पायेगी ? जल, जंगल और ज़मीनों को ठेके पर देती जा रही सरकारें लोकतंत्र को ही बेमानी साबित कर रही हैं । औद्योगिक घरानों से नेताओं की जुगलबंदी का आलम यही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब संसद और विधानसभाओं की कुर्सियों को भी निजी हाथों के हवाले करने का कोई नुस्खा नये दौर के गज़नवी ढ़ूँढ़ ही निकालेंगे ।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

सरकारी धन को लूटने में जुटी सरकार

मध्यप्रदेश सरकार के फ़ैसलों को देखकर "अँधी पीसे-कुत्ते खाएँ" कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है । सत्ता के नशे में डूबी भाजपा को विपक्ष की निष्क्रियता ने निरंकुशता के पंख लगाकर भ्रष्टाचार के आसमान में लम्बी और ऊँची उड़ान भरने के लिये स्वतंत्र छोड़ दिया है । कैबिनेट के एक के बाद एक फ़ैसले बताते हैं कि किस तरह सरकारी खज़ाने का दुरुपयोग कर नेता अपने उद्योग धंधे आगे बढ़ा रहे हैं । इस तरह की योजनाएँ बनाई जा रही हैं, जिनमें उद्योग लगाने वालों को सरकारी पैसा मुफ़्त में मिल रहा है, जैसे वे अपना बिज़नेस प्रदेश में लाकर जनता पर बड़ा भारी एहसान कर रहे हैं । बेशकीमती ज़मीनों को औने-पौने में ठिकाने लगाने की मुहिम की अपार सफ़लता से उत्साहित राज्य सरकार अब यही फ़ार्मूला अन्य क्षेत्रों में भी आज़माने जा रही है । यकीन ना आये तो सरकार के हालिया फ़ैसलों को उठाकर देख लीजिये ।

मध्यप्रदेश सरकार ने निजी क्षेत्र के ऑपरेटरों के माध्यम से प्रदेश के प्रमुख शहरों को वायु सेवा से जोड़ने का निर्णय लिया है। चार बड़े शहरों समेत कई नगरों को हवाई सेवा से जोड़ने की योजना में निजी ऑपरेटरों को कई रियायतें देने की तैयारी को अंतिम रुप दे दिया गया है । निजी ऑपरेटर्स 9 सीटर विमान चलाएंगे। इसके लिए वे प्रत्येक सेक्टर में किराया तय करने के लिये स्वतंत्र होंगे। प्रत्येक सेक्टर के लिए विमान में कुछ सीटें राज्य शासन के उपयोग के लिये आरक्षित होंगी। इन सीटों पर प्रत्येक सीट का किराया निर्धारण निविदा के माध्यम से किया जाएगा, जिन पर राज्य शासन द्वारा अधिकृत अधिकारी यात्रा कर सकेंगे। अगर किसी सेक्टर में किसी समय शासकीय अधिकारी आरक्षित सीट पर यात्रा नहीं करेंगे तो ऎसी सीटें आपरेटर द्वारा प्राइवेट मार्केट में बेची जा सकेंगी ।

इस फ़ैसले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जो भी आरक्षित सीट खाली जाएगी उसका भुगतान राज्य सरकार करेगी । भुगतान अधिकतम चार खाली सीटों का होगा । इस पर 84 लाख महीना और सालाना करीब 8 से 9 करोड़ रूपए खर्च होंगे । सरकार तीन साल तक यह प्रोत्साहन राशि देगी । निजी आपरेटर को विमान में लगने वाले ईंधन में वैट से भी छूट मिलेगी । ये वही सरकार है जो महँगाई पर काबू पाने के लिये डीज़ल-पेट्रोल और रसोई गैस पर लगे करों को ज़रा भी कम करने को तैयार नहीं है । गौर करने वाली बात है कि मध्यप्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थ और रसोई गैस अन्य प्रदेशों की तुलना में तीस से पैंतीस फ़ीसदी तक महँगे हैं ।

औद्योगिक घरानों और व्यापारियों पर मेहरबान राज्य सरकार अपने कर्मचारियों का खून चूसने से भी बाज़ नहीं आ रही है । हाल ही में हुए खुलासे ने कर्मचारियों को हक्का बक्का कर दिया है । महंगाई की मार से दोहरे हो चुके कर्मचारियों की मकान किराया भत्ता, वाहन भत्ता जैसी मूलभूत सुविधाओं पर भी सरकार ने रोक लगा रखी है । बेहाल सरकारी मुलाज़िमों के हक के पैसे पर डाका डालकर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है । कर्मचारियों को सरकार की रीढ़ मानने का दावा करने वाली प्रदेश में बीते छह वर्षो में सत्तारूढ़ भाजपा साढे पांच लाख मुलाजिमों का दस हजार करोड़ रूपया डकार चुकी है। सरकारी खजाने में जमा यह राशि केंद्र की अनुशंसाओं को राज्य सरकार द्वारा देरी से लागू करने के अंतर की है । अप्रैल 2004 को केंद्र ने 50 फीसदी डीए मूल वेतन में शामिल कर दिया। राज्य ने इसे 1 अप्रैल 2007 में सम्मलित किया । केंद्रीय कर्मियों को 1 जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 के बीच छठे वेतनमान के एरियर का भुगतान डीए समेत किया । छठे वेतनमान में केंद्र ने 1 जनवरी 2006 से अपने कर्मचारियों को महंगाई भत्ते का भुगतान किया। राज्य ने एरियर तो दिया लेकिन बिना डीए का ।

जनतांत्रिक तरीके से चुनकर आई प्रदेश सरकार के सामंती और तानाशाही तेवरों का आलम यह है कि कर्मचारियों के जायज़ हक को नज़र अंदाज़ करने वाले वित्त मंत्री राघवजी अपने फ़ैसले को सही ठहरा रहे हैं । कर्मचारियों को वेतन-भत्ते देने के लिये सरकार के पास पैसा नहीं है, लेकिन सरकारी योजनाओं के नाम पर उद्योगपतियों को रियायतें देने के लिये सरकारी खज़ाना खाली करने में कोई संकोच नहीं है । वे कहते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि केंद्रीय तिथि से ही राज्य अपने कर्मियों को महंगाई भत्ता या अन्य लाभ दे। राज्य इस मामले में स्वतंत्र है। वित्त विभाग का दो टूक कहना है कि जरूरी नहीं है कि वह केंद्रीय तिथि से भुगतान करे।

तमाम हेराफ़ेरी के बावजूद सरकारी आँकड़े ही प्रदेश के वित्तीय हालात की चुगली करते दिखाई देते हैं । आंकड़े बयां कर रहे हैं कि किस तरह कर्मचारियों का पेट काटकर ही तिजोरी भरी गई है। राज्य सरकार के वित्तीय वर्ष 2009-10 के अंत में शुद्ध बचत रिजर्व बैंक के खजाने में बचत 5560 करोड़ रूपए थी, जबकि केंद्रीय तिथि से कर्मचारियों को भुगतान नहीं करने का सरकारी आंकड़ों में अंतर 10012 करोड़ रूपए है। इस तरह यदि कर्मचारियों को उनकी बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाए, तो खज़ाना भरा होने का सरकारी दावा पल भर में काफ़ूर हो जाए ।

स्वर्णिम प्रदेश बनाने का शिगूफ़ा छोड़ने वाले शिवराज के फ़ैसले अँधेर नगरी के.......राजा की याद ताज़ा कर देते हैं । आये दिन केन्द्र पर भेदभाव का आरोप मढ़कर जनता को बेवकूफ़ बनाने वाले मुख्यमंत्रीजी की शिकायत है कि इस साल उसे केंद्रीय सड़क निधि और अन्य योजनाओं में मिलने वाले 1000 से 1500 करोड़ रूपये नहीं मिले, इसलिए सड़कें बनाने के लिए धन की भारी कमी हो गई है। लेकिन शिवराज सरकार इन तात्कालिक बाधाओं के आगे घुटने टेकने वाली थोड़े ही है, लिहाज़ा इरादे के पक्के मुख्यमंत्री ने आनन-फ़ानन में फैसला ले लिया है कि करीब 2500 किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण के लिए वह ठेकेदारों से ही करीब 2000 करोड़ रूपये का लोन लिया जाएगा । यह राष्ट्रीयकृत बैंकों की मौजूदा ब्याज दर पर ही होगा और उसे 10 वर्षो में सालाना किश्तों में चुकता किया जाएगा ।

यहां गौर करने लायक बात यह है कि "एनयूटी मोड" के तहत बनने वाली ये वे सड़कें होंगी जहां टोल टैक्स की वसूली संभव नहीं है। अब एनयूटी मोड में सड़कें बनेंगी, यानी ठेकेदार सड़क बनाएगा और सरकार किस्तों में उसे ब्याज सहित लागत रकम लौटाएगी। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि इस तरह बनने वाली सड़कों में असल फायदा किसे होगा- सरकार को, ठेकेदार को या जनता को? क्योंकि बीओटी के तहत बनी सड़कों पर टोलटैक्स वसूली की हकीकत से सभी कभी न कभी दो-चार हुए हैं ।

सबसे गंभीर और हैरानी की बात यह है कि सारे सरकारी निर्माण कार्य घाटे में ही क्यों जाते हैं, जबकि सरकारी ठेके लेने वाले लोग हर स्तर पर मुट्ठी गर्म करने के बावजूद दिन दोगुनी रफ़्तार से श्री और समृद्धि हासिल करते हैं । जो आमतौर पर ठेकेदार किसी ना किसी रुप में नेताओं से जुड़े रहते हैं, फ़िर चाहे वो उनके सगे-संबंधी हों या उनके इष्टमित्र । अब तो वे सरकार की कृपा से साहूकार भी बनने जा रहे हैं। सरकारी धन की लूट की बढ़ती प्रवृत्ति कह रही है कि तो वह दिन दूर नहीं जब कर्ज के बोझ तले दबी सरकार ही किसी ठेकेदार के हाथ होगी ।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

चल रहा है प्रदेश बेचो अभियान.....!

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सनसनीखेज़ और उत्तेजक बयानों ने प्रदेश की राजनीति में तूफ़ान ला दिया है । जहाँ शिवपुरी में भूमाफ़ियाओं पर उन्हें हटाने के लिये धन इकट्ठा करने का बयान दे कर सबको हक्का बक्का कर दिया। वहीं सदन के भीतर भूमाफ़ियाओं को चुनौती देने की शिवराज की दंभ भरी हुँकार से लोग सन्न हैं । विरोधियों को चुनौती देने के लिये उन्होंने संसदीय मर्यादाओं को बलाये ताक रखकर जिस भाषा शैली का इस्तेमाल किया, उसका उदाहरण प्रदेश के इतिहास में शायद ही मिले ।
मुख्यमंत्री भूमाफ़ियाओं पर उन्हें हटाने के लिये धन इकट्ठा करने का आरोप लगा रहे हैं, मगर भाजपा सरकार की कामकाज की शैली पर नज़र डालें, तो राज्य सरकार खुद ही भूमाफ़िया की सरमायेदार नज़र आती है। शिवराज के सत्तारुढ़ होने के बाद से मंत्रिपरिषद के अब तक लिये गये फ़ैसले सरकार की शैली साफ़ करने के लिये काफ़ी हैं । हर चौथी-पाँचवीं बैठक में निजी क्षेत्र को सरकारी ज़मीन देने के फ़ैसले आम है । सदन में भूमाफ़ियाओं पर दहाड़ने वाले मुखिया का मंत्रिमंडल जिस तरह के फ़ैसले ले रहा है, उससे उद्योगपतियों, नेताओं और भूमाफ़िया ही चाँदी कूट रहे हैं । एक तरफ़ सरकारी ज़मीनों को कौड़ियों के भाव औद्योगिक घरानों के हवाले किया जा रहा है , वहीं दूसरी तरफ़ बड़े बिल्डरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है । सरकार के फ़ैसले से नाराज़ छोटे बिल्डरों को खुश करने के लिये भी नियमों को बलाए ताक रख दिया गया है । गोया कि सरकार नेताओं को चंदा देने वाली किसी भी संस्था की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती ।

सरकारी कायदों की आड़ में ज़मीनों के अधिग्रहण का खेल पुराना है , लेकिन अब मध्यप्रदेश में हालात बेकाबू हो चले हैं । मिंटो हॉल को बेचने के कैबिनेट के फ़ैसले ने सरकार की नीयत पर सवाल खडे कर दिये हैं । मध्यप्रदेश सरकार सूबे की संपत्ति को अपनी मिल्कियत समझकर मनमाने फ़ैसले ले रही है । मालदारों और रसूखदारों को उपकृत करने की श्रृंखला में अब बारी है भोपाल की शान मिंटो हॉल की , जिसे निजी हाथों में सौंपा जा रहा है । स्थापत्य कला के नायाब नमूने के तौर पर सीना ताने खड़ी नवाबी दौर की इस इमारत का ऎतिहासिक महत्व तो है ही, यह धरोहर एकीकृत मध्यप्रदेश की विधान सभा के तौर पर कई अहम फ़ैसलों की गवाह भी है । सरकारी जमीन लीज पर देने का अपने तरह का यह पहला मामला होगा। राज्य सरकार की प्री-क्वालीफिकेशन बिड में चार कंपनियाँ रामकी (हैदराबाद), सोम इंडस्ट्री (हैदराबाद) जेपी ग्रुप (दिल्ली) और रहेजा ग्रुप (बाम्बे) चुनी गई हैं । इनमें से रामकी ग्रुप बीजेपी के एक बड़े नेता के करीबी रिश्तेदार का है । यूनियन कार्बाइड का कचरा जलाने का ठेका भी इसी कंपनी को दिया गया है । जेपी ग्रुप पर बीजेपी की मेहरबानियाँ जगज़ाहिर हैं ।

भोपाल को रातोंरात सिंगापुर,पेरिस बनाने की चाहत में राज्य सरकार कम्पनियों को मनमानी रियायत देने पर आमादा है । इतनी बेशकीमती जमीन कमर्शियल रेट तो दूर,सरकार कलेक्टर रेट से भी कम दामों पर देने की तैयारी कर चुकी है । ऐसा लगता है कि सरकार किसी उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को अपने हिसाब से बना रही है। कलेक्टर रेट पर भी जमीन की कीमत लगभग 117.25 करोड़ है,जबकि 7.1 एकड़ के भूखंड की कीमत महज़ 85 करोड़ रुपए रखी गई है। शहर के बीचोबीच राजभवन के पास की इस जमीन की सरकारी कीमत सत्रह करोड़ रूपए प्रति एकड़ है। यहाँ जमीन का कामर्शियल रेट कलेक्टर रेट से तीन गुना से भी अधिक है। कीमत कम रखने के पीछे तर्क है कि उपयोग की जमीन मात्र साढ़े पांच एकड़ है। इतना ही नहीं 1.2 एकड़ में बने खूबसूरत पार्क को एक रूपए प्रतिवर्ष की लीज पर दिया जाएगा, जिसका उपयोग संबंधित कंपनी पार्टियों के साथ ही बतौर कैफेटेरिया भी कर पायेगी ।

सरकार की मेहरबानियों का सिलसिला यहीं नहीं थमता । उद्योगपतियों को लाभ देने के लिए 85 करोड़ की राशि चौदह साल में आसान किश्तों पर लेने का प्रस्ताव है। पहले चार साल प्रतिवर्ष ढ़ाई करोड़ रूपए सरकार को मिलेंगे, जबकि पांचवे साल से सरकार को 14.90 करोड़ रूपए मिलेंगे। इस दौरान कंपनी सरकार को राशि पर महज़ 8.5 फ़ीसदी की दर से ब्याज अदा करेगी। इतनी रियायतें और चौदह साल में 85 करोड़ रूपए की अदायगी का सरकारी फ़ार्मूला किसी के गले नहीं उतर रहा है। सरकार मिंटो हॉल को साठ साल की लीज पर देगी, जिसे तीस साल तक और बढ़ाया जा सकता है। गौरतलब है कि गरीबों और मध्यमवर्गियों को मकान बनाकर देने वाला मप्र गृह निर्माण मंडल अपने ग्राहकों से आज भी किराया भाड़ा योजना के तहत 15 फ़ीसदी से भी ज़्यादा ब्याज वसूलता है ।

इसी तरह पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर मप्र पर्यटन विकास निगम ने महज़ 27 हजार 127 रुपए की सालाना लीज पर गोविंदगढ़ का किला दिल्ली की मैसर्स मैगपी रिसोर्ट प्रायवेट लिमिटेड के हवाले कर दिया है। इस तरह करीब 3.617 हेक्टेयर में फ़ैले गोविंदगढ़ किले को हेरिटेज होटल में तब्दील करके सैलानियों की जेब हल्की कराने के लिये कंपनी को हर महीने सिर्फ़ 2 हज़ार 260 रुपए खर्च करना होंगे। उस पर तुर्रा ये कि निगम के अध्यक्ष बड़ी ही मासूमियत के साथ कंपनी का एहसान मान रहे हैं,जिसने कम से कम किला खरीदने की हिम्मत तो की । वरना कई बार विज्ञापन करने के बावजूद कोई भी कंपनी किले को खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी ।

"मुफ़्त का चंदन" घिसने में मुख्यमंत्री किसी से पीछे नहीं हैं । ज़मीनों की रेवड़ियाँ बाँटने में उनका हाथ काफ़ी खुला हुआ है । पिछले छह सालों में केवल भोपाल ज़िले में सेवा भारती सहित कई सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों को करीब 95एकड़ ज़मीन दे चुके हैं । इसमें वो बेशकीमती ज़मीनें शामिल नहीं हैं , जिन पर मंत्रियों और विधायकों से लेकर छुटभैये नेताओं के इशारों पर मंदिर,झुग्गियाँ तथा गुमटियाँ बन चुकी हैं ।

राजधानी के कमर्शियल एरिया महाराणा प्रताप नगर से लगी सरकारी ज़मीन पर बसे पट्टेधारी झुग्गीवासियों को बलपूर्वक खदेड़ दिया गया था । ज़मीन खाली कराने के पीछे प्रशासन का तर्क था कि सरकार को इसकी ज़रुरत है । विस्थापन के लिये सरकार ने झुग्गीवासियों को वैकल्पिक जगह दी और उनके विस्थापन का खर्च भी उठाया । बाद में मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल के दावे को दरकिनार करते हुए बीजेपी सरकार ने बेशकीमती ज़मीन औने-पौने में दैनिक भास्कर समूह को "भेंट कर" दी । आज वहाँ डीबी मॉल सीना तान कर बेरोकटोक जारी सरकारी बंदरबाँट पर इठला रहा है । हाल ही में इस मॉल के प्रवेश द्वार में तब्दीली के लिये कैबिनेट के फ़ैसले ने एक बार फ़िर व्यावसायिक परीक्षा मंडल को अपना आकार सिकोड़ने पर मजबूर कर दिया । तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए कई पेड़ों की बलि देकर बेशकीमती ज़मीन डीबी मॉल को सौंप दी गई । करीब पाँच साल पहले भोपाल विकास प्राधिकरण ने भी एक बिल्डर पर भी इसी तरह की कृपा दिखाई थी । सरकारी खर्च पर अतिक्रमण से मुक्त कराई गई करीब पाँच एकड़ से ज़्यादा ज़मीन के लिये बिल्डर को कई सालों तक आसान किस्तों में रकम अदायगी की सुविधा मुहैया कराई थी । इसी तरह राजधानी भोपाल के टीनशेड, साउथ टीटीनगर क्षेत्र के सरकारी मकानों को ज़मीनदोज़ कर ज़मीन कंस्ट्रक्शन कंपनी गैमन इंडिया के हवाले कर दी गई ।

राज्य सरकार सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षिक संस्थाओं के अलावा अब उद्योगपतियों पर भी मेहरबान हो रही है । राजधानी भोपाल,औद्योगिक शहर इंदौर,जबलपुर,ग्वालियर सहित कई अन्य शहरों में तमाम नियमों को दरकिनार कर सरकारी ज़मीन कौड़ियों के दाम नेताओं के रिश्तेदारों और उनके चहेते औद्योगिक घरानों को सौंपी जा रही हैं । 23 अप्रैल 2010 के पत्रिका के भोपाल संस्करण में सातवें पेज पर प्रकाशित ज़ाहिर सूचना में ग्राम सिंगारचोली यानी मनुआभान की टेकरी के आसपास की 1.28 एकड़ शासकीय ज़मीन एस्सार ग्रुप को कार्यालय खोलने के लिये आवंटित करने की बात कही गई है । नजूल अधिकारी के हवाले से प्रकाशित इस विज्ञापन में बेहद बारीक अक्षरों में पंद्रह दिनों के भीतर आपत्ति लगाने की खानापूर्ति भी की गई है ।

सरकार के कई मंत्री और विधायक शहरों की प्राइम लोकेशन वाली ज़मीनों पर रातों रात झुग्गी बस्तियाँ उगाने, शनि और साँईं मंदिर बनाने के काम में मसरुफ़ हैं । नेताओं की छत्रछाया में बेजा कब्ज़ा कर ज़मीनें बेचने वाले भूमाफ़िया पूरे प्रदेश में फ़लफ़ूल रहे हैं । भाजपा के करीबियों ने कोटरा क्षेत्र में सरकारी ज़मीन पर प्लॉट काट दिये । गोमती कॉलोनी के करीब चार सौ परिवार नजूल का नोटिस मिलने के बाद अपने बसेरे टूटने की आशंका से हैरान-परेशान घूम रहे हैं । असली अपराधी नेताओं के संरक्षण में सरकारी ज़मीनों को "लूटकर" बेच रहे हैं । आलम ये है कि सरकार की नाक के नीचे भोपाल में करोड़ों की सरकारी ज़मीनें निजी हाथों में जा चुकी है । कई मामलों में नेताओं और अफ़सरों की मिलीभगत के चलते सरकार को मुँह की खाना पड़ी है ।

राज्य सरकार ने काफी मशक्कत के बाद भोपाल के मास्टर प्लान को रद्द करने का निर्णय लेने का मन बना लिया है। नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय ने राज्य शासन को नगर तथा ग्राम निवेश की धारा 18 (3) के तहत प्लान को निरस्त करने का प्रस्ताव भेज दिया है।शहरों में जमीन की आसमान छू रही कीमतों और बढ़ते शहरीकरण के मद्देनजर आवास एवं पर्यावरण विभाग ने टाउनशिप विकास नियम-2010 का प्रारूप प्रकाशित कर दिया है। ऊपरी तौर पर सब कुछ सामान्य घटनाक्रम दिखता है, लेकिन पूरे मामले की तह में जाने पर सारी धाँधली साफ़ हो जाती है । टाउनशिप विकास नियम-2010 के प्रकाशन से पहले भोपाल के मास्टर प्लान को रद्द करने की मुख्यमंत्री की घोषणा की टाइमिंग भूमाफ़ियाओं से सरकार की साँठगाँठ की पोल खोल कर रख देती है ।

सरसरी तौर पर टाउनशिप विकास नियम-2010 में कोई खोट नज़र नहीं आती, लेकिन प्रारूप में एक ऎसी छूट शामिल कर दी गई है, जिससे शहरों के मास्टर प्लान ही बेमानी हो जाएँगे । मास्टर प्लान में कई नियमों से बँधे कॉलोनाइजरों और डेवलपरों के लिये स्पेशल टाउनशिप नियम राहत का पैगाम है। राज्य सरकार ने टाउनशिप नियमों का जो मसौदा तैयार किया है, उसमें स्पेशल टाउनशिप को मंजूरी देने के लिए मास्टर प्लान के नियम बाधा नहीं बनेंगे। जहां भी मास्टर प्लान का क्षेत्र होगा, यदि वहां उक्त प्रस्ताव के नियमों और मास्टर प्लान के नियमों में विरोधाभास हुआ तो टाउनशिप के नियम लागू होंगे। इस तरह राज्य सरकार ने स्पेशल टाउनशिप के ज़रिये मास्टर प्लान से भी छेड़छाड़ की छूट दे दी है।

टाउनशिप के निर्माण के लिए असीमित कृषि भूमि खरीदने और इस जमीन को कृषि जोत उच्चतम सीमा अधिनियम के प्रावधानों से भी मुक्त करने जैसी बड़ी रियायतें भी देने का प्रस्ताव है। साथ ही टाउनशिप के बीच में आने वाली सरकारी जमीन प्रचलित दरों या अनुसूची(क) की दरों अथवा कलेक्टर की ओर से तय दरों पर पट्टे पर देने का प्रस्ताव भी आगे चलकर किसके लिये मददगार बनेगा,बताने की ज़रुरत शायद नहीं है । खतरनाक बात यह है कि कृषि भूमि पर भी टाउनशिप खड़ी हो सकेगी। खेती को लाभ का धँधा बनाने के सब्ज़बाग दिखाने वाले सूबे के मुखिया ने खेती की ज़मीनों पर काँक्रीट के जंगल उगाने की खुली छूट दे दी है । किसान तात्कालिक फ़ायदे के लिये अपनी ज़मीनें भूमाफ़ियाओं को बेच रहे हैं । सरकार की नीतियों के कारण सिकुड़ती कृषि भूमि ने धरतीपुत्रों को मालिक से मज़दूर बना दिया है । इससे पहले राज्य सरकार हानि में चल रहे कृषि प्रक्षेत्रों, जिनमें नर्सरियाँ और बाबई कृषि फ़ार्म भी निजी हाथों में देने का फ़ैसला ले चुकी है ।

प्रारूप के नियमों में हर जगह लिखा गया है कि विकासकर्ता को अपने स्रोतों से ही टाउनशिप में सुविधाएँ उपलब्ध कराना होंगी जिनमें सड़क बिजली एवं पानी मुख्य है । वहीं यह भी जोड़ दिया कि वो चाहे तो इस कार्य में नगरीय निकाय की सहायता ले सकते हैं। नियम में इस शर्त को जोड़कर विकासकर्ता को खुली छूट दी गई है कि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर टाउनशिप का पूरा विकास सरकारी एजेंसी के खर्चे से करवा ले। आवास एवं पर्यावरण विभाग की वेबसाइट पर मसौदे को गौर से पढ़ा जाए तो इसमें शुरू से लेकर आखिर तक सिर्फ बिल्डरों को उपकृत करने की मंशा साफ़ नज़र आती है। विभाग ने अपने ही नियमों को धता बताते हुए इस नए नियम से बड़े कॉलोनाइजरों और डेवलपरों की खुलकर मदद की है।

स्पेशल टाउनशिप को पर्यावरण और खेती का रकबा घटने के लिये ज़िम्मेदार मानने वालों का तर्क है कि शहर के बाहर स्पेशल टाउनशिप बनाने के बजाए पहले सरकार को पुनर्घनत्वीकरण योजना के तहत शहर के पुराने, जर्जर भवनों के स्थान पर बहुमंजिला भवन बनाना चाहिए। अंग्रेजों द्वारा 1894 में बनाये गये कानून की आड़ में सरकारी ज़मीनों की खरीद फ़रोख्त का दौर वैसे ही उफ़ान पर है । ऎसे में खेती की ज़मीनों पर टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव आत्मघाती कदम साबित होगा । इस प्रस्ताव से कृषि भूमि के परिवर्तन के मामलों में अंधाधुंध बढ़ोतरी की आशंका भी पर्यावरण प्रेमियों को सताने लगी है ।

कृषि भूमि का अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने पर उतारु सरकार सरकारी संपत्ति की लूट खसोट के लिये जनता द्वारा सौंपी गई ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रही हैं । अरबों-खरबों के टर्नओवर वाली कंपनियों पर भी शिवराज सरकार की कृपादृष्टि कम नहीं है । इस बात को समझने के लिये इतना जानना ही काफ़ी होगा कि बीते एक साल के दौरान प्रदेश में बड़ी कंपनियों को सरकार 8000 हैक्टेयर से अधिक ज़मीन बाँट चुकी है । बेशकीमती ज़मीनें बड़ी कम्पनियों को रियायती दरों पर देने का यह खेल प्रदेश में उद्योग-धँधों को बढ़ावा देने के नाम पर खेला जा रहा है । पिछले एक साल में रिलायंस, बिड़ला समूह समेत 22 बड़ी कंपनियों को करीब 6400 हैक्टेयर निजी भूमि भू अर्जन के माध्यम से दी गई । वहीं 14 ऎसी कंपनियाँ हैं जिन्हें निजी के साथ ही करीब 1640 हैक्टेयर सरकारी ज़मीन भी उपलब्ध कराई गई है । इनमें भाजपा का चहेता जेपी ग्रुप भी शामिल है । अरबों के टर्नओवर वाली कंपनियों को रियायत की सौगात देने के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे लोगों को स्थानीय स्तर पर रोज़गार मिल सकेगा लेकिन अब तक सरकारी दावे खोखले ही हैं ।

सरकारी संपत्ति पर जनता का पहला हक है। आम लोगों को अँधेरे में रखकर सरकार पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली की तरह काम कर रही है । नवम्बर 2005 के बाद प्रदेश की भाजपा सरकार के फ़ैसले भूमाफ़ियाओं के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली के से जान पड़ते हैं । पिछले छः दशकों में आदिवासी तथा अन्य क्षेत्रों की खनिज संपदा का तो बड़े पैमाने पर दोहन किया गया है मगर इसका फायदा सिर्फ पूँजीपतियों को मिला है। जो आबादियाँ खनन आदि के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापित हुईं, अपनी जमीन से उजड़ीं, उन्हें कुछ नहीं मिला। यहाँ तक कि आजीविका कमाने के संसाधन भी नहीं मिले, सिर पर एक छत भी नहीं मिली और पारंपरिक जीवनपद्धति छूटी, रोजगार छूटा, सो अलग। सरकार को उसकी हैसियत बताने के लिये जनता को अपनी ताकत पहचानना होगा और जागना होगा नीम बेहोशी से ।.......क्योंकि ज़मीनों की इस बंदरबाँट को थामने का कोई रास्ता अब भी बचा है ?

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

भरोसा कर लिया जिन पर ............

मध्यप्रदेश सरकार सूबे की संपत्ति को अपनी मिल्कियत समझकर मनमाने फ़ैसले ले रही है । एक तरफ़ सरकारी ज़मीनों को कौड़ियों के भाव औद्योगिक घरानों के हवाले किया जा रहा है । वहीं दूसरी तरफ़ बड़े बिल्डरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है । सरकार के फ़ैसले से नाराज़ छोटे बिल्डरों को खुश करने के लिये भी सरकार ने नियमों में ढ़ील दे दी है । गोया कि राज्य सरकार नेताओं को चंदा देने वाली किसी भी संस्था की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती । सरकारी कायदों की आड़ में ज़मीनों के अधिग्रहण का खेल पुराना है , लेकिन अब मध्यप्रदेश में हालात बेकाबू हो चले हैं । राजधानी भोपाल के सरकारी मकानों को ज़मीनदोज़ कर कंस्ट्रक्शन कंपनी गैमन इंडिया के हवाले कर दी गई ।
मालदारों और रसूखदारों को उपकृत करने की श्रृंखला में अब बारी है भोपाल की शान कहे जाने वाले मिंटो हॉल की , जिसे निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है । स्थापत्य कला के नायाब नमूने के तौर पर सीना ताने खड़ी इस इमारत का ऎतिहासिक महत्व तो है ही, यह धरोहर एकीकृत मध्यप्रदेश की विधान सभा के तौर पर कई अहम फ़ैसलों की गवाह भी रही है । मिंटो हॉल से लगी 7.1 एकड़ जमीन पर कंवेंशन सेंटर बनाने के लिए सरकारी रेट से कम दर पर जमीन देने की तैयारी राज्य सरकार ने कर ली है। यही नहीं मिंटो हाल से सटे एक एकड़ से अधिक क्षेत्र में फ़ैले पार्क को एक रूपए प्रतिवर्ष के लीज पर दिया जाएगा। शायद सरकारी जमीन लीज पर देने का अपने तरह का यह पहला मामला होगा। लघु उद्योग निगम ने कैबिनेट में प्रस्ताव लाने के लिए प्रेसी बनाकर राज्य सरकार को भेज दी है। राज्य सरकार द्वारा जारी की गई प्री-क्वालीफिकेशन बिड में चार कंपनियाँ रामकी (हैदराबाद), सोम इंडस्ट्री (हैदराबाद) जेपी ग्रुप (दिल्ली) और रहेजा ग्रुप (बाम्बे) का चुनी गई हैं । इनमें से रामकी ग्रुप बीजेपी के एक बड़े नेता के करीबी रिश्तेदार का है । यूनियन कार्बाईड का कचरा जलाने का ठेका भी इसी कंपनी को दिया गया है । जेपी ग्रुप पर बीजेपी की मेहरबानियाँ जगज़ाहिर हैं ।

रातोंरात भोपाल को सिंगापुर,पेरिस बनाने का चाहत में राज्य सरकार कम्पनियों को मनमानी रियायत देने पर आमादा है । तभी तो कमर्शियल रेट तो दूर की बात है इतनी बेशकीमती जमीन को सरकार को कलेक्टर रेट से भी कम दामों पर देने की तैयारी कर चुकी है । शहर के बीचोबीच राजभवन के पास की इस जमीन की सरकारी कीमत सत्रह करोड़ रूपए प्रति एकड़ है। लेकिन सरकार ने 7.1 एकड़ के भूखंड की कीमत 85 करोड़ रुपए रखी है। इस हिसाब से जमीन की कीमत बारह करोड़ रूपए प्रति एकड़ होगी, जबकि यहाँ जमीन का कामर्शियल रेट कलेक्टर रेट से तीन गुना से भी अधिक है। कलेक्टर रेट पर भी जमीन की कीमत लगभग 117.25 करोड़ होना चाहिए। लेकिन जमीन की कीमत सरकारी कीमत से 32 करोड़ रूपए कम रखी गई है। इसके पीछे कैबिनेट की प्रेसी में तर्क दिए गए है कि उपयोग की जमीन मात्र साढ़े पांच एकड़ है। सरकार मिंटो हॉल को साठ साल के लीज पर देगी, जिसे तीस साल तक और बढ़ाया जा सकता है।

सरकार की मेहरबानियों का सिलसिला यहीं नहीं थमता । उद्योगपतियों को लाभ देने के लिए 85 करोड़ की राशि चौदह साल में आसान किश्तों पर लेने का प्रस्ताव है। पहले चार साल प्रतिवर्ष ढ़ाई करोड़ रूपए सरकार को मिलेंगे, जबकि पांचवे साल से सरकार को 14.90 करोड़ रूपए मिलेंगे। इस दौरान कंपनी सरकार को राशि पर महज़ 8.5 की दर से ब्याज अदा करेगी। इतनी रियायतें और चौदह साल में 85 करोड़ रूपए की अदायगी का सरकारी फ़ार्मूला किसी के गले नहीं उतर रहा है। गौरतलब है कि गरीबों और मध्यमवर्गीयों को मकान बनाकर देने वाला मप्र गृह निर्माण मंडल अपने ग्राहकों से आज भी किराया भाड़ा योजना के तहत 15 फ़ीसदी से भी ज़्यादा ब्याज वसूलता है ।
ऐसा लगता है कि सरकार किसी उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को अपने हिसाब से बना रही है। कैबिनेट के लिए तैयार किए गए प्रस्ताव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मिंटोहाल के वर्तमान स्वरूप में कोई बदलाव और फेरबदल नहीं किया जाएगा। लेकिन टेंडर जिस कंपनी को मिलेगा , वह इमारत का इस्तेमाल कर सकेगी । इतना ही नहीं 1.2 एकड़ में बने खूबसूरत पार्क को एक रूपए प्रतिवर्ष की लीज पर दिया जाएगा। जिसका उपयोग संबंधित कंपनी पार्टियों के साथ ही बतौर कैफेटेरिया भी कर पायेगी । प्रेसी में गार्डन पर लगने वाले विकास शुल्क का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है।

इसी तरह राजधानी के कमर्शियल एरिया महाराणा प्रताप नगर से लगी सरकारी ज़मीन पर बसे पट्टेधारी झुग्गीवासियों को बलपूर्वक खदेड़ दिया गया था । ज़मीन खाली कराने के पीछे प्रशासन का तर्क था कि सरकार को इसकी ज़रुरत है । विस्थापन के लिये सरकार ने झुग्गीवासियों को वैकल्पिक जगह दी और उनके विस्थापन का खर्च भी उठाया । बाद में मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल के दावे को दरकिनार करते हुए बीजेपी सरकार ने बेशकीमती ज़मीन औने-पौने में दैनिक भास्कर समूह को "भेंट कर" दी । आज वहाँ डीबी मॉल सीना तान कर बेरोकटोक जारी सरकारी बंदरबाँट पर इठला रहा है । करीब पाँच साल पहले भोपाल विकास प्राधिकरण ने भी एक बिल्डर पर भी इसी तरह की कृपा दिखाई थी । सरकारी खर्च पर अतिक्रमण से मुक्त कराई गई करीब पाँच एकड़ से ज़्यादा ज़मीन के लिये बिल्डर को कई सालों तक आसान किस्तों में रकम अदायगी की सुविधा मुहैया कराई थी ।
राज्य सरकार सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षिक संस्थाओं के अलावा अब उद्योगपतियों पर भी मेहरबान हो रही है । राजधानी भोपाल,औद्योगिक शहर इंदौर,जबलपुर,ग्वालियर सहित कई अन्य शहरों में तमाम नियमों को दरकिनार कर सरकारी ज़मीन कौड़ियों के दाम नेताओं के रिश्तेदारों और उनके चहेते औद्योगिक घरानों को सौंपी जा रही हैं । सरकार के कई मंत्री और विधायक शहरों की प्राइम लोकेशन वाली ज़मीनों पर रातों रात झुग्गी बस्तियाँ उगाने, शनि और साँईं मंदिर बनाने के काम में मसरुफ़ हैं । नेताओं की छत्रछाया में बेजा कब्ज़ा कर ज़मीनें बेचने वाले भूमाफ़िया पूरे प्रदेश में फ़लफ़ूल रहे हैं । आलम ये है कि सरकार की नाक के नीचे करोड़ों की सरकारी ज़मीनें निजी हाथों में जा चुकी है । कई मामलों में नेताओं और अफ़सरों की मिलीभगत के चलते सरकार को मुँह की खाना पड़ी है ।

शहरों में जमीन की आसमान छू रही कीमतों के मद्देनजर राज्य शासन की मंशा है कि शहर के आसपास ऎसी स्पेशल टाउनशिप बनाई जाए, जिसमें सस्ती दरों पर मकान उपलब्ध हों। साथ ही स्कूल, अस्पताल समेत अन्य मूलभूत सुविधाएं भी मुहैया कराई जा सकें। आवास एवं पर्यावरण विभाग ने प्रदेश में बढ़ते शहरीकरण के मद्देनजर टाउनशिप विकास नियम-2010 का प्रारूप प्रकाशित किया है। सरसरी तौर पर योजना में कोई खोट नज़र नहीं आती, लेकिन प्रारूप में एक ऎसी छूट शामिल कर दी गई है, जिससे मास्टर प्लान से छेड़छाड़ होने की पूरी संभावना है। मास्टर प्लान में कई नियमों से बँधे कॉलोनाइजरों और डेवलपरों के लिये स्पेशल टाउनशिप नियम राहत का पैगाम है। राज्य सरकार ने टाउनशिप नियमों का जो मसौदा तैयार किया है, उसमें स्पेशल टाउनशिप को मंजूरी देने के लिए मास्टर प्लान के नियम बाधा नहीं बनेंगे। खास बात यह है कि कृषि भूमि पर भी टाउनशिप खड़ी हो सकेगी। अब तक कई सीमाएं कालोनाइजर के लिए बाधक बनी हुई थी।

जहां भी मास्टर प्लान का क्षेत्र होगा, यदि वहां उक्त प्रस्ताव के नियमों और मास्टर प्लान के नियमों में विरोधाभास हुआ तो टाउनशिप के नियम लागू होंगे। इस तरह राज्य सरकार ने स्पेशल टाउनशिप के लिए निर्माताओं को मास्टर प्लान से भी छेड़छाड़ करने की छूट दे दी है। टाउनशिप के निर्माण के लिए असीमित कृषि भूमि खरीदने और इस जमीन को कृषि जोत उच्चतम सीमा अधिनियम के प्रावधानों से भी मुक्त करने जैसी बड़ी रियायतें भी देने का प्रस्ताव किया है। साथ ही टाउनशिप के बीच में आने वाली सरकारी जमीन प्रचलित दरों या अनुसूची(क) की दरों अथवा कलेक्टर की ओर से तय दरों पर पट्टे पर देने का प्रस्ताव भी आगे चलकर किसके लिये मददगार बनेगा,बताने की ज़रुरत शायद नहीं है ।

प्रारूप के नियमों में हर जगह लिखा गया है कि विकासकर्ता को अपने स्रोतों से ही टाउनशिप में सुविधाएँ उपलब्ध कराना होंगी जिनमें सड़क बिजली एवं पानी मुख्य है । वहीं यह भी जोड़ दिया कि वो चाहे तो इस कार्य में नगरीय निकाय की सहायता ले सकते हैं। नियम में इस शर्त को जोड़कर विकासकर्ता को खुली छूट दी गई है कि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर टाउनशिप का पूरा विकास निगम खर्चे से करवा ले। आवास एवं पर्यावरण विभाग की वेबसाइट पर मौजूद को गौर से पढ़ा जाए तो इसमें शुरू से लेकर आखिर तक सिर्फ बिल्डरों को उपकृत करने की मंशा साफ़ नज़र आती है। विभाग ने अपने ही नियमों को धता बताते हुए इस नए नियम से बड़े कॉलोनाइजरों और डेवलपर की खुलकर मदद की है।

सरकार के प्रस्ताव से नाराज़ लोगों का तर्क है कि शहर के बाहर स्पेशल टाउनशिप बनाने के बजाए पहले सरकार को पुनर्घनत्वीकरण योजना के तहत शहर के पुराने, जर्जर भवनों के स्थान पर बहुमंजिला भवन बनाना चाहिए। स्पेशल टाउनशिप बनाए जाने से पर्यावरण भी प्रभावित होगा और खेती के लिए भी कम जमीन बचेगी। कोई भी कृषि भूमि पर टाउनशिप विकसित कर सकेगा, जिससे कृषि भूमि के परिवर्तन के मामलों में अंधाधुंध बढ़ोतरी होगी। जमीनों को लेकर अंग्रेजों द्वारा 1894 में बनाये गये कानून की आड़ में सरकारी ज़मीनों की खरीद फ़रोख्त का सिलसिला ज़ोर पकड़ चुका है । कृषि योग्य जमीन का अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने पर उतारु सरकारें सरकारी संपत्ति की लूट खसोट के लिये जनता द्वारा सौंपी गई ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रही हैं । सरकारी संपत्ति पर जनता का पहला हक है। लेकिन आम लोगों को अँधेरे में रखकर सरकार पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली की तरह काम कर रही है । सरकार को उसकी हैसियत बताने के लिये अनता को अपनी ताकत पहचानना होगा और जागना होगा नीम बेहोशी से । फ़िलहाल तो आम जनता के हाले दिल का आलम कुछ यूँ है कि " भरोसा कर लिया जिन पर उन्हीं ने हम को लूटा है,कहाँ तक नाम गिनवाएँ सभी ने हम को लूटा है ।"