शनिवार, 15 मई 2010

ज़रा ज़ुबान सम्हाल कर....!

भाजपा के नये मुखिया ने जोश-जोश में क्षेत्रीय पार्टियों के चंद नेताओं को आइना दिखा दिया,तो क्या गुनाह कर दिया ? वे अकेले तो नहीं हैं जिन्होंने इस तरह की भाषा का प्रयोग किया है । भारतीय राजनीति में यह सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है । एक ज़माने में स्वर्गीय राजीव गाँधी "नानी याद दिला देने" पर आमादा थे । बाद के सालों में "कुत्ते" के सर्वाधिकार मायावती के पास सुरक्षित थे । बदलते दौर के साथ देश में राजनीति कम और दलाली का दौर शुरु हुआ,तो इस स्वामीभक्त प्राणी के "हेय संबोधन" को जनप्रिय बनाने का पूरा-पूरा श्रेय राजनीतिक अड़ीबाज़ माननीय अमर सिंह्जी को जाता है ।
वैसे तो आज के दौर का कोई भी नेता बदज़ुबानी में किसी से पीछे नहीं है । मुलायम,लालू की हल्की बातों को मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये खूब भुनाया और उसके चटखारों से खूब मजमा जुटाया । मगर क्या मीडिया की हिमायत इनकी छिछली टिप्पणियों को जायज़ ठहरा सकती है ? काँग्रेस में भी सत्यव्रत चतुर्वेदी, दिग्विजय सिंह , मनीष तिवारी जैसे महारथियों की भरमार है,जो अपने काम से ज़्यादा ओछी टीका टिप्पणियों के लिये सुर्खियाँ बटोरते हैं ।
वैसे भी हिन्दी में मुहावरेदार भाषा का चलन है,जो बातचीत को रसीला और मज़ेदार बना देता है । फ़िर गडकरीजी ने अपनी बात को इशारों-इशारों में ही तो कहा था । मगर कहते हैं ना कि "चोर की दाढ़ी में तिनका"। लिहाज़ा लालू-मुल्लू ने तुरंत ही जान लिया कि तलवा कौन चाटता है ? बेचारे गडकरी ने तो अपने मुँह से उस स्वामीभक्त प्राणी का नाम भी नहीं उच्चारा था । बहरहाल लालू-मुल्लू सरीखे घाघ नेता ही नहीं गली-मोहल्ले के आवारा कुत्ते भी गडकरी से खफ़ा हो गये हैं । पूँछ में तख्ती टाँगे ये प्राणी भौंक-भौंक कर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं । इनका आरोप है कि गडकरी के बयान से इनकी साख पर बट्टा लग गया है । इन्हें लगता है कि भाजपा के मुखिया ने लालू-मुल्लू के साथ नाम जोड़कर इनकी कौम का मान मर्दन किया है । कई जोशीले नौजवान कुकुर तो गडकरी पर मानहानि का दावा ठोकने की तैयारी में लग गये हैं ।
भाजपा के सांसद रह चुके धर्मेन्द्र ने रुपहले पर्दे पर खलनायक को कुत्ते-कमीने के खिताब से नवाज़ कर खूब तालियाँ भी बटोरीं और खूब धन भी समेटा । कुते-कमीनों का खून पीने का सरे आम ऎलान कर लोकप्रियता के शिखर को छूने वाले धरमिन्दर पाजी बाद के सालों में संसद के गलियारे में भी दाखिल हो गये । गडकरी आरएसएस के आशीर्वाद से बीजेपी के मुखिया तो बन गये हैं , लेकिन चांडाल चौकड़ी के चलते वे गब्बरसिंग की महफ़िल में रस्सी से बँधे "वीरु" से जान पड़ते हैं । वही वीरु जो चिल्ला-चिल्ला बसंती को "कुत्तों के आगे नाचने" से रोकने की कोशिश करता है । पुराने फ़िल्मी गानों के शौकीन गडकरी ने मध्यप्रदेश में हुए भाजपा अधिवेशन के दौरान शिवराजसिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिला कर खूब मंच लूटा था । लगता है कार्यकर्ताओं को चाँडाल चौकड़ी के कब्ज़े से छुड़ा कर अपने खेमे में लाने के लिये गडकरी ने यह दाँव आज़माया होगा ।
वैसे नेताओं को समझना होगा कि सार्वजनिक जीवन में आचार-व्यवहार की मर्यादाओं का ध्यान रखना ही चाहिये । हल्के शब्द तात्कालिक तौर पर फ़ायदा देते दिखाई ज़रुर देते हैं,लेकिन ये ही शब्द व्यक्तित्व की गुरुता को घटाते भी हैं । "ज़ुबान की फ़िसलन" राजनीति की रपटीली ज़मीन पर बेहद घातक साबित हो सकती है । खासतौर से ये खतरा तब और भी बढ़ जाता है,जब विरोधी घर में ही मौजूद हों । देश के प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया की "ज़ुबान का फ़िसलना" और फ़िर "ज़ुबान से पलटना" ना तो खुद उनके लिये अच्छा है और ना ही भाजपा के लिए ....। लिहाज़ा गडकरीजी, ! ज़रा ज़ुबान संभाल कर .........।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

लोकतंत्र की लूटखसोट

पूरे देश में आईपीएल पर मीडियाई हाहाकार मचा हुआ है । हाल ही में शोएब सानिया और आयशा के लव ट्रायंगल पर दिन-रात पसीना बहाने वाले पत्रकारों ने दम भी नहीं लिय था कि मोदी ने अंतरजाल पर चहक-चहक कर अक्सर चहचहाने वाले शशि थरुर की बोलता बंद कर दी । सुनंदा की मित्रता थरुर की कुर्सी पर भारी पड़ गई । काँग्रेस ने नाक बचाने के लिये थरुर की बलि तो ले ली लेकिन अब वह मोदी को भी बख्शने के मूड में नहीं है । तभी तो तेल पानी लेकर पिल गई है मोदी को चारों खाने चित्त करने में ।
वैसे पहले सानिया-शोएब और अब आईपीएल का चखड़बा । देश की मूल समस्याओं की ओर अब किसी का ध्यान भी नहीं है । महँगाई का विरोध करने के लिये पानी की तरह पैसा बहाकर भीड़ जुटाने की बीजेपी की कोशिश भी कुछ रंग नहीं ल सकी । उल्टा हुआ ये कि एयरकंडीशनर की ठंडी हवा के आदी हो चुके नेताओं को गर्म लू के थपेड़ों की आदत ही नहीं रही , लिहाज़ा सूरज की तपिश से रुबरु होते ही गश खा कर गिर पड़े । अब कोई इन नेताओं से पूछे कि महँगाई की सुरसा तो पिछले कई महीनों से लगातार मुँह फ़ाड़ रही है , अब जाकर होश आया ....!!!! गर्म हवा के एक झोंके से चक्कर खाकर गिर जाने वालों से कोई ये भी पूछे कि करोड़ों रुपए फ़ूँक कर एक दिन मजमा जुटा लेने से क्या आम जनता को महँगाई से निजात मिल जायेगी ।
दरासल देश में अजीब सा "केओस" का माहौल है । आम आदमी के पेट में भले ही निवाला नहीं पहुँचे लेकिन संसद में आईपीएल पर बहस में समय ज़ाया करना ज़रुरी है । मीडिया भी बुनियादी समस्याओं से आम लोगों का ध्यान हटाने के लिये नेताओं के सुर में सुर मिलाकर फ़िज़ूल के मुद्दे बना रहा है और उन्हें बेवजह तूल दे रहा है । आखिर नेताओं और उद्योग घरानों की मदद से ही तो उनकी दुकान चलती रह सकती है ।
इधर प्रदेश के अखबार घरानों ने भी एक दूसरे को पटखनी देने के लिये नित नये दाँव खेलना सीख लिया है । अखबार जो कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ था आज लूटतंत्र में अन्य स्तंभों का हमजोली बन गया है । जब से एनजीओ के ज़रिये सरकारी कम कराने का चलन बढ़ा है, इन अखबार मालिकों को समाज सेवा का भी भूत सवार हो गया है । कोई तालाब बचाने के नाम पर पैसा बना रहा है, तो कोई पक्षियों को दाना-पानी देकर वाहवाही लूट रहा है । एक अखबार ने तो इन दिनों कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ़ मुहिम छेड़ रखी है । बेशक नेताओं के काले कारनामे जनता के सामने आना ही चाहिये , मगर इन घपलों को उजागर करने के तरीके अखबार की नीयत पर ही सवाल खड़े करते हैं । आखिर क्या वजह है कि इस अखबार को प्रदेश में सिर्फ़ एक ही मंत्री बेईमान नज़र आ रहा है । अखबार मुख्यमंत्री से न्याय की अपेक्षा कर रहा है , लेकिन क्या इस भोले-भंडारी को यह नहीं मालूम कि मुख्यमंत्री का "डंपर मामला" अब भी लोकायुक्त के पास धूल चाट रहा है । गर अखबार सचमुच प्रदेश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहता है,तो सरकार के मुखिया के कारनामों को उजागर करता ?
व्यक्ति विशेष के खिलाफ़ चलाई जा रही मुहिम में व्यक्तिगत दुर्भावना या विद्वेष की बू आती है । कहीं ऎसा तो नहीं कि इंदौर में पैर जमाने में अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से नाराज़ होकर मंत्री जी की बखिया उधेड़ी जा रही है या फ़िर इंदौर के बीजेपी अधिवेशन के सफ़ल आयोजन के बाद आलाकमान की नज़रों में विजयवर्गीय के नम्बर बढ़ने से खौफ़्ज़दा भाजपाइयों ने ही अखबार को "छू’ कर दिया हो ....! बहरहाल नैतिकता और व्यावसायिक प्रतिबद्धता का दावा करने वाले अखबारों का ये " ब्लेकमेलर" अंदाज़ बेहद शर्मनाक है । अगर अनियमितताओं से पर्दा हटाने क बीड़ा उठाया ही है तो फ़िर निष्पक्षता का हामी होना भी ज़रुरी है । राजनीतिक शुचिता के देश की मौजूदा व्यवस्था में शायद अब कोई जगह बची ही नहीं है ।
जो मुख्यमंत्री केबिनेट में शहर की सरकारी बेशकीमती ज़मीनें कई रसूखदारों को बाँट दे, जो खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हो , अधिकारियों और दिल्ली में बैठे नेताओं के हाथ की कठपुतली बना हुआ हो , वो सिर्फ़ लच्छेदार भाषण देकर लोगों को भरम सकता है, उनकी भलाई के बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठा सकता । कल यानी तेइस अप्रैल के पत्रिका के सातवें पन्ने पर एक सरकारी उदघोषणा प्रकाशित की गई है । इसमें शहर के महँगे इलाके सिंगारचोली की १.२८ एकड़ सरकारी ज़मीन मुम्बई के एस्सार ग्रुप को कार्यालय खॊलने के लिये आवंटित करने की बात कही गई है । नजूल अधिकारी ने पंद्रह दिन में आपत्तियाँ मँगाई हैं । क्या सरकारी ज़मीनें औने-पौने दामों में रामदेव जैसे योग के व्यापारी,धर्म या समाज का ठेकेदारों,फ़र्ज़ी समाजसेवी संस्थाओं को आवंटित करने का हक इन नेताओं महज़ इस लिये मिल जाना चाहिये क्योंकि ये येनकेन प्रकारेण सत्ता पर काबिज़ हैं । इस बँदरबाँट में राजनीतिक दलों का कोई भेद नहीं बचा है । सत्ता किसी भी पार्टी की हो, नेता सब बाँट कर खाने मामले में एक हो चुके हैं । सरकारी संपत्ति को इन लुटेरों से बचाने के लिये जनता को ही कोई रास्ता तलाशना होगा ।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

अकेले नौकरशाह ज़िम्मेदार नहीं

मध्यप्रदेश में आईएएस दंपति के लॉकर सोने- चाँदी और हीरे जवाहरात उगल रहे हैं । उनके बंगले से मिली पाँच सौ और हज़ार के नोटों की गड्डियों को गिनने के लिये आयकर विभाग के अमले को पसीने आ गये । आलम ये रहा कि नोट गिनने वाली मशीन को भी अपना काम अंजाम देने में घंटों लग गये । छापे से जहाँ नौकरशाही में हड़कंप मचा है , वहीं आम जनता हैरान है । कई लोग तो दबी ज़ुबान में कह रहे हैं कि इतना कैश घर में रखने की ज़रुरत ही क्या थी ? लेकिन कुछ लोग ऎसे भी हैं जिनकी राय में यह तो प्रदेश ही क्यों समूचे देश में मचे भ्रष्टाचार के तांडव की बानगी भर है ।


सूबे के मुखिया सारे काम धाम छोड़कर आये दिन प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के अभियान पर निकल पड़ते हैं । ग्रामीणों को भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनने की सीख देते हैं । लोगों को काली कमाई से दूर रहने की सौगंध दिलाते हैं और थके माँदे राजधानी लौटकर अफ़सरशाही की मदद से अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लग जाते हैं । मौजूदा दौर में ये माना जा चुका है कि काम करने से सरकार नहीं चलती । सरकार की स्थिरता के लिये अपने आकाओं की खुशामद ज़रुरी है ।

नितिन गडकरी की ताजपोशी के बावजूद बीजेपी में आज भी एक साथ कई मुखिया हैं । लिहाज़ा "कुर्सी बचाने" के लिये इन सभी तक "खर्चा-पानी" पहुँचाना ज़रुरी है । नौकरशाही को भी लगने लगा है कि नेताओं के लिये जब कमाई करना ही है , तो क्यों ना बहती गंगा में हम भी हाथ धो लें । वे भी जानते हैं कि एक गुनाह की भी वही सज़ा है , जो हज़ार गुनाहों की । "फ़ंड के फ़ंडे" में उलझे नेताओं की हकीकत को जानने के बाद अब नौकरशाही पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है ।

मुख्यमंत्री शासन - प्रशासन को स्वच्छ कर देने के दावे तो आये दिन करते रहते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है । किसानों को खाद - बीज देने का मामला हो या सिंचाई नहरों का, गरीब ग्रामीण बेहाल और नेता, ठेकेदार, अफ़सरान मालामाल । आँकड़े गवाही देते हैं कि किस तरह ग्रामीण अंचलों में बच्चे कुपोषण और भूख से मर रहे हैं, लेकिन पोषाहार सप्लाई में मची बँदरबाँट से लोकतंत्र का ताकतवर गठजोड़ दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होता जा रहा है । जनता की गाढ़ी कमाई से इकट्ठा काली कमाई तिजोरियों का पेट भर रही रही है और प्राण लेने पर उतारु महँगाई की मार झेल रहा आम आदमी दो वक्त की रोटी के लिये भी जद्दोजहद कर रहा है । गरीबों के कल्याण के लिये बनी नरेगा जैसी तमाम योजनाएँ समाज के उच्च वर्ग की रातों को रंगीन, नशीला और रुमानी बनाने वाली साबित हो रही हैं ।

प्राइवेट कंपनियों की बीमा पॉलिसियाँ कारोबारियों,अफ़सरों और नेताओं की काली कमाई को उजला बनाने की " फ़ेयर एंड लवली" साबित हो रही है । लोगों से जीने का बुनियादी हक छीनने वाले जीवन सुरक्षा में निवेश कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये "कारु का खज़ाना" तैयार कर रहे हैं । काँग्रेस के एकछत्र राज्य में मचे घटाटोप में बीजेपी एक उम्मीद की किरण बन कर आई थी, लेकिन नाकारा नेतृत्व और सत्ताधारी दल के साथ मिल बाँट कर खाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने आम जनता के भरोसे का खून कर दिया है ।

प्याज के मुद्दे पर सरकार हिला देने की ताकत रखने वाली लोकशाही में दाल-रोटी ही नहीं, बिजली-पानी भी महँगा हो गया है । बेतहाशा फ़ैलते प्रदूषण ने लोगों का साँस लेना भी दूभर कर दिया है । लेकिन आम आदमी की आवाज़ उठाने की किसी को फ़िक्र भी नहीं है और ना ही फ़ुर्सत है । महँगाई से परेशान लोगों के आँसू निकलने लगे हैं । चारों तरफ़ हाहाकार मचा है, ऎसे में विपक्ष की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है । कहीं ये मौन लोकतंत्र के किसी नये गठबंधन का संकेत तो नहीं ? कहीं ऎसा तो नहीं कि वोट लेने के बाद सत्ता और विपक्ष में साँठगाँठ हो गई है । क्या विपक्ष चुप्पी साधने की कीमत वसूल कर आम आदमी की पीड़ा से मुँह फ़ेर चुका है ?

मौजूदा हालात तो लोकतंत्र के इस बदनुमा चेहरे को ही उजागर कर रहे हैं । लेकिन नेताओं को जनता के सब्र का इतना भी इंम्तेहान नहीं लेना चाहिए कि तकलीफ़ें उन्हें सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दे । मगरुर नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पीड़ा से तड़पती जनता जब सड़कों पर आती है, तो कई वटवृक्षों को जड़ से उखाड़ने की ताकत रखती है । बीजेपी नेतृत्व को समझना होगा कि सता चाहे जितनी मदमस्त क्यों ना हो विपक्ष के मज़बूत और बुलंद इरादों के सामने उसे घुटने टेकना ही पड़ते हैं । जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठाने के लिये पार्टी को नैतिक मूल्यों को दोबारा से प्रतिष्ठित करना होगा और इसके लिये ज़रुरत होगी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा साहसिक फ़ैसले लेकर उन्हें अमलीजामा पहनाने की ।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

पूँजीवादी अमरसिंह लायेंगे समाजवाद

परिवारों में दरार डालने और रिश्तों में दीवार खड़ी करने के लिये ख्याति अर्जित करने वाले अमरसिंह अब की बार मुलायम से अपने हर उपकार का हिसाब एक ही बार में सूद सहित वसूल लेना चाहते हैं । अपनी शिकस्त से बौखलाये अमरसिंह ने अब की बार पार्टी को दो फ़ाड़ करने की ठान ली है । खून के रिश्तों में खटास लाने के अमरसिंह के अचूक नुस्खे पर राम गोपाल यादव और मुलायम सिंह के रिश्तों की मज़बूती भारी पड़ गई । पूँजीवादी अमरसिंह से शायद खाँटी समाजवादियों के देसी मन को पढ़ने में चूक हो गई । तभी तो रिश्तों की मज़बूत डोर से बँधे यादव परिवार से परिवारवाद का आरोप झेलकर पूँजीवाद का कलंक अपने माथे से धो डालने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया ।

आये दिन रुठने मनाने के सिलसिले से आज़िज़ आ चुके मुलायम अमर पर "कड़क" क्या हुए समाजवादी पार्टी में दो फ़ाड़ की नौबत आ गई है । गौरतलब है कि अमर सिंह ने हाल ही में कहा था कि "मैं मुलायमवादी नहीं समाजवादी हूं।" उनके इस बयान पर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं । मुलायमवाद से मोहभंग होने के बाद समाजवादी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने वाले अमर सिंह इन दिनों समाजवाद के किसी नए आयाम की तलाश कर रहे हैं। हो सकता है कि जल्द ही इसका नतीजा किसी नई पार्टी के गठन के रूप में सामने आए। अमर सिंह ने कई राजनीतिक कार्यक्रमों की घोषणा की है । माना जा रहा है कि इसके ज़रिए वह मौजूदा राजनीतिक स्थिति को पढ़ना चाहते हैं । अमर सिंह के मुताबिक़ वह ''सच्चे समाजवादी'' मध्य प्रदेश के नेता रघु ठाकुर से मिलना चाहेंगे और रामपुर, मथुरा और ग़ाज़ीपुर में कार्यक्रमों में हिस्सा लेना चाहते हैं ।

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि सिंह पुराने समाजवादियों को इकटठा कर नया मोर्चा बनाने की कोशिश कर सकते हैं जिसे समाजवादी विचारधारा से जुड़े किसी नए राजनीतिक दल की शक्ल दी जा सकती है। कल तक खुद को मुलायम का दर्ज़ी यानी खुले तौर पर मुलायमवादी होने का दावा करने वाले अमरसिंह अब पार्टी के लिये "अमरबेल" साबित हो रहे हैं । समाजवाद को पूँजीवाद की चाट लगाकर चकाचौंध से भरी सिनेमाई दुनिया की रंगीनियों की सैर कराने वाले ठाकुर साहब अब एक ही झटके में पार्टी को बेनूर कर देने पर आमादा हैं ।

संभावनाओं की सियासत के बड़े खिलाड़ी अमर सिंह सुर्खियों में रहने के गुर बखूबी जानते हैं । हाल के दिनों में फ़िल्मी सितारों की चमक दमक में गुम हो चुकी समाजवादी पार्टी में एक दौर वो भी था तब बेनी प्रसाद का जलवा हुआ करता था, जनेश्वर मिश्र संसद में बोलने उठते थे लेकिन उनको सुनते थे। राम गोपाल यादव पार्टी की राजनीति में निर्णायक माने जाते थे और मुलायम समेत इन सबको समाजवादी माना जाता था। ये अमर सिंह के कैरियर का शुरुआती दौर था। लेकिन अमर धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी की मुख्य धारा बन गये और बेनी प्रसाद हाशिये से होते-होते बाहर, जनेश्वर पार्टी मे सजावट की चीज बन गये । राम गोपाल यादव कैकेयी की भूमिका में दिख्ने लगे। भाई मुलाय़म का प्रोफाइल अचानक काफी बढ गया, धुर गँवई "नेताजी" अमिताभ और अनिल अंबानी के संग सोहने लगे। भाई पर अमर प्रेम का ऐसा नशा चढ़ा कि अमर सिंह समाजवाद की पहचान बन गये ।  लोग कनफ्यूज्ड कि ये अमर सिंह का प्रमोशन था या फिर मुलामय का डिमोशन।

छन-छन कर आ रही खबरों के मुताबिक अमर सिंह पुराने समाजवादी और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघु ठाकुर के लगातार संपर्क में हैं । सिंह ने फोन पर उनसे संपर्क कर कहा है कि वे उनके रचनात्मक कार्यो से जुडना चाहते हैं। मध्यप्रदेश के सागर के निवासी और समाजवादी पार्टी के अनेक दिग्गज नेताओं के सहयोगी रहे ठाकुर ने कहा कि अमर सिंह ने उनसे मिलने की इच्छा भी जताई है। संभवत: 25 जनवरी को दिल्ली में अमर सिंह और रघु ठाकुर की मुलाकात होगी।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

युवराज की क्लास पर मचा बवाल

दलितों के घर खाना खाने और रात बिताने के बाद काँग्रेस के युवराज आजकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी की खाक छान रहे हैं । कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी  के विश्वविद्यालयों के दौरे से राजनीति गरमा गई है। बीजेपी सांसद अनिल दवे  काँग्रेस के युवराज से होड़ की ठान बैठे हैं । अब राहुल युवाओं के बीच कितनी पैठ बना पाये हैं , यह तो फ़िलहाल कह पाना मुश्किल है । लेकिन भाजपा संसाद अनिल माधव दवे ने विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को पत्र लिखकर राहुल की तर्ज पर बतौर सांसद उन्हें भी अपने यहां छात्रों से संवाद कायम करने के लिए आमंत्रित करने की माँगकर धर्मसंकट में डाल दिया है।

 मुख्यमंत्री का कॉलेज कैंपस को राजनीति से दूर रखने का बयान और सांसद का भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और सागर यूनिवर्सिटी के प्रमुखों को लिखा गया पत्र बताता है कि बीजेपी हाथ आये इस मुद्दे को हवा देकर राजनीतिक फ़ायदा लेना चाहती है । दवे ने पत्र में कहा है कि राहुल की तर्ज पर बतौर सांसद उन्हें भी छात्रों से संवाद कायम करने के लिए आमंत्रित किया जाये । हाल ही में कोपेनहेगन सम्मेलन से लौटे दवे का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग का विषय छात्रों में जाना समसामयिक है। इसलिए शिक्षण संस्थानों में राहुल गांधी की तरह उनका भी कार्यक्रम आयोजित हो।

इंदौर में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में राहुल के कार्यक्रम को लेकर राज्य सरकार के उच्च शिक्षा आयुक्त ने कुलपति और रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया है। उच्च शिक्षा आयुक्त ने कुलपति अजित सहरावत और रजिस्टार आरडी मुसलगांवकर को नोटिस जारी कर पूछा है कि कांग्रेस नेता के राजनीतिक कार्यक्रम की इजाजत किसने दी? मंगलवार को राहुल ने यहाँ विद्यार्थियों से रू-ब-रू होकर राजनीति में सक्रिय होने को कहा था। दूसरी ओर भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर ने गोवा विवि कैंपस में राहुल के राजनीतिक कार्यक्रम को अनुमति दिए जाने के लिए रजिस्टार को बर्खास्त करने की माँग की है। इससे पहले कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति राहुल गाँधी को कार्यक्रम के लिए आमंत्रित करने के मामले में मुख्यमंत्री मायावती के कोपभाजन बने थे ।

नोटिस के सवाल पर दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को अपने गिरेबाँ में झाँकने की नसीहत दे डाली है । दिग्विजय ने पलटवार करते हुए पूछा कि मुख्यमंत्री बताएं कि वे कितनी बार विश्वविद्यालयों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में गए हैं। जहां तक राहुल गांधी के विश्वविद्यालय के दौरों का सवाल है, तो उन्हें आमंत्रित किया गया था। सिर्फ नोटिस देने का कोई मतलब नहीं है, चौहान को राजनीतिक लड़ाई लड़ना चाहिए। राहुल के बचाव में उतरे एक अन्य काँग्रेस महासचिव और मध्यप्रदेश के प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा-धर्म के नाम पर और राम का नाम बेचकर राजनीति करने वाले मुख्यमंत्री को राहुल गांधी के नाम पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

नौजवानों के बीच जा-जाकर राहुल ने राजनीति में अपराधियों को आने से रोकने की बात कही । यूनिवर्सिटी के छात्रों को राहुल की क्लास में मजा आया लेकिन विपक्ष भी इस मुद्दे पर चुटकी लेने से नहीं चूका । बीजेपी का काँग्रेस को  मशविरा है कि अच्छे काम की शुरुआत घर से ही करना चाहिए। ग्वालियर में लक्ष्मी बाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षण संस्थान में राहुल ने नौजवानों से राजनीति में भाग लेने की अपील की।

राहुल ने छात्रों से कहा कि आप लोग एनएसयूआई या यूथ काँग्रेस से जुड सकते हैं लेकिन इसकी पहली शर्त है धर्मनिरपेक्ष सोच और साफ़ सुथरा चरित्र । आप राजनीति को गंदा न समझें जब अच्छे लोग या युवा राजनीति से जुड़ेंगे तभी राजनीति की स्वच्छ छवि बनेगी। उन्होंने कहा कि युवाओं को खुद आगे आकर राजनीति में अपना योगदान करना चाहिए। आने वाले समय में युवा ही भारत की नींव होंगे। मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में निष्पक्ष चुनाव और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को आगे लाने की वकालत करते हुए श्री गांधी ने कहा कि युवाओं का आह्वान किया कि राजनीति में सकारात्मक बदलाव के लिए उन्हें खुद आगे आते हुए इसका हिस्सा बनना चाहिए।

मध्यप्रदेश बीजेपी के अनुभवी नेताओं का एक नौसीखिये राजनीतिज्ञ के दौरे पर बौखलाना बेवजह है । जब तक दिग्विजय सिंह प्रदेश के बाहर की राजनीति कर रहे हैं और जब तक काँग्रेस की कमान जमुना देवी, सुरेश पचौरी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया सरीखे अपनी ढ़पली-अपना राग अलापने वालों के हाथ में रहेगी, बीजेपी सरकार का बाल भी बाँका नहीं हो सकता, जनता कितनी ही नाराज़ क्यों ना हो जाए। राहुल गाँधी की आँधी आई और चली गई । राज्य सरकार काँग्रेस की मदद से बदस्तूर बेखटके राजपाट चला सकती है । मौजूदा हालात पर उस चीड़िया और किसान की कहानी सटीक बैठती है , किसान के मुँह से गाँव वालों और फ़िर रिश्तेदारों-दोस्तों के भरोसे फ़सल काटने की बात सुनकर निश्चिंत रहने वाली चिड़िया अपने बच्चों को लेकर खेत से उस वक्त तक फ़ुर्र नहीं होती , जब तक किसान खुद फ़सल काटने की तैयारी नहीं कर लेता । लिहाज़ा बीजेपी के पास अभी पूरे-पूरे चार साल हैं -जल,जंगल और ज़मीन बेचकर अपनी झोली भरने के .......।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

चेहरा बदला, क्या चाल-चरित्र बदलेगा ....?

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में हाल के दोनों में दो अहम बदलाव हुए हैं । भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ लोकसभा में विपक्ष का नेता भी बदल गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अब लालकृष्ण आडवाणी नहीं सुषमा स्वराज होंगी, तो राजनाथ सिंह के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान नितिन गडकरी ने संभाली है। इस साल लोकसभा चुनाव में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व युवा नेताओं के हाथ में सौंपने की माँग उठ रही थी । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या इस बदलाव से भाजपा का कुछ भला हो पाएगा ? क्या पार्टी इनके नेतृत्व में बुरे दौर से निकल पाएगी ? क्या आडवाणी की राजनीतिक पारी भी समाप्ति की ओर है?


गौरतलब है कि आडवाणी के लिए संसदीय दल के संविधान में संशोधन करके काँग्रेस की तर्ज़ पर विशेष जगह बनाई गई है । उनका राजनीतिक कैरियर सुरक्षित करने की गरज से उठाये गये इस कदम की बदौलत लालकृष्ण आडवाणी अब संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बन गए हैं। यानि सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार अब भी उनके पास सुरक्षित है। भाजपा के इस लौहपुरूष को पिघलाना आसान बात नहीं है, यह बात एक बार फिर साबित हो गयी है। भले ही संसदीय दल का नेता नहीं होने के कारण कैबिनेट मंत्री का दर्जा छिन गया हो, मगर लालकृष्ण आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष के रूप में पार्टी पर वर्चस्व बनाए रखेंगे। आडवाणी की राजनीतिक बुलंदियाँ छूने की महत्वाकांक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं, यह मानना भूल होगी। हिन्दुत्व के एजेंडे को बुलंद करते हुए भाजपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में आडवाणी का हाथ रहा, बावजूद इसके वे कभी प्रधानमंत्री पद पर नहीं पहुँच पाए। लोकसभा में पार्टी की सिमटती सीटों के बावजूद हार उन्होंने नहीं मानी है, विरोधियों को चतुराई से किनारे किया और वे अब भी बैक सीट ड्राइविंग करते हुए एक तरह से पार्टी को अपनी पसंद की राह पर चलवा रहे हैं। भाजपा का युवा अवतार कितनी दूर तक वरिष्ठों के कहे अनुसार चलेगा, यह देखने वाली बात रहेगी।

भारतीय जनता पार्टी संक्रमण के दौर में है। नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर दोहरे संकट को झेलती पार्टी को पटरी पर लाने के लिये नितिन गडकरी को संघ के समर्थन का नैतिक बल ज़रुर हासिल होगा । लेकिन इससे उनकी राह बहुत आसान नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा बड़ी हो गई है और बदल भी गई है । भाजपा के संक्रमण का एक पहलू यह भी है कि मौजूदा चुनौतियों के संदर्भ में एक सैद्धांतिक आधारभूमि भी तलाशना है । जिससे वह ऊर्जा ग्रहण कर एक राजनीतिक दल के रुप में सार्थक हो सके और अपने समर्थकों को इतना वेगवान बना सके कि वे राजनीतिक शून्यता भरने में कामयाब हो सकें ।

इसके बारे में संघ जितना बेपरवाह है उससे कहीं ज़्यादा उदासीनता भरा रवैया भाजपा का रहा है। भाजपा में पार्टी प्रतिबद्धता का हाल यह है कि संघ नेतृत्व खुलेआम कहने लगा है कि वहाँ कोई भी राष्ट्रीय नेता ऐसा नहीं है ,जो पार्टी और उसके भविष्य की सोचता है । हर कोई अपने में सिमट गया है। भाजपा के जिस विशेषता के लिए जानी जाती थी वह उससे बहुत दूर हो गई है । इसे संघ चाहे भी तो कैसे दूर करेगा ? क्या कोई नया संगठन मंत्री आकर जादूका छड़ी फेर सकता है ? इस समय जो संगठन मंत्री हैं वे बिगड़ी भाजपा के चेहरे हो गए हैं ।

गडकरी की छबि व्यवहार कुशल नेता की है। विचार का जहाँ तक सवाल है वे स्वदेशी के पैरोकार हैं पर वैश्वीकरण से उन्हें बैर भी नहीं है । शनिवार को दिल्ली में पार्टी की कमान संभालने के बाद उन्होंने कहा कि वे पाँच सालों में पहली बार दिल्ली में रात बिताएंगे। यानि उनकी राजनीति महाराष्ट्र के इर्द-गिर्द ही रही। अब एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण और सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। यह समय गठबंधन राजनीति का है। इस नाते तरह-तरह के दलों से पार्टी के संबंधों को मजबूती देना उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। लगातार सिमट रहे जनाधार से पार्टी कार्यकर्ताओं के पस्त पड़े हौसलों को नयी ऊर्जा देना भी एक बड़ा काम रहेगा और सबसे बड़ी चुनौती रहेगी पार्टी के भीतर मौजूद दिग्गजों के अहं को संतुष्ट करते हुए आपसी तालमेल बनाए रखते हुए भाजपा की सभी प्रदेश ईकाइयों को नया जोश देना।

गडकरी के जरिए संघ, भाजपा पर नियंत्रण रखना चाहता है। हालाँकि बदलती परिस्थितियों में यह कितना कारगर होगा, यह कहना कठिन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अपनी पसंद के नितिन गडकरी को बीजेपी में ले तो आये हैं, वे अभी तक राज्य स्तर के नेता रहे हैं लेकिन देश के मुख्य विपक्षी दल का अध्यक्ष होने की पात्रता उनमें कितनी है, यह अभी रहस्य बना हुआ है। अगर वे असफल होते हैं तो यह संघ नेतृत्व की असफलता कही जाएगी और ये आरोप लगेगा कि संघ के महाराष्ट्रीय ब्राह्मण नेतृत्व ने एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण को पार्टी पर भी थोप दिया।

भाजपा इस समय एक ऐसी पार्टी बन चुकी है जिसे अपनी दिशा मालूम नहीं और दो लोकसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि हिन्दुत्व की लाइन पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुई है। आम जनता हिन्दुत्व की राजनीति की निरर्थकता को समझ चुकी है और अब इससे निकलना चाहती है। लोग शायद अब जातिवाद की राजनीति से भी ऊब चुके हैं और उससे भी बाहर आने का रास्ता तलाशाना चाहते हैं। भाजपा विकास से ज़्यादा धर्म के एजेंडे पर ध्यान देती आई है लेकिन देश का आम आदमी अब जागरुक हो चुका है। लोग देश का विकास, शिक्षा और रोजगार चाहते हैं। बढ़ती महंगाई और रोज़गार के घटते अवसरों के बीच लोग समझ चुके हैं कि धर्म से पेट नहीं भरता। खराब बुनियाद पर बने घर,साम्प्रदायिक और धार्मिक नीति की बुनियाद पर बने राष्ट्र और साम्प्रदायिक और धार्मिक सोच से चलती पार्टी का अस्तित्व बहुत दिनों तक नहीं कायम नहीं रहता है ।

भाजपा के दो प्रमुख पदों पर परिवर्तन से कुछ होने वाला नहीं है. पार्टी तभी मजबूत होगी जब पार्टी का एजेंडा बदला जाए ।  मुखौटा बदलने की बजाए भाजपा को विचारधारा बदलने की आवश्यकता है । अब तक तीन वैचारिक लाइन ली हैं । गांधीवादी समाजवाद. इसे 1985 में छोड़ा और एकात्मक मानववाद को अपनाया । 1987 से वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लाइन पर है । इसने भाजपा को अयोध्या आंदोलन में एक भूमिका दी । लेकिन भाजपा की समस्या इसी से शुरू होती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वो ऐसे ठोस नारे में नहीं बदल सकी है जो लोगों के गले उतरे । इसके लिए जिस तरह की सैद्धांतिक समझ और चारित्रिक दृढ़ता चाहिए वो आज ना भाजपा में है ना ही संघ में । सतही सत्ता के खेल में उलझी भाजपा का वैचारिक द्वंद उस समय बेक़ाबू हो गया जब वह चुनाव में हारने लगी । भाजपा की अनेक धाराएँ हो गई हैं । खुलकर बहस की गुंजाइश ख़त्म है । असहमति को वहाँ विरोध समझ लिया जाता है, गिरोहबंदी में फंसी भाजपा को संघ का हंटर कितना सुधार सकेगा?

बीजेपी को पटरी पर लाने के लिये गडकरी को चाँडाल चौकड़ी से छुटकारा पाना होगा । उन्होंने सेतुबन्ध बनाकर कई दुर्गम राहों पर सफ़र आसान बनाने की योजनाओं को सफ़लता से साकार किया है । विकास की राजनीति वक्त की ज़रुरत है लेकिन गडकरी को समझना होगा कि जर्जर बुनियाद पर मज़बूत इमारतें खड़ी करना नामुमकिन होता है । इमारत की बुलंदी काफ़ी हद तक बुनियाद की मज़बूती पर निर्भर करती है । ज़ाहिर बात है कि विकास के इतिहास में विध्वंस की कहानी भी दर्ज़ होती है । कई मर्तबा पुख्ता ज़मीन तैयार करने के लिये डायनामाइट लगाना ज़रुरी हो जाता है । बीजेपी के लाइलाज मर्ज़ से निपटने के लिये गडकरी को सर्जरी की दरकार होगी । कुशल डॉक्टर जानता है कि जीवन सुरक्षित रहे तो अंगदान करने वालों की कमी नहीं रहती ।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

राजनीति के अखाड़े में "मैच फ़िक्सिंग"

भोपाल नगर निगम में तीसरी पारी खेलने का सपना देख रही काँग्रेस ने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है । दर असल बाबूलाल गौर और कृष्णा गौर को मतदाताओं का शुक्रिया अदा करने से पहले काँग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी का भी एहसानमंद होना चाहिए, जिन्होंने गुमनाम चेहरे को टिकट देकर ससुर-बहू की "अलबेली जोड़ी" का ख्वाब पूरा करने में अप्रत्यक्ष तौर पर भरपूर मदद की । वरना बीजेपी के दिग्गजों और खुद मुख्यमंत्री ने गौर के बरसो से सँजोये ख्वाब को चकनाचूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी ।

भोपाल में बीजेपी की जीत का सेहरा काँग्रेस के सिर ही बाँधा जाना ठीक रहेगा । कृष्णा गौर को काँटे की टक्कर के बाद मिली जीत ने कई नये सवालों को जन्म दे दिया है । ये जीत "अँधों के हाथी" से कम नहीं । राजनीतिक विश्लेषक इसमें कई एंगल तलाश सकते हैं । संगठन और सत्ता की ताकत के बावजूद पार्टी को महापौर का चुनाव जीतने में पसीना आ गया। पार्टी का गढ़ माने जाने वाले विधानसभा क्षेत्रों में न केवल कांग्रेस ने सेंध लगाई बल्कि अपना वोट बढ़ाकर आखिरी तक भाजपा को साँसत में भी रखा। भाजपा नेताओं द्वारा बढ़त को लेकर किए गए दावे फेल हो गए।

इस सीट पर पूरे प्रदेश की निगाह लगी हुई थी। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हुए पार्टी ने तमाम अंतर्विरोध के बावजूद सामान्य महिला सीट पर पिछड़े वर्ग की कृष्णा गौर को मैदान में उतारा और स्थिति को अपने अनुकूल बनाने के प्रयास किए। हालाँकि गौर ने काँग्रेस उम्मीदवार आभा सिंह को काँटे की टक्कर में 15 हजार से अधिक मतों से हराकर प्रतिष्ठित महापौर सीट काँग्रेस से छीन ली । लेकिन वोटों का अँतर और काँग्रेस को मिले मतों की संख्या पर गौर करें, तो ये आँकड़े जीत के पीछे छिपी करारी शिकस्त की चुगली करते हैं । भाजपा प्रत्याशी कृष्णा गौर को 2 लाख 62 हजार 214 मत मिले, जबकि आभा सिंह को कुल 2 लाख 46 हजार 893 वोट हासिल हुए । यानी उन्होंने काँग्रेस उम्मीदवार आभा अखिलेश सिंह को 15 हजार 321 मतों से मात दी।

गौर करने वाली बात यह है कि भोपाल के सात विधान सभा क्षेत्रों में से छह पर बीजेपी का कब्ज़ा है । साथ ही लोकसभा सीट भी बीजेपी के ही पास है । इस तरह कहा जा सकता है कि फ़िलवक्त भोपाल पूरी तरह भगवा रंग में रंगा हुआ है । बाबूलाल गौर लम्बे समय से "जनता दरबार" सजाकर राजधानी के स्वयंभू नवाब बने बैठे हैं । आये दिन बहू को साथ लेकर भोपाल की नालियों और गली-कूचों का निरीक्षण करना उनका खास शगल रहा है । सरकारी और गैर कार्यक्रमों में शिरकत, भूमि पूजन, गेंती-फ़ावड़ा चलाते हुए फ़ोटो सेशन करा कर अखबारों में कमोबेश हर रोज़ जगह पाने वाली कृष्णा ने शहर के होर्डिंग्स और दीवारों पर भी पिछले चार साल से स्थायी कब्ज़ा जमा रखा था । इतने जानेमाने चेहरे का मुकाबला एक गुमनाम प्रतिद्वंद्वी से होने के बावजूद हार-जीत का फ़ासला महज़ सवा पंद्रह हज़ार वोट ...?

यहाँ यह जान लेना बेहद ज़रुरी हो जाता है कि शहर में कई मतदान केन्द्रों की मतपेटियों को लेकर रवाना हुए ट्रक ने दस मिनट के रास्ते को तय करने में पूरे साढ़े सात घंटे लगाये । साथ ही एक मतपेटी में कुल मतदाताओं की तादाद से भी ज़्यादा वोट पाये गये । आखिरी दो घंटों में जमकर वोटिंग की खबरें हैं । इस वोटिंग की खासियत यह रही कि मतदाताओं को अपनी पहचान बताने के लिये किसी दस्तावेज़ की ज़रुरत ही नहीं थी । खुले आम धाँधली और सरकारी मशीनरी के दुरपयोग के बीच जीत का मामूली अंतर बीजेपी और खास तौर पर बाबूलाल गौर के मुँह पर करारा तमाचा है । यहाँ आभा सिंह के प्रदर्शन की सराहना करना लाज़मी है,लेकिन ये समझना होगा कि काँग्रेस को मिला वोट वास्तव में बीजेपी, बाबूलाल गौर और कृष्णा गौर की खिलाफ़त का वोट है । यह नतीजे के पीछे का सच कहता है कि भोपाल की जनता ने कृष्णा गौर को बुरी तरह नकार दिया है । लेकिन लोकतंत्र में वोटों की तादाद ही असली ताकत है । इससे कोई मतलब नहीं कि आखिर ये वोट मतपेटी में आये किस तरह और डाले किसने ? लिहाज़ा कृष्णा गौर भोपाल की महापौर हैं ।

इतना ज़रुर तय है कि नगरीय प्रशासन विभाग ससुर के पास और भोपाल का मेयर पद बहू के पास हो और दोनों की जुगलबंदी का तमाशा जनता पिछले चार सालों से मुँह बाये देखने को बेबस हो , तो भोपाल के दुर्भाग्य पर अफ़सोस जताने के सिवाय कुछ बाकी नहीं रहता । भूमाफ़िया और बिल्डरों की दुलारी ससुर-बहू की जोड़ी की जुगलबंदी को वक्त रहते नहीं तोड़ा गया,तो वो दिन दूर नहीं जब भोपाल की झील पर बड़ी-बड़ी कोठियाँ बन जायेंगी और पेरिस की जगमगाहट भोपाल में लाने के लिये झील में बड़ा भारी मॉल खड़ा कर दिया जायेगा । राज्य सरकार को नैतिक आधार पर बाबूलाल गौर से नगरीय प्रशासन विभाग लेकर उन्हें कोई और महत्वपूर्ण दायित्व सौंप देना चाहिए । वैसे भी अब तक वे भोपाल के अलावा प्रदेश का कोई और हिस्सा देख ही नहीं पाये हैं ।

प्रदेश में जब से काँग्रेस का मुखिया बदला है,तब से राजनीति का एक नया चेहरा सामने आया है । अब मतदाताओं के पास जाने से पहले प्रतिद्वंद्वी पार्टी के साथ मिलकर "दोस्ताना मुकाबला" करने का चलन शुरु हो गया है । भोपाल में कृष्णा के खिलाफ़ उतारे गये उम्मीदवार का चयन इसी चलन की एक और बानगी है । इससे पहले सुषमा स्वराज के खिलाफ़ विदिशा में राजकुमार पटेल की कारगुज़ारी किसी से छिपी नहीं है । मतदाता इस ठगी से हैरान और परेशान है , लेकिन वो समझ नहीं पा रहा कि राजनीति के इन धूर्तों से कैसे निपटा जाये ? राजनीति में योग्यता की बजाय धन की बढ़ती ताकत के चलते काँग्रेस के दिग्गज नेता जनाधार की बजाय "धनाधार" बढ़ाने में जुट गये हैं । अब तक पार्टी के भीतर ही टिकटों की खरीद-फ़रोख्त हुआ करती थी, लेकिन अब एक घाघ खरीददार ने दिन में देखे सपने को साकार करने के लिये विपक्षी दल से हर कीमत पर सौदा कर लिया । राजनीति का यह नया "ट्रेंड" आने वाले वक्त में क्या गुल खिलायेगा ? वोटर इस दोस्ताना मुकाबलों से कैसे निजात पा सकेगा ? क्रिकेट के बाद राजनीति के अखाड़े में मैच फ़िक्सिंग का बढ़ता चलन लोकतंत्र को किस दिशा में ले जायेगा, यह तो आने वाले वक्त में ही साफ़ हो सकेगा ।