खींचों ना तलवार ना कमान निकालो
जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो ।
संभवतः ऎसा ही कोई शेर है ,जो पत्रकारों को नैतिकता के साथ व्यवस्था के गुण दोष सामने लाने का हौंसला और जज़्बा देता है । पत्रकारिता आज़ादी के पहले तक , बल्कि आज़ादी के कुछ साल बाद तक

भोपाल से निकलने वाले एक अखबार ने नए साल में पत्रकारिता के नए मानदंड स्थापित किए हैं । अपनी तरह का शायद ये पहला और शर्मनाक
मामला होगा । अपने आपको समाज का हित चिंतक बताने वाले इस अखबार ने दो जनवरी को एक समाचार दिया और फ़िर चार जनवरी को इसी समाचार पर U टर्न मार लिया । संभव है कि आने वाले सालों में पत्रकारिता जगत में आने वाले छात्र इसे कोर्स की किताबों में भी पाएं। कहानी पूरी फ़िल्मी है । आप ही तय करें ये सच है या वो सच था .........
दो जनवरी को प्रकाशित




5 टिप्पणियां:
खरीबात और सत्य कहने के साहस के लिए साधुवाद
अब पत्रकारिता मिशन नहीं रहा। अब यह व्यवसाय का रूप धारण कर चुकी है। कुछ उदाहरण स्वरूप घटनाओं को छोड़ दे तो आज की पत्रकारिता भी ईमानदार है। जो मामले आपने सामने लाया है वह सराहनीय है।
आपने सही लिखा है सरिता जी। आपके मुद्दे अच्छे होते हैं और आप उनपर सटीक लिखती हैं। मैंने आपको वैबदुनिया में भी पढ़ा है। भोपाल में किस अखबार या पत्रिका में रहकर पत्रकारिता कर रही हैं आप.....????
na jaane kya maajra hai
आपने सचमुच में दर्पण दिखा दिया।
1977 के लोकसभा चुनावों के बाद, पत्रकारों के एक समूह को सम्बोधित करते हुए, देश के तत्कालीन सूचना प्रसारण मन्त्री लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था - 'आपसे झुकने के लिए कहा गया था लेकिन आप रेंगने लगे।'
लगता है, आडवाणी की बात आज ज्यादा प्रभाव से सच सबित हो रही है।
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