गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

करवा चौथ के बहाने -१


मेरी पिछली पोस्ट करवा चौथ के बहाने पर मिलीं प्रतिक्रियाओं के मद्देनज़र चाहे अनचाहे महिला मुद्दे पर बात करना ज़रुरी लगने लगा इस पोस्ट को पढने के बाद कई लोगों ने मुझे जमकर लानत भेजी साथ ही ये भी हिदायत दे डाली कि परंपराओं का मज़ाक बनाना अच्छा बात नहीं किसी की आस्थाओं को चोट पहुंचाना मेरा मकसद बिलकुल नहीं था वैसे भी मैंने आलेख में ऎसी कोई गैर वाजिब बात कही भी नहीं सिर्फ़ वही लिखा ,जो दिखा बल्कि समाज के अलग - अलग वर्गों में औरतों की हालिया स्थिति को एक साथ रखने की छोटी सी कोशिश की
मेरा अब भी यही मानना है कि परंपराओं को त्यागने की नहीं , समय के मुताबिक ज़रुरी तब्दीली की ज़रुरत है देश के जिन प्रांतों में करवा चौथ और हरतालिका तीज का सबसे ज़्यादा महिमा मंडन है ,उन्हीं इलाकों की कडवी हकीकत ये भी है कि वहां महिलाओं के प्रति नज़रिया अब भी मध्ययुगीन ही है कन्या भ्रूण हत्या , बलात्कार , दहेज हत्या , अपहरण , छेड्छाड , मानसिक और शारीरिक उत्पीडन , और भी कई अनाम तरह की हिंसा का सबसे अधिक प्रतिशत वाला इलाका साल में दो बार महिलाओं को देवी का दर्ज़ा देकर पूजता है , लेकिन साल के बाकी दिन महिलाओं के अस्तित्व को नकारता नज़र आता है।
मैं कभी महिला स्वातंत्र्य की हिमायती नहीं रही आज़ादी किससे और क्यों ? मेरी राय में जब भी हम आज़ादी की बात कहते हैं तो कहीं ना कहीं इस मान्यता की पुष्टि करते हैं कि महिलाओं का मालिक पुरुष है दरअसल किसी और को दोषी करार देने या आज़ादी के लिए गिडगिडाने की बजाय महिलाओं को अपने अस्तित्व को भीतर तक जानने की ज़रुरत है किसी शायर ने क्या खूब कहा है ---
मैं इक उम्र के बाद खुद को समझा हूं ,
रुकूं तो किनारा , बहूं तो दरिया हूं
कई महिला पत्रिकाओं और अखबारों में महिला पाठकों के लिए परोसे जा रहे मसौदों पर भी मुझे सख्त एतराज़ है कब तक औरतें बनाव - श्रंगार , बुनाई - कढाई या सास - ननद के किस्सों में उलझी रहेंगी महिलाओं का एक समूह स्त्री विमर्श के नाम पर महिलाओं के नैसर्गिक गुणों पर अजीबोगरीब चर्चा कर खुद को धन्य मान बैठा है वहीं दूसरा बडा तबका सदियों से चली रही परंपराओं के निर्वहन में ही अपने जीवन की सार्थकता तलाश रहा है महिलाओं की तरक्की का रास्ता इन दोनों भूलभुलैयाओं के बीच से होकर गुज़रता है उम्मीद है पति, पिता ,भाई और बेटों की सलामती और तरक्की के लिए भूख प्यास भूलकर कठिन व्रत करने वाली भारत की नारी अपने अस्तित्व को पहचानने के लिए जल्द ही कोई रास्ता ढूंढ निकालेगी
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