मंगलवार, 21 अक्तूबर 2008

अकेले राज ही तो कसूरवार नहीं ..........

आखिरकर राज की गिरफ़्तारी को लेकर चल रही कश्मकश का फ़िलहाल तो खात्मा हो गया लगता है । गैर मराठियों को महाराष्ट्र के रंग में रंगने की चाहत के साथ सियासी जंग में किस्मत आज़माने निकले राज ठाकरे की राजनीतिक हैसियत बढाने में मीडिया , कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का खास रोल है । अपने सियासी नफ़े नुकसान को मद्देनज़र रखकर इन द्लों ने बयानबाज़ी की । राज्य सरकार ने शुतुरमुर्गी रवैया अख्तियार कर मामले को हवा दी । शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत को हासिल करने के लिए शुरु हुई वर्चस्व की लडाई को दूसरे द्लों ने अपने - अपने फ़ायदे के लिए तूल दिया । हालांकि यह पहली बार नहीं है कि मुंबई में बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगों को ऐसे हालात का सामना करना पडा हो । इससे पहले शिवसेना ऐसा कहती और बहुत कुछ करती रही है ।देश की वाणिज्यिक राजधानी की जीवनशैली पश्चिमी जीवनशैली के खुलेपन से ख़ासी प्रभावित है । इस शहर में ऐसा कौन सा प्रदेश है जहाँ के लोग न रह रहे हों और इसे अपना शहर न मानते हों । यह और बात है कि बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगों की संख्या बाक़ी प्रदेश के लोगों से कुछ ज़्यादा है । इस बात से न शिवसेना इनकार कर सकती है और न महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना कि मुंबई की कई ऐसी मूलभूत सेवाएँ हैं जो इन्हीं बिहार और उत्तरप्रदेश से आए लोगों के भरोसे चलती हैं । निश्चित तौर पर बाल ठाकरे और राज ठाकरे इस आबादी को अपने वोट बैंक का हिस्सा नहीं मानते और उन्हें यह डर सताता रहता है कि कहीं इस आबादी की अपनी राजनीति मुंबई में इतनी हावी न हो जाए कि वे ही दरकिनार कर दिए जाएँ । आश्चर्य होता है कि उसी प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे दूसरे राजनीतिक दल भी इस तरह की राजनीति का वैसा विरोध नहीं करते जैसा कि राष्ट्रीय पार्टी को करना चाहिए । विरोध का स्वर उठाने वाले लालू यादव , मुलायम सिंह और नीतिश कुमार जैसे नेता हैं , जो खुद सवालों के घेरे में हैं । केवल दिखावे के लिए विरोध करने वाले इन नेताओं ने क्या कभी ईमानदारी से सोचा कि बिहार और उत्तरप्रदेश के ही लोगों को इतनी बड़ी संख्या में क्यों पलायन करके मुंबई जाना पड़ता है । क्यों उन्हें जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों की विषम परिस्थितियों में जीते हुए जान जोख़िम में डालकर रहना पड़ता है । क्या कभी इस तरह की राजनीति करने वालों ने विचार किया है कि जम्मू-कश्मीर और बस्तर के अबूझमाड़ जैसे सघन आदिवासी इलाके में देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले नागरिकों के लिए नियम क़ायदे कुछ अलग हैं , लेकिन वे फिर भी वैसे नहीं हैं जिसका पाठ ये दोनों दल मिलकर पढ़ाना चाहते हैं । गनीमत है कि ब्रिटेन में अभी ठाकरे जैसे राजनीतिज्ञ नहीं हैं जो दीवाली और लोहड़ी मनाने वाले भारतीयों को वापस भारत भेजने की बात कहें या अमरीका में कोई फ़तवा जारी नहीं कर रहा है कि नियमित रुप से चर्च न जाने वाले भारतीय सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों के वीज़ा रद्द कर दिए जाएँ । बिहार और उत्तर प्रदेश से लाखों लोग आजीविका की तलाश में पलायन कर गए हैं । भारत के नागरिकों को मिले मूलभूत अधिकारों का हिस्सा है कि वह देश के किसी भी हिस्से में जाए वहाँ रहें रोज़गार तलाश करे और ज़मीन जायदाद ख़रीदकर वहाँ बस जाएं । तो ये कौन लोग हैं जो आज़ादी के इकसठ साल और संविधान लागू होने के ५९ साल बाद नागरिकों से उनके मूलभूत अधिकार छीनने की धमकी दे रहे हैं । कौन दे रहा है उन्हें यह अधिकार ....? उन्हें क्या हक़ पहुँचता है कि वे महाराष्ट्र के भीतर अपना राष्ट्र स्थापित करने की कोशिश करें ? कभी श्रीनगर में गिलानी ग़ैर-कश्मीरियों को निकालने की बात करते हैं और कभी असम में हिंदीभाषी लोगों को मार दिया जाता है । अगर किसी को अपने गाँव अपने शहर और अपने राज्य में रोज़गार के पर्याप्त और अच्छे अवसर मिलेंगे तो कोई क्यों इस तरह अपमानित होने और अपनी जान से हाथ धोने जाएगा ।भारत के कुछ राज्यों में उठने वाले ये सवाल जटिल नहीं हैं और न उनके जवाब कठिन हैं लेकिन इस पूरे मसले को राजनीति और वोट बैंक से अलग होकर देखना होगा जिसकी गुंजाइश फिलहाल भारतीय राजनीति में थोड़ी कम नज़र आती है । चुनावों में बिहार का पलायन कोई मुद्दा ही नहीं बनता । किस्तों में विस्थापित हो रहे इन लोगों की न तो बिहार के चुनाव में कोई सीधी भागीदारी है और न ही वहां के नेताओं को उनकी फ़िक्र । मुम्बई के अलावा दिल्ली और कोलकाता के साथ ही पंजाब और हरियाणा में भी बड़ी संख्या में बिहारी रोज़ी रोटी की तलाश में जा बसे हैं । वे रिक्शा चलाने और खोमचे-ठेले पर सब्जियां बेचने से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों तक में छाए हुए हैं । आँकड़े गवाही दे रहे हैं कि दस से पंद्रह सालों में पलायन बढ़ा है। । वैसे १९७० के दशक में पंजाब और हरियाणा में हरित क्रांति के दौर में बिहार , उत्तर प्रदेश , उड़ीसा और मध्यप्रदेश से जमकर पलायन हुआ । इनमें भी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग ज्यादा थे । वजह ये सस्ते खेतिहर मजदूर थे । बाद के दशकों में हसीन सपने लेकर दिल्ली और मुंबई जाने वाले युवकों की संख्या बढ़ गई । बेशक इनमें से कई ऊंचों पदों पर बैठे हैं । लेकिन ऊंचे सपने लेकर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर की राह पकड़ने वाले न जाने कितने लोग बिहारी और भइया बनकर रह गए । बरसों पहले बिहार से बाहर जा बसे लोग मानते हैं कि बिहार की बदहाली ने लोगों को बाहर निकलने के लिए मजबूर कर दिया । अनुमान के मुताबिक हर साल बिहार से दो से तीन लाख लोग रोजी रोटी की तलाश में बिहार से बाहर चले जाते हैं । आंकडों की ज़बान का यकीन करें तो अभी कम से कम एक करोड़ बिहारी बिहार से बाहर हैं । यह आंकड़े नहीं महत्वपूर्ण सूचनाएँ हैं कि बिहार देश का सबसे पिछड़ा राज्य है । वहां प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है ४२।३ फ़ीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं । लेकिन क्या बिहार के राजनीतिक क्या इन आँकड़ों को सुन-पढ़ रहे हैं । राज ठाकरे को कोसने की बजाय उस मुद्दे पर गौर किया जाए , जो बिहार के लोगों को सतरंगी सपने पूरे करने के लिए नहीं महज़ दो वक्त की रोटी की जुगाड में अपना घरबार छोडकर बाहर निकलने पर मजबूर करता है ।
हैरत की बात है कि वहां जी रहे थे लोग
गो शहर में कहीं भी हवा का गुज़र न था ।
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