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सोमवार, 20 जून 2011

कलम के सिपाही गोली के शिकार

पत्रकारिता हमेशा से जोखिम भरा काम रहा है, लेकिन इस खतरे में वैश्विक तौर पर लगातार इजाफा हो रहा है। जनहित और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले इन खतरों से बखूबी वाकिफ़ हैं। पूँजीवाद के दौर में कलम के सिपाहियों को माफ़ियाओं के साथ ही सत्ता के नशे में चूर राजनीतिज्ञों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है । आज खबर लेना और खबर देना दोनों खतरे में हैं। पत्रकारों पर बढ़ रहे ऐसे हमलों से प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती जा रही है। इस समय पत्रकारों को सरकार और गैर कानूनी काम करने वालों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। मुंबई में अँग्रेजी अखबार "मिड डे" के क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या और बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली के कपिल शर्मा का मामला ताजातरीन मिसाल है।

अभी पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शाहजाद की हत्या का पखवाड़ा भी नहीं बीता था कि मुम्बई में क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या कर दी गई। शहजाद जिस तरह आईएसआई और कट्टरपंथी तबकों की बखिया उधेड़ रहे थे। उसी तरह ज्योतिर्मय डे भी मुंबई की माफिया जमात पर अपनी खोजी रिपोर्टिंग से लगातार खतरे खड़े कर रहे थे। अपने साथियों के बीच "जेडे" के नाम से मशहूर क्राइम रिपोर्टर,बीते कुछ महीनों से डीजल माफिया के खिलाफ धारावाहिक खोज रिपोर्टों के जरिए अभियान चला रहे थे।मुम्बई में अंडरवर्ल्ड पर कई रिपोर्ट लिखने वाले जेडे की मोटरसाइकिल सवार चार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पहले बीते साल 20 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह घर लौट रहे थे। इस साल 23 जनवरी को नईदुनिया के पत्रकार उमेश राजपूत की मोटरसाइकिल सवार नकाबपोशों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

दूसरी तरफ़ हकीकत सामने लाने का साहस दिखाने वाले नामानिगारों को सबक सिखाने के लिये सरकारों के पास तमाम हथकंडे हैं। 11 और 12 जून 2011 की दरम्यिनी रात बिजनेस स्टैंडर्ड के पत्रकार कपिल शर्मा को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेकर प्रताड़ित करने का मामला भी सामने आया। इसी तरह 26/11 हमले में जब्त हथियार खुले में रखे होने के मामले को सामने लाने वाले मुम्बई के पत्रकार ताराकांत द्विवेदी को सरकारी गोपनीयता कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया । अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता उल्लंघन के मामलों पर निगरानी रखने वाले 'द फ्री स्पीच ट्रैकर' के अनुसार,देश में पत्रकारों पर हमले की वारदात तेज़ी से बढ़ रही हैं। सम्पादकों और लेखकों को लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। संगठन ने पत्रकारों पर हुए 14 हमलों का हवाला देते हुए कहा है कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में है ।

माफिया से टकराने की कीमत जेडे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनकी हत्या पेट्रोलियम माफिया ने की या किसी अंडरवर्ल्ड गिरोह ने या फिर उसके पीछे किसी नौकरशाह अथवा नेता का हाथ है। इस पर फ़िलहाल कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन मामले की जाँच में सामने आये तथ्य जेडे के खुलासों से माफिया जगत में मची खलबली की पुष्टि करते हैं। उन्हें मिल रही धमकियाँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। डीजल माफिया की शासन-प्रशासन से साँठ-गाँठ अब जगज़ाहिर है। कुछ लोग तो सप्रमाण कहते हैं कि छुटभैये नेता डीजल माफिया के पेरोल पर होते हैं । अपने कारोबार में आड़े आने वाले सरकारी मुलाज़िमों को रास्ते से हटाने में भी इन्हें कोई गुरेज़ नहीं होता।

जेडे तीसरे भारतीय पत्रकार थे, जिनकी पिछले छह माह में हत्या की गई। इन सभी मामलों में जाँच जारी है, लेकिन कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं आये हैं। पत्रकारों की हत्या के मामले तो सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन गुत्थियाँ अनसुलझी ही रह जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्था की ओर से बनाए गए ‘माफी सूचकांक 2011’ के अनुसार पत्रकारों की हत्या की गुत्थी न सुलझा सकने वाले देशों में भारत 13वें स्थान पर है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 10वें और बांगलादेश 11वें स्थान पर है। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (सीपीजे) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सात अनसुलझे मामलों के साथ 13वें स्थान पर है। एक साल में पूरी दुनिया में होने वाले कार्य संबंधी हत्याओं में 70 प्रतिशत मामले पत्रकारों के हैं। सूचकांक में पत्रकारों की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों का प्रतिशत जनसंख्या के अनुपात में निकाला गया है। यहाँ ऐसे मामलों को अनसुलझा माना गया है, जिसमें अभी तक कोई आरोपी पकड़ा नहीं गया है। फ़ेहरिस्त में इराक पहले स्थान पर है। वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों और खतरनाक अभियानों के दौरान बहुत ज्यादा संख्या में पत्रकारों की हत्या हुई है। इराक में 92 मामले अभी तक अनसुलझे हैं,जबकि फिलीपींस में इनकी संख्या 56 है। इसके बाद श्रीलंका और कोलंबिया का स्थान आता है।

दरअसल,विश्व भर में पत्रकारों की हत्याओं का सिलसिला किसी भी साल थमा नहीं है। भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अभिव्यक्ति के सिद्धांत पर अमल करते हुए पूरी दुनिया में हर साल सैकड़ों पत्रकार जान देते हैं।जेडे और शाहजाद इस मुहिम में अकेले नहीं रहे। संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक,वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2009 तक दुनिया में सच को आवाज़ देने की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए 247 पत्रकार कुर्बान हो गये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुहिम को कलम के माध्यम से आगे बढ़ाते हुए इस दौरान भारत में छह पत्रकार बलिदान हुए। यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन वर्षों में पत्रकारों की हत्या के मामलों से स्पष्ट है कि मीडिया से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं ।

ऐसा नहीं कि सिर्फ यूनेस्को ही ऐसी रिपोर्ट पेश कर रहा है। "विदाउट बॉर्डर्स" की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2010 में काम के दौरान 57 पत्रकार मारे गए। यह संख्या 2009 के 77 पत्रकारों की तुलना में कम है लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह है कि 2010 में 51 पत्रकारों को बंधक बनाया गया जो पिछले दो सालों की संख्या से कहीं ज्यादा है। "विदाउट बॉर्डर्स" के महासचिव जाँ फ्रांसोआ जूलियर्ड ने कहा भी कि पत्रकारों का बढ़ता अपहरण साबित करता है कि उनकी निष्पक्षता और काम का आदर अब नहीं किया जाता। उन्हें भी सत्ता का एक अंग समझा जाता है और अकसर उनका अपहरण सत्ता से कोई माँग पूरी करने के एवज में किया जाता है। पत्रकारों की हत्याओं ने इस सच्चाई से हमें रूबरू करा दिया है कि आर्थिक तरक्की और देश में एक लोकतांत्रिक सरकार के होते हुए भी पत्रकारों के लिए सुरक्षित जगह सिकुड़ती जा रही है। विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में भले ही अफगानिस्तान और नाइजीरिया को पत्रकारों के लिए सबसे असुरक्षित माना गया हो लेकिन भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं। फरवरी 2010 में जारी इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ने तो पत्रकारों के लिए दुनिया में सबसे खतरनाक जगह के रूप में भारत का स्थान मेक्सिको और फिलीपींस के साथ तीसरे नंबर पर रखा है।

जेडे हत्याकांड ने समाज में चलने वाली साजिशों,भ्रष्टाचार और गैरकानूनी धंधों को उजागर करने वाले पत्रकारों के लिए बढ़ते खतरे को एक बार फिर उजागर किया है। ये घटनाएँ यह बताती हैं कि किसी भी ताकतवर संस्था, व्यक्ति या गिरोह के कारनामों को जनता के सामने लाना कितना जोखिम भरा होता जा रहा है। सरकार एक तरफ "व्हिसल ब्लोअर बिल" लाकर गड़बड़ियों को सामने लाने वाले लोगों को संरक्षण देने की बात कर रही है और दूसरी तरफ पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे पत्रकारों को संरक्षण देने में नाकाम रही है। हत्यारों का मनोबल इसलिए बढ़ता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं। अगर इनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो पत्रकार ऐसे भ्रष्ट तत्वों का ‘आसान निशाना’ बने रहेंगे। सत्ता पक्ष मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहता है, इसलिए वह हमें भ्रष्ट भी कर रहा है।

चैनलों और समाचारपत्रों में ठेके की नौकरियों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। मीडिया हाउसों में श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, पर सरकार खामोशी से तमाशा देख रही है। दरअसल सरकारी तंत्र अपने काले कारनामों को छिपाने के लिये पत्रकारों को खरीदने या डराने का उपक्रम करता रहता है । सरकार खुद भी चाहती है कि पत्रकार असुरक्षित रहें, ताकि वे सत्ता के खिलाफ अपनी कलम नहीं चला सकें। वे नौकरी जाने की आशंका में अपना साहस और आत्मविश्वास खो दें। रोज़ी-रोटी के सवाल पर वे भीरू हो जाएं और अपना पैनापन खो बैठें। आर्थिक संकटों से जूझते खबरनवीसों का सत्ता पक्ष आज अपने लिए बेतरह इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल उठता है कि आखिर क्या कदम शासन उठाए कि कार्यरत पत्रकारों को अपेक्षित सुरक्षा उपलब्ध हो। पहला तो यही कि भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों में संशोधन किया जाये। पत्रकारों पर हमले को संज्ञेय और गैरजमानती अपराध करार दिया जाए। इससे कुछ तो बचाव होगा। कुछ लोग मुद्दा उठा सकते हैं कि ऐसी सहायता हर भारतीय नागरिक को मिले, केवल कार्यरत पत्रकारों को ही क्यों? यहाँ यह समझना होगा कि सीमा पर तैनात सैनिक की तरह ही पत्रकारों का काम भी खतरे भरा है, जहां हमले की आशंका निरन्तर है। आखिर पत्रकार जनसेवा में कार्यशील हैं। राष्ट्रहित और समाज को जागरुक करने में पत्रकार का योगदान किसी भी नज़रिये से सुरक्षा बलों या जननायकों से कमतर नहीं है।

भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कानून बनाने का मामला पिछले कई सालों से लंबित पड़ा है। अधिवेशनों में पत्रकार कानून बनाने की माँग उठाते रहे हैं। पत्रकार संगठनों द्वारा धरना-प्रदर्शन किया जाता है। सरकारें जल्द से जल्द कानून बनाने का आश्वासन देती हैं। नेता पत्रकारों पर होनेवाले हमले पर कानून बनाने की बात करते हैं। इस घटना में भी सब कुछ ऐसा ही हुआ है। जेडे के मारे जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा देने की बात कही है। असली सवाल फिर भी रह जाता है। क्या यह हकीकत नहीं है कि पत्रकारों पर होने वाले हमले को लेकर सरकार खुद ही कानून नहीं बनाना चाहती है ?

शनिवार, 21 मई 2011

महँगाई से निपटने का एकमात्र हथियार-भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होने वाले आंदोलन अधिकतर भारतीयों की इसी सोच को साबित करते हैं कि देश में करप्शन दिनों-दिन बढ़ रहा है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी गैलप के मुताबिक वर्ष 2010 में करीब 47 फ़ीसदी लोगों ने माना कि 5 साल पहले की तुलना में भारत में करप्शन बढ़ा है,जबकि 27 प्रतिशत को घूसखोरी के पैटर्न में कोई तब्दीली नज़र नहीं आती। 78 प्रतिशत लोगों की राय में सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। वहीं 71 प्रतिशत लोगों का मानना है कि व्यापार जगत में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लोग भ्रष्टाचार को लेकर खुद को कितना असहाय महसूस कर रहे हैं और उनमें कैसी छटपटाहट है,इसकी एक मिसाल अप्रैल में दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन के दौरान देखने को मिली थी। हाल ही में जारी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की लड़ाई को मिले व्यापक जन समर्थन और इस तरह के आंदोलनों से भारतीयों की हताशा जाहिर होती है। रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादातर भारतीय इस समस्या की समाज में गहराई तक पैठ बनाने की सच्चाई को स्वीकार चुके हैं।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि बेरोज़गार और युवा तबका उम्मीदों के बोझ तले हालात के आगे घुटने टेकता दिखाई देता है। तकरीबन 65 प्रतिशत बेरोजगारों की राय में सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के ठोस कदम नहीं उठा रही है। सर्वे के अनुसार लोगों को नहीं लगता कि हालात सुधर रहे हैं और वे व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार से लड़ सकते हैं। सर्वे में 6 हज़ार वयस्कों से सीधे इंटरव्यू किया गया।

दूसरी तरफ़ वित्त और निवेश जगत की नामचीन हस्तियाँ कहने लगें कि भारत में शासन संबंधी स्थितियों को लेकर निराशा का माहौल बन गया है,तो ऎसे में देश की व्यवस्था संबंधी खामियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। मशहूर अमेरिकी फर्म जेपी मॉर्गन के एक प्रमुख अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह बेलाग कहा है कि आम तौर पर भारत को लेकर आज छवि नकारात्मक है और निवेशक अब हताश होने लगे हैं। उन्होंने यह बात विदेशी निवेशकों के संदर्भ में कही है,लेकिन भारत में लोगों की राय भी आज इससे बेहतर नहीं है।

सुरसा सा मुँह फ़ैलाती महँगाई की ओर से मुँह फ़ेर चुकी सरकारों को देखकर लगता है, मानो देश के औद्योगिक विकास के लिये देश में जान बूझकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया है। व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सबसे भ्रष्ट अफ़सरों की ज़बरदस्त पूछ है। सरकार की आवाज़ समझे जाने वाले महकमे में तो जैसे कलेक्शन सेंटर खोल दिया गया है। यथासमय दान-दक्षिणा पहुँचाने के एवज़ में लूटखसोट की खुली छूट दे दी गई है। देश के जाने माने शिक्षा संस्थान जहाँ मोटी फ़ीस लेकर पत्रकारिता की डिग्री देते हैं। वहीं इन सरकारी महकमों में ऎरे-गैरे नत्थू खैरे शुरुआती भेंट पूजा के साथ बाकायदा काम पा रहे हैं। आलम यह है कि असली पत्रकार धीरे-धीरे गायब हो चुके हैं। अब स्कूली शिक्षक, कपड़ा व्यापारी, अकाउंटेंट सरीखे लोगों का डंका बज रहा है। एक काँख में काँग्रेस और दूसरे में बीजेपी को दबाये घूमने, बड़े नेताओं को साधने और आला अफ़सरों को खरीदने का हुनर जानने वाले बरसों बरस एक ही जगह जमे रहकर मौज करते हैं और नियम कायदों पर चलने वालों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। वोट बैंक की खातिर समाज के आखिरी छोर पर खड़े लोगों को भी मुफ़्त बिजली,पानी,राशन,ज़मीन और मकान देकर खरीद लिया गया है।

अन्ना के अनशन से एक कारगर लोकपाल की स्थापना की उम्मीद बनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर जिस हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है, उसका क्या हल हो, इस सवाल पर आम लोग से लेकर विशेषज्ञ तक किंकर्तव्य्विमूढ़ हैं। इस असहायता से ही वह हताशा पैदा हो रही है, जिसका असर अब देश की विकास पर पड़ने लगा है। हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों पर न्यायपालिका ने जबरदस्त सख्ती से कई बड़े घोटालों की जाँच में चुस्ती आई है । नतीजतन कई धुरंधर सलाखों के पीछे हैं, मगर इससे आम आदमी का भरोसा लौटता नहीं दिख रहा है।

कहते हैं, जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। लिहाज़ा भ्रष्टाचार की हिस्सेदारी थोड़ी ही सही कमोबेश देश का हर नागरिक कर रहा है। कई मर्तबा लगता है मुफ़्तखोरी ने हमारे जेनेटिक कोड को ही खराब कर दिया है। ऎसे में सुधार की संभावनाएँ ना के बराबर हैं। सुनते हैं विध्वंस में ही सृजन छिपा है। विनाश में ही नई उम्मीद का बीज मौजूद है। कई भविष्यवक्ताओं ने आज २१ मई का दिन मुकर्रर किया था पृथ्वी के खात्मे के लिये, मगर शाम होने आई अब तक तो कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। भ्रष्टाचारियों की राह के रोड़े हम जैसे लोगों को अब अगली किसी तारीख का इंतज़ार करना होगा।

कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअययन है,नींद क्यों रात भर नहीं आती ।

रविवार, 21 सितंबर 2008

बाज़ार का गणित



तेज़ी से सफ़लता की पायदान लांघने का दावा करने वाला भोपाल का एक अखबार यूं तो हमेशा ही चर्चा में बना रहता है ,लेकिन इन दिनों एक खास तरह की खबर के लिए बहस का सबब बना हुआ है । भारतीय परंपराओं और शास्त्रों की नई व्याख्या के ज़रिए लोगों को बाज़ार की राह पकडने के लिए उकसाने के लिए अखबार ने पत्रकारिता के सभी मानदंडों को ताक पर
रख
दिया । उपभोक्तावाद
की तेज़ी से फ़ैलती पश्चिमी जीवन शैली को भारतीय जामा पहनाने के लिए अखबार ने पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों का भी जमकर मखौल उडाया है । देश में अखबार , रेडियो और विद्वानों के मत पर आज भी लोगों का पूरा भरोसा है । ऎसे लोगों की देश में कोई कमी नहीं है ,जो अखबार और ज्योतिष विद्वानों की कही बातों को ब्रह्म वाक्य से कम नहीं मानते हैं ।

कुछ दशक पहले तक बच्चे साइंस की किताब में पढते थे कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है लेकिन बदले दौर में ये जुमला उलट गया है । बाज़ार सामान से अटा पडा है और संचार माध्यमों ने उपभोक्ताओं को बाज़ार की ओर ठेलने का ज़िम्मा सम्हाल लिया है । सामाजिक सरोकारों से दूर हो चुकी पत्रकारिता बाज़ार के हाथॊ का खिलौना बन कर रह गई है । बाज़ार का अर्थशास्त्र लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के हर फ़ैसले में घुसपैठ कर चुका है ।

खैर , बात हो रही थी भरोसे की । तो आज सामाजिक सरोकारों से जुडी एक संस्था " दृष्टि " ने भोपाल में विचार गोष्ठी का आयोजन किया जिसके केन्द्र में था वो खबरनुमा इश्तेहार जो श्राद्ध
पक्ष में खरीददारी को शास्त्र सम्मत बताते हुए १६ दिनों में हर रोज़ अलग -अलग सामान खरीदने के शुभ मुहूर्त की जानकारी से भरा था ।


मज़े की बात ये है कि समाचार में जिन ज्योतिषाचार्य का हवाला दिया गया था वो ही कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे और जो खुलासा उन्होंने किया वह काफ़ी चौंकाने वाला था । उन्होंने दावा किया कि अखबार में उनके हवाले से छापी गई जानकारी का कोई आधार ही नहीं है ,क्योंकि समाचार पत्र ने इस बारे में उनसे कोई बात ही नहीं की । उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वे पितृ पक्ष में खरीददारी के हिमायती कतई नहीं है ।

सवाल ये है कि समाचार पत्र अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा वहां तक तो फ़िर भी माना जा सकता है कि व्यावसायिक मजबूरियां कई बार ऎसा करा देती हैं । पितृ पक्ष की परंपराओं को उचित ठहराना या उनको व्यवहार में लाना एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है , लेकिन किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के नाम का इस्तेमाल कर समाज में भ्रामक प्रचार करना कहां तक जायज़ है ? चिंता इस बात की भी है कि बाज़ार का गुणा - भाग कहीं लोगों की ज़िंदगी का गणित ना बिगाड दे ...।