आरएसएस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आरएसएस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 29 मई 2011

संघ-भाजपा के सितमों से आचार्य धर्मेन्द्र आगबबूला

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और आरएसएस को इन दिनों हिन्दुत्व के अलंबरदार और तेज़तर्रार विहिप नेता आचार्य धर्मेन्द्र का कोपभाजन बनना पड़ रहा है । गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के कब्ज़े से छुड़ाने के लिए सागर में करीब एक हफ़्ते का अनशन नाकाम होने से आचार्य बेहद बिफ़रे हुए हैं । दरअसल आचार्य धर्मेन्द्र पिछले रविवार को सागर में अनशन पर बैठे थे। पर सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और किसी नतीजे के पहले ही उन्हें छह दिन बाद गाय का दूध पीकर अपना आमरण अनशन खत्म करना पड़ा। अपनों के सितम से बेज़ार आचार्य संघ और भाजपा पर मतलबपरस्ती की तोहमत लगा रहे हैं।

बगैर कुछ हासिल किए मजबूरी में अनशन तोड़ने के बाद अब आचार्य धर्मेन्द्र भाजपा सरकार और आरएसएस को कोस रहे हैं। गुस्साये हिन्दूवादी नेता ने सरस्वती शिशु मंदिर पर तीखे प्रहार करते हुए संगठन को शिक्षा माफ़िया तक बता डाला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर विश्वासघात का आरोप लगाने वाले आचार्य धर्मेन्द्र की निगाह में संघ अब 'परिवार' नहीं रहा बल्कि 'तंत्र' बन गया है । संघ में भावना, समर्पण,त्याग व प्रेम की जगह धनलोलुपता का जोर बढ़ रहा है। उन्होंने आमरण अनशन के बेनतीजा समाप्त होने को अपनी पराजय न मानते हुए संघ पर लगा कभी न मिटने वाला कलंक बताया।

कहते हैं लोहा,लोहे को काटता है। लिहाज़ा प्रदेश सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी । इस घटनाक्रम से गौ और गंगा के नाम पर हिन्दुओं को भरमाने वाली भाजपा की इन मुद्दों पर गंभीरता का सहज ही अँदाज़ा लगाया जा सकता है। आचार्य धर्मेंद्र मानते हैं,इससे हिंदुत्व और गाय के लिए नारा लगाने वालों की असलियत सामने आ गई है। उनका अनशन जमीन के लिए नहीं,बल्कि गौ-माता के लिए था। उन्होंने कहा कि स्कूल द्वारा दबाई गई जमीन गौ सेवा संघ की है। भाजपा और आरएसएस की भूमिका से खफ़ा हिन्दू नेता इसे अपने जीवन का सबसे कड़वा अनुभव बता रहे हैं। अनशन की नाकामी से निराश आचार्य इसे संघ और भाजपा की हार करार देने से भी नहीं चूकते।

आचार्य धर्मेन्द्र के मुताबिक वे वर्ष 1980 से सागर के गौ सेवा संघ के संरक्षक हैं और आरएसएस से भी जुडे़ रहे हैं, लेकिन गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर संगठन के कब्जे से मुक्त कराने के मामले में संघ ने उनके साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि संघ का अनुषांगिक संगठन सरस्वती शिशु मंदिर छल, षड़यंत्रों व कुचक्रों का जाल बुनने वाला शिक्षा माफिया है। संघ के अनुषांगिक संगठनों के समूह को संघ परिवार कहा जाता रहा है, लेकिन सागर के जहरीले अनुभव के बाद अब वह संघ परिवार को 'संघ तंत्र' कहने को विवश हैं। संघ पर "यूज एंड थ्रो" की पश्चिमी संस्कृति अपनाने का आरोप जड़ते हुए उन्होंने कहा कि अपनों ने मुझे खो दिया। उन्हें अब मेरी जरूरत नहीं है।

गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। जानकारों का कहना है कि गौ सेवा संघ को 1927 में पचास हजार वर्ग फीट से अधिक जमीन दान में मिली थी। इसे गौ शाला बनाने और गौ संरक्षण के उद्देश्य से दिया गया था। 1972 में गौ सेवा संघ ने सरस्वती शिशु मंदिर को दो कमरे किराए पर दिए थे। इसके बाद वर्ष 1980 में सरस्वती शिशु मंदिर के पदाधिकारियों ने उनसे ही शिशु मंदिर के नए भवन का शिलान्यास करा लिया और लगातार विकास करते रहे। जब आचार्य धर्मेन्द्र को जमीन हथियाने की सूचना मिली तो उन्होंने आरएसएस के लोगों से बात की पर नतीजा नहीं निकला। पंचखंड पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच चल रहे भूमि विवाद को सुलझाने के मकसद से सागर आए थे। जमीन मुक्त कराने के लिये सरस्वती शिशु मंदिर के प्रवेश द्वार पर 21 मई से सत्याग्रह शुरू किया था, जो 24 मई को आमरण अनशन में तब्दील हो गया। सरकार की बेरुखी के कारण आमरण अनशन 27 मई को बेनतीजा खत्म करना पड़ा।

आचार्य धर्मेन्द्र सरीखे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के कटु अनुभव संघ और भाजपा पर सत्ता क सुरुर चढ़ने की पुष्टि करते हैं। वैसे भी जिसे पीने का शऊर और आदत भी नहीं हो,उस पर नशा कुछ जल्दी ही तारी हो जाता है। जनता को संस्कारों की घुट्टी पिलाने वाले संघी सत्ता के मद में इस कदर चूर हो चुके हैं कि अपनी ही नीतियों और सिद्धांतों को रौंदते हुए बढ़े चले जा रहे हैं,गोया कि प्रदेश में सत्ता की चाबी महज़ पाँच सालों के लिये नहीं आने वाली कई पुश्तों को सौंप दी गई है। लोकतंत्र में नये किस्म का सामंतवाद लाने वालों को आगाह ही किया जा सकता है। बहरहाल आचार्य धर्मेन्द्र के आक्रोश को नसीहत समझकर सबक सीखने की गुंजाइश तो रखना ही चाहिए। और फ़िर -

कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय|
जा खावत बौरात है,वा पावत बौराय ।|

शनिवार, 15 मई 2010

ज़रा ज़ुबान सम्हाल कर....!

भाजपा के नये मुखिया ने जोश-जोश में क्षेत्रीय पार्टियों के चंद नेताओं को आइना दिखा दिया,तो क्या गुनाह कर दिया ? वे अकेले तो नहीं हैं जिन्होंने इस तरह की भाषा का प्रयोग किया है । भारतीय राजनीति में यह सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है । एक ज़माने में स्वर्गीय राजीव गाँधी "नानी याद दिला देने" पर आमादा थे । बाद के सालों में "कुत्ते" के सर्वाधिकार मायावती के पास सुरक्षित थे । बदलते दौर के साथ देश में राजनीति कम और दलाली का दौर शुरु हुआ,तो इस स्वामीभक्त प्राणी के "हेय संबोधन" को जनप्रिय बनाने का पूरा-पूरा श्रेय राजनीतिक अड़ीबाज़ माननीय अमर सिंह्जी को जाता है ।
वैसे तो आज के दौर का कोई भी नेता बदज़ुबानी में किसी से पीछे नहीं है । मुलायम,लालू की हल्की बातों को मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये खूब भुनाया और उसके चटखारों से खूब मजमा जुटाया । मगर क्या मीडिया की हिमायत इनकी छिछली टिप्पणियों को जायज़ ठहरा सकती है ? काँग्रेस में भी सत्यव्रत चतुर्वेदी, दिग्विजय सिंह , मनीष तिवारी जैसे महारथियों की भरमार है,जो अपने काम से ज़्यादा ओछी टीका टिप्पणियों के लिये सुर्खियाँ बटोरते हैं ।
वैसे भी हिन्दी में मुहावरेदार भाषा का चलन है,जो बातचीत को रसीला और मज़ेदार बना देता है । फ़िर गडकरीजी ने अपनी बात को इशारों-इशारों में ही तो कहा था । मगर कहते हैं ना कि "चोर की दाढ़ी में तिनका"। लिहाज़ा लालू-मुल्लू ने तुरंत ही जान लिया कि तलवा कौन चाटता है ? बेचारे गडकरी ने तो अपने मुँह से उस स्वामीभक्त प्राणी का नाम भी नहीं उच्चारा था । बहरहाल लालू-मुल्लू सरीखे घाघ नेता ही नहीं गली-मोहल्ले के आवारा कुत्ते भी गडकरी से खफ़ा हो गये हैं । पूँछ में तख्ती टाँगे ये प्राणी भौंक-भौंक कर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं । इनका आरोप है कि गडकरी के बयान से इनकी साख पर बट्टा लग गया है । इन्हें लगता है कि भाजपा के मुखिया ने लालू-मुल्लू के साथ नाम जोड़कर इनकी कौम का मान मर्दन किया है । कई जोशीले नौजवान कुकुर तो गडकरी पर मानहानि का दावा ठोकने की तैयारी में लग गये हैं ।
भाजपा के सांसद रह चुके धर्मेन्द्र ने रुपहले पर्दे पर खलनायक को कुत्ते-कमीने के खिताब से नवाज़ कर खूब तालियाँ भी बटोरीं और खूब धन भी समेटा । कुते-कमीनों का खून पीने का सरे आम ऎलान कर लोकप्रियता के शिखर को छूने वाले धरमिन्दर पाजी बाद के सालों में संसद के गलियारे में भी दाखिल हो गये । गडकरी आरएसएस के आशीर्वाद से बीजेपी के मुखिया तो बन गये हैं , लेकिन चांडाल चौकड़ी के चलते वे गब्बरसिंग की महफ़िल में रस्सी से बँधे "वीरु" से जान पड़ते हैं । वही वीरु जो चिल्ला-चिल्ला बसंती को "कुत्तों के आगे नाचने" से रोकने की कोशिश करता है । पुराने फ़िल्मी गानों के शौकीन गडकरी ने मध्यप्रदेश में हुए भाजपा अधिवेशन के दौरान शिवराजसिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिला कर खूब मंच लूटा था । लगता है कार्यकर्ताओं को चाँडाल चौकड़ी के कब्ज़े से छुड़ा कर अपने खेमे में लाने के लिये गडकरी ने यह दाँव आज़माया होगा ।
वैसे नेताओं को समझना होगा कि सार्वजनिक जीवन में आचार-व्यवहार की मर्यादाओं का ध्यान रखना ही चाहिये । हल्के शब्द तात्कालिक तौर पर फ़ायदा देते दिखाई ज़रुर देते हैं,लेकिन ये ही शब्द व्यक्तित्व की गुरुता को घटाते भी हैं । "ज़ुबान की फ़िसलन" राजनीति की रपटीली ज़मीन पर बेहद घातक साबित हो सकती है । खासतौर से ये खतरा तब और भी बढ़ जाता है,जब विरोधी घर में ही मौजूद हों । देश के प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया की "ज़ुबान का फ़िसलना" और फ़िर "ज़ुबान से पलटना" ना तो खुद उनके लिये अच्छा है और ना ही भाजपा के लिए ....। लिहाज़ा गडकरीजी, ! ज़रा ज़ुबान संभाल कर .........।

रविवार, 15 मार्च 2009

सुदर्शन चाहते हैं मौजूदा संविधान नष्ट करना

आरएसएस के सरसंघ चालक के एस सुदर्शन ने अँग्रेज़ों और दूसरे देशों की मदद से बनाए गए भारतीय संविधान को नष्ट कर देने की पैरवी की है । कल भोपाल में भारतीय विचार संस्थान के बौद्धिक कार्यक्रम में सुदर्शन ने कहा कि कुछ लोगों के निजी स्वार्थों के लिए ही यह संविधान बनाया गया था । आँबेडकर भी इस से संतुष्ट नहीं थे , इसीलिए उन्होंने कहा था कि बस चले तो संविधान में आग लगा दूँ । इससे किसी का भला नहीं होने वाला ।

उनसठ साल पुराने संविधान पर गाहे - बगाहे सवाल उठते रहे हैं । लंबे समय से नए व्यावहारिक और मज़बूत संविधान की ज़रुरत महसूस की जा रही है । भारत रक्षा संगठन ने नया संविधान बनाने के लिए संघर्ष का रास्ता चुनने की घोषणा की है वहीं प्रज्ञा संस्थान और राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन भी नए संविधान का पक्षधर है ।

गणराज्य के जिस संविधान को हमने 26 जनवरी 1950 को अँगीकार किया था , बदलते सामाजिक और आर्थिक दौर में उसकी प्रासंगिकता खत्म हो चली है । ऎसी आवाज़ उठाने वाले भारतीय संविधान के 59 साल के सफ़र को विफ़ल करार देते हुए नए संविधान की माँग कर रहे हैं ।इनमें कुछ संगठन शामिल हैं , तो कुछ संविधान विशेषज्ञ ।

सच तो यह भी है कि जो संविधान हमें मिला वह आज़ादी के आंदोलन के दौरान घोषित स्वतंत्र भारत के लक्ष्य के अनुरुप नहीं था । महात्मा गाँधी ने भी ग्राम स्वराज की ओर बढने की बात को संविधान में शामिल नहीं करने पर कड़ी आपत्ति की थी । वास्तव में संविधान समग्र रुप से भारतीय स्वभाव और तासीर से मेल नहीं खाने के कारण असहज हो गया और धीरे-धीरे पूरा तंत्र बीमार होता चला गया । आज हालत ये है कि जन और तंत्र के बीच की खाई दिन ब दिन चौड़ी होती जा रही है ।

गौर से देखा जाए तो आमजन को केवल मत डालने का अधिकार दिया गया है । शासन में उसे किसी भी तरह की भागीदारी नहीं दी गई और ना ही उसकी कोई भूमिका तय की गई । संविधान से जुड़े प्रश्‍नों की फ़ेहरिस्त लगातार लम्बी होती जा रही है , जिनका उत्तर हमारे संविधान में ढूँढ पाना नामुमकिन होता जा रहा है । इनके लिए या तो संशोधन करना पड़ता है या फ़िर कोई व्यवस्था देने के लिए न्यायालय को आगे आना पड़ता है । कई मर्तबा संसद अपने मन मुताबिक प्रक्रिया शुरु कर देती है । संविधान से स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं मिलने के कारण आज गणतंत्र पटरी से उतर गया है । चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री , अराजकता तथा अँधेरगर्दी का बोलबाला है ।

संविधान का पहला संशोधन 1951 में किया गया और अब तक 90 से ज़्यादा संशोधनों का विश्‍व कीर्तिमान बन गया है , जबकि सवा दो सौ साल पुराने अमेरिकी संविधान में अब तक महज़ 26 बदलाव किये गये हैं । दर असल जिस संविधान की दुहाई देते हम नहीं थकते , उसकी सच्चाई यही है कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर और उसके बाद अँग्रेज़ सरकार के कानूनों का ही विस्तारित रुप है । कुछ लोग इसे 1773 के रेग्युलेशन एक्ट से लेकर 1935 के भारतीय शासन अधिनियम तक का मिलाजुला रुप बताते हैं ।

राजनीति के अपराधीकरण , चाँद-फ़िज़ा जैसे मामलों से समाज में बढती अराजकता और आरक्षण से फ़ैलते सामाजिक विद्वेष के मूल में कहीं ना कहीं संविधान का लचीलापन और मौन ही ज़िम्मेदार है । शासन - प्रशासन में बढ़ते भ्रष्टाचार और देश में कानून का राज कायम कराने में नाकाम न्याय व्यवस्था से राष्ट्रीय चरित्र का संकट खड़ा हो गया है ।

अपना दायित्व भूलकर दूसरे के काम में दखलंदाज़ी के बढ़ते चलन ने देश में असंतुलन और निरंकुशता का माहौल बना दिया है । बदलते दौर में संविधान में छिटपुट बदलाव करते रहने की बजाय सख्त और सक्षम कानून बनाने की ज़रुरत है । यह काम वक्त रहते कर लिया जाए , तो देश की तस्वीर और तकदीर भी सुनहरे हर्फ़ों में लिखी जा सकेगी । "एक मुल्क -एक कानून" ही देश में समरसता का माहौल बना सकता है । सभी वर्गों को न्याय के तराज़ू पर बराबरी से रखकर ही सांप्रदायिकता के दानव से छुटकारा मिल सकता है ।

मैं तो बेचैन हक़ीक़त को ज़ुबाँ देता हूँ ।
आप कहते हैं बग़ावत को हवा देता हूँ ।
निज़ाम कैसा ये खूशबू को नहीं आज़ादी ?
सुर्ख फ़ूलों को दहकने की दुआ देता हूँ ।