रविवार, 15 मार्च 2009

सुदर्शन चाहते हैं मौजूदा संविधान नष्ट करना

आरएसएस के सरसंघ चालक के एस सुदर्शन ने अँग्रेज़ों और दूसरे देशों की मदद से बनाए गए भारतीय संविधान को नष्ट कर देने की पैरवी की है । कल भोपाल में भारतीय विचार संस्थान के बौद्धिक कार्यक्रम में सुदर्शन ने कहा कि कुछ लोगों के निजी स्वार्थों के लिए ही यह संविधान बनाया गया था । आँबेडकर भी इस से संतुष्ट नहीं थे , इसीलिए उन्होंने कहा था कि बस चले तो संविधान में आग लगा दूँ । इससे किसी का भला नहीं होने वाला ।

उनसठ साल पुराने संविधान पर गाहे - बगाहे सवाल उठते रहे हैं । लंबे समय से नए व्यावहारिक और मज़बूत संविधान की ज़रुरत महसूस की जा रही है । भारत रक्षा संगठन ने नया संविधान बनाने के लिए संघर्ष का रास्ता चुनने की घोषणा की है वहीं प्रज्ञा संस्थान और राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन भी नए संविधान का पक्षधर है ।

गणराज्य के जिस संविधान को हमने 26 जनवरी 1950 को अँगीकार किया था , बदलते सामाजिक और आर्थिक दौर में उसकी प्रासंगिकता खत्म हो चली है । ऎसी आवाज़ उठाने वाले भारतीय संविधान के 59 साल के सफ़र को विफ़ल करार देते हुए नए संविधान की माँग कर रहे हैं ।इनमें कुछ संगठन शामिल हैं , तो कुछ संविधान विशेषज्ञ ।

सच तो यह भी है कि जो संविधान हमें मिला वह आज़ादी के आंदोलन के दौरान घोषित स्वतंत्र भारत के लक्ष्य के अनुरुप नहीं था । महात्मा गाँधी ने भी ग्राम स्वराज की ओर बढने की बात को संविधान में शामिल नहीं करने पर कड़ी आपत्ति की थी । वास्तव में संविधान समग्र रुप से भारतीय स्वभाव और तासीर से मेल नहीं खाने के कारण असहज हो गया और धीरे-धीरे पूरा तंत्र बीमार होता चला गया । आज हालत ये है कि जन और तंत्र के बीच की खाई दिन ब दिन चौड़ी होती जा रही है ।

गौर से देखा जाए तो आमजन को केवल मत डालने का अधिकार दिया गया है । शासन में उसे किसी भी तरह की भागीदारी नहीं दी गई और ना ही उसकी कोई भूमिका तय की गई । संविधान से जुड़े प्रश्‍नों की फ़ेहरिस्त लगातार लम्बी होती जा रही है , जिनका उत्तर हमारे संविधान में ढूँढ पाना नामुमकिन होता जा रहा है । इनके लिए या तो संशोधन करना पड़ता है या फ़िर कोई व्यवस्था देने के लिए न्यायालय को आगे आना पड़ता है । कई मर्तबा संसद अपने मन मुताबिक प्रक्रिया शुरु कर देती है । संविधान से स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं मिलने के कारण आज गणतंत्र पटरी से उतर गया है । चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री , अराजकता तथा अँधेरगर्दी का बोलबाला है ।

संविधान का पहला संशोधन 1951 में किया गया और अब तक 90 से ज़्यादा संशोधनों का विश्‍व कीर्तिमान बन गया है , जबकि सवा दो सौ साल पुराने अमेरिकी संविधान में अब तक महज़ 26 बदलाव किये गये हैं । दर असल जिस संविधान की दुहाई देते हम नहीं थकते , उसकी सच्चाई यही है कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर और उसके बाद अँग्रेज़ सरकार के कानूनों का ही विस्तारित रुप है । कुछ लोग इसे 1773 के रेग्युलेशन एक्ट से लेकर 1935 के भारतीय शासन अधिनियम तक का मिलाजुला रुप बताते हैं ।

राजनीति के अपराधीकरण , चाँद-फ़िज़ा जैसे मामलों से समाज में बढती अराजकता और आरक्षण से फ़ैलते सामाजिक विद्वेष के मूल में कहीं ना कहीं संविधान का लचीलापन और मौन ही ज़िम्मेदार है । शासन - प्रशासन में बढ़ते भ्रष्टाचार और देश में कानून का राज कायम कराने में नाकाम न्याय व्यवस्था से राष्ट्रीय चरित्र का संकट खड़ा हो गया है ।

अपना दायित्व भूलकर दूसरे के काम में दखलंदाज़ी के बढ़ते चलन ने देश में असंतुलन और निरंकुशता का माहौल बना दिया है । बदलते दौर में संविधान में छिटपुट बदलाव करते रहने की बजाय सख्त और सक्षम कानून बनाने की ज़रुरत है । यह काम वक्त रहते कर लिया जाए , तो देश की तस्वीर और तकदीर भी सुनहरे हर्फ़ों में लिखी जा सकेगी । "एक मुल्क -एक कानून" ही देश में समरसता का माहौल बना सकता है । सभी वर्गों को न्याय के तराज़ू पर बराबरी से रखकर ही सांप्रदायिकता के दानव से छुटकारा मिल सकता है ।

मैं तो बेचैन हक़ीक़त को ज़ुबाँ देता हूँ ।
आप कहते हैं बग़ावत को हवा देता हूँ ।
निज़ाम कैसा ये खूशबू को नहीं आज़ादी ?
सुर्ख फ़ूलों को दहकने की दुआ देता हूँ ।
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