गुरुवार, 11 जून 2009

नशे में कौन नहीं है,मुझे बताओ ज़रा...!

नशा शराब में होता तो नाचती बोतल......। सदी के महानायक ने अपनी पहली पारी की मशहूर फ़िल्म "शराबी" में देवताओं के प्रिय पेय यानी सुरा की पैरवी करते हुए ऎसा ज़बरदस्त तर्क दिया कि आज तक उसका तोड़ कोई नहीं ढ़ूँढ़ पाया । अपने चारों ओर नज़र घुमाकर देखो तो "शराबी" की बात में दम दिखाई देता है । मदिराप्रेमी तो बेचारे मुफ़्त ही बदनाम हैं । नशा कहाँ नहीं और किसका नहीं है । यकीन ना हो तो वामपंथियों से पूछ देखिये । कार्ल मार्क्स के अनुयायी आपको बतायेंगे कि धर्म एक अफ़ीम है जो धार्मिक आस्था में डूबे लोगों को रोज़मर्रा की जद्दोजहद से दूर ले जाकर हमेशा गा़फ़िल रखती है ।

मुझे भी अब इन सब बातों पर यकीन सा हो चला है । आजकल भोपाल में किस्म-किस्म के नशे में चूर लोग आमने-सामने हैं । धर्म के ठेकेदार शराब ठेकेदारों के खिलाफ़ लामबंद होकर सत्ता के अड़तियों ललकार रहे हैं । प्रदेश में शराब सस्ती और पानी दुर्लभ है । आलम ये है कि पुण्य कमाने के लिये प्याऊ खोलने वालों का टोटा पड़ गया है । पानी का पाउच महँगा और लाल पानी सस्ता है । हर चौराहे पर पानी की टंकी मिले ना मिले, देशी-विदेशी शराब की दुकान देर रात खुली मिलने की पूरी गारंटी है । आखिर हो भी क्यों ना ! बोतल में भरी शराब का नशा तो गले से नीचे उतरने पर ही चढ़ता है लेकिन सत्ता के मद में चूर नेताओं की शराब ठेके बढाने की नीति का जवाब भला है किसी के पास ?

जब से बीजेपी ने सत्ता संभाली है प्रदेश में तीन चीज़ें बेतहाशा बढ़ी हैं- सड़क किनारे गुमटियाँ,कदम-कदम पर मंदिर और गली-मोहल्लों में शराब की दुकानें । अब हालत ये है कि इधर सिंदूर पुते गोलमटोल हनुमानजी बिराजे हैं और उधर सड़कों पर लोट लगाते सुराप्रेमी हैं । इधर बोतल गटकते बच्चे-बूढ़े और जवान हैं,तो उधर शिंगनापुर से पधारे न्याय के देवता शनिदेव सौ रुपए लीटर तक जा पहुँचे सरसों के तेल से मल-मल कर अंगराग कर रहे हैं । कायदे से देखा जाये तो एक ही जगह सभी की पसंद का ख्याल रखा गया है । आप चाहें तो अंगूर की बेटी से दोस्ती कर लें या फ़िर धर्म की अफ़ीम चाटकर दानपेटी के रास्ते अपने पाप धो लें । हर मढ़िया पर जंज़ीरों में जकड़ी ताले की पहरेदारी में रखा दानपात्र दुनिया का हर पाप कर्म धोकर "सुपर रिन की चमकार" का भरोसा दिलाता है ।

घोड़ी नहीं चढ़े तो क्या बारातें तो खूब देखी हैं । कहने का मतलब ये कि शराब के हैंगओवर से बाहर आने के लिये पियक्कड़ तरह- तरह की तरकीब आज़माते हैं । इसी तरह धर्म की अफ़ीम को हेरोइन,ब्राउन शुगर और कोकेन में तब्दील करने के लिये यज्ञ,हवन,प्रवचन,प्राणप्रतिष्ठा और शोभायात्रा की भट्टी चढ़ाई जाती है ।

आजकल अपनी ज़िम्मेदारियों से जी चुराकर भागे लोगों में भगवा चोला धारण करने का चलन कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है । इन निठल्ले और निकम्मे लोगों ने जगह-जगह मंदिर तान लिये हैं । एक अनुमान के मुताबिक पिछले पाँच सालों में केवल भोपाल में चालीस हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा की सरकारी ज़मीन मंदिर माफ़ियाओं के कब्ज़े में जा चुकी है । ठेला लगाकर रोज़ी-रोटी कमाने वालों पर नगर निगम की गाज गिरने में वक्त नहीं लगता । राजधानी के न्यू मार्केट, एमपी नगर , कमलापार्क जैसे कई व्यस्ततम इलाकों में करोड़ों की ज़मीन पर रातों रात पक्के मंदिर खड़े हो गये और नगर निगम को पता भी नहीं चला ....?????

हद तो तब हो गई, जब भोपाल की संस्कृति को सजाने-सँवारने का दावा पेश करने वाले समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका ने इन मंदिरों के रखरखाव के लिये आर्थिक मदद की माँग कर डाली । इन मंदिरों की तस्वीर के साथ खबर छाप कर अखबार कौन सी संस्कृति तैयार कर रहा है ? जिन अतिक्रमणकारियों और उनके खैरख्वाहों को जेल में ठूँस कर कोड़ों से उधेड़ देना चाहिये,धर्म की आड़ लेकर उनकी वकालत करना कहाँ की समझदारी है ?

हाल ही में दम तोड़ चुके बड़े तालाब को आखिरी सलाम देने के लिये लेक व्यू रोड के रास्ते पर बने सरकारी श्रमदान (शर्मदान) स्थल पर जाने का मौका मिला । देखकर हैरानी हुई कि कल तक जहाँ पानी हिलोरें मारता था वहाँ बड़ा भारी पक्का चबूतरा बन चुका है । कई सिंदूर पुते पत्थर सजीव हो चले हैं । गौर करने वाली बात ये है कि यहाँ नगर निगम का अमला रोज़ सैकड़ों ट्रक मिट्टी निकालने का काम करता है । आये दिन मुख्यमंत्री,मंत्री,आला अधिकारी और नेता श्रमदान के फ़ोटो सेशन के लिये पधारते रहते हैं ।
बहरहाल, अतिक्रमणकारी छद्म बाबाओं ने आजकल शराब की दुकाने हटाने के मुद्दे को लेकर राजधानी में बवाल मचा रखा है । मेरी राय में सरकार को शराब की दुकान हटाने से पहले सभी मंदिरों को नेस्तनाबूद कर देना चाहिये । मुफ़्त की रोटियाँ तोड़-तोड़कर ये निठल्ले लोग गर्रा गये हैं । गुर्राने से शुरु हुए ये निकम्मे अब गरियाने लगे हैं । भोपाल को अपनी रियासत समझकर दरबार सजाने वाले नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर से भी सवाल है कि भोपाल को स्विटज़रर्लैंड बनाने का ख्वाब दिखाने के बाद पिछले छह सालों में क्या दिया उन्होंने ? चारों तरफ़ गड्ढे, बेतहाशा बढ़ते झुग्गियों के जंगल और बिल्डरों के लालच के चलते डायनामाइट के विस्फ़ोट में अपना अस्तित्व गवाँ चुकी खूबसूरत पहाडियाँ ...???? नशे में कौन नहीं है,मुझे बताओ ज़रा...!
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