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शनिवार, 17 सितंबर 2011

क्या पहुँच पायेगी सीबीआई शहला मसूद के कातिलों तक

भोपाल का बहुचर्चित और सनसनीखेज़ शहला मसूद हत्याकांड भी अब नोयडा के आरुषि-हेमराज मामले की तर्ज़ पर आगे बढ़ रहा है। देश की सबसे काबिल जाँच एजेंसी सीबीआई ने शहला के कातिल का सुराग देने वाले को पाँच लाख का ईनाम देने की घोषणा के साथ ही इस मामले की नियति और परिणीति लगभग तय कर दी है । इससे पहले मध्यप्रदेश पुलिस ने कातिल तक पहुँचाने वाले को एक लाख रुपए देने का ऎलान किया था । तमाम भाजपा नेताओं के नाम सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ने आनन फ़ानन में जाँच सीबीआई को सौंपने की घोषणा तो कर दी,मगर कागज़ी खानापूर्ति नहीं होने के कारण पंद्रह दिनों तक  मामला अटका रहा । इस बीच स्थानीय पुलिस तफ़्तीश में जुटी रही । इस दौरान सबूत भी बखूबी खुर्द-बुर्द कर दिये गये और मामले का रुख भी बेहद चतुराई से दूसरी तरफ़ मोड़ दिया गया । सीबीआई अब तक इस मामले में करीब आधा दर्जन लोगों से पूछताछ कर चुकी है,पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है । पक्ष-विपक्ष की राजनीति को नज़दीक से समझने वाले आशंका जता चुके हैं कि इस मामले का हश्र भी रुसिया हत्याकांड  की तरह होना तय है । उस मामले में सुषमा स्वराज के करीबी विधायक जीतेन्द्र डागा का नाम उछलने के बाद सीबीआई जाँच कराई गई थी और जाँच में रुसिया की मौत को हादसा करार दिया गया था ।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद तरुण विजय और  वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से व्यक्तिगत जान पहचान रखने वाली शहला के भाजपा के साथ गहरे ताल्लुकात पर चर्चा का बाज़ार गर्म है । आरटीआई कार्यकर्ता शहला के भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से गहरे संबंधों ने पार्टी के सामने मुश्किलें खडी कर दी हैं । आज आलम यह है कि शहला मसूद  हत्याकांड भाजपा में अंदरूनी घमासान और एक-दूसरे को निबटाने का हथियार बन गया है । सबसे ज्यादा गंभीर बात यह है कि भोपाल से लेकर दिल्ली तक के कई भाजपा नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं । प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के कई नामचीन चेहरे शक के दायरे में हैं ।  प्रदेश की राजनीति में "चरित्र हनन" का ब्रह्मास्त्र चलाकर अपने प्रतिद्वंद्वियों को चित्त करने में माहिर खिलाड़ियों ने  तरूण विजय से शहला के अंतरंग संबंधों को लेकर मीडिया में कुछ इस तरह हवा बनाई कि अब असली कातिल तक पहुँचना सीबीआई के लिये आसान नहीं होगा ।

बहरहाल मामले में हर गुज़रते दिन के साथ नये-नये खुलासे हो रहे हैं । जानकार बता रहे हैं कि जाँच में कुछ ऐसी बातें सामने आ सकती हैं, जो प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दें । मामले की सीबीआई जाँच से शहला और प्रदेश की राजनीति से जुड़े कई अनछुए पहलू सामने आने की उम्मीद है। सूबे की राजनीति के साथ-साथ प्रशासन में हलचल मचाने वाले मामलों से भी पर्दा उठ सकता है । आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या के वक्त का चुनाव और उसका सबब पहेली बना हुआ है । इस हाईप्रोफाइल मामले की गुत्थी बेहद उलझी हुई है,जो कई दिग्गज नेताओं और अफसरों को लपेट सकती है। ।  विधायकों और सांसदों से लेकर चार आईएएस,दो आईपीएस अधिकारियों तथा एक जाने माने बिल्डर पर शक की सुई घूम रही है ।

१६ अगस्त की सुबह शहला मसूद की भोपाल में उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई थी । वह अपनी कार में ही मृत पाई गईं। शहला मसूद भोपाल की वह शख्सियत थी,जिसने सूचना के अधिकार का उपयोग करते हुए कई मंत्रियों तथा अधिकारियों को सीधे-सीधे घेरा । वे कई नेताओं की करीबी रहीं,तो कई नेताओं की किरकिरी भी बनी रहीं । शहला ने आरटीआई में आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के भ्रष्टाचार की जानकारी हासिल की थी । उन्होंने चार आईएएस अफसरों सहित शहर के एक बड़े बिल्डर द्वारा विभिन्न विभागों में किए जा रहे निर्माण कार्यों की जानकारी सूचना के अधिकार के अंतर्गत संबंधित विभागों से माँगी थी । इन तमाम जानकारियों में नेताओं और अफ़सरशाही की मिलीभगत उजागर हो सकती थी । वे इंडिया अगेंस्ट करप्शन की प्रदेश संयोजक भी थीं। ऎसा कहा जाता है कि हत्या वाले दिन यानी १६ अगस्त को ही बोट क्लब पर मध्य प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान शुरू कर भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों के नामों का खुलासा करने वाली थीं । सौ मीटर लम्बे बैनर पर हस्ताक्षर के ज़रिये यह जानने की कोशिश होने वाली थी कि प्रदेश का सबसे भ्रष्ट महकमा और अधिकारी कौन है? शहला अन्ना के आंदोलन की तर्ज पर एम.पी.अगेंस्ट करप्शन अभियान शुरू करने वाली थी। वो नेताओं और अफसरों के काले कारनामों को उजागर करतीं, उससे पहले उन्हें  दुनिया से रुखसत कर दिया गया।

इस सनसनीखेज़ हत्‍याकांड से मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के दफ्तर का नाम जुड़ने की चर्चा भी अब आम है । सीबीआई के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक एक अगस्त को शहला ने सीवीसी से मुख्यमंत्री औऱ प्रदेश सरकार की शिकायत की थी। बताया जा रहा है कि शहला ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि उन्‍हें मुख्‍यमंत्री के स्‍टाफ की ओर से धमकी मिली थी। हालाँकि जब एक न्यूज़ चैनल ने इस बारे में शिवराजसिंह से पूछा तो उन्‍होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।

शुरुआत में इस हत्या को आत्महत्या में बदलने की कोशिश भी की गई । शहला की कॉल डिटेल में दिल्ली के एक भाजपा नेता से लंबी बातचीत का रिकार्ड मिलने के बाद घबराई पुलिस मामले को खुदकुशी बताने की थ्योरी पर काम करने लगी थी । लेकिन शहला के परिजनों और नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह की ओर से सीबीआई जाँच की माँग सामने आते ही इसे तत्काल सीबीआई को सौंप दिया गया । केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी हत्यारों का जल्द पता लगाने के बारे में मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था । वहीं शहला के पिता मसूद सुल्तान के मुताबिक उनकी बेटी को जान का खतरा था,जिसे लेकर आईजी को पत्र भी लिखा था । उन्होंने आईजी पवन श्रीवास्तव,हीरा खनन कंपनी रियो-टिंटो के अफसर,बीजेपी नेता सहित कुछ अन्य लोगों पर भी हत्या का संदेह जताया है ।

सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद की हत्या के मामले में जाँच का एक बिंदु यह भी है कि सूचना के अधिकार के तहत जानकारी हासिल करने के दौरान ऐसे कितने और कौन-कौन लोग थे,जो शहला मसूद के दुश्मन बन गए? क्या दुश्मनी इस हद तक जा पहुँची थी कि कोई उनकी जान तक ले ले ? शहला की हत्या के बाद सामने आईं जानकारियों से पता चला है कि उन्होंने करीब एक हजार आवेदन विभिन्न महकमों में गड़बड़ियों से जुड़ी जानकारियाँ जुटाने में लगा रखे थे। इनमें बाघों के शिकार,वनों की अवैध कटाई और पुलिस की करतूतों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ चाही गई थीं ।

कहा जाता है कि शहला को छतरपुर जिले के सघन वनों में गैरकानूनी रूप से हीरे के खनन की जानकारी भी थी । यह जगह पन्ना टाइगर रिजर्व के पास बताई जाती है । शहला ने  पन्ना जिले में रियो-टिंटो कंपनी से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार के तहत हासिल की थी । १२ लाख रुपए खर्च कर अपनी लक्जरी कार में बार बनाने वाले रंगीनमिजाज़ मंत्री को उन्होंने जमकर घेरा था । सात सौ करोड़ के एक कथित घोटाले की तहकीकात में भी वे लगी हुई थी । बाँधवगढ़ में पिछले दिनों हुई एक बाघिन की हत्या में एक मंत्री तथा उनके भतीजे के खिलाफ वे मुहिम चला रही थी । खबर तो ये भी है कि शहला ने  शराब और शिकार के शौकीन प्रदेश के मंत्रियों के बेटों की हरकतों की एक सीडी तैयार कर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को दी थी । इस सीडी में बाँधवगढ़ में एक बाघिन की रहस्यमय ढंग से हुई मौत के राज़ हैं । इस मामले की एसटीएफ द्वारा जाँच की जा रही है । इसके लपेटे में दो वरिष्ठ आईएएस अफसर भी आ सकते हैं ।

शहला की जिंदगी से जुड़े सभी पहलुओं की बारीकी से पड़ताल भी कातिल तक  पहुँचाने में मददगार बन सकती है । जाँच तो इस बात की भी होना चाहिए कि कैसे मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की इवेंट मैनेजमेंट करते-करते भाजपा के नेताओं के करीब जा पहुँची ? लालकृष्ण आडवाणी,सुषमा स्वराज,नितिन गडकरी सरीखे नेताओं के साथ शहला के फ़ोटोग्राफ़ भाजपा में उसकी पैठ की गवाही देने के लिये काफ़ी हैं । ऎसे में ये सवाल बेहद मौजूँ हो जाता है कि महज़ दो-तीन सालों में एक आरटीआई कार्यकर्ता की सियासी गलियारों में सरगर्मियाँ कब,कैसे और क्यों बढ़ीं ? ये जाँच का विषय है कि उसे पार्टी के कद्दावर नेताओं से सबसे पहले किसने रूबरू कराया और वह किन नेताओं की खास रही, बाद में उसकी किन से और किन कारणों से अनबन हुई ?

दिल्ली से मास कम्युनिकेशन का डिप्लोमा करने के बाद भोपाल के सिटी केबल में बतौर एंकर काम कर चुकी शहला मसूद को पत्रकारिता ज्यादा रास नहीं आई और उसने "मिरेकल्स" नाम की कंपनी बनाकर इंवेंट मैनेजमेंट के क्षेत्र में कदम रखा । कुछ ही सालों में शहला को अपने संपर्को के बूते पर्यटन विकास निगम,संस्कृति विभाग जैसे सरकारी महकमों में लाखों के काम मिलने लगे । इस तथ्य को इसी से समझा जा सकता है कि शहला की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी और आरएसएस समर्थित ''श्यामा प्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट '' मिलकर दिल्ली,भोपाल,कश्मीर,कोलकाता में कई कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं । इस वज़ह से शहला का उठना-बैठना ओहदेदार और रसूखदार लोगों के साथ था । विधायक ध्रुव नारायण सिंह की एनजीओ "उदय" तो अब शहला ही चला रही थीं । जब ध्रुव नारायण पर्यटन निगम अध्यक्ष थे,तब शहला की कंपनी को कई काम मिले थे । हालाँकि भोपाल के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का टिकट नहीं मिलने के बाद से उसके मन में ध्रुव नारायण के प्रति खटास पैदा हो गई थी । आलम ये था कि  पर्यटन विकास निगम, जिसमें वे इवेंट मैनेज करने में लगी थी, वहीं कई शिकायतें उन्होंने कर रखी थी । ईको टूरिज्म पर हो रहे विकास कार्यो को लेकर उन्होंने सीधे वहां के एमडी को कठघरे में लिया था । ऐसी और भी शिकायतें थी,जिनको सूचना के अधिकार में लिया गया, लेकिन इसके बाद उनका क्या हुआ आज तक पता नहीं चला । 

सवाल ये उठ रहे हैं कि शहला मसूद की मौत की वजह कहीं उसकी भाजपा सांसद तरुण विजय से बढ़ती नजदीकी तो नहीं बनी? राजनीतिक हसरतें ही तो उसकी मौत का सबब नहीं बन गईं? कहते हैं,पार्षद का टिकट पाने में नाकाम शहला मसूद को अपनी राजनीतिक हसरतों को मंजिल तब दिखना शुरू हुई, जब वह तरुण विजय के संपर्क में आईं । दो साल में दोनों के बीच नजदीकी इतनी बढ़ी कि पिछले साल ईद पर मुबारकबाद देने के लिये तरुण शहला के घर पहुँचे । तरुण और शहला के बीच हत्याकांड के ठीक एक दिन पहले दो बार लंबी बातचीत हुई । पहले शहला ने फोन करके ४५ मिनट बात की तो बाद में तरुण विजय ने फोन लगाया और २७ मिनट बात की । हत्याकांड वाले दिन भी सुबह दोनों के बीच फोन पर बात हुई थी । करीबी दोस्त की हत्या के पन्द्रह दिन तक उनकी चुप्पी ने भी कई सवाल खड़े किये हैं । लेकिन ये तमाम तथ्य तरुण विजय को कठघरे में खड़ा करने के लिये पर्याप्त नहीं कहे जा सकते । ऎसा लगता है कि तरुण विजय और शहला के व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों के खुलासों को हवा देकर प्रदेश के कई घाघ नेताओं ने तोप का मुँह दिल्ली के नेताओं की ओर मोड़ कर हिसाब-किताब बराबर किया है । इसे "जाँच की आँच" से दामन बचाने की कोशिश के तौर भी देखा जा सकता है ।

तरुण विजय और शहला मसूद के बीच 'आर्थिक लेनदेन' को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं । मध्‍य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष २०१० में विजय के श्यामाप्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट को २५ लाख रुपए की आर्थिक मदद दी थी । राज्‍यसभा सदस्‍य और आरएसएस के मुखपत्र 'पांचजन्‍य' के पूर्व संपादक तरुण विजय इस एनजीओ के प्रमुख हैं। कहा जा रहा है कि विजय ने ही  शहला को इस एनजीओ से जोड़ा था। जानकारी के अनुसार हाल में ही शहला ने करीब ८० लाख रुपए की जमीन का सौदा किया था । उस सौदे में कई पेंच थे । मामले में दिलचस्पी रखने वाले अपने तईं तफ़्तीश में जुटे हैं कि जमीन खरीदने में शहला के साथ और कौन-कौन लोग शामिल थे? जमीन खरीदने के लिए रुपए कहाँ से और कैसे जुटाए थे? इस मामले में शहला के किन लोगों से मतभेद थे? ये तमाम बातें भी अब जाँच का हिस्सा बनेंगी ।

दरअसल अपने राजनीतिक संपर्को के बूते शहला की भाजपा में जाने की तैयारी हो गई थी । भोपाल के विधायक ध्रुवनारायण सिंह तथा राज्यसभा सदस्य तरुण विजय इसके प्रयास में थे । विजय ने शहला की भाजपा में एंट्री पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में बतौर चेयरमैन कराने की कवायद भी की थी, लेकिन अंडरवर्ल्ड और आईएसआई से तार जुड़े होने का पेंच फ़ँसाकर उस मुहिम की हवा निकाल दी गई । अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोड़ने की कवायद में जुटी भाजपा के पास दमखम वाले मुसलमान नेताओं का टोटा है । विजय विधानसभा चुनावों में शहला की  माडरेट मुस्लिम नेता की छवि को भुनाकर मुसलमानों को बीजेपी से जोड़ने की कोशिश में थे । तरुण विजय के जरिए शहला भाजपा और आरएसएस के शीर्षस्थ नेताओं के संपर्क में आई थी । सूत्रों के मुताबिक शहला राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच का तानाबाना खड़ा करने में मददगार बनी थी । यह मंच जम्मू-कश्मीर सहित पूरे उत्तर भारत में काम करता है। इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में भाजपा का जनाधार बढ़ाना और राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार करना है।

पुलिस जाँच में एक दिशा यह भी थी कि कहीं इसके पीछे कोई कट्टरपंथी कनेक्शन तो नहीं है ।  बिंदास जीवन शैली और  उदारवादी छबि के चलते शहला के संपर्कों का दायरा बहुत व्यापक था। उसके कई ऐसे लोगों से भी संपर्क थे जो कट्टरपंथी माने जाते हैं । यदि सूत्र इस दिशा में बढ़े तो यह मामला चौंकाने वाले राज से पर्दा हटा सकता है । इस संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता कि कहीं डबल क्रॉस तो शहला की मौत का कारण नहीं बना ? इन तारों को जोड़ने की भी कोशिश चल रही थी  कि पिछले दो ढाई साल में शहला के तरुण विजय जैसे नेताओं से नजदीकी संबंध और इसी दौरान प्रदेश में सिमी के नेटवर्क के कई लोग पुलिस की पकड़ में आने के बीच कोई संबंध तो नहीं है । इन हल्कों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक शहला की हत्या के सूत्र पिछले दिनों पूरे प्रदेश में पुलिस द्वारा सिमी के नेटवर्क को ध्वस्त करने की कोशिशों से जुड़ते नजर आ रहे हैं ।

दरअसल शहला की हत्या ने पुलिस से ज्यादा संघ और भाजपा से जुड़े लोगों को चौंकाया है। तमाम तथ्यों के सामने आने के बाद यह सवाल और भी पेचीदा हो जाता है कि आखिर शहला की हत्या क्यों हुई ? इसे पूरी तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वाले सिपाही की कुर्बानी मान लेना उन आरटीआई कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी, जो हर जोखिम उठाकर हर कीमत पर सच की मशाल को थामे रहते हैं । कनबतियों पर यकीन करें तो हज़ारों आरटीआई के ज़रिये हासिल की गई जानकारियाँ दुधारु गाय में तब्दील करने का हुनर हासिल करने के बाद शहला सियासी और सरकारी अमले के लिये सिरदर्द बन चुकी थी। कह पाना बड़ा मुश्किल है कि आरटीआई कार्यकर्ता होने की हैसियत ने उनके इवेंट मैनेजमेंट के कारोबार को आगे बढ़ाया या गड़बड़ियों के खुलासे की आड़ में मिल बाँटकर हिसाब कर लेने के हुनर ने। प्रदेश में चरित्र हनन की राजनीति के मँझे हुए खिलाड़ियों ने बड़ी ही सफ़ाई से जाँच का रुख दिल्ली की ओर मोड़ दिया है। जाँच रिपोर्ट सामने आने तक इस सनसनीखेज़ हत्याकांड पर लोग अपनी तरह से कयास लगाते रहेंगे आखिर क्यों गई शहला की जान ...? आरएसएस से जुड़ाव,बाघों के मौत के विरुद्ध आवाज़ उठाना,आपसी रंजिश या राजनीतिक महत्वाकांक्षा......मौत की वजह कोई भी हो सकती है।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

चेहरा बदला, क्या चाल-चरित्र बदलेगा ....?

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में हाल के दोनों में दो अहम बदलाव हुए हैं । भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ लोकसभा में विपक्ष का नेता भी बदल गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अब लालकृष्ण आडवाणी नहीं सुषमा स्वराज होंगी, तो राजनाथ सिंह के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान नितिन गडकरी ने संभाली है। इस साल लोकसभा चुनाव में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व युवा नेताओं के हाथ में सौंपने की माँग उठ रही थी । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या इस बदलाव से भाजपा का कुछ भला हो पाएगा ? क्या पार्टी इनके नेतृत्व में बुरे दौर से निकल पाएगी ? क्या आडवाणी की राजनीतिक पारी भी समाप्ति की ओर है?


गौरतलब है कि आडवाणी के लिए संसदीय दल के संविधान में संशोधन करके काँग्रेस की तर्ज़ पर विशेष जगह बनाई गई है । उनका राजनीतिक कैरियर सुरक्षित करने की गरज से उठाये गये इस कदम की बदौलत लालकृष्ण आडवाणी अब संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बन गए हैं। यानि सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार अब भी उनके पास सुरक्षित है। भाजपा के इस लौहपुरूष को पिघलाना आसान बात नहीं है, यह बात एक बार फिर साबित हो गयी है। भले ही संसदीय दल का नेता नहीं होने के कारण कैबिनेट मंत्री का दर्जा छिन गया हो, मगर लालकृष्ण आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष के रूप में पार्टी पर वर्चस्व बनाए रखेंगे। आडवाणी की राजनीतिक बुलंदियाँ छूने की महत्वाकांक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं, यह मानना भूल होगी। हिन्दुत्व के एजेंडे को बुलंद करते हुए भाजपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में आडवाणी का हाथ रहा, बावजूद इसके वे कभी प्रधानमंत्री पद पर नहीं पहुँच पाए। लोकसभा में पार्टी की सिमटती सीटों के बावजूद हार उन्होंने नहीं मानी है, विरोधियों को चतुराई से किनारे किया और वे अब भी बैक सीट ड्राइविंग करते हुए एक तरह से पार्टी को अपनी पसंद की राह पर चलवा रहे हैं। भाजपा का युवा अवतार कितनी दूर तक वरिष्ठों के कहे अनुसार चलेगा, यह देखने वाली बात रहेगी।

भारतीय जनता पार्टी संक्रमण के दौर में है। नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर दोहरे संकट को झेलती पार्टी को पटरी पर लाने के लिये नितिन गडकरी को संघ के समर्थन का नैतिक बल ज़रुर हासिल होगा । लेकिन इससे उनकी राह बहुत आसान नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा बड़ी हो गई है और बदल भी गई है । भाजपा के संक्रमण का एक पहलू यह भी है कि मौजूदा चुनौतियों के संदर्भ में एक सैद्धांतिक आधारभूमि भी तलाशना है । जिससे वह ऊर्जा ग्रहण कर एक राजनीतिक दल के रुप में सार्थक हो सके और अपने समर्थकों को इतना वेगवान बना सके कि वे राजनीतिक शून्यता भरने में कामयाब हो सकें ।

इसके बारे में संघ जितना बेपरवाह है उससे कहीं ज़्यादा उदासीनता भरा रवैया भाजपा का रहा है। भाजपा में पार्टी प्रतिबद्धता का हाल यह है कि संघ नेतृत्व खुलेआम कहने लगा है कि वहाँ कोई भी राष्ट्रीय नेता ऐसा नहीं है ,जो पार्टी और उसके भविष्य की सोचता है । हर कोई अपने में सिमट गया है। भाजपा के जिस विशेषता के लिए जानी जाती थी वह उससे बहुत दूर हो गई है । इसे संघ चाहे भी तो कैसे दूर करेगा ? क्या कोई नया संगठन मंत्री आकर जादूका छड़ी फेर सकता है ? इस समय जो संगठन मंत्री हैं वे बिगड़ी भाजपा के चेहरे हो गए हैं ।

गडकरी की छबि व्यवहार कुशल नेता की है। विचार का जहाँ तक सवाल है वे स्वदेशी के पैरोकार हैं पर वैश्वीकरण से उन्हें बैर भी नहीं है । शनिवार को दिल्ली में पार्टी की कमान संभालने के बाद उन्होंने कहा कि वे पाँच सालों में पहली बार दिल्ली में रात बिताएंगे। यानि उनकी राजनीति महाराष्ट्र के इर्द-गिर्द ही रही। अब एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण और सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। यह समय गठबंधन राजनीति का है। इस नाते तरह-तरह के दलों से पार्टी के संबंधों को मजबूती देना उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। लगातार सिमट रहे जनाधार से पार्टी कार्यकर्ताओं के पस्त पड़े हौसलों को नयी ऊर्जा देना भी एक बड़ा काम रहेगा और सबसे बड़ी चुनौती रहेगी पार्टी के भीतर मौजूद दिग्गजों के अहं को संतुष्ट करते हुए आपसी तालमेल बनाए रखते हुए भाजपा की सभी प्रदेश ईकाइयों को नया जोश देना।

गडकरी के जरिए संघ, भाजपा पर नियंत्रण रखना चाहता है। हालाँकि बदलती परिस्थितियों में यह कितना कारगर होगा, यह कहना कठिन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अपनी पसंद के नितिन गडकरी को बीजेपी में ले तो आये हैं, वे अभी तक राज्य स्तर के नेता रहे हैं लेकिन देश के मुख्य विपक्षी दल का अध्यक्ष होने की पात्रता उनमें कितनी है, यह अभी रहस्य बना हुआ है। अगर वे असफल होते हैं तो यह संघ नेतृत्व की असफलता कही जाएगी और ये आरोप लगेगा कि संघ के महाराष्ट्रीय ब्राह्मण नेतृत्व ने एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण को पार्टी पर भी थोप दिया।

भाजपा इस समय एक ऐसी पार्टी बन चुकी है जिसे अपनी दिशा मालूम नहीं और दो लोकसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि हिन्दुत्व की लाइन पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुई है। आम जनता हिन्दुत्व की राजनीति की निरर्थकता को समझ चुकी है और अब इससे निकलना चाहती है। लोग शायद अब जातिवाद की राजनीति से भी ऊब चुके हैं और उससे भी बाहर आने का रास्ता तलाशाना चाहते हैं। भाजपा विकास से ज़्यादा धर्म के एजेंडे पर ध्यान देती आई है लेकिन देश का आम आदमी अब जागरुक हो चुका है। लोग देश का विकास, शिक्षा और रोजगार चाहते हैं। बढ़ती महंगाई और रोज़गार के घटते अवसरों के बीच लोग समझ चुके हैं कि धर्म से पेट नहीं भरता। खराब बुनियाद पर बने घर,साम्प्रदायिक और धार्मिक नीति की बुनियाद पर बने राष्ट्र और साम्प्रदायिक और धार्मिक सोच से चलती पार्टी का अस्तित्व बहुत दिनों तक नहीं कायम नहीं रहता है ।

भाजपा के दो प्रमुख पदों पर परिवर्तन से कुछ होने वाला नहीं है. पार्टी तभी मजबूत होगी जब पार्टी का एजेंडा बदला जाए ।  मुखौटा बदलने की बजाए भाजपा को विचारधारा बदलने की आवश्यकता है । अब तक तीन वैचारिक लाइन ली हैं । गांधीवादी समाजवाद. इसे 1985 में छोड़ा और एकात्मक मानववाद को अपनाया । 1987 से वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लाइन पर है । इसने भाजपा को अयोध्या आंदोलन में एक भूमिका दी । लेकिन भाजपा की समस्या इसी से शुरू होती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वो ऐसे ठोस नारे में नहीं बदल सकी है जो लोगों के गले उतरे । इसके लिए जिस तरह की सैद्धांतिक समझ और चारित्रिक दृढ़ता चाहिए वो आज ना भाजपा में है ना ही संघ में । सतही सत्ता के खेल में उलझी भाजपा का वैचारिक द्वंद उस समय बेक़ाबू हो गया जब वह चुनाव में हारने लगी । भाजपा की अनेक धाराएँ हो गई हैं । खुलकर बहस की गुंजाइश ख़त्म है । असहमति को वहाँ विरोध समझ लिया जाता है, गिरोहबंदी में फंसी भाजपा को संघ का हंटर कितना सुधार सकेगा?

बीजेपी को पटरी पर लाने के लिये गडकरी को चाँडाल चौकड़ी से छुटकारा पाना होगा । उन्होंने सेतुबन्ध बनाकर कई दुर्गम राहों पर सफ़र आसान बनाने की योजनाओं को सफ़लता से साकार किया है । विकास की राजनीति वक्त की ज़रुरत है लेकिन गडकरी को समझना होगा कि जर्जर बुनियाद पर मज़बूत इमारतें खड़ी करना नामुमकिन होता है । इमारत की बुलंदी काफ़ी हद तक बुनियाद की मज़बूती पर निर्भर करती है । ज़ाहिर बात है कि विकास के इतिहास में विध्वंस की कहानी भी दर्ज़ होती है । कई मर्तबा पुख्ता ज़मीन तैयार करने के लिये डायनामाइट लगाना ज़रुरी हो जाता है । बीजेपी के लाइलाज मर्ज़ से निपटने के लिये गडकरी को सर्जरी की दरकार होगी । कुशल डॉक्टर जानता है कि जीवन सुरक्षित रहे तो अंगदान करने वालों की कमी नहीं रहती ।

मंगलवार, 19 मई 2009

सत्ता सुख की चाहत में शेर बने मेमने

कहते हैं वक्त बदलते वक्त नहीं लगता। यह कहावत भारतीय राजनीति के मौजूदा दौर पर शब्दशः चरितार्थ हो रही है । कल तक जो नेता मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी से अपने समर्थन की भरपूर कीमत वसूलते थे और आये दिन आँखें भी तरेरते थे, वे ही आज बिन माँगा समर्थन देने के लिये ना सिर्फ़ उतावले हैं,बल्कि राष्ट्रपति को चिट्ठी देने के लिये दौड़े चले जा रहे हैं। मज़े की बात ये भी है कि जो काम वे खुद कर रहे हैं, वही काम करने वाले प्रतिद्वंद्वी उनकी नज़र में अवसरवादी और मौकापरस्त हैं।

परमाणु करार के बहाने सरकार के नीचे से ज़मीन खींच लेने का मुग़ालता पालने वाले वामपंथियों को राजनीति के महान दलाल ने करारी शिकस्त दे दी। गु़स्से से लाल हो रहे वामपंथियों को ममता बनर्जी की आड़ में जनता ने इस कदर धो डाला कि अब करात दंपति के साथ साथ सभी का चेहरा ज़र्द पड़ गया है। यूपीए गठबँधन में शामिल तीन तरह की काँग्रेस ने कुछ और सहयोगियों की मदद से विरोधी खेमे के सभी रंग उड़ा दिये हैं।

मायावती का हाथी भी सत्ता की चौखट पर हीला-हवाला किये बग़ैर बँधने को आतुर है। चार बार उत्तर प्रदेश की मुखिया की ज़िम्मेदारी सम्हालने वाली मायावती की निगाह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लगी थी। हो भी क्यों ना आखिर वे एक दलित की बेटी हैं। इसी नाते हक़ है उनका ख्वाब देखने का। खैर हाल फ़िलहाल यह सपना टूट गया तो क्या, वो नहीं बड़ा भाई ही सही कुर्सी तो घर में ही है । माया मेम साब ने जनता को याद दिलाया है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन्हें अपनी छोटी बहन बता चुके हैं ।

ये सब वही लोग हैं जो कल तक कह रहे थे-हमारे सारे विकल्प खुले हुए हैं। हम काँग्रेस के साथ भी जा सकते हैं, भाजपा और तीसरे मोर्चे के साथ भी। सभी ने अजीब सी रहस्यमयी मुस्कुराहट पहन ली थी । हर कोई १६मई के इंतज़ार की बात कह अपने पत्ते खोलने से बच रहा था। यहाँ तक कि वामपंथी दल भी, जो तीसरा मोर्चा बनाए बैठे थे। नीतिश कुमार ने भी अपनी दुकान खूब सजाई और तख्ती टाँग दी कि बिहार को विशेष पैकेज दो और हमारा समर्थन ले जाओ । सब अपनी छोटी-छोटी दुकानें सजाए बैठे थे। १६ मई आए और मैं ग्राहक की जेब खाली कराऊँ......।

तय तारीख आई और चली गई। सजी हुई दुकानों पर किसी ने झूठमूठ भी भाव तक नहीं पूछा। शाम तक दुकानों पर मक्खियाँ भिनभिनाने लगीं। दुकानदार में इतना उत्साह भी नहीं रहा कि उन्हें भगाए। रात होने से पहले-पहले दुकानों पर ताले जड़ गए। सारे विकल्प खोलकर बैठने वाले अब गली-गली फ़ेरी लगा रहे हैं । ठेले पर बिक रहे समर्थन का कोई खरीददार नहीं है। टेर लगाने वालों के गले सूख गये हैं और बिकाऊ माल सड़ने की आशंका में चेहरे मुरझा गये हैं । कल तक अपनी शर्तों पर साथ देने वाले आज बिना शर्त सत्ता के दरवाज़े खूँटे से बँधी गाय बनने को बेताब हैं,लेकिन खरीददार इतना बेरहम हो सकता है ये इन सबने कभी सोचा नहीं था ।

अब ये तो बेरहमी की इंतेहा हो गई । वे बेचारे इसके बदले कुछ माँग भी तो नहीं रहे। उन्हें मंत्री पद की चाहत भी नहीं । वे तो बस काँग्रेस का हाथ अपने साथ चाहते हैं। वे चाहते हैं तो बस इतना कि यूपीए में थोड़ी सी जगह मिल जाये। हम सत्ताधारी पार्टी कहलाएँ,बस इतना-सा संदेश पूँजीपतियों तक जाना चाहिए। बाकी हम अपना इंतजाम खुद कर लेंगे। वे समर्थन देना चाहते हैं और कांग्रेस है कि ले नहीं रही है। कोई धेले को पूछ नहीं रहा। बिहार के चतुर-सुजानों की सारी हेकड़ी धरी की धरी रह गई ।

उधर साइकल की हवा निकल चुकी है,लेकिन इससे क्या? पुराने रिश्ते यूँ पल में झटके से नहीं टूट जाया करते । दिग्विजय सिंह,कमलनाथ जैसे "छुटभैये नेता" अमरसिंह सरीखे महानतम राजनीतिज्ञ पर टीका-टिप्पणी करते हुए शोभा नहीं देते । अमरवाणी के मुताबिक तीसरे और चौथे दर्ज़े के नेताओं की छींटाकशी काँग्रेस से उनके एकतरफ़ा प्रेम की लौ को बुझा नहीं सकती । तभी तो निस्वार्थ भाव से राजनीति के ज़रिये देश सेवा पर उतारु "पॉवर ब्रोकर" महोदय देर किये बग़ैर मीडिया को दिखाते हुए समर्थन की चिट्ठी लेकर राष्ट्रपति भवन पहुँच गये।



लालू की लालटेन की लौ क्या टिमटिमाने लगी,उनके चेहरे का तो मानो नूर ही चला गया । कल तक बिहार में काँग्रेस के लिये तीन सीटों से ज़्यादा नहीं छोड़ने की ज़िद पकड़े बैठे लालू आज अपना समर्थन देने पर आमादा हैं। बार-बार झिड़की खाकर भी पुराने संबंधों की दुहाई देकर लालू एक बार फ़िर सत्ता की मलाई खाने को उतावले हैं । हद तो ये है कि चुनाव के दौरान काँग्रेस पर दहाड़ने वाले लालू प्रसाद अब मिमिया रहे हैं। लेकिन फ़िर भी उनकी खिलाफ़त कर रहे काँग्रेस के दिग्गज नेताओं को दोयम दर्ज़े का बताने से बाज़ नहीं आ रहे। वे अपनी फ़रियाद सोनिया दरबार तक पहुँचाने के लिये उतावले हैं ।

आखिर सत्ता का नशा होता ही है मदमस्त कर देने वाला । जब तक कुर्सी की ताकत रहती है व्यक्ति रहता है मदहोश और जब वह हैसियत छिन जाती है तो वह बेबस और लाचार व्यक्ति " जल बिन मछली" की तरह छटपटाने लगता है । इसी लिये सत्ता सुंदरी के चारों ओर भँवरे से मँडराते ये नेता किसी कीमत पर काँग्रेस से जुदा नहीं होना चाहते । इन सभी नेताओं का दर्द और पीड़ा कमोबेश एक सी है । सितारों ने साथ छोड़ा तो सत्ता भी पकड़ से दूर चली गयी । कल तक जो अपने थे वो सब एकाएक पराये हो गये और इनमें से ज़्यादातर को डर है कि पुराने दिनों की ब्लैक मेलिंग का बदला कहीं अब गिन-गिन कर नहीं लिया जाये ।

नतीजे आने तक लालू, मुलायम,पासवान, करात,शरद पवार, लालकृष्ण आडवाणी, मायावती जैसे नेता दिन में भी प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देखने लगे थे । लेकिन रोज़-रोज़ की तू-तू मैं-मैं से आज़िज़ आ चुकी जनता ने ऎसा दाँव चला कि इन सभी के " दिल के अरमां आँसुओं में बह गये।" जो दल व्यक्तिवादी थे उन्हें हवा के बदले रुख के मुताबिक "शरणम गच्छामि" में ही समझदारी दिखाई दे रही है । इन मौकापरस्तों को एकतरफ़ा प्रेम से भी कोई गुरेज़ नहीं है । दरअसल इस बहाने ये सभी अपने आने वाले कल के अँधियारे को हरसंभव रोकना चाहते हैं । अब सुनहरे सपनों की बजाय अँधियारी काल कोठरी का डरावना ख्याल रातों की नींद उड़ाने लगा है ।