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गुरुवार, 30 अगस्त 2012

लोकतंत्र की दीमक


मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वक्त वो सब हो रहा है , जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । कल तक खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानकर शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ़ खेमेबंदी का झंडा उठाकर चलने वाले कैलाश विजयवर्गीय आज सरकार की झूठन समेट रहे हैं । चाहे वो मुरैना में हुई आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या का मामला हो , महज़ सात सालों में अरबपति बने दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के सीधे ताल्लुकात का मुद्दा हो या कोल ब्लॉक आवंटन मामले में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल हों । मुख्यमंत्री मुँह में दही जमा कर बैठे हैं और कैलाश विजयवर्गीय उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं । गोया कि सूबे के मुखिया बनने का ख्वाब हुआ हवा , अब तो आलम ये है कि कुर्सी बचाए रखने के लिए चौहान की चरणोदक पीने में भी गुरेज़ नहीं रहा ।

 रही सही कसर एमपीसीए के चुनाव में मिली करारी मात ने निकाल दी । धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए माधवराव सिंधिया ने क्लीन स्वीप कर दिया । कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र के सभी हथकंडे अपनाए ,मगर वो भूल गए कि गली-कूचों में “भिया और भिडु “ तैयार करके विधायकी हासिल करना अलग बात है , भद्र और कुलीन समाज का खेल माने जाने वाले क्रिकेट की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना और बात । 

इसी तरह देश के इतिहास में शायद ये पहला ही मौका होगा , जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो सौ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के हुजूम ने इंदौर में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल दिया । संघी मनोज परमार मामले के जाँच अधिकारी के एकाएक तबादले से नाराज़ थे । सूबे के मुखिया के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी कर रहे इन कार्यकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को प्रताड़ित कर रही है । इंदौर इन दिनों गैंगवार और माफ़िया की गिरफ़्त में फ़ँस कर कराह रहा है । मगर इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं । भाजपा समर्थक व्यापारी प्रशासन से गुँडाराज से छुटकारा दिलाने की गुहार लगा रहे हैं ।

प्रदेश के मुखिया हवाई सफ़र, विदेश भ्रमण, तीर्थाटन, देवदर्शन या फ़िर प्रदेश के रमणिक स्थलों पर परिवार के साथ सुस्ताने में व्यस्त रहते हैं । इन गतिविधियों से कभी कुछ वक्त मिल जाता है , तो मीडिया का चोंगा थाम कर देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपने “अनमोल वचन” प्रसारित करके उपस्थित दर्ज कराते रहते हैं । "मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थूकने" की प्रवृत्ति के पोषक मुख्यमंत्री प्रदेश की हर बड़ी घटना पर मुँह सिलकर बैठ जाते हैं । ऎसे मौके पर नरोत्तम मिश्र या कैलाश विजयवर्गीय को आगे कर दिया जाता है । लोग मायावती के प्रचार अभियान पर सरकारी खज़ाने के १२० करोड़ रुपए फ़ूँक दिए जाने पर गाल बजाते हैं । यदि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह की ब्रांडिंग पर जनसंपर्क, वन्या , खेल और तमाम अन्य महकमों के मद से लुटाए गए खज़ाने का अनुमान लाया जाए , तो ये किसी भी सूरत में ३५० करोड़ रुपए से कम नहीं बैठेगा ।

इसके अलावा यह भी एक दिलचस्प खबर है कि सूबे के मुखिया औसत हर रोज़ दो घंटे हवाई यात्रा में बिताते हैं । सब कुछ हवा में ही है, ज़मीन पर कुछ नहीं अगर है भी तो बस पोलपट्टी । यही नतीजा है कि भाजपा के ज़िला पदाधिकारी भी अपना सिर पीट रहे हैं । वे कहते हैं कि ज़िलों में ना सड़क है ना बिजली और ना ही पानी , बरसात में तो हालात बदतर हो चुके हैं , ऎसे में जनता को क्या जवाब दें ? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे चुनाव में जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएँगे ? अधिकांश पदाधिकारी मानते हैं कि इन्हीं मुद्दों को लेकर दिग्विजय सिंह को सत्ता से उखाड़ फ़ेंकने वाली जनता अब भाजपा को सबक सिखाने का मूड बना रही है । मगर दिल्ली की चाँडाल – चौकड़ी को हफ़्ता पहुँचाकर अपनी कुर्सी बचाए रखने वालों का जनता के सुख-दुख से क्या सरोकार ?

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ  के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी प्रदेश सरकार की कारगुज़ारियों पर अँगुली उठाते रहे हैं । ये अलग बात है कि  भाजपा सरकार की मुखालफ़त की उन्हें भारी कीमत चुकाना पड़ी । सच बोलने की सज़ा के तौर पर उन्हें असंवैधानिक तरीके से पद से हटा दिया गया , करीब पंद्रह दिन जेल की सलाखों के पीछे फ़ेंका गया सो अलग । हाल ही में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भोपाल में आयोजित अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम में पहुँचे श्री शर्मा ने प्रदेश सरकार को यूपीए सरकार से भी चार गुना ज़्यादा भ्रष्ट करार देकर सबको सकते में डाल दिया ।

 अपनी साफ़गोई के लिए पहचाने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा जैसे लोगों को सत्ता का रोग मानते हैं । खून- पसीने से पार्टी को सींच कर यहाँ तक पहुँचाने वालों की कतार में शामिल रहे श्री शर्मा का कहना है कि संकट के समय ये लोग नहीं दिखेंगे, उस समय काम आयेंगे त्यागी और सिद्धांतनिष्ठ कार्यकर्ता । मगर उनकी इस नसीहत की आखिर ज़रुरत किसे है? अपना तो क्या चाचा के मामा के ताऊ के फ़ूफ़ा  तक की पुश्तों का इंतज़ाम कर चुके इन सत्ताधीशों को क्या लेना देश से ,यहाँ की जनता से , भारत के लोकतंत्र से ।

दरअसल इस देश में इस तरह के लोकतंत्र की कोई ज़रुरत ही नहीं है । देश में भ्रष्टाचार के मूल में लोकतंत्र के नाम पर खड़े किये गये चूषक तंत्र ही हैं । मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आखिर इस देश में दिल्ली से लेकर गाँवों की गली-कूचों तक जनप्रतिनिधियों के नाम पर खड़े किए गए इन सत्ता के दलालों की ज़रुरत क्यों है ? अगर देश के नेता सिर्फ़ दलाली खाने के लिए ही हैं तो इनका खर्च जनता क्यों उठाए ? राष्ट्र्पति शासन में भी तो सरकारी मशीनरी बिना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बेहतर और सुचारु ढंग से काम करती है । गौर करने वाली बात यह भी है कि जब से नगर निगम और नगर पालिकाएँ बनीं तबसे अव्यवस्थाएँ और गंदगी फ़ैली । महापौर और पार्षद रातोंरात करोड़पति बन गए ,मगर शहरों की हालत बद से बदतर होती गई । यही हाल ग्राम स्वराज के नाम पर खड़ी की गई पंचायती राज व्यवस्था का है । पंच-सरपंच पजेरो में सैर कर रहे हैं लेकिन गरीब आदमी सूखे निवालों से भी महरुम है । यानी अब लोकतंत्र  की दीमकों से छुटकारा पाने के लिए सत्ता बदलने की नहीं , देश चलाने के लिए नय रास्ता तलाशने का वक्त है ।

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सरकारी खज़ाने पर भारी पडता मुख्यमंत्री का उत्सवधर्म

यूँ तो हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी हैं । मौसम का मिजाज़ बदले या फ़िर जीवन से जुड़ा कोई भी पहलू हो, हम पर्व मनाने का बहाना तलाश ही लेते है। साल में जितने दिन होते हैं उससे कहीं ज़्यादा पर्व और त्योहार हैं। अब तक लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर पर्व मनाये जाते रहे हैं। मगर उत्सव धर्मी मुख्यमंत्री के शौक के चलते अब प्रदेश में बारहों महीने सरकारी त्योहार मनाने की नई परंपरा चल पड़ी है। गणपति स्थापना के साथ शुरू हुए उत्सवी माहौल में नवरात्रि आने तक राज्य सरकार ने “बेटी बचाओ अभियान” का जो रंग भरा है,वो जल्दी ही फ़ीका पडता नही दीखता। राज्य में शासन की ओर से “बेटी बचाओ अभियान” नए सिरे से शुरू किया गया है। सरकारी खज़ाने से सौ करोड़ रुपये खर्च कर लिंगानुपात में आ रहे अंतर को पाटना और बालिकाओं को प्रोत्साहन देना मुहिम का खास मकसद बताया जा रहा है।

तूफ़ानी तरीके से चलाये जा रहे इस अभियान के मकसद पर कई बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अभियान ने मीडिया, विज्ञापन और प्रिंटिंग कारोबार में नई जान फ़ूँक दी है। मध्यप्रदेश में कुछेक ज़िलों को छोड़कर शायद ही कोई इलाका ऎसा हो जहाँ लिंगानुपात के हालात इतने चिंताजनक हों। दरअसल लिंग अनुपात में असंतुलन का मुख्य कारण विलुप्त हो रही भारतीय परंपराएँ और संस्कृति है। वाहनों पर चस्पा पोस्टर, बैनर और सड़क किनारे लगे होर्डिंग बेटियाँ बचाने में कारगर साबित होते, तो शायद देश को अब तक तमाम सामाजिक बुराइयों से निजात मिल जाती । जनसंपर्क विभाग की साइट पर अभी कुछ समय पहले एक प्रेस विज्ञप्ति पर नज़र पड़ी, जिसमें बताया गया है कि सरकार ने पानी बचाओ अभियान में गोष्ठी, परिचर्चा, कार्यशाला, सेमिनार और रैली जैसे आयोजनों के ज़रिये जनजागरुकता लाने पर महज़ तीन सालों में करीब नौ सौ तेरह करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिये। पानी के मामले में प्रदेश के हालात पर अब कुछ भी कहना-सुनना बेमानी है। वैसे भी देखने में आया है कि जिस भी मुद्दे पर सरकारी तंत्र का नज़रे-करम हुआ, उसकी नियति तो स्वयं विधाता भी नहीं बदल सकते। कहते हैं,जहँ-जहँ पैर पड़े संतन के,तहँ-तहँ बँटाढ़ार।

कुछ साल पहले बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी से मोहभंग की स्थिति में इस्तीफ़ा देते वक्त पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि बीजेपी को अब टेंट-तंबू वाले चला रहे हैं। मध्यप्रदेश में यह बात शब्दशः साबित हो रही है। सरकारी आयोजनों का लाभ जनता को कितना मिल पा रहा है, यह तो जगज़ाहिर है। मगर मुख्यमंत्री की उत्सवधर्मिता से कुछ चुनिंदा व्यवसायों से जुड़े लोगों की पौ-बारह है। राजनीतिक टोटकों और शिगूफ़ेबाज़ी से जनता को लम्बे समय तक भरमाये रखने का अगर कोई खिताब हो तो देश में बेशक शिवराजसिंह चौहान इसके एकमात्र और निर्विवाद दावेदार साबित होंगे।

उत्सवधर्मिता निभाने में सूबे के शाहखर्च मुखिया किसी से कमतर नहीं हैं। सत्ता सम्हालने के बाद से ही प्रदेश में जश्न का कोई ना कोई बहाना जुट ही जाता है। पहले महापंचायतों का दौर चला, इसके बाद इन्वेस्टर्स मीट के बहाने जश्न मनाये गये। यात्राओं और मंत्रियों को कॉर्पोरेट कल्चर से वाकिफ़ कराने के नाम पर भी जनता के पैसे में खूब आग लगाई गई। फ़िर बारी आई मुख्यमंत्री निवास में करवा चौथ, होली, दीवाली, रक्षाबंधन, ईद, रोज़ा इफ़्तार, क्रिसमस त्योहार मनाने की। जनता के खर्च पर धार्मिक आयोजनों के ज़रिये पुण्य लाभ अपने खाते में डालने का सिलसिला भी खूब चला। “आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश” जैसी शिगूफ़ेबाज़ी से भरपायी सरकार ने “स्वर्णिम मध्यप्रदेश“ का नारा ज़ोर शोर से बुलंद किया। पिछले दो सालों में प्रदेश स्वर्णिम बन सका या नहीं इसकी गवाही सड़कों के गड्ढ़ों, बिजली की किल्लत, बढ़ते अपराधों और किसानो की खुदकुशी के आँकड़ों से बेहतर भला कौन दे सकेगा ? मगर इतना तो तय है कि इस राजनीतिक स्टंट से नेताओं, ठेकेदारों, माफ़ियाओं, दलालों, उद्योगपतियों और मीडिया से जुड़े चंद लोगों की तिजोरियाँ सोने की सिल्लियों से ज़रुर “फ़ुल“ हो गईं हैं।

इसी तरह सत्ता पर येनकेन प्रकारेण पाँच साल काबिज़ रहने में कामयाब रहे शिवराजसिंह चौहान और जेब कटी जनता की। मुख्यमंत्री पद पर पाँच साल पूरे होने की खुशी में पिछले साल करीब चार करोड़ रुपये खर्च कर गौरव दिवस समारोह मनाया गया। संगठन के मुखिया प्रभात झा की कुर्सी प्राप्ति का सालाना जश्न भी मुख्यमंत्री निवास में धूमधाम से मना।

प्रदेश में एक के बाद एक आयोजनों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। मालूम होता है मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस समारोह की रंगीनियाँ जल्दी ही बेटी बचाओ अभियान को पीछे छोड़ देंगी। अब तक रावण वध से लेकर दीपावली की शुभकामना संदेशों तक हर मौके पर बेटी बचाने का संदेश प्रसारित करने में व्यस्त मुख्यमंत्री जी जल्दी ही मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के लिये जनता का आह्वान करते नज़र आयेंगे। उनके इस बर्ताव को देखकर बस इतना ही कहना मुनासिब होगा-आधी छोड़ पूरी को ध्यावै आधी मिले ना पूरी पावै।

बहरहाल खबर है कि भोपाल में होने वाले मुख्य समारोह में बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की नृत्य नाटिका और आशा भोंसले के नग़्मे जश्न में चार चाँद लायेंगे। वहीं लेज़र शो आयोजन का खास आकर्षण होगा। हर जश्न में लेज़र शो की प्रस्तुति का नया ट्रेंड भी शोध का विषय है। आजकल हर सरकारी समारोह में लेज़र शो और आतिशबाज़ी का भव्य प्रदर्शन सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर इन दोनों कारोबारों के साथ ही इवेंट मैनेजमेंट में किन बड़े भाजपा नेताओं का पैसा लगा है ? सवाल लाज़मी है कि कर्मचारियों को वेतन-भत्ते या जनता को करों में रियायत देकर महँगाई पर अँकुश लगाने के मुद्दे पर हाथ खींचने वाली राज्य सरकार आखिर इन जश्नों पर पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ?

फ़िज़ूलखर्ची का आलम ये है कि समारोह को भव्य बनाने के लिये चार लाख निमंत्रण पत्र छपवाए गये हैं,जबकि आयोजन स्थल लाल परेड ग्राउंड में एक लाख लोग भी बमुश्किल समा पायेंगे। माले मुफ़्त दिले बेरहम की तर्ज़ पर सरकार ने चार लाख कार्डों की छपाई पर चालीस लाख रुपये खर्च किये हैं । अमूमन सरकारी आयोजनों में लोगों की दिलचस्पी कम ही होती है। शाहखर्ची को जस्टिफ़ाय करने के लिये लोगों को घर-घर जाकर निहोरे खा-खा कर समारोह में आमंत्रित किया जा रहा है। बदहाल और फ़टेहाल प्रदेश की छप्पनवीं सालगिरह पर संस्कृति विभाग तीन करोड़ रुपए खर्च करने का इरादा रखता है। इनमें से दो करोड़ रुपये की होली भोपाल के मुख्य समारोह में जलाई जायेगी। संस्कृति विभाग में एक तृतीय श्रेणी की हैसियत रखने वाले व्यक्ति को तमाम नियम कायदों के विपरीत जाकर संचालक पद से नवाज़ा गया है।  अपनी अदभुत जुगाड़ क्षमता और संघ को साधने में महारत के चलते एक गैर आईएएस व्यक्ति एक साथ संस्कृति संचालक,वन्या प्रकाशन और स्वराज संस्थान प्रमुख जैसे अहम पदों पर काबिज़ है । सरकारी खज़ाने में सेंध लगाने के आये दिन नायाब नुस्खे ढ़ूँढ़ लाने में माहिर यह अफ़सर सरकार और संघ की आँखों का तारा बना हुआ है।

पूरे प्रदेश में वन, खनन, शिक्षा, ज़मीन की बँदरबाँट और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऎतिहासिक धरोहरों की लूटखसोट मची है। ऎसे हालात में चारों तरफ़ जश्न के माहौल को देखकर रोम में बाँसुरी बजाते नीरो को याद करने की बजाय मगध में घनानंद के राजकाज की यादें ताज़ा होना स्वाभाविक ही है । ऎसे घटाटोप में चाणक्य और चंन्द्रगुप्त के अवतरण का बस इंतज़ार ही किया जा सकता है ।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

मध्यप्रदेश में शिव"ताँडव"

सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशोखरोश के साथ जश्न मनाने की तैयारियों में जुटी है । शिवराज सिंह प्रदेश की गैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऎसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं । इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है । ऎसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर "गौरव दिवस" मनाने पर आमादा है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । बीजेपी का "गौरव दिवस" मौका भी है सरकार की कार्यशैली की समीक्षा का । साथ ही पीछे मुड़कर यह देखने का कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया ।

शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं,दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये,तो वे राजनीति की "राखी सावंत" से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी फ़िदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है । घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी हकीकत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फ़ोड़ने की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के खिलाफ़ सत्याग्रह, धरने,प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं । दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नज़र आते हैं । वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं । वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं,बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में "अँधों में काना राजा" की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मजबूरी बन गये हैं ।

शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय काफ़ी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है । जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया । जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं भी कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना "मित्र धर्म" बखूबी निभाया ।

शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था कि प्रदेश में सात तरह के माफ़ियाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिलाकरही दम लेंगे । लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश में फ़ैले गुंडाराज की कहानी खुद बयान करती है । आज आलम ये है कि भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के फ़ायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है ।

भय,भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है । बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ "ढूँढ़ते रह जाओगे" के हालात में पहुँच गई हैं । केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तर्ज़ पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है । राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे ज़िम्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है । पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से "तर" सरकार आम जनता की परेशानियों से बेखबर है ।

पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई फ़ायदा मिला हो । "आगे पाठ पीछे सपाट" के फ़ार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगूफ़ेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है ।

कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोड़ने की कवायद के बाद शिवराज ने "स्वर्णिम मध्यप्रदेश" का शोशा छोड़ा । १ नवम्बर १९५६ को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने "आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश" की मुहिम छेड़ रखी है । मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अखबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है । मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश "स्वर्णिम" बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती इसके पहले ही वे इन दिनों वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं ।

बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की "चाचाजी" वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज "मामाजी" के तौर पर मकबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है । नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ रफ़्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से "प्रधानमंत्री कब बनोगे" सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंज़िल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे ।

छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के सफ़र में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान हैं। एक तरफ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है । जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है । प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बेफ़िक्र है । वोट बैंक की खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है । राजधानी भोपाल की ऎतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऎतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को साफ़ करती है । किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है । अवैध खनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है । वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह ज़िले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैध कटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से फ़लफ़ूल रहा है ।

दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऎसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढ़ंग अपनाना शुरु कर दिया । अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार,महिला उत्पीड़न,अपहरण,हत्या,लूट,चोरी,डकैती,फ़िरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्राफ़ लगातार कुलाँचे मार रहा है । प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्राफ़ रफ़्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही सफ़लता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कर्ज़ लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़ोरों पर है ।

तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की हकीकत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सिर्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षो में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।

उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सिर्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण,व्यावसायिक सहयोग,प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।

प्रदेश में गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। गरीबी यहाँ तेजी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जिलों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जिले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हजार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में गरीबी बढ़ने की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऎशो आराम पर दिल खोलकर खर्च रही है ।

भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढ़ने के फ़ेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने नगमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन "लागा चुनरी में दाग" गाकर महफ़िल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ ज़िलों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं । वैसे विजय शाह के साथ गले में ढ़ोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में फ़ँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन "तो दाग अच्छे हैं" की तरह अपने दामन पर लगे "डंपर कांड" के दाग को भी "जस्टिफ़ाई" कर रहे हैं ।

वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है । उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं । बहरहाल इस अनंतकथा को कम शब्दों में बखान करने के लिये फ़िलहाल इतना कहना ही काफ़ी होगा -"हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, बहु बिधि कहहिं सुनहिं सब सन्ता ।"

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

गलत क्या कहा शिवराज ने ....?

मीडिया की मेहरबानी और ओछी राजनीति के चलते मध्यप्रदेश मे मुख्यमंत्री बैठे ठाले मुश्किल में पड़ गये हैं । स्थानीय लोगों को छोटॆ-मोटे रोज़गार की तलाश में अपना घर द्वार छोड़कर भटकना ना पड़े , इस इरादे से सूबे के मुखिया ने एक बात कह दी , जिसे मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मिर्च-मसाले के साथ परोस दिया । सियासी फ़ायदा उठाने वालों की तो जैसे बन आई । लिहाज़ा बिहार की अदालत में याचिका लगा दी गई । अब बेतिया ज़िले की अदालत के आदेश पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। बेतिया व्यवहार न्यायालय के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मिथिलेष कुमार द्विवेदी के आदेश पर मुख्यमंत्री के खिलाफ धारा 124 (ए), 153 (ए), 153 (बी), 181, 500 और 504 के तहत मामला कायम हुआ है। गौरतलब है कि नौ नवंबर को वकील मुराद अली ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में दाखिल याचिका में आरोप लगाया था कि सतना में बिहारियों के खिलाफ़ दिया गया शिवराज सिंह का भाषण मुख्यमंत्री बनने के समय लिए गए शपथ के विरूद्ध है । यह बिहारवासियों का अपमान है और इससे क्षेत्रवाद फैलेगा।


न्यायालय ने मामला दर्ज़ करने का आदेश दिया है,लेकिन इस पूरे मसले में शिवराजसिंह कहीं भी दोषी नज़र नहीं आते । मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मामले को बेवजह तूल दिया । उनके बयान को गौर से सुनें,तो उसमें ना तो कोई अलगाव पैदा करने वाली बात कही गई थी और ना ही मनसे नेता राज ठाकरे की तरह भड़काऊ बयान दिया गया था । उन्होंने सहज ही जो बात कही वो कतई गलत नहीं थी । बल्कि सूबे के मुखिया होने के नाते उनके नज़रिये में कोई खोट भी नहीं है ।

क्षेत्र में कारखाना और उद्योग लगे और वहाँ का युवा या कामगार दूसरी जगह जाकर काम की तलाश में भटके, तो फ़िर वही हालात पैदा होते हैं , जो फ़िलहाल यूपी-बिहार में हैं । बेरोज़गारी से पनपने वाला असंतोष सामाजिक असंतुलन और अपराधों का सबब बन जाता है । राज्य सरकारों का काम ही है अपने सूबे की तरक्की के लिये कोशिश करना । अगर मध्यप्रदेश में कारखाना लगेगा,तो ज़ाहिर सी बात है स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी ही जाना चाहिए । मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज ने स्थानीय लोगों को नौकरियों में पचास फ़ीसदी प्राथमिकता देने की बात कह भी दी ,तो कौन सा कहर ढ़हा दिया ?

यूपी और बिहार से आकर नौकरी करने वाले सरकारी अफ़सरों ने प्रदेश को लूटने खसोटने में जिस तरह के बुद्धि कौशल और चातुर्य का परिचय दिया है, उसने इन प्रदेशों की छबि देश भर में बिगाड़कर रख दी है । कहते हुए दिल दुखता है लेकिन भाई-भतीजावाद की इससे बेहतर मिसाल क्या होगी कि भिलाई स्टील प्लांट हो या बीएचईएल छोटे और औसत दर्ज़े के सत्तर से अस्सी फ़ीसदी पदों पर बाहरी लोगों का कब्ज़ा है, जबकि स्थानीय कामगार दूसरे शहरों की खाक छान रहे हैं ।
तकनीक के इस दौर में उच्च शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं के लिये देश ही नहीं विदेशों में भी रोज़गार के तमाम मौके हैं, मगर असंगठित और अप्रशिक्षित हाथों को दो जून की रोटी की तलाश में हज़ारों किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़े, महानगरों में नारकीय जीवन गुज़ारते हुए खोमचे लगाना पड़े या दिहाड़ी मज़दूरी करना पड़े,तो यह सरकारों की विकास योजनाओं पर करारे तमाचे से कमतर नहीं है । यूँ भी रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वालों की ज़्यादातर ऊर्जा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में खप जाती है । जिस क्षेत्र में कारखाना लगता है, वहाँ की आबोहवा, ज़मीन, जंगल, पानी पर उसी इलाके के लोगों का पहला हक है । यदि देश और समाज की तरक्की के लिये वे अपना हिस्सा सभी के साथ बाँटने को तैयार हैं,तो उनके जायज़ हक को सौंपने में इतनी तंगदिली क्यों ? किसी भी देश,प्रदेश या क्षेत्र को तरक्की करना है तो योग्यता के साथ-साथ स्थानीय प्रतिभा को प्राथमिकता देना ही चाहिए।

शिवराज के बयान को तंग नज़रिये से देखने की बजाय व्यापक दृष्टिकोण से समझने की ज़रुरत है । सरकारों को इस मुद्दे पर नीतिगत फ़ैसला लेना चाहिए । टटपूँजिये तरीके से बाल की खाल निकाल कर राजनीति तो चमकाई जा सकती है, लेकिन किस कीमत पर ? अब वो वक्त आ चुका है , जब देश के कालिदासों की सेनाओं को समझना चाहिए कि नोचने-खसोटने के लिये ज़्यादा कुछ बचा नहीं है । दमतोड़ते लोकतंत्र की लाश को नोचने की सीमा भी आने को है । सम्हलो-वरना जिस दिन देश का अनपढ़-अनगढ़ आदमी उठ खड़ा हुआ तो नेताओं की जमात का नामलेवा भी नहीं बचेगा ।

रविवार, 2 नवंबर 2008

लोक परंपराओं और वन संपदा के सौदागर

हमारे पौराणिक ग्रंथों में पाताललोक का ज़िक्र अक्सर आता है । पाताल कहते ही ज़ेहन में एक चित्र उभरता है , जो हमें धरती के नीचे सात पातालों की कल्पना में पहुंचा देते हैं । देश के ह्र्दय कहलाने वाले मध्य प्रदेश की धरती पर एक यथार्थ लोक है - पातालकोट । छिंदवाडा ज़िले के उत्तर में सतपुडा के पठार पर स्थित पातालकोट कुदरत की अदभुत रचना है । ८९ वर्ग किलोमीटर में फ़ैली पातालकोट की धरा को नज़दीक से निहारना अपने आप में कौतूहल से भरा अनूठा अनुभव है ।

यहां के किसी भी गांव तक पहुंचने के लिए १२०० से १५०० फ़ीट की गहराई तक उतरना पडता है । घाटियां इतनी नीचे चली गई हैं कि उनमें झांक कर देखना भी मुश्किल है । ऎसा लगता है यहां शिखरों और घाटियों में होड लगी है , कौन कितना गौरव के साथ ऊंचा जाता है और कौन कितना विनम्रता के साथ झुकता हुआ धरती के अंतिम छोर को छू सकता है । इस कोशिश के गवाह हैं तरह - तरह के पेड - पौधे , जो घाटियों के गर्भ में और शिखरों की फ़ुनगियों पर बिना किसी भेदभाव के फ़ैले हुए हैं । निर्मल झरने , झिरियों और सरिताओं ने पातालकोट को नया जीवन दिया है ।

राजाखोह , दूधी और गायनी नदियों के उदगम की गहरी खाइयों में सूरज की किरणें अलसाती हुईं दोपहर बारह बजे तक दस्तक देने पहुंचती हैं और किसी प्रेयसी की तरह जल्द से जल्द मुलाकात खत्म कर लौट जाने की फ़िराक में रहती हैं । शाम चार बजने तक अंधियारा पांव पसारने लगता है । पातालकोट में भारिया जनजाति के लोग सदियों से रहते हैं । बाहरी दुनिया से अनजान इन लोगों की ज़िन्दगी में देश - दुनिया की विकास की गौरव गाथा का भी कोई पहलू शामिल नज़र नहीं आता । यहां दो - ढाई हज़ार लोग अजूबे की ज़िंदगी जी रहे हैं ।

वन संपदा के धनी इस इलाके के विकास के लिए सरकार अब तक अरबों रुपए फ़ूंक चुकी है । भारिया जनजाति के विकास और उसकी संस्क्रति को सहेजने के लिए विशेष पैकेज बनाए गये लेकिन नताजा वही - ढाक के तीन पात । न तो भारिया अब तक समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सके और न ही आदिवासियों का पारंपारिक औषधीय ग्यान बाहरी लोगों तक पहुंच सका है ।

यहां के लोग भुमका और गुनिया पर सबसे ज़्यादा विश्वास करते हैं । गुनिया जडी - बूटी का अच्छा जानकार होता है , जबकि भुमका मारक - तारक तंत्र - मंत्र में माहिर माना जाता है । भुमका नाडी देखकर बीमारी का निदान करते हैं । उनका कहना है कि हम बगैर पढे - लिखे लोग दिल पढना जानते हैं और वही पढकर रोग की जड का पता लगा लेते हैं । भुमका कहते हैं - " नाडी देखकर भगवान के नाम पर पानी छोड देते हैं । इससे बीमारी ठीक हो जाती है ।" उनके मुताबिक दिल की गहराइयों से बोले गये मंत्र असर करते हैं । दी गई जडी - बूटियां फ़ौरन फ़ायदा पहुंचाती हैं ।

पातालकोट में ऎसी जडी - बूटियां पाई जाती हैं , जो भारत में कहीं और मिलना नामुमकिन है । शायद इसीलिए कई निजी कंपनियों ने विदेशी कंपनियों से हाथ मिलाकर यहां डेरा डाल दिया है । इंटरनेट के ज़रिए यहां की दुर्लभ जडी - बूटियां विदेशों में बेची जा रही है । वन संपदा के बेतरह दोहन से सरकार अनजान बनी हुई है । इलाके में एकाएक व्यापारिक गतिविधियां बढ जाने से बाहरी लोगों की आवाजाही भी तेज़ी से बढी है । अनमोल जडी बूटियों को बाज़ार में बेचकर तिजोरी भर रहे व्यापारियों ने कुदरत के बेशकीमती खज़ाने में सेंध लगा दी है । कई जडी बूटियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं । लेकिन वन विभाग इससे बेखबर है ।

बाहरी लोगों का भारिया जनजाति के रहन - सहन पर भी खासा असर साफ़ दिखाई देने लगा है । ढोल और मांदल की थाप पर थिरकने वाले ये वनवासी अब पाश्चात्य संगीत पर झूम रहे हैं । नई पीढी लोकगीत और लोकधुनों को बिसरा चुकी है । फ़िल्मी गीतों की दीवानगी इस कदर बढी कि अब ढोल - नगाडॆ नौजवानों के लिए गुज़रे ज़माने की बात हो चले हैं ।

बाहरी चमक दमक का असर इस हद तक बढ गया है कि भारिया जनजाति की लोक संस्क्रति और परंपराओं के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है । भोले भाले आदिवासियों को सस्ते म्यूज़िक प्लेयर थमाकर व्यापारी अनमोल जडी - बूटियों पर हाथ साफ़ कर रहे हैं । अब तो बुज़ुर्ग भारिया भी मानने लगे हैं कि पातालकोट की पहचान बचाने के लिए दुर्लभ जडी - बूटियों के बेजा इस्तेमाल पर पाबंदी लगाना ज़रुरी है । वे आदिवासी परंपराओं के शहरीकरण को लेकर भी चिंतित हैं ।

दुआ है दुश्मनों को , जो सरे आम बुरा करते हैं
उन दोस्तों से तौबा ,जो दोस्ती में क्त्लेआम करते हैं ।