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शनिवार, 23 जनवरी 2010

पूँजीवादी अमरसिंह लायेंगे समाजवाद

परिवारों में दरार डालने और रिश्तों में दीवार खड़ी करने के लिये ख्याति अर्जित करने वाले अमरसिंह अब की बार मुलायम से अपने हर उपकार का हिसाब एक ही बार में सूद सहित वसूल लेना चाहते हैं । अपनी शिकस्त से बौखलाये अमरसिंह ने अब की बार पार्टी को दो फ़ाड़ करने की ठान ली है । खून के रिश्तों में खटास लाने के अमरसिंह के अचूक नुस्खे पर राम गोपाल यादव और मुलायम सिंह के रिश्तों की मज़बूती भारी पड़ गई । पूँजीवादी अमरसिंह से शायद खाँटी समाजवादियों के देसी मन को पढ़ने में चूक हो गई । तभी तो रिश्तों की मज़बूत डोर से बँधे यादव परिवार से परिवारवाद का आरोप झेलकर पूँजीवाद का कलंक अपने माथे से धो डालने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया ।

आये दिन रुठने मनाने के सिलसिले से आज़िज़ आ चुके मुलायम अमर पर "कड़क" क्या हुए समाजवादी पार्टी में दो फ़ाड़ की नौबत आ गई है । गौरतलब है कि अमर सिंह ने हाल ही में कहा था कि "मैं मुलायमवादी नहीं समाजवादी हूं।" उनके इस बयान पर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं । मुलायमवाद से मोहभंग होने के बाद समाजवादी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने वाले अमर सिंह इन दिनों समाजवाद के किसी नए आयाम की तलाश कर रहे हैं। हो सकता है कि जल्द ही इसका नतीजा किसी नई पार्टी के गठन के रूप में सामने आए। अमर सिंह ने कई राजनीतिक कार्यक्रमों की घोषणा की है । माना जा रहा है कि इसके ज़रिए वह मौजूदा राजनीतिक स्थिति को पढ़ना चाहते हैं । अमर सिंह के मुताबिक़ वह ''सच्चे समाजवादी'' मध्य प्रदेश के नेता रघु ठाकुर से मिलना चाहेंगे और रामपुर, मथुरा और ग़ाज़ीपुर में कार्यक्रमों में हिस्सा लेना चाहते हैं ।

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि सिंह पुराने समाजवादियों को इकटठा कर नया मोर्चा बनाने की कोशिश कर सकते हैं जिसे समाजवादी विचारधारा से जुड़े किसी नए राजनीतिक दल की शक्ल दी जा सकती है। कल तक खुद को मुलायम का दर्ज़ी यानी खुले तौर पर मुलायमवादी होने का दावा करने वाले अमरसिंह अब पार्टी के लिये "अमरबेल" साबित हो रहे हैं । समाजवाद को पूँजीवाद की चाट लगाकर चकाचौंध से भरी सिनेमाई दुनिया की रंगीनियों की सैर कराने वाले ठाकुर साहब अब एक ही झटके में पार्टी को बेनूर कर देने पर आमादा हैं ।

संभावनाओं की सियासत के बड़े खिलाड़ी अमर सिंह सुर्खियों में रहने के गुर बखूबी जानते हैं । हाल के दिनों में फ़िल्मी सितारों की चमक दमक में गुम हो चुकी समाजवादी पार्टी में एक दौर वो भी था तब बेनी प्रसाद का जलवा हुआ करता था, जनेश्वर मिश्र संसद में बोलने उठते थे लेकिन उनको सुनते थे। राम गोपाल यादव पार्टी की राजनीति में निर्णायक माने जाते थे और मुलायम समेत इन सबको समाजवादी माना जाता था। ये अमर सिंह के कैरियर का शुरुआती दौर था। लेकिन अमर धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी की मुख्य धारा बन गये और बेनी प्रसाद हाशिये से होते-होते बाहर, जनेश्वर पार्टी मे सजावट की चीज बन गये । राम गोपाल यादव कैकेयी की भूमिका में दिख्ने लगे। भाई मुलाय़म का प्रोफाइल अचानक काफी बढ गया, धुर गँवई "नेताजी" अमिताभ और अनिल अंबानी के संग सोहने लगे। भाई पर अमर प्रेम का ऐसा नशा चढ़ा कि अमर सिंह समाजवाद की पहचान बन गये ।  लोग कनफ्यूज्ड कि ये अमर सिंह का प्रमोशन था या फिर मुलामय का डिमोशन।

छन-छन कर आ रही खबरों के मुताबिक अमर सिंह पुराने समाजवादी और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघु ठाकुर के लगातार संपर्क में हैं । सिंह ने फोन पर उनसे संपर्क कर कहा है कि वे उनके रचनात्मक कार्यो से जुडना चाहते हैं। मध्यप्रदेश के सागर के निवासी और समाजवादी पार्टी के अनेक दिग्गज नेताओं के सहयोगी रहे ठाकुर ने कहा कि अमर सिंह ने उनसे मिलने की इच्छा भी जताई है। संभवत: 25 जनवरी को दिल्ली में अमर सिंह और रघु ठाकुर की मुलाकात होगी।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

मुन्नाभाई की साइकल सवारी, गाँधीगिरी गाँधीवाद पर भारी

अपने मुन्ना भाई भले ही एमबीबीएस ना कर पाए हों मगर अब साइकल की सवारी कर संसद भवन में एंट्री की पूरी तैयारी में हैं । समाजवादी पार्टी सत्ता हासिल करने के लिए किस स्तर तक जा सकती है ये तो अमर सिंह का अगला बयान ही बताएगा । लेकिन एक सवाल - टाडा के तहत दोषी करार दिये गये संजय दत्त को क्या सिर्फ़ इस लिये संसद में पहुंचने का हक मिल जाना चाहिए क्योंकि वे एक फ़िल्म में गाँधीगिरी के पक्ष में खडे दिखाई देते हैं । किसी फ़िल्म का हिट होना और उसका कोई जुमला लोगों की ज़ुबान पर चढ जाना ही सांसद बनने की योग्यता का पैमाना कैसे बन सकता है ?

माननीय अमरुद्दीन बाटला हाउस एनकाउंटर को फ़र्ज़ी करार देने में नहीं हिचकते , हिलेरी क्लिंटन की समाजसेवी संस्था को मोटा चंदा देने की बात पर चुप लगा जाते हैं । एकाएक संजय दत्त की उम्मीदवारी को जायज़ ठहराने के लिए एक फ़िल्म का हवाला देते हैं । अमर वाणी है कि संजय दत्त ने युवाओं के बीच अपनी फ़िल्म के माध्यम से गाँधी को दोबारा लोकप्रिय बनाने का सराहनीय काम किया है । गोया कि गाँधी जी भारत में अपनी पहचान के लिए संजय दत्त के मोहताज हों ....।

मज़े की बात है कि अमर सिंह गाँधीजी के नाम पर संजय दत्त को राजनीति की सीढियों पर ऊपर चढाने की जुगत लगा रहे हैं । उधर मुम्बई हमले के बाद मीडिया को बुलाकर कैमरे के सामने अपनी पीडा बताते हुए संजय दत्त खुद मानते हैं कि गाँधीगिरी करके आतंकियों से नहीं निपटा जा सकता ।

अमर सिंह आखिर देश को कहां ले जाना चाहते हैं .....? सारे भांड - मिरासियों , अपराधी तत्वों की फ़ौज संसद में पहुंचा कर ही दम लेंगे क्या ...?अमर सिंह जी ज़रा इन नामों पर भी गौर करें : अबु सलेम , बबलू श्रीवास्तव, मोनिका बेदी भी खासे लोकप्रिय हैं , इन्हें भी टिकट की दरकार है । ऎसा ही चलता रहा तो शोले का गब्बर सिंह वाला डायलाग चलन में लौटेगा संसद सदस्यों के लिए - ठाकुर ने .........की फ़ौज तैयार की है ।

लेकिन एक बात गौर करने वाली है कि गांधी के देश में गाँधी को पूछने वाला कोई नहीं । युवाओं में गाँधीगिरी का क्रेज़ है लेकिन गाँधीवाद दम तोड चुका है । गाँधी दर्शन लोगों के आचार , विचार और व्यवहार से गुम हो चुका है । इसका सबसे बडा उदाहरण है गाँवों की पहचान का खत्म होना । ग्रामीण अर्थव्यवस्था का तार तार हो जाना । एक वक्त था जब शहर गाँवों पर निर्भर थे लेकिन अब गाँव शहरों के मोहताज होकर रह गये हैं । बहरहाल गाँधीजी के दर्शन पर चर्चा फ़िर कभी ।

वैसे एक दिलचस्प खबर और भी .....। अपराधी तत्व संवैधानिक संस्थानों में पूरी ठसक से प्रवेश पा रहे हैं , जनता की सहमति लेकर .....???????? मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री , तमाम मंत्रियों और आला अफ़सरों की सुरक्षा में लगे 1000 अंगरक्षकों के चरित्र का गोपनीय सत्यापन कराया जा रहा है । वीआईपी सुरक्षा में तैनात किए जाने वाले अंगरक्षकों की कार गुज़ारियों को जानने के लिए उनके पिछले तीन सालों का रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है । इसमें उनकी दिनचर्या ,लत और संगत का लेखा जोखा तैयार किया जाना है ।

वैसे बता दें कि एक गैर सरकारी संगठन नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश ,राजस्थान , दिल्ली ,छत्तीसगढ मिज़ोरम में हाल ही में चुने गये 549 विधायकों में से 124 का आपराधिक रिकॉर्ड है । यानी हर पाँच में से एक ...। आप ही तय करें सुरक्षा की ज़रुरत किसे है ...?