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रविवार, 8 मार्च 2009

होली की अग्नि में भस्म होते खटमल........

बाज़ार से लौटते वक्त आज सड़क किनारे बैठे मटके वालों के पास बड़बूले ( गोबर की बनी आकृतियाँ) की माला देखकर बचपन की कई यादें आँखों के सामने तैर गईं । होली का डाँडा गड़ते ही हमें ज़्यादा से ज़्यादा गोबर इकट्ठा करने की हिदायत मिल जाती थी । पूरे मोहल्ले में लड़कियों के बीच होड़ लग जाती थी कौन कितनी बड़ी माला तैयार करेगा । हर रोज़ गोबर की तलाश , फ़िर राख बिछाकर उस पर बड़बूले तैयार करने , उन्हें सहेजने , उलट- पलट कर सुखाने में वक्त कब गुज़र जाता , पता ही नहीं चलता था ।

हर रोज़ माँ बताती , तीन भाई यानी तीन मालाएँ । इतना ही नहीं माला की सजावट के लिए तरह - तरह की आकृतियाँ - जीभ , कटी जीभ , शकरपारा , पान का पत्ता ,कटा पत्ता । भाइयों की रक्षा की कामना से बनाई गई ढाल और तलवार , जिसे बड़े ही जतन और मनोयोग से आटे ,हल्दी , कुमकुम से सजाया जाता था । दो दियों के बीच गेंहूँ के कुछ दाने भरकर , ऊपर से गोबर लगा कर नारियल की शक्ल में ढाला जाता था । होलिका की पूजा की थाली में ये सभी चीज़ें सजाई जाती थीं ।

साल दर साल यह प्रक्रिया धीरे - धीरे शिथिल होती गई और अब तो लगभग खत्म ही हो चुकी है । ना गाय - भैंसे हैं और गोबर मिल भी जाए तो वक्त कहाँ है । बड़े की तो छोड़ों दस साल के छोटे बेटे की सोच भी "आधुनिक" है , उन्हें अपनी माँ के "परंपरा प्रेम" पर घनघोर आपत्ति है । लेकिन इस सबके बीच भी मेरा मन मुझे बार - बार वह सब याद दिलाता है ,छटपटाता है । समझ नहीं पाती शहर में बड़बूले की दुकान सजने को किस नज़रिये से देखूँ । परंपराएँ लौट रही हैं , इस बात की खुशियाँ मनाऊँ या यह मान कर संतोष कर लूँ कि टूटती ही सही अब भी कुछ साँसें बाकी हैं हमारी लोक परंपराओं की ...।

होली प्रकृति परिवर्तन का समारोह है । प्रकृति अपने दूषित - जर्जर वस्त्रों को त्याग कर उनका सूर्य की अग्नि में दाह संस्कार करती है । इसी तरह साल भर सांसारिकता के जंजाल में उलझा मानव मन भी मैला हो जाता है । होली अवसर है रंगों की मौज मस्ती के साथ मन का मैल धोने का ...।

मध्यप्रदेश के मालवा और निमाड़ अंचल में होली की अग्नि घर लाने की परंपरा है । लोक मान्यता है कि सब की नज़र बचा कर अँधेरा रहते ही होली की अँगार घर लाने से साल भर समृद्धि बनी रहती है । कम से कम सात दिन तक अग्नि चूल्हे में कायम रहे ,इस बात का खास ख्याल रखा जाता है । इसी तरह होलिका दहन की अग्नि पर गर्म किये गये पानी से बच्चों को नहलाने से गर्मी का मुकाबला करने की क्षमता विकसित हो जाती है । होलिका के आशीर्वाद से निःसंतान दंपतियों के घर आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजने की बात को सही बताने वाले भी ढेरों लोग मिल जाएँगे ।

होली में गेंहूँ की बालियाँ सेंक कर खाने का रिवाज़ है । मेरी माँ का कहना है कि इससे आँत और दाँत ,दोनों मज़बूत होते हैं । घर का कूड़ा- करकट भी होलिका में जलाने की परंपरा को भी परिवार की सुख-समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है । होली की अग्नि खरपतवार और अन्य जंगली पौधों से नुकसान उठा रहे किसानों के लिए भी वरदान है । खेतों में "आग्या" नाम की खरपतवार फ़सल की बढवार में रुकावट डालती है । किसान लोहे के यंत्र "पास" को होली की आग में तपाकर इस खरपतवार पर डालते हैं ,जिससे वह समूल नष्ट हो जाती है ।

ताँत्रिक-माँत्रिक होली की राख का उपयोग बिच्छू का ज़हर उतारने में करते हैं । कई अन्य मँत्रोपचारों में भी यह राख चमत्कारिक असर दिखाती है । रात में चुपके से आपका खून ही नहीं ,नींद और चैन भी चुरा लेने वाली निशाचरी सेना यानी " खटमल" भी होली की अग्नि में हमेशा के लिए भस्म किए जा सकते हैं । तो छॊड़िये खटमलमार दवाओं का चक्कर और आज़मा लीजिए दादी- नानी के ज़माने का नुस्खा़ - धुलेंडी वाले दिन कुछ देर के लिए फ़ाग की मस्ती भूलकर झटपट कुछ खटमलों को ज़िन्दा पकड़िये । इन्हें एक पुड़िया में बाँधकर होली की अग्नि में भस्मीभूत कर दें । कुछ ही दिनों में आप निशाचरी सेना को ढूँढते ही रह जाएँगे..........। लेकिन ये नुस्खा चुनावी खटमलों पर आज तक आज़माया नहीं गया है । कोई कृपालु इस प्रयोग में सफ़लता हासिल करे , तो कृपया हमें ज़रुर सूचित करे ।