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रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सरकारी खज़ाने पर भारी पडता मुख्यमंत्री का उत्सवधर्म

यूँ तो हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी हैं । मौसम का मिजाज़ बदले या फ़िर जीवन से जुड़ा कोई भी पहलू हो, हम पर्व मनाने का बहाना तलाश ही लेते है। साल में जितने दिन होते हैं उससे कहीं ज़्यादा पर्व और त्योहार हैं। अब तक लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर पर्व मनाये जाते रहे हैं। मगर उत्सव धर्मी मुख्यमंत्री के शौक के चलते अब प्रदेश में बारहों महीने सरकारी त्योहार मनाने की नई परंपरा चल पड़ी है। गणपति स्थापना के साथ शुरू हुए उत्सवी माहौल में नवरात्रि आने तक राज्य सरकार ने “बेटी बचाओ अभियान” का जो रंग भरा है,वो जल्दी ही फ़ीका पडता नही दीखता। राज्य में शासन की ओर से “बेटी बचाओ अभियान” नए सिरे से शुरू किया गया है। सरकारी खज़ाने से सौ करोड़ रुपये खर्च कर लिंगानुपात में आ रहे अंतर को पाटना और बालिकाओं को प्रोत्साहन देना मुहिम का खास मकसद बताया जा रहा है।

तूफ़ानी तरीके से चलाये जा रहे इस अभियान के मकसद पर कई बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अभियान ने मीडिया, विज्ञापन और प्रिंटिंग कारोबार में नई जान फ़ूँक दी है। मध्यप्रदेश में कुछेक ज़िलों को छोड़कर शायद ही कोई इलाका ऎसा हो जहाँ लिंगानुपात के हालात इतने चिंताजनक हों। दरअसल लिंग अनुपात में असंतुलन का मुख्य कारण विलुप्त हो रही भारतीय परंपराएँ और संस्कृति है। वाहनों पर चस्पा पोस्टर, बैनर और सड़क किनारे लगे होर्डिंग बेटियाँ बचाने में कारगर साबित होते, तो शायद देश को अब तक तमाम सामाजिक बुराइयों से निजात मिल जाती । जनसंपर्क विभाग की साइट पर अभी कुछ समय पहले एक प्रेस विज्ञप्ति पर नज़र पड़ी, जिसमें बताया गया है कि सरकार ने पानी बचाओ अभियान में गोष्ठी, परिचर्चा, कार्यशाला, सेमिनार और रैली जैसे आयोजनों के ज़रिये जनजागरुकता लाने पर महज़ तीन सालों में करीब नौ सौ तेरह करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिये। पानी के मामले में प्रदेश के हालात पर अब कुछ भी कहना-सुनना बेमानी है। वैसे भी देखने में आया है कि जिस भी मुद्दे पर सरकारी तंत्र का नज़रे-करम हुआ, उसकी नियति तो स्वयं विधाता भी नहीं बदल सकते। कहते हैं,जहँ-जहँ पैर पड़े संतन के,तहँ-तहँ बँटाढ़ार।

कुछ साल पहले बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी से मोहभंग की स्थिति में इस्तीफ़ा देते वक्त पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि बीजेपी को अब टेंट-तंबू वाले चला रहे हैं। मध्यप्रदेश में यह बात शब्दशः साबित हो रही है। सरकारी आयोजनों का लाभ जनता को कितना मिल पा रहा है, यह तो जगज़ाहिर है। मगर मुख्यमंत्री की उत्सवधर्मिता से कुछ चुनिंदा व्यवसायों से जुड़े लोगों की पौ-बारह है। राजनीतिक टोटकों और शिगूफ़ेबाज़ी से जनता को लम्बे समय तक भरमाये रखने का अगर कोई खिताब हो तो देश में बेशक शिवराजसिंह चौहान इसके एकमात्र और निर्विवाद दावेदार साबित होंगे।

उत्सवधर्मिता निभाने में सूबे के शाहखर्च मुखिया किसी से कमतर नहीं हैं। सत्ता सम्हालने के बाद से ही प्रदेश में जश्न का कोई ना कोई बहाना जुट ही जाता है। पहले महापंचायतों का दौर चला, इसके बाद इन्वेस्टर्स मीट के बहाने जश्न मनाये गये। यात्राओं और मंत्रियों को कॉर्पोरेट कल्चर से वाकिफ़ कराने के नाम पर भी जनता के पैसे में खूब आग लगाई गई। फ़िर बारी आई मुख्यमंत्री निवास में करवा चौथ, होली, दीवाली, रक्षाबंधन, ईद, रोज़ा इफ़्तार, क्रिसमस त्योहार मनाने की। जनता के खर्च पर धार्मिक आयोजनों के ज़रिये पुण्य लाभ अपने खाते में डालने का सिलसिला भी खूब चला। “आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश” जैसी शिगूफ़ेबाज़ी से भरपायी सरकार ने “स्वर्णिम मध्यप्रदेश“ का नारा ज़ोर शोर से बुलंद किया। पिछले दो सालों में प्रदेश स्वर्णिम बन सका या नहीं इसकी गवाही सड़कों के गड्ढ़ों, बिजली की किल्लत, बढ़ते अपराधों और किसानो की खुदकुशी के आँकड़ों से बेहतर भला कौन दे सकेगा ? मगर इतना तो तय है कि इस राजनीतिक स्टंट से नेताओं, ठेकेदारों, माफ़ियाओं, दलालों, उद्योगपतियों और मीडिया से जुड़े चंद लोगों की तिजोरियाँ सोने की सिल्लियों से ज़रुर “फ़ुल“ हो गईं हैं।

इसी तरह सत्ता पर येनकेन प्रकारेण पाँच साल काबिज़ रहने में कामयाब रहे शिवराजसिंह चौहान और जेब कटी जनता की। मुख्यमंत्री पद पर पाँच साल पूरे होने की खुशी में पिछले साल करीब चार करोड़ रुपये खर्च कर गौरव दिवस समारोह मनाया गया। संगठन के मुखिया प्रभात झा की कुर्सी प्राप्ति का सालाना जश्न भी मुख्यमंत्री निवास में धूमधाम से मना।

प्रदेश में एक के बाद एक आयोजनों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। मालूम होता है मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस समारोह की रंगीनियाँ जल्दी ही बेटी बचाओ अभियान को पीछे छोड़ देंगी। अब तक रावण वध से लेकर दीपावली की शुभकामना संदेशों तक हर मौके पर बेटी बचाने का संदेश प्रसारित करने में व्यस्त मुख्यमंत्री जी जल्दी ही मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के लिये जनता का आह्वान करते नज़र आयेंगे। उनके इस बर्ताव को देखकर बस इतना ही कहना मुनासिब होगा-आधी छोड़ पूरी को ध्यावै आधी मिले ना पूरी पावै।

बहरहाल खबर है कि भोपाल में होने वाले मुख्य समारोह में बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की नृत्य नाटिका और आशा भोंसले के नग़्मे जश्न में चार चाँद लायेंगे। वहीं लेज़र शो आयोजन का खास आकर्षण होगा। हर जश्न में लेज़र शो की प्रस्तुति का नया ट्रेंड भी शोध का विषय है। आजकल हर सरकारी समारोह में लेज़र शो और आतिशबाज़ी का भव्य प्रदर्शन सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर इन दोनों कारोबारों के साथ ही इवेंट मैनेजमेंट में किन बड़े भाजपा नेताओं का पैसा लगा है ? सवाल लाज़मी है कि कर्मचारियों को वेतन-भत्ते या जनता को करों में रियायत देकर महँगाई पर अँकुश लगाने के मुद्दे पर हाथ खींचने वाली राज्य सरकार आखिर इन जश्नों पर पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ?

फ़िज़ूलखर्ची का आलम ये है कि समारोह को भव्य बनाने के लिये चार लाख निमंत्रण पत्र छपवाए गये हैं,जबकि आयोजन स्थल लाल परेड ग्राउंड में एक लाख लोग भी बमुश्किल समा पायेंगे। माले मुफ़्त दिले बेरहम की तर्ज़ पर सरकार ने चार लाख कार्डों की छपाई पर चालीस लाख रुपये खर्च किये हैं । अमूमन सरकारी आयोजनों में लोगों की दिलचस्पी कम ही होती है। शाहखर्ची को जस्टिफ़ाय करने के लिये लोगों को घर-घर जाकर निहोरे खा-खा कर समारोह में आमंत्रित किया जा रहा है। बदहाल और फ़टेहाल प्रदेश की छप्पनवीं सालगिरह पर संस्कृति विभाग तीन करोड़ रुपए खर्च करने का इरादा रखता है। इनमें से दो करोड़ रुपये की होली भोपाल के मुख्य समारोह में जलाई जायेगी। संस्कृति विभाग में एक तृतीय श्रेणी की हैसियत रखने वाले व्यक्ति को तमाम नियम कायदों के विपरीत जाकर संचालक पद से नवाज़ा गया है।  अपनी अदभुत जुगाड़ क्षमता और संघ को साधने में महारत के चलते एक गैर आईएएस व्यक्ति एक साथ संस्कृति संचालक,वन्या प्रकाशन और स्वराज संस्थान प्रमुख जैसे अहम पदों पर काबिज़ है । सरकारी खज़ाने में सेंध लगाने के आये दिन नायाब नुस्खे ढ़ूँढ़ लाने में माहिर यह अफ़सर सरकार और संघ की आँखों का तारा बना हुआ है।

पूरे प्रदेश में वन, खनन, शिक्षा, ज़मीन की बँदरबाँट और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऎतिहासिक धरोहरों की लूटखसोट मची है। ऎसे हालात में चारों तरफ़ जश्न के माहौल को देखकर रोम में बाँसुरी बजाते नीरो को याद करने की बजाय मगध में घनानंद के राजकाज की यादें ताज़ा होना स्वाभाविक ही है । ऎसे घटाटोप में चाणक्य और चंन्द्रगुप्त के अवतरण का बस इंतज़ार ही किया जा सकता है ।

रविवार, 29 मई 2011

संघ-भाजपा के सितमों से आचार्य धर्मेन्द्र आगबबूला

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और आरएसएस को इन दिनों हिन्दुत्व के अलंबरदार और तेज़तर्रार विहिप नेता आचार्य धर्मेन्द्र का कोपभाजन बनना पड़ रहा है । गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के कब्ज़े से छुड़ाने के लिए सागर में करीब एक हफ़्ते का अनशन नाकाम होने से आचार्य बेहद बिफ़रे हुए हैं । दरअसल आचार्य धर्मेन्द्र पिछले रविवार को सागर में अनशन पर बैठे थे। पर सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और किसी नतीजे के पहले ही उन्हें छह दिन बाद गाय का दूध पीकर अपना आमरण अनशन खत्म करना पड़ा। अपनों के सितम से बेज़ार आचार्य संघ और भाजपा पर मतलबपरस्ती की तोहमत लगा रहे हैं।

बगैर कुछ हासिल किए मजबूरी में अनशन तोड़ने के बाद अब आचार्य धर्मेन्द्र भाजपा सरकार और आरएसएस को कोस रहे हैं। गुस्साये हिन्दूवादी नेता ने सरस्वती शिशु मंदिर पर तीखे प्रहार करते हुए संगठन को शिक्षा माफ़िया तक बता डाला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर विश्वासघात का आरोप लगाने वाले आचार्य धर्मेन्द्र की निगाह में संघ अब 'परिवार' नहीं रहा बल्कि 'तंत्र' बन गया है । संघ में भावना, समर्पण,त्याग व प्रेम की जगह धनलोलुपता का जोर बढ़ रहा है। उन्होंने आमरण अनशन के बेनतीजा समाप्त होने को अपनी पराजय न मानते हुए संघ पर लगा कभी न मिटने वाला कलंक बताया।

कहते हैं लोहा,लोहे को काटता है। लिहाज़ा प्रदेश सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी । इस घटनाक्रम से गौ और गंगा के नाम पर हिन्दुओं को भरमाने वाली भाजपा की इन मुद्दों पर गंभीरता का सहज ही अँदाज़ा लगाया जा सकता है। आचार्य धर्मेंद्र मानते हैं,इससे हिंदुत्व और गाय के लिए नारा लगाने वालों की असलियत सामने आ गई है। उनका अनशन जमीन के लिए नहीं,बल्कि गौ-माता के लिए था। उन्होंने कहा कि स्कूल द्वारा दबाई गई जमीन गौ सेवा संघ की है। भाजपा और आरएसएस की भूमिका से खफ़ा हिन्दू नेता इसे अपने जीवन का सबसे कड़वा अनुभव बता रहे हैं। अनशन की नाकामी से निराश आचार्य इसे संघ और भाजपा की हार करार देने से भी नहीं चूकते।

आचार्य धर्मेन्द्र के मुताबिक वे वर्ष 1980 से सागर के गौ सेवा संघ के संरक्षक हैं और आरएसएस से भी जुडे़ रहे हैं, लेकिन गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर संगठन के कब्जे से मुक्त कराने के मामले में संघ ने उनके साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि संघ का अनुषांगिक संगठन सरस्वती शिशु मंदिर छल, षड़यंत्रों व कुचक्रों का जाल बुनने वाला शिक्षा माफिया है। संघ के अनुषांगिक संगठनों के समूह को संघ परिवार कहा जाता रहा है, लेकिन सागर के जहरीले अनुभव के बाद अब वह संघ परिवार को 'संघ तंत्र' कहने को विवश हैं। संघ पर "यूज एंड थ्रो" की पश्चिमी संस्कृति अपनाने का आरोप जड़ते हुए उन्होंने कहा कि अपनों ने मुझे खो दिया। उन्हें अब मेरी जरूरत नहीं है।

गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। जानकारों का कहना है कि गौ सेवा संघ को 1927 में पचास हजार वर्ग फीट से अधिक जमीन दान में मिली थी। इसे गौ शाला बनाने और गौ संरक्षण के उद्देश्य से दिया गया था। 1972 में गौ सेवा संघ ने सरस्वती शिशु मंदिर को दो कमरे किराए पर दिए थे। इसके बाद वर्ष 1980 में सरस्वती शिशु मंदिर के पदाधिकारियों ने उनसे ही शिशु मंदिर के नए भवन का शिलान्यास करा लिया और लगातार विकास करते रहे। जब आचार्य धर्मेन्द्र को जमीन हथियाने की सूचना मिली तो उन्होंने आरएसएस के लोगों से बात की पर नतीजा नहीं निकला। पंचखंड पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच चल रहे भूमि विवाद को सुलझाने के मकसद से सागर आए थे। जमीन मुक्त कराने के लिये सरस्वती शिशु मंदिर के प्रवेश द्वार पर 21 मई से सत्याग्रह शुरू किया था, जो 24 मई को आमरण अनशन में तब्दील हो गया। सरकार की बेरुखी के कारण आमरण अनशन 27 मई को बेनतीजा खत्म करना पड़ा।

आचार्य धर्मेन्द्र सरीखे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के कटु अनुभव संघ और भाजपा पर सत्ता क सुरुर चढ़ने की पुष्टि करते हैं। वैसे भी जिसे पीने का शऊर और आदत भी नहीं हो,उस पर नशा कुछ जल्दी ही तारी हो जाता है। जनता को संस्कारों की घुट्टी पिलाने वाले संघी सत्ता के मद में इस कदर चूर हो चुके हैं कि अपनी ही नीतियों और सिद्धांतों को रौंदते हुए बढ़े चले जा रहे हैं,गोया कि प्रदेश में सत्ता की चाबी महज़ पाँच सालों के लिये नहीं आने वाली कई पुश्तों को सौंप दी गई है। लोकतंत्र में नये किस्म का सामंतवाद लाने वालों को आगाह ही किया जा सकता है। बहरहाल आचार्य धर्मेन्द्र के आक्रोश को नसीहत समझकर सबक सीखने की गुंजाइश तो रखना ही चाहिए। और फ़िर -

कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय|
जा खावत बौरात है,वा पावत बौराय ।|