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शनिवार, 17 अगस्त 2013

भगवद्गीता की राजनीति - नीति सही ना नीयत

फ़ल की इच्छा किए बगैर कर्म करने की सीख देने वाली भगवद्गीता का पाठ बच्चों को पढ़ाने की तैयारी में जुटी प्रदेश सरकार ने अपने इस राजनीतिक कर्म के "फ़ल" का अँदाज़ा लगते ही आनन-फ़ानन में कदम पीछे खींच लिए हैं। मदरसों में गीता पढ़ाने पर मचे बवाल के बाद रक्षात्मक मुद्रा में आई सरकार ने साफ किया कि जिन कक्षाओं की उर्दू पाठ्यपुस्तकों में इन पाठों को शामिल किया गया है, उनमें परीक्षा के आधार पर कक्षा में रोकने का प्रावधान नहीं है। फिर भी यदि किसी विद्यार्थी की रूचि इन पाठों को प़़ढने में नहीं है तो इन्हें वैकल्पिक माना जाएगा। वंदेमातरम और सूर्य नमस्कार के मुद्दे पर मुँह की खाने के बाद सरकार ने इसी तरह फ़ैसले पलटे थे। प्रदेश सरकार ने राज्य के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने वाला अपना आदेश वापस ले लिया है। गौरतलब है कि सरकार के इस आदेश पर धार्मिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। कुछ संगठनों ने कोर्ट में भी जाने की चेतावनी दी थी।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इसे लेकर जो विवाद पैदा हुआ वह सही नहीं था। उन्होंने कहा कि जिस आदेश के कारण विवाद की स्थिति पैदा हुई उसे वापस लिया जाता है। शिवराज का कहना है कि सरकारी आदेश से कुछ गलतफहमी हो गई थी, जिसके बाद मदरसों में भी नए सत्र की किताबों में गीता के अध्याय जोड़ दिए गए।
राज्य सरकार ने एक जुलाई को जारी अधिसूचना के जरिए प्रदेश के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने का आदेश जारी किया था। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद मुस्लिम संगठनों सहित काँग्रेस ने भी इसका भारी विरोध किया और इसे दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया था। इस सबके बीच सत्ता की हैट्रिक लगाने की चाहत पाले बैठे मुख्यमंत्री इस फैसले के व्यापक विरोध से बुरी तरह परेशान थे। उन्होंने मुख्य सचिव और अन्य आला अफसरों से चर्चा करने के बाद विवादित फैसले को निरस्त करने के आदेश दिए। इसके बाद इसी अगस्त माह की एक तारीख को जारी अधिसूचना पाँच दिन बाद निरस्त कर दी गई। नए आदेश के बाद अब सिर्फ हिन्दी की किताबों में ही गीता का पाठ जारी रहेगा।
 गौरतलब है कि राज्य सरकार ने पाठ्यपुस्तक अधिनियम में संशोधन कर मदरसों के उर्दू पाठ्यक्रम में गीता की शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। इसके तहत कक्षा 1 और 2 की विशिष्ट उर्दू तथा विशिष्ट अँग्रेजी के साथ इसी शिक्षण सत्र से भगवद्गीता के अध्याय पढ़ाए जाना थे। राज्य शिक्षा केंद्र और एमपी मदरसा बोर्ड से संबद्ध सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए यह नियम अनिवार्य किया गया था। कक्षा 3 से 8 तक गीता के अध्याय सामान्य हिन्दी के पाठयक्रम में जोड़े जाने की बात कही गई।
राज्य सरकार के इस फैसले की खिलाफ़त में मध्य प्रदेश कैथोलिक काउंसिल, मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ और मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच भी उतर आए थे। अल्पसंख्यक संगठनों ने चेतावनी दी थी कि फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाएँगे। उधर ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य आरिफ मसूद ने राज्यपाल रामनरेश यादव को सौंपे ज्ञापन में अधिसूचना निरस्त करने की माँग करते हुए कहा था कि एक धर्म की पुस्तक का पाठ पढ़ाया जाना संविधान के विपरीत है और मुस्लिम समाज इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रुप में देखता है।
मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ के संयोजक आनंद ने कहा था, 'हम इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर सकते हैं। धार्मिक मामलों से सरकार को दूर रहना चाहिए, यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा है। सरकार गलत परंपरा की शुरुआत कर रही है।'
राज्य सरकार का तर्क है कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जनवरी, 2012 में स्कूलों में गीता-सार पढ़ाए जाने के शासन के निर्णय के विरूद्ध कैथोलिक बिशप कौंसिल की याचिका पर व्यवस्था दी कि गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, न कि भारत के धर्म पर।
सरकारी बयान के मुताबिक पाठ्य-पुस्तकों में गीता आधारित सामग्री का निर्णय नया नहीं है। वर्ष 2011-12 से गीता के व्यावहारिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित विभिन्न पाठ्य सामग्री, कक्षा 1 से 12 की भाषा की पुस्तकों में समाहित की गई है। ये पुस्तकें पिछले दो वर्षों से शासकीय शालाओं के साथ ही अनुदान प्राप्त मदरसों में प्रचलित हैं, जिसके संबंध में किसी प्रकार की आपत्ति सामने नहीं आई है।
 गीता के व्यवहारिक जीवन में उपयोगी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जो पाठ स्कूली पुस्तकों में जोड़े गए हैं, उन्हें धार्मिक या साम्प्रदायिक नजरिए से देखना गलत है। यह मूलतः नैतिक शिक्षा तथा जिसे भावनात्मक परिपक्वताओं का शिक्षण कहा जाता है, उसके अनुरूप की गई कार्रवाई है। सरकारी विज्ञप्ति कहती है कि उपरोक्त वस्तु-स्थिति के आधार पर यह कहना कि, पाठ्य-पुस्तकों में चुनावी या धार्मिक भावना से कोई पाठ शामिल किया गया है, पूर्णतः भ्रामक एवं गलत होगा।
 ऎसे में लाख टके का सवाल यही है कि निर्णय सही और नीयत साफ़ है, तो फ़िर विरोध की सुगबुगाहट शुरू होते ही कदम क्यों खींचे ? समूचे घटनाक्रम पर नज़र डालें तो पाएँगे कि शिवराज सिंह चौहान नरेन्द्र मोदी से आगे निकलने की होड़ में आए दिन "गोड़" फ़ुड़वाने पर आमादा हैं। देश में कराए तमाम सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक भले ही भाजपा के लिए अभी दिल्ली दूर हो , लेकिन खुद को सर्वमान्य और हर वर्ग में स्वीकार्य बनाने की जुगत भिड़ा रहे शिवराज आए दिन नए-नए शिगूफ़े छोड़ते रहते हैं।
 सेक्युलर छबि बनाने की गरज से रमज़ान के मुकद्दस महीने में मुख्यमंत्री निवास में रोज़ा इफ़्तारी करते हैं, वे मोदी को निपटाने और हिन्दू मतों को साधने के फ़ेर में टोपी तो पहनते हैं- मगर "केसरिया"। इसी तरह ईद की मुबारकबाद के मौके पर पहले तो रज़ा मुराद को आगे कर अपनी मुराद साधने की कोशिश की और जब विवाद बढ़ा तो मोदी की शान में कसीदे पढ़ने लगे। मज़ेदार बात तो यह है कि जो शख्स आठ साल से निर्बाध और एकछत्र राजकाज संभालने के बावजूद अब तक ना तो पद के अनुरूप गंभीरता पैदा कर सका हो और ना ही सूबे के मुखिया के तौर पर काबिलियत साबित कर सका हो, वो सीधे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए प्रस्तुत है। शायद संत कबीर ने ऎसे ही किसी दौर की आहट को पढ़कर कहा होगा - "करम की गति न्यारी संतो, .................पंडित फ़िरत भिखारी।"
मुख्यमंत्री के हालिया फ़ैसले एक मर्तबा फ़िर साबित कर गए कि विरोध और दबाव का प्रतिरोध करने की सलाहियत उनमें रत्ती भर भी नहीं है। जब भी उनके फ़ैसलों पर सवाल उठे, जवाब देने की बजाय उन्होंने "खोल" में घुस जाना ही बेहतर समझा। वे किसी भी मुद्दे पर ज़्यादा वक्त कायम नहीं रह पाते और दबाव बढ़ने पर फ़ौरन से पेशतर हथियार डाल देते हैं। अँदरखाने पक्ष-विपक्ष के हर छोटे-बड़े नेताओं से डील कर भले ही शिवराज ने अपना कार्यकाल "स्वर्णिम" होने का मुगालता पाल लिया हो, हकीकतन इस स्वेच्छाचारिता ने प्रदेश के हर संवैधानिक पद और संस्थान की गरिमा को ध्वस्त कर दिया है।
अपना उल्लू सीधा करने के लिए कभी संघ से दूरी बनाने की कोशिश और ज़रूरत पड़ने पर  खुद को हिन्दुत्व का ध्वजवाहक बताने की चाहत में उनकी छबि निरंतर "लिजलिजीहोती चली जा रही है। वैसे शिवराज की एक कदम आगे चार कदम पीछे" की कार्यपद्धति ने उनकी नेतृत्व क्षमता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। सूबे के मुखिया के तौर पर वे किंकर्तव्यविमूढ़ ही नज़र आते रहे हैं। गीता पर पैदा हुए विवाद में मीडिया के काँधे पर सवार प्रधानमंत्री पद के स्वयंभू दावेदार ने हथियार डाल दिए।
हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने की नीयत से किए गए फ़ैसले का विरोध ज़ोर पकड़ते ही हिन्दुत्व पर आगे बढ़ने के इरादे को उन्होंने पल भर में ही तिलाँजलि दे डाली। वैसे सूबे की जनता को भी अब गंभीरता से सोचना होगा। सत्ता में एक दशक का सफ़र तय के बाद भी जो दल अब तक सूबे के लिए एक परिपक्व नेतृत्व तैयार नहीं कर सका हो, क्या उसके हाथ में तीसरी बार काँग्रेस के निकम्मेपन के चलते सत्ता सौंपना उचित रहेगा।  

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

बिकाऊ विपक्ष के कँधे पर सवार "विकास पुरुष"


मध्यप्रदेश मे राजनीतिक और पत्रकारीय धर्म से मुँह फ़ेर चुके लोगों का बोलबाला होने से चारों ओर "धूरधानी" मची हुई है। बिकाऊ विपक्ष और बज़रिये जनसंपर्क विभाग सत्ता की चौखट पर कलम गिरवी रख चुके पत्रकारों की बदौलत प्रदेश विकास के ग्राफ़ पर कुलाँचे मारता दिखाई दे रहा है। मगर हकीकत के आइने में सत्ता पक्ष के साथ गलबहियाँ करते विपक्ष और पत्रकारों के बदनुमा चेहरों को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। हाल ही में राजनीतिक चिंतक के.एन. गोविन्दाचार्य ने मध्यप्रदेश सरकार के बारे मे कहा था प्रदेश की भाजपा सरकार पूर्व शासित काँग्रेस की दिग्विजय सरकार से ज्यादा भ्रष्ट है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार को रोकने में असफल साबित हुए हैं। गोविंदाचार्य ने कहा है कि इतना भ्रष्टाचार तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जमाने में भी नहीं था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मंत्रियों पर अँकुश नहीं रखने के कारण प्रदेश में भ्रष्टाचार में बेतहाशा वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार चलाने के लिए चौहान ने मंत्रियों को खुली छूट दे रखी है। उन्होंने कहा कि भाजपा के शासन में उद्योगपति और अधिकारी खुश हैं, जबकि किसान दुखी हैं।
गोविंदाचार्य की तस्दीक प्रदेश के हालात भी करते हैं। प्रदेश में काँग्रेस के बड़े नेता सत्ताधारी दल के साथ मिलकर जमकर फ़ायदा ले रहे हैं । नतीजतन विपक्ष का अँकुश पूरी तरह हट चुका है। जनसंपर्क विभाग ने सैकड़ों करोड़ के बजट के बूते कहीं विज्ञापनों के ज़रिए अखबार मालिकों, तो कहीं सीधे पत्रकारों को साध रखा है। जो पत्रकार सच बात कहने का " दुस्साहस " करते हैं, उन्हें सरकारी अधिमान्यता देने से भी इंकार कर दिया जाता है। उधर कई नौकरशाह सरकार के हमजोली बनकर हजारों करोड़ के आसामी बन चुके हैं। ये वो अधिकारी हैं, जो प्रदेश से कमाया धन दूसरे प्रदेशों की प्रॉपर्टी में निवेश कर रहे हैं और जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।
दूसरी तरफ़ अवैध खनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छोटे कर्मचारियों को शातिताना अँदाज़ में हमेशा के लिए खामोश किया जा रहा है। हाल ही में रतलाम में खनिज निेरीक्षक संजय भार्गव की सड़क हादसे में मौत हो गई। इससे पहले भोपाल से लगे बैरसिया के गाँव में पीडब्ल्यूडी के सब इंजीनियर रामेशवर प्रसाद चतुर्वेदी की भी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। सरसरी तौर पर ये सामान्य हादसे लगते हैं। लेकिन इन मौतों को बड़े ही शातिराना तरीके से अँजाम तक पहुँचाया गया, जिससे "हत्या" को हादसा साबित किया जा सके। इन दोनों ही मामलों में मु्ख्यमंत्री निवास में सीधे धमक रखने वाले प्रदेश के एक बड़े ठेकेदार का नाम सामने आ रहा है। इसी तरह पिछले साल होली पर मुरैना में खनन माफ़ियाओं ने एक होनहार आईपीएस नरेन्द्र कुमार को मौत के घाट उतार दिया था। मगर हुआ क्या ?
जिस सीबीआई पर काँग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है, उसी ने एक अदने से आदमी को अपराधी बनाकर पेश कर दिया। आनन-फ़ानन में अदालती फ़ैसला भी हो गया। जिस तरह आरुषि-हेमराज मामले में सीबीआई ने कृष्णा, राजकुमार और प्रदीप मंडल को फ़ाँसी का फ़ँदा पहनाने की पूरी तैयारी कर ली थी । उसी तरह शहला मसूद हत्याकांड में रसूखदार लोगों को बचाने के लिए ज़ाहिदा और सबा जैसे लोगों को बिला वजह फ़ँसाया जा रहा है। फ़र्क है तो सिर्फ़ इतना कि दिल्ली की मीडिया कृष्णा और राजकुमार की बेगुनाही साबित करने के किए उठ खड़ी हुई थी। मगर प्रदेश में सम्मानों, प्रोजेक्टों, विज्ञापनों, सस्ते प्लाटों और इसी तरह के कई अन्य फ़ायदों के बोझ तले दबे कलमवीरों का ज़मीर क्या कभी जाग पाएगा।

शनिवार, 12 मई 2012

मध्यप्रदेश में शिव ”राज” नहीं, माफ़िया राज

नौ मई को मुरैना जिले के चिन्नौनी थाना क्षेत्र में चंबल नदी से अवैध रूप से रेत भरकर ले जा रही ट्रैक्टर –ट्रॉली रोकने पर पुलिस टीम पर कट्टे से फायर और पथराव ।


• मई में मुरैना जिले में खनिज माफ़िया द्वारा एक और पुलिस अधिकारी को ट्रेक्टर-ट्रॉली से
कुचलकर मारने की कोशिश ।


• मई की शुरुआत में राजधानी से लगे बड़ली गाँव में जंगल माफ़िया ने वन विभाग के अमले को घेर कर पीटा ; जंगल चोरों ने डिप्टी रेंजर सहित नौ वन कर्मियों को किया पीट-पीट कर अधमरा ।

• अप्रैल में देवास ज़िले की कन्नौद तहसील के कुसमनिया गाँव में महिला तहसीलदार को जेसीबी मशीन से रौंदने की खनन माफ़िया की कोशिश ।

घुन की तरह प्रदेश की नैसर्गिक संपदा को चट कर रहे खनन माफ़िया से टक्कर लेते हुए युवा आईपीएस नरेन्द्र कुमार ने होली के दिन शहादत दी । लेकिन सत्ता मद में चूर सरकार के रहनुमाओं ने युवा पुलिस अधिकारी की मौत को हादसा बताकर कुछ इस तरह की दलीलें पेश कीं, मानो सरकार को बदनाम करने की साज़िश रची जा रही हो ।प्रदेश सरकार की इस बेहयाई ने माफ़ियाओं के हौंसले इतने बुलंद कर दिये हैं कि अब जंगल, खनिज और रेत, ज़मीन,पानी, बिजली और शराब का गैरकानूनी धंधा करने वाले बेखौफ़ होकर सरकारी मुलाज़िमों को अपना निशाना बना रहे हैं । अवैध कारोबार पर नकेल कसने की कोशिश में सरकार के कारिंदे कहीं बँधक बनाये जा रहे हैं , कहीं सरेआम रौंदे जा रहे हैं या फ़िर बदमाशों के गोली, लाठी,डंडे खाने को मजबूर हैं । सत्ता का गुरुर अब मगरुरी में तब्दील होता जा रहा है । जो अधिकारी अपना ईमान और ज़मीर बेचने को राज़ी नहीं है, वो सत्ताधारी दल के लोगों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं । उन्हें झूठे आरोपों में फ़ँसाकर निलंबन या बार-बार तबादले की सज़ा दी जा रही है ।

यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि जब एक जाँबाज युवा पुलिस अधिकारी मुरैना में खनन माफियाओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने लहू की अंतिम बूँद भी धरती पर बहा रहा था... तब हमारे प्रदेश के मुखिया होली के रंगों में सराबोर हो रहे थे । जब उस युवा पुलिस अधिकारी की पत्नी अपनी कोख में साढ़े आठ माह के शिशु को लेकर अपने सुहाग को मुखाग्नि दे रही थी... फाग गाते, ढोल मँजीरे बजाते हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री की तस्वीरें अखबारों और चैनलों में छाई थीं ।

एक ऐसी हत्या, जिसकी चर्चा केवल प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश में हो रही हो, उस घटना पर सूबे के मुख्यमंत्री का बयान चौबीस घंटे बीत जाने के बाद आता है । अपनी पत्रकार वार्ता में भी वे इस बात पर ज्यादा खफा दिखाई पड़े कि बार बार माफियाओं का नाम लेकर प्रदेश को बदनाम किया जा रहा है । जब नरेन्द्र कुमार के पिता और आईएएस पत्नी इस हत्या के पीछे खदान माफियाओं का हाथ होने की बात बार-बार दोहरा रहे थे, तब मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई भी खदान माफिया न होने का दावा कर रहे थे

मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई खदान माफिया नहीं होने का जितना दावा करते हैं , राजनीतिक संरक्षण का भरोसा पाकर माफियाओं के हौंसले उतने ही बुलंद होते जा रहे हैं । सियासी आकाओं का प्रश्रय पाकर अब माफ़िया पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को अपना निशाना बना रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में 20 आईपीएस और आईएएस अधिकारियों सहित 65 पुलिस वालों पर हमले हुए हैं । ग्रामीण इलाकों में छोटे कर्मचारियों की पिटाई का आँकड़ा तो हज़ारों में है । हालत ये है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का मध्यप्रदेश से मोह भंग होने लगा है । हाल ही में नरेन्द्र कुमार की आईएएस पत्नी मधुरानी तेवतिया ने अपना भी कैडर बदलने का आवेदन दिया है ।

मुरैना जिले में खदान माफिया कलेक्टर आकाश त्रिपाठी और पुलिस अधीक्षक हरि सिंह पर भी फायरिंग कर चुके हैं । भिंड में भी शराब माफियाओं ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के साथ मारपीट की । खरगोन में एक आरक्षक की हत्या के साथ ही एएसआई पर जानलेवा हमला हुआ । सागर में अवैध खनन पकडऩे की कोशिश कर रहे टीआई पर माफिया ने गोलियाँ चलाईं और उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा । पन्ना में रेत माफिया ने नदी पर पुल बना डाला था, जिसे तोड़ने गए एसडीएम पर भी फायरिंग की गई । शहडोल में भाजपा नेता और पूर्व विधायक छोटेलाल सरावगी के बेटे ने कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह पर फायरिंग की थी, क्योंकि वह उनकी कोयले की चोरी रोकने की कोशिश कर रहे थे।

मध्यप्रदेश में सरकारी अमले पर हमलों की लगातार बढ़ रही वारदातें कहती हैं कि सूबे में हालात चिंताजनक है । तुर्रा ये कि यहाँ चोरी और सीनाज़ोरी में ना सत्ता पीछे है और ना ही संगठन । हाल ही में अपनी नाकाबिलियत के बावजूद प्रदेश संगठन की कमान सम्हालने के दो साल पूरे होने का जश्न सरकारी खर्च मनाने पर “आमादा“ प्रभात झा छाती ठोक कर दावा कर रहे थे कि प्रदेश में कोई माफ़िया नहीं है । मुख्यमंत्री भी मीडिया के “चोंगे“ पर आये दिन कुछ ऎसा ही आलापते सुनाई देते हैं । मगर शायद वे भूल गये कि सत्ता सम्हालते ही उन्होंने कहा था कि प्रदेश में सात किस्म के माफ़िया सक्रिय हैं । उन्होंने बाकायदा इन माफ़ियाओं के नाम भी गिनवाये थे । हाल की घटनाओं पर सरसरी नज़र डालते ही ’“रक्तबीज“ की तरह तेज़ी से फ़ैलते माफ़िया राज की हकीकत का खुलासा हो जाता है ।

वो शायद भूल गये कि वर्ष 2010 में शिवपुरी में दिए कथित बयान में उन्होंने भूमाफ़िया पर तोहमत जड़ी थी कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की साज़िश रची जा रही है । उनके इस बयान पर मचे बवाल के बाद विधानसभा में दंभ से भरे चौहान ने कहा था कि ”उन्हें हटाने का किसी माई के लाल में दम नहीं है और वे किसी से डरते नहीं हैं । न किसी में हिम्मत है कि उन्हें हटा सके । उन्होंने कहा, भूमाफियाओं पर कार्रवाई की बात मैं करता आया हूँ । भूमाफियाओं से मुझे कोई डर नहीं है । ” यह स्वीकारोक्ति सूबे में जड़े जमा चुके माफ़िया की मौजूदगी बताने के लिये काफ़ी है ।

श्री चौहान का दावा है कि प्रदेश में सब कुछ बढ़िया है । यहाँ कोई माफ़िया नहीं हैं । लेकिन हकीकत तो ये है कि उनके कार्यकाल में एक और किस्म का यानी मीडिया माफ़िया भी तेज़ी से पनपा है । करोड़ों के विज्ञापनों के ज़रिये छबि गढ़ने की कवायद ने इस ’अमरबेल” को खूब फ़लने-फ़ूलने का मौका दिया है । प्रदेश की पत्रकारिता मीडिया घरानों और चंद चापलूसों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है । ’’पत्रकारिता के बंध्याकरण” के कारखाने में तब्दील हो चुके जनसंपर्क विभाग के ज़रिये प्रदेश की खुशहाल तस्वीर पेश की जा रही है, जो हकीकत से कोसों दूर है । विज्ञापनों के बूते मीडिया घरानों का मुँह बंद कर और चंद तथाकथित बड़े पत्रकारों को ’एवज़ी’ देकर भले ही स्वर्णिम मध्यप्रदेश का ढ़ोल पीटा जा रहा हो, मगर सच्चाई तो यह है कि इस ढ़ोल में पोल ही पोल है ।

मुख्यमंत्री कहते हैं कि न तो प्रदेश में कोई खदान माफिया है और न ही सरकार माफियाओं के दबाव में है। लेकिन सरकारी आँकड़े ही उनके इस दावे की हवा निकालने के लिये काफ़ी हैं । प्रदेश के खनन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार राज्य के 27 जिलों में अवैध खनन के मामलों में 141.49 करोड़ रुपये का ज़ुर्माना लगाया गया । मगर 80.81 लाख रुपये की नाम मात्र की रकम वसूल कर मामले निबटा दिये गये । गौरतलब है कि वसूली गई राशि लगाये गये जुर्माने के 1 प्रतिशत से भी कम है । क्या इसके बाद भी किसी सबूत की जरूरत रह जाती है कि राज्य सरकार किसकी मुठ्ठी में है?

क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक है कि जिस मुरैना में दस महीनों में अवैध खनन का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ था , वहाँ नरेन्द्र कुमार के बानमौर के एसडीओपी बनने के चालीस दिन के भीतर 20 मामले दर्ज हुए । इन मामलों में 18 हज़ार 240 रुपये पैनल्टी लगाई गई ,लेकिन केवल 4 हज़ार 240 रुपये वसूल कर मामला रफा दफा कर दिया गया । पड़ोसी जिले भिंड में जहाँ नरेन्द्र कुमार की हत्या के दिन शराब माफियाओं ने एक दूसरे आईपीएस अधिकारी पर जानलेवा हमला किया था, वहाँ इसी साल 1.89 करोड़ रुपये की पैनल्टी अवैध खनन को लेकर की गई और आज तक वसूली नहीं हो सकी है । होशंगाबाद जिले में 4 करोड़ 52 लाख के ज़ुर्माने के एवज़ में 50 लाख 52 हजार रुपये की मामूली रकम वसूल कर मामलों खत्म कर दिया गया ।

खदान माफिया पूरे प्रदेश में फैले हुए हैं । अलीराजपुर जिले में तो खदान माफियाओं ने नकलीरसीदें छपवा रखी हैं । इन रसीदों के पकड़े जाने के बाद भी उन अपराधियों पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई है । रतलाम जिले की पिपलौदा तहसील के गांव चैरासी बड़ायला में तो एक फोरलेन सड़क बनाने वाली कंपनी ने पत्थर और मुरम की पूरी पहाड़ी खोद डाली , लेकिन रायल्टी के 3 करोड़ रुपये में से छदाम भी राज्य सरकार को नहीं दिया है । इसी दौरान नीमच जिले में खनिज अधिकारी वीके सांखला ने अवैध गिट्टी के 10 ट्रैक्टर पकड़ कर उन पर 47 लाख रुपये जुर्माना किया था । भाजपा नेता ने अपने रसूख के दम पर एक भी पैसा जुर्माना भरे बगैर ही इन ट्रैक्टरों को छुड़वा दिया । धार में नर्मदा नदी की रेत का अवैध खनन हो रहा है । इंदौर जिले में नेमावर और रंगवासा पहाडिय़ों को खनन माफिया ने लीज से कई गुना ज्यादा खोद डाला है ।

प्रदेश में न केवल खदान माफिया ही राज कर रहे हैं , बल्कि भाजपा नेता और राज्य सरकार के मंत्री भी या तो खुद खनन माफिया बने हुए हैं या फिर वे खनन माफियाओं को संरक्षण दे रहे हैं । बात सिर्फ मुरैना की नहीं है । मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर और उनके विधान सभा क्षेत्र भी रेत के अवैध खनन का अड्डा बना हुआ है । सवाल लाज़मी है कि मुख्यमंत्री के अपने जिले में ही प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट , क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव है? दमोह की खनिज अधिकारी दीपारानी ने मीडिया को बताया था कि किस तरह उन्हें कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया के दबाव में अवैध खनन में लगे वाहनों को छोडऩा पड़ा । लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह के खिलाफ अवैध खनन के मामले तो केन्द्र सरकार तक पहुँच चुके हैं ।

मुरैना में शहीद हुए नरेन्द्र कुमार के पिता भाजपा के राष्ट्रीय नेता और सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर को खदान माफिया बता रहे हैं । उधर खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ला सतना में किसानों को बेदखल कर हजारों एकड़ जमीन की लीज हथियाना चाहते हैं । एनडीए के संयोजक शरद यादव पहले ही पूरे विंध्य-महाकौशल में हर जिले में बैल्लारी होने की बात चुके हैं । लेकिन यदि मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि प्रदेश में खदान माफिया नहीं हैं, तो फिर कहना ही होगा कि प्रदेश में अब माफिया नहीं हैं , माफिया राज है ।

शनिवार, 12 नवंबर 2011

मध्यप्रदेश में मलेरिया का कहर और सियासत

मध्य प्रदेश की सेहत इन दिनों काफ़ी खराब है । सीधी, मंदसौर और नीमच ज़िले में मलेरिया से मौतों का आँकड़ा बढ़ने के साथ ही सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। मलेरिया से करीब पचास लोगों की मौत के कारण सीधी जिला इन दिनों राजनीति के केंद्र में है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने इस मुद्दे को लेकर सीधी कलेक्ट्रेट के बाहर धरना दिया। इसके बाद जाकर सरकार के कानों पर जूँ रेंगी। मगर आये दिन उड़न खटोले में सवार होकर देश भर की सैर करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चौंकाने वाली टिप्पणी ने सबको सन्न कर दिया। जिस वक्त वे सचिन के सौवें शतक का शुभकामना संदेश प्रसारित कर रहे थे, तब वे प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों से बेखबर थे। विपक्ष के हर आरोप को हवा में उड़ाने वाले शिवराज की नींद तब टूटी जब ये मामला अखबारों की सुर्खियों में आया। अधिकारियों की बैठक में वे खूब बिफ़रे कि उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं दी गई है। प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की फ़ेहरिस्त में नाम शामिल कराने की जोड़तोड़ में लगे मुख्यमंत्रीजी से लाख टके का सवाल ये है कि जब उन्हें अपने प्रदेश की समस्याओं की कोई जानकारी ही नहीं रहती है, तो उनके सूबे का मुखिया बने रहने का औचित्य ही क्या है ?


आदिवासी बहुल सीधी जिले के कुछ गाँवों में मलेरिया कहर बनकर टूटा है। जिले में मलेरिया से हुई मौतों का आँकड़ा लगातार बढ़ रहा है। अब तक पचास मौतें हो चुकी हैं। तीन गाँवों में 30 सितंबर से एक नवंबर तक 35 लोगों की मौत हुई। नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि पैंतीस मृतकों में सत्रह बेटियाँ भी हैं, जिनको बचाने के लिए सरकार अभियान छेड़े हुए है। इन मौतों ने बेटी बचाओ अभियान के साथ-साथ स्वास्थ्य इंतजामों की कलई खोलकर रख दी है। हालाँकि यह बात सामने आने के बाद प्रशासन पूरी तरह से मामले को दबाने में लगा रहा।

नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि जिला मुख्यालय से मात्र 18 किलोमीटर दूर बसे गाँवों में मचे मौत के ताँडव से पूरा प्रशासन बेखबर बना रहा । उन्होंने विकास खंड के लगभग आधा दर्जन गाँवों का दौरा किया, तब हकीकत सामने आयी। जनजाति बहुल गाँव पडरी, चौफाल और सतनरा के लगभग हर घर में कम से कम एक व्यक्ति मलेरिया पीड़ित है। चूंकि सीधी अजय सिंह का गृह जिला है, लिहाजा वे प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठे और राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। मुख्यमंत्री को फोन करने के बाद प्रशासन हरकत में आया। उनके मुताबिक 47 मौतें होने के बाद भी कलेक्टर वहाँ नहीं पहुँचे थे। कमिश्नर को प्रकरण की जानकारी भी नहीं थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सीधी को मलेरिया प्रभावित जिला मानते हुए विशेष किट दिए हैं, लेकिन सरकार इनका उपयोग नहीं कर रही है।

बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का हवाला देते हुए नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को घेरे में लिया है। गौरतलब है कि चार साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीधी जिला गोद लिया था। बताते हैं कि सीधी जिले में सरकार ने डॉक्टरों के लिए 130 पद स्वीकृत किए हैं। मगर इनमें से 93 पद कई सालों से खाली हैं। अजय सिंह का आरोप है कि सीधी से लगे हुए गाँवों में जब मलेरिया प्रकोप बनकर फैल रहा है तो दूरदराज के क्षेत्रों के हालात की कल्पना की जा सकती है। ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सेवाओं के हालात समझने के लिये इतना जानना काफ़ी है कि डॉक्टर अपनी ड्यूटी पर शायद ही कभी जाते हैं। उनका कहना है कि सिमरिया के ब्लॉक मेडिकल अधिकारी अस्पताल नहीं जाते हैं। इसी तरह ज़िले में पदस्थ प्रदेश सरकार में मंत्री जगन्नाथ सिंह के सुपुत्र डेढ़ साल से नौकरी पर नहीं गये हैं।

प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों का सिलसिला नहीं थम रहा है। सीधी के बाद अब मंदसौर, नीमच (मालवा) में मलेरिया का संक्रमण फैल गया है। मालवा में मलेरिया बुखार से दो माह के भीतर 40 लोगों की जान गई है, जबकि मलेरिया से पीड़ित 50 लोगों का इलाज किया गया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार मंदसौर जिले के धावद, बगचाच, सावंत, नावली, बड़ौदिया, नावली, सावन कोठली और कोठरी टैंक गाँव में मलेरिया से संक्रमित हैं। जिले के प्रभारी सीएमएचओ के मुताबिक इन गाँवों में बीते दो माह में 21 लोगों की जानें गई हैं। शुरुआती जाँच में मौत की वजह मलेरिया है। वहीं नीमच जिले के ग्राम कोज्या, रूपपुरिया, परिछा, माना, मनोहरपुरा, प्रेमपुरा और कनोड़ में बीमारी की गंभीर स्थिति है। सीएमएचओ जिले में 19 लोगों की मौत मलेरिया से होने की पुष्टि कर रहे हैं।

प्रदेश की जनता ने जिस भरोसे से शिवराज सिंह को सत्ता की बागडोर सौंपी थी, वही आज उसके ज़ख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। हाल ही में उन्होंने गायत्री परिवार के हरिद्वार महाकुंभ हादसे में मारे गये लोगों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता का एलान किया। जबकि सीधी में मलेरिया से हुई मौतों पर मुख्यमंत्री ने महज़ दस-दस हज़ार रुपये की खैरात बाँटकर आखिर किस पर एहसान किया? सवाल है कि मीडिया से संवेदनशील और सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता का खिताब हासिल करने को बेताब मुखिया की मुट्ठी सूबे की जनता के लिये आखिर क्यों भिंच गई? सरकार फिजूल के अभियान और उत्सवों पर जनता के करोड़ों रुपये फूंक रही है मगर लोगों की बुनियादी जरूरतों की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं है। प्रदेश के स्थापना दिवस पर करोड़ों रुपये की आतिशबाज़ी फ़ूँकने या क्रिकेटरों और अन्य खिलाड़ियों को लाखों रुपये बतौर तोहफ़ा देकर खूब वाहवाही बटोरने वाले मुख्यमंत्री के हाथ आखिर प्रदेश की जनता से जुड़े मुद्दों पर ही खाली क्यों दिखाई देते हैं?

बहरहाल मलेरिया से हुई मौतों पर बवाल मचता देख मुख्यमंत्री आनन-फ़ानन में सीधी पहुँचे और कलेक्टर का तुरंत तबादला कर दिया। लेकिन सवाल फ़िर वही। क्या कलेक्टर का तबादला करने या कुछ छोटे कर्मचारियों को निलंबित करने मात्र से हालात सुधर जाएँगे? मालवा, चंबल और विंध्य क्षेत्र में मलेरिया से हो रही मौतों के लिये क्या छोटे मोटे प्रशासनिक फ़ेरबदल काफ़ी हैं? प्रदेश में क्या अदने कर्मचारियों की बलि लेकर स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य महकमे के आला अफ़सरों को ज़िम्मेदारी से बरी किया जा सकता है ? सरकार और नौकरशाहों का पूरा ध्यान महँगे उपकरण और दवा खरीदी, तो डॉक्टरों की दिलचस्पी ड्रग ट्रायल के मुनाफ़े और प्रायवेट अस्पतालों में मोटी फ़ीस पर सेवाएँ देने में ही सिमट कर रह गई है।

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने से बेखबर सूबे के मुखिया एक के बाद एक मुश्किलों में घिरते जा रहे हैं। विधानसभा सत्र के मुहाने पर विपक्ष के हाथ एक साथ कई मुद्दे लग गये हैं। डम्पर मामले को पुनर्विचार के लिये एक बार फ़िर हाईकोर्ट में ले जाकर याचिकाकर्ता रमेश साहू ने शिवराज की दिक्कतें बढ़ा दी हैं। उधर इस मामले में उन्हें क्लीन चिट देने वाले लोकायुक्त पी.पी.नावलेकर की नियुक्ति विवादों में है और अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है । उस पर जबलपुर ज़िले के सीहोरा तहसील के झीटी वन क्षेत्र की खदानों में लौह अयस्क के अवैध उत्खनन का मामला काँग्रेस ने भोपाल न्यायालय में पेश कर दिया है। इसमें मुख्यमंत्री,तीन मंत्रियों,एक सांसद सहित कुल सत्ताइस लोगों को नामजद किया गया है। काँग्रेस ने मामले की शिकायत लोकायुक्त में भी की है। साथ ही अब अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक जगदीश प्रसाद शर्मा ने सतना ज़िले के उचेहरा, नागौद आदि वन परिक्षेत्र में चल रहे उत्खनन की रिपोर्ट में भी खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अब तक विपक्ष को मृतप्राय मानकर मनमानी पर उतारु सरकार पर काँग्रेस चौतरफ़ा हमले कर रही है। कमोबेश पिछले आठ सालों से निर्बाध गति से दौड़ रहे अश्वमेधी रथ की वल्गाएँ यकबयक थामकर काँग्रेस ने सत्ता पक्ष में खलबली मचा दी है। विपक्ष से पहली बार मिल रही करारी चुनौती और अंदर ही अंदर बढ़ते जनाक्रोश से सत्ता पक्ष कैसे निपटता है आने वाले वक्त में सबकी निगाहें इसी पर लगी रहेंगी ।

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सरकारी खज़ाने पर भारी पडता मुख्यमंत्री का उत्सवधर्म

यूँ तो हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी हैं । मौसम का मिजाज़ बदले या फ़िर जीवन से जुड़ा कोई भी पहलू हो, हम पर्व मनाने का बहाना तलाश ही लेते है। साल में जितने दिन होते हैं उससे कहीं ज़्यादा पर्व और त्योहार हैं। अब तक लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर पर्व मनाये जाते रहे हैं। मगर उत्सव धर्मी मुख्यमंत्री के शौक के चलते अब प्रदेश में बारहों महीने सरकारी त्योहार मनाने की नई परंपरा चल पड़ी है। गणपति स्थापना के साथ शुरू हुए उत्सवी माहौल में नवरात्रि आने तक राज्य सरकार ने “बेटी बचाओ अभियान” का जो रंग भरा है,वो जल्दी ही फ़ीका पडता नही दीखता। राज्य में शासन की ओर से “बेटी बचाओ अभियान” नए सिरे से शुरू किया गया है। सरकारी खज़ाने से सौ करोड़ रुपये खर्च कर लिंगानुपात में आ रहे अंतर को पाटना और बालिकाओं को प्रोत्साहन देना मुहिम का खास मकसद बताया जा रहा है।

तूफ़ानी तरीके से चलाये जा रहे इस अभियान के मकसद पर कई बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अभियान ने मीडिया, विज्ञापन और प्रिंटिंग कारोबार में नई जान फ़ूँक दी है। मध्यप्रदेश में कुछेक ज़िलों को छोड़कर शायद ही कोई इलाका ऎसा हो जहाँ लिंगानुपात के हालात इतने चिंताजनक हों। दरअसल लिंग अनुपात में असंतुलन का मुख्य कारण विलुप्त हो रही भारतीय परंपराएँ और संस्कृति है। वाहनों पर चस्पा पोस्टर, बैनर और सड़क किनारे लगे होर्डिंग बेटियाँ बचाने में कारगर साबित होते, तो शायद देश को अब तक तमाम सामाजिक बुराइयों से निजात मिल जाती । जनसंपर्क विभाग की साइट पर अभी कुछ समय पहले एक प्रेस विज्ञप्ति पर नज़र पड़ी, जिसमें बताया गया है कि सरकार ने पानी बचाओ अभियान में गोष्ठी, परिचर्चा, कार्यशाला, सेमिनार और रैली जैसे आयोजनों के ज़रिये जनजागरुकता लाने पर महज़ तीन सालों में करीब नौ सौ तेरह करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिये। पानी के मामले में प्रदेश के हालात पर अब कुछ भी कहना-सुनना बेमानी है। वैसे भी देखने में आया है कि जिस भी मुद्दे पर सरकारी तंत्र का नज़रे-करम हुआ, उसकी नियति तो स्वयं विधाता भी नहीं बदल सकते। कहते हैं,जहँ-जहँ पैर पड़े संतन के,तहँ-तहँ बँटाढ़ार।

कुछ साल पहले बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी से मोहभंग की स्थिति में इस्तीफ़ा देते वक्त पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि बीजेपी को अब टेंट-तंबू वाले चला रहे हैं। मध्यप्रदेश में यह बात शब्दशः साबित हो रही है। सरकारी आयोजनों का लाभ जनता को कितना मिल पा रहा है, यह तो जगज़ाहिर है। मगर मुख्यमंत्री की उत्सवधर्मिता से कुछ चुनिंदा व्यवसायों से जुड़े लोगों की पौ-बारह है। राजनीतिक टोटकों और शिगूफ़ेबाज़ी से जनता को लम्बे समय तक भरमाये रखने का अगर कोई खिताब हो तो देश में बेशक शिवराजसिंह चौहान इसके एकमात्र और निर्विवाद दावेदार साबित होंगे।

उत्सवधर्मिता निभाने में सूबे के शाहखर्च मुखिया किसी से कमतर नहीं हैं। सत्ता सम्हालने के बाद से ही प्रदेश में जश्न का कोई ना कोई बहाना जुट ही जाता है। पहले महापंचायतों का दौर चला, इसके बाद इन्वेस्टर्स मीट के बहाने जश्न मनाये गये। यात्राओं और मंत्रियों को कॉर्पोरेट कल्चर से वाकिफ़ कराने के नाम पर भी जनता के पैसे में खूब आग लगाई गई। फ़िर बारी आई मुख्यमंत्री निवास में करवा चौथ, होली, दीवाली, रक्षाबंधन, ईद, रोज़ा इफ़्तार, क्रिसमस त्योहार मनाने की। जनता के खर्च पर धार्मिक आयोजनों के ज़रिये पुण्य लाभ अपने खाते में डालने का सिलसिला भी खूब चला। “आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश” जैसी शिगूफ़ेबाज़ी से भरपायी सरकार ने “स्वर्णिम मध्यप्रदेश“ का नारा ज़ोर शोर से बुलंद किया। पिछले दो सालों में प्रदेश स्वर्णिम बन सका या नहीं इसकी गवाही सड़कों के गड्ढ़ों, बिजली की किल्लत, बढ़ते अपराधों और किसानो की खुदकुशी के आँकड़ों से बेहतर भला कौन दे सकेगा ? मगर इतना तो तय है कि इस राजनीतिक स्टंट से नेताओं, ठेकेदारों, माफ़ियाओं, दलालों, उद्योगपतियों और मीडिया से जुड़े चंद लोगों की तिजोरियाँ सोने की सिल्लियों से ज़रुर “फ़ुल“ हो गईं हैं।

इसी तरह सत्ता पर येनकेन प्रकारेण पाँच साल काबिज़ रहने में कामयाब रहे शिवराजसिंह चौहान और जेब कटी जनता की। मुख्यमंत्री पद पर पाँच साल पूरे होने की खुशी में पिछले साल करीब चार करोड़ रुपये खर्च कर गौरव दिवस समारोह मनाया गया। संगठन के मुखिया प्रभात झा की कुर्सी प्राप्ति का सालाना जश्न भी मुख्यमंत्री निवास में धूमधाम से मना।

प्रदेश में एक के बाद एक आयोजनों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। मालूम होता है मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस समारोह की रंगीनियाँ जल्दी ही बेटी बचाओ अभियान को पीछे छोड़ देंगी। अब तक रावण वध से लेकर दीपावली की शुभकामना संदेशों तक हर मौके पर बेटी बचाने का संदेश प्रसारित करने में व्यस्त मुख्यमंत्री जी जल्दी ही मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के लिये जनता का आह्वान करते नज़र आयेंगे। उनके इस बर्ताव को देखकर बस इतना ही कहना मुनासिब होगा-आधी छोड़ पूरी को ध्यावै आधी मिले ना पूरी पावै।

बहरहाल खबर है कि भोपाल में होने वाले मुख्य समारोह में बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की नृत्य नाटिका और आशा भोंसले के नग़्मे जश्न में चार चाँद लायेंगे। वहीं लेज़र शो आयोजन का खास आकर्षण होगा। हर जश्न में लेज़र शो की प्रस्तुति का नया ट्रेंड भी शोध का विषय है। आजकल हर सरकारी समारोह में लेज़र शो और आतिशबाज़ी का भव्य प्रदर्शन सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर इन दोनों कारोबारों के साथ ही इवेंट मैनेजमेंट में किन बड़े भाजपा नेताओं का पैसा लगा है ? सवाल लाज़मी है कि कर्मचारियों को वेतन-भत्ते या जनता को करों में रियायत देकर महँगाई पर अँकुश लगाने के मुद्दे पर हाथ खींचने वाली राज्य सरकार आखिर इन जश्नों पर पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ?

फ़िज़ूलखर्ची का आलम ये है कि समारोह को भव्य बनाने के लिये चार लाख निमंत्रण पत्र छपवाए गये हैं,जबकि आयोजन स्थल लाल परेड ग्राउंड में एक लाख लोग भी बमुश्किल समा पायेंगे। माले मुफ़्त दिले बेरहम की तर्ज़ पर सरकार ने चार लाख कार्डों की छपाई पर चालीस लाख रुपये खर्च किये हैं । अमूमन सरकारी आयोजनों में लोगों की दिलचस्पी कम ही होती है। शाहखर्ची को जस्टिफ़ाय करने के लिये लोगों को घर-घर जाकर निहोरे खा-खा कर समारोह में आमंत्रित किया जा रहा है। बदहाल और फ़टेहाल प्रदेश की छप्पनवीं सालगिरह पर संस्कृति विभाग तीन करोड़ रुपए खर्च करने का इरादा रखता है। इनमें से दो करोड़ रुपये की होली भोपाल के मुख्य समारोह में जलाई जायेगी। संस्कृति विभाग में एक तृतीय श्रेणी की हैसियत रखने वाले व्यक्ति को तमाम नियम कायदों के विपरीत जाकर संचालक पद से नवाज़ा गया है।  अपनी अदभुत जुगाड़ क्षमता और संघ को साधने में महारत के चलते एक गैर आईएएस व्यक्ति एक साथ संस्कृति संचालक,वन्या प्रकाशन और स्वराज संस्थान प्रमुख जैसे अहम पदों पर काबिज़ है । सरकारी खज़ाने में सेंध लगाने के आये दिन नायाब नुस्खे ढ़ूँढ़ लाने में माहिर यह अफ़सर सरकार और संघ की आँखों का तारा बना हुआ है।

पूरे प्रदेश में वन, खनन, शिक्षा, ज़मीन की बँदरबाँट और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऎतिहासिक धरोहरों की लूटखसोट मची है। ऎसे हालात में चारों तरफ़ जश्न के माहौल को देखकर रोम में बाँसुरी बजाते नीरो को याद करने की बजाय मगध में घनानंद के राजकाज की यादें ताज़ा होना स्वाभाविक ही है । ऎसे घटाटोप में चाणक्य और चंन्द्रगुप्त के अवतरण का बस इंतज़ार ही किया जा सकता है ।

रविवार, 29 मई 2011

संघ-भाजपा के सितमों से आचार्य धर्मेन्द्र आगबबूला

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और आरएसएस को इन दिनों हिन्दुत्व के अलंबरदार और तेज़तर्रार विहिप नेता आचार्य धर्मेन्द्र का कोपभाजन बनना पड़ रहा है । गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के कब्ज़े से छुड़ाने के लिए सागर में करीब एक हफ़्ते का अनशन नाकाम होने से आचार्य बेहद बिफ़रे हुए हैं । दरअसल आचार्य धर्मेन्द्र पिछले रविवार को सागर में अनशन पर बैठे थे। पर सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और किसी नतीजे के पहले ही उन्हें छह दिन बाद गाय का दूध पीकर अपना आमरण अनशन खत्म करना पड़ा। अपनों के सितम से बेज़ार आचार्य संघ और भाजपा पर मतलबपरस्ती की तोहमत लगा रहे हैं।

बगैर कुछ हासिल किए मजबूरी में अनशन तोड़ने के बाद अब आचार्य धर्मेन्द्र भाजपा सरकार और आरएसएस को कोस रहे हैं। गुस्साये हिन्दूवादी नेता ने सरस्वती शिशु मंदिर पर तीखे प्रहार करते हुए संगठन को शिक्षा माफ़िया तक बता डाला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर विश्वासघात का आरोप लगाने वाले आचार्य धर्मेन्द्र की निगाह में संघ अब 'परिवार' नहीं रहा बल्कि 'तंत्र' बन गया है । संघ में भावना, समर्पण,त्याग व प्रेम की जगह धनलोलुपता का जोर बढ़ रहा है। उन्होंने आमरण अनशन के बेनतीजा समाप्त होने को अपनी पराजय न मानते हुए संघ पर लगा कभी न मिटने वाला कलंक बताया।

कहते हैं लोहा,लोहे को काटता है। लिहाज़ा प्रदेश सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी । इस घटनाक्रम से गौ और गंगा के नाम पर हिन्दुओं को भरमाने वाली भाजपा की इन मुद्दों पर गंभीरता का सहज ही अँदाज़ा लगाया जा सकता है। आचार्य धर्मेंद्र मानते हैं,इससे हिंदुत्व और गाय के लिए नारा लगाने वालों की असलियत सामने आ गई है। उनका अनशन जमीन के लिए नहीं,बल्कि गौ-माता के लिए था। उन्होंने कहा कि स्कूल द्वारा दबाई गई जमीन गौ सेवा संघ की है। भाजपा और आरएसएस की भूमिका से खफ़ा हिन्दू नेता इसे अपने जीवन का सबसे कड़वा अनुभव बता रहे हैं। अनशन की नाकामी से निराश आचार्य इसे संघ और भाजपा की हार करार देने से भी नहीं चूकते।

आचार्य धर्मेन्द्र के मुताबिक वे वर्ष 1980 से सागर के गौ सेवा संघ के संरक्षक हैं और आरएसएस से भी जुडे़ रहे हैं, लेकिन गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर संगठन के कब्जे से मुक्त कराने के मामले में संघ ने उनके साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि संघ का अनुषांगिक संगठन सरस्वती शिशु मंदिर छल, षड़यंत्रों व कुचक्रों का जाल बुनने वाला शिक्षा माफिया है। संघ के अनुषांगिक संगठनों के समूह को संघ परिवार कहा जाता रहा है, लेकिन सागर के जहरीले अनुभव के बाद अब वह संघ परिवार को 'संघ तंत्र' कहने को विवश हैं। संघ पर "यूज एंड थ्रो" की पश्चिमी संस्कृति अपनाने का आरोप जड़ते हुए उन्होंने कहा कि अपनों ने मुझे खो दिया। उन्हें अब मेरी जरूरत नहीं है।

गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। जानकारों का कहना है कि गौ सेवा संघ को 1927 में पचास हजार वर्ग फीट से अधिक जमीन दान में मिली थी। इसे गौ शाला बनाने और गौ संरक्षण के उद्देश्य से दिया गया था। 1972 में गौ सेवा संघ ने सरस्वती शिशु मंदिर को दो कमरे किराए पर दिए थे। इसके बाद वर्ष 1980 में सरस्वती शिशु मंदिर के पदाधिकारियों ने उनसे ही शिशु मंदिर के नए भवन का शिलान्यास करा लिया और लगातार विकास करते रहे। जब आचार्य धर्मेन्द्र को जमीन हथियाने की सूचना मिली तो उन्होंने आरएसएस के लोगों से बात की पर नतीजा नहीं निकला। पंचखंड पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच चल रहे भूमि विवाद को सुलझाने के मकसद से सागर आए थे। जमीन मुक्त कराने के लिये सरस्वती शिशु मंदिर के प्रवेश द्वार पर 21 मई से सत्याग्रह शुरू किया था, जो 24 मई को आमरण अनशन में तब्दील हो गया। सरकार की बेरुखी के कारण आमरण अनशन 27 मई को बेनतीजा खत्म करना पड़ा।

आचार्य धर्मेन्द्र सरीखे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के कटु अनुभव संघ और भाजपा पर सत्ता क सुरुर चढ़ने की पुष्टि करते हैं। वैसे भी जिसे पीने का शऊर और आदत भी नहीं हो,उस पर नशा कुछ जल्दी ही तारी हो जाता है। जनता को संस्कारों की घुट्टी पिलाने वाले संघी सत्ता के मद में इस कदर चूर हो चुके हैं कि अपनी ही नीतियों और सिद्धांतों को रौंदते हुए बढ़े चले जा रहे हैं,गोया कि प्रदेश में सत्ता की चाबी महज़ पाँच सालों के लिये नहीं आने वाली कई पुश्तों को सौंप दी गई है। लोकतंत्र में नये किस्म का सामंतवाद लाने वालों को आगाह ही किया जा सकता है। बहरहाल आचार्य धर्मेन्द्र के आक्रोश को नसीहत समझकर सबक सीखने की गुंजाइश तो रखना ही चाहिए। और फ़िर -

कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय|
जा खावत बौरात है,वा पावत बौराय ।|