गुरुवार, 22 सितंबर 2011

मुख्यमंत्री की चीन यात्रा सवालों के घेरे में

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लोकायुक्त के बेटे को लेकर चीन की सैर कर आये हैं । चीन यात्रा में लोकायुक्त पी.पी.नावलेकर के कारोबारी सुपुत्र की सहभागिता विवादों में घिर गई है। चीनी निवेशकों को मध्यप्रदेश में उद्योग लगाने के लिये आमंत्रित करने की गरज से डालियान,बीजिंग और शंघाई की नौ दिवसीय यात्रा पर गये प्रतिनिधि मंडल में संदीप नावलेकर की मौजूदगी ने एक साथ कई सवाल खड़े किये हैं। उनको मुख्यमंत्री के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल में चीन ले जाना कई शंकाओं को जन्म दे रहा है। भाइयों, बीवी और साले की मदद से भ्रष्टाचार की गंगोत्री में पुण्य स्नान करने वाले शिवराज अन्ना और रामदेव के आंदोलन का समर्थन कर खुद को पाक - साफ़ दिखाने की खूब कोशिश करते हैं, लेकिन हकीकत एकदम अलग है । नावलेकर के कारोबारी बेटे के सरकार से जुड़े हित लोकायुक्त की निष्पक्षता को जानने के लिये पर्याप्त है। 

"ठाकुर और गब्बर" की जोड़ी यानी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सपत्नीक चीन पहुँचकर वहाँ के उद्योगपतियों को मध्यप्रदेश आने का न्यौता दिया। ये अलग बात है कि इन्वेस्टर्स मीट के नाम पर अब तक करोड़ों रुपये फ़ूँकने के बावजूद प्रदेश सरकार देशी निवेशकों को ही रिझाने में नाकाम रही है। यानी "जितने की झाँझ नहीं,उससे ज़्यादा के तो मँजीरे फ़ोड़ डालने" की कहावत को चरितार्थ करते हुए शिवराज पूरे लाव-लश्कर के साथ चीन यात्रा पर गये। चीन यात्रा का लुत्फ़ उठाने वालों में आला अफ़सरान के साथ पार्टी और नेताओं के कई चहेते व्यापारी-व्यवसायी भी शामिल थे। 

गौर करने वाली बात यह है कि उनकी टोली में शामिल संदीप नावलेकर महज़ए एक व्यवसायी ही नहीं, बल्कि वे न्यायमूर्ति पी.पी. नावलेकर के पुत्र हैं, जो वर्तमान में प्रदेश के लोकायुक्त के रूप में एक उच्च संवैधानिक न्यायिक जाँच प्राधिकारी भी हैं। वे मुख्यमंत्री, मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ मिलने वाली षिकायतों की जाँच कर अपना महत्वपूर्ण फैसला देते हैं। ऎसे में लोकायुक्त के महत्वपूर्ण संवैधानिक पद की गरिमा को भी राज्य सरकार ने सवालों के घेरे में ला दिया है। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के लगभग दर्ज़न भर मंत्रियों और कई नौकरशाहों की जाँच लोकायुक्त में पेंडिंग है।

काँग्रेस भी इस मामले मैं सरकार पर हमलावर हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने सीधे मुख्यमंत्री को निशाने पर ले लिया है। भूरिया ने शिवराज सिंह से पूछा है कि वे संदीप को चीन की यात्रा पर क्यों ले गए थे जबकि उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के गैर सरकारी सदस्यों के लिए निर्धारित यात्रा शुल्क की रकम भी जमा नहीं की है, जो लाखों रुपये में होती है। उनका आरोप है कि लोकायुक्त के पुत्र संदीप नावलेकर के व्यावसायिक हित म.प्र. सरकार के साथ जुडे़ हुए हैं। प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष ने आगे कहा है कि संदीप नावलेकर डार्लिंग पम्प्स प्रायवेट लिमिटेड, इंदौर के प्रबंध संचालक हैं। यह कंपनी आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया और शहरी विकास मंत्री बाबूलाल गौर के विभागों को सीवेज पंप सप्लाई करती है। 

यहाँ ये बताना भी ज़रुरी है कि मध्य प्रदेश देश का ऐसा राज्य है, जहाँ लोकायुक्त को सर्वाधिक अधिकार हैं। संगठन ने इन अधिकारों का बेहतर इस्तेमाल किया हो, ऐसा अब तक नज़र नहीं आया है। लोकायुक्त पी.पी. नावलेकर ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी साधना सिंह को दिसम्बर २०१० में बहुचर्चित डंपर खरीदी कांड में क्लीन चिट दे दी थी। लोकायुक्त पुलिस ने अदालत में मामले को खत्म करने की सिफारिश की थीएजिसके आधार पर भोपाल की विशेष अदालत ने उनके हक में फ़ैसला सुनाया था। पूर्व लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल भी डंपर मामले की जाँच के दौरान विवादों में फ़ँसे थे। उन पर भोपाल की सांसद-विधायकों की शानदार आवासीय कॉलोनी रिवेयरा टाउनशिप में मकान आवंटन कराने का मामला कोर्ट तक पहुँचा था। इसी तरह उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीयए विधायक रमेश मेंदोला समेत तमाम बड़े नेता और मंत्री लोकायुक्त की सुस्ती का खूब फ़ायदा ले रहे हैं।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

क्या पहुँच पायेगी सीबीआई शहला मसूद के कातिलों तक

भोपाल का बहुचर्चित और सनसनीखेज़ शहला मसूद हत्याकांड भी अब नोयडा के आरुषि-हेमराज मामले की तर्ज़ पर आगे बढ़ रहा है। देश की सबसे काबिल जाँच एजेंसी सीबीआई ने शहला के कातिल का सुराग देने वाले को पाँच लाख का ईनाम देने की घोषणा के साथ ही इस मामले की नियति और परिणीति लगभग तय कर दी है । इससे पहले मध्यप्रदेश पुलिस ने कातिल तक पहुँचाने वाले को एक लाख रुपए देने का ऎलान किया था । तमाम भाजपा नेताओं के नाम सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ने आनन फ़ानन में जाँच सीबीआई को सौंपने की घोषणा तो कर दी,मगर कागज़ी खानापूर्ति नहीं होने के कारण पंद्रह दिनों तक  मामला अटका रहा । इस बीच स्थानीय पुलिस तफ़्तीश में जुटी रही । इस दौरान सबूत भी बखूबी खुर्द-बुर्द कर दिये गये और मामले का रुख भी बेहद चतुराई से दूसरी तरफ़ मोड़ दिया गया । सीबीआई अब तक इस मामले में करीब आधा दर्जन लोगों से पूछताछ कर चुकी है,पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है । पक्ष-विपक्ष की राजनीति को नज़दीक से समझने वाले आशंका जता चुके हैं कि इस मामले का हश्र भी रुसिया हत्याकांड  की तरह होना तय है । उस मामले में सुषमा स्वराज के करीबी विधायक जीतेन्द्र डागा का नाम उछलने के बाद सीबीआई जाँच कराई गई थी और जाँच में रुसिया की मौत को हादसा करार दिया गया था ।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद तरुण विजय और  वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से व्यक्तिगत जान पहचान रखने वाली शहला के भाजपा के साथ गहरे ताल्लुकात पर चर्चा का बाज़ार गर्म है । आरटीआई कार्यकर्ता शहला के भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से गहरे संबंधों ने पार्टी के सामने मुश्किलें खडी कर दी हैं । आज आलम यह है कि शहला मसूद  हत्याकांड भाजपा में अंदरूनी घमासान और एक-दूसरे को निबटाने का हथियार बन गया है । सबसे ज्यादा गंभीर बात यह है कि भोपाल से लेकर दिल्ली तक के कई भाजपा नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं । प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के कई नामचीन चेहरे शक के दायरे में हैं ।  प्रदेश की राजनीति में "चरित्र हनन" का ब्रह्मास्त्र चलाकर अपने प्रतिद्वंद्वियों को चित्त करने में माहिर खिलाड़ियों ने  तरूण विजय से शहला के अंतरंग संबंधों को लेकर मीडिया में कुछ इस तरह हवा बनाई कि अब असली कातिल तक पहुँचना सीबीआई के लिये आसान नहीं होगा ।

बहरहाल मामले में हर गुज़रते दिन के साथ नये-नये खुलासे हो रहे हैं । जानकार बता रहे हैं कि जाँच में कुछ ऐसी बातें सामने आ सकती हैं, जो प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दें । मामले की सीबीआई जाँच से शहला और प्रदेश की राजनीति से जुड़े कई अनछुए पहलू सामने आने की उम्मीद है। सूबे की राजनीति के साथ-साथ प्रशासन में हलचल मचाने वाले मामलों से भी पर्दा उठ सकता है । आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या के वक्त का चुनाव और उसका सबब पहेली बना हुआ है । इस हाईप्रोफाइल मामले की गुत्थी बेहद उलझी हुई है,जो कई दिग्गज नेताओं और अफसरों को लपेट सकती है। ।  विधायकों और सांसदों से लेकर चार आईएएस,दो आईपीएस अधिकारियों तथा एक जाने माने बिल्डर पर शक की सुई घूम रही है ।

१६ अगस्त की सुबह शहला मसूद की भोपाल में उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई थी । वह अपनी कार में ही मृत पाई गईं। शहला मसूद भोपाल की वह शख्सियत थी,जिसने सूचना के अधिकार का उपयोग करते हुए कई मंत्रियों तथा अधिकारियों को सीधे-सीधे घेरा । वे कई नेताओं की करीबी रहीं,तो कई नेताओं की किरकिरी भी बनी रहीं । शहला ने आरटीआई में आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के भ्रष्टाचार की जानकारी हासिल की थी । उन्होंने चार आईएएस अफसरों सहित शहर के एक बड़े बिल्डर द्वारा विभिन्न विभागों में किए जा रहे निर्माण कार्यों की जानकारी सूचना के अधिकार के अंतर्गत संबंधित विभागों से माँगी थी । इन तमाम जानकारियों में नेताओं और अफ़सरशाही की मिलीभगत उजागर हो सकती थी । वे इंडिया अगेंस्ट करप्शन की प्रदेश संयोजक भी थीं। ऎसा कहा जाता है कि हत्या वाले दिन यानी १६ अगस्त को ही बोट क्लब पर मध्य प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान शुरू कर भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों के नामों का खुलासा करने वाली थीं । सौ मीटर लम्बे बैनर पर हस्ताक्षर के ज़रिये यह जानने की कोशिश होने वाली थी कि प्रदेश का सबसे भ्रष्ट महकमा और अधिकारी कौन है? शहला अन्ना के आंदोलन की तर्ज पर एम.पी.अगेंस्ट करप्शन अभियान शुरू करने वाली थी। वो नेताओं और अफसरों के काले कारनामों को उजागर करतीं, उससे पहले उन्हें  दुनिया से रुखसत कर दिया गया।

इस सनसनीखेज़ हत्‍याकांड से मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के दफ्तर का नाम जुड़ने की चर्चा भी अब आम है । सीबीआई के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक एक अगस्त को शहला ने सीवीसी से मुख्यमंत्री औऱ प्रदेश सरकार की शिकायत की थी। बताया जा रहा है कि शहला ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि उन्‍हें मुख्‍यमंत्री के स्‍टाफ की ओर से धमकी मिली थी। हालाँकि जब एक न्यूज़ चैनल ने इस बारे में शिवराजसिंह से पूछा तो उन्‍होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।

शुरुआत में इस हत्या को आत्महत्या में बदलने की कोशिश भी की गई । शहला की कॉल डिटेल में दिल्ली के एक भाजपा नेता से लंबी बातचीत का रिकार्ड मिलने के बाद घबराई पुलिस मामले को खुदकुशी बताने की थ्योरी पर काम करने लगी थी । लेकिन शहला के परिजनों और नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह की ओर से सीबीआई जाँच की माँग सामने आते ही इसे तत्काल सीबीआई को सौंप दिया गया । केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी हत्यारों का जल्द पता लगाने के बारे में मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था । वहीं शहला के पिता मसूद सुल्तान के मुताबिक उनकी बेटी को जान का खतरा था,जिसे लेकर आईजी को पत्र भी लिखा था । उन्होंने आईजी पवन श्रीवास्तव,हीरा खनन कंपनी रियो-टिंटो के अफसर,बीजेपी नेता सहित कुछ अन्य लोगों पर भी हत्या का संदेह जताया है ।

सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद की हत्या के मामले में जाँच का एक बिंदु यह भी है कि सूचना के अधिकार के तहत जानकारी हासिल करने के दौरान ऐसे कितने और कौन-कौन लोग थे,जो शहला मसूद के दुश्मन बन गए? क्या दुश्मनी इस हद तक जा पहुँची थी कि कोई उनकी जान तक ले ले ? शहला की हत्या के बाद सामने आईं जानकारियों से पता चला है कि उन्होंने करीब एक हजार आवेदन विभिन्न महकमों में गड़बड़ियों से जुड़ी जानकारियाँ जुटाने में लगा रखे थे। इनमें बाघों के शिकार,वनों की अवैध कटाई और पुलिस की करतूतों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ चाही गई थीं ।

कहा जाता है कि शहला को छतरपुर जिले के सघन वनों में गैरकानूनी रूप से हीरे के खनन की जानकारी भी थी । यह जगह पन्ना टाइगर रिजर्व के पास बताई जाती है । शहला ने  पन्ना जिले में रियो-टिंटो कंपनी से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार के तहत हासिल की थी । १२ लाख रुपए खर्च कर अपनी लक्जरी कार में बार बनाने वाले रंगीनमिजाज़ मंत्री को उन्होंने जमकर घेरा था । सात सौ करोड़ के एक कथित घोटाले की तहकीकात में भी वे लगी हुई थी । बाँधवगढ़ में पिछले दिनों हुई एक बाघिन की हत्या में एक मंत्री तथा उनके भतीजे के खिलाफ वे मुहिम चला रही थी । खबर तो ये भी है कि शहला ने  शराब और शिकार के शौकीन प्रदेश के मंत्रियों के बेटों की हरकतों की एक सीडी तैयार कर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को दी थी । इस सीडी में बाँधवगढ़ में एक बाघिन की रहस्यमय ढंग से हुई मौत के राज़ हैं । इस मामले की एसटीएफ द्वारा जाँच की जा रही है । इसके लपेटे में दो वरिष्ठ आईएएस अफसर भी आ सकते हैं ।

शहला की जिंदगी से जुड़े सभी पहलुओं की बारीकी से पड़ताल भी कातिल तक  पहुँचाने में मददगार बन सकती है । जाँच तो इस बात की भी होना चाहिए कि कैसे मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की इवेंट मैनेजमेंट करते-करते भाजपा के नेताओं के करीब जा पहुँची ? लालकृष्ण आडवाणी,सुषमा स्वराज,नितिन गडकरी सरीखे नेताओं के साथ शहला के फ़ोटोग्राफ़ भाजपा में उसकी पैठ की गवाही देने के लिये काफ़ी हैं । ऎसे में ये सवाल बेहद मौजूँ हो जाता है कि महज़ दो-तीन सालों में एक आरटीआई कार्यकर्ता की सियासी गलियारों में सरगर्मियाँ कब,कैसे और क्यों बढ़ीं ? ये जाँच का विषय है कि उसे पार्टी के कद्दावर नेताओं से सबसे पहले किसने रूबरू कराया और वह किन नेताओं की खास रही, बाद में उसकी किन से और किन कारणों से अनबन हुई ?

दिल्ली से मास कम्युनिकेशन का डिप्लोमा करने के बाद भोपाल के सिटी केबल में बतौर एंकर काम कर चुकी शहला मसूद को पत्रकारिता ज्यादा रास नहीं आई और उसने "मिरेकल्स" नाम की कंपनी बनाकर इंवेंट मैनेजमेंट के क्षेत्र में कदम रखा । कुछ ही सालों में शहला को अपने संपर्को के बूते पर्यटन विकास निगम,संस्कृति विभाग जैसे सरकारी महकमों में लाखों के काम मिलने लगे । इस तथ्य को इसी से समझा जा सकता है कि शहला की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी और आरएसएस समर्थित ''श्यामा प्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट '' मिलकर दिल्ली,भोपाल,कश्मीर,कोलकाता में कई कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं । इस वज़ह से शहला का उठना-बैठना ओहदेदार और रसूखदार लोगों के साथ था । विधायक ध्रुव नारायण सिंह की एनजीओ "उदय" तो अब शहला ही चला रही थीं । जब ध्रुव नारायण पर्यटन निगम अध्यक्ष थे,तब शहला की कंपनी को कई काम मिले थे । हालाँकि भोपाल के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का टिकट नहीं मिलने के बाद से उसके मन में ध्रुव नारायण के प्रति खटास पैदा हो गई थी । आलम ये था कि  पर्यटन विकास निगम, जिसमें वे इवेंट मैनेज करने में लगी थी, वहीं कई शिकायतें उन्होंने कर रखी थी । ईको टूरिज्म पर हो रहे विकास कार्यो को लेकर उन्होंने सीधे वहां के एमडी को कठघरे में लिया था । ऐसी और भी शिकायतें थी,जिनको सूचना के अधिकार में लिया गया, लेकिन इसके बाद उनका क्या हुआ आज तक पता नहीं चला । 

सवाल ये उठ रहे हैं कि शहला मसूद की मौत की वजह कहीं उसकी भाजपा सांसद तरुण विजय से बढ़ती नजदीकी तो नहीं बनी? राजनीतिक हसरतें ही तो उसकी मौत का सबब नहीं बन गईं? कहते हैं,पार्षद का टिकट पाने में नाकाम शहला मसूद को अपनी राजनीतिक हसरतों को मंजिल तब दिखना शुरू हुई, जब वह तरुण विजय के संपर्क में आईं । दो साल में दोनों के बीच नजदीकी इतनी बढ़ी कि पिछले साल ईद पर मुबारकबाद देने के लिये तरुण शहला के घर पहुँचे । तरुण और शहला के बीच हत्याकांड के ठीक एक दिन पहले दो बार लंबी बातचीत हुई । पहले शहला ने फोन करके ४५ मिनट बात की तो बाद में तरुण विजय ने फोन लगाया और २७ मिनट बात की । हत्याकांड वाले दिन भी सुबह दोनों के बीच फोन पर बात हुई थी । करीबी दोस्त की हत्या के पन्द्रह दिन तक उनकी चुप्पी ने भी कई सवाल खड़े किये हैं । लेकिन ये तमाम तथ्य तरुण विजय को कठघरे में खड़ा करने के लिये पर्याप्त नहीं कहे जा सकते । ऎसा लगता है कि तरुण विजय और शहला के व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों के खुलासों को हवा देकर प्रदेश के कई घाघ नेताओं ने तोप का मुँह दिल्ली के नेताओं की ओर मोड़ कर हिसाब-किताब बराबर किया है । इसे "जाँच की आँच" से दामन बचाने की कोशिश के तौर भी देखा जा सकता है ।

तरुण विजय और शहला मसूद के बीच 'आर्थिक लेनदेन' को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं । मध्‍य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष २०१० में विजय के श्यामाप्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट को २५ लाख रुपए की आर्थिक मदद दी थी । राज्‍यसभा सदस्‍य और आरएसएस के मुखपत्र 'पांचजन्‍य' के पूर्व संपादक तरुण विजय इस एनजीओ के प्रमुख हैं। कहा जा रहा है कि विजय ने ही  शहला को इस एनजीओ से जोड़ा था। जानकारी के अनुसार हाल में ही शहला ने करीब ८० लाख रुपए की जमीन का सौदा किया था । उस सौदे में कई पेंच थे । मामले में दिलचस्पी रखने वाले अपने तईं तफ़्तीश में जुटे हैं कि जमीन खरीदने में शहला के साथ और कौन-कौन लोग शामिल थे? जमीन खरीदने के लिए रुपए कहाँ से और कैसे जुटाए थे? इस मामले में शहला के किन लोगों से मतभेद थे? ये तमाम बातें भी अब जाँच का हिस्सा बनेंगी ।

दरअसल अपने राजनीतिक संपर्को के बूते शहला की भाजपा में जाने की तैयारी हो गई थी । भोपाल के विधायक ध्रुवनारायण सिंह तथा राज्यसभा सदस्य तरुण विजय इसके प्रयास में थे । विजय ने शहला की भाजपा में एंट्री पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में बतौर चेयरमैन कराने की कवायद भी की थी, लेकिन अंडरवर्ल्ड और आईएसआई से तार जुड़े होने का पेंच फ़ँसाकर उस मुहिम की हवा निकाल दी गई । अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोड़ने की कवायद में जुटी भाजपा के पास दमखम वाले मुसलमान नेताओं का टोटा है । विजय विधानसभा चुनावों में शहला की  माडरेट मुस्लिम नेता की छवि को भुनाकर मुसलमानों को बीजेपी से जोड़ने की कोशिश में थे । तरुण विजय के जरिए शहला भाजपा और आरएसएस के शीर्षस्थ नेताओं के संपर्क में आई थी । सूत्रों के मुताबिक शहला राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच का तानाबाना खड़ा करने में मददगार बनी थी । यह मंच जम्मू-कश्मीर सहित पूरे उत्तर भारत में काम करता है। इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में भाजपा का जनाधार बढ़ाना और राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार करना है।

पुलिस जाँच में एक दिशा यह भी थी कि कहीं इसके पीछे कोई कट्टरपंथी कनेक्शन तो नहीं है ।  बिंदास जीवन शैली और  उदारवादी छबि के चलते शहला के संपर्कों का दायरा बहुत व्यापक था। उसके कई ऐसे लोगों से भी संपर्क थे जो कट्टरपंथी माने जाते हैं । यदि सूत्र इस दिशा में बढ़े तो यह मामला चौंकाने वाले राज से पर्दा हटा सकता है । इस संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता कि कहीं डबल क्रॉस तो शहला की मौत का कारण नहीं बना ? इन तारों को जोड़ने की भी कोशिश चल रही थी  कि पिछले दो ढाई साल में शहला के तरुण विजय जैसे नेताओं से नजदीकी संबंध और इसी दौरान प्रदेश में सिमी के नेटवर्क के कई लोग पुलिस की पकड़ में आने के बीच कोई संबंध तो नहीं है । इन हल्कों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक शहला की हत्या के सूत्र पिछले दिनों पूरे प्रदेश में पुलिस द्वारा सिमी के नेटवर्क को ध्वस्त करने की कोशिशों से जुड़ते नजर आ रहे हैं ।

दरअसल शहला की हत्या ने पुलिस से ज्यादा संघ और भाजपा से जुड़े लोगों को चौंकाया है। तमाम तथ्यों के सामने आने के बाद यह सवाल और भी पेचीदा हो जाता है कि आखिर शहला की हत्या क्यों हुई ? इसे पूरी तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वाले सिपाही की कुर्बानी मान लेना उन आरटीआई कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी, जो हर जोखिम उठाकर हर कीमत पर सच की मशाल को थामे रहते हैं । कनबतियों पर यकीन करें तो हज़ारों आरटीआई के ज़रिये हासिल की गई जानकारियाँ दुधारु गाय में तब्दील करने का हुनर हासिल करने के बाद शहला सियासी और सरकारी अमले के लिये सिरदर्द बन चुकी थी। कह पाना बड़ा मुश्किल है कि आरटीआई कार्यकर्ता होने की हैसियत ने उनके इवेंट मैनेजमेंट के कारोबार को आगे बढ़ाया या गड़बड़ियों के खुलासे की आड़ में मिल बाँटकर हिसाब कर लेने के हुनर ने। प्रदेश में चरित्र हनन की राजनीति के मँझे हुए खिलाड़ियों ने बड़ी ही सफ़ाई से जाँच का रुख दिल्ली की ओर मोड़ दिया है। जाँच रिपोर्ट सामने आने तक इस सनसनीखेज़ हत्याकांड पर लोग अपनी तरह से कयास लगाते रहेंगे आखिर क्यों गई शहला की जान ...? आरएसएस से जुड़ाव,बाघों के मौत के विरुद्ध आवाज़ उठाना,आपसी रंजिश या राजनीतिक महत्वाकांक्षा......मौत की वजह कोई भी हो सकती है।