गुरुवार, 30 अगस्त 2012

लोकतंत्र की दीमक


मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वक्त वो सब हो रहा है , जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । कल तक खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानकर शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ़ खेमेबंदी का झंडा उठाकर चलने वाले कैलाश विजयवर्गीय आज सरकार की झूठन समेट रहे हैं । चाहे वो मुरैना में हुई आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या का मामला हो , महज़ सात सालों में अरबपति बने दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के सीधे ताल्लुकात का मुद्दा हो या कोल ब्लॉक आवंटन मामले में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल हों । मुख्यमंत्री मुँह में दही जमा कर बैठे हैं और कैलाश विजयवर्गीय उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं । गोया कि सूबे के मुखिया बनने का ख्वाब हुआ हवा , अब तो आलम ये है कि कुर्सी बचाए रखने के लिए चौहान की चरणोदक पीने में भी गुरेज़ नहीं रहा ।

 रही सही कसर एमपीसीए के चुनाव में मिली करारी मात ने निकाल दी । धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए माधवराव सिंधिया ने क्लीन स्वीप कर दिया । कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र के सभी हथकंडे अपनाए ,मगर वो भूल गए कि गली-कूचों में “भिया और भिडु “ तैयार करके विधायकी हासिल करना अलग बात है , भद्र और कुलीन समाज का खेल माने जाने वाले क्रिकेट की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना और बात । 

इसी तरह देश के इतिहास में शायद ये पहला ही मौका होगा , जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो सौ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के हुजूम ने इंदौर में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल दिया । संघी मनोज परमार मामले के जाँच अधिकारी के एकाएक तबादले से नाराज़ थे । सूबे के मुखिया के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी कर रहे इन कार्यकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को प्रताड़ित कर रही है । इंदौर इन दिनों गैंगवार और माफ़िया की गिरफ़्त में फ़ँस कर कराह रहा है । मगर इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं । भाजपा समर्थक व्यापारी प्रशासन से गुँडाराज से छुटकारा दिलाने की गुहार लगा रहे हैं ।

प्रदेश के मुखिया हवाई सफ़र, विदेश भ्रमण, तीर्थाटन, देवदर्शन या फ़िर प्रदेश के रमणिक स्थलों पर परिवार के साथ सुस्ताने में व्यस्त रहते हैं । इन गतिविधियों से कभी कुछ वक्त मिल जाता है , तो मीडिया का चोंगा थाम कर देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपने “अनमोल वचन” प्रसारित करके उपस्थित दर्ज कराते रहते हैं । "मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थूकने" की प्रवृत्ति के पोषक मुख्यमंत्री प्रदेश की हर बड़ी घटना पर मुँह सिलकर बैठ जाते हैं । ऎसे मौके पर नरोत्तम मिश्र या कैलाश विजयवर्गीय को आगे कर दिया जाता है । लोग मायावती के प्रचार अभियान पर सरकारी खज़ाने के १२० करोड़ रुपए फ़ूँक दिए जाने पर गाल बजाते हैं । यदि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह की ब्रांडिंग पर जनसंपर्क, वन्या , खेल और तमाम अन्य महकमों के मद से लुटाए गए खज़ाने का अनुमान लाया जाए , तो ये किसी भी सूरत में ३५० करोड़ रुपए से कम नहीं बैठेगा ।

इसके अलावा यह भी एक दिलचस्प खबर है कि सूबे के मुखिया औसत हर रोज़ दो घंटे हवाई यात्रा में बिताते हैं । सब कुछ हवा में ही है, ज़मीन पर कुछ नहीं अगर है भी तो बस पोलपट्टी । यही नतीजा है कि भाजपा के ज़िला पदाधिकारी भी अपना सिर पीट रहे हैं । वे कहते हैं कि ज़िलों में ना सड़क है ना बिजली और ना ही पानी , बरसात में तो हालात बदतर हो चुके हैं , ऎसे में जनता को क्या जवाब दें ? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे चुनाव में जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएँगे ? अधिकांश पदाधिकारी मानते हैं कि इन्हीं मुद्दों को लेकर दिग्विजय सिंह को सत्ता से उखाड़ फ़ेंकने वाली जनता अब भाजपा को सबक सिखाने का मूड बना रही है । मगर दिल्ली की चाँडाल – चौकड़ी को हफ़्ता पहुँचाकर अपनी कुर्सी बचाए रखने वालों का जनता के सुख-दुख से क्या सरोकार ?

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ  के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी प्रदेश सरकार की कारगुज़ारियों पर अँगुली उठाते रहे हैं । ये अलग बात है कि  भाजपा सरकार की मुखालफ़त की उन्हें भारी कीमत चुकाना पड़ी । सच बोलने की सज़ा के तौर पर उन्हें असंवैधानिक तरीके से पद से हटा दिया गया , करीब पंद्रह दिन जेल की सलाखों के पीछे फ़ेंका गया सो अलग । हाल ही में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भोपाल में आयोजित अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम में पहुँचे श्री शर्मा ने प्रदेश सरकार को यूपीए सरकार से भी चार गुना ज़्यादा भ्रष्ट करार देकर सबको सकते में डाल दिया ।

 अपनी साफ़गोई के लिए पहचाने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा जैसे लोगों को सत्ता का रोग मानते हैं । खून- पसीने से पार्टी को सींच कर यहाँ तक पहुँचाने वालों की कतार में शामिल रहे श्री शर्मा का कहना है कि संकट के समय ये लोग नहीं दिखेंगे, उस समय काम आयेंगे त्यागी और सिद्धांतनिष्ठ कार्यकर्ता । मगर उनकी इस नसीहत की आखिर ज़रुरत किसे है? अपना तो क्या चाचा के मामा के ताऊ के फ़ूफ़ा  तक की पुश्तों का इंतज़ाम कर चुके इन सत्ताधीशों को क्या लेना देश से ,यहाँ की जनता से , भारत के लोकतंत्र से ।

दरअसल इस देश में इस तरह के लोकतंत्र की कोई ज़रुरत ही नहीं है । देश में भ्रष्टाचार के मूल में लोकतंत्र के नाम पर खड़े किये गये चूषक तंत्र ही हैं । मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आखिर इस देश में दिल्ली से लेकर गाँवों की गली-कूचों तक जनप्रतिनिधियों के नाम पर खड़े किए गए इन सत्ता के दलालों की ज़रुरत क्यों है ? अगर देश के नेता सिर्फ़ दलाली खाने के लिए ही हैं तो इनका खर्च जनता क्यों उठाए ? राष्ट्र्पति शासन में भी तो सरकारी मशीनरी बिना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बेहतर और सुचारु ढंग से काम करती है । गौर करने वाली बात यह भी है कि जब से नगर निगम और नगर पालिकाएँ बनीं तबसे अव्यवस्थाएँ और गंदगी फ़ैली । महापौर और पार्षद रातोंरात करोड़पति बन गए ,मगर शहरों की हालत बद से बदतर होती गई । यही हाल ग्राम स्वराज के नाम पर खड़ी की गई पंचायती राज व्यवस्था का है । पंच-सरपंच पजेरो में सैर कर रहे हैं लेकिन गरीब आदमी सूखे निवालों से भी महरुम है । यानी अब लोकतंत्र  की दीमकों से छुटकारा पाने के लिए सत्ता बदलने की नहीं , देश चलाने के लिए नय रास्ता तलाशने का वक्त है ।

शनिवार, 18 अगस्त 2012

अकेला कांडा ही तो दोषी नहीं


गीतिका खुदकुशी मामले में गोपाल कांडा को लेकर बवाल मचा हुआ है । लेकिन इस मामले का एक पहलू और भी है , जिसे नज़र अँदाज़ किया जा रहा है । हालाँकि इस ओर इंगित करने से अक्सर लोग घबराते हैं, बचते हैं । और इसकी वजह है लोकेषणा । लोगों को लगता है कि कहीं उन पर रुढ़िवादी या दकियानूसी होने का ठप्पा न लग जाए । खुद को प्रोग्रेसिव जताने की खोखली चाहत में समाज लगातार गर्त में जा रहा है । हम सब इस अधोपतन को मुँह बाये देख रहे हैं ।

 चारों तरफ़ से कांडा पर आरोपों की बारिश हो रही है । गीतिका का भाई चीख-चीख कर गोपाल कांडा की गिरफ़्तारी की माँग करता टीवी पर गाहे-बगाहे नज़र आ रहा है । लेकिन क्या गीतिका की मौत के लिए उसका परिवार भी बराबर का ज़िम्मेदार नहीं है ? विभिन्न शहरों में खिंचवाई गई तस्वीरें गीतिका के परिवार और कांडा के करीबी ताल्लुकात की तस्दीक करती हैं । एक सवाल ये भी कि महज़ सत्रह साल की उम्र में ज़रुरी योग्यता हासिल किए बगैर नौकरी की शुरुआत के लिए बाहर भेजने और एकाएक कामयाबी की सीढ़ी पर फ़र्राटा भरने के दौर में गीतिका का परिवार खामोश क्यों रहा ?

 बेटी के पैसों पर मौज उड़ाते वक्त क्या उस युवती के माता-पिता के ज़ेहन में एकबारगी ये ख्याल आया कि उनकी सुपुत्री पर एकाएक कामयाबी की बौछारें क्यों हो रही है । महँगी गाड़ी, मोबाइल तोहफ़े लेते समय क्या कभी उनके मन में सवाल नहीं उठे ? अगर शुरुआती दौर में ही इस सिलसिले को सख्ती से रोकने की कोशिश की जाती, तो शायद हालात कुछ और होते । इस मामले में कांडा के समर्थन में थाने पर प्रदर्शन का मामला भी समाज के विद्रूप चेहरे को सामने लाता है । समाज में नैतिकता का संकट इतना गहरा गया है कि लोग पैसे की खातिर रसूखदारों के हज़ारों गुनाहों पर पर्दा डालकर उन्हें "रॉबिनहुड" का जामा पहनाने में ना देरी करते हैं और ना ही कोई गुरेज़ ।

वक्त अभी भी पूरी तरह से हाथ से निकला नहीं है । समाज की उलझी डोर को सुलझाने का सिरा भले ही नहीं मिल पा रहा हो , मगर जहाँ से भी मुमकिन हो डोर को थाम लेने में ही सबकी भलाई है । निष्पक्ष रुप से देखें तो कांडा के साथ ही गीतिका के माता-पिता भी गीतिका की मौत के लिए बराबर के दोषी हैं । कानूनी तौर पर ना सही , सामाजिक रुप से वे इस खुदकुशी का ठीकरा कांडा पर अकेले कतई नहीं फ़ोड़ सकते । इसी तरह कांडा के साथ खड़े होने वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए ।

मीडिया को भी अपने तात्कालिक फ़ायदे के लिए समाज की बुनियाद को खोखला करने की प्रवृत्ति पर स्वप्रेरणा से आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया आज नहीं तो कल अपनाना ही होगी । वरना अनुराधा बाली, गीतिका , मधुमिता , भँवरी देवी जैसी महिलाएँ महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर यूँ ही आहुतियाँ देती रहेंगीं । नारी स्वातंत्र्य के नाम पर  उपभोग की वस्तु बन चुकी स्त्री को अपने अस्तित्व को पहचान कर समाज में योगदान देना चाहिए । बराबरी के हक की आड़ में पुरुषों के हाथ की कठपुतली बनने से कहीं बेहतर है अपने नैसर्गिक गुणों को पहचान कर परिवार में समग्र और रचनात्मक योगदान देना ।

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

ईमानदारी की दुहाई , पर ये है सच्चाई


 मध्य प्रदेश  को ’’शांति का टाप” कहा जाता है । बेशक कागज़ों पर यह बात लगातार सही साबित हो रही हो , मगर इस शांति के असली कारक सत्ता और विपक्ष की साँठ-गाँठ और मीडिया की मिलीभगत है । जून में बीजेपी से जुड़े दो कारोबारियों-दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के ठिकानों पर आयकर छापे में मिली अकूत दौलत की खबरें सामने आने के बाद एक बारगी जनता को भ्रष्टाचार से निजात मिलने के सपने पर ये यकीन हो चला था । लेकिन जल्दी ही काँग्रेस-भाजपा के गठबँधन ने इसे दिवास्वप्न में तब्दील कर दिया । सदन में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने के नाम पर नेता प्रतिपक्ष की लचर कार्रवाई और दो काँग्रेस विधायकों की विधानसभा से बर्खास्तगी के सुनियोजित ड्रामेबाज़ी ने एक गंभीर मामले को प्रहसन बना दिया । इस पूरे घटनाक्रम ने एक फ़िर साबित कर दिया है कि किस तरह सत्ता और विपक्ष पर्दे के पीछे एकजुट होकर जनता के हितों पर डाका डाल रहे हैं ।

इस मसले में काला धन वापस लाने की मुहिम में ज़ोरशोर से जुटे बाबा रामदेव  की नीयत पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है । विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बाबा रामदेव के साथ दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के फोटो जारी कर बाबा की सच्चाई को जगज़ाहिर कर दिया है । तस्वीरों में से एक में दिलीप सूर्यवंशी एक कार्यक्रम के दौरान बाबा के चरण छू रहे हैं। वहीं, दूसरी तस्वीर में बाबा के दायें-बायें छप्परफ़ाड़ तरीके से धनकुबेर बने सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा खड़े हैं  । सवाल है कि बाबा रामदेव भाजपाइयों के काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में मौन क्यों हैं?
  
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जब जापान, सिंगापुर और कोरिया की दस दिन के दौरे पर थे, तब आरएसएस नेता सुरेश सोनी के करीबी बीजेपी नेता सुधीर शर्मा और शिवराज के करीबी बिल्डर दिलीप सूर्यवंशी के 60 ठिकानों पर इनकम टैक्स ने छापे मारे और साढ़े छह करोड़ रुपये नकद, दस किलो सोना और सैकड़ों एकड़ जमीन के कागजात जब्त किए थे । सूर्यवंशी के घर से बड़ी तादाद में मंत्रियों की तबादले संबंधी नोटशीटस भीमिली थीं । इन सरकारी कागज़ात का मिलना साफ़ गवाही देता है कि सूर्यवंशी का सत्ता–साकेत में कितना और किस हद तक सीधा दखल था । सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि राखी सावंत से लेकर ओबामा और भोपाल की गली-कूँचों से लेकर वाशिंगटन तक के हर छोटे-बड़े मसले पर तत्काल बयान जारी करने वाले मुख्यमंत्री अपने रात-दिन के करीबी पर खामोशी अख्तियार किए बैठे हैं ।

उधर पूर्व प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता के.के. मिश्रा ने सीडी जारी कर दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के करीबी रिश्तों का खुलासा किया है  । सीडी में साल 2008 की एक वीडियो क्लिपिंग जिसमें सीएम का उदबोधन है और श्री सूर्यवंशी के संबंध में बात कही गई है  । इसमें मुख्यमंत्री चार साल पहले खुले मंच से दिलीप सूर्यवंशी और खनन माफिया सुधीर शर्मा से सीधे संबंध स्वीकारते दिखाई पड़ रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक कहा है कि मेरे बचपन के दौर के पालन पोषण में सूर्यवंशी परिवार का बड़ा योगदान रहा है।
सत्ताधीशों की करीबी पाकर लक्ष्मी की कृपादृष्टि पाने का खेल समझने के लिए इतना जानजा कीफ़ी है कि आठ साल पहले दिलीप सूर्यवंशी के पास  तेरह डंपर थे जिनकी संख्या बढ़कर १८२० हो गई है । इसी तरह सरस्वती शिशु मंदिर के शिक्षक  रहे सुधीर शर्मा पर कुबेर  की असीम अनुकंपा का नज़ारा कुछ  ऎसा  रहा कि “आचार्यजी” प्रदेश में सबसे ज़्यादा आयकर देने के बावजूद भी आयकर छापों के फ़ेर में उलझ गये । ज़ाहिर है इतनी अकूत संपदा इतनी छोटी सी अवधि में ईमानदारी और मेहनत से अर्जित कर पाना नामुमकिन है । साफ़ है कि लक्ष्मी और कुबेर से ज़्यादा इन पर सरकार के मुखिया और पार्टी के कुछ चुनिंदा नेताओं  की खास नज़रे इनायत रही ।
शुरुआती दौर में मध्य प्रदेश में इन कारोबारियों पर इनकम टैक्स छापों का मामला गंभीर होता नज़र आ रहा था । इस मुद्दे पर पोस्टर वॉर शुरू हो गया । एक बारगी तो ऎसा लगा मानो इस मुद्दे पर भाजपा को ना सिर्फ़ मुख्यमंत्री बदलना पड सकता है , बल्कि कर्नाटक के येदियुरप्पा के मामले से भी कई गुना ज़्यादा बड़े तमाम घोटालों पर किरकिरी झेलना पड़ सकती है । मगर भला हो काँग्रेस के नेताओं खास तौर पर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह , विधायक कल्पना परुलेकर और चौधरी राकेश सिंह का , जिन्होंने वक्त रहते सरकार के “साँच पर आँच” नहीं आने दी । हालांकि छापों के तुरंत बाद कांग्रेस ने भोपाल में पोस्टर लगाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ग्यारह सवाल पूछे थे। कांग्रेस का आरोप था कि जिन कारोबारियों के यहां छापे पड़े हैं, वे सब शिवराज सिंह के खास करीबी हैं और उनकी ही मेहरबानी से रातोंरात अरबपति बन गए हैं।

पोस्टरों में दावा किया गया था कि साढ़े छह साल पहले दिलीप सूर्यवंशी की कंपनी दिलीप बिल्डकॉन का टर्नओवर तेरह करोड़ रुपये था , आज जेट की रफ़्तार से एक हजार करोड़ रुपये तक जा पहुँचा है। उनकी कंपनी चार हजार करोड़ रुपये के ठेकों पर काम कर रही है। पोस्टर में सवाल पूछा गया कि क्या दिलीप सूर्यवंशी ने मुख्यमंत्री के अरेरा कॉलोनी के फ्लैट ई-3/163 की साज सज्जा पर बीते साल बीस लाख रुपये खर्च नहीं किए? मुख्यमंत्री के निजी सचिव का भाई दिलीप सूर्यवंशी के किस कारोबार में पार्टनर है? 
 
इन इन आरोपों के जवाब में मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष प्रभात झा का कहना था कि क्या बीजेपी के लोग व्यापार नहीं करेंगे? और व्यापार करेंगे तो क्या इनकम टैक्स वाले टैक्स नहीं मांगेगे। ये कोई अपराध नहीं है। मनुष्य की वृत्ति होती है टैक्स बचाना और इनकम टैक्स का काम होता है, ज्यादा इनकम होने पर टैक्स लेना और अपने अपने काम में सब लगे हैं।   



मीडिया मैनेजमेंट और निहित स्वार्थों के कारण विपक्ष के ढ़ीले पड़ते तेवरों से बेशक सूबे के मुखिया कुछ और वक्त तक अपना चेहरा चमकाए रख सकते हैं , लेकिन इस हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता कि सच्चाई को लम्बे वक्त तक दबाना या छिपाना किसी के बूते की बात नहीं है । गुज़रते वक्त के साथ सच्चाई खुद ब खुद बाहर आकर ही रहेगी । रसूख से लोगों का मुँह बंद किया जा सकता है । नोटों से समाज पर असर डालने वाले चंद लोगों को कुछ वक्त के लिये अपने पक्ष में खड़ा किया जा सकता है । इस सबके बावजूद वक्त की बदलती चाल दूध का दूध और पानी का पानी किए बिना नहीं रहती ।

शनिवार, 12 मई 2012

मध्यप्रदेश में शिव ”राज” नहीं, माफ़िया राज

नौ मई को मुरैना जिले के चिन्नौनी थाना क्षेत्र में चंबल नदी से अवैध रूप से रेत भरकर ले जा रही ट्रैक्टर –ट्रॉली रोकने पर पुलिस टीम पर कट्टे से फायर और पथराव ।


• मई में मुरैना जिले में खनिज माफ़िया द्वारा एक और पुलिस अधिकारी को ट्रेक्टर-ट्रॉली से
कुचलकर मारने की कोशिश ।


• मई की शुरुआत में राजधानी से लगे बड़ली गाँव में जंगल माफ़िया ने वन विभाग के अमले को घेर कर पीटा ; जंगल चोरों ने डिप्टी रेंजर सहित नौ वन कर्मियों को किया पीट-पीट कर अधमरा ।

• अप्रैल में देवास ज़िले की कन्नौद तहसील के कुसमनिया गाँव में महिला तहसीलदार को जेसीबी मशीन से रौंदने की खनन माफ़िया की कोशिश ।

घुन की तरह प्रदेश की नैसर्गिक संपदा को चट कर रहे खनन माफ़िया से टक्कर लेते हुए युवा आईपीएस नरेन्द्र कुमार ने होली के दिन शहादत दी । लेकिन सत्ता मद में चूर सरकार के रहनुमाओं ने युवा पुलिस अधिकारी की मौत को हादसा बताकर कुछ इस तरह की दलीलें पेश कीं, मानो सरकार को बदनाम करने की साज़िश रची जा रही हो ।प्रदेश सरकार की इस बेहयाई ने माफ़ियाओं के हौंसले इतने बुलंद कर दिये हैं कि अब जंगल, खनिज और रेत, ज़मीन,पानी, बिजली और शराब का गैरकानूनी धंधा करने वाले बेखौफ़ होकर सरकारी मुलाज़िमों को अपना निशाना बना रहे हैं । अवैध कारोबार पर नकेल कसने की कोशिश में सरकार के कारिंदे कहीं बँधक बनाये जा रहे हैं , कहीं सरेआम रौंदे जा रहे हैं या फ़िर बदमाशों के गोली, लाठी,डंडे खाने को मजबूर हैं । सत्ता का गुरुर अब मगरुरी में तब्दील होता जा रहा है । जो अधिकारी अपना ईमान और ज़मीर बेचने को राज़ी नहीं है, वो सत्ताधारी दल के लोगों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं । उन्हें झूठे आरोपों में फ़ँसाकर निलंबन या बार-बार तबादले की सज़ा दी जा रही है ।

यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि जब एक जाँबाज युवा पुलिस अधिकारी मुरैना में खनन माफियाओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने लहू की अंतिम बूँद भी धरती पर बहा रहा था... तब हमारे प्रदेश के मुखिया होली के रंगों में सराबोर हो रहे थे । जब उस युवा पुलिस अधिकारी की पत्नी अपनी कोख में साढ़े आठ माह के शिशु को लेकर अपने सुहाग को मुखाग्नि दे रही थी... फाग गाते, ढोल मँजीरे बजाते हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री की तस्वीरें अखबारों और चैनलों में छाई थीं ।

एक ऐसी हत्या, जिसकी चर्चा केवल प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश में हो रही हो, उस घटना पर सूबे के मुख्यमंत्री का बयान चौबीस घंटे बीत जाने के बाद आता है । अपनी पत्रकार वार्ता में भी वे इस बात पर ज्यादा खफा दिखाई पड़े कि बार बार माफियाओं का नाम लेकर प्रदेश को बदनाम किया जा रहा है । जब नरेन्द्र कुमार के पिता और आईएएस पत्नी इस हत्या के पीछे खदान माफियाओं का हाथ होने की बात बार-बार दोहरा रहे थे, तब मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई भी खदान माफिया न होने का दावा कर रहे थे

मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई खदान माफिया नहीं होने का जितना दावा करते हैं , राजनीतिक संरक्षण का भरोसा पाकर माफियाओं के हौंसले उतने ही बुलंद होते जा रहे हैं । सियासी आकाओं का प्रश्रय पाकर अब माफ़िया पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को अपना निशाना बना रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में 20 आईपीएस और आईएएस अधिकारियों सहित 65 पुलिस वालों पर हमले हुए हैं । ग्रामीण इलाकों में छोटे कर्मचारियों की पिटाई का आँकड़ा तो हज़ारों में है । हालत ये है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का मध्यप्रदेश से मोह भंग होने लगा है । हाल ही में नरेन्द्र कुमार की आईएएस पत्नी मधुरानी तेवतिया ने अपना भी कैडर बदलने का आवेदन दिया है ।

मुरैना जिले में खदान माफिया कलेक्टर आकाश त्रिपाठी और पुलिस अधीक्षक हरि सिंह पर भी फायरिंग कर चुके हैं । भिंड में भी शराब माफियाओं ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के साथ मारपीट की । खरगोन में एक आरक्षक की हत्या के साथ ही एएसआई पर जानलेवा हमला हुआ । सागर में अवैध खनन पकडऩे की कोशिश कर रहे टीआई पर माफिया ने गोलियाँ चलाईं और उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा । पन्ना में रेत माफिया ने नदी पर पुल बना डाला था, जिसे तोड़ने गए एसडीएम पर भी फायरिंग की गई । शहडोल में भाजपा नेता और पूर्व विधायक छोटेलाल सरावगी के बेटे ने कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह पर फायरिंग की थी, क्योंकि वह उनकी कोयले की चोरी रोकने की कोशिश कर रहे थे।

मध्यप्रदेश में सरकारी अमले पर हमलों की लगातार बढ़ रही वारदातें कहती हैं कि सूबे में हालात चिंताजनक है । तुर्रा ये कि यहाँ चोरी और सीनाज़ोरी में ना सत्ता पीछे है और ना ही संगठन । हाल ही में अपनी नाकाबिलियत के बावजूद प्रदेश संगठन की कमान सम्हालने के दो साल पूरे होने का जश्न सरकारी खर्च मनाने पर “आमादा“ प्रभात झा छाती ठोक कर दावा कर रहे थे कि प्रदेश में कोई माफ़िया नहीं है । मुख्यमंत्री भी मीडिया के “चोंगे“ पर आये दिन कुछ ऎसा ही आलापते सुनाई देते हैं । मगर शायद वे भूल गये कि सत्ता सम्हालते ही उन्होंने कहा था कि प्रदेश में सात किस्म के माफ़िया सक्रिय हैं । उन्होंने बाकायदा इन माफ़ियाओं के नाम भी गिनवाये थे । हाल की घटनाओं पर सरसरी नज़र डालते ही ’“रक्तबीज“ की तरह तेज़ी से फ़ैलते माफ़िया राज की हकीकत का खुलासा हो जाता है ।

वो शायद भूल गये कि वर्ष 2010 में शिवपुरी में दिए कथित बयान में उन्होंने भूमाफ़िया पर तोहमत जड़ी थी कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की साज़िश रची जा रही है । उनके इस बयान पर मचे बवाल के बाद विधानसभा में दंभ से भरे चौहान ने कहा था कि ”उन्हें हटाने का किसी माई के लाल में दम नहीं है और वे किसी से डरते नहीं हैं । न किसी में हिम्मत है कि उन्हें हटा सके । उन्होंने कहा, भूमाफियाओं पर कार्रवाई की बात मैं करता आया हूँ । भूमाफियाओं से मुझे कोई डर नहीं है । ” यह स्वीकारोक्ति सूबे में जड़े जमा चुके माफ़िया की मौजूदगी बताने के लिये काफ़ी है ।

श्री चौहान का दावा है कि प्रदेश में सब कुछ बढ़िया है । यहाँ कोई माफ़िया नहीं हैं । लेकिन हकीकत तो ये है कि उनके कार्यकाल में एक और किस्म का यानी मीडिया माफ़िया भी तेज़ी से पनपा है । करोड़ों के विज्ञापनों के ज़रिये छबि गढ़ने की कवायद ने इस ’अमरबेल” को खूब फ़लने-फ़ूलने का मौका दिया है । प्रदेश की पत्रकारिता मीडिया घरानों और चंद चापलूसों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है । ’’पत्रकारिता के बंध्याकरण” के कारखाने में तब्दील हो चुके जनसंपर्क विभाग के ज़रिये प्रदेश की खुशहाल तस्वीर पेश की जा रही है, जो हकीकत से कोसों दूर है । विज्ञापनों के बूते मीडिया घरानों का मुँह बंद कर और चंद तथाकथित बड़े पत्रकारों को ’एवज़ी’ देकर भले ही स्वर्णिम मध्यप्रदेश का ढ़ोल पीटा जा रहा हो, मगर सच्चाई तो यह है कि इस ढ़ोल में पोल ही पोल है ।

मुख्यमंत्री कहते हैं कि न तो प्रदेश में कोई खदान माफिया है और न ही सरकार माफियाओं के दबाव में है। लेकिन सरकारी आँकड़े ही उनके इस दावे की हवा निकालने के लिये काफ़ी हैं । प्रदेश के खनन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार राज्य के 27 जिलों में अवैध खनन के मामलों में 141.49 करोड़ रुपये का ज़ुर्माना लगाया गया । मगर 80.81 लाख रुपये की नाम मात्र की रकम वसूल कर मामले निबटा दिये गये । गौरतलब है कि वसूली गई राशि लगाये गये जुर्माने के 1 प्रतिशत से भी कम है । क्या इसके बाद भी किसी सबूत की जरूरत रह जाती है कि राज्य सरकार किसकी मुठ्ठी में है?

क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक है कि जिस मुरैना में दस महीनों में अवैध खनन का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ था , वहाँ नरेन्द्र कुमार के बानमौर के एसडीओपी बनने के चालीस दिन के भीतर 20 मामले दर्ज हुए । इन मामलों में 18 हज़ार 240 रुपये पैनल्टी लगाई गई ,लेकिन केवल 4 हज़ार 240 रुपये वसूल कर मामला रफा दफा कर दिया गया । पड़ोसी जिले भिंड में जहाँ नरेन्द्र कुमार की हत्या के दिन शराब माफियाओं ने एक दूसरे आईपीएस अधिकारी पर जानलेवा हमला किया था, वहाँ इसी साल 1.89 करोड़ रुपये की पैनल्टी अवैध खनन को लेकर की गई और आज तक वसूली नहीं हो सकी है । होशंगाबाद जिले में 4 करोड़ 52 लाख के ज़ुर्माने के एवज़ में 50 लाख 52 हजार रुपये की मामूली रकम वसूल कर मामलों खत्म कर दिया गया ।

खदान माफिया पूरे प्रदेश में फैले हुए हैं । अलीराजपुर जिले में तो खदान माफियाओं ने नकलीरसीदें छपवा रखी हैं । इन रसीदों के पकड़े जाने के बाद भी उन अपराधियों पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई है । रतलाम जिले की पिपलौदा तहसील के गांव चैरासी बड़ायला में तो एक फोरलेन सड़क बनाने वाली कंपनी ने पत्थर और मुरम की पूरी पहाड़ी खोद डाली , लेकिन रायल्टी के 3 करोड़ रुपये में से छदाम भी राज्य सरकार को नहीं दिया है । इसी दौरान नीमच जिले में खनिज अधिकारी वीके सांखला ने अवैध गिट्टी के 10 ट्रैक्टर पकड़ कर उन पर 47 लाख रुपये जुर्माना किया था । भाजपा नेता ने अपने रसूख के दम पर एक भी पैसा जुर्माना भरे बगैर ही इन ट्रैक्टरों को छुड़वा दिया । धार में नर्मदा नदी की रेत का अवैध खनन हो रहा है । इंदौर जिले में नेमावर और रंगवासा पहाडिय़ों को खनन माफिया ने लीज से कई गुना ज्यादा खोद डाला है ।

प्रदेश में न केवल खदान माफिया ही राज कर रहे हैं , बल्कि भाजपा नेता और राज्य सरकार के मंत्री भी या तो खुद खनन माफिया बने हुए हैं या फिर वे खनन माफियाओं को संरक्षण दे रहे हैं । बात सिर्फ मुरैना की नहीं है । मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर और उनके विधान सभा क्षेत्र भी रेत के अवैध खनन का अड्डा बना हुआ है । सवाल लाज़मी है कि मुख्यमंत्री के अपने जिले में ही प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट , क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव है? दमोह की खनिज अधिकारी दीपारानी ने मीडिया को बताया था कि किस तरह उन्हें कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया के दबाव में अवैध खनन में लगे वाहनों को छोडऩा पड़ा । लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह के खिलाफ अवैध खनन के मामले तो केन्द्र सरकार तक पहुँच चुके हैं ।

मुरैना में शहीद हुए नरेन्द्र कुमार के पिता भाजपा के राष्ट्रीय नेता और सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर को खदान माफिया बता रहे हैं । उधर खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ला सतना में किसानों को बेदखल कर हजारों एकड़ जमीन की लीज हथियाना चाहते हैं । एनडीए के संयोजक शरद यादव पहले ही पूरे विंध्य-महाकौशल में हर जिले में बैल्लारी होने की बात चुके हैं । लेकिन यदि मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि प्रदेश में खदान माफिया नहीं हैं, तो फिर कहना ही होगा कि प्रदेश में अब माफिया नहीं हैं , माफिया राज है ।

शनिवार, 12 नवंबर 2011

मध्यप्रदेश में मलेरिया का कहर और सियासत

मध्य प्रदेश की सेहत इन दिनों काफ़ी खराब है । सीधी, मंदसौर और नीमच ज़िले में मलेरिया से मौतों का आँकड़ा बढ़ने के साथ ही सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। मलेरिया से करीब पचास लोगों की मौत के कारण सीधी जिला इन दिनों राजनीति के केंद्र में है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने इस मुद्दे को लेकर सीधी कलेक्ट्रेट के बाहर धरना दिया। इसके बाद जाकर सरकार के कानों पर जूँ रेंगी। मगर आये दिन उड़न खटोले में सवार होकर देश भर की सैर करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चौंकाने वाली टिप्पणी ने सबको सन्न कर दिया। जिस वक्त वे सचिन के सौवें शतक का शुभकामना संदेश प्रसारित कर रहे थे, तब वे प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों से बेखबर थे। विपक्ष के हर आरोप को हवा में उड़ाने वाले शिवराज की नींद तब टूटी जब ये मामला अखबारों की सुर्खियों में आया। अधिकारियों की बैठक में वे खूब बिफ़रे कि उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं दी गई है। प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की फ़ेहरिस्त में नाम शामिल कराने की जोड़तोड़ में लगे मुख्यमंत्रीजी से लाख टके का सवाल ये है कि जब उन्हें अपने प्रदेश की समस्याओं की कोई जानकारी ही नहीं रहती है, तो उनके सूबे का मुखिया बने रहने का औचित्य ही क्या है ?


आदिवासी बहुल सीधी जिले के कुछ गाँवों में मलेरिया कहर बनकर टूटा है। जिले में मलेरिया से हुई मौतों का आँकड़ा लगातार बढ़ रहा है। अब तक पचास मौतें हो चुकी हैं। तीन गाँवों में 30 सितंबर से एक नवंबर तक 35 लोगों की मौत हुई। नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि पैंतीस मृतकों में सत्रह बेटियाँ भी हैं, जिनको बचाने के लिए सरकार अभियान छेड़े हुए है। इन मौतों ने बेटी बचाओ अभियान के साथ-साथ स्वास्थ्य इंतजामों की कलई खोलकर रख दी है। हालाँकि यह बात सामने आने के बाद प्रशासन पूरी तरह से मामले को दबाने में लगा रहा।

नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि जिला मुख्यालय से मात्र 18 किलोमीटर दूर बसे गाँवों में मचे मौत के ताँडव से पूरा प्रशासन बेखबर बना रहा । उन्होंने विकास खंड के लगभग आधा दर्जन गाँवों का दौरा किया, तब हकीकत सामने आयी। जनजाति बहुल गाँव पडरी, चौफाल और सतनरा के लगभग हर घर में कम से कम एक व्यक्ति मलेरिया पीड़ित है। चूंकि सीधी अजय सिंह का गृह जिला है, लिहाजा वे प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठे और राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। मुख्यमंत्री को फोन करने के बाद प्रशासन हरकत में आया। उनके मुताबिक 47 मौतें होने के बाद भी कलेक्टर वहाँ नहीं पहुँचे थे। कमिश्नर को प्रकरण की जानकारी भी नहीं थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सीधी को मलेरिया प्रभावित जिला मानते हुए विशेष किट दिए हैं, लेकिन सरकार इनका उपयोग नहीं कर रही है।

बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का हवाला देते हुए नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को घेरे में लिया है। गौरतलब है कि चार साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीधी जिला गोद लिया था। बताते हैं कि सीधी जिले में सरकार ने डॉक्टरों के लिए 130 पद स्वीकृत किए हैं। मगर इनमें से 93 पद कई सालों से खाली हैं। अजय सिंह का आरोप है कि सीधी से लगे हुए गाँवों में जब मलेरिया प्रकोप बनकर फैल रहा है तो दूरदराज के क्षेत्रों के हालात की कल्पना की जा सकती है। ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सेवाओं के हालात समझने के लिये इतना जानना काफ़ी है कि डॉक्टर अपनी ड्यूटी पर शायद ही कभी जाते हैं। उनका कहना है कि सिमरिया के ब्लॉक मेडिकल अधिकारी अस्पताल नहीं जाते हैं। इसी तरह ज़िले में पदस्थ प्रदेश सरकार में मंत्री जगन्नाथ सिंह के सुपुत्र डेढ़ साल से नौकरी पर नहीं गये हैं।

प्रदेश में मलेरिया से हो रही मौतों का सिलसिला नहीं थम रहा है। सीधी के बाद अब मंदसौर, नीमच (मालवा) में मलेरिया का संक्रमण फैल गया है। मालवा में मलेरिया बुखार से दो माह के भीतर 40 लोगों की जान गई है, जबकि मलेरिया से पीड़ित 50 लोगों का इलाज किया गया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार मंदसौर जिले के धावद, बगचाच, सावंत, नावली, बड़ौदिया, नावली, सावन कोठली और कोठरी टैंक गाँव में मलेरिया से संक्रमित हैं। जिले के प्रभारी सीएमएचओ के मुताबिक इन गाँवों में बीते दो माह में 21 लोगों की जानें गई हैं। शुरुआती जाँच में मौत की वजह मलेरिया है। वहीं नीमच जिले के ग्राम कोज्या, रूपपुरिया, परिछा, माना, मनोहरपुरा, प्रेमपुरा और कनोड़ में बीमारी की गंभीर स्थिति है। सीएमएचओ जिले में 19 लोगों की मौत मलेरिया से होने की पुष्टि कर रहे हैं।

प्रदेश की जनता ने जिस भरोसे से शिवराज सिंह को सत्ता की बागडोर सौंपी थी, वही आज उसके ज़ख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। हाल ही में उन्होंने गायत्री परिवार के हरिद्वार महाकुंभ हादसे में मारे गये लोगों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता का एलान किया। जबकि सीधी में मलेरिया से हुई मौतों पर मुख्यमंत्री ने महज़ दस-दस हज़ार रुपये की खैरात बाँटकर आखिर किस पर एहसान किया? सवाल है कि मीडिया से संवेदनशील और सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता का खिताब हासिल करने को बेताब मुखिया की मुट्ठी सूबे की जनता के लिये आखिर क्यों भिंच गई? सरकार फिजूल के अभियान और उत्सवों पर जनता के करोड़ों रुपये फूंक रही है मगर लोगों की बुनियादी जरूरतों की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं है। प्रदेश के स्थापना दिवस पर करोड़ों रुपये की आतिशबाज़ी फ़ूँकने या क्रिकेटरों और अन्य खिलाड़ियों को लाखों रुपये बतौर तोहफ़ा देकर खूब वाहवाही बटोरने वाले मुख्यमंत्री के हाथ आखिर प्रदेश की जनता से जुड़े मुद्दों पर ही खाली क्यों दिखाई देते हैं?

बहरहाल मलेरिया से हुई मौतों पर बवाल मचता देख मुख्यमंत्री आनन-फ़ानन में सीधी पहुँचे और कलेक्टर का तुरंत तबादला कर दिया। लेकिन सवाल फ़िर वही। क्या कलेक्टर का तबादला करने या कुछ छोटे कर्मचारियों को निलंबित करने मात्र से हालात सुधर जाएँगे? मालवा, चंबल और विंध्य क्षेत्र में मलेरिया से हो रही मौतों के लिये क्या छोटे मोटे प्रशासनिक फ़ेरबदल काफ़ी हैं? प्रदेश में क्या अदने कर्मचारियों की बलि लेकर स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य महकमे के आला अफ़सरों को ज़िम्मेदारी से बरी किया जा सकता है ? सरकार और नौकरशाहों का पूरा ध्यान महँगे उपकरण और दवा खरीदी, तो डॉक्टरों की दिलचस्पी ड्रग ट्रायल के मुनाफ़े और प्रायवेट अस्पतालों में मोटी फ़ीस पर सेवाएँ देने में ही सिमट कर रह गई है।

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने से बेखबर सूबे के मुखिया एक के बाद एक मुश्किलों में घिरते जा रहे हैं। विधानसभा सत्र के मुहाने पर विपक्ष के हाथ एक साथ कई मुद्दे लग गये हैं। डम्पर मामले को पुनर्विचार के लिये एक बार फ़िर हाईकोर्ट में ले जाकर याचिकाकर्ता रमेश साहू ने शिवराज की दिक्कतें बढ़ा दी हैं। उधर इस मामले में उन्हें क्लीन चिट देने वाले लोकायुक्त पी.पी.नावलेकर की नियुक्ति विवादों में है और अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है । उस पर जबलपुर ज़िले के सीहोरा तहसील के झीटी वन क्षेत्र की खदानों में लौह अयस्क के अवैध उत्खनन का मामला काँग्रेस ने भोपाल न्यायालय में पेश कर दिया है। इसमें मुख्यमंत्री,तीन मंत्रियों,एक सांसद सहित कुल सत्ताइस लोगों को नामजद किया गया है। काँग्रेस ने मामले की शिकायत लोकायुक्त में भी की है। साथ ही अब अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक जगदीश प्रसाद शर्मा ने सतना ज़िले के उचेहरा, नागौद आदि वन परिक्षेत्र में चल रहे उत्खनन की रिपोर्ट में भी खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अब तक विपक्ष को मृतप्राय मानकर मनमानी पर उतारु सरकार पर काँग्रेस चौतरफ़ा हमले कर रही है। कमोबेश पिछले आठ सालों से निर्बाध गति से दौड़ रहे अश्वमेधी रथ की वल्गाएँ यकबयक थामकर काँग्रेस ने सत्ता पक्ष में खलबली मचा दी है। विपक्ष से पहली बार मिल रही करारी चुनौती और अंदर ही अंदर बढ़ते जनाक्रोश से सत्ता पक्ष कैसे निपटता है आने वाले वक्त में सबकी निगाहें इसी पर लगी रहेंगी ।

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सरकारी खज़ाने पर भारी पडता मुख्यमंत्री का उत्सवधर्म

यूँ तो हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी हैं । मौसम का मिजाज़ बदले या फ़िर जीवन से जुड़ा कोई भी पहलू हो, हम पर्व मनाने का बहाना तलाश ही लेते है। साल में जितने दिन होते हैं उससे कहीं ज़्यादा पर्व और त्योहार हैं। अब तक लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर पर्व मनाये जाते रहे हैं। मगर उत्सव धर्मी मुख्यमंत्री के शौक के चलते अब प्रदेश में बारहों महीने सरकारी त्योहार मनाने की नई परंपरा चल पड़ी है। गणपति स्थापना के साथ शुरू हुए उत्सवी माहौल में नवरात्रि आने तक राज्य सरकार ने “बेटी बचाओ अभियान” का जो रंग भरा है,वो जल्दी ही फ़ीका पडता नही दीखता। राज्य में शासन की ओर से “बेटी बचाओ अभियान” नए सिरे से शुरू किया गया है। सरकारी खज़ाने से सौ करोड़ रुपये खर्च कर लिंगानुपात में आ रहे अंतर को पाटना और बालिकाओं को प्रोत्साहन देना मुहिम का खास मकसद बताया जा रहा है।

तूफ़ानी तरीके से चलाये जा रहे इस अभियान के मकसद पर कई बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अभियान ने मीडिया, विज्ञापन और प्रिंटिंग कारोबार में नई जान फ़ूँक दी है। मध्यप्रदेश में कुछेक ज़िलों को छोड़कर शायद ही कोई इलाका ऎसा हो जहाँ लिंगानुपात के हालात इतने चिंताजनक हों। दरअसल लिंग अनुपात में असंतुलन का मुख्य कारण विलुप्त हो रही भारतीय परंपराएँ और संस्कृति है। वाहनों पर चस्पा पोस्टर, बैनर और सड़क किनारे लगे होर्डिंग बेटियाँ बचाने में कारगर साबित होते, तो शायद देश को अब तक तमाम सामाजिक बुराइयों से निजात मिल जाती । जनसंपर्क विभाग की साइट पर अभी कुछ समय पहले एक प्रेस विज्ञप्ति पर नज़र पड़ी, जिसमें बताया गया है कि सरकार ने पानी बचाओ अभियान में गोष्ठी, परिचर्चा, कार्यशाला, सेमिनार और रैली जैसे आयोजनों के ज़रिये जनजागरुकता लाने पर महज़ तीन सालों में करीब नौ सौ तेरह करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिये। पानी के मामले में प्रदेश के हालात पर अब कुछ भी कहना-सुनना बेमानी है। वैसे भी देखने में आया है कि जिस भी मुद्दे पर सरकारी तंत्र का नज़रे-करम हुआ, उसकी नियति तो स्वयं विधाता भी नहीं बदल सकते। कहते हैं,जहँ-जहँ पैर पड़े संतन के,तहँ-तहँ बँटाढ़ार।

कुछ साल पहले बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी से मोहभंग की स्थिति में इस्तीफ़ा देते वक्त पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि बीजेपी को अब टेंट-तंबू वाले चला रहे हैं। मध्यप्रदेश में यह बात शब्दशः साबित हो रही है। सरकारी आयोजनों का लाभ जनता को कितना मिल पा रहा है, यह तो जगज़ाहिर है। मगर मुख्यमंत्री की उत्सवधर्मिता से कुछ चुनिंदा व्यवसायों से जुड़े लोगों की पौ-बारह है। राजनीतिक टोटकों और शिगूफ़ेबाज़ी से जनता को लम्बे समय तक भरमाये रखने का अगर कोई खिताब हो तो देश में बेशक शिवराजसिंह चौहान इसके एकमात्र और निर्विवाद दावेदार साबित होंगे।

उत्सवधर्मिता निभाने में सूबे के शाहखर्च मुखिया किसी से कमतर नहीं हैं। सत्ता सम्हालने के बाद से ही प्रदेश में जश्न का कोई ना कोई बहाना जुट ही जाता है। पहले महापंचायतों का दौर चला, इसके बाद इन्वेस्टर्स मीट के बहाने जश्न मनाये गये। यात्राओं और मंत्रियों को कॉर्पोरेट कल्चर से वाकिफ़ कराने के नाम पर भी जनता के पैसे में खूब आग लगाई गई। फ़िर बारी आई मुख्यमंत्री निवास में करवा चौथ, होली, दीवाली, रक्षाबंधन, ईद, रोज़ा इफ़्तार, क्रिसमस त्योहार मनाने की। जनता के खर्च पर धार्मिक आयोजनों के ज़रिये पुण्य लाभ अपने खाते में डालने का सिलसिला भी खूब चला। “आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश” जैसी शिगूफ़ेबाज़ी से भरपायी सरकार ने “स्वर्णिम मध्यप्रदेश“ का नारा ज़ोर शोर से बुलंद किया। पिछले दो सालों में प्रदेश स्वर्णिम बन सका या नहीं इसकी गवाही सड़कों के गड्ढ़ों, बिजली की किल्लत, बढ़ते अपराधों और किसानो की खुदकुशी के आँकड़ों से बेहतर भला कौन दे सकेगा ? मगर इतना तो तय है कि इस राजनीतिक स्टंट से नेताओं, ठेकेदारों, माफ़ियाओं, दलालों, उद्योगपतियों और मीडिया से जुड़े चंद लोगों की तिजोरियाँ सोने की सिल्लियों से ज़रुर “फ़ुल“ हो गईं हैं।

इसी तरह सत्ता पर येनकेन प्रकारेण पाँच साल काबिज़ रहने में कामयाब रहे शिवराजसिंह चौहान और जेब कटी जनता की। मुख्यमंत्री पद पर पाँच साल पूरे होने की खुशी में पिछले साल करीब चार करोड़ रुपये खर्च कर गौरव दिवस समारोह मनाया गया। संगठन के मुखिया प्रभात झा की कुर्सी प्राप्ति का सालाना जश्न भी मुख्यमंत्री निवास में धूमधाम से मना।

प्रदेश में एक के बाद एक आयोजनों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। मालूम होता है मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस समारोह की रंगीनियाँ जल्दी ही बेटी बचाओ अभियान को पीछे छोड़ देंगी। अब तक रावण वध से लेकर दीपावली की शुभकामना संदेशों तक हर मौके पर बेटी बचाने का संदेश प्रसारित करने में व्यस्त मुख्यमंत्री जी जल्दी ही मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के लिये जनता का आह्वान करते नज़र आयेंगे। उनके इस बर्ताव को देखकर बस इतना ही कहना मुनासिब होगा-आधी छोड़ पूरी को ध्यावै आधी मिले ना पूरी पावै।

बहरहाल खबर है कि भोपाल में होने वाले मुख्य समारोह में बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की नृत्य नाटिका और आशा भोंसले के नग़्मे जश्न में चार चाँद लायेंगे। वहीं लेज़र शो आयोजन का खास आकर्षण होगा। हर जश्न में लेज़र शो की प्रस्तुति का नया ट्रेंड भी शोध का विषय है। आजकल हर सरकारी समारोह में लेज़र शो और आतिशबाज़ी का भव्य प्रदर्शन सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर इन दोनों कारोबारों के साथ ही इवेंट मैनेजमेंट में किन बड़े भाजपा नेताओं का पैसा लगा है ? सवाल लाज़मी है कि कर्मचारियों को वेतन-भत्ते या जनता को करों में रियायत देकर महँगाई पर अँकुश लगाने के मुद्दे पर हाथ खींचने वाली राज्य सरकार आखिर इन जश्नों पर पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ?

फ़िज़ूलखर्ची का आलम ये है कि समारोह को भव्य बनाने के लिये चार लाख निमंत्रण पत्र छपवाए गये हैं,जबकि आयोजन स्थल लाल परेड ग्राउंड में एक लाख लोग भी बमुश्किल समा पायेंगे। माले मुफ़्त दिले बेरहम की तर्ज़ पर सरकार ने चार लाख कार्डों की छपाई पर चालीस लाख रुपये खर्च किये हैं । अमूमन सरकारी आयोजनों में लोगों की दिलचस्पी कम ही होती है। शाहखर्ची को जस्टिफ़ाय करने के लिये लोगों को घर-घर जाकर निहोरे खा-खा कर समारोह में आमंत्रित किया जा रहा है। बदहाल और फ़टेहाल प्रदेश की छप्पनवीं सालगिरह पर संस्कृति विभाग तीन करोड़ रुपए खर्च करने का इरादा रखता है। इनमें से दो करोड़ रुपये की होली भोपाल के मुख्य समारोह में जलाई जायेगी। संस्कृति विभाग में एक तृतीय श्रेणी की हैसियत रखने वाले व्यक्ति को तमाम नियम कायदों के विपरीत जाकर संचालक पद से नवाज़ा गया है।  अपनी अदभुत जुगाड़ क्षमता और संघ को साधने में महारत के चलते एक गैर आईएएस व्यक्ति एक साथ संस्कृति संचालक,वन्या प्रकाशन और स्वराज संस्थान प्रमुख जैसे अहम पदों पर काबिज़ है । सरकारी खज़ाने में सेंध लगाने के आये दिन नायाब नुस्खे ढ़ूँढ़ लाने में माहिर यह अफ़सर सरकार और संघ की आँखों का तारा बना हुआ है।

पूरे प्रदेश में वन, खनन, शिक्षा, ज़मीन की बँदरबाँट और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऎतिहासिक धरोहरों की लूटखसोट मची है। ऎसे हालात में चारों तरफ़ जश्न के माहौल को देखकर रोम में बाँसुरी बजाते नीरो को याद करने की बजाय मगध में घनानंद के राजकाज की यादें ताज़ा होना स्वाभाविक ही है । ऎसे घटाटोप में चाणक्य और चंन्द्रगुप्त के अवतरण का बस इंतज़ार ही किया जा सकता है ।

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

सता रहा है डम्पर घोटाले का जिन्न


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सितारे भले ही बुलंद हों, मगर बलात बोतल में बंद किया गया “डम्पर घोटाले” का जिन्न गाहेबगाहे बाहर आने को बेताब हुआ जाता है लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट के आधार पर इसी साल अगस्त में जिला अदालत ने शिवराज सिंह चौहान और उनकी पत्नी को चार साल की बेचैनी के बाद इस मामले में राहत दी है तिकड़मों और उठापटक के गुणा भाग पर लगता है जल्दी ही शनि-मंगल, राहु -केतु की आड़ी-टेढ़ी चाल असर दिखाने वाली है ग्रहों की “वक्र दृष्टि” से बचने के लिये किये गये तमाम उपाय फ़ौरी राहत देते ज़रुर मालूम होते हैं, मगर समय की चाल बदलते ही चार डम्परों की घरघराहट एक बार फ़िर चौहान दम्पति की रातों की नींद उड़ा सकती है लोकायुक्त से काला-पीला कराकर हासिल की गई खात्मा रिपोर्ट पर सवाल उठाने वालों को रोकने की नीयत से लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू को आरटीआई के दायरे से बाहर करने के सरकार के फ़ैसले पर हाईकोर्ट ने हाल ही में सामान्य प्रशासन और आयुक्त आरटीआई से चार हफ़्तों में जवाब तलब किया है वहीं देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ काम करने वाली संस्था भारत पुर्नोत्थान अभियान (आईआरआई) अब इस मामले का परीक्षण कर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ ज़ोरशोर से आवाज़ उठाती नज़र आने वाली प्रदेश सरकार ने २५ अगस्त को अधिसूचना जारी कर लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर कर दिया अब इन दोनों जाँच एजेंसियों के बारे में इस कानून के तहत जानकारियाँ नहीं माँगी जा सकेंगी सच्चाई का गला गुपचुप घोंटने के लिये राज्य सरकार ने वही वक्त चुना जब देश में अन्ना हज़ारे के आँदोलन की लहर थी और शिवराज सिंह इस मुहिम का खुलकर समर्थन कर रहे थे मगर कहते हैं ना, हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और”  फ़िर सरकारें भी किसी हाथी से कम थोड़े ही हैं एक ओर जहाँ पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाई जा रही है, ऎसे में मध्यप्रदेश सरकार का यह कदम भ्रष्टाचार के संरक्षण की पहल से इतर क्या माना जा सकता है ?

हाल ही में मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार मिटाने के लिये विशेष अदालतें गठित करने को लेकर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से भी मुलाकात कर चुके हैं विशेष न्यायालय विधेयक में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह व्यवस्था की गई है लोकायुक्त को नख-दँत विहीन करने में जुटी सरकार का दावा है कि इसके दायरे में पंचायत प्रतिनिधि से लेकर सीएम तक आएँगे इसमें आरोपियों की संपत्ति राजसात करने का भी प्रावधान है प्रदेश में पिछले दिनों लगभग साठ सरकारी मुलाज़िमों को रिश्वत लेते या जबरन उगाही करते पकड़ा गया और उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया गया। ये सभी पुलिस आरक्षक, पटवारी,कार्यालयों के बाबू और वनरक्षक जैसे छोटे कर्मचारी हैं ,  लेकिन बड़ी मछलियाँ और मगरमच्छ अभी भी भ्रष्टाचार के महासागर बेखौफ़ छपाके लगा रहे हैं छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई को उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार के लिये “पापमोचिनी गंगा” बनाकर स्वच्छ प्रशासन की छबि गढ़ी जा रही है

लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देने वाली सरकार ने तीन साल पहले भी तत्कालीन लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल की सिफारिश पर ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त को आरटीआई से बाहर कर दिया था लेकिन मप्र के मुख्य सूचना आयुक्त पद्मपाणि तिवारी ने कड़ी आपत्ति की इसके बाद राज्य सरकार को नियम में संशोधन वापस लेना पड़ा था विधि विभाग के प्रमुख सचिव रह चुके श्री तिवारी का तर्क था कि लोक सेवकों के भ्रष्टाचार पर निगाह रखने वाली जाँच एजेंसी को सूचना के अधिकार से बाहर कैसे रखा जा सकता है ? इन संस्थाओं की तुलना आईबी और रॉ से नहीं की जा सकती लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू  सरकारी स्तर पर होने वाली आर्थिक अनियमितताओं की जाँच एजेंसियाँ हैं, जबकि गुप्तचर एजेंसियों को सुरक्षा कारणों से आरटीआई से बाहर रखा गया है ताजा बदलाव पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब एक बार फिर विवाद गर्मा गया है

सच पूछा जाए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान डंपर घोटाले से बरी ज़रूर हो गए हैं, लेकिन अंदर से अब भी डरे हुए हैं यही कारण है कि उनकी सरकार ने लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो को सूचना के अधिकार से बाहर रखने का फैसला किया है संभवतः वे यह नहीं चाहते कि कोई आरटीआई एक्टिविस्ट यह जानने की कोशिश  करे कि भ्रष्टों को बरी करने का आधार क्या है ? अभी लोकायुक्त ने मुख्यमंत्री और एक मंत्री को क्लीन चिट दी है कल उन सभी दर्जन भर मंत्रियों को क्लीन चिट दी जा सकती है, जिनके विरुध्द जाँच विचाराधीन है

लोकायुक्त पी.पी. नावलेकर ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी साधना सिंह को दिसम्बर 2010 में बहुचर्चित डंपर खरीदी कांड में क्लीन चिट दे दी थी लोकायुक्त पुलिस ने अदालत में मामले को खत्म करने की सिफारिश की थी,जिसके आधार पर भोपाल की विशेष अदालत ने उनके हक में फ़ैसला सुनाया था। पूर्व लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल भी डंपर मामले की जाँच के दौरान विवादों में फ़ँसे थे उन पर भोपाल की सांसद-विधायकों की शानदार आवासीय कॉलोनी रिवेयरा टाउनशिप में मकान आवंटन कराने का मामला कोर्ट तक पहुँचा था

MP 17 HH 0179, MP 17 HH 0180, MP 17 HH 0181 और MP 17 HH 0208  ये वो चार रजिस्ट्रेशन नंबर हैं जो आरटीओ के दफ्तर में साधना सिंह वाइफ ऑफ एस आर सिंह, जेपीनगर प्लांट, रीवा के नाम से दर्ज हुए थे उमा भारती के साथ बीजेपी से बाहर गये प्रहलाद पटेल ने ये जानकारी परिवहन विभाग की साइट से निकाली थी अब प्रहलाद पटेल वापस बीजेपी में चुके हैं बवाल मचने पर 26 मई 2006 को खरीदे गए डंपरों का मालिकाना हक आनन फ़ानन में बदल गया चारों डंपर जेपी एसोसिएट को ही बेच दिये गये सवाल उठा कि लाखों की खरीद के लिये शिवराज की पत्नी के पास पैसा कहाँ से आया, मामला अदालत पहुंचा। विशेष अदालत के आदेश पर चार साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी पत्नी साधना सिंह, जेपी एसोसिएट के डायरेक्टर सन्नी गौर समेत पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ लोकायुक्त पुलिस ने जाँच मे पाया कि डंपरों की कीमत दो करोड़ की बजाय तकरीबन 74 लाख रुपये है और पाँचों आरोपियों के खिलाफ़ कोई अपराध नहीं बनता है

याचिकाकर्ता के मुताबिक लोकायुक्त ने असली मुद्दों की जाँच ही नहीं की इस मामले में सवाल कई हैं जिनके जवाब अब भी तलाशे जा रहे हैं मसलन साधना सिंह ने अपने पति का नाम एस आर सिंह क्यों लिखा \ जबकि मुख्यमंत्री का हर जगह शिवराज सिंह चौहान नाम चलता है फ़िर अपने गाँव जैत, भोपाल या फिर विदिशा की बजाय रीवा का आधा-अधूरा पता क्यों दिया गया \ अगर रोजी रोटी कमाने के लिये डंपर खरीदे भी थे तो बवाल मचने के बाद अचानक बेच क्यों दिये \

उधर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के लिये समर्थन जुटाने भोपाल आये भारत पुर्नोत्थान अभियान संस्था के तीन सदस्यों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह,  पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस कृष्णास्वामी, केरल के पूर्व डीजीपी उपेन्द्र वर्मा को एक कार्यक्रम में डंपर मामले की जानकारी देकर मदद माँगी गई संस्था के पदाधिकारियों ने संबंधित सारे दस्तावेज माँगे हैं उनका कहना है कि  इस मामले में उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के सबूत होने पर आगे की लड़ाई में मदद दी जाएगी आईआरआई मामले का परीक्षण कर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है संस्था का मानना है कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की तरफ चलता है और जब तक सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त रहेंगे तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है

इस बीच आईएएस राघव चन्द्रा के मामले में लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट के खिलाफ़ आये  सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने भी मुख्यमंत्री की नींद उड़ा दी होगी जस्टिस जीएस सिंघवी और एचएल बत्तू ने इस मामले में लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट को खारिज करते हुए केस रिओपन करने और चालान पेश करने के कटनी अदालत के आदेश को सही माना है। इस आदेश के बाद लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना चंद्रा के खिलाफ राज्य सरकार से अभियोजन स्वीकृति लेने की तैयारी कर रही है। कटनी के पूर्व कलेक्टर शहजाद खान और पूर्व कमिश्नर राघव चन्द्रा समेत पांच लोगों पर सुप्रीम कोर्ट ने भूमि घोटाले के आरोप में मामला दर्ज करने का आदेश दिया है वर्ष 2002 में कटनी के पूर्व कलेक्टर और पूर्व कमिश्नर के कार्यकाल में 10 लाख की जमीन अल्फर्ट कम्पनी द्वारा हाउसिंग बोर्ड को 7 करोड़ 20 में बेचने का मामला सामने आया था

 इसी तरह इंदौर के सुगनी देवी ज़मीन घोटाले में फ़रियादी सुरेश सेठ ने विशेष जज को लिखित में लोकायुक्त की निष्पक्षता से भरोसा उठने की बात कहकर सनसनी फ़ैला दी है लोकायुक्त पी पी नावलेकर के पुत्र संदीप नावलेकर की मुख्यमंत्री के नेतृत्व में चीन गए प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई यात्रा को लेकर काँग्रेस ने लोकायुक्त के खिलाफ कड़े तेवर अख्तियार करते हुए उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा तक माँग लिया इधर, सरकार ने सफाई दी है कि संदीप नावलेकर सीआईआई अध्यक्ष के तौर पर चीन गए थे और यात्रा का पूरा खर्च उनके द्वारा वहन किया गया प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने संदीप की चीन यात्रा को लेकर खड़े किए गए सवाल के बाद नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बयान जारी कर मुख्यमंत्री और लोकायुक्त के बीच साँठगाँठ का आरोप लगाया उन्होंने मुख्यमंत्री की चीन यात्रा को रहस्यमयी और संदेह के घेरे में करार देते हुए कहा कि लोकायुक्त अगस्त में डंपर कांड से मुख्यमंत्री को दोष मुक्त करते हैं और एक माह बाद ही उनके पुत्र मुख्यमंत्री के साथ सरकारी यात्रा पर चीन जाते हैं श्री सिंह ने कहा कि लोकायुक्त के पास सरकार के एक दर्जन मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की जाँच लंबित है, यह जाँच निष्पक्षता से होगी इसमें संदेह हैं

बहरहाल तमाम विरोधाभासों के बीच फ़िलहाल प्रदेश सरकार के मंसूबों की थाह पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ विशेष अदालतों के गठन के लिए विशेष न्यायालय विधेयक लाने को बेताब मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार क्या वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ तहेदिल से गंभीर है? अगर ऐसा ही है तो लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को आरटीआई की परिधि में रख कर उन्हें अधिकतम पारदर्शी बनाने से सरकार को आखिर परहेज क्यों है ?