गुरुवार, 22 सितंबर 2011

मुख्यमंत्री की चीन यात्रा सवालों के घेरे में

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लोकायुक्त के बेटे को लेकर चीन की सैर कर आये हैं । चीन यात्रा में लोकायुक्त पी.पी.नावलेकर के कारोबारी सुपुत्र की सहभागिता विवादों में घिर गई है। चीनी निवेशकों को मध्यप्रदेश में उद्योग लगाने के लिये आमंत्रित करने की गरज से डालियान,बीजिंग और शंघाई की नौ दिवसीय यात्रा पर गये प्रतिनिधि मंडल में संदीप नावलेकर की मौजूदगी ने एक साथ कई सवाल खड़े किये हैं। उनको मुख्यमंत्री के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल में चीन ले जाना कई शंकाओं को जन्म दे रहा है। भाइयों, बीवी और साले की मदद से भ्रष्टाचार की गंगोत्री में पुण्य स्नान करने वाले शिवराज अन्ना और रामदेव के आंदोलन का समर्थन कर खुद को पाक - साफ़ दिखाने की खूब कोशिश करते हैं, लेकिन हकीकत एकदम अलग है । नावलेकर के कारोबारी बेटे के सरकार से जुड़े हित लोकायुक्त की निष्पक्षता को जानने के लिये पर्याप्त है। 

"ठाकुर और गब्बर" की जोड़ी यानी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सपत्नीक चीन पहुँचकर वहाँ के उद्योगपतियों को मध्यप्रदेश आने का न्यौता दिया। ये अलग बात है कि इन्वेस्टर्स मीट के नाम पर अब तक करोड़ों रुपये फ़ूँकने के बावजूद प्रदेश सरकार देशी निवेशकों को ही रिझाने में नाकाम रही है। यानी "जितने की झाँझ नहीं,उससे ज़्यादा के तो मँजीरे फ़ोड़ डालने" की कहावत को चरितार्थ करते हुए शिवराज पूरे लाव-लश्कर के साथ चीन यात्रा पर गये। चीन यात्रा का लुत्फ़ उठाने वालों में आला अफ़सरान के साथ पार्टी और नेताओं के कई चहेते व्यापारी-व्यवसायी भी शामिल थे। 

गौर करने वाली बात यह है कि उनकी टोली में शामिल संदीप नावलेकर महज़ए एक व्यवसायी ही नहीं, बल्कि वे न्यायमूर्ति पी.पी. नावलेकर के पुत्र हैं, जो वर्तमान में प्रदेश के लोकायुक्त के रूप में एक उच्च संवैधानिक न्यायिक जाँच प्राधिकारी भी हैं। वे मुख्यमंत्री, मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ मिलने वाली षिकायतों की जाँच कर अपना महत्वपूर्ण फैसला देते हैं। ऎसे में लोकायुक्त के महत्वपूर्ण संवैधानिक पद की गरिमा को भी राज्य सरकार ने सवालों के घेरे में ला दिया है। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के लगभग दर्ज़न भर मंत्रियों और कई नौकरशाहों की जाँच लोकायुक्त में पेंडिंग है।

काँग्रेस भी इस मामले मैं सरकार पर हमलावर हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने सीधे मुख्यमंत्री को निशाने पर ले लिया है। भूरिया ने शिवराज सिंह से पूछा है कि वे संदीप को चीन की यात्रा पर क्यों ले गए थे जबकि उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के गैर सरकारी सदस्यों के लिए निर्धारित यात्रा शुल्क की रकम भी जमा नहीं की है, जो लाखों रुपये में होती है। उनका आरोप है कि लोकायुक्त के पुत्र संदीप नावलेकर के व्यावसायिक हित म.प्र. सरकार के साथ जुडे़ हुए हैं। प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष ने आगे कहा है कि संदीप नावलेकर डार्लिंग पम्प्स प्रायवेट लिमिटेड, इंदौर के प्रबंध संचालक हैं। यह कंपनी आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया और शहरी विकास मंत्री बाबूलाल गौर के विभागों को सीवेज पंप सप्लाई करती है। 

यहाँ ये बताना भी ज़रुरी है कि मध्य प्रदेश देश का ऐसा राज्य है, जहाँ लोकायुक्त को सर्वाधिक अधिकार हैं। संगठन ने इन अधिकारों का बेहतर इस्तेमाल किया हो, ऐसा अब तक नज़र नहीं आया है। लोकायुक्त पी.पी. नावलेकर ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी साधना सिंह को दिसम्बर २०१० में बहुचर्चित डंपर खरीदी कांड में क्लीन चिट दे दी थी। लोकायुक्त पुलिस ने अदालत में मामले को खत्म करने की सिफारिश की थीएजिसके आधार पर भोपाल की विशेष अदालत ने उनके हक में फ़ैसला सुनाया था। पूर्व लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल भी डंपर मामले की जाँच के दौरान विवादों में फ़ँसे थे। उन पर भोपाल की सांसद-विधायकों की शानदार आवासीय कॉलोनी रिवेयरा टाउनशिप में मकान आवंटन कराने का मामला कोर्ट तक पहुँचा था। इसी तरह उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीयए विधायक रमेश मेंदोला समेत तमाम बड़े नेता और मंत्री लोकायुक्त की सुस्ती का खूब फ़ायदा ले रहे हैं।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

क्या पहुँच पायेगी सीबीआई शहला मसूद के कातिलों तक

भोपाल का बहुचर्चित और सनसनीखेज़ शहला मसूद हत्याकांड भी अब नोयडा के आरुषि-हेमराज मामले की तर्ज़ पर आगे बढ़ रहा है। देश की सबसे काबिल जाँच एजेंसी सीबीआई ने शहला के कातिल का सुराग देने वाले को पाँच लाख का ईनाम देने की घोषणा के साथ ही इस मामले की नियति और परिणीति लगभग तय कर दी है । इससे पहले मध्यप्रदेश पुलिस ने कातिल तक पहुँचाने वाले को एक लाख रुपए देने का ऎलान किया था । तमाम भाजपा नेताओं के नाम सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ने आनन फ़ानन में जाँच सीबीआई को सौंपने की घोषणा तो कर दी,मगर कागज़ी खानापूर्ति नहीं होने के कारण पंद्रह दिनों तक  मामला अटका रहा । इस बीच स्थानीय पुलिस तफ़्तीश में जुटी रही । इस दौरान सबूत भी बखूबी खुर्द-बुर्द कर दिये गये और मामले का रुख भी बेहद चतुराई से दूसरी तरफ़ मोड़ दिया गया । सीबीआई अब तक इस मामले में करीब आधा दर्जन लोगों से पूछताछ कर चुकी है,पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है । पक्ष-विपक्ष की राजनीति को नज़दीक से समझने वाले आशंका जता चुके हैं कि इस मामले का हश्र भी रुसिया हत्याकांड  की तरह होना तय है । उस मामले में सुषमा स्वराज के करीबी विधायक जीतेन्द्र डागा का नाम उछलने के बाद सीबीआई जाँच कराई गई थी और जाँच में रुसिया की मौत को हादसा करार दिया गया था ।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद तरुण विजय और  वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से व्यक्तिगत जान पहचान रखने वाली शहला के भाजपा के साथ गहरे ताल्लुकात पर चर्चा का बाज़ार गर्म है । आरटीआई कार्यकर्ता शहला के भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से गहरे संबंधों ने पार्टी के सामने मुश्किलें खडी कर दी हैं । आज आलम यह है कि शहला मसूद  हत्याकांड भाजपा में अंदरूनी घमासान और एक-दूसरे को निबटाने का हथियार बन गया है । सबसे ज्यादा गंभीर बात यह है कि भोपाल से लेकर दिल्ली तक के कई भाजपा नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं । प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के कई नामचीन चेहरे शक के दायरे में हैं ।  प्रदेश की राजनीति में "चरित्र हनन" का ब्रह्मास्त्र चलाकर अपने प्रतिद्वंद्वियों को चित्त करने में माहिर खिलाड़ियों ने  तरूण विजय से शहला के अंतरंग संबंधों को लेकर मीडिया में कुछ इस तरह हवा बनाई कि अब असली कातिल तक पहुँचना सीबीआई के लिये आसान नहीं होगा ।

बहरहाल मामले में हर गुज़रते दिन के साथ नये-नये खुलासे हो रहे हैं । जानकार बता रहे हैं कि जाँच में कुछ ऐसी बातें सामने आ सकती हैं, जो प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दें । मामले की सीबीआई जाँच से शहला और प्रदेश की राजनीति से जुड़े कई अनछुए पहलू सामने आने की उम्मीद है। सूबे की राजनीति के साथ-साथ प्रशासन में हलचल मचाने वाले मामलों से भी पर्दा उठ सकता है । आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या के वक्त का चुनाव और उसका सबब पहेली बना हुआ है । इस हाईप्रोफाइल मामले की गुत्थी बेहद उलझी हुई है,जो कई दिग्गज नेताओं और अफसरों को लपेट सकती है। ।  विधायकों और सांसदों से लेकर चार आईएएस,दो आईपीएस अधिकारियों तथा एक जाने माने बिल्डर पर शक की सुई घूम रही है ।

१६ अगस्त की सुबह शहला मसूद की भोपाल में उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई थी । वह अपनी कार में ही मृत पाई गईं। शहला मसूद भोपाल की वह शख्सियत थी,जिसने सूचना के अधिकार का उपयोग करते हुए कई मंत्रियों तथा अधिकारियों को सीधे-सीधे घेरा । वे कई नेताओं की करीबी रहीं,तो कई नेताओं की किरकिरी भी बनी रहीं । शहला ने आरटीआई में आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के भ्रष्टाचार की जानकारी हासिल की थी । उन्होंने चार आईएएस अफसरों सहित शहर के एक बड़े बिल्डर द्वारा विभिन्न विभागों में किए जा रहे निर्माण कार्यों की जानकारी सूचना के अधिकार के अंतर्गत संबंधित विभागों से माँगी थी । इन तमाम जानकारियों में नेताओं और अफ़सरशाही की मिलीभगत उजागर हो सकती थी । वे इंडिया अगेंस्ट करप्शन की प्रदेश संयोजक भी थीं। ऎसा कहा जाता है कि हत्या वाले दिन यानी १६ अगस्त को ही बोट क्लब पर मध्य प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान शुरू कर भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों के नामों का खुलासा करने वाली थीं । सौ मीटर लम्बे बैनर पर हस्ताक्षर के ज़रिये यह जानने की कोशिश होने वाली थी कि प्रदेश का सबसे भ्रष्ट महकमा और अधिकारी कौन है? शहला अन्ना के आंदोलन की तर्ज पर एम.पी.अगेंस्ट करप्शन अभियान शुरू करने वाली थी। वो नेताओं और अफसरों के काले कारनामों को उजागर करतीं, उससे पहले उन्हें  दुनिया से रुखसत कर दिया गया।

इस सनसनीखेज़ हत्‍याकांड से मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के दफ्तर का नाम जुड़ने की चर्चा भी अब आम है । सीबीआई के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक एक अगस्त को शहला ने सीवीसी से मुख्यमंत्री औऱ प्रदेश सरकार की शिकायत की थी। बताया जा रहा है कि शहला ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि उन्‍हें मुख्‍यमंत्री के स्‍टाफ की ओर से धमकी मिली थी। हालाँकि जब एक न्यूज़ चैनल ने इस बारे में शिवराजसिंह से पूछा तो उन्‍होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।

शुरुआत में इस हत्या को आत्महत्या में बदलने की कोशिश भी की गई । शहला की कॉल डिटेल में दिल्ली के एक भाजपा नेता से लंबी बातचीत का रिकार्ड मिलने के बाद घबराई पुलिस मामले को खुदकुशी बताने की थ्योरी पर काम करने लगी थी । लेकिन शहला के परिजनों और नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह की ओर से सीबीआई जाँच की माँग सामने आते ही इसे तत्काल सीबीआई को सौंप दिया गया । केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी हत्यारों का जल्द पता लगाने के बारे में मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था । वहीं शहला के पिता मसूद सुल्तान के मुताबिक उनकी बेटी को जान का खतरा था,जिसे लेकर आईजी को पत्र भी लिखा था । उन्होंने आईजी पवन श्रीवास्तव,हीरा खनन कंपनी रियो-टिंटो के अफसर,बीजेपी नेता सहित कुछ अन्य लोगों पर भी हत्या का संदेह जताया है ।

सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद की हत्या के मामले में जाँच का एक बिंदु यह भी है कि सूचना के अधिकार के तहत जानकारी हासिल करने के दौरान ऐसे कितने और कौन-कौन लोग थे,जो शहला मसूद के दुश्मन बन गए? क्या दुश्मनी इस हद तक जा पहुँची थी कि कोई उनकी जान तक ले ले ? शहला की हत्या के बाद सामने आईं जानकारियों से पता चला है कि उन्होंने करीब एक हजार आवेदन विभिन्न महकमों में गड़बड़ियों से जुड़ी जानकारियाँ जुटाने में लगा रखे थे। इनमें बाघों के शिकार,वनों की अवैध कटाई और पुलिस की करतूतों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ चाही गई थीं ।

कहा जाता है कि शहला को छतरपुर जिले के सघन वनों में गैरकानूनी रूप से हीरे के खनन की जानकारी भी थी । यह जगह पन्ना टाइगर रिजर्व के पास बताई जाती है । शहला ने  पन्ना जिले में रियो-टिंटो कंपनी से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार के तहत हासिल की थी । १२ लाख रुपए खर्च कर अपनी लक्जरी कार में बार बनाने वाले रंगीनमिजाज़ मंत्री को उन्होंने जमकर घेरा था । सात सौ करोड़ के एक कथित घोटाले की तहकीकात में भी वे लगी हुई थी । बाँधवगढ़ में पिछले दिनों हुई एक बाघिन की हत्या में एक मंत्री तथा उनके भतीजे के खिलाफ वे मुहिम चला रही थी । खबर तो ये भी है कि शहला ने  शराब और शिकार के शौकीन प्रदेश के मंत्रियों के बेटों की हरकतों की एक सीडी तैयार कर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को दी थी । इस सीडी में बाँधवगढ़ में एक बाघिन की रहस्यमय ढंग से हुई मौत के राज़ हैं । इस मामले की एसटीएफ द्वारा जाँच की जा रही है । इसके लपेटे में दो वरिष्ठ आईएएस अफसर भी आ सकते हैं ।

शहला की जिंदगी से जुड़े सभी पहलुओं की बारीकी से पड़ताल भी कातिल तक  पहुँचाने में मददगार बन सकती है । जाँच तो इस बात की भी होना चाहिए कि कैसे मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की इवेंट मैनेजमेंट करते-करते भाजपा के नेताओं के करीब जा पहुँची ? लालकृष्ण आडवाणी,सुषमा स्वराज,नितिन गडकरी सरीखे नेताओं के साथ शहला के फ़ोटोग्राफ़ भाजपा में उसकी पैठ की गवाही देने के लिये काफ़ी हैं । ऎसे में ये सवाल बेहद मौजूँ हो जाता है कि महज़ दो-तीन सालों में एक आरटीआई कार्यकर्ता की सियासी गलियारों में सरगर्मियाँ कब,कैसे और क्यों बढ़ीं ? ये जाँच का विषय है कि उसे पार्टी के कद्दावर नेताओं से सबसे पहले किसने रूबरू कराया और वह किन नेताओं की खास रही, बाद में उसकी किन से और किन कारणों से अनबन हुई ?

दिल्ली से मास कम्युनिकेशन का डिप्लोमा करने के बाद भोपाल के सिटी केबल में बतौर एंकर काम कर चुकी शहला मसूद को पत्रकारिता ज्यादा रास नहीं आई और उसने "मिरेकल्स" नाम की कंपनी बनाकर इंवेंट मैनेजमेंट के क्षेत्र में कदम रखा । कुछ ही सालों में शहला को अपने संपर्को के बूते पर्यटन विकास निगम,संस्कृति विभाग जैसे सरकारी महकमों में लाखों के काम मिलने लगे । इस तथ्य को इसी से समझा जा सकता है कि शहला की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी और आरएसएस समर्थित ''श्यामा प्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट '' मिलकर दिल्ली,भोपाल,कश्मीर,कोलकाता में कई कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं । इस वज़ह से शहला का उठना-बैठना ओहदेदार और रसूखदार लोगों के साथ था । विधायक ध्रुव नारायण सिंह की एनजीओ "उदय" तो अब शहला ही चला रही थीं । जब ध्रुव नारायण पर्यटन निगम अध्यक्ष थे,तब शहला की कंपनी को कई काम मिले थे । हालाँकि भोपाल के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का टिकट नहीं मिलने के बाद से उसके मन में ध्रुव नारायण के प्रति खटास पैदा हो गई थी । आलम ये था कि  पर्यटन विकास निगम, जिसमें वे इवेंट मैनेज करने में लगी थी, वहीं कई शिकायतें उन्होंने कर रखी थी । ईको टूरिज्म पर हो रहे विकास कार्यो को लेकर उन्होंने सीधे वहां के एमडी को कठघरे में लिया था । ऐसी और भी शिकायतें थी,जिनको सूचना के अधिकार में लिया गया, लेकिन इसके बाद उनका क्या हुआ आज तक पता नहीं चला । 

सवाल ये उठ रहे हैं कि शहला मसूद की मौत की वजह कहीं उसकी भाजपा सांसद तरुण विजय से बढ़ती नजदीकी तो नहीं बनी? राजनीतिक हसरतें ही तो उसकी मौत का सबब नहीं बन गईं? कहते हैं,पार्षद का टिकट पाने में नाकाम शहला मसूद को अपनी राजनीतिक हसरतों को मंजिल तब दिखना शुरू हुई, जब वह तरुण विजय के संपर्क में आईं । दो साल में दोनों के बीच नजदीकी इतनी बढ़ी कि पिछले साल ईद पर मुबारकबाद देने के लिये तरुण शहला के घर पहुँचे । तरुण और शहला के बीच हत्याकांड के ठीक एक दिन पहले दो बार लंबी बातचीत हुई । पहले शहला ने फोन करके ४५ मिनट बात की तो बाद में तरुण विजय ने फोन लगाया और २७ मिनट बात की । हत्याकांड वाले दिन भी सुबह दोनों के बीच फोन पर बात हुई थी । करीबी दोस्त की हत्या के पन्द्रह दिन तक उनकी चुप्पी ने भी कई सवाल खड़े किये हैं । लेकिन ये तमाम तथ्य तरुण विजय को कठघरे में खड़ा करने के लिये पर्याप्त नहीं कहे जा सकते । ऎसा लगता है कि तरुण विजय और शहला के व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों के खुलासों को हवा देकर प्रदेश के कई घाघ नेताओं ने तोप का मुँह दिल्ली के नेताओं की ओर मोड़ कर हिसाब-किताब बराबर किया है । इसे "जाँच की आँच" से दामन बचाने की कोशिश के तौर भी देखा जा सकता है ।

तरुण विजय और शहला मसूद के बीच 'आर्थिक लेनदेन' को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं । मध्‍य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष २०१० में विजय के श्यामाप्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट को २५ लाख रुपए की आर्थिक मदद दी थी । राज्‍यसभा सदस्‍य और आरएसएस के मुखपत्र 'पांचजन्‍य' के पूर्व संपादक तरुण विजय इस एनजीओ के प्रमुख हैं। कहा जा रहा है कि विजय ने ही  शहला को इस एनजीओ से जोड़ा था। जानकारी के अनुसार हाल में ही शहला ने करीब ८० लाख रुपए की जमीन का सौदा किया था । उस सौदे में कई पेंच थे । मामले में दिलचस्पी रखने वाले अपने तईं तफ़्तीश में जुटे हैं कि जमीन खरीदने में शहला के साथ और कौन-कौन लोग शामिल थे? जमीन खरीदने के लिए रुपए कहाँ से और कैसे जुटाए थे? इस मामले में शहला के किन लोगों से मतभेद थे? ये तमाम बातें भी अब जाँच का हिस्सा बनेंगी ।

दरअसल अपने राजनीतिक संपर्को के बूते शहला की भाजपा में जाने की तैयारी हो गई थी । भोपाल के विधायक ध्रुवनारायण सिंह तथा राज्यसभा सदस्य तरुण विजय इसके प्रयास में थे । विजय ने शहला की भाजपा में एंट्री पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में बतौर चेयरमैन कराने की कवायद भी की थी, लेकिन अंडरवर्ल्ड और आईएसआई से तार जुड़े होने का पेंच फ़ँसाकर उस मुहिम की हवा निकाल दी गई । अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोड़ने की कवायद में जुटी भाजपा के पास दमखम वाले मुसलमान नेताओं का टोटा है । विजय विधानसभा चुनावों में शहला की  माडरेट मुस्लिम नेता की छवि को भुनाकर मुसलमानों को बीजेपी से जोड़ने की कोशिश में थे । तरुण विजय के जरिए शहला भाजपा और आरएसएस के शीर्षस्थ नेताओं के संपर्क में आई थी । सूत्रों के मुताबिक शहला राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच का तानाबाना खड़ा करने में मददगार बनी थी । यह मंच जम्मू-कश्मीर सहित पूरे उत्तर भारत में काम करता है। इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में भाजपा का जनाधार बढ़ाना और राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार करना है।

पुलिस जाँच में एक दिशा यह भी थी कि कहीं इसके पीछे कोई कट्टरपंथी कनेक्शन तो नहीं है ।  बिंदास जीवन शैली और  उदारवादी छबि के चलते शहला के संपर्कों का दायरा बहुत व्यापक था। उसके कई ऐसे लोगों से भी संपर्क थे जो कट्टरपंथी माने जाते हैं । यदि सूत्र इस दिशा में बढ़े तो यह मामला चौंकाने वाले राज से पर्दा हटा सकता है । इस संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता कि कहीं डबल क्रॉस तो शहला की मौत का कारण नहीं बना ? इन तारों को जोड़ने की भी कोशिश चल रही थी  कि पिछले दो ढाई साल में शहला के तरुण विजय जैसे नेताओं से नजदीकी संबंध और इसी दौरान प्रदेश में सिमी के नेटवर्क के कई लोग पुलिस की पकड़ में आने के बीच कोई संबंध तो नहीं है । इन हल्कों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक शहला की हत्या के सूत्र पिछले दिनों पूरे प्रदेश में पुलिस द्वारा सिमी के नेटवर्क को ध्वस्त करने की कोशिशों से जुड़ते नजर आ रहे हैं ।

दरअसल शहला की हत्या ने पुलिस से ज्यादा संघ और भाजपा से जुड़े लोगों को चौंकाया है। तमाम तथ्यों के सामने आने के बाद यह सवाल और भी पेचीदा हो जाता है कि आखिर शहला की हत्या क्यों हुई ? इसे पूरी तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वाले सिपाही की कुर्बानी मान लेना उन आरटीआई कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी, जो हर जोखिम उठाकर हर कीमत पर सच की मशाल को थामे रहते हैं । कनबतियों पर यकीन करें तो हज़ारों आरटीआई के ज़रिये हासिल की गई जानकारियाँ दुधारु गाय में तब्दील करने का हुनर हासिल करने के बाद शहला सियासी और सरकारी अमले के लिये सिरदर्द बन चुकी थी। कह पाना बड़ा मुश्किल है कि आरटीआई कार्यकर्ता होने की हैसियत ने उनके इवेंट मैनेजमेंट के कारोबार को आगे बढ़ाया या गड़बड़ियों के खुलासे की आड़ में मिल बाँटकर हिसाब कर लेने के हुनर ने। प्रदेश में चरित्र हनन की राजनीति के मँझे हुए खिलाड़ियों ने बड़ी ही सफ़ाई से जाँच का रुख दिल्ली की ओर मोड़ दिया है। जाँच रिपोर्ट सामने आने तक इस सनसनीखेज़ हत्याकांड पर लोग अपनी तरह से कयास लगाते रहेंगे आखिर क्यों गई शहला की जान ...? आरएसएस से जुड़ाव,बाघों के मौत के विरुद्ध आवाज़ उठाना,आपसी रंजिश या राजनीतिक महत्वाकांक्षा......मौत की वजह कोई भी हो सकती है।

सोमवार, 20 जून 2011

कलम के सिपाही गोली के शिकार

पत्रकारिता हमेशा से जोखिम भरा काम रहा है, लेकिन इस खतरे में वैश्विक तौर पर लगातार इजाफा हो रहा है। जनहित और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले इन खतरों से बखूबी वाकिफ़ हैं। पूँजीवाद के दौर में कलम के सिपाहियों को माफ़ियाओं के साथ ही सत्ता के नशे में चूर राजनीतिज्ञों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है । आज खबर लेना और खबर देना दोनों खतरे में हैं। पत्रकारों पर बढ़ रहे ऐसे हमलों से प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती जा रही है। इस समय पत्रकारों को सरकार और गैर कानूनी काम करने वालों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। मुंबई में अँग्रेजी अखबार "मिड डे" के क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या और बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली के कपिल शर्मा का मामला ताजातरीन मिसाल है।

अभी पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शाहजाद की हत्या का पखवाड़ा भी नहीं बीता था कि मुम्बई में क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या कर दी गई। शहजाद जिस तरह आईएसआई और कट्टरपंथी तबकों की बखिया उधेड़ रहे थे। उसी तरह ज्योतिर्मय डे भी मुंबई की माफिया जमात पर अपनी खोजी रिपोर्टिंग से लगातार खतरे खड़े कर रहे थे। अपने साथियों के बीच "जेडे" के नाम से मशहूर क्राइम रिपोर्टर,बीते कुछ महीनों से डीजल माफिया के खिलाफ धारावाहिक खोज रिपोर्टों के जरिए अभियान चला रहे थे।मुम्बई में अंडरवर्ल्ड पर कई रिपोर्ट लिखने वाले जेडे की मोटरसाइकिल सवार चार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पहले बीते साल 20 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह घर लौट रहे थे। इस साल 23 जनवरी को नईदुनिया के पत्रकार उमेश राजपूत की मोटरसाइकिल सवार नकाबपोशों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

दूसरी तरफ़ हकीकत सामने लाने का साहस दिखाने वाले नामानिगारों को सबक सिखाने के लिये सरकारों के पास तमाम हथकंडे हैं। 11 और 12 जून 2011 की दरम्यिनी रात बिजनेस स्टैंडर्ड के पत्रकार कपिल शर्मा को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेकर प्रताड़ित करने का मामला भी सामने आया। इसी तरह 26/11 हमले में जब्त हथियार खुले में रखे होने के मामले को सामने लाने वाले मुम्बई के पत्रकार ताराकांत द्विवेदी को सरकारी गोपनीयता कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया । अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता उल्लंघन के मामलों पर निगरानी रखने वाले 'द फ्री स्पीच ट्रैकर' के अनुसार,देश में पत्रकारों पर हमले की वारदात तेज़ी से बढ़ रही हैं। सम्पादकों और लेखकों को लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। संगठन ने पत्रकारों पर हुए 14 हमलों का हवाला देते हुए कहा है कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में है ।

माफिया से टकराने की कीमत जेडे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनकी हत्या पेट्रोलियम माफिया ने की या किसी अंडरवर्ल्ड गिरोह ने या फिर उसके पीछे किसी नौकरशाह अथवा नेता का हाथ है। इस पर फ़िलहाल कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन मामले की जाँच में सामने आये तथ्य जेडे के खुलासों से माफिया जगत में मची खलबली की पुष्टि करते हैं। उन्हें मिल रही धमकियाँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। डीजल माफिया की शासन-प्रशासन से साँठ-गाँठ अब जगज़ाहिर है। कुछ लोग तो सप्रमाण कहते हैं कि छुटभैये नेता डीजल माफिया के पेरोल पर होते हैं । अपने कारोबार में आड़े आने वाले सरकारी मुलाज़िमों को रास्ते से हटाने में भी इन्हें कोई गुरेज़ नहीं होता।

जेडे तीसरे भारतीय पत्रकार थे, जिनकी पिछले छह माह में हत्या की गई। इन सभी मामलों में जाँच जारी है, लेकिन कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं आये हैं। पत्रकारों की हत्या के मामले तो सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन गुत्थियाँ अनसुलझी ही रह जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्था की ओर से बनाए गए ‘माफी सूचकांक 2011’ के अनुसार पत्रकारों की हत्या की गुत्थी न सुलझा सकने वाले देशों में भारत 13वें स्थान पर है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 10वें और बांगलादेश 11वें स्थान पर है। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (सीपीजे) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सात अनसुलझे मामलों के साथ 13वें स्थान पर है। एक साल में पूरी दुनिया में होने वाले कार्य संबंधी हत्याओं में 70 प्रतिशत मामले पत्रकारों के हैं। सूचकांक में पत्रकारों की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों का प्रतिशत जनसंख्या के अनुपात में निकाला गया है। यहाँ ऐसे मामलों को अनसुलझा माना गया है, जिसमें अभी तक कोई आरोपी पकड़ा नहीं गया है। फ़ेहरिस्त में इराक पहले स्थान पर है। वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों और खतरनाक अभियानों के दौरान बहुत ज्यादा संख्या में पत्रकारों की हत्या हुई है। इराक में 92 मामले अभी तक अनसुलझे हैं,जबकि फिलीपींस में इनकी संख्या 56 है। इसके बाद श्रीलंका और कोलंबिया का स्थान आता है।

दरअसल,विश्व भर में पत्रकारों की हत्याओं का सिलसिला किसी भी साल थमा नहीं है। भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अभिव्यक्ति के सिद्धांत पर अमल करते हुए पूरी दुनिया में हर साल सैकड़ों पत्रकार जान देते हैं।जेडे और शाहजाद इस मुहिम में अकेले नहीं रहे। संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक,वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2009 तक दुनिया में सच को आवाज़ देने की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए 247 पत्रकार कुर्बान हो गये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुहिम को कलम के माध्यम से आगे बढ़ाते हुए इस दौरान भारत में छह पत्रकार बलिदान हुए। यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन वर्षों में पत्रकारों की हत्या के मामलों से स्पष्ट है कि मीडिया से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं ।

ऐसा नहीं कि सिर्फ यूनेस्को ही ऐसी रिपोर्ट पेश कर रहा है। "विदाउट बॉर्डर्स" की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2010 में काम के दौरान 57 पत्रकार मारे गए। यह संख्या 2009 के 77 पत्रकारों की तुलना में कम है लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह है कि 2010 में 51 पत्रकारों को बंधक बनाया गया जो पिछले दो सालों की संख्या से कहीं ज्यादा है। "विदाउट बॉर्डर्स" के महासचिव जाँ फ्रांसोआ जूलियर्ड ने कहा भी कि पत्रकारों का बढ़ता अपहरण साबित करता है कि उनकी निष्पक्षता और काम का आदर अब नहीं किया जाता। उन्हें भी सत्ता का एक अंग समझा जाता है और अकसर उनका अपहरण सत्ता से कोई माँग पूरी करने के एवज में किया जाता है। पत्रकारों की हत्याओं ने इस सच्चाई से हमें रूबरू करा दिया है कि आर्थिक तरक्की और देश में एक लोकतांत्रिक सरकार के होते हुए भी पत्रकारों के लिए सुरक्षित जगह सिकुड़ती जा रही है। विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में भले ही अफगानिस्तान और नाइजीरिया को पत्रकारों के लिए सबसे असुरक्षित माना गया हो लेकिन भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं। फरवरी 2010 में जारी इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ने तो पत्रकारों के लिए दुनिया में सबसे खतरनाक जगह के रूप में भारत का स्थान मेक्सिको और फिलीपींस के साथ तीसरे नंबर पर रखा है।

जेडे हत्याकांड ने समाज में चलने वाली साजिशों,भ्रष्टाचार और गैरकानूनी धंधों को उजागर करने वाले पत्रकारों के लिए बढ़ते खतरे को एक बार फिर उजागर किया है। ये घटनाएँ यह बताती हैं कि किसी भी ताकतवर संस्था, व्यक्ति या गिरोह के कारनामों को जनता के सामने लाना कितना जोखिम भरा होता जा रहा है। सरकार एक तरफ "व्हिसल ब्लोअर बिल" लाकर गड़बड़ियों को सामने लाने वाले लोगों को संरक्षण देने की बात कर रही है और दूसरी तरफ पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे पत्रकारों को संरक्षण देने में नाकाम रही है। हत्यारों का मनोबल इसलिए बढ़ता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं। अगर इनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो पत्रकार ऐसे भ्रष्ट तत्वों का ‘आसान निशाना’ बने रहेंगे। सत्ता पक्ष मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहता है, इसलिए वह हमें भ्रष्ट भी कर रहा है।

चैनलों और समाचारपत्रों में ठेके की नौकरियों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। मीडिया हाउसों में श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, पर सरकार खामोशी से तमाशा देख रही है। दरअसल सरकारी तंत्र अपने काले कारनामों को छिपाने के लिये पत्रकारों को खरीदने या डराने का उपक्रम करता रहता है । सरकार खुद भी चाहती है कि पत्रकार असुरक्षित रहें, ताकि वे सत्ता के खिलाफ अपनी कलम नहीं चला सकें। वे नौकरी जाने की आशंका में अपना साहस और आत्मविश्वास खो दें। रोज़ी-रोटी के सवाल पर वे भीरू हो जाएं और अपना पैनापन खो बैठें। आर्थिक संकटों से जूझते खबरनवीसों का सत्ता पक्ष आज अपने लिए बेतरह इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल उठता है कि आखिर क्या कदम शासन उठाए कि कार्यरत पत्रकारों को अपेक्षित सुरक्षा उपलब्ध हो। पहला तो यही कि भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों में संशोधन किया जाये। पत्रकारों पर हमले को संज्ञेय और गैरजमानती अपराध करार दिया जाए। इससे कुछ तो बचाव होगा। कुछ लोग मुद्दा उठा सकते हैं कि ऐसी सहायता हर भारतीय नागरिक को मिले, केवल कार्यरत पत्रकारों को ही क्यों? यहाँ यह समझना होगा कि सीमा पर तैनात सैनिक की तरह ही पत्रकारों का काम भी खतरे भरा है, जहां हमले की आशंका निरन्तर है। आखिर पत्रकार जनसेवा में कार्यशील हैं। राष्ट्रहित और समाज को जागरुक करने में पत्रकार का योगदान किसी भी नज़रिये से सुरक्षा बलों या जननायकों से कमतर नहीं है।

भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कानून बनाने का मामला पिछले कई सालों से लंबित पड़ा है। अधिवेशनों में पत्रकार कानून बनाने की माँग उठाते रहे हैं। पत्रकार संगठनों द्वारा धरना-प्रदर्शन किया जाता है। सरकारें जल्द से जल्द कानून बनाने का आश्वासन देती हैं। नेता पत्रकारों पर होनेवाले हमले पर कानून बनाने की बात करते हैं। इस घटना में भी सब कुछ ऐसा ही हुआ है। जेडे के मारे जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा देने की बात कही है। असली सवाल फिर भी रह जाता है। क्या यह हकीकत नहीं है कि पत्रकारों पर होने वाले हमले को लेकर सरकार खुद ही कानून नहीं बनाना चाहती है ?

सोमवार, 6 जून 2011

"शठ योगी" बाबा का हठ योग

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई महाभारत के बाद पूरे देश में घमासान मच गया है । रामदेव के मुद्दे ने राष्ट्रीय राजनीति में मृतप्राय हो चली बीजेपी के लिये संजीवनी बूटी का काम किया है । चारों तरफ़ रामदेव के हाईटेक और पाँचसितारा सत्याग्रह पर हुए पुलिसिया ताँडव की बर्बरता पर हाहाकार मचा है । लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन के ज़रिये अपनी बात सरकार तक पहुँचाने वालों का दमन किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता,लेकिन संवैधानिक अधिकार की आड़ में बाबा के कुकृत्यों पर पर्दा डालना भी आत्मघाती कदम से कम नहीं होगा । मीडिया बाबा को हठयोगी,महायोगी और ना जाने कौन-कौन सी पदवी से नवाज़ रहा है,मगर हाल के दिनों की उनकी करतूतें रामदेव को "शठ योगी" ही ठहराती हैं ।


बीती बातों को बिसार कर बाबाजी के हाल के दिनों के आचरण पर ही बारीकी से नज़र डालें,तो रामदेव के योग की हकीकत पर कुछ भी कहने-सुनने को बाकी नहीं रह जाता । योग का सतत अभ्यास सांसारिक उलझनों में फ़ँसे लोगों के मन, वचन और कर्म की शुद्धि कर देता है, तो फ़िर संसार त्याग चुके संन्यासियों की बात ही कुछ और है। मगर रामदेव के आचरण और वाणी में यम,नियम,तप,जप, योग,ध्यान,समाधि,और न्यास का कोई भी भग्नावशेष दिखाई नहीं दिये। योगी कभी दोगला या झूठा नहीं हो सकता मगर बाबा बड़ी सफ़ाई से अपने भक्तों और देश के लोगों को बरगलाते रहे। बाबा जब सरकार से डील कर ही चुके थे,तो फ़िर इतनी सफ़ाई से मीडिया के ज़रिये पूरे देश को बेवकूफ़ बनाने की क्या ज़रुरत थी ? वास्तव में बाबा का काले धन के मुद्दे से कोई सरोकार है ही नहीं। अचानक हाथ आये पैसे और प्रसिद्धि से बौराए बाबाजी को अब पॉवर हासिल करने की उतावली है। इसीलिये एक्शन-इमोशन-सस्पेंस से भरा मेलोड्रामा टीआरपी की भूखे मीडिया को नित नये अँदाज़ में हर रोज़ परोस रहे हैं ।

पँडाल में मनोज तिवारी देश भक्ति के गीतों से लोगों में जोश भर रहे थे और बाबाजी भी उनके सुर में सुर मिलाकर अलाप रहे थे "मेरा रंग दे बसंती चोला" और " सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है " लेकिन जब पुलिस पकडने आई , तो आधुनिक युग के भगत सिंग मंच पर गुंडों की तरह इधर-उधर भागते दिखाई दिए । ऎसे ही सरफ़रोश थे, तो गिरफ़्तारी से बचने के लिये समर्थकों को अपनी हिफ़ाज़त के लिये घेरा बनाने को क्यों कह रहे थे ? सत्याग्रह जारी रखने की "भीष्म प्रतिज्ञा" लेने वाले रामदेव इतने खोखले कैसे साबित को गये कि पुलिस की पहुँच से बचने के लिये महिलाओं की ओट में जा छिपे ।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने बाबाजी को नये दौर का स्वामी विवेकानंद ठहराया है । मगर सवाल यह भी है कि बसंती चोला रंगाने की चाहत रखने वाले बाबाजी ने गेरुआ त्याग सफ़ेद बाना क्यों पहना ? मुसीबत के वक्त ही व्यक्तित्व की सही पहचान होती है । मगर बाबाजी की शख्सियत में ना धीरता दिखी और ना ही गंभीरता । देश का नेतृत्व करने की चाहत रखने वाला बाबा खाकी के रौब से इतना खौफ़ज़दा हो गया कि अपने समर्थकों को मुसीबत में छोड़कर भेस बदलकर दुम दबाकर भाग निकला । ऎसे ही आँदोलनकारी थे, देशभक्त थे,क्राँतिकारी थे,तो मँच से शान से अपनी गिरफ़्तारी देते और भगतसिंग की तरह "रंग दे बसंती" का नारा बुलंद करते । बाबाजी अब तो आप जान ही गये होंगे कि जोश भरे फ़िल्मी गीतों पर एक्टिंग करना और हकीकत में देश के लिये जान की बाज़ी लगाने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है । आँदोलन के अगुवाई के लिये पुलिस का घेरा तोड़ने की गरज से भेस बदलने के किस्से तो खूब देखे-सुने थे,मगर "आज़ादी की दूसरी लड़ाई" के स्वयंभू क्राँतिकारी का यह रणछोड़ अँदाज़ बेहद हास्यास्पद है। गनीमत है ऎसे फ़िल्मी केरेक्टर स्वाधीनता सँग्राम के दौर में पैदा नहीं हुए ।

बाबा का चोरी और सीनाज़ोरी का अँदाज़ भी बड़ा निराला है। अब वे अपने हर कृत्य को कुछ राजनीतिक दलों की शह पर ग्लैमर का जामा पहनाने पर उतारु हैं। एक नेताजी ने किसी चैनल पर बोलते हुए क्ल्यू दे दिया, तो अब बाबाजी ने अपने सुर बदल दिये । कल तक तो जान बचाने के लिये "माताओं-बहनों" के कपड़े मजबूरन इस्तेमाल करने की दुहाई देने वाले बाबाजी अब तेवर दिखा रहे हैं । अ वे पुलिस पर चीर हरण का आरोप लगा रगे हैं । वे इतने पर ही नहीं रुकते । वे सरकार पर पँडाल को लाक्षागृह बनाने, बम फ़ेंकने, उनकी हत्या या एनकाउंटर करने का षडयंत्र रचने का आरोप भी लगा रहे हैं ।

केन्द्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों के स्वार्थ के चलते देश में रामदेव जैसे तमाम फ़र्ज़ी बाबाओं की पौ बारह है । सरकारें अपने राजनीतिक हित साधने के लिये इन बाबाओं आगे बढ़ाती हैं,जिसका खमियाज़ा देश की भोलीभाली जनता को उठाना पड़ता है । मीडिया की साँठगाँठ भी इस साज़िश में बराबर की हिस्सेदार है । बाबा के अनर्गल प्रलाप का पिछले चर दिनों से लाइव कवरेज दिखाने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में क्या सारे बिकाऊ या अधकचरे लोग भरे पड़े हैं,जो बाबा के चेहरे से टपकी धूर्तता को देखकर भी देख नहीं पा रहे हैं । सजीव तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलतीं । उस रात मंच पर कुर्सियाँ फ़ाँदते, भीड़ में छलाँग लगाते, शाम से लोगों को मरने-मारने के लिये उकसाते और पुलिस से बचने के लिये महिलाओं की आड़ लेने का पेशेवराना तरीका कुछ और ही कह रहा है। आज तो बाबा ने हद ही कर दी । प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान उन्होंने किसी की वल्दियत तक पर सवाल खड़ा कर दिया । जिस अँदाज़ में उन्होंने इस वाक्यांश का इस्तेमाल किया, वह हरियाण,पंजाब,राजस्थानके हिस्सों में अपमानजनक समझा जाता है । ऎसे ही कल एक चैनल पर पँडाल में बाबा के विश्राम के लिये बनाये गये कक्ष में अत्याधुनिक साज-सज्जा और डनलप का गद्दा देखकर आँखें फ़टी रह गईं । हमने तो सुना था कि योगियों का आधुनिक सुख-सुविधाओं से कोई वास्ता नहीं होता ।

मूल सवाल वही है कि जिसका वाणी पर संयम नहीं,जिसके विचार स्थिर और शुध्द नहीं, जिसके मन से लोभ-लालच नहीं गया, जिसमें भोग विलास की लिप्सा बाकी है,जिसके आचरण में क्रूरता, कुटिलता और धूर्तता भरी पड़ी हो वो क्या वो योगी हो सकता है ? खास तौर से जो शख्स करीब तीस सालों से भी ज़्यादा वक्त से लगातार योगाभ्यास का दावा कर रहा हो और अपने योग के ज़रिये देश को स्वस्थ बनाने का दम भरता हो, उसका इतना गैरज़िम्मेदाराना बर्ताव उसकी ठग प्रवृत्ति की गवाही देने के लिये पर्याप्त हैं । ये मुद्दे भी आम जनता के सामने लाने की ज़रुरत है। बाबाजी ने पिछले तीन दिनों के घटनाक्रम के दौरान खुद ही आमजनता और मीडिया को अपने छिपे हुए रुप या यूँ कहें कि असली रुप की झलक बारंबार दी है। बाबाजी तो अपना नकाब उतार चुके अब यदि लोग हकीकत को देखकर भी नज़र अँदाज़ कर दें तो ये लोगों की निगाहों का ही कसूर होगा ।

रविवार, 29 मई 2011

संघ-भाजपा के सितमों से आचार्य धर्मेन्द्र आगबबूला

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और आरएसएस को इन दिनों हिन्दुत्व के अलंबरदार और तेज़तर्रार विहिप नेता आचार्य धर्मेन्द्र का कोपभाजन बनना पड़ रहा है । गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के कब्ज़े से छुड़ाने के लिए सागर में करीब एक हफ़्ते का अनशन नाकाम होने से आचार्य बेहद बिफ़रे हुए हैं । दरअसल आचार्य धर्मेन्द्र पिछले रविवार को सागर में अनशन पर बैठे थे। पर सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और किसी नतीजे के पहले ही उन्हें छह दिन बाद गाय का दूध पीकर अपना आमरण अनशन खत्म करना पड़ा। अपनों के सितम से बेज़ार आचार्य संघ और भाजपा पर मतलबपरस्ती की तोहमत लगा रहे हैं।

बगैर कुछ हासिल किए मजबूरी में अनशन तोड़ने के बाद अब आचार्य धर्मेन्द्र भाजपा सरकार और आरएसएस को कोस रहे हैं। गुस्साये हिन्दूवादी नेता ने सरस्वती शिशु मंदिर पर तीखे प्रहार करते हुए संगठन को शिक्षा माफ़िया तक बता डाला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर विश्वासघात का आरोप लगाने वाले आचार्य धर्मेन्द्र की निगाह में संघ अब 'परिवार' नहीं रहा बल्कि 'तंत्र' बन गया है । संघ में भावना, समर्पण,त्याग व प्रेम की जगह धनलोलुपता का जोर बढ़ रहा है। उन्होंने आमरण अनशन के बेनतीजा समाप्त होने को अपनी पराजय न मानते हुए संघ पर लगा कभी न मिटने वाला कलंक बताया।

कहते हैं लोहा,लोहे को काटता है। लिहाज़ा प्रदेश सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी । इस घटनाक्रम से गौ और गंगा के नाम पर हिन्दुओं को भरमाने वाली भाजपा की इन मुद्दों पर गंभीरता का सहज ही अँदाज़ा लगाया जा सकता है। आचार्य धर्मेंद्र मानते हैं,इससे हिंदुत्व और गाय के लिए नारा लगाने वालों की असलियत सामने आ गई है। उनका अनशन जमीन के लिए नहीं,बल्कि गौ-माता के लिए था। उन्होंने कहा कि स्कूल द्वारा दबाई गई जमीन गौ सेवा संघ की है। भाजपा और आरएसएस की भूमिका से खफ़ा हिन्दू नेता इसे अपने जीवन का सबसे कड़वा अनुभव बता रहे हैं। अनशन की नाकामी से निराश आचार्य इसे संघ और भाजपा की हार करार देने से भी नहीं चूकते।

आचार्य धर्मेन्द्र के मुताबिक वे वर्ष 1980 से सागर के गौ सेवा संघ के संरक्षक हैं और आरएसएस से भी जुडे़ रहे हैं, लेकिन गौ सेवा संघ की जमीन सरस्वती शिशु मंदिर संगठन के कब्जे से मुक्त कराने के मामले में संघ ने उनके साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि संघ का अनुषांगिक संगठन सरस्वती शिशु मंदिर छल, षड़यंत्रों व कुचक्रों का जाल बुनने वाला शिक्षा माफिया है। संघ के अनुषांगिक संगठनों के समूह को संघ परिवार कहा जाता रहा है, लेकिन सागर के जहरीले अनुभव के बाद अब वह संघ परिवार को 'संघ तंत्र' कहने को विवश हैं। संघ पर "यूज एंड थ्रो" की पश्चिमी संस्कृति अपनाने का आरोप जड़ते हुए उन्होंने कहा कि अपनों ने मुझे खो दिया। उन्हें अब मेरी जरूरत नहीं है।

गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। जानकारों का कहना है कि गौ सेवा संघ को 1927 में पचास हजार वर्ग फीट से अधिक जमीन दान में मिली थी। इसे गौ शाला बनाने और गौ संरक्षण के उद्देश्य से दिया गया था। 1972 में गौ सेवा संघ ने सरस्वती शिशु मंदिर को दो कमरे किराए पर दिए थे। इसके बाद वर्ष 1980 में सरस्वती शिशु मंदिर के पदाधिकारियों ने उनसे ही शिशु मंदिर के नए भवन का शिलान्यास करा लिया और लगातार विकास करते रहे। जब आचार्य धर्मेन्द्र को जमीन हथियाने की सूचना मिली तो उन्होंने आरएसएस के लोगों से बात की पर नतीजा नहीं निकला। पंचखंड पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र गौ सेवा संघ और सरस्वती शिशु मंदिर के बीच चल रहे भूमि विवाद को सुलझाने के मकसद से सागर आए थे। जमीन मुक्त कराने के लिये सरस्वती शिशु मंदिर के प्रवेश द्वार पर 21 मई से सत्याग्रह शुरू किया था, जो 24 मई को आमरण अनशन में तब्दील हो गया। सरकार की बेरुखी के कारण आमरण अनशन 27 मई को बेनतीजा खत्म करना पड़ा।

आचार्य धर्मेन्द्र सरीखे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के कटु अनुभव संघ और भाजपा पर सत्ता क सुरुर चढ़ने की पुष्टि करते हैं। वैसे भी जिसे पीने का शऊर और आदत भी नहीं हो,उस पर नशा कुछ जल्दी ही तारी हो जाता है। जनता को संस्कारों की घुट्टी पिलाने वाले संघी सत्ता के मद में इस कदर चूर हो चुके हैं कि अपनी ही नीतियों और सिद्धांतों को रौंदते हुए बढ़े चले जा रहे हैं,गोया कि प्रदेश में सत्ता की चाबी महज़ पाँच सालों के लिये नहीं आने वाली कई पुश्तों को सौंप दी गई है। लोकतंत्र में नये किस्म का सामंतवाद लाने वालों को आगाह ही किया जा सकता है। बहरहाल आचार्य धर्मेन्द्र के आक्रोश को नसीहत समझकर सबक सीखने की गुंजाइश तो रखना ही चाहिए। और फ़िर -

कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय|
जा खावत बौरात है,वा पावत बौराय ।|

शनिवार, 21 मई 2011

महँगाई से निपटने का एकमात्र हथियार-भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होने वाले आंदोलन अधिकतर भारतीयों की इसी सोच को साबित करते हैं कि देश में करप्शन दिनों-दिन बढ़ रहा है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी गैलप के मुताबिक वर्ष 2010 में करीब 47 फ़ीसदी लोगों ने माना कि 5 साल पहले की तुलना में भारत में करप्शन बढ़ा है,जबकि 27 प्रतिशत को घूसखोरी के पैटर्न में कोई तब्दीली नज़र नहीं आती। 78 प्रतिशत लोगों की राय में सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। वहीं 71 प्रतिशत लोगों का मानना है कि व्यापार जगत में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लोग भ्रष्टाचार को लेकर खुद को कितना असहाय महसूस कर रहे हैं और उनमें कैसी छटपटाहट है,इसकी एक मिसाल अप्रैल में दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन के दौरान देखने को मिली थी। हाल ही में जारी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की लड़ाई को मिले व्यापक जन समर्थन और इस तरह के आंदोलनों से भारतीयों की हताशा जाहिर होती है। रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादातर भारतीय इस समस्या की समाज में गहराई तक पैठ बनाने की सच्चाई को स्वीकार चुके हैं।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि बेरोज़गार और युवा तबका उम्मीदों के बोझ तले हालात के आगे घुटने टेकता दिखाई देता है। तकरीबन 65 प्रतिशत बेरोजगारों की राय में सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के ठोस कदम नहीं उठा रही है। सर्वे के अनुसार लोगों को नहीं लगता कि हालात सुधर रहे हैं और वे व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार से लड़ सकते हैं। सर्वे में 6 हज़ार वयस्कों से सीधे इंटरव्यू किया गया।

दूसरी तरफ़ वित्त और निवेश जगत की नामचीन हस्तियाँ कहने लगें कि भारत में शासन संबंधी स्थितियों को लेकर निराशा का माहौल बन गया है,तो ऎसे में देश की व्यवस्था संबंधी खामियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। मशहूर अमेरिकी फर्म जेपी मॉर्गन के एक प्रमुख अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह बेलाग कहा है कि आम तौर पर भारत को लेकर आज छवि नकारात्मक है और निवेशक अब हताश होने लगे हैं। उन्होंने यह बात विदेशी निवेशकों के संदर्भ में कही है,लेकिन भारत में लोगों की राय भी आज इससे बेहतर नहीं है।

सुरसा सा मुँह फ़ैलाती महँगाई की ओर से मुँह फ़ेर चुकी सरकारों को देखकर लगता है, मानो देश के औद्योगिक विकास के लिये देश में जान बूझकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया है। व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सबसे भ्रष्ट अफ़सरों की ज़बरदस्त पूछ है। सरकार की आवाज़ समझे जाने वाले महकमे में तो जैसे कलेक्शन सेंटर खोल दिया गया है। यथासमय दान-दक्षिणा पहुँचाने के एवज़ में लूटखसोट की खुली छूट दे दी गई है। देश के जाने माने शिक्षा संस्थान जहाँ मोटी फ़ीस लेकर पत्रकारिता की डिग्री देते हैं। वहीं इन सरकारी महकमों में ऎरे-गैरे नत्थू खैरे शुरुआती भेंट पूजा के साथ बाकायदा काम पा रहे हैं। आलम यह है कि असली पत्रकार धीरे-धीरे गायब हो चुके हैं। अब स्कूली शिक्षक, कपड़ा व्यापारी, अकाउंटेंट सरीखे लोगों का डंका बज रहा है। एक काँख में काँग्रेस और दूसरे में बीजेपी को दबाये घूमने, बड़े नेताओं को साधने और आला अफ़सरों को खरीदने का हुनर जानने वाले बरसों बरस एक ही जगह जमे रहकर मौज करते हैं और नियम कायदों पर चलने वालों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। वोट बैंक की खातिर समाज के आखिरी छोर पर खड़े लोगों को भी मुफ़्त बिजली,पानी,राशन,ज़मीन और मकान देकर खरीद लिया गया है।

अन्ना के अनशन से एक कारगर लोकपाल की स्थापना की उम्मीद बनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर जिस हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है, उसका क्या हल हो, इस सवाल पर आम लोग से लेकर विशेषज्ञ तक किंकर्तव्य्विमूढ़ हैं। इस असहायता से ही वह हताशा पैदा हो रही है, जिसका असर अब देश की विकास पर पड़ने लगा है। हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों पर न्यायपालिका ने जबरदस्त सख्ती से कई बड़े घोटालों की जाँच में चुस्ती आई है । नतीजतन कई धुरंधर सलाखों के पीछे हैं, मगर इससे आम आदमी का भरोसा लौटता नहीं दिख रहा है।

कहते हैं, जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। लिहाज़ा भ्रष्टाचार की हिस्सेदारी थोड़ी ही सही कमोबेश देश का हर नागरिक कर रहा है। कई मर्तबा लगता है मुफ़्तखोरी ने हमारे जेनेटिक कोड को ही खराब कर दिया है। ऎसे में सुधार की संभावनाएँ ना के बराबर हैं। सुनते हैं विध्वंस में ही सृजन छिपा है। विनाश में ही नई उम्मीद का बीज मौजूद है। कई भविष्यवक्ताओं ने आज २१ मई का दिन मुकर्रर किया था पृथ्वी के खात्मे के लिये, मगर शाम होने आई अब तक तो कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। भ्रष्टाचारियों की राह के रोड़े हम जैसे लोगों को अब अगली किसी तारीख का इंतज़ार करना होगा।

कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअययन है,नींद क्यों रात भर नहीं आती ।

सोमवार, 16 मई 2011

महँगाई के मुद्दे पर राहुल-सोनिया भूमिगत

पेट्रोल के दाम एक बार फ़िर बढ़ा दिये गये। इस मर्तबा कीमतों में अब तक की सर्वाधिक सीधे पाँच रुपये की बढ़ोत्तरी ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है। यह वृद्धि आठ प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो सालों में पेट्रोल के दामों में प्रति लीटर 23 रूपयों की वृद्धि की जा चुकी है। गौरतलब है कि पिछले नौ महीनों में पेट्रोल की कीमत में नौ बार इज़ाफ़ा हो चुका है। इस तरह पेट्रोल की कीमत 47.93 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 63.37 रुपये हो गई है।

लेकिन दिन रात आम आदमी की दुहाई देने वाली केन्द्र सरकार पूरे मामले से पल्ला झाड़ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मुताबिक "पिछले वर्ष जून में हमने पेट्रोल कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का निर्णय लिया था। लिहाजा इन दिनों पेट्रोल कीमतों में वृद्धि या कमी का निर्णय सरकार नहीं लेती। पेट्रोल की ताजा मूल्य वृद्धि में सरकार ने कोई भूमिका नहीं निभाई है, क्योंकि कीमतें नियंत्रण मुक्त हो चुकी हैं। उन्होंने एक तरह से तेल विपणन कम्पनियों के निर्णय का पक्ष लेते हुए कहा कि पिछले 11 महीनों में कच्चे तेल की कीमत 42 डॉलर प्रति बैरल बढ़ गई हैं। वे कहते हैं कि जब पिछले जून में कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने का निर्णय लिया गया था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 68 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन आज यह दर बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।

इधर हमेशा की तरह भाजपा और वामपंथी दल गाल बजाकर अपने लोकतांत्रिक दायित्वों की पूर्ति का दम भरने में लगे हैं । दो-चार दिन सड़कों पर चक्काजाम करने या साइकल,बैलगाड़ी,घोड़ागाड़ी दौड़ाने से सरकार के कान पर जूँ रेंगती तो शायद हालात कुछ और होते। मगर बयान जारी कर चेहरा चमकाने की राजनीति के मौजूदा दौर में बीजेपी ने कहा कि केंद्र सरकार पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए चुनाव परिणामों का इंतज़ार कर रही थी। बीजेपी ने इसे पश्चिम बंगाल, केरल और असम में काँग्रेस की जीत का जनता को ‘‘तोहफा’’ बताया है । अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृध्दि के सरकार के तर्क की काट में भाजपा ने कहा कि सरकार पेट्रोल पर लगाए गए बेतहाशा केन्द्रीय करों को कम करके जनता को राहत दे सकती है। वामपंथी पार्टियों ने मूल्य वृद्धि को संप्रग सरकार का ‘क्रूर हमला’निरुपित करते हुए हर तरफ से महंगाई से त्रस्त लोगों को जबरदस्त झटका बताया है। साथ ही विनियमन नीति वापस लेने की माँग की है।

इस पूरे मसले में एक बात हैरान करने वाली है । जब भी महँगाई से जुड़े मुद्दे पर देश में बैचेनी बढ़ती है। सोनिया गाँधी और उनके सुपुत्र राहुल गाँधी भूमिगत हो जाते हैं । दलित के घर भोजन खाकर,कलावती का मुद्दा संसद में उठाकर,सिर पर मिट्टी ढ़ोकर और भट्टा पारसौल के किसानों के बीच जाकर गिरफ़्तारी देने वाले "काँग्रेस के युवराज" कब तक भारतीय जनमानस की भावनाओं से खेलते रहेंगे। आम जनता की रोज़ी-रोटी से जुड़े मुद्दों पर काँग्रेस के इस "पोस्टर ब्वाय" की चुप्पी आपराधिकता की श्रेणी में आती है। पेट्रोल, डीज़ल या रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी सिर्फ़ इन उत्पादों तक ही सीमित नहीं होती। इनका असर रोज़मर्रा की ज़रुरतों की हर छोटी बड़ी वस्तु पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पड़ता है।

बाज़ारीकरण की नीति पर चलकर आखिर देश जा कहाँ रहा है ? बिजली के बाद अब प्रकृति प्रदत्त संसाधन भी निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। प्याऊ लगाकर प्यासे कँठों को तर करने का पुण्य कमाने वाले देश में आज पानी एक "कमोडिटी" है। मुनाफ़े के इस धँधे में चाँदी काटने के इरादे से केन्द्र और राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारों पर नाच रही हैं। भोपाल के कोलार क्षेत्र में नगर पालिका बनाकर नेताओं की कमाई के लिये चारागाह तो तैयार कर दी गई, मगर यहाँ की पेयजल समस्या के निराकरण की कोई पहल नहीं की गई। यह जानकर कलेजा मुँह को आता है कि औसतन दस- बारह हज़ार रुपये महीना कमाने वाले परिवार को मकान किराया,बिजली,दूध और पेट्रोल जैसे ज़रुरी खर्च के अलावा पानी के इंतज़ाम पर औसतन हर महीने सात सौ से आठ सौ रुपये चुकाना पड़ रहे हैं । यही हाल सड़कों किनारे बनाई गई अँधाधुँध पार्किंग का है। पाँच-पाँच, दस-दस रुपये के ज़रिये लोग हर रोज़ ना जाने कितने रुपये चुकाते हैं। अब तो टोल नाकों के ज़रिये सड़कों पर चलने की भारी कीमत चुकाना पड़ रही है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। कोई नियम कायदा नहीं है।

दरअसल बाज़ारीकरण की व्यवस्था भ्रष्ट समाज में ही पुष्पित और पल्लवित हो सकती है। उपभोक्तावादी संस्कृति में नैतिकता और ईमानदारी का कोई मूल्य ही नहीं है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ईमानदारी अनमोल है,वास्तव में बाज़ारवाद की राह पर आगे बढ़ते समाज में यह "बेमोल" है । सत्ता चलाने वाले भी बखूबी जान चुके हैं कि इस भ्रष्ट तंत्र में कीमतों में इज़ाफ़े से किसी पर भी कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ज़रा सोच कर देखिये दाम बढ़ेगे तो व्यापारी से लेकर मज़दूर और डॉक्टर से लेकर ठेले वाले तक सभी अपने- अपने स्तर पर बढ़ती महँगाई से तालमेल बिठाने का एडजस्टमेंट कर लेते हैं। और कुछ दिनों के हँगामे के बाद गाड़ी फ़िर पटरी पर चलने लगती है।

इस चक्की में सिर्फ़ वही पिसने वाला है जिसे ईमानदारी से जीवन गुज़र बसर करने का भूत सवार है। देश की कुलाँचे मारती जीडीपी में वैसे भी ईमानदार जीवों का भला क्या योगदान है ? इन मरदूदों के भरोसे चले, तो देश की इकॉनॉमी का भट्टा बैठना तय है और औद्योगिक विकास की दर का गर्त में समाना लाज़िमी है। पूरी बात का लब्बेलुआब यह कि जनाब यह सतयुग नहीं कलिकाल है, जहाँ भोगवादियों का बोलबाला है। इस दौर के मार्गकँटकों (ईमानदारो) की विलुप्तप्राय प्रजाति को धरती से हटाने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है। देश की तरक्की और दुनिया का सिरमौर बनने के लिये भ्रष्टाचार ज़िन्दाबाद। और जब भ्रष्टाचार है, तो कीमतों में इज़ाफ़े से कैसा डर ? इस हाथ ले उस हाथ दे की अर्थव्यवस्था में महँगाई कोई समस्या नहीं है । यह तो महज़ एक सियासी दाँव है,जो सत्ता हथियाने के लिये राजनीतिक दल अपनी सहूलियत से समय-समय पर आज़माते हैं।