गुरुवार, 19 अगस्त 2010

सरकारी धन को लूटने में जुटी सरकार

मध्यप्रदेश सरकार के फ़ैसलों को देखकर "अँधी पीसे-कुत्ते खाएँ" कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है । सत्ता के नशे में डूबी भाजपा को विपक्ष की निष्क्रियता ने निरंकुशता के पंख लगाकर भ्रष्टाचार के आसमान में लम्बी और ऊँची उड़ान भरने के लिये स्वतंत्र छोड़ दिया है । कैबिनेट के एक के बाद एक फ़ैसले बताते हैं कि किस तरह सरकारी खज़ाने का दुरुपयोग कर नेता अपने उद्योग धंधे आगे बढ़ा रहे हैं । इस तरह की योजनाएँ बनाई जा रही हैं, जिनमें उद्योग लगाने वालों को सरकारी पैसा मुफ़्त में मिल रहा है, जैसे वे अपना बिज़नेस प्रदेश में लाकर जनता पर बड़ा भारी एहसान कर रहे हैं । बेशकीमती ज़मीनों को औने-पौने में ठिकाने लगाने की मुहिम की अपार सफ़लता से उत्साहित राज्य सरकार अब यही फ़ार्मूला अन्य क्षेत्रों में भी आज़माने जा रही है । यकीन ना आये तो सरकार के हालिया फ़ैसलों को उठाकर देख लीजिये ।

मध्यप्रदेश सरकार ने निजी क्षेत्र के ऑपरेटरों के माध्यम से प्रदेश के प्रमुख शहरों को वायु सेवा से जोड़ने का निर्णय लिया है। चार बड़े शहरों समेत कई नगरों को हवाई सेवा से जोड़ने की योजना में निजी ऑपरेटरों को कई रियायतें देने की तैयारी को अंतिम रुप दे दिया गया है । निजी ऑपरेटर्स 9 सीटर विमान चलाएंगे। इसके लिए वे प्रत्येक सेक्टर में किराया तय करने के लिये स्वतंत्र होंगे। प्रत्येक सेक्टर के लिए विमान में कुछ सीटें राज्य शासन के उपयोग के लिये आरक्षित होंगी। इन सीटों पर प्रत्येक सीट का किराया निर्धारण निविदा के माध्यम से किया जाएगा, जिन पर राज्य शासन द्वारा अधिकृत अधिकारी यात्रा कर सकेंगे। अगर किसी सेक्टर में किसी समय शासकीय अधिकारी आरक्षित सीट पर यात्रा नहीं करेंगे तो ऎसी सीटें आपरेटर द्वारा प्राइवेट मार्केट में बेची जा सकेंगी ।

इस फ़ैसले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जो भी आरक्षित सीट खाली जाएगी उसका भुगतान राज्य सरकार करेगी । भुगतान अधिकतम चार खाली सीटों का होगा । इस पर 84 लाख महीना और सालाना करीब 8 से 9 करोड़ रूपए खर्च होंगे । सरकार तीन साल तक यह प्रोत्साहन राशि देगी । निजी आपरेटर को विमान में लगने वाले ईंधन में वैट से भी छूट मिलेगी । ये वही सरकार है जो महँगाई पर काबू पाने के लिये डीज़ल-पेट्रोल और रसोई गैस पर लगे करों को ज़रा भी कम करने को तैयार नहीं है । गौर करने वाली बात है कि मध्यप्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थ और रसोई गैस अन्य प्रदेशों की तुलना में तीस से पैंतीस फ़ीसदी तक महँगे हैं ।

औद्योगिक घरानों और व्यापारियों पर मेहरबान राज्य सरकार अपने कर्मचारियों का खून चूसने से भी बाज़ नहीं आ रही है । हाल ही में हुए खुलासे ने कर्मचारियों को हक्का बक्का कर दिया है । महंगाई की मार से दोहरे हो चुके कर्मचारियों की मकान किराया भत्ता, वाहन भत्ता जैसी मूलभूत सुविधाओं पर भी सरकार ने रोक लगा रखी है । बेहाल सरकारी मुलाज़िमों के हक के पैसे पर डाका डालकर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है । कर्मचारियों को सरकार की रीढ़ मानने का दावा करने वाली प्रदेश में बीते छह वर्षो में सत्तारूढ़ भाजपा साढे पांच लाख मुलाजिमों का दस हजार करोड़ रूपया डकार चुकी है। सरकारी खजाने में जमा यह राशि केंद्र की अनुशंसाओं को राज्य सरकार द्वारा देरी से लागू करने के अंतर की है । अप्रैल 2004 को केंद्र ने 50 फीसदी डीए मूल वेतन में शामिल कर दिया। राज्य ने इसे 1 अप्रैल 2007 में सम्मलित किया । केंद्रीय कर्मियों को 1 जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 के बीच छठे वेतनमान के एरियर का भुगतान डीए समेत किया । छठे वेतनमान में केंद्र ने 1 जनवरी 2006 से अपने कर्मचारियों को महंगाई भत्ते का भुगतान किया। राज्य ने एरियर तो दिया लेकिन बिना डीए का ।

जनतांत्रिक तरीके से चुनकर आई प्रदेश सरकार के सामंती और तानाशाही तेवरों का आलम यह है कि कर्मचारियों के जायज़ हक को नज़र अंदाज़ करने वाले वित्त मंत्री राघवजी अपने फ़ैसले को सही ठहरा रहे हैं । कर्मचारियों को वेतन-भत्ते देने के लिये सरकार के पास पैसा नहीं है, लेकिन सरकारी योजनाओं के नाम पर उद्योगपतियों को रियायतें देने के लिये सरकारी खज़ाना खाली करने में कोई संकोच नहीं है । वे कहते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि केंद्रीय तिथि से ही राज्य अपने कर्मियों को महंगाई भत्ता या अन्य लाभ दे। राज्य इस मामले में स्वतंत्र है। वित्त विभाग का दो टूक कहना है कि जरूरी नहीं है कि वह केंद्रीय तिथि से भुगतान करे।

तमाम हेराफ़ेरी के बावजूद सरकारी आँकड़े ही प्रदेश के वित्तीय हालात की चुगली करते दिखाई देते हैं । आंकड़े बयां कर रहे हैं कि किस तरह कर्मचारियों का पेट काटकर ही तिजोरी भरी गई है। राज्य सरकार के वित्तीय वर्ष 2009-10 के अंत में शुद्ध बचत रिजर्व बैंक के खजाने में बचत 5560 करोड़ रूपए थी, जबकि केंद्रीय तिथि से कर्मचारियों को भुगतान नहीं करने का सरकारी आंकड़ों में अंतर 10012 करोड़ रूपए है। इस तरह यदि कर्मचारियों को उनकी बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाए, तो खज़ाना भरा होने का सरकारी दावा पल भर में काफ़ूर हो जाए ।

स्वर्णिम प्रदेश बनाने का शिगूफ़ा छोड़ने वाले शिवराज के फ़ैसले अँधेर नगरी के.......राजा की याद ताज़ा कर देते हैं । आये दिन केन्द्र पर भेदभाव का आरोप मढ़कर जनता को बेवकूफ़ बनाने वाले मुख्यमंत्रीजी की शिकायत है कि इस साल उसे केंद्रीय सड़क निधि और अन्य योजनाओं में मिलने वाले 1000 से 1500 करोड़ रूपये नहीं मिले, इसलिए सड़कें बनाने के लिए धन की भारी कमी हो गई है। लेकिन शिवराज सरकार इन तात्कालिक बाधाओं के आगे घुटने टेकने वाली थोड़े ही है, लिहाज़ा इरादे के पक्के मुख्यमंत्री ने आनन-फ़ानन में फैसला ले लिया है कि करीब 2500 किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण के लिए वह ठेकेदारों से ही करीब 2000 करोड़ रूपये का लोन लिया जाएगा । यह राष्ट्रीयकृत बैंकों की मौजूदा ब्याज दर पर ही होगा और उसे 10 वर्षो में सालाना किश्तों में चुकता किया जाएगा ।

यहां गौर करने लायक बात यह है कि "एनयूटी मोड" के तहत बनने वाली ये वे सड़कें होंगी जहां टोल टैक्स की वसूली संभव नहीं है। अब एनयूटी मोड में सड़कें बनेंगी, यानी ठेकेदार सड़क बनाएगा और सरकार किस्तों में उसे ब्याज सहित लागत रकम लौटाएगी। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि इस तरह बनने वाली सड़कों में असल फायदा किसे होगा- सरकार को, ठेकेदार को या जनता को? क्योंकि बीओटी के तहत बनी सड़कों पर टोलटैक्स वसूली की हकीकत से सभी कभी न कभी दो-चार हुए हैं ।

सबसे गंभीर और हैरानी की बात यह है कि सारे सरकारी निर्माण कार्य घाटे में ही क्यों जाते हैं, जबकि सरकारी ठेके लेने वाले लोग हर स्तर पर मुट्ठी गर्म करने के बावजूद दिन दोगुनी रफ़्तार से श्री और समृद्धि हासिल करते हैं । जो आमतौर पर ठेकेदार किसी ना किसी रुप में नेताओं से जुड़े रहते हैं, फ़िर चाहे वो उनके सगे-संबंधी हों या उनके इष्टमित्र । अब तो वे सरकार की कृपा से साहूकार भी बनने जा रहे हैं। सरकारी धन की लूट की बढ़ती प्रवृत्ति कह रही है कि तो वह दिन दूर नहीं जब कर्ज के बोझ तले दबी सरकार ही किसी ठेकेदार के हाथ होगी ।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

चल रहा है प्रदेश बेचो अभियान.....!

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सनसनीखेज़ और उत्तेजक बयानों ने प्रदेश की राजनीति में तूफ़ान ला दिया है । जहाँ शिवपुरी में भूमाफ़ियाओं पर उन्हें हटाने के लिये धन इकट्ठा करने का बयान दे कर सबको हक्का बक्का कर दिया। वहीं सदन के भीतर भूमाफ़ियाओं को चुनौती देने की शिवराज की दंभ भरी हुँकार से लोग सन्न हैं । विरोधियों को चुनौती देने के लिये उन्होंने संसदीय मर्यादाओं को बलाये ताक रखकर जिस भाषा शैली का इस्तेमाल किया, उसका उदाहरण प्रदेश के इतिहास में शायद ही मिले ।
मुख्यमंत्री भूमाफ़ियाओं पर उन्हें हटाने के लिये धन इकट्ठा करने का आरोप लगा रहे हैं, मगर भाजपा सरकार की कामकाज की शैली पर नज़र डालें, तो राज्य सरकार खुद ही भूमाफ़िया की सरमायेदार नज़र आती है। शिवराज के सत्तारुढ़ होने के बाद से मंत्रिपरिषद के अब तक लिये गये फ़ैसले सरकार की शैली साफ़ करने के लिये काफ़ी हैं । हर चौथी-पाँचवीं बैठक में निजी क्षेत्र को सरकारी ज़मीन देने के फ़ैसले आम है । सदन में भूमाफ़ियाओं पर दहाड़ने वाले मुखिया का मंत्रिमंडल जिस तरह के फ़ैसले ले रहा है, उससे उद्योगपतियों, नेताओं और भूमाफ़िया ही चाँदी कूट रहे हैं । एक तरफ़ सरकारी ज़मीनों को कौड़ियों के भाव औद्योगिक घरानों के हवाले किया जा रहा है , वहीं दूसरी तरफ़ बड़े बिल्डरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है । सरकार के फ़ैसले से नाराज़ छोटे बिल्डरों को खुश करने के लिये भी नियमों को बलाए ताक रख दिया गया है । गोया कि सरकार नेताओं को चंदा देने वाली किसी भी संस्था की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती ।

सरकारी कायदों की आड़ में ज़मीनों के अधिग्रहण का खेल पुराना है , लेकिन अब मध्यप्रदेश में हालात बेकाबू हो चले हैं । मिंटो हॉल को बेचने के कैबिनेट के फ़ैसले ने सरकार की नीयत पर सवाल खडे कर दिये हैं । मध्यप्रदेश सरकार सूबे की संपत्ति को अपनी मिल्कियत समझकर मनमाने फ़ैसले ले रही है । मालदारों और रसूखदारों को उपकृत करने की श्रृंखला में अब बारी है भोपाल की शान मिंटो हॉल की , जिसे निजी हाथों में सौंपा जा रहा है । स्थापत्य कला के नायाब नमूने के तौर पर सीना ताने खड़ी नवाबी दौर की इस इमारत का ऎतिहासिक महत्व तो है ही, यह धरोहर एकीकृत मध्यप्रदेश की विधान सभा के तौर पर कई अहम फ़ैसलों की गवाह भी है । सरकारी जमीन लीज पर देने का अपने तरह का यह पहला मामला होगा। राज्य सरकार की प्री-क्वालीफिकेशन बिड में चार कंपनियाँ रामकी (हैदराबाद), सोम इंडस्ट्री (हैदराबाद) जेपी ग्रुप (दिल्ली) और रहेजा ग्रुप (बाम्बे) चुनी गई हैं । इनमें से रामकी ग्रुप बीजेपी के एक बड़े नेता के करीबी रिश्तेदार का है । यूनियन कार्बाइड का कचरा जलाने का ठेका भी इसी कंपनी को दिया गया है । जेपी ग्रुप पर बीजेपी की मेहरबानियाँ जगज़ाहिर हैं ।

भोपाल को रातोंरात सिंगापुर,पेरिस बनाने की चाहत में राज्य सरकार कम्पनियों को मनमानी रियायत देने पर आमादा है । इतनी बेशकीमती जमीन कमर्शियल रेट तो दूर,सरकार कलेक्टर रेट से भी कम दामों पर देने की तैयारी कर चुकी है । ऐसा लगता है कि सरकार किसी उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को अपने हिसाब से बना रही है। कलेक्टर रेट पर भी जमीन की कीमत लगभग 117.25 करोड़ है,जबकि 7.1 एकड़ के भूखंड की कीमत महज़ 85 करोड़ रुपए रखी गई है। शहर के बीचोबीच राजभवन के पास की इस जमीन की सरकारी कीमत सत्रह करोड़ रूपए प्रति एकड़ है। यहाँ जमीन का कामर्शियल रेट कलेक्टर रेट से तीन गुना से भी अधिक है। कीमत कम रखने के पीछे तर्क है कि उपयोग की जमीन मात्र साढ़े पांच एकड़ है। इतना ही नहीं 1.2 एकड़ में बने खूबसूरत पार्क को एक रूपए प्रतिवर्ष की लीज पर दिया जाएगा, जिसका उपयोग संबंधित कंपनी पार्टियों के साथ ही बतौर कैफेटेरिया भी कर पायेगी ।

सरकार की मेहरबानियों का सिलसिला यहीं नहीं थमता । उद्योगपतियों को लाभ देने के लिए 85 करोड़ की राशि चौदह साल में आसान किश्तों पर लेने का प्रस्ताव है। पहले चार साल प्रतिवर्ष ढ़ाई करोड़ रूपए सरकार को मिलेंगे, जबकि पांचवे साल से सरकार को 14.90 करोड़ रूपए मिलेंगे। इस दौरान कंपनी सरकार को राशि पर महज़ 8.5 फ़ीसदी की दर से ब्याज अदा करेगी। इतनी रियायतें और चौदह साल में 85 करोड़ रूपए की अदायगी का सरकारी फ़ार्मूला किसी के गले नहीं उतर रहा है। सरकार मिंटो हॉल को साठ साल की लीज पर देगी, जिसे तीस साल तक और बढ़ाया जा सकता है। गौरतलब है कि गरीबों और मध्यमवर्गियों को मकान बनाकर देने वाला मप्र गृह निर्माण मंडल अपने ग्राहकों से आज भी किराया भाड़ा योजना के तहत 15 फ़ीसदी से भी ज़्यादा ब्याज वसूलता है ।

इसी तरह पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर मप्र पर्यटन विकास निगम ने महज़ 27 हजार 127 रुपए की सालाना लीज पर गोविंदगढ़ का किला दिल्ली की मैसर्स मैगपी रिसोर्ट प्रायवेट लिमिटेड के हवाले कर दिया है। इस तरह करीब 3.617 हेक्टेयर में फ़ैले गोविंदगढ़ किले को हेरिटेज होटल में तब्दील करके सैलानियों की जेब हल्की कराने के लिये कंपनी को हर महीने सिर्फ़ 2 हज़ार 260 रुपए खर्च करना होंगे। उस पर तुर्रा ये कि निगम के अध्यक्ष बड़ी ही मासूमियत के साथ कंपनी का एहसान मान रहे हैं,जिसने कम से कम किला खरीदने की हिम्मत तो की । वरना कई बार विज्ञापन करने के बावजूद कोई भी कंपनी किले को खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी ।

"मुफ़्त का चंदन" घिसने में मुख्यमंत्री किसी से पीछे नहीं हैं । ज़मीनों की रेवड़ियाँ बाँटने में उनका हाथ काफ़ी खुला हुआ है । पिछले छह सालों में केवल भोपाल ज़िले में सेवा भारती सहित कई सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों को करीब 95एकड़ ज़मीन दे चुके हैं । इसमें वो बेशकीमती ज़मीनें शामिल नहीं हैं , जिन पर मंत्रियों और विधायकों से लेकर छुटभैये नेताओं के इशारों पर मंदिर,झुग्गियाँ तथा गुमटियाँ बन चुकी हैं ।

राजधानी के कमर्शियल एरिया महाराणा प्रताप नगर से लगी सरकारी ज़मीन पर बसे पट्टेधारी झुग्गीवासियों को बलपूर्वक खदेड़ दिया गया था । ज़मीन खाली कराने के पीछे प्रशासन का तर्क था कि सरकार को इसकी ज़रुरत है । विस्थापन के लिये सरकार ने झुग्गीवासियों को वैकल्पिक जगह दी और उनके विस्थापन का खर्च भी उठाया । बाद में मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल के दावे को दरकिनार करते हुए बीजेपी सरकार ने बेशकीमती ज़मीन औने-पौने में दैनिक भास्कर समूह को "भेंट कर" दी । आज वहाँ डीबी मॉल सीना तान कर बेरोकटोक जारी सरकारी बंदरबाँट पर इठला रहा है । हाल ही में इस मॉल के प्रवेश द्वार में तब्दीली के लिये कैबिनेट के फ़ैसले ने एक बार फ़िर व्यावसायिक परीक्षा मंडल को अपना आकार सिकोड़ने पर मजबूर कर दिया । तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए कई पेड़ों की बलि देकर बेशकीमती ज़मीन डीबी मॉल को सौंप दी गई । करीब पाँच साल पहले भोपाल विकास प्राधिकरण ने भी एक बिल्डर पर भी इसी तरह की कृपा दिखाई थी । सरकारी खर्च पर अतिक्रमण से मुक्त कराई गई करीब पाँच एकड़ से ज़्यादा ज़मीन के लिये बिल्डर को कई सालों तक आसान किस्तों में रकम अदायगी की सुविधा मुहैया कराई थी । इसी तरह राजधानी भोपाल के टीनशेड, साउथ टीटीनगर क्षेत्र के सरकारी मकानों को ज़मीनदोज़ कर ज़मीन कंस्ट्रक्शन कंपनी गैमन इंडिया के हवाले कर दी गई ।

राज्य सरकार सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षिक संस्थाओं के अलावा अब उद्योगपतियों पर भी मेहरबान हो रही है । राजधानी भोपाल,औद्योगिक शहर इंदौर,जबलपुर,ग्वालियर सहित कई अन्य शहरों में तमाम नियमों को दरकिनार कर सरकारी ज़मीन कौड़ियों के दाम नेताओं के रिश्तेदारों और उनके चहेते औद्योगिक घरानों को सौंपी जा रही हैं । 23 अप्रैल 2010 के पत्रिका के भोपाल संस्करण में सातवें पेज पर प्रकाशित ज़ाहिर सूचना में ग्राम सिंगारचोली यानी मनुआभान की टेकरी के आसपास की 1.28 एकड़ शासकीय ज़मीन एस्सार ग्रुप को कार्यालय खोलने के लिये आवंटित करने की बात कही गई है । नजूल अधिकारी के हवाले से प्रकाशित इस विज्ञापन में बेहद बारीक अक्षरों में पंद्रह दिनों के भीतर आपत्ति लगाने की खानापूर्ति भी की गई है ।

सरकार के कई मंत्री और विधायक शहरों की प्राइम लोकेशन वाली ज़मीनों पर रातों रात झुग्गी बस्तियाँ उगाने, शनि और साँईं मंदिर बनाने के काम में मसरुफ़ हैं । नेताओं की छत्रछाया में बेजा कब्ज़ा कर ज़मीनें बेचने वाले भूमाफ़िया पूरे प्रदेश में फ़लफ़ूल रहे हैं । भाजपा के करीबियों ने कोटरा क्षेत्र में सरकारी ज़मीन पर प्लॉट काट दिये । गोमती कॉलोनी के करीब चार सौ परिवार नजूल का नोटिस मिलने के बाद अपने बसेरे टूटने की आशंका से हैरान-परेशान घूम रहे हैं । असली अपराधी नेताओं के संरक्षण में सरकारी ज़मीनों को "लूटकर" बेच रहे हैं । आलम ये है कि सरकार की नाक के नीचे भोपाल में करोड़ों की सरकारी ज़मीनें निजी हाथों में जा चुकी है । कई मामलों में नेताओं और अफ़सरों की मिलीभगत के चलते सरकार को मुँह की खाना पड़ी है ।

राज्य सरकार ने काफी मशक्कत के बाद भोपाल के मास्टर प्लान को रद्द करने का निर्णय लेने का मन बना लिया है। नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय ने राज्य शासन को नगर तथा ग्राम निवेश की धारा 18 (3) के तहत प्लान को निरस्त करने का प्रस्ताव भेज दिया है।शहरों में जमीन की आसमान छू रही कीमतों और बढ़ते शहरीकरण के मद्देनजर आवास एवं पर्यावरण विभाग ने टाउनशिप विकास नियम-2010 का प्रारूप प्रकाशित कर दिया है। ऊपरी तौर पर सब कुछ सामान्य घटनाक्रम दिखता है, लेकिन पूरे मामले की तह में जाने पर सारी धाँधली साफ़ हो जाती है । टाउनशिप विकास नियम-2010 के प्रकाशन से पहले भोपाल के मास्टर प्लान को रद्द करने की मुख्यमंत्री की घोषणा की टाइमिंग भूमाफ़ियाओं से सरकार की साँठगाँठ की पोल खोल कर रख देती है ।

सरसरी तौर पर टाउनशिप विकास नियम-2010 में कोई खोट नज़र नहीं आती, लेकिन प्रारूप में एक ऎसी छूट शामिल कर दी गई है, जिससे शहरों के मास्टर प्लान ही बेमानी हो जाएँगे । मास्टर प्लान में कई नियमों से बँधे कॉलोनाइजरों और डेवलपरों के लिये स्पेशल टाउनशिप नियम राहत का पैगाम है। राज्य सरकार ने टाउनशिप नियमों का जो मसौदा तैयार किया है, उसमें स्पेशल टाउनशिप को मंजूरी देने के लिए मास्टर प्लान के नियम बाधा नहीं बनेंगे। जहां भी मास्टर प्लान का क्षेत्र होगा, यदि वहां उक्त प्रस्ताव के नियमों और मास्टर प्लान के नियमों में विरोधाभास हुआ तो टाउनशिप के नियम लागू होंगे। इस तरह राज्य सरकार ने स्पेशल टाउनशिप के ज़रिये मास्टर प्लान से भी छेड़छाड़ की छूट दे दी है।

टाउनशिप के निर्माण के लिए असीमित कृषि भूमि खरीदने और इस जमीन को कृषि जोत उच्चतम सीमा अधिनियम के प्रावधानों से भी मुक्त करने जैसी बड़ी रियायतें भी देने का प्रस्ताव है। साथ ही टाउनशिप के बीच में आने वाली सरकारी जमीन प्रचलित दरों या अनुसूची(क) की दरों अथवा कलेक्टर की ओर से तय दरों पर पट्टे पर देने का प्रस्ताव भी आगे चलकर किसके लिये मददगार बनेगा,बताने की ज़रुरत शायद नहीं है । खतरनाक बात यह है कि कृषि भूमि पर भी टाउनशिप खड़ी हो सकेगी। खेती को लाभ का धँधा बनाने के सब्ज़बाग दिखाने वाले सूबे के मुखिया ने खेती की ज़मीनों पर काँक्रीट के जंगल उगाने की खुली छूट दे दी है । किसान तात्कालिक फ़ायदे के लिये अपनी ज़मीनें भूमाफ़ियाओं को बेच रहे हैं । सरकार की नीतियों के कारण सिकुड़ती कृषि भूमि ने धरतीपुत्रों को मालिक से मज़दूर बना दिया है । इससे पहले राज्य सरकार हानि में चल रहे कृषि प्रक्षेत्रों, जिनमें नर्सरियाँ और बाबई कृषि फ़ार्म भी निजी हाथों में देने का फ़ैसला ले चुकी है ।

प्रारूप के नियमों में हर जगह लिखा गया है कि विकासकर्ता को अपने स्रोतों से ही टाउनशिप में सुविधाएँ उपलब्ध कराना होंगी जिनमें सड़क बिजली एवं पानी मुख्य है । वहीं यह भी जोड़ दिया कि वो चाहे तो इस कार्य में नगरीय निकाय की सहायता ले सकते हैं। नियम में इस शर्त को जोड़कर विकासकर्ता को खुली छूट दी गई है कि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर टाउनशिप का पूरा विकास सरकारी एजेंसी के खर्चे से करवा ले। आवास एवं पर्यावरण विभाग की वेबसाइट पर मसौदे को गौर से पढ़ा जाए तो इसमें शुरू से लेकर आखिर तक सिर्फ बिल्डरों को उपकृत करने की मंशा साफ़ नज़र आती है। विभाग ने अपने ही नियमों को धता बताते हुए इस नए नियम से बड़े कॉलोनाइजरों और डेवलपरों की खुलकर मदद की है।

स्पेशल टाउनशिप को पर्यावरण और खेती का रकबा घटने के लिये ज़िम्मेदार मानने वालों का तर्क है कि शहर के बाहर स्पेशल टाउनशिप बनाने के बजाए पहले सरकार को पुनर्घनत्वीकरण योजना के तहत शहर के पुराने, जर्जर भवनों के स्थान पर बहुमंजिला भवन बनाना चाहिए। अंग्रेजों द्वारा 1894 में बनाये गये कानून की आड़ में सरकारी ज़मीनों की खरीद फ़रोख्त का दौर वैसे ही उफ़ान पर है । ऎसे में खेती की ज़मीनों पर टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव आत्मघाती कदम साबित होगा । इस प्रस्ताव से कृषि भूमि के परिवर्तन के मामलों में अंधाधुंध बढ़ोतरी की आशंका भी पर्यावरण प्रेमियों को सताने लगी है ।

कृषि भूमि का अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने पर उतारु सरकार सरकारी संपत्ति की लूट खसोट के लिये जनता द्वारा सौंपी गई ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रही हैं । अरबों-खरबों के टर्नओवर वाली कंपनियों पर भी शिवराज सरकार की कृपादृष्टि कम नहीं है । इस बात को समझने के लिये इतना जानना ही काफ़ी होगा कि बीते एक साल के दौरान प्रदेश में बड़ी कंपनियों को सरकार 8000 हैक्टेयर से अधिक ज़मीन बाँट चुकी है । बेशकीमती ज़मीनें बड़ी कम्पनियों को रियायती दरों पर देने का यह खेल प्रदेश में उद्योग-धँधों को बढ़ावा देने के नाम पर खेला जा रहा है । पिछले एक साल में रिलायंस, बिड़ला समूह समेत 22 बड़ी कंपनियों को करीब 6400 हैक्टेयर निजी भूमि भू अर्जन के माध्यम से दी गई । वहीं 14 ऎसी कंपनियाँ हैं जिन्हें निजी के साथ ही करीब 1640 हैक्टेयर सरकारी ज़मीन भी उपलब्ध कराई गई है । इनमें भाजपा का चहेता जेपी ग्रुप भी शामिल है । अरबों के टर्नओवर वाली कंपनियों को रियायत की सौगात देने के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे लोगों को स्थानीय स्तर पर रोज़गार मिल सकेगा लेकिन अब तक सरकारी दावे खोखले ही हैं ।

सरकारी संपत्ति पर जनता का पहला हक है। आम लोगों को अँधेरे में रखकर सरकार पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली की तरह काम कर रही है । नवम्बर 2005 के बाद प्रदेश की भाजपा सरकार के फ़ैसले भूमाफ़ियाओं के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली के से जान पड़ते हैं । पिछले छः दशकों में आदिवासी तथा अन्य क्षेत्रों की खनिज संपदा का तो बड़े पैमाने पर दोहन किया गया है मगर इसका फायदा सिर्फ पूँजीपतियों को मिला है। जो आबादियाँ खनन आदि के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापित हुईं, अपनी जमीन से उजड़ीं, उन्हें कुछ नहीं मिला। यहाँ तक कि आजीविका कमाने के संसाधन भी नहीं मिले, सिर पर एक छत भी नहीं मिली और पारंपरिक जीवनपद्धति छूटी, रोजगार छूटा, सो अलग। सरकार को उसकी हैसियत बताने के लिये जनता को अपनी ताकत पहचानना होगा और जागना होगा नीम बेहोशी से ।.......क्योंकि ज़मीनों की इस बंदरबाँट को थामने का कोई रास्ता अब भी बचा है ?

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

भरोसा कर लिया जिन पर ............

मध्यप्रदेश सरकार सूबे की संपत्ति को अपनी मिल्कियत समझकर मनमाने फ़ैसले ले रही है । एक तरफ़ सरकारी ज़मीनों को कौड़ियों के भाव औद्योगिक घरानों के हवाले किया जा रहा है । वहीं दूसरी तरफ़ बड़े बिल्डरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है । सरकार के फ़ैसले से नाराज़ छोटे बिल्डरों को खुश करने के लिये भी सरकार ने नियमों में ढ़ील दे दी है । गोया कि राज्य सरकार नेताओं को चंदा देने वाली किसी भी संस्था की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती । सरकारी कायदों की आड़ में ज़मीनों के अधिग्रहण का खेल पुराना है , लेकिन अब मध्यप्रदेश में हालात बेकाबू हो चले हैं । राजधानी भोपाल के सरकारी मकानों को ज़मीनदोज़ कर कंस्ट्रक्शन कंपनी गैमन इंडिया के हवाले कर दी गई ।
मालदारों और रसूखदारों को उपकृत करने की श्रृंखला में अब बारी है भोपाल की शान कहे जाने वाले मिंटो हॉल की , जिसे निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है । स्थापत्य कला के नायाब नमूने के तौर पर सीना ताने खड़ी इस इमारत का ऎतिहासिक महत्व तो है ही, यह धरोहर एकीकृत मध्यप्रदेश की विधान सभा के तौर पर कई अहम फ़ैसलों की गवाह भी रही है । मिंटो हॉल से लगी 7.1 एकड़ जमीन पर कंवेंशन सेंटर बनाने के लिए सरकारी रेट से कम दर पर जमीन देने की तैयारी राज्य सरकार ने कर ली है। यही नहीं मिंटो हाल से सटे एक एकड़ से अधिक क्षेत्र में फ़ैले पार्क को एक रूपए प्रतिवर्ष के लीज पर दिया जाएगा। शायद सरकारी जमीन लीज पर देने का अपने तरह का यह पहला मामला होगा। लघु उद्योग निगम ने कैबिनेट में प्रस्ताव लाने के लिए प्रेसी बनाकर राज्य सरकार को भेज दी है। राज्य सरकार द्वारा जारी की गई प्री-क्वालीफिकेशन बिड में चार कंपनियाँ रामकी (हैदराबाद), सोम इंडस्ट्री (हैदराबाद) जेपी ग्रुप (दिल्ली) और रहेजा ग्रुप (बाम्बे) का चुनी गई हैं । इनमें से रामकी ग्रुप बीजेपी के एक बड़े नेता के करीबी रिश्तेदार का है । यूनियन कार्बाईड का कचरा जलाने का ठेका भी इसी कंपनी को दिया गया है । जेपी ग्रुप पर बीजेपी की मेहरबानियाँ जगज़ाहिर हैं ।

रातोंरात भोपाल को सिंगापुर,पेरिस बनाने का चाहत में राज्य सरकार कम्पनियों को मनमानी रियायत देने पर आमादा है । तभी तो कमर्शियल रेट तो दूर की बात है इतनी बेशकीमती जमीन को सरकार को कलेक्टर रेट से भी कम दामों पर देने की तैयारी कर चुकी है । शहर के बीचोबीच राजभवन के पास की इस जमीन की सरकारी कीमत सत्रह करोड़ रूपए प्रति एकड़ है। लेकिन सरकार ने 7.1 एकड़ के भूखंड की कीमत 85 करोड़ रुपए रखी है। इस हिसाब से जमीन की कीमत बारह करोड़ रूपए प्रति एकड़ होगी, जबकि यहाँ जमीन का कामर्शियल रेट कलेक्टर रेट से तीन गुना से भी अधिक है। कलेक्टर रेट पर भी जमीन की कीमत लगभग 117.25 करोड़ होना चाहिए। लेकिन जमीन की कीमत सरकारी कीमत से 32 करोड़ रूपए कम रखी गई है। इसके पीछे कैबिनेट की प्रेसी में तर्क दिए गए है कि उपयोग की जमीन मात्र साढ़े पांच एकड़ है। सरकार मिंटो हॉल को साठ साल के लीज पर देगी, जिसे तीस साल तक और बढ़ाया जा सकता है।

सरकार की मेहरबानियों का सिलसिला यहीं नहीं थमता । उद्योगपतियों को लाभ देने के लिए 85 करोड़ की राशि चौदह साल में आसान किश्तों पर लेने का प्रस्ताव है। पहले चार साल प्रतिवर्ष ढ़ाई करोड़ रूपए सरकार को मिलेंगे, जबकि पांचवे साल से सरकार को 14.90 करोड़ रूपए मिलेंगे। इस दौरान कंपनी सरकार को राशि पर महज़ 8.5 की दर से ब्याज अदा करेगी। इतनी रियायतें और चौदह साल में 85 करोड़ रूपए की अदायगी का सरकारी फ़ार्मूला किसी के गले नहीं उतर रहा है। गौरतलब है कि गरीबों और मध्यमवर्गीयों को मकान बनाकर देने वाला मप्र गृह निर्माण मंडल अपने ग्राहकों से आज भी किराया भाड़ा योजना के तहत 15 फ़ीसदी से भी ज़्यादा ब्याज वसूलता है ।
ऐसा लगता है कि सरकार किसी उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को अपने हिसाब से बना रही है। कैबिनेट के लिए तैयार किए गए प्रस्ताव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मिंटोहाल के वर्तमान स्वरूप में कोई बदलाव और फेरबदल नहीं किया जाएगा। लेकिन टेंडर जिस कंपनी को मिलेगा , वह इमारत का इस्तेमाल कर सकेगी । इतना ही नहीं 1.2 एकड़ में बने खूबसूरत पार्क को एक रूपए प्रतिवर्ष की लीज पर दिया जाएगा। जिसका उपयोग संबंधित कंपनी पार्टियों के साथ ही बतौर कैफेटेरिया भी कर पायेगी । प्रेसी में गार्डन पर लगने वाले विकास शुल्क का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है।

इसी तरह राजधानी के कमर्शियल एरिया महाराणा प्रताप नगर से लगी सरकारी ज़मीन पर बसे पट्टेधारी झुग्गीवासियों को बलपूर्वक खदेड़ दिया गया था । ज़मीन खाली कराने के पीछे प्रशासन का तर्क था कि सरकार को इसकी ज़रुरत है । विस्थापन के लिये सरकार ने झुग्गीवासियों को वैकल्पिक जगह दी और उनके विस्थापन का खर्च भी उठाया । बाद में मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल के दावे को दरकिनार करते हुए बीजेपी सरकार ने बेशकीमती ज़मीन औने-पौने में दैनिक भास्कर समूह को "भेंट कर" दी । आज वहाँ डीबी मॉल सीना तान कर बेरोकटोक जारी सरकारी बंदरबाँट पर इठला रहा है । करीब पाँच साल पहले भोपाल विकास प्राधिकरण ने भी एक बिल्डर पर भी इसी तरह की कृपा दिखाई थी । सरकारी खर्च पर अतिक्रमण से मुक्त कराई गई करीब पाँच एकड़ से ज़्यादा ज़मीन के लिये बिल्डर को कई सालों तक आसान किस्तों में रकम अदायगी की सुविधा मुहैया कराई थी ।
राज्य सरकार सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षिक संस्थाओं के अलावा अब उद्योगपतियों पर भी मेहरबान हो रही है । राजधानी भोपाल,औद्योगिक शहर इंदौर,जबलपुर,ग्वालियर सहित कई अन्य शहरों में तमाम नियमों को दरकिनार कर सरकारी ज़मीन कौड़ियों के दाम नेताओं के रिश्तेदारों और उनके चहेते औद्योगिक घरानों को सौंपी जा रही हैं । सरकार के कई मंत्री और विधायक शहरों की प्राइम लोकेशन वाली ज़मीनों पर रातों रात झुग्गी बस्तियाँ उगाने, शनि और साँईं मंदिर बनाने के काम में मसरुफ़ हैं । नेताओं की छत्रछाया में बेजा कब्ज़ा कर ज़मीनें बेचने वाले भूमाफ़िया पूरे प्रदेश में फ़लफ़ूल रहे हैं । आलम ये है कि सरकार की नाक के नीचे करोड़ों की सरकारी ज़मीनें निजी हाथों में जा चुकी है । कई मामलों में नेताओं और अफ़सरों की मिलीभगत के चलते सरकार को मुँह की खाना पड़ी है ।

शहरों में जमीन की आसमान छू रही कीमतों के मद्देनजर राज्य शासन की मंशा है कि शहर के आसपास ऎसी स्पेशल टाउनशिप बनाई जाए, जिसमें सस्ती दरों पर मकान उपलब्ध हों। साथ ही स्कूल, अस्पताल समेत अन्य मूलभूत सुविधाएं भी मुहैया कराई जा सकें। आवास एवं पर्यावरण विभाग ने प्रदेश में बढ़ते शहरीकरण के मद्देनजर टाउनशिप विकास नियम-2010 का प्रारूप प्रकाशित किया है। सरसरी तौर पर योजना में कोई खोट नज़र नहीं आती, लेकिन प्रारूप में एक ऎसी छूट शामिल कर दी गई है, जिससे मास्टर प्लान से छेड़छाड़ होने की पूरी संभावना है। मास्टर प्लान में कई नियमों से बँधे कॉलोनाइजरों और डेवलपरों के लिये स्पेशल टाउनशिप नियम राहत का पैगाम है। राज्य सरकार ने टाउनशिप नियमों का जो मसौदा तैयार किया है, उसमें स्पेशल टाउनशिप को मंजूरी देने के लिए मास्टर प्लान के नियम बाधा नहीं बनेंगे। खास बात यह है कि कृषि भूमि पर भी टाउनशिप खड़ी हो सकेगी। अब तक कई सीमाएं कालोनाइजर के लिए बाधक बनी हुई थी।

जहां भी मास्टर प्लान का क्षेत्र होगा, यदि वहां उक्त प्रस्ताव के नियमों और मास्टर प्लान के नियमों में विरोधाभास हुआ तो टाउनशिप के नियम लागू होंगे। इस तरह राज्य सरकार ने स्पेशल टाउनशिप के लिए निर्माताओं को मास्टर प्लान से भी छेड़छाड़ करने की छूट दे दी है। टाउनशिप के निर्माण के लिए असीमित कृषि भूमि खरीदने और इस जमीन को कृषि जोत उच्चतम सीमा अधिनियम के प्रावधानों से भी मुक्त करने जैसी बड़ी रियायतें भी देने का प्रस्ताव किया है। साथ ही टाउनशिप के बीच में आने वाली सरकारी जमीन प्रचलित दरों या अनुसूची(क) की दरों अथवा कलेक्टर की ओर से तय दरों पर पट्टे पर देने का प्रस्ताव भी आगे चलकर किसके लिये मददगार बनेगा,बताने की ज़रुरत शायद नहीं है ।

प्रारूप के नियमों में हर जगह लिखा गया है कि विकासकर्ता को अपने स्रोतों से ही टाउनशिप में सुविधाएँ उपलब्ध कराना होंगी जिनमें सड़क बिजली एवं पानी मुख्य है । वहीं यह भी जोड़ दिया कि वो चाहे तो इस कार्य में नगरीय निकाय की सहायता ले सकते हैं। नियम में इस शर्त को जोड़कर विकासकर्ता को खुली छूट दी गई है कि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर टाउनशिप का पूरा विकास निगम खर्चे से करवा ले। आवास एवं पर्यावरण विभाग की वेबसाइट पर मौजूद को गौर से पढ़ा जाए तो इसमें शुरू से लेकर आखिर तक सिर्फ बिल्डरों को उपकृत करने की मंशा साफ़ नज़र आती है। विभाग ने अपने ही नियमों को धता बताते हुए इस नए नियम से बड़े कॉलोनाइजरों और डेवलपर की खुलकर मदद की है।

सरकार के प्रस्ताव से नाराज़ लोगों का तर्क है कि शहर के बाहर स्पेशल टाउनशिप बनाने के बजाए पहले सरकार को पुनर्घनत्वीकरण योजना के तहत शहर के पुराने, जर्जर भवनों के स्थान पर बहुमंजिला भवन बनाना चाहिए। स्पेशल टाउनशिप बनाए जाने से पर्यावरण भी प्रभावित होगा और खेती के लिए भी कम जमीन बचेगी। कोई भी कृषि भूमि पर टाउनशिप विकसित कर सकेगा, जिससे कृषि भूमि के परिवर्तन के मामलों में अंधाधुंध बढ़ोतरी होगी। जमीनों को लेकर अंग्रेजों द्वारा 1894 में बनाये गये कानून की आड़ में सरकारी ज़मीनों की खरीद फ़रोख्त का सिलसिला ज़ोर पकड़ चुका है । कृषि योग्य जमीन का अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने पर उतारु सरकारें सरकारी संपत्ति की लूट खसोट के लिये जनता द्वारा सौंपी गई ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रही हैं । सरकारी संपत्ति पर जनता का पहला हक है। लेकिन आम लोगों को अँधेरे में रखकर सरकार पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली की तरह काम कर रही है । सरकार को उसकी हैसियत बताने के लिये अनता को अपनी ताकत पहचानना होगा और जागना होगा नीम बेहोशी से । फ़िलहाल तो आम जनता के हाले दिल का आलम कुछ यूँ है कि " भरोसा कर लिया जिन पर उन्हीं ने हम को लूटा है,कहाँ तक नाम गिनवाएँ सभी ने हम को लूटा है ।"

सोमवार, 14 जून 2010

कौन बाँटेगा गैस पीड़ितों का दर्द

गैस त्रासदी पर सीजेएम का फ़ैसला गैस पीड़ितों के ज़ख्मों पर नमक साबित हुआ है । फ़ैसला आने के बाद से मीडिया में आये दिन हो रहे खुलासों ने भारतीय राजनीति के चरित्र को उजागर कर दिया है । अदालती फ़ैसले ने कई चेहरों और देश की प्रमुख सियासी पार्टियों के चेहरे पर पड़े नकाब नोच दिये हैं । आज सब एक सुर में अर्जुन सिंह से जवाब माँग रहे हैं,लेकिन क्या वे अकेले ही गैस पीड़ितों के गुनाहगार हैं ? आज मोती सिंह अर्जुन सिंह को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं,एक वक्त में वे तत्कालीन मुख्यमंत्री के बेहद करीबी थे । क्या उन्होंने अपनी भूमिका को ठीक से अंजाम दिया ? अगले ही साल वीरता पुरस्कार हासिल करने पुलिस अधिकारी स्वराज पुरी की बहादुरी का सच जनता के सामने आ चुका है ।
गैस राहत मंत्रियों के तौर पर काम करने वाले नेताओं की कारगुज़ारियाँ भी किसी से छिपी नहीं हैं । क्या ये सभी यूनियन कार्बाइड के आला अफ़सरों से कम कसूरवार हैं ? क्या सरकारी खर्च पर कमेटी बनाकर कुछ लोगों को लाभ पहुँचाने की मुख्यमंत्री की हालिया कवायद से एंडरसन को भारत लाने और उसे सज़ा दिलाने की कोई सूरत बनती दिखाई देती है ? एक बार फ़िर गरीब और असहाय जनता को न्याय दिलाने के सब्ज़बाग दिखाकर अपनी सियासत चमकाने की कोशिशें ज़ोर पकड़ने लगी है ।
वारेन एंडरसन की कंपनी से निकले ज़हरीले रसायन ने तो कई लोगों को उसी रात मौत की नींद सुला दिया । हज़ारों लोग पिछले पचीस सालों से तिल-तिल कर मर रहे हैं । यूनियन कार्बाइड से फ़ैले प्रदूषण पर देश दुनिया में बरसों से खूब चर्चा भी हो रही है । इस बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ किसी भी तरह की हमदर्दी हो ही नहीं सकती । क्या इस मसले की आड़ लेकर सियासी दाँवपेंच चल रहे नेताओं के अपराध को नज़र अंदाज़ किया जा सकता है ?
एक बार फ़िर गैस पीड़ितों की पीड़ा का मसला राजनीतिक दलों की उठापटक में दम तोड़ता दिखाई दे रहा है । मीडिया भी जाने अनजाने राजनेताओं की कठपुतली से इतर अपनी भूमिका साबित नहीं कर सका है । आपसी जूतम पैजार में गैस पीड़ितों के मूल मुद्दे बड़ी ही चतुराई से एक बार फ़िर दरकिनार किये जा रहे हैं । घोटाले भारतीय लोकतंत्र की त्रासदी बन चुके हैं । लाशों पर होने वाली राजनीति का प्रदूषण यूनियन कार्बाइड से फ़ैले रासायनिक प्रदूषण से कम खतरनाक नहीं है ।
गैस पीड़ितों के दर्द को समझने के लिये उनकी बस्तियों में जाने की किसी नेता को फ़ुर्सत नहीं है । बयानों से अपनी वीरता के झंडे गाड़ने वाले मुख्यमंत्री लगातार मीडिया का जमावड़ा लगाकर केन्द्र सरकार और अर्जुन सिंह से खतो किताबत का ब्यौरा देने में मसरुफ़ हैं । मामले को सियासी रंग देने के लिये एक कमेटी बनाकर कुछ लोगों को रोज़गार देने का "भारी भरकम" काम ज़रुर किया है,लेकिन सवाल फ़िर वही कि आखिर अब तक सभी सो क्यों रहे थे । वैसे भी इस सियासी प्रपंच में गैस पीड़ितों के दर्द की कोई दवा नहीं है । अगर इनकी नीयत में ईमानदारी थी तो गैस पीड़ित बस्तियों में अब तक साफ़ पेयजल मुहैया क्यों नहीं हो सका ? खोखले हो चुके शरीरों का बोझ ढ़ोते लोगों का पुनर्वास क्यों नहीं हो सका ? बोझिल लोगों के लिये कम मेहनत वाले रोज़गार मिल सके,इसकी व्यवस्था अब तक क्यों नहीं हो सकी ? गैस पीड़ितों के नाम पर आये पैसों की बंदरबाँट में कोई भी दल पीछे नहीं है । कोई कार्बाइड के नये मालिक डाउ केमिकल को बचाने के नाम पर लूट रहा है , तो कोई रासायनिक कचरे को खत्म करने के ढ़ोंग के ज़रिये तिजोरी भर रहा है ।
संभवतः ये देश की पहली और अनोखी विभीषिका होगी जिसमें केन्द्र या राज्य सरकार ने मुआवज़े के तौर पर धेला भी नहीं खर्चा है , जबकि सड़क हादसे हों या रेल दुर्घटना या फ़िर हवाई हादसे , लाखों के मुआवज़े देने में सरकारें कभी कोताही नहीं करतीं । मगर गैस पीड़ितों को मुआवज़ा देना तो दूर उनके समुचित पुनर्वास, इलाज, रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दों पर बात करना भी किसी राजनीतिक सल को गवारा नहीं है । इस फ़ैसले बाद उठे बवाल ने एक बार फ़िर यह साबित कर दिया है कि सरकारें किसी भी दल की हों भारतीय लोकतंत्र में नेताओं के व्यक्तिगत हित ही सर्वोपरि हैं । अब तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सभी पार्टियों के बीच मौन समझौता हो चुका है सत्तासुख मिल बाँट कर उठाने का । लिहाज़ा सत्ता में दल कोई भी क्यों ना रहे , मलाई सभी मिल बाँट कर खायेंगे । इससे एक बात तो साफ़ हो चुकी है कि गैस पीड़ितों को अपनी आवाज़ अपने तरीके खुद ही बुलंद करना होगी । संघर्ष के सूत्र अपने हाथों में लेना पड़ेंगे ।

शनिवार, 15 मई 2010

ज़रा ज़ुबान सम्हाल कर....!

भाजपा के नये मुखिया ने जोश-जोश में क्षेत्रीय पार्टियों के चंद नेताओं को आइना दिखा दिया,तो क्या गुनाह कर दिया ? वे अकेले तो नहीं हैं जिन्होंने इस तरह की भाषा का प्रयोग किया है । भारतीय राजनीति में यह सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है । एक ज़माने में स्वर्गीय राजीव गाँधी "नानी याद दिला देने" पर आमादा थे । बाद के सालों में "कुत्ते" के सर्वाधिकार मायावती के पास सुरक्षित थे । बदलते दौर के साथ देश में राजनीति कम और दलाली का दौर शुरु हुआ,तो इस स्वामीभक्त प्राणी के "हेय संबोधन" को जनप्रिय बनाने का पूरा-पूरा श्रेय राजनीतिक अड़ीबाज़ माननीय अमर सिंह्जी को जाता है ।
वैसे तो आज के दौर का कोई भी नेता बदज़ुबानी में किसी से पीछे नहीं है । मुलायम,लालू की हल्की बातों को मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये खूब भुनाया और उसके चटखारों से खूब मजमा जुटाया । मगर क्या मीडिया की हिमायत इनकी छिछली टिप्पणियों को जायज़ ठहरा सकती है ? काँग्रेस में भी सत्यव्रत चतुर्वेदी, दिग्विजय सिंह , मनीष तिवारी जैसे महारथियों की भरमार है,जो अपने काम से ज़्यादा ओछी टीका टिप्पणियों के लिये सुर्खियाँ बटोरते हैं ।
वैसे भी हिन्दी में मुहावरेदार भाषा का चलन है,जो बातचीत को रसीला और मज़ेदार बना देता है । फ़िर गडकरीजी ने अपनी बात को इशारों-इशारों में ही तो कहा था । मगर कहते हैं ना कि "चोर की दाढ़ी में तिनका"। लिहाज़ा लालू-मुल्लू ने तुरंत ही जान लिया कि तलवा कौन चाटता है ? बेचारे गडकरी ने तो अपने मुँह से उस स्वामीभक्त प्राणी का नाम भी नहीं उच्चारा था । बहरहाल लालू-मुल्लू सरीखे घाघ नेता ही नहीं गली-मोहल्ले के आवारा कुत्ते भी गडकरी से खफ़ा हो गये हैं । पूँछ में तख्ती टाँगे ये प्राणी भौंक-भौंक कर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं । इनका आरोप है कि गडकरी के बयान से इनकी साख पर बट्टा लग गया है । इन्हें लगता है कि भाजपा के मुखिया ने लालू-मुल्लू के साथ नाम जोड़कर इनकी कौम का मान मर्दन किया है । कई जोशीले नौजवान कुकुर तो गडकरी पर मानहानि का दावा ठोकने की तैयारी में लग गये हैं ।
भाजपा के सांसद रह चुके धर्मेन्द्र ने रुपहले पर्दे पर खलनायक को कुत्ते-कमीने के खिताब से नवाज़ कर खूब तालियाँ भी बटोरीं और खूब धन भी समेटा । कुते-कमीनों का खून पीने का सरे आम ऎलान कर लोकप्रियता के शिखर को छूने वाले धरमिन्दर पाजी बाद के सालों में संसद के गलियारे में भी दाखिल हो गये । गडकरी आरएसएस के आशीर्वाद से बीजेपी के मुखिया तो बन गये हैं , लेकिन चांडाल चौकड़ी के चलते वे गब्बरसिंग की महफ़िल में रस्सी से बँधे "वीरु" से जान पड़ते हैं । वही वीरु जो चिल्ला-चिल्ला बसंती को "कुत्तों के आगे नाचने" से रोकने की कोशिश करता है । पुराने फ़िल्मी गानों के शौकीन गडकरी ने मध्यप्रदेश में हुए भाजपा अधिवेशन के दौरान शिवराजसिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिला कर खूब मंच लूटा था । लगता है कार्यकर्ताओं को चाँडाल चौकड़ी के कब्ज़े से छुड़ा कर अपने खेमे में लाने के लिये गडकरी ने यह दाँव आज़माया होगा ।
वैसे नेताओं को समझना होगा कि सार्वजनिक जीवन में आचार-व्यवहार की मर्यादाओं का ध्यान रखना ही चाहिये । हल्के शब्द तात्कालिक तौर पर फ़ायदा देते दिखाई ज़रुर देते हैं,लेकिन ये ही शब्द व्यक्तित्व की गुरुता को घटाते भी हैं । "ज़ुबान की फ़िसलन" राजनीति की रपटीली ज़मीन पर बेहद घातक साबित हो सकती है । खासतौर से ये खतरा तब और भी बढ़ जाता है,जब विरोधी घर में ही मौजूद हों । देश के प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया की "ज़ुबान का फ़िसलना" और फ़िर "ज़ुबान से पलटना" ना तो खुद उनके लिये अच्छा है और ना ही भाजपा के लिए ....। लिहाज़ा गडकरीजी, ! ज़रा ज़ुबान संभाल कर .........।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

लोकतंत्र की लूटखसोट

पूरे देश में आईपीएल पर मीडियाई हाहाकार मचा हुआ है । हाल ही में शोएब सानिया और आयशा के लव ट्रायंगल पर दिन-रात पसीना बहाने वाले पत्रकारों ने दम भी नहीं लिय था कि मोदी ने अंतरजाल पर चहक-चहक कर अक्सर चहचहाने वाले शशि थरुर की बोलता बंद कर दी । सुनंदा की मित्रता थरुर की कुर्सी पर भारी पड़ गई । काँग्रेस ने नाक बचाने के लिये थरुर की बलि तो ले ली लेकिन अब वह मोदी को भी बख्शने के मूड में नहीं है । तभी तो तेल पानी लेकर पिल गई है मोदी को चारों खाने चित्त करने में ।
वैसे पहले सानिया-शोएब और अब आईपीएल का चखड़बा । देश की मूल समस्याओं की ओर अब किसी का ध्यान भी नहीं है । महँगाई का विरोध करने के लिये पानी की तरह पैसा बहाकर भीड़ जुटाने की बीजेपी की कोशिश भी कुछ रंग नहीं ल सकी । उल्टा हुआ ये कि एयरकंडीशनर की ठंडी हवा के आदी हो चुके नेताओं को गर्म लू के थपेड़ों की आदत ही नहीं रही , लिहाज़ा सूरज की तपिश से रुबरु होते ही गश खा कर गिर पड़े । अब कोई इन नेताओं से पूछे कि महँगाई की सुरसा तो पिछले कई महीनों से लगातार मुँह फ़ाड़ रही है , अब जाकर होश आया ....!!!! गर्म हवा के एक झोंके से चक्कर खाकर गिर जाने वालों से कोई ये भी पूछे कि करोड़ों रुपए फ़ूँक कर एक दिन मजमा जुटा लेने से क्या आम जनता को महँगाई से निजात मिल जायेगी ।
दरासल देश में अजीब सा "केओस" का माहौल है । आम आदमी के पेट में भले ही निवाला नहीं पहुँचे लेकिन संसद में आईपीएल पर बहस में समय ज़ाया करना ज़रुरी है । मीडिया भी बुनियादी समस्याओं से आम लोगों का ध्यान हटाने के लिये नेताओं के सुर में सुर मिलाकर फ़िज़ूल के मुद्दे बना रहा है और उन्हें बेवजह तूल दे रहा है । आखिर नेताओं और उद्योग घरानों की मदद से ही तो उनकी दुकान चलती रह सकती है ।
इधर प्रदेश के अखबार घरानों ने भी एक दूसरे को पटखनी देने के लिये नित नये दाँव खेलना सीख लिया है । अखबार जो कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ था आज लूटतंत्र में अन्य स्तंभों का हमजोली बन गया है । जब से एनजीओ के ज़रिये सरकारी कम कराने का चलन बढ़ा है, इन अखबार मालिकों को समाज सेवा का भी भूत सवार हो गया है । कोई तालाब बचाने के नाम पर पैसा बना रहा है, तो कोई पक्षियों को दाना-पानी देकर वाहवाही लूट रहा है । एक अखबार ने तो इन दिनों कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ़ मुहिम छेड़ रखी है । बेशक नेताओं के काले कारनामे जनता के सामने आना ही चाहिये , मगर इन घपलों को उजागर करने के तरीके अखबार की नीयत पर ही सवाल खड़े करते हैं । आखिर क्या वजह है कि इस अखबार को प्रदेश में सिर्फ़ एक ही मंत्री बेईमान नज़र आ रहा है । अखबार मुख्यमंत्री से न्याय की अपेक्षा कर रहा है , लेकिन क्या इस भोले-भंडारी को यह नहीं मालूम कि मुख्यमंत्री का "डंपर मामला" अब भी लोकायुक्त के पास धूल चाट रहा है । गर अखबार सचमुच प्रदेश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहता है,तो सरकार के मुखिया के कारनामों को उजागर करता ?
व्यक्ति विशेष के खिलाफ़ चलाई जा रही मुहिम में व्यक्तिगत दुर्भावना या विद्वेष की बू आती है । कहीं ऎसा तो नहीं कि इंदौर में पैर जमाने में अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से नाराज़ होकर मंत्री जी की बखिया उधेड़ी जा रही है या फ़िर इंदौर के बीजेपी अधिवेशन के सफ़ल आयोजन के बाद आलाकमान की नज़रों में विजयवर्गीय के नम्बर बढ़ने से खौफ़्ज़दा भाजपाइयों ने ही अखबार को "छू’ कर दिया हो ....! बहरहाल नैतिकता और व्यावसायिक प्रतिबद्धता का दावा करने वाले अखबारों का ये " ब्लेकमेलर" अंदाज़ बेहद शर्मनाक है । अगर अनियमितताओं से पर्दा हटाने क बीड़ा उठाया ही है तो फ़िर निष्पक्षता का हामी होना भी ज़रुरी है । राजनीतिक शुचिता के देश की मौजूदा व्यवस्था में शायद अब कोई जगह बची ही नहीं है ।
जो मुख्यमंत्री केबिनेट में शहर की सरकारी बेशकीमती ज़मीनें कई रसूखदारों को बाँट दे, जो खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हो , अधिकारियों और दिल्ली में बैठे नेताओं के हाथ की कठपुतली बना हुआ हो , वो सिर्फ़ लच्छेदार भाषण देकर लोगों को भरम सकता है, उनकी भलाई के बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठा सकता । कल यानी तेइस अप्रैल के पत्रिका के सातवें पन्ने पर एक सरकारी उदघोषणा प्रकाशित की गई है । इसमें शहर के महँगे इलाके सिंगारचोली की १.२८ एकड़ सरकारी ज़मीन मुम्बई के एस्सार ग्रुप को कार्यालय खॊलने के लिये आवंटित करने की बात कही गई है । नजूल अधिकारी ने पंद्रह दिन में आपत्तियाँ मँगाई हैं । क्या सरकारी ज़मीनें औने-पौने दामों में रामदेव जैसे योग के व्यापारी,धर्म या समाज का ठेकेदारों,फ़र्ज़ी समाजसेवी संस्थाओं को आवंटित करने का हक इन नेताओं महज़ इस लिये मिल जाना चाहिये क्योंकि ये येनकेन प्रकारेण सत्ता पर काबिज़ हैं । इस बँदरबाँट में राजनीतिक दलों का कोई भेद नहीं बचा है । सत्ता किसी भी पार्टी की हो, नेता सब बाँट कर खाने मामले में एक हो चुके हैं । सरकारी संपत्ति को इन लुटेरों से बचाने के लिये जनता को ही कोई रास्ता तलाशना होगा ।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

अकेले नौकरशाह ज़िम्मेदार नहीं

मध्यप्रदेश में आईएएस दंपति के लॉकर सोने- चाँदी और हीरे जवाहरात उगल रहे हैं । उनके बंगले से मिली पाँच सौ और हज़ार के नोटों की गड्डियों को गिनने के लिये आयकर विभाग के अमले को पसीने आ गये । आलम ये रहा कि नोट गिनने वाली मशीन को भी अपना काम अंजाम देने में घंटों लग गये । छापे से जहाँ नौकरशाही में हड़कंप मचा है , वहीं आम जनता हैरान है । कई लोग तो दबी ज़ुबान में कह रहे हैं कि इतना कैश घर में रखने की ज़रुरत ही क्या थी ? लेकिन कुछ लोग ऎसे भी हैं जिनकी राय में यह तो प्रदेश ही क्यों समूचे देश में मचे भ्रष्टाचार के तांडव की बानगी भर है ।


सूबे के मुखिया सारे काम धाम छोड़कर आये दिन प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के अभियान पर निकल पड़ते हैं । ग्रामीणों को भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनने की सीख देते हैं । लोगों को काली कमाई से दूर रहने की सौगंध दिलाते हैं और थके माँदे राजधानी लौटकर अफ़सरशाही की मदद से अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लग जाते हैं । मौजूदा दौर में ये माना जा चुका है कि काम करने से सरकार नहीं चलती । सरकार की स्थिरता के लिये अपने आकाओं की खुशामद ज़रुरी है ।

नितिन गडकरी की ताजपोशी के बावजूद बीजेपी में आज भी एक साथ कई मुखिया हैं । लिहाज़ा "कुर्सी बचाने" के लिये इन सभी तक "खर्चा-पानी" पहुँचाना ज़रुरी है । नौकरशाही को भी लगने लगा है कि नेताओं के लिये जब कमाई करना ही है , तो क्यों ना बहती गंगा में हम भी हाथ धो लें । वे भी जानते हैं कि एक गुनाह की भी वही सज़ा है , जो हज़ार गुनाहों की । "फ़ंड के फ़ंडे" में उलझे नेताओं की हकीकत को जानने के बाद अब नौकरशाही पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है ।

मुख्यमंत्री शासन - प्रशासन को स्वच्छ कर देने के दावे तो आये दिन करते रहते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है । किसानों को खाद - बीज देने का मामला हो या सिंचाई नहरों का, गरीब ग्रामीण बेहाल और नेता, ठेकेदार, अफ़सरान मालामाल । आँकड़े गवाही देते हैं कि किस तरह ग्रामीण अंचलों में बच्चे कुपोषण और भूख से मर रहे हैं, लेकिन पोषाहार सप्लाई में मची बँदरबाँट से लोकतंत्र का ताकतवर गठजोड़ दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होता जा रहा है । जनता की गाढ़ी कमाई से इकट्ठा काली कमाई तिजोरियों का पेट भर रही रही है और प्राण लेने पर उतारु महँगाई की मार झेल रहा आम आदमी दो वक्त की रोटी के लिये भी जद्दोजहद कर रहा है । गरीबों के कल्याण के लिये बनी नरेगा जैसी तमाम योजनाएँ समाज के उच्च वर्ग की रातों को रंगीन, नशीला और रुमानी बनाने वाली साबित हो रही हैं ।

प्राइवेट कंपनियों की बीमा पॉलिसियाँ कारोबारियों,अफ़सरों और नेताओं की काली कमाई को उजला बनाने की " फ़ेयर एंड लवली" साबित हो रही है । लोगों से जीने का बुनियादी हक छीनने वाले जीवन सुरक्षा में निवेश कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये "कारु का खज़ाना" तैयार कर रहे हैं । काँग्रेस के एकछत्र राज्य में मचे घटाटोप में बीजेपी एक उम्मीद की किरण बन कर आई थी, लेकिन नाकारा नेतृत्व और सत्ताधारी दल के साथ मिल बाँट कर खाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने आम जनता के भरोसे का खून कर दिया है ।

प्याज के मुद्दे पर सरकार हिला देने की ताकत रखने वाली लोकशाही में दाल-रोटी ही नहीं, बिजली-पानी भी महँगा हो गया है । बेतहाशा फ़ैलते प्रदूषण ने लोगों का साँस लेना भी दूभर कर दिया है । लेकिन आम आदमी की आवाज़ उठाने की किसी को फ़िक्र भी नहीं है और ना ही फ़ुर्सत है । महँगाई से परेशान लोगों के आँसू निकलने लगे हैं । चारों तरफ़ हाहाकार मचा है, ऎसे में विपक्ष की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है । कहीं ये मौन लोकतंत्र के किसी नये गठबंधन का संकेत तो नहीं ? कहीं ऎसा तो नहीं कि वोट लेने के बाद सत्ता और विपक्ष में साँठगाँठ हो गई है । क्या विपक्ष चुप्पी साधने की कीमत वसूल कर आम आदमी की पीड़ा से मुँह फ़ेर चुका है ?

मौजूदा हालात तो लोकतंत्र के इस बदनुमा चेहरे को ही उजागर कर रहे हैं । लेकिन नेताओं को जनता के सब्र का इतना भी इंम्तेहान नहीं लेना चाहिए कि तकलीफ़ें उन्हें सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दे । मगरुर नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पीड़ा से तड़पती जनता जब सड़कों पर आती है, तो कई वटवृक्षों को जड़ से उखाड़ने की ताकत रखती है । बीजेपी नेतृत्व को समझना होगा कि सता चाहे जितनी मदमस्त क्यों ना हो विपक्ष के मज़बूत और बुलंद इरादों के सामने उसे घुटने टेकना ही पड़ते हैं । जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठाने के लिये पार्टी को नैतिक मूल्यों को दोबारा से प्रतिष्ठित करना होगा और इसके लिये ज़रुरत होगी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा साहसिक फ़ैसले लेकर उन्हें अमलीजामा पहनाने की ।