मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

अकेले नौकरशाह ज़िम्मेदार नहीं

मध्यप्रदेश में आईएएस दंपति के लॉकर सोने- चाँदी और हीरे जवाहरात उगल रहे हैं । उनके बंगले से मिली पाँच सौ और हज़ार के नोटों की गड्डियों को गिनने के लिये आयकर विभाग के अमले को पसीने आ गये । आलम ये रहा कि नोट गिनने वाली मशीन को भी अपना काम अंजाम देने में घंटों लग गये । छापे से जहाँ नौकरशाही में हड़कंप मचा है , वहीं आम जनता हैरान है । कई लोग तो दबी ज़ुबान में कह रहे हैं कि इतना कैश घर में रखने की ज़रुरत ही क्या थी ? लेकिन कुछ लोग ऎसे भी हैं जिनकी राय में यह तो प्रदेश ही क्यों समूचे देश में मचे भ्रष्टाचार के तांडव की बानगी भर है ।


सूबे के मुखिया सारे काम धाम छोड़कर आये दिन प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के अभियान पर निकल पड़ते हैं । ग्रामीणों को भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनने की सीख देते हैं । लोगों को काली कमाई से दूर रहने की सौगंध दिलाते हैं और थके माँदे राजधानी लौटकर अफ़सरशाही की मदद से अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लग जाते हैं । मौजूदा दौर में ये माना जा चुका है कि काम करने से सरकार नहीं चलती । सरकार की स्थिरता के लिये अपने आकाओं की खुशामद ज़रुरी है ।

नितिन गडकरी की ताजपोशी के बावजूद बीजेपी में आज भी एक साथ कई मुखिया हैं । लिहाज़ा "कुर्सी बचाने" के लिये इन सभी तक "खर्चा-पानी" पहुँचाना ज़रुरी है । नौकरशाही को भी लगने लगा है कि नेताओं के लिये जब कमाई करना ही है , तो क्यों ना बहती गंगा में हम भी हाथ धो लें । वे भी जानते हैं कि एक गुनाह की भी वही सज़ा है , जो हज़ार गुनाहों की । "फ़ंड के फ़ंडे" में उलझे नेताओं की हकीकत को जानने के बाद अब नौकरशाही पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है ।

मुख्यमंत्री शासन - प्रशासन को स्वच्छ कर देने के दावे तो आये दिन करते रहते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है । किसानों को खाद - बीज देने का मामला हो या सिंचाई नहरों का, गरीब ग्रामीण बेहाल और नेता, ठेकेदार, अफ़सरान मालामाल । आँकड़े गवाही देते हैं कि किस तरह ग्रामीण अंचलों में बच्चे कुपोषण और भूख से मर रहे हैं, लेकिन पोषाहार सप्लाई में मची बँदरबाँट से लोकतंत्र का ताकतवर गठजोड़ दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होता जा रहा है । जनता की गाढ़ी कमाई से इकट्ठा काली कमाई तिजोरियों का पेट भर रही रही है और प्राण लेने पर उतारु महँगाई की मार झेल रहा आम आदमी दो वक्त की रोटी के लिये भी जद्दोजहद कर रहा है । गरीबों के कल्याण के लिये बनी नरेगा जैसी तमाम योजनाएँ समाज के उच्च वर्ग की रातों को रंगीन, नशीला और रुमानी बनाने वाली साबित हो रही हैं ।

प्राइवेट कंपनियों की बीमा पॉलिसियाँ कारोबारियों,अफ़सरों और नेताओं की काली कमाई को उजला बनाने की " फ़ेयर एंड लवली" साबित हो रही है । लोगों से जीने का बुनियादी हक छीनने वाले जीवन सुरक्षा में निवेश कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये "कारु का खज़ाना" तैयार कर रहे हैं । काँग्रेस के एकछत्र राज्य में मचे घटाटोप में बीजेपी एक उम्मीद की किरण बन कर आई थी, लेकिन नाकारा नेतृत्व और सत्ताधारी दल के साथ मिल बाँट कर खाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने आम जनता के भरोसे का खून कर दिया है ।

प्याज के मुद्दे पर सरकार हिला देने की ताकत रखने वाली लोकशाही में दाल-रोटी ही नहीं, बिजली-पानी भी महँगा हो गया है । बेतहाशा फ़ैलते प्रदूषण ने लोगों का साँस लेना भी दूभर कर दिया है । लेकिन आम आदमी की आवाज़ उठाने की किसी को फ़िक्र भी नहीं है और ना ही फ़ुर्सत है । महँगाई से परेशान लोगों के आँसू निकलने लगे हैं । चारों तरफ़ हाहाकार मचा है, ऎसे में विपक्ष की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है । कहीं ये मौन लोकतंत्र के किसी नये गठबंधन का संकेत तो नहीं ? कहीं ऎसा तो नहीं कि वोट लेने के बाद सत्ता और विपक्ष में साँठगाँठ हो गई है । क्या विपक्ष चुप्पी साधने की कीमत वसूल कर आम आदमी की पीड़ा से मुँह फ़ेर चुका है ?

मौजूदा हालात तो लोकतंत्र के इस बदनुमा चेहरे को ही उजागर कर रहे हैं । लेकिन नेताओं को जनता के सब्र का इतना भी इंम्तेहान नहीं लेना चाहिए कि तकलीफ़ें उन्हें सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दे । मगरुर नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पीड़ा से तड़पती जनता जब सड़कों पर आती है, तो कई वटवृक्षों को जड़ से उखाड़ने की ताकत रखती है । बीजेपी नेतृत्व को समझना होगा कि सता चाहे जितनी मदमस्त क्यों ना हो विपक्ष के मज़बूत और बुलंद इरादों के सामने उसे घुटने टेकना ही पड़ते हैं । जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठाने के लिये पार्टी को नैतिक मूल्यों को दोबारा से प्रतिष्ठित करना होगा और इसके लिये ज़रुरत होगी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा साहसिक फ़ैसले लेकर उन्हें अमलीजामा पहनाने की ।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

पूँजीवादी अमरसिंह लायेंगे समाजवाद

परिवारों में दरार डालने और रिश्तों में दीवार खड़ी करने के लिये ख्याति अर्जित करने वाले अमरसिंह अब की बार मुलायम से अपने हर उपकार का हिसाब एक ही बार में सूद सहित वसूल लेना चाहते हैं । अपनी शिकस्त से बौखलाये अमरसिंह ने अब की बार पार्टी को दो फ़ाड़ करने की ठान ली है । खून के रिश्तों में खटास लाने के अमरसिंह के अचूक नुस्खे पर राम गोपाल यादव और मुलायम सिंह के रिश्तों की मज़बूती भारी पड़ गई । पूँजीवादी अमरसिंह से शायद खाँटी समाजवादियों के देसी मन को पढ़ने में चूक हो गई । तभी तो रिश्तों की मज़बूत डोर से बँधे यादव परिवार से परिवारवाद का आरोप झेलकर पूँजीवाद का कलंक अपने माथे से धो डालने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया ।

आये दिन रुठने मनाने के सिलसिले से आज़िज़ आ चुके मुलायम अमर पर "कड़क" क्या हुए समाजवादी पार्टी में दो फ़ाड़ की नौबत आ गई है । गौरतलब है कि अमर सिंह ने हाल ही में कहा था कि "मैं मुलायमवादी नहीं समाजवादी हूं।" उनके इस बयान पर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं । मुलायमवाद से मोहभंग होने के बाद समाजवादी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने वाले अमर सिंह इन दिनों समाजवाद के किसी नए आयाम की तलाश कर रहे हैं। हो सकता है कि जल्द ही इसका नतीजा किसी नई पार्टी के गठन के रूप में सामने आए। अमर सिंह ने कई राजनीतिक कार्यक्रमों की घोषणा की है । माना जा रहा है कि इसके ज़रिए वह मौजूदा राजनीतिक स्थिति को पढ़ना चाहते हैं । अमर सिंह के मुताबिक़ वह ''सच्चे समाजवादी'' मध्य प्रदेश के नेता रघु ठाकुर से मिलना चाहेंगे और रामपुर, मथुरा और ग़ाज़ीपुर में कार्यक्रमों में हिस्सा लेना चाहते हैं ।

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि सिंह पुराने समाजवादियों को इकटठा कर नया मोर्चा बनाने की कोशिश कर सकते हैं जिसे समाजवादी विचारधारा से जुड़े किसी नए राजनीतिक दल की शक्ल दी जा सकती है। कल तक खुद को मुलायम का दर्ज़ी यानी खुले तौर पर मुलायमवादी होने का दावा करने वाले अमरसिंह अब पार्टी के लिये "अमरबेल" साबित हो रहे हैं । समाजवाद को पूँजीवाद की चाट लगाकर चकाचौंध से भरी सिनेमाई दुनिया की रंगीनियों की सैर कराने वाले ठाकुर साहब अब एक ही झटके में पार्टी को बेनूर कर देने पर आमादा हैं ।

संभावनाओं की सियासत के बड़े खिलाड़ी अमर सिंह सुर्खियों में रहने के गुर बखूबी जानते हैं । हाल के दिनों में फ़िल्मी सितारों की चमक दमक में गुम हो चुकी समाजवादी पार्टी में एक दौर वो भी था तब बेनी प्रसाद का जलवा हुआ करता था, जनेश्वर मिश्र संसद में बोलने उठते थे लेकिन उनको सुनते थे। राम गोपाल यादव पार्टी की राजनीति में निर्णायक माने जाते थे और मुलायम समेत इन सबको समाजवादी माना जाता था। ये अमर सिंह के कैरियर का शुरुआती दौर था। लेकिन अमर धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी की मुख्य धारा बन गये और बेनी प्रसाद हाशिये से होते-होते बाहर, जनेश्वर पार्टी मे सजावट की चीज बन गये । राम गोपाल यादव कैकेयी की भूमिका में दिख्ने लगे। भाई मुलाय़म का प्रोफाइल अचानक काफी बढ गया, धुर गँवई "नेताजी" अमिताभ और अनिल अंबानी के संग सोहने लगे। भाई पर अमर प्रेम का ऐसा नशा चढ़ा कि अमर सिंह समाजवाद की पहचान बन गये ।  लोग कनफ्यूज्ड कि ये अमर सिंह का प्रमोशन था या फिर मुलामय का डिमोशन।

छन-छन कर आ रही खबरों के मुताबिक अमर सिंह पुराने समाजवादी और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघु ठाकुर के लगातार संपर्क में हैं । सिंह ने फोन पर उनसे संपर्क कर कहा है कि वे उनके रचनात्मक कार्यो से जुडना चाहते हैं। मध्यप्रदेश के सागर के निवासी और समाजवादी पार्टी के अनेक दिग्गज नेताओं के सहयोगी रहे ठाकुर ने कहा कि अमर सिंह ने उनसे मिलने की इच्छा भी जताई है। संभवत: 25 जनवरी को दिल्ली में अमर सिंह और रघु ठाकुर की मुलाकात होगी।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

युवराज की क्लास पर मचा बवाल

दलितों के घर खाना खाने और रात बिताने के बाद काँग्रेस के युवराज आजकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी की खाक छान रहे हैं । कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी  के विश्वविद्यालयों के दौरे से राजनीति गरमा गई है। बीजेपी सांसद अनिल दवे  काँग्रेस के युवराज से होड़ की ठान बैठे हैं । अब राहुल युवाओं के बीच कितनी पैठ बना पाये हैं , यह तो फ़िलहाल कह पाना मुश्किल है । लेकिन भाजपा संसाद अनिल माधव दवे ने विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को पत्र लिखकर राहुल की तर्ज पर बतौर सांसद उन्हें भी अपने यहां छात्रों से संवाद कायम करने के लिए आमंत्रित करने की माँगकर धर्मसंकट में डाल दिया है।

 मुख्यमंत्री का कॉलेज कैंपस को राजनीति से दूर रखने का बयान और सांसद का भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और सागर यूनिवर्सिटी के प्रमुखों को लिखा गया पत्र बताता है कि बीजेपी हाथ आये इस मुद्दे को हवा देकर राजनीतिक फ़ायदा लेना चाहती है । दवे ने पत्र में कहा है कि राहुल की तर्ज पर बतौर सांसद उन्हें भी छात्रों से संवाद कायम करने के लिए आमंत्रित किया जाये । हाल ही में कोपेनहेगन सम्मेलन से लौटे दवे का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग का विषय छात्रों में जाना समसामयिक है। इसलिए शिक्षण संस्थानों में राहुल गांधी की तरह उनका भी कार्यक्रम आयोजित हो।

इंदौर में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में राहुल के कार्यक्रम को लेकर राज्य सरकार के उच्च शिक्षा आयुक्त ने कुलपति और रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया है। उच्च शिक्षा आयुक्त ने कुलपति अजित सहरावत और रजिस्टार आरडी मुसलगांवकर को नोटिस जारी कर पूछा है कि कांग्रेस नेता के राजनीतिक कार्यक्रम की इजाजत किसने दी? मंगलवार को राहुल ने यहाँ विद्यार्थियों से रू-ब-रू होकर राजनीति में सक्रिय होने को कहा था। दूसरी ओर भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर ने गोवा विवि कैंपस में राहुल के राजनीतिक कार्यक्रम को अनुमति दिए जाने के लिए रजिस्टार को बर्खास्त करने की माँग की है। इससे पहले कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति राहुल गाँधी को कार्यक्रम के लिए आमंत्रित करने के मामले में मुख्यमंत्री मायावती के कोपभाजन बने थे ।

नोटिस के सवाल पर दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को अपने गिरेबाँ में झाँकने की नसीहत दे डाली है । दिग्विजय ने पलटवार करते हुए पूछा कि मुख्यमंत्री बताएं कि वे कितनी बार विश्वविद्यालयों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में गए हैं। जहां तक राहुल गांधी के विश्वविद्यालय के दौरों का सवाल है, तो उन्हें आमंत्रित किया गया था। सिर्फ नोटिस देने का कोई मतलब नहीं है, चौहान को राजनीतिक लड़ाई लड़ना चाहिए। राहुल के बचाव में उतरे एक अन्य काँग्रेस महासचिव और मध्यप्रदेश के प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा-धर्म के नाम पर और राम का नाम बेचकर राजनीति करने वाले मुख्यमंत्री को राहुल गांधी के नाम पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

नौजवानों के बीच जा-जाकर राहुल ने राजनीति में अपराधियों को आने से रोकने की बात कही । यूनिवर्सिटी के छात्रों को राहुल की क्लास में मजा आया लेकिन विपक्ष भी इस मुद्दे पर चुटकी लेने से नहीं चूका । बीजेपी का काँग्रेस को  मशविरा है कि अच्छे काम की शुरुआत घर से ही करना चाहिए। ग्वालियर में लक्ष्मी बाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षण संस्थान में राहुल ने नौजवानों से राजनीति में भाग लेने की अपील की।

राहुल ने छात्रों से कहा कि आप लोग एनएसयूआई या यूथ काँग्रेस से जुड सकते हैं लेकिन इसकी पहली शर्त है धर्मनिरपेक्ष सोच और साफ़ सुथरा चरित्र । आप राजनीति को गंदा न समझें जब अच्छे लोग या युवा राजनीति से जुड़ेंगे तभी राजनीति की स्वच्छ छवि बनेगी। उन्होंने कहा कि युवाओं को खुद आगे आकर राजनीति में अपना योगदान करना चाहिए। आने वाले समय में युवा ही भारत की नींव होंगे। मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में निष्पक्ष चुनाव और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को आगे लाने की वकालत करते हुए श्री गांधी ने कहा कि युवाओं का आह्वान किया कि राजनीति में सकारात्मक बदलाव के लिए उन्हें खुद आगे आते हुए इसका हिस्सा बनना चाहिए।

मध्यप्रदेश बीजेपी के अनुभवी नेताओं का एक नौसीखिये राजनीतिज्ञ के दौरे पर बौखलाना बेवजह है । जब तक दिग्विजय सिंह प्रदेश के बाहर की राजनीति कर रहे हैं और जब तक काँग्रेस की कमान जमुना देवी, सुरेश पचौरी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया सरीखे अपनी ढ़पली-अपना राग अलापने वालों के हाथ में रहेगी, बीजेपी सरकार का बाल भी बाँका नहीं हो सकता, जनता कितनी ही नाराज़ क्यों ना हो जाए। राहुल गाँधी की आँधी आई और चली गई । राज्य सरकार काँग्रेस की मदद से बदस्तूर बेखटके राजपाट चला सकती है । मौजूदा हालात पर उस चीड़िया और किसान की कहानी सटीक बैठती है , किसान के मुँह से गाँव वालों और फ़िर रिश्तेदारों-दोस्तों के भरोसे फ़सल काटने की बात सुनकर निश्चिंत रहने वाली चिड़िया अपने बच्चों को लेकर खेत से उस वक्त तक फ़ुर्र नहीं होती , जब तक किसान खुद फ़सल काटने की तैयारी नहीं कर लेता । लिहाज़ा बीजेपी के पास अभी पूरे-पूरे चार साल हैं -जल,जंगल और ज़मीन बेचकर अपनी झोली भरने के .......।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

चेहरा बदला, क्या चाल-चरित्र बदलेगा ....?

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में हाल के दोनों में दो अहम बदलाव हुए हैं । भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ लोकसभा में विपक्ष का नेता भी बदल गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अब लालकृष्ण आडवाणी नहीं सुषमा स्वराज होंगी, तो राजनाथ सिंह के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान नितिन गडकरी ने संभाली है। इस साल लोकसभा चुनाव में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व युवा नेताओं के हाथ में सौंपने की माँग उठ रही थी । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या इस बदलाव से भाजपा का कुछ भला हो पाएगा ? क्या पार्टी इनके नेतृत्व में बुरे दौर से निकल पाएगी ? क्या आडवाणी की राजनीतिक पारी भी समाप्ति की ओर है?


गौरतलब है कि आडवाणी के लिए संसदीय दल के संविधान में संशोधन करके काँग्रेस की तर्ज़ पर विशेष जगह बनाई गई है । उनका राजनीतिक कैरियर सुरक्षित करने की गरज से उठाये गये इस कदम की बदौलत लालकृष्ण आडवाणी अब संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बन गए हैं। यानि सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार अब भी उनके पास सुरक्षित है। भाजपा के इस लौहपुरूष को पिघलाना आसान बात नहीं है, यह बात एक बार फिर साबित हो गयी है। भले ही संसदीय दल का नेता नहीं होने के कारण कैबिनेट मंत्री का दर्जा छिन गया हो, मगर लालकृष्ण आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष के रूप में पार्टी पर वर्चस्व बनाए रखेंगे। आडवाणी की राजनीतिक बुलंदियाँ छूने की महत्वाकांक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं, यह मानना भूल होगी। हिन्दुत्व के एजेंडे को बुलंद करते हुए भाजपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में आडवाणी का हाथ रहा, बावजूद इसके वे कभी प्रधानमंत्री पद पर नहीं पहुँच पाए। लोकसभा में पार्टी की सिमटती सीटों के बावजूद हार उन्होंने नहीं मानी है, विरोधियों को चतुराई से किनारे किया और वे अब भी बैक सीट ड्राइविंग करते हुए एक तरह से पार्टी को अपनी पसंद की राह पर चलवा रहे हैं। भाजपा का युवा अवतार कितनी दूर तक वरिष्ठों के कहे अनुसार चलेगा, यह देखने वाली बात रहेगी।

भारतीय जनता पार्टी संक्रमण के दौर में है। नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर दोहरे संकट को झेलती पार्टी को पटरी पर लाने के लिये नितिन गडकरी को संघ के समर्थन का नैतिक बल ज़रुर हासिल होगा । लेकिन इससे उनकी राह बहुत आसान नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा बड़ी हो गई है और बदल भी गई है । भाजपा के संक्रमण का एक पहलू यह भी है कि मौजूदा चुनौतियों के संदर्भ में एक सैद्धांतिक आधारभूमि भी तलाशना है । जिससे वह ऊर्जा ग्रहण कर एक राजनीतिक दल के रुप में सार्थक हो सके और अपने समर्थकों को इतना वेगवान बना सके कि वे राजनीतिक शून्यता भरने में कामयाब हो सकें ।

इसके बारे में संघ जितना बेपरवाह है उससे कहीं ज़्यादा उदासीनता भरा रवैया भाजपा का रहा है। भाजपा में पार्टी प्रतिबद्धता का हाल यह है कि संघ नेतृत्व खुलेआम कहने लगा है कि वहाँ कोई भी राष्ट्रीय नेता ऐसा नहीं है ,जो पार्टी और उसके भविष्य की सोचता है । हर कोई अपने में सिमट गया है। भाजपा के जिस विशेषता के लिए जानी जाती थी वह उससे बहुत दूर हो गई है । इसे संघ चाहे भी तो कैसे दूर करेगा ? क्या कोई नया संगठन मंत्री आकर जादूका छड़ी फेर सकता है ? इस समय जो संगठन मंत्री हैं वे बिगड़ी भाजपा के चेहरे हो गए हैं ।

गडकरी की छबि व्यवहार कुशल नेता की है। विचार का जहाँ तक सवाल है वे स्वदेशी के पैरोकार हैं पर वैश्वीकरण से उन्हें बैर भी नहीं है । शनिवार को दिल्ली में पार्टी की कमान संभालने के बाद उन्होंने कहा कि वे पाँच सालों में पहली बार दिल्ली में रात बिताएंगे। यानि उनकी राजनीति महाराष्ट्र के इर्द-गिर्द ही रही। अब एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण और सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। यह समय गठबंधन राजनीति का है। इस नाते तरह-तरह के दलों से पार्टी के संबंधों को मजबूती देना उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। लगातार सिमट रहे जनाधार से पार्टी कार्यकर्ताओं के पस्त पड़े हौसलों को नयी ऊर्जा देना भी एक बड़ा काम रहेगा और सबसे बड़ी चुनौती रहेगी पार्टी के भीतर मौजूद दिग्गजों के अहं को संतुष्ट करते हुए आपसी तालमेल बनाए रखते हुए भाजपा की सभी प्रदेश ईकाइयों को नया जोश देना।

गडकरी के जरिए संघ, भाजपा पर नियंत्रण रखना चाहता है। हालाँकि बदलती परिस्थितियों में यह कितना कारगर होगा, यह कहना कठिन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अपनी पसंद के नितिन गडकरी को बीजेपी में ले तो आये हैं, वे अभी तक राज्य स्तर के नेता रहे हैं लेकिन देश के मुख्य विपक्षी दल का अध्यक्ष होने की पात्रता उनमें कितनी है, यह अभी रहस्य बना हुआ है। अगर वे असफल होते हैं तो यह संघ नेतृत्व की असफलता कही जाएगी और ये आरोप लगेगा कि संघ के महाराष्ट्रीय ब्राह्मण नेतृत्व ने एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण को पार्टी पर भी थोप दिया।

भाजपा इस समय एक ऐसी पार्टी बन चुकी है जिसे अपनी दिशा मालूम नहीं और दो लोकसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि हिन्दुत्व की लाइन पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुई है। आम जनता हिन्दुत्व की राजनीति की निरर्थकता को समझ चुकी है और अब इससे निकलना चाहती है। लोग शायद अब जातिवाद की राजनीति से भी ऊब चुके हैं और उससे भी बाहर आने का रास्ता तलाशाना चाहते हैं। भाजपा विकास से ज़्यादा धर्म के एजेंडे पर ध्यान देती आई है लेकिन देश का आम आदमी अब जागरुक हो चुका है। लोग देश का विकास, शिक्षा और रोजगार चाहते हैं। बढ़ती महंगाई और रोज़गार के घटते अवसरों के बीच लोग समझ चुके हैं कि धर्म से पेट नहीं भरता। खराब बुनियाद पर बने घर,साम्प्रदायिक और धार्मिक नीति की बुनियाद पर बने राष्ट्र और साम्प्रदायिक और धार्मिक सोच से चलती पार्टी का अस्तित्व बहुत दिनों तक नहीं कायम नहीं रहता है ।

भाजपा के दो प्रमुख पदों पर परिवर्तन से कुछ होने वाला नहीं है. पार्टी तभी मजबूत होगी जब पार्टी का एजेंडा बदला जाए ।  मुखौटा बदलने की बजाए भाजपा को विचारधारा बदलने की आवश्यकता है । अब तक तीन वैचारिक लाइन ली हैं । गांधीवादी समाजवाद. इसे 1985 में छोड़ा और एकात्मक मानववाद को अपनाया । 1987 से वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लाइन पर है । इसने भाजपा को अयोध्या आंदोलन में एक भूमिका दी । लेकिन भाजपा की समस्या इसी से शुरू होती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वो ऐसे ठोस नारे में नहीं बदल सकी है जो लोगों के गले उतरे । इसके लिए जिस तरह की सैद्धांतिक समझ और चारित्रिक दृढ़ता चाहिए वो आज ना भाजपा में है ना ही संघ में । सतही सत्ता के खेल में उलझी भाजपा का वैचारिक द्वंद उस समय बेक़ाबू हो गया जब वह चुनाव में हारने लगी । भाजपा की अनेक धाराएँ हो गई हैं । खुलकर बहस की गुंजाइश ख़त्म है । असहमति को वहाँ विरोध समझ लिया जाता है, गिरोहबंदी में फंसी भाजपा को संघ का हंटर कितना सुधार सकेगा?

बीजेपी को पटरी पर लाने के लिये गडकरी को चाँडाल चौकड़ी से छुटकारा पाना होगा । उन्होंने सेतुबन्ध बनाकर कई दुर्गम राहों पर सफ़र आसान बनाने की योजनाओं को सफ़लता से साकार किया है । विकास की राजनीति वक्त की ज़रुरत है लेकिन गडकरी को समझना होगा कि जर्जर बुनियाद पर मज़बूत इमारतें खड़ी करना नामुमकिन होता है । इमारत की बुलंदी काफ़ी हद तक बुनियाद की मज़बूती पर निर्भर करती है । ज़ाहिर बात है कि विकास के इतिहास में विध्वंस की कहानी भी दर्ज़ होती है । कई मर्तबा पुख्ता ज़मीन तैयार करने के लिये डायनामाइट लगाना ज़रुरी हो जाता है । बीजेपी के लाइलाज मर्ज़ से निपटने के लिये गडकरी को सर्जरी की दरकार होगी । कुशल डॉक्टर जानता है कि जीवन सुरक्षित रहे तो अंगदान करने वालों की कमी नहीं रहती ।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

राजनीति के अखाड़े में "मैच फ़िक्सिंग"

भोपाल नगर निगम में तीसरी पारी खेलने का सपना देख रही काँग्रेस ने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है । दर असल बाबूलाल गौर और कृष्णा गौर को मतदाताओं का शुक्रिया अदा करने से पहले काँग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी का भी एहसानमंद होना चाहिए, जिन्होंने गुमनाम चेहरे को टिकट देकर ससुर-बहू की "अलबेली जोड़ी" का ख्वाब पूरा करने में अप्रत्यक्ष तौर पर भरपूर मदद की । वरना बीजेपी के दिग्गजों और खुद मुख्यमंत्री ने गौर के बरसो से सँजोये ख्वाब को चकनाचूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी ।

भोपाल में बीजेपी की जीत का सेहरा काँग्रेस के सिर ही बाँधा जाना ठीक रहेगा । कृष्णा गौर को काँटे की टक्कर के बाद मिली जीत ने कई नये सवालों को जन्म दे दिया है । ये जीत "अँधों के हाथी" से कम नहीं । राजनीतिक विश्लेषक इसमें कई एंगल तलाश सकते हैं । संगठन और सत्ता की ताकत के बावजूद पार्टी को महापौर का चुनाव जीतने में पसीना आ गया। पार्टी का गढ़ माने जाने वाले विधानसभा क्षेत्रों में न केवल कांग्रेस ने सेंध लगाई बल्कि अपना वोट बढ़ाकर आखिरी तक भाजपा को साँसत में भी रखा। भाजपा नेताओं द्वारा बढ़त को लेकर किए गए दावे फेल हो गए।

इस सीट पर पूरे प्रदेश की निगाह लगी हुई थी। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हुए पार्टी ने तमाम अंतर्विरोध के बावजूद सामान्य महिला सीट पर पिछड़े वर्ग की कृष्णा गौर को मैदान में उतारा और स्थिति को अपने अनुकूल बनाने के प्रयास किए। हालाँकि गौर ने काँग्रेस उम्मीदवार आभा सिंह को काँटे की टक्कर में 15 हजार से अधिक मतों से हराकर प्रतिष्ठित महापौर सीट काँग्रेस से छीन ली । लेकिन वोटों का अँतर और काँग्रेस को मिले मतों की संख्या पर गौर करें, तो ये आँकड़े जीत के पीछे छिपी करारी शिकस्त की चुगली करते हैं । भाजपा प्रत्याशी कृष्णा गौर को 2 लाख 62 हजार 214 मत मिले, जबकि आभा सिंह को कुल 2 लाख 46 हजार 893 वोट हासिल हुए । यानी उन्होंने काँग्रेस उम्मीदवार आभा अखिलेश सिंह को 15 हजार 321 मतों से मात दी।

गौर करने वाली बात यह है कि भोपाल के सात विधान सभा क्षेत्रों में से छह पर बीजेपी का कब्ज़ा है । साथ ही लोकसभा सीट भी बीजेपी के ही पास है । इस तरह कहा जा सकता है कि फ़िलवक्त भोपाल पूरी तरह भगवा रंग में रंगा हुआ है । बाबूलाल गौर लम्बे समय से "जनता दरबार" सजाकर राजधानी के स्वयंभू नवाब बने बैठे हैं । आये दिन बहू को साथ लेकर भोपाल की नालियों और गली-कूचों का निरीक्षण करना उनका खास शगल रहा है । सरकारी और गैर कार्यक्रमों में शिरकत, भूमि पूजन, गेंती-फ़ावड़ा चलाते हुए फ़ोटो सेशन करा कर अखबारों में कमोबेश हर रोज़ जगह पाने वाली कृष्णा ने शहर के होर्डिंग्स और दीवारों पर भी पिछले चार साल से स्थायी कब्ज़ा जमा रखा था । इतने जानेमाने चेहरे का मुकाबला एक गुमनाम प्रतिद्वंद्वी से होने के बावजूद हार-जीत का फ़ासला महज़ सवा पंद्रह हज़ार वोट ...?

यहाँ यह जान लेना बेहद ज़रुरी हो जाता है कि शहर में कई मतदान केन्द्रों की मतपेटियों को लेकर रवाना हुए ट्रक ने दस मिनट के रास्ते को तय करने में पूरे साढ़े सात घंटे लगाये । साथ ही एक मतपेटी में कुल मतदाताओं की तादाद से भी ज़्यादा वोट पाये गये । आखिरी दो घंटों में जमकर वोटिंग की खबरें हैं । इस वोटिंग की खासियत यह रही कि मतदाताओं को अपनी पहचान बताने के लिये किसी दस्तावेज़ की ज़रुरत ही नहीं थी । खुले आम धाँधली और सरकारी मशीनरी के दुरपयोग के बीच जीत का मामूली अंतर बीजेपी और खास तौर पर बाबूलाल गौर के मुँह पर करारा तमाचा है । यहाँ आभा सिंह के प्रदर्शन की सराहना करना लाज़मी है,लेकिन ये समझना होगा कि काँग्रेस को मिला वोट वास्तव में बीजेपी, बाबूलाल गौर और कृष्णा गौर की खिलाफ़त का वोट है । यह नतीजे के पीछे का सच कहता है कि भोपाल की जनता ने कृष्णा गौर को बुरी तरह नकार दिया है । लेकिन लोकतंत्र में वोटों की तादाद ही असली ताकत है । इससे कोई मतलब नहीं कि आखिर ये वोट मतपेटी में आये किस तरह और डाले किसने ? लिहाज़ा कृष्णा गौर भोपाल की महापौर हैं ।

इतना ज़रुर तय है कि नगरीय प्रशासन विभाग ससुर के पास और भोपाल का मेयर पद बहू के पास हो और दोनों की जुगलबंदी का तमाशा जनता पिछले चार सालों से मुँह बाये देखने को बेबस हो , तो भोपाल के दुर्भाग्य पर अफ़सोस जताने के सिवाय कुछ बाकी नहीं रहता । भूमाफ़िया और बिल्डरों की दुलारी ससुर-बहू की जोड़ी की जुगलबंदी को वक्त रहते नहीं तोड़ा गया,तो वो दिन दूर नहीं जब भोपाल की झील पर बड़ी-बड़ी कोठियाँ बन जायेंगी और पेरिस की जगमगाहट भोपाल में लाने के लिये झील में बड़ा भारी मॉल खड़ा कर दिया जायेगा । राज्य सरकार को नैतिक आधार पर बाबूलाल गौर से नगरीय प्रशासन विभाग लेकर उन्हें कोई और महत्वपूर्ण दायित्व सौंप देना चाहिए । वैसे भी अब तक वे भोपाल के अलावा प्रदेश का कोई और हिस्सा देख ही नहीं पाये हैं ।

प्रदेश में जब से काँग्रेस का मुखिया बदला है,तब से राजनीति का एक नया चेहरा सामने आया है । अब मतदाताओं के पास जाने से पहले प्रतिद्वंद्वी पार्टी के साथ मिलकर "दोस्ताना मुकाबला" करने का चलन शुरु हो गया है । भोपाल में कृष्णा के खिलाफ़ उतारे गये उम्मीदवार का चयन इसी चलन की एक और बानगी है । इससे पहले सुषमा स्वराज के खिलाफ़ विदिशा में राजकुमार पटेल की कारगुज़ारी किसी से छिपी नहीं है । मतदाता इस ठगी से हैरान और परेशान है , लेकिन वो समझ नहीं पा रहा कि राजनीति के इन धूर्तों से कैसे निपटा जाये ? राजनीति में योग्यता की बजाय धन की बढ़ती ताकत के चलते काँग्रेस के दिग्गज नेता जनाधार की बजाय "धनाधार" बढ़ाने में जुट गये हैं । अब तक पार्टी के भीतर ही टिकटों की खरीद-फ़रोख्त हुआ करती थी, लेकिन अब एक घाघ खरीददार ने दिन में देखे सपने को साकार करने के लिये विपक्षी दल से हर कीमत पर सौदा कर लिया । राजनीति का यह नया "ट्रेंड" आने वाले वक्त में क्या गुल खिलायेगा ? वोटर इस दोस्ताना मुकाबलों से कैसे निजात पा सकेगा ? क्रिकेट के बाद राजनीति के अखाड़े में मैच फ़िक्सिंग का बढ़ता चलन लोकतंत्र को किस दिशा में ले जायेगा, यह तो आने वाले वक्त में ही साफ़ हो सकेगा ।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

गलत क्या कहा शिवराज ने ....?

मीडिया की मेहरबानी और ओछी राजनीति के चलते मध्यप्रदेश मे मुख्यमंत्री बैठे ठाले मुश्किल में पड़ गये हैं । स्थानीय लोगों को छोटॆ-मोटे रोज़गार की तलाश में अपना घर द्वार छोड़कर भटकना ना पड़े , इस इरादे से सूबे के मुखिया ने एक बात कह दी , जिसे मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मिर्च-मसाले के साथ परोस दिया । सियासी फ़ायदा उठाने वालों की तो जैसे बन आई । लिहाज़ा बिहार की अदालत में याचिका लगा दी गई । अब बेतिया ज़िले की अदालत के आदेश पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। बेतिया व्यवहार न्यायालय के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मिथिलेष कुमार द्विवेदी के आदेश पर मुख्यमंत्री के खिलाफ धारा 124 (ए), 153 (ए), 153 (बी), 181, 500 और 504 के तहत मामला कायम हुआ है। गौरतलब है कि नौ नवंबर को वकील मुराद अली ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में दाखिल याचिका में आरोप लगाया था कि सतना में बिहारियों के खिलाफ़ दिया गया शिवराज सिंह का भाषण मुख्यमंत्री बनने के समय लिए गए शपथ के विरूद्ध है । यह बिहारवासियों का अपमान है और इससे क्षेत्रवाद फैलेगा।


न्यायालय ने मामला दर्ज़ करने का आदेश दिया है,लेकिन इस पूरे मसले में शिवराजसिंह कहीं भी दोषी नज़र नहीं आते । मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मामले को बेवजह तूल दिया । उनके बयान को गौर से सुनें,तो उसमें ना तो कोई अलगाव पैदा करने वाली बात कही गई थी और ना ही मनसे नेता राज ठाकरे की तरह भड़काऊ बयान दिया गया था । उन्होंने सहज ही जो बात कही वो कतई गलत नहीं थी । बल्कि सूबे के मुखिया होने के नाते उनके नज़रिये में कोई खोट भी नहीं है ।

क्षेत्र में कारखाना और उद्योग लगे और वहाँ का युवा या कामगार दूसरी जगह जाकर काम की तलाश में भटके, तो फ़िर वही हालात पैदा होते हैं , जो फ़िलहाल यूपी-बिहार में हैं । बेरोज़गारी से पनपने वाला असंतोष सामाजिक असंतुलन और अपराधों का सबब बन जाता है । राज्य सरकारों का काम ही है अपने सूबे की तरक्की के लिये कोशिश करना । अगर मध्यप्रदेश में कारखाना लगेगा,तो ज़ाहिर सी बात है स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी ही जाना चाहिए । मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज ने स्थानीय लोगों को नौकरियों में पचास फ़ीसदी प्राथमिकता देने की बात कह भी दी ,तो कौन सा कहर ढ़हा दिया ?

यूपी और बिहार से आकर नौकरी करने वाले सरकारी अफ़सरों ने प्रदेश को लूटने खसोटने में जिस तरह के बुद्धि कौशल और चातुर्य का परिचय दिया है, उसने इन प्रदेशों की छबि देश भर में बिगाड़कर रख दी है । कहते हुए दिल दुखता है लेकिन भाई-भतीजावाद की इससे बेहतर मिसाल क्या होगी कि भिलाई स्टील प्लांट हो या बीएचईएल छोटे और औसत दर्ज़े के सत्तर से अस्सी फ़ीसदी पदों पर बाहरी लोगों का कब्ज़ा है, जबकि स्थानीय कामगार दूसरे शहरों की खाक छान रहे हैं ।
तकनीक के इस दौर में उच्च शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं के लिये देश ही नहीं विदेशों में भी रोज़गार के तमाम मौके हैं, मगर असंगठित और अप्रशिक्षित हाथों को दो जून की रोटी की तलाश में हज़ारों किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़े, महानगरों में नारकीय जीवन गुज़ारते हुए खोमचे लगाना पड़े या दिहाड़ी मज़दूरी करना पड़े,तो यह सरकारों की विकास योजनाओं पर करारे तमाचे से कमतर नहीं है । यूँ भी रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वालों की ज़्यादातर ऊर्जा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में खप जाती है । जिस क्षेत्र में कारखाना लगता है, वहाँ की आबोहवा, ज़मीन, जंगल, पानी पर उसी इलाके के लोगों का पहला हक है । यदि देश और समाज की तरक्की के लिये वे अपना हिस्सा सभी के साथ बाँटने को तैयार हैं,तो उनके जायज़ हक को सौंपने में इतनी तंगदिली क्यों ? किसी भी देश,प्रदेश या क्षेत्र को तरक्की करना है तो योग्यता के साथ-साथ स्थानीय प्रतिभा को प्राथमिकता देना ही चाहिए।

शिवराज के बयान को तंग नज़रिये से देखने की बजाय व्यापक दृष्टिकोण से समझने की ज़रुरत है । सरकारों को इस मुद्दे पर नीतिगत फ़ैसला लेना चाहिए । टटपूँजिये तरीके से बाल की खाल निकाल कर राजनीति तो चमकाई जा सकती है, लेकिन किस कीमत पर ? अब वो वक्त आ चुका है , जब देश के कालिदासों की सेनाओं को समझना चाहिए कि नोचने-खसोटने के लिये ज़्यादा कुछ बचा नहीं है । दमतोड़ते लोकतंत्र की लाश को नोचने की सीमा भी आने को है । सम्हलो-वरना जिस दिन देश का अनपढ़-अनगढ़ आदमी उठ खड़ा हुआ तो नेताओं की जमात का नामलेवा भी नहीं बचेगा ।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

आतंक और मौतों की सियासत

मध्यप्रदेश के खंडवा में एटीएस के आरक्षक सहित तीन लोगों को दिनदहाड़े गोलियों से भून देने के बाद सरकार ने जिस तरह घोषणाओं का पिटारा खोल दिया , उसमें मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदनाशीलता कम मामले का सियासी फ़ायदा उठाने की कुत्सित चेष्टा ज़्यादा दिखाई देती है । खंडवा में मारे गये लोगों की शवयात्रा को काँधा देने के लिये खुद मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, मंत्रिमंडल के कई और सदस्यों के साथ ही डीजीपी एस के राउत भी मौजूद थे । प्रशासन और पुलिस ने मामले में प्रतिबंधित संगठन सिमी का हाथ होने की बात कह कर सनसनी फ़ैला दी और सरकारी तंत्र पूरे लवाज़मे के साथ खंडवा पहुँच गया ।

अब तक पुलिस की गिरफ़्त से बाहर है । अब पुलिस "ऑपरेशन फ़ंदा" का ढ़ोंग करने में जुट गई है,मगर नतीजा सिफ़र ही है । कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया है ,लेकिन अब तक कुछ भी सामने नहीं आया है । अलबत्ता नगरीय निकायों के चुनाव ज़रुर सामने खड़े हैं । लिहाज़ा घोषणाओं का पिटारा खोलकर राजनीतिक माइलेज लेने में माहिर सूबे के मुखिया ने एक बार फ़िर बाज़ी मार ली । आनन फ़ानन में उन्होंने तीनों मृतकों को शहीद का दर्ज़ा दे डाला । सभी की राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई । आरक्षक के परिजनों को दस लाख रुपए और दो अन्य मृतकों के परिवारों को पाँच-पाँच लाख रुपए का मुआवज़ा और एक-एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति देने की घोषणा भी कर दी गई । गोया कि २६/११ के मुम्बई हमले से भी बड़ा कोई आतंकी हमला हो गया हो जिसमें आतंकियों से जूझते हुए आरक्षक सीताराम यादव , बैंक अधिकारी पारे और वकील पाल ने वीरगति प्राप्त की हो । सरकारी प्रेस नोट को पढ़ने के बाद तो कम से कम यही लगता है मानो सीमा पर रणबाँकुरों ने देश की हिफ़ाज़त के लिये प्राण न्यौछावर किये हों ।

आरक्षक यादव बेशक एटीएस के कर्तव्यपरायण और जाँबाज़ जवान रहे हैं । उनकी बहादुरी पर हम सभी को नाज़ है । इस बात से भी इंकार नहीं कि देश के लिये साहस के साथ अपने दायित्वों को निबाहने वालों को ना सिर्फ़ सम्मान मिलना चाहिए , बल्कि उनके परिजनों को बेहतर ज़िन्दगी देने का नैतिक दायित्व समाज और सरकार दोनों का होता है । लेकिन मूल सवाल यही है कि नेता आखिर कब तक बेहयाई से अपने फ़ायदे के लिये लोकतंत्र का बेहूदा मज़ाक बनाते रहेंगे । अभी तफ़्तीश चल रही है । फ़िलहाल कुछ भी साफ़ नहीं है । कल जाँच-पड़ताल के बाद मामला आपसी रंजिश या लेनदेन का निकले,तब सरकार कहाँ जाकर मुँह छिपाएगी ?

अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिये नेता लोकतंत्र और सत्ता को "चेरी" समझ बैठे हैं । उनका ध्यान समाज में व्यवस्था लाने से ज़्यादा अराजकता फ़ैलाकर चाँदी काटाने में लग गया है । गुज़रते वक्त के साथ मध्यप्रदेश में तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । मुख्यमंत्री खुद भरी सभा में मान चुके हैं कि सूबे में तरह - तरह के माफ़ियाओं का राज है । दोबारा सत्ता में आने के बाद से तो जैसे भाजपाइयों को "पर" ही लग गये हैं । भूमाफ़ियाओं का आतंक पूरे प्रदेश में फ़ैला हुआ है । इसकी परिणिति एक आईएएस अफ़सर एम जी रुसिया की मौत के रुप में सामने आ चुकी है । ऎसे कई मामले हैं जिनमें शक की सुई सीधे-सीधे सत्ताधारी दल के नेताओं पर आ टिकती है , लेकिन रुसिया की संदिग्ध हालात में हुई मौत के बाद से अफ़सरशाही चौकन्नी हो गई है । अब आलम यह है कि अधिकारी अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिये नियम - कायदों को ताक पर रख कर नेताओं की मनमानी को बर्दाश्त कर रहे हैं ।

राजधानी की व्यस्ततम सडक पर चलती कार में चार लोगों द्वारा में तथाकथित रेप का मामला प्रदेश के हालात बयान करने के लिये काफ़ी है । शहर में गैंगरेप जैसी कोई घटना हुई ही नहीं और पुलिस ने आरोपी भी ढ़ूँढ़ निकाला । पास के गाँव के एक निरीह और शरीफ़ इंसान से अपराध भी कबूलवा लिया । शायद उसकी किस्मत अच्छी थी जो गाँव के कुछ लोग उसके पक्ष में उठ खड़े हुए । करीब डेढ़ - दो महीने गुज़ारने के बाद एक बेकसूर युवक ज़मानत पर रिहा हो सका । बाद में पता चला कि कुछ लोगों को फ़ँसाकर रकम ऎंठने के इरादे से यह कहानी बुनी गई थी । इसे अँजाम देने के लिये मुम्बई के दलालों और कॉलगर्ल की मदद ली गई थी, वास्तव में ऎसी कोई वारदात उस रात भोपाल में हुई ही नहीं थी ।

ये एक बानगी है । खंडवा की वारदात के बाद आधी-अधूरी जानकारी के बूते सरकार की बेतहाशा घोषणाएँ करना गंभीर मसला है । आखिर नेता कब तक अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते रहेंगे । मुख्यमंत्री अपने अधकचरे सलाहकारों का मशविरा मानकर "इमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज़" के लिये जाने क्या-क्या घोषणाएँ करते रहते हैं । उन्हें अपने व्यक्तित्व में गंभीरता लाकर सोचना ही होगा कि जनता ने राज्य और समाज हित के कामों के लिये उन्हें सत्ता सौंपी थी । सरकारी खज़ाना उनकी निजी जायदाद या मिल्कियत नहीं है , जिसे वो जब चाहें ,जैसे चाहे लुटाते रहें , उड़ाते रहें । हालाँकि प्रदेश में विपक्षी दल काँग्रेस का निकम्मापन और मिल बाँटकर खाने की नीयत से साधी गई चुप्पी को सब भाँप चुके हैं , लेकिन हकीकत किसी ना किसी बहाने सामने आकर ही रहती है । अराजकता की सियासत के सहारे लम्बा सफ़र तय कर पाना नामुमकिन है ।