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शनिवार, 17 अगस्त 2013

भगवद्गीता की राजनीति - नीति सही ना नीयत

फ़ल की इच्छा किए बगैर कर्म करने की सीख देने वाली भगवद्गीता का पाठ बच्चों को पढ़ाने की तैयारी में जुटी प्रदेश सरकार ने अपने इस राजनीतिक कर्म के "फ़ल" का अँदाज़ा लगते ही आनन-फ़ानन में कदम पीछे खींच लिए हैं। मदरसों में गीता पढ़ाने पर मचे बवाल के बाद रक्षात्मक मुद्रा में आई सरकार ने साफ किया कि जिन कक्षाओं की उर्दू पाठ्यपुस्तकों में इन पाठों को शामिल किया गया है, उनमें परीक्षा के आधार पर कक्षा में रोकने का प्रावधान नहीं है। फिर भी यदि किसी विद्यार्थी की रूचि इन पाठों को प़़ढने में नहीं है तो इन्हें वैकल्पिक माना जाएगा। वंदेमातरम और सूर्य नमस्कार के मुद्दे पर मुँह की खाने के बाद सरकार ने इसी तरह फ़ैसले पलटे थे। प्रदेश सरकार ने राज्य के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने वाला अपना आदेश वापस ले लिया है। गौरतलब है कि सरकार के इस आदेश पर धार्मिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। कुछ संगठनों ने कोर्ट में भी जाने की चेतावनी दी थी।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इसे लेकर जो विवाद पैदा हुआ वह सही नहीं था। उन्होंने कहा कि जिस आदेश के कारण विवाद की स्थिति पैदा हुई उसे वापस लिया जाता है। शिवराज का कहना है कि सरकारी आदेश से कुछ गलतफहमी हो गई थी, जिसके बाद मदरसों में भी नए सत्र की किताबों में गीता के अध्याय जोड़ दिए गए।
राज्य सरकार ने एक जुलाई को जारी अधिसूचना के जरिए प्रदेश के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने का आदेश जारी किया था। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद मुस्लिम संगठनों सहित काँग्रेस ने भी इसका भारी विरोध किया और इसे दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया था। इस सबके बीच सत्ता की हैट्रिक लगाने की चाहत पाले बैठे मुख्यमंत्री इस फैसले के व्यापक विरोध से बुरी तरह परेशान थे। उन्होंने मुख्य सचिव और अन्य आला अफसरों से चर्चा करने के बाद विवादित फैसले को निरस्त करने के आदेश दिए। इसके बाद इसी अगस्त माह की एक तारीख को जारी अधिसूचना पाँच दिन बाद निरस्त कर दी गई। नए आदेश के बाद अब सिर्फ हिन्दी की किताबों में ही गीता का पाठ जारी रहेगा।
 गौरतलब है कि राज्य सरकार ने पाठ्यपुस्तक अधिनियम में संशोधन कर मदरसों के उर्दू पाठ्यक्रम में गीता की शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। इसके तहत कक्षा 1 और 2 की विशिष्ट उर्दू तथा विशिष्ट अँग्रेजी के साथ इसी शिक्षण सत्र से भगवद्गीता के अध्याय पढ़ाए जाना थे। राज्य शिक्षा केंद्र और एमपी मदरसा बोर्ड से संबद्ध सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए यह नियम अनिवार्य किया गया था। कक्षा 3 से 8 तक गीता के अध्याय सामान्य हिन्दी के पाठयक्रम में जोड़े जाने की बात कही गई।
राज्य सरकार के इस फैसले की खिलाफ़त में मध्य प्रदेश कैथोलिक काउंसिल, मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ और मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच भी उतर आए थे। अल्पसंख्यक संगठनों ने चेतावनी दी थी कि फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाएँगे। उधर ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य आरिफ मसूद ने राज्यपाल रामनरेश यादव को सौंपे ज्ञापन में अधिसूचना निरस्त करने की माँग करते हुए कहा था कि एक धर्म की पुस्तक का पाठ पढ़ाया जाना संविधान के विपरीत है और मुस्लिम समाज इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रुप में देखता है।
मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ के संयोजक आनंद ने कहा था, 'हम इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर सकते हैं। धार्मिक मामलों से सरकार को दूर रहना चाहिए, यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा है। सरकार गलत परंपरा की शुरुआत कर रही है।'
राज्य सरकार का तर्क है कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जनवरी, 2012 में स्कूलों में गीता-सार पढ़ाए जाने के शासन के निर्णय के विरूद्ध कैथोलिक बिशप कौंसिल की याचिका पर व्यवस्था दी कि गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, न कि भारत के धर्म पर।
सरकारी बयान के मुताबिक पाठ्य-पुस्तकों में गीता आधारित सामग्री का निर्णय नया नहीं है। वर्ष 2011-12 से गीता के व्यावहारिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित विभिन्न पाठ्य सामग्री, कक्षा 1 से 12 की भाषा की पुस्तकों में समाहित की गई है। ये पुस्तकें पिछले दो वर्षों से शासकीय शालाओं के साथ ही अनुदान प्राप्त मदरसों में प्रचलित हैं, जिसके संबंध में किसी प्रकार की आपत्ति सामने नहीं आई है।
 गीता के व्यवहारिक जीवन में उपयोगी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जो पाठ स्कूली पुस्तकों में जोड़े गए हैं, उन्हें धार्मिक या साम्प्रदायिक नजरिए से देखना गलत है। यह मूलतः नैतिक शिक्षा तथा जिसे भावनात्मक परिपक्वताओं का शिक्षण कहा जाता है, उसके अनुरूप की गई कार्रवाई है। सरकारी विज्ञप्ति कहती है कि उपरोक्त वस्तु-स्थिति के आधार पर यह कहना कि, पाठ्य-पुस्तकों में चुनावी या धार्मिक भावना से कोई पाठ शामिल किया गया है, पूर्णतः भ्रामक एवं गलत होगा।
 ऎसे में लाख टके का सवाल यही है कि निर्णय सही और नीयत साफ़ है, तो फ़िर विरोध की सुगबुगाहट शुरू होते ही कदम क्यों खींचे ? समूचे घटनाक्रम पर नज़र डालें तो पाएँगे कि शिवराज सिंह चौहान नरेन्द्र मोदी से आगे निकलने की होड़ में आए दिन "गोड़" फ़ुड़वाने पर आमादा हैं। देश में कराए तमाम सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक भले ही भाजपा के लिए अभी दिल्ली दूर हो , लेकिन खुद को सर्वमान्य और हर वर्ग में स्वीकार्य बनाने की जुगत भिड़ा रहे शिवराज आए दिन नए-नए शिगूफ़े छोड़ते रहते हैं।
 सेक्युलर छबि बनाने की गरज से रमज़ान के मुकद्दस महीने में मुख्यमंत्री निवास में रोज़ा इफ़्तारी करते हैं, वे मोदी को निपटाने और हिन्दू मतों को साधने के फ़ेर में टोपी तो पहनते हैं- मगर "केसरिया"। इसी तरह ईद की मुबारकबाद के मौके पर पहले तो रज़ा मुराद को आगे कर अपनी मुराद साधने की कोशिश की और जब विवाद बढ़ा तो मोदी की शान में कसीदे पढ़ने लगे। मज़ेदार बात तो यह है कि जो शख्स आठ साल से निर्बाध और एकछत्र राजकाज संभालने के बावजूद अब तक ना तो पद के अनुरूप गंभीरता पैदा कर सका हो और ना ही सूबे के मुखिया के तौर पर काबिलियत साबित कर सका हो, वो सीधे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए प्रस्तुत है। शायद संत कबीर ने ऎसे ही किसी दौर की आहट को पढ़कर कहा होगा - "करम की गति न्यारी संतो, .................पंडित फ़िरत भिखारी।"
मुख्यमंत्री के हालिया फ़ैसले एक मर्तबा फ़िर साबित कर गए कि विरोध और दबाव का प्रतिरोध करने की सलाहियत उनमें रत्ती भर भी नहीं है। जब भी उनके फ़ैसलों पर सवाल उठे, जवाब देने की बजाय उन्होंने "खोल" में घुस जाना ही बेहतर समझा। वे किसी भी मुद्दे पर ज़्यादा वक्त कायम नहीं रह पाते और दबाव बढ़ने पर फ़ौरन से पेशतर हथियार डाल देते हैं। अँदरखाने पक्ष-विपक्ष के हर छोटे-बड़े नेताओं से डील कर भले ही शिवराज ने अपना कार्यकाल "स्वर्णिम" होने का मुगालता पाल लिया हो, हकीकतन इस स्वेच्छाचारिता ने प्रदेश के हर संवैधानिक पद और संस्थान की गरिमा को ध्वस्त कर दिया है।
अपना उल्लू सीधा करने के लिए कभी संघ से दूरी बनाने की कोशिश और ज़रूरत पड़ने पर  खुद को हिन्दुत्व का ध्वजवाहक बताने की चाहत में उनकी छबि निरंतर "लिजलिजीहोती चली जा रही है। वैसे शिवराज की एक कदम आगे चार कदम पीछे" की कार्यपद्धति ने उनकी नेतृत्व क्षमता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। सूबे के मुखिया के तौर पर वे किंकर्तव्यविमूढ़ ही नज़र आते रहे हैं। गीता पर पैदा हुए विवाद में मीडिया के काँधे पर सवार प्रधानमंत्री पद के स्वयंभू दावेदार ने हथियार डाल दिए।
हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने की नीयत से किए गए फ़ैसले का विरोध ज़ोर पकड़ते ही हिन्दुत्व पर आगे बढ़ने के इरादे को उन्होंने पल भर में ही तिलाँजलि दे डाली। वैसे सूबे की जनता को भी अब गंभीरता से सोचना होगा। सत्ता में एक दशक का सफ़र तय के बाद भी जो दल अब तक सूबे के लिए एक परिपक्व नेतृत्व तैयार नहीं कर सका हो, क्या उसके हाथ में तीसरी बार काँग्रेस के निकम्मेपन के चलते सत्ता सौंपना उचित रहेगा।  

सोमवार, 8 जुलाई 2013

सीडी की सियासत....!


मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री रहे राघवजी भाई को चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली बीजेपी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अस्सीवीं सालगिरह के मौके पर पचपन साल की सेवा के बदले में पार्टी की तरफ़ से दिया गया यह तोहफ़ा राघवजी भाई के लिए वाकई यादगार रहेगा। यूँ तो प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, अजय विश्नोई, ध्रुवनारायण सिंह समेत शिवराज मंत्रिमंडल के तमाम सदस्यों पर अनैतिक आचरण के आरोप लगते रहे हैं।लेकिन इससे पहले पार्टी ने कितने मामलों में सख्ती दिखाने की नज़ीर पेश की? फ़िर ऎसा भी नहीं है कि राघवजी पर इस तरह का आरोप पहली मर्तबा लगा हो। दो साल पहले भी अनैतिक यौनाचार के मामले में उन पर अँगुली उठी थी । तब भी सीडी की बात सामने आई थी लेकिन जल्दी ही मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

दरअसल यह नैतिक आचरण से ज्यादा सियासी मुद्दा है। भाजपा की अँदरुनी राजनीति के साथ ही पक्ष-प्रतिपक्ष के मिलीजुली "प्रदर्शन मुकाबले" के संकेत भी इस घटनाक्रम में साफ़ मिलते हैं। मध्यप्रदेश में पिछले सात सालों से जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसमें विपक्ष का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह वही ज़ुबान बोलते हैं, जो सूबे के मुखिया को रास आए। काँग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सत्ता में वापसी के लिए कोशिश करते हैं लेकिन अजय सिंह अपने बयानों या फ़िर अपने तौर तरीकों से इन प्रयासों में तुरंत ही पलीता लगा देते हैं ।

राघवजी के मामले में भी विशुध्द रूप से पटवा-सारंग गुट की सियासी शैली साफ़ झलकती है। इसी सियासी वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब चेले ने भी ऎन चुनावों के पहले वही दाँव फ़ेंका है। प्रधानमंत्री पद की रेस में अपना नाम खुद ही आगे बढ़ाने की जुगत में लगे सूबे के मुखिया इन दिनों किसी और ही गुणा-भाग में लगे हैं। वे विदिशा से अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा कर विधानसभा में पहुँचाने का इरादा रखते हैं। राघवजी के ५५ साल के राजनीतिक सफ़र को एक झटके में नगण्य कर दिया गया। लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी ने आनन फ़ानन में बगैर जाँच किए जिस तरह से राघवजी को बर्खास्त किया, वह भी कई संकेत छोड़ता है।

इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार के तौर पर शिवशंकर पटेरिया खुद सामने आए हैं । किसी जमाने में उमा भारती के खास रहे पटेरिया लम्बे वक्त से हाशिये पर हैं। वैसे वो मौके और वक्त की नज़ाकत के मुताबिक पाला बदलने में खासे माहिर हैं। इस सीडी कांड के बाद एकाएक सुर्खियों में आए पटेरिया "मुक्त कंठ" से जिस तरह "राग शिवराज" गा रहे हैं। नज़दीक आते चुनावों के मद्देनज़र उनकी उलट-बाँसी विधानसभा क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी को लेकर प्रदेश भाजपा में मचे घमासान का मुज़ाहिरा भी करती है।

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि हाल के दिनों में नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर सीधे और तीखे हमले किए थे। प्रदेश में परिवर्तन यात्राओं के दौरान अजय सिंह ने शिवराज सिह चौहान और उनकी पत्नी साधना सिंह पर कई आरोप लगाए और पत्र लिखकर जवाब भी माँगा। पावस सत्र के दौरान इस बार काँग्रेस एक बार फ़िर अविश्वास प्रस्ताव ला रही है। ऎसे में विपक्ष के आरोपों की धार को कुँद करने के लिए चला गया "अस्त्र" लगता है हमेशा की तरह निशाना पर लगा है। विपक्ष के वार की धा को भोथर करने में इसमें "फ़ूल छाप काँग्रेसियों" की भी भूमिका अहम है।

राघवजी के सीडी काँड के जरिए एक साथ कई निशाने साधे गए हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम पर सहमति जताने वाले संघ को भी इस बहाने अपनी ताकत का एहसास कराने की कोशिश की गई है। यानी इस समय सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है। 

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

बिकाऊ विपक्ष के कँधे पर सवार "विकास पुरुष"


मध्यप्रदेश मे राजनीतिक और पत्रकारीय धर्म से मुँह फ़ेर चुके लोगों का बोलबाला होने से चारों ओर "धूरधानी" मची हुई है। बिकाऊ विपक्ष और बज़रिये जनसंपर्क विभाग सत्ता की चौखट पर कलम गिरवी रख चुके पत्रकारों की बदौलत प्रदेश विकास के ग्राफ़ पर कुलाँचे मारता दिखाई दे रहा है। मगर हकीकत के आइने में सत्ता पक्ष के साथ गलबहियाँ करते विपक्ष और पत्रकारों के बदनुमा चेहरों को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। हाल ही में राजनीतिक चिंतक के.एन. गोविन्दाचार्य ने मध्यप्रदेश सरकार के बारे मे कहा था प्रदेश की भाजपा सरकार पूर्व शासित काँग्रेस की दिग्विजय सरकार से ज्यादा भ्रष्ट है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार को रोकने में असफल साबित हुए हैं। गोविंदाचार्य ने कहा है कि इतना भ्रष्टाचार तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जमाने में भी नहीं था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मंत्रियों पर अँकुश नहीं रखने के कारण प्रदेश में भ्रष्टाचार में बेतहाशा वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार चलाने के लिए चौहान ने मंत्रियों को खुली छूट दे रखी है। उन्होंने कहा कि भाजपा के शासन में उद्योगपति और अधिकारी खुश हैं, जबकि किसान दुखी हैं।
गोविंदाचार्य की तस्दीक प्रदेश के हालात भी करते हैं। प्रदेश में काँग्रेस के बड़े नेता सत्ताधारी दल के साथ मिलकर जमकर फ़ायदा ले रहे हैं । नतीजतन विपक्ष का अँकुश पूरी तरह हट चुका है। जनसंपर्क विभाग ने सैकड़ों करोड़ के बजट के बूते कहीं विज्ञापनों के ज़रिए अखबार मालिकों, तो कहीं सीधे पत्रकारों को साध रखा है। जो पत्रकार सच बात कहने का " दुस्साहस " करते हैं, उन्हें सरकारी अधिमान्यता देने से भी इंकार कर दिया जाता है। उधर कई नौकरशाह सरकार के हमजोली बनकर हजारों करोड़ के आसामी बन चुके हैं। ये वो अधिकारी हैं, जो प्रदेश से कमाया धन दूसरे प्रदेशों की प्रॉपर्टी में निवेश कर रहे हैं और जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।
दूसरी तरफ़ अवैध खनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छोटे कर्मचारियों को शातिताना अँदाज़ में हमेशा के लिए खामोश किया जा रहा है। हाल ही में रतलाम में खनिज निेरीक्षक संजय भार्गव की सड़क हादसे में मौत हो गई। इससे पहले भोपाल से लगे बैरसिया के गाँव में पीडब्ल्यूडी के सब इंजीनियर रामेशवर प्रसाद चतुर्वेदी की भी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। सरसरी तौर पर ये सामान्य हादसे लगते हैं। लेकिन इन मौतों को बड़े ही शातिराना तरीके से अँजाम तक पहुँचाया गया, जिससे "हत्या" को हादसा साबित किया जा सके। इन दोनों ही मामलों में मु्ख्यमंत्री निवास में सीधे धमक रखने वाले प्रदेश के एक बड़े ठेकेदार का नाम सामने आ रहा है। इसी तरह पिछले साल होली पर मुरैना में खनन माफ़ियाओं ने एक होनहार आईपीएस नरेन्द्र कुमार को मौत के घाट उतार दिया था। मगर हुआ क्या ?
जिस सीबीआई पर काँग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है, उसी ने एक अदने से आदमी को अपराधी बनाकर पेश कर दिया। आनन-फ़ानन में अदालती फ़ैसला भी हो गया। जिस तरह आरुषि-हेमराज मामले में सीबीआई ने कृष्णा, राजकुमार और प्रदीप मंडल को फ़ाँसी का फ़ँदा पहनाने की पूरी तैयारी कर ली थी । उसी तरह शहला मसूद हत्याकांड में रसूखदार लोगों को बचाने के लिए ज़ाहिदा और सबा जैसे लोगों को बिला वजह फ़ँसाया जा रहा है। फ़र्क है तो सिर्फ़ इतना कि दिल्ली की मीडिया कृष्णा और राजकुमार की बेगुनाही साबित करने के किए उठ खड़ी हुई थी। मगर प्रदेश में सम्मानों, प्रोजेक्टों, विज्ञापनों, सस्ते प्लाटों और इसी तरह के कई अन्य फ़ायदों के बोझ तले दबे कलमवीरों का ज़मीर क्या कभी जाग पाएगा।