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बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मप्र के आदिवासी देशी खेती सीखने जाएँगे परदेस....!

"कोई भरम मत पालिये । साफ़ बात यह है कि लेखक दुनिया नहीं बदलता । वह बदल ही नहीं सकता । दुनिया बदलने वाले दुनिया बदलते हैं ।"

लीजिए साहब , अब मध्य प्रदेश के किसान खेती की बेहतर तकनीक सीखने के लिए सात समुंदर पार भेजे जाएँगे । आदिम जाति कल्याण विभाग आदिवासियों को विदेशों में खेती किसानी सिखाने भेजने की तैयारी में जुट गया है । राज्य के किसान अमेरिका ,चीन ,जापान सहित कई देशों से खेती के गुर सीख कर आएँगे । शुरुआती दौर में दस किसान खरीफ़ मौसम में पंद्रह दिन से एक महीने का प्रशिक्षण लेने भेजे जाएँगे । अधिकारियों का कहना है कि चावल की अच्छी माँग होने के कारण धान की जैविक खेती के बारे में जानकारी दी जाएगी ।

खेती - किसानी के मामले में आज भी भारत कई देशों से आगे है । लोकोक्तियाँ और कहावतें मौसम के मिजाज़ को समझने और उसके मुताबिक फ़सल लेने तक का सटीक ज्ञान देने में सक्षम हैं । अनुभवी किसान हवा का रुख देख कर भाँप जाता है कि बरसात कब- कब होगी और कितनी । इतना ही नही नक्षत्रों और मिट्टी की किस्म से ग्रामीण फ़सल का अनुमान लगा सकते हैं । लेकिन हम अपने देश के वैदिक और पारंपरिक ज्ञान के प्रति हमेशा से लापरवाह रहे हैं । "फ़ॉरेन रिटर्न" की मानसिकता इस कदर हावी है कि देश की चीज़ जब तक विदेशी ठप्पा लगवाकर नहीं आये , हम उसे संदेह की निगाह से ही देखते हैं ।

वैज्ञानिकों ने गायत्री मंत्र के ज़रिए उपचारित बीजों से हैरत में डाल देने वाला फ़सल उत्पादन हासिल होने की बात स्वीकारी है । लोगों की बेरुखी के कारण सड़कों पर पन्नियाँ खा कर दम तोड़ती गायें भी खेती की मूलभूत ज़रुरत में से एक है । गाय का मूत्र और गोबर जमीन की उर्वरा शक्ति बढाता है । साथ ही फ़सलों को नुकसान पहुँचाने वाले अनगिनत जीवाणुओं और कीड़ों की रोकथाम करता है । अनुभवी कहते हैं गौमूत्र के नियमित छिड़काव से पथरीली ज़मीन भी उपजाऊ और भुरभुरी हो जाती है ।

गायत्री शक्तिपीठ ने खेती को भारतीय पद्धति से करने के कई सफ़ल प्रयोग किये हैं और जैविक खेती की तकनीक पर शोध भी किये हैं । मेरे अपने प्रदेश में ऎसे कई प्रगतिशील किसान हैं , जिन्होंने अपनी हिकमत और हिम्मत से खेती के पारंपरिक स्वरुप को नया जीवनदान दिया है । इतना ही नहीं ये साबित भी किया है कि प्राकृतिक नुस्खे अपना कर खेती की लागत घटा कर भरपूर पैदावार ली जा सकती है ।

अब सवाल ये कि जिस विषय के बारे में हमारे यहाँ ज्ञान का भंडार मौजूद है ,उसके लिए विदेश का रुख करना कहाँ तक जायज़ है ? वास्तव में हमारे नेता और अफ़सर कभी बीमारी , तो कभी प्रशिक्षण के नाम से सरकारी खर्च पर दूसरे देशों के सैर सपाटे का बहाना तलाशते रहते हैं । ज़ाहिर सी बात है कि गाँव की पगडंडी छोड़कर शहर की सड़कों तक आने में घबराने वाले ठेठ ग्रामीण परिवेश से निकले ये आदिवासी अकेले तो विदेश जा नहीं सकेंगे........। अँग्रेज़ीदाँ वातावरण में किसानों को समझाने और हौसला देने के लिए हो सकता है अधिकारियों की लम्बी चौड़ी फ़ौज भी साथ जाए ।

वैसे एक और जानकारी काबिले गौर है । शिवरात्रि पर भोपाल के नज़दीक प्रसिद्ध स्थल भोजपुर में उत्सव के उदघाटन समारोह में मुख्यमंत्री ने एक जानकारी दी । उन्होंने बताया कि पिछले साल संस्कृति विभाग के ज़रिए 17 करोड़ रुपए प्रदेश की सभी पंचायतों की भजन मंडलियों को दिये गये । यानी प्रदेश का लोक कलाकार भी खासा अमीर हो गया शिवराज के राज में .....?????? क्या वाकई ....????? और हाँ संस्कृति मंत्री ने समारोह में लोक कलाकारों की पंचायत बुलाने की माँग भी कर डाली । हाल ही में "घोषणावीर मुख्यमंत्री" हाथठेला और रिक्शा चालकों की पंचायत कर चुके हैं । पिछले कार्यकाल में उन्होंने सत्रह पंचायतें कीं । इन लोगों का कितना भला हो सका ये शोध का विषय है, लेकिन अधिकारियों और इंतज़ाम में लगे ठेकेदारों को तत्काल लाभ मिल ही गया ।