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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

लोकतंत्र की लूटखसोट

पूरे देश में आईपीएल पर मीडियाई हाहाकार मचा हुआ है । हाल ही में शोएब सानिया और आयशा के लव ट्रायंगल पर दिन-रात पसीना बहाने वाले पत्रकारों ने दम भी नहीं लिय था कि मोदी ने अंतरजाल पर चहक-चहक कर अक्सर चहचहाने वाले शशि थरुर की बोलता बंद कर दी । सुनंदा की मित्रता थरुर की कुर्सी पर भारी पड़ गई । काँग्रेस ने नाक बचाने के लिये थरुर की बलि तो ले ली लेकिन अब वह मोदी को भी बख्शने के मूड में नहीं है । तभी तो तेल पानी लेकर पिल गई है मोदी को चारों खाने चित्त करने में ।
वैसे पहले सानिया-शोएब और अब आईपीएल का चखड़बा । देश की मूल समस्याओं की ओर अब किसी का ध्यान भी नहीं है । महँगाई का विरोध करने के लिये पानी की तरह पैसा बहाकर भीड़ जुटाने की बीजेपी की कोशिश भी कुछ रंग नहीं ल सकी । उल्टा हुआ ये कि एयरकंडीशनर की ठंडी हवा के आदी हो चुके नेताओं को गर्म लू के थपेड़ों की आदत ही नहीं रही , लिहाज़ा सूरज की तपिश से रुबरु होते ही गश खा कर गिर पड़े । अब कोई इन नेताओं से पूछे कि महँगाई की सुरसा तो पिछले कई महीनों से लगातार मुँह फ़ाड़ रही है , अब जाकर होश आया ....!!!! गर्म हवा के एक झोंके से चक्कर खाकर गिर जाने वालों से कोई ये भी पूछे कि करोड़ों रुपए फ़ूँक कर एक दिन मजमा जुटा लेने से क्या आम जनता को महँगाई से निजात मिल जायेगी ।
दरासल देश में अजीब सा "केओस" का माहौल है । आम आदमी के पेट में भले ही निवाला नहीं पहुँचे लेकिन संसद में आईपीएल पर बहस में समय ज़ाया करना ज़रुरी है । मीडिया भी बुनियादी समस्याओं से आम लोगों का ध्यान हटाने के लिये नेताओं के सुर में सुर मिलाकर फ़िज़ूल के मुद्दे बना रहा है और उन्हें बेवजह तूल दे रहा है । आखिर नेताओं और उद्योग घरानों की मदद से ही तो उनकी दुकान चलती रह सकती है ।
इधर प्रदेश के अखबार घरानों ने भी एक दूसरे को पटखनी देने के लिये नित नये दाँव खेलना सीख लिया है । अखबार जो कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ था आज लूटतंत्र में अन्य स्तंभों का हमजोली बन गया है । जब से एनजीओ के ज़रिये सरकारी कम कराने का चलन बढ़ा है, इन अखबार मालिकों को समाज सेवा का भी भूत सवार हो गया है । कोई तालाब बचाने के नाम पर पैसा बना रहा है, तो कोई पक्षियों को दाना-पानी देकर वाहवाही लूट रहा है । एक अखबार ने तो इन दिनों कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ़ मुहिम छेड़ रखी है । बेशक नेताओं के काले कारनामे जनता के सामने आना ही चाहिये , मगर इन घपलों को उजागर करने के तरीके अखबार की नीयत पर ही सवाल खड़े करते हैं । आखिर क्या वजह है कि इस अखबार को प्रदेश में सिर्फ़ एक ही मंत्री बेईमान नज़र आ रहा है । अखबार मुख्यमंत्री से न्याय की अपेक्षा कर रहा है , लेकिन क्या इस भोले-भंडारी को यह नहीं मालूम कि मुख्यमंत्री का "डंपर मामला" अब भी लोकायुक्त के पास धूल चाट रहा है । गर अखबार सचमुच प्रदेश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहता है,तो सरकार के मुखिया के कारनामों को उजागर करता ?
व्यक्ति विशेष के खिलाफ़ चलाई जा रही मुहिम में व्यक्तिगत दुर्भावना या विद्वेष की बू आती है । कहीं ऎसा तो नहीं कि इंदौर में पैर जमाने में अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से नाराज़ होकर मंत्री जी की बखिया उधेड़ी जा रही है या फ़िर इंदौर के बीजेपी अधिवेशन के सफ़ल आयोजन के बाद आलाकमान की नज़रों में विजयवर्गीय के नम्बर बढ़ने से खौफ़्ज़दा भाजपाइयों ने ही अखबार को "छू’ कर दिया हो ....! बहरहाल नैतिकता और व्यावसायिक प्रतिबद्धता का दावा करने वाले अखबारों का ये " ब्लेकमेलर" अंदाज़ बेहद शर्मनाक है । अगर अनियमितताओं से पर्दा हटाने क बीड़ा उठाया ही है तो फ़िर निष्पक्षता का हामी होना भी ज़रुरी है । राजनीतिक शुचिता के देश की मौजूदा व्यवस्था में शायद अब कोई जगह बची ही नहीं है ।
जो मुख्यमंत्री केबिनेट में शहर की सरकारी बेशकीमती ज़मीनें कई रसूखदारों को बाँट दे, जो खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हो , अधिकारियों और दिल्ली में बैठे नेताओं के हाथ की कठपुतली बना हुआ हो , वो सिर्फ़ लच्छेदार भाषण देकर लोगों को भरम सकता है, उनकी भलाई के बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठा सकता । कल यानी तेइस अप्रैल के पत्रिका के सातवें पन्ने पर एक सरकारी उदघोषणा प्रकाशित की गई है । इसमें शहर के महँगे इलाके सिंगारचोली की १.२८ एकड़ सरकारी ज़मीन मुम्बई के एस्सार ग्रुप को कार्यालय खॊलने के लिये आवंटित करने की बात कही गई है । नजूल अधिकारी ने पंद्रह दिन में आपत्तियाँ मँगाई हैं । क्या सरकारी ज़मीनें औने-पौने दामों में रामदेव जैसे योग के व्यापारी,धर्म या समाज का ठेकेदारों,फ़र्ज़ी समाजसेवी संस्थाओं को आवंटित करने का हक इन नेताओं महज़ इस लिये मिल जाना चाहिये क्योंकि ये येनकेन प्रकारेण सत्ता पर काबिज़ हैं । इस बँदरबाँट में राजनीतिक दलों का कोई भेद नहीं बचा है । सत्ता किसी भी पार्टी की हो, नेता सब बाँट कर खाने मामले में एक हो चुके हैं । सरकारी संपत्ति को इन लुटेरों से बचाने के लिये जनता को ही कोई रास्ता तलाशना होगा ।