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शनिवार, 21 मई 2011

महँगाई से निपटने का एकमात्र हथियार-भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होने वाले आंदोलन अधिकतर भारतीयों की इसी सोच को साबित करते हैं कि देश में करप्शन दिनों-दिन बढ़ रहा है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी गैलप के मुताबिक वर्ष 2010 में करीब 47 फ़ीसदी लोगों ने माना कि 5 साल पहले की तुलना में भारत में करप्शन बढ़ा है,जबकि 27 प्रतिशत को घूसखोरी के पैटर्न में कोई तब्दीली नज़र नहीं आती। 78 प्रतिशत लोगों की राय में सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। वहीं 71 प्रतिशत लोगों का मानना है कि व्यापार जगत में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लोग भ्रष्टाचार को लेकर खुद को कितना असहाय महसूस कर रहे हैं और उनमें कैसी छटपटाहट है,इसकी एक मिसाल अप्रैल में दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन के दौरान देखने को मिली थी। हाल ही में जारी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की लड़ाई को मिले व्यापक जन समर्थन और इस तरह के आंदोलनों से भारतीयों की हताशा जाहिर होती है। रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादातर भारतीय इस समस्या की समाज में गहराई तक पैठ बनाने की सच्चाई को स्वीकार चुके हैं।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि बेरोज़गार और युवा तबका उम्मीदों के बोझ तले हालात के आगे घुटने टेकता दिखाई देता है। तकरीबन 65 प्रतिशत बेरोजगारों की राय में सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के ठोस कदम नहीं उठा रही है। सर्वे के अनुसार लोगों को नहीं लगता कि हालात सुधर रहे हैं और वे व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार से लड़ सकते हैं। सर्वे में 6 हज़ार वयस्कों से सीधे इंटरव्यू किया गया।

दूसरी तरफ़ वित्त और निवेश जगत की नामचीन हस्तियाँ कहने लगें कि भारत में शासन संबंधी स्थितियों को लेकर निराशा का माहौल बन गया है,तो ऎसे में देश की व्यवस्था संबंधी खामियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। मशहूर अमेरिकी फर्म जेपी मॉर्गन के एक प्रमुख अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह बेलाग कहा है कि आम तौर पर भारत को लेकर आज छवि नकारात्मक है और निवेशक अब हताश होने लगे हैं। उन्होंने यह बात विदेशी निवेशकों के संदर्भ में कही है,लेकिन भारत में लोगों की राय भी आज इससे बेहतर नहीं है।

सुरसा सा मुँह फ़ैलाती महँगाई की ओर से मुँह फ़ेर चुकी सरकारों को देखकर लगता है, मानो देश के औद्योगिक विकास के लिये देश में जान बूझकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया है। व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सबसे भ्रष्ट अफ़सरों की ज़बरदस्त पूछ है। सरकार की आवाज़ समझे जाने वाले महकमे में तो जैसे कलेक्शन सेंटर खोल दिया गया है। यथासमय दान-दक्षिणा पहुँचाने के एवज़ में लूटखसोट की खुली छूट दे दी गई है। देश के जाने माने शिक्षा संस्थान जहाँ मोटी फ़ीस लेकर पत्रकारिता की डिग्री देते हैं। वहीं इन सरकारी महकमों में ऎरे-गैरे नत्थू खैरे शुरुआती भेंट पूजा के साथ बाकायदा काम पा रहे हैं। आलम यह है कि असली पत्रकार धीरे-धीरे गायब हो चुके हैं। अब स्कूली शिक्षक, कपड़ा व्यापारी, अकाउंटेंट सरीखे लोगों का डंका बज रहा है। एक काँख में काँग्रेस और दूसरे में बीजेपी को दबाये घूमने, बड़े नेताओं को साधने और आला अफ़सरों को खरीदने का हुनर जानने वाले बरसों बरस एक ही जगह जमे रहकर मौज करते हैं और नियम कायदों पर चलने वालों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। वोट बैंक की खातिर समाज के आखिरी छोर पर खड़े लोगों को भी मुफ़्त बिजली,पानी,राशन,ज़मीन और मकान देकर खरीद लिया गया है।

अन्ना के अनशन से एक कारगर लोकपाल की स्थापना की उम्मीद बनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर जिस हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है, उसका क्या हल हो, इस सवाल पर आम लोग से लेकर विशेषज्ञ तक किंकर्तव्य्विमूढ़ हैं। इस असहायता से ही वह हताशा पैदा हो रही है, जिसका असर अब देश की विकास पर पड़ने लगा है। हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों पर न्यायपालिका ने जबरदस्त सख्ती से कई बड़े घोटालों की जाँच में चुस्ती आई है । नतीजतन कई धुरंधर सलाखों के पीछे हैं, मगर इससे आम आदमी का भरोसा लौटता नहीं दिख रहा है।

कहते हैं, जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। लिहाज़ा भ्रष्टाचार की हिस्सेदारी थोड़ी ही सही कमोबेश देश का हर नागरिक कर रहा है। कई मर्तबा लगता है मुफ़्तखोरी ने हमारे जेनेटिक कोड को ही खराब कर दिया है। ऎसे में सुधार की संभावनाएँ ना के बराबर हैं। सुनते हैं विध्वंस में ही सृजन छिपा है। विनाश में ही नई उम्मीद का बीज मौजूद है। कई भविष्यवक्ताओं ने आज २१ मई का दिन मुकर्रर किया था पृथ्वी के खात्मे के लिये, मगर शाम होने आई अब तक तो कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। भ्रष्टाचारियों की राह के रोड़े हम जैसे लोगों को अब अगली किसी तारीख का इंतज़ार करना होगा।

कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअययन है,नींद क्यों रात भर नहीं आती ।

सोमवार, 16 मई 2011

महँगाई के मुद्दे पर राहुल-सोनिया भूमिगत

पेट्रोल के दाम एक बार फ़िर बढ़ा दिये गये। इस मर्तबा कीमतों में अब तक की सर्वाधिक सीधे पाँच रुपये की बढ़ोत्तरी ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है। यह वृद्धि आठ प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो सालों में पेट्रोल के दामों में प्रति लीटर 23 रूपयों की वृद्धि की जा चुकी है। गौरतलब है कि पिछले नौ महीनों में पेट्रोल की कीमत में नौ बार इज़ाफ़ा हो चुका है। इस तरह पेट्रोल की कीमत 47.93 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 63.37 रुपये हो गई है।

लेकिन दिन रात आम आदमी की दुहाई देने वाली केन्द्र सरकार पूरे मामले से पल्ला झाड़ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मुताबिक "पिछले वर्ष जून में हमने पेट्रोल कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का निर्णय लिया था। लिहाजा इन दिनों पेट्रोल कीमतों में वृद्धि या कमी का निर्णय सरकार नहीं लेती। पेट्रोल की ताजा मूल्य वृद्धि में सरकार ने कोई भूमिका नहीं निभाई है, क्योंकि कीमतें नियंत्रण मुक्त हो चुकी हैं। उन्होंने एक तरह से तेल विपणन कम्पनियों के निर्णय का पक्ष लेते हुए कहा कि पिछले 11 महीनों में कच्चे तेल की कीमत 42 डॉलर प्रति बैरल बढ़ गई हैं। वे कहते हैं कि जब पिछले जून में कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने का निर्णय लिया गया था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 68 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन आज यह दर बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।

इधर हमेशा की तरह भाजपा और वामपंथी दल गाल बजाकर अपने लोकतांत्रिक दायित्वों की पूर्ति का दम भरने में लगे हैं । दो-चार दिन सड़कों पर चक्काजाम करने या साइकल,बैलगाड़ी,घोड़ागाड़ी दौड़ाने से सरकार के कान पर जूँ रेंगती तो शायद हालात कुछ और होते। मगर बयान जारी कर चेहरा चमकाने की राजनीति के मौजूदा दौर में बीजेपी ने कहा कि केंद्र सरकार पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए चुनाव परिणामों का इंतज़ार कर रही थी। बीजेपी ने इसे पश्चिम बंगाल, केरल और असम में काँग्रेस की जीत का जनता को ‘‘तोहफा’’ बताया है । अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृध्दि के सरकार के तर्क की काट में भाजपा ने कहा कि सरकार पेट्रोल पर लगाए गए बेतहाशा केन्द्रीय करों को कम करके जनता को राहत दे सकती है। वामपंथी पार्टियों ने मूल्य वृद्धि को संप्रग सरकार का ‘क्रूर हमला’निरुपित करते हुए हर तरफ से महंगाई से त्रस्त लोगों को जबरदस्त झटका बताया है। साथ ही विनियमन नीति वापस लेने की माँग की है।

इस पूरे मसले में एक बात हैरान करने वाली है । जब भी महँगाई से जुड़े मुद्दे पर देश में बैचेनी बढ़ती है। सोनिया गाँधी और उनके सुपुत्र राहुल गाँधी भूमिगत हो जाते हैं । दलित के घर भोजन खाकर,कलावती का मुद्दा संसद में उठाकर,सिर पर मिट्टी ढ़ोकर और भट्टा पारसौल के किसानों के बीच जाकर गिरफ़्तारी देने वाले "काँग्रेस के युवराज" कब तक भारतीय जनमानस की भावनाओं से खेलते रहेंगे। आम जनता की रोज़ी-रोटी से जुड़े मुद्दों पर काँग्रेस के इस "पोस्टर ब्वाय" की चुप्पी आपराधिकता की श्रेणी में आती है। पेट्रोल, डीज़ल या रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी सिर्फ़ इन उत्पादों तक ही सीमित नहीं होती। इनका असर रोज़मर्रा की ज़रुरतों की हर छोटी बड़ी वस्तु पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पड़ता है।

बाज़ारीकरण की नीति पर चलकर आखिर देश जा कहाँ रहा है ? बिजली के बाद अब प्रकृति प्रदत्त संसाधन भी निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। प्याऊ लगाकर प्यासे कँठों को तर करने का पुण्य कमाने वाले देश में आज पानी एक "कमोडिटी" है। मुनाफ़े के इस धँधे में चाँदी काटने के इरादे से केन्द्र और राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारों पर नाच रही हैं। भोपाल के कोलार क्षेत्र में नगर पालिका बनाकर नेताओं की कमाई के लिये चारागाह तो तैयार कर दी गई, मगर यहाँ की पेयजल समस्या के निराकरण की कोई पहल नहीं की गई। यह जानकर कलेजा मुँह को आता है कि औसतन दस- बारह हज़ार रुपये महीना कमाने वाले परिवार को मकान किराया,बिजली,दूध और पेट्रोल जैसे ज़रुरी खर्च के अलावा पानी के इंतज़ाम पर औसतन हर महीने सात सौ से आठ सौ रुपये चुकाना पड़ रहे हैं । यही हाल सड़कों किनारे बनाई गई अँधाधुँध पार्किंग का है। पाँच-पाँच, दस-दस रुपये के ज़रिये लोग हर रोज़ ना जाने कितने रुपये चुकाते हैं। अब तो टोल नाकों के ज़रिये सड़कों पर चलने की भारी कीमत चुकाना पड़ रही है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। कोई नियम कायदा नहीं है।

दरअसल बाज़ारीकरण की व्यवस्था भ्रष्ट समाज में ही पुष्पित और पल्लवित हो सकती है। उपभोक्तावादी संस्कृति में नैतिकता और ईमानदारी का कोई मूल्य ही नहीं है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ईमानदारी अनमोल है,वास्तव में बाज़ारवाद की राह पर आगे बढ़ते समाज में यह "बेमोल" है । सत्ता चलाने वाले भी बखूबी जान चुके हैं कि इस भ्रष्ट तंत्र में कीमतों में इज़ाफ़े से किसी पर भी कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ज़रा सोच कर देखिये दाम बढ़ेगे तो व्यापारी से लेकर मज़दूर और डॉक्टर से लेकर ठेले वाले तक सभी अपने- अपने स्तर पर बढ़ती महँगाई से तालमेल बिठाने का एडजस्टमेंट कर लेते हैं। और कुछ दिनों के हँगामे के बाद गाड़ी फ़िर पटरी पर चलने लगती है।

इस चक्की में सिर्फ़ वही पिसने वाला है जिसे ईमानदारी से जीवन गुज़र बसर करने का भूत सवार है। देश की कुलाँचे मारती जीडीपी में वैसे भी ईमानदार जीवों का भला क्या योगदान है ? इन मरदूदों के भरोसे चले, तो देश की इकॉनॉमी का भट्टा बैठना तय है और औद्योगिक विकास की दर का गर्त में समाना लाज़िमी है। पूरी बात का लब्बेलुआब यह कि जनाब यह सतयुग नहीं कलिकाल है, जहाँ भोगवादियों का बोलबाला है। इस दौर के मार्गकँटकों (ईमानदारो) की विलुप्तप्राय प्रजाति को धरती से हटाने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है। देश की तरक्की और दुनिया का सिरमौर बनने के लिये भ्रष्टाचार ज़िन्दाबाद। और जब भ्रष्टाचार है, तो कीमतों में इज़ाफ़े से कैसा डर ? इस हाथ ले उस हाथ दे की अर्थव्यवस्था में महँगाई कोई समस्या नहीं है । यह तो महज़ एक सियासी दाँव है,जो सत्ता हथियाने के लिये राजनीतिक दल अपनी सहूलियत से समय-समय पर आज़माते हैं।