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सोमवार, 15 अप्रैल 2013

बिकाऊ विपक्ष के कँधे पर सवार "विकास पुरुष"


मध्यप्रदेश मे राजनीतिक और पत्रकारीय धर्म से मुँह फ़ेर चुके लोगों का बोलबाला होने से चारों ओर "धूरधानी" मची हुई है। बिकाऊ विपक्ष और बज़रिये जनसंपर्क विभाग सत्ता की चौखट पर कलम गिरवी रख चुके पत्रकारों की बदौलत प्रदेश विकास के ग्राफ़ पर कुलाँचे मारता दिखाई दे रहा है। मगर हकीकत के आइने में सत्ता पक्ष के साथ गलबहियाँ करते विपक्ष और पत्रकारों के बदनुमा चेहरों को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। हाल ही में राजनीतिक चिंतक के.एन. गोविन्दाचार्य ने मध्यप्रदेश सरकार के बारे मे कहा था प्रदेश की भाजपा सरकार पूर्व शासित काँग्रेस की दिग्विजय सरकार से ज्यादा भ्रष्ट है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार को रोकने में असफल साबित हुए हैं। गोविंदाचार्य ने कहा है कि इतना भ्रष्टाचार तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जमाने में भी नहीं था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मंत्रियों पर अँकुश नहीं रखने के कारण प्रदेश में भ्रष्टाचार में बेतहाशा वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार चलाने के लिए चौहान ने मंत्रियों को खुली छूट दे रखी है। उन्होंने कहा कि भाजपा के शासन में उद्योगपति और अधिकारी खुश हैं, जबकि किसान दुखी हैं।
गोविंदाचार्य की तस्दीक प्रदेश के हालात भी करते हैं। प्रदेश में काँग्रेस के बड़े नेता सत्ताधारी दल के साथ मिलकर जमकर फ़ायदा ले रहे हैं । नतीजतन विपक्ष का अँकुश पूरी तरह हट चुका है। जनसंपर्क विभाग ने सैकड़ों करोड़ के बजट के बूते कहीं विज्ञापनों के ज़रिए अखबार मालिकों, तो कहीं सीधे पत्रकारों को साध रखा है। जो पत्रकार सच बात कहने का " दुस्साहस " करते हैं, उन्हें सरकारी अधिमान्यता देने से भी इंकार कर दिया जाता है। उधर कई नौकरशाह सरकार के हमजोली बनकर हजारों करोड़ के आसामी बन चुके हैं। ये वो अधिकारी हैं, जो प्रदेश से कमाया धन दूसरे प्रदेशों की प्रॉपर्टी में निवेश कर रहे हैं और जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।
दूसरी तरफ़ अवैध खनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छोटे कर्मचारियों को शातिताना अँदाज़ में हमेशा के लिए खामोश किया जा रहा है। हाल ही में रतलाम में खनिज निेरीक्षक संजय भार्गव की सड़क हादसे में मौत हो गई। इससे पहले भोपाल से लगे बैरसिया के गाँव में पीडब्ल्यूडी के सब इंजीनियर रामेशवर प्रसाद चतुर्वेदी की भी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। सरसरी तौर पर ये सामान्य हादसे लगते हैं। लेकिन इन मौतों को बड़े ही शातिराना तरीके से अँजाम तक पहुँचाया गया, जिससे "हत्या" को हादसा साबित किया जा सके। इन दोनों ही मामलों में मु्ख्यमंत्री निवास में सीधे धमक रखने वाले प्रदेश के एक बड़े ठेकेदार का नाम सामने आ रहा है। इसी तरह पिछले साल होली पर मुरैना में खनन माफ़ियाओं ने एक होनहार आईपीएस नरेन्द्र कुमार को मौत के घाट उतार दिया था। मगर हुआ क्या ?
जिस सीबीआई पर काँग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है, उसी ने एक अदने से आदमी को अपराधी बनाकर पेश कर दिया। आनन-फ़ानन में अदालती फ़ैसला भी हो गया। जिस तरह आरुषि-हेमराज मामले में सीबीआई ने कृष्णा, राजकुमार और प्रदीप मंडल को फ़ाँसी का फ़ँदा पहनाने की पूरी तैयारी कर ली थी । उसी तरह शहला मसूद हत्याकांड में रसूखदार लोगों को बचाने के लिए ज़ाहिदा और सबा जैसे लोगों को बिला वजह फ़ँसाया जा रहा है। फ़र्क है तो सिर्फ़ इतना कि दिल्ली की मीडिया कृष्णा और राजकुमार की बेगुनाही साबित करने के किए उठ खड़ी हुई थी। मगर प्रदेश में सम्मानों, प्रोजेक्टों, विज्ञापनों, सस्ते प्लाटों और इसी तरह के कई अन्य फ़ायदों के बोझ तले दबे कलमवीरों का ज़मीर क्या कभी जाग पाएगा।