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बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

सूख रही हैं धरती की धमनियाँ

धरती की धमनियाँ सूख रही हैं। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए तरह-तरह से संकेत दे रही हैं। कभी बाढ़ के माध्यम आगाह कर रहती हैं, तो कहीं सूरज की तपन से सकुचा कर गर्मी की दस्तक सुनते ही अपना दामन समेट लेती हैं। भारत की सनातनी परम्परा ने सदियों से सलिलाओं को पुण्यदायिनी मान कर पूजा है। कई सभ्यताएँ नदी तीरे अस्तित्व में आईं, फ़ली-फ़ूलीं और विलुप्त हो गईं। आज के वैज्ञानिक दौर में हमने तकनीक की मदद से ब्रह्मांड का भविष्य पढ़ने की ताकत भले ही हासिल कर ली हो, लेकिन हम सभी भयावह चित्र दिखा-दिखा कर लोगों का ध्यान समस्या की ओर खींचने में कामयाब जरूर हुए हैं। हमारी अब तक की सारी कोशिशें रट्टू तोतों के उस समूह की तरह है, जो शिकारी के जाल से बचने के तमाम उपाय तो जानते हैं, उन्हें लगातार दोहराते भी रहते हैं, मगर दाना भी चुगते हैं और जाल में भी फ़ँसते हैं। अगर गाल बजाने से ही सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहरों की साक्षी रही नदियों का अस्तित्व बचाया जा सकता, तो बेशक हम हिन्दुस्थानियों से बड़ा शायद ही कोई होता।
देश की ज्यादातर नदियों की दुर्दशा हमारी नीयत और कोशिशों का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख देती हैं। प्रकृति की इन अनमोल कृतियों को बचाने में अब तक के सारे प्रयास हवा-हवाई ही साबित हुए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक हालिया रिपोर्ट सरकार और समाज के तदर्थवादी रवैये को उजागर करती है। रिपोर्ट के मुताबिक देश की 445 नदियों में से 275 नदियाँ प्रदूषित हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से असम तक देश के हर कोने में नदियाँ प्रदूषण के बोझ से दबी जा रही हैं। सरिताओं का अविरल प्रवाह थम सा गया है और ही उनमें अब जल धारण करने की क्षमता शेष है। ऐसे में साल के अधिकांश समय में नदियों में पानी की जगह रेत ही रेत दिखायी पड़े, तो ज्यादा आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
देश के कुछ क्षेत्रों में नदियाँ ही पेयजल की मुख्य स्रोत हैं। ऐसे में प्रदूषित और सूखती नदियाँ कब तक उनकी प्यास बुझा पाएँगी, यह चिंता चिंतन का विषय है। राष्ट्रीय नदी हो या छोटी-बड़ी अन्य नदियाँ, सभी का अस्तित्व खतरे में है। इनमें श्रेष्ठ मानी जाने वाली प्राचीन नदी सरस्वती विलुप्त होकर इतिहास के पन्नों में समा गयी। ऐसी और भी नदियाँ जिंदा रह कर मानव सृष्टि का साथ देने में अपनी असमर्थता जाहिर कर रही हैं।
झारखंड की दामोदर, जुमार, कारो, कोयल, शंख और स्वर्णरेखा भी प्रदूषण के मानक से ऊपर जा रही है। निश्चय ही इन नदियों का प्रदूषित जल केवल जलीय जीवों के लिए घातक सिद्ध होगा, बल्कि यह भूजल के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर हमें अस्पताल की राह भी दिखाने वाला है।
नदियों का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है, जिसे भारतीयों से बेहतर कौन जान सकता है। नदियों की सफाई को लेकर सभी स्तरों पर दृष्टि का अभाव दिखता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पवित्र नदियों का जल विभिन्न योनियों में ब्रह्मांड में विचरण कर रहे हमारे पूर्वजों की तृप्ति और वैतरिणी को पार करने में सहायक होता है। अपने पूर्वजों को तारने के लिए हम पुण्य सलिलाओं की ओर देखते हैं, मगर इन नदियों को कौन तारेगा? जब तक अपने उद्गम स्थान से विसर्जन के स्थान तक इन्हें सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक इनके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह यूँ ही लगा रहेगा।
स्वच्छ जल इन नदियों का वस्त्र है और जब तक इनके वस्त्र स्वच्छ नहीं होंगे, कोई भी हम सभ्य नहीं कहला सकते। नदियों का अस्तित्व बनाये रखना कोई मजाक नहीं है। ये ना हो कि नदियों के साथ मजाक करते-करते मानव सभ्यता कब मजाक बन जाये हमें पता ही नहीं चले। ये नदी नाले, तालाब, सब एक-दूसरे को पोषण देते हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। मानव ने सदा ही स्वयं को सभ्य कहा है पर प्रमाण देने में शायद सफल नहीं हो पाया। क्योंकि प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या और जो हो रहा है वही सभ्यता की परिभाषा है तो पता नहीं?

हजारों वर्षों से मानव सभ्यता को पुष्पित-पल्वित करने वाली नदियाँ प्रदूषण की शिकार हो गई हैं। आज इनका अस्तित्व खतरे में है। प्रमुख कारण है -सीवेज।
नदियाँ इतनी तेजी से नालों में बदलती जा रही हैं इसका सबसे बड़ा कारण है शहरों से निकलने वाला सीवेज जो साफ किए बगैर सीधे नदियों में बहता है। देश में 650 महानगर, शहर और कस्बे हैं जिनकी गंदगी इन नदियों में जा रही है। शहरों को रोजाना जितने पीने के पानी की आपूर्ति होती है उसका 30 प्रतिशत सीवेज के रूप में बाहर आता है।
मुख्य प्रदूषित नदियाँ
छत्तीसगढ़- हसदेव, केलो, खारजन, महानदी, शिवनाश
उत्तरप्रदेश- गोमती, हिडन, काली, रामगंगा, राप्ती, रिहंद, सरयू, गंगा, यमुना और कोसी
उत्तराखण्ड -गंगा, सुसवा, धेला, भेल्ला, कोसी
बिहार- गंगा, हखारा, मनुसागर, रामरेखा, सीरसिआ
दिल्ली- यमुना
हरियाणायमुना, घग्गर
झारखण्ड- बोकारो, दामोदर, जुमरकारों, कोएन नार्थ, कोएल, सांख, स्वर्णरेखा।

पंजाब- धग्गर, सतलुज