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सोमवार, 14 जून 2010

कौन बाँटेगा गैस पीड़ितों का दर्द

गैस त्रासदी पर सीजेएम का फ़ैसला गैस पीड़ितों के ज़ख्मों पर नमक साबित हुआ है । फ़ैसला आने के बाद से मीडिया में आये दिन हो रहे खुलासों ने भारतीय राजनीति के चरित्र को उजागर कर दिया है । अदालती फ़ैसले ने कई चेहरों और देश की प्रमुख सियासी पार्टियों के चेहरे पर पड़े नकाब नोच दिये हैं । आज सब एक सुर में अर्जुन सिंह से जवाब माँग रहे हैं,लेकिन क्या वे अकेले ही गैस पीड़ितों के गुनाहगार हैं ? आज मोती सिंह अर्जुन सिंह को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं,एक वक्त में वे तत्कालीन मुख्यमंत्री के बेहद करीबी थे । क्या उन्होंने अपनी भूमिका को ठीक से अंजाम दिया ? अगले ही साल वीरता पुरस्कार हासिल करने पुलिस अधिकारी स्वराज पुरी की बहादुरी का सच जनता के सामने आ चुका है ।
गैस राहत मंत्रियों के तौर पर काम करने वाले नेताओं की कारगुज़ारियाँ भी किसी से छिपी नहीं हैं । क्या ये सभी यूनियन कार्बाइड के आला अफ़सरों से कम कसूरवार हैं ? क्या सरकारी खर्च पर कमेटी बनाकर कुछ लोगों को लाभ पहुँचाने की मुख्यमंत्री की हालिया कवायद से एंडरसन को भारत लाने और उसे सज़ा दिलाने की कोई सूरत बनती दिखाई देती है ? एक बार फ़िर गरीब और असहाय जनता को न्याय दिलाने के सब्ज़बाग दिखाकर अपनी सियासत चमकाने की कोशिशें ज़ोर पकड़ने लगी है ।
वारेन एंडरसन की कंपनी से निकले ज़हरीले रसायन ने तो कई लोगों को उसी रात मौत की नींद सुला दिया । हज़ारों लोग पिछले पचीस सालों से तिल-तिल कर मर रहे हैं । यूनियन कार्बाइड से फ़ैले प्रदूषण पर देश दुनिया में बरसों से खूब चर्चा भी हो रही है । इस बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ किसी भी तरह की हमदर्दी हो ही नहीं सकती । क्या इस मसले की आड़ लेकर सियासी दाँवपेंच चल रहे नेताओं के अपराध को नज़र अंदाज़ किया जा सकता है ?
एक बार फ़िर गैस पीड़ितों की पीड़ा का मसला राजनीतिक दलों की उठापटक में दम तोड़ता दिखाई दे रहा है । मीडिया भी जाने अनजाने राजनेताओं की कठपुतली से इतर अपनी भूमिका साबित नहीं कर सका है । आपसी जूतम पैजार में गैस पीड़ितों के मूल मुद्दे बड़ी ही चतुराई से एक बार फ़िर दरकिनार किये जा रहे हैं । घोटाले भारतीय लोकतंत्र की त्रासदी बन चुके हैं । लाशों पर होने वाली राजनीति का प्रदूषण यूनियन कार्बाइड से फ़ैले रासायनिक प्रदूषण से कम खतरनाक नहीं है ।
गैस पीड़ितों के दर्द को समझने के लिये उनकी बस्तियों में जाने की किसी नेता को फ़ुर्सत नहीं है । बयानों से अपनी वीरता के झंडे गाड़ने वाले मुख्यमंत्री लगातार मीडिया का जमावड़ा लगाकर केन्द्र सरकार और अर्जुन सिंह से खतो किताबत का ब्यौरा देने में मसरुफ़ हैं । मामले को सियासी रंग देने के लिये एक कमेटी बनाकर कुछ लोगों को रोज़गार देने का "भारी भरकम" काम ज़रुर किया है,लेकिन सवाल फ़िर वही कि आखिर अब तक सभी सो क्यों रहे थे । वैसे भी इस सियासी प्रपंच में गैस पीड़ितों के दर्द की कोई दवा नहीं है । अगर इनकी नीयत में ईमानदारी थी तो गैस पीड़ित बस्तियों में अब तक साफ़ पेयजल मुहैया क्यों नहीं हो सका ? खोखले हो चुके शरीरों का बोझ ढ़ोते लोगों का पुनर्वास क्यों नहीं हो सका ? बोझिल लोगों के लिये कम मेहनत वाले रोज़गार मिल सके,इसकी व्यवस्था अब तक क्यों नहीं हो सकी ? गैस पीड़ितों के नाम पर आये पैसों की बंदरबाँट में कोई भी दल पीछे नहीं है । कोई कार्बाइड के नये मालिक डाउ केमिकल को बचाने के नाम पर लूट रहा है , तो कोई रासायनिक कचरे को खत्म करने के ढ़ोंग के ज़रिये तिजोरी भर रहा है ।
संभवतः ये देश की पहली और अनोखी विभीषिका होगी जिसमें केन्द्र या राज्य सरकार ने मुआवज़े के तौर पर धेला भी नहीं खर्चा है , जबकि सड़क हादसे हों या रेल दुर्घटना या फ़िर हवाई हादसे , लाखों के मुआवज़े देने में सरकारें कभी कोताही नहीं करतीं । मगर गैस पीड़ितों को मुआवज़ा देना तो दूर उनके समुचित पुनर्वास, इलाज, रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दों पर बात करना भी किसी राजनीतिक सल को गवारा नहीं है । इस फ़ैसले बाद उठे बवाल ने एक बार फ़िर यह साबित कर दिया है कि सरकारें किसी भी दल की हों भारतीय लोकतंत्र में नेताओं के व्यक्तिगत हित ही सर्वोपरि हैं । अब तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सभी पार्टियों के बीच मौन समझौता हो चुका है सत्तासुख मिल बाँट कर उठाने का । लिहाज़ा सत्ता में दल कोई भी क्यों ना रहे , मलाई सभी मिल बाँट कर खायेंगे । इससे एक बात तो साफ़ हो चुकी है कि गैस पीड़ितों को अपनी आवाज़ अपने तरीके खुद ही बुलंद करना होगी । संघर्ष के सूत्र अपने हाथों में लेना पड़ेंगे ।