बुधवार, 20 जनवरी 2016

मध्यप्रदेश का घोटाला पुराण


257 साइट्स को 12 करोड़ 73 लाख 23 हजार 527 रुपए    59 चैनलों को 80 करोड़ 53 लाख 68 हजार 306 रुपए का भुगतान 
लोकल चैनल को 73 करोड़
107 प्रचार संस्थाओं को 57 करोड़ 80 लाख 68 हजार 793
केवल एक ही संस्था को 21 करोड़ से ज्यादा

 किस चैनल को कितना भुगतान 
एबीपी न्यूज़              12 करोड़ 76 लाख
सहारा समय              12 करोड़ 50 लाख
इंडिया न्यूज़               8 करोड़ 68 लाख        
सीएनबीसी आवाज          6 करोड़ 50 लाख
ज़ी मीडिया                6 करोड़ 10 लाख
टाइम्स नाउ               1 करोड़ 39 लाख
न्यूज़ वर्ल्ड                1 करोड़ 28 लाख
टी वी उर्दू               लगभग 1 करोड़
एनडीटीवी                 12 लाख 84 हजार
 मध्यप्रदेश के स्थानीय चैनल
टीवी मध्यप्रदेश       13 करोड़
बंसल न्यूज़            11 करोड़ 57 लाख
साधना न्यूज़ मध्यप्रदेश   8 करोड़ 78 लाख
दूरदर्शन               मात्र 8 लाख

लोकल चैनल आपरेटर
हाथवे इंदौर                        50 लाख
सुदर्शन न्यूज़                      14 लाख
सिटी केबल                        84 लाख
भास्कर मल्टीनेट                    6 लाख 95 हजार
सेंट्रल इंडिया डिजिटल नेटवर्क          1 करोड़ 41 लाख
ध्य प्रदेश में घोटालों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। अजब प्रदेश की गजब कहानी यानी मध्यप्रदेश के घोटाला पुराण में एक अध्याय और जुड़ गया है। शिवराज सिंह चौहान की रहनुमाई में सरकार का शायद ही कोई ऐसा महकमा बचा हो जहाँ घोटालेबाज़ों की पौ बारह ना हो। व्यापमं घोटाला उजागर हो जाने की बेचैनी के बीच शिवराज सरकार का दामन अब विज्ञापन घोटाले के कीचड़ से सन गया है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में काँग्रेस विधायक बाला बच्चन के तारांकित प्रश्न क्रमांक 283 के माध्यम से जनसम्पर्क विभाग की विज्ञापन नीति के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब ने सभी के कान खड़े कर दिए हैं। 8 दिसंबर 2015 को जनसम्पर्क विभाग के मंत्री राजेंद्र शुक्ल द्वारा दी गई जानकारी में घोटाले की बू रही थी। रही-सही कसर दिलजलों और ताड़ने वालों की तीखी नजरों ने पूरी कर दी। और इस तरह विज्ञापन घोटाले की परतें उधड़ने लगीं। प्रदेश के राजनैतिक और प्रशासनिक हलकों में मीडिया मैनेजमेंट और विज्ञापन घोटाले पर कानाफ़ूसी का सिलसिला तेज हो चला है।
बहरहाल विधानसभा में दी गई जानकारी से पता चला है कि प्रचार के नाम पर शिवराज सरकार ने करीब 300 चैनलों और वेबसाइटों को लगभग डेढ़ सौ करोड़ रुपए बाँट दिए। साल 2012 में सरकार ने धड़ल्ले से उन चैनलों और वेबसाइटों पर मेहर बरसाई, जो बंद पड़ी हैं या जिनमें से अधिकतर की टीआरपी ना के बराबर है। दस्तावेजों से पता चलता है कि इंटरनेट की दुनिया में "यशोगान" के लिए 235 वेबसाइटों/वेबपोर्टलों को साढ़े चार साल में लगभग सवा बारह करोड़ रूपए के विज्ञापन नियम विरूद्ध तरीके से बाँट दिए गए। इसी प्रकार 70 न्यूज चैनलों को लगभग 72 करोड़ रूपए और क्षेत्रीय प्रचार के नाम पर लगभग 58 करोड़ की रेवड़ियाँ दे दी गईं। 235 वेबसाइटों में से मात्र 25 ही ऐसी हैं जो नियमित पत्रकारिता कर रही हैं। ज्यादातर फ़र्जी
और गुमनाम हैं। साइबर वर्ल्ड में इनका कोई अता-पता नहीं है, मगर सरकारी खजाने इनमें से कई को आठ से दस लाख रूपए तक का भुगतान किया गया है। 210 वेबसाइटों के संचालक नामी-गिरामी पत्रकारों के रिश्तेदार या जनसंपर्क विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं, जिन्हें भारी भरकम विज्ञापन दिए गए हैं। कुछ डमी पत्रकारों के तौर पर भाजपा के प्रभावशाली नेताओं से जुड़े लोग भी हैं।
सूबे के मुखिया देश-दुनिया में "सेल्फ़ ब्रांडिंग" के लिए जनसम्पर्क विभाग का जम कर दोहन करने में लगे हैं। विरूदावली गाने के लिए बीते कई सालों से पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। सरकार की कल्याणकारी  योजनाओं की जानकारी जन-जन तक पहुँचाने के लिये बनाया गया जनसम्पर्क महकमा महज मुख्यमंत्री का चेहरा चमकाने का जरिया बन कर रह गया है। ठकुर सुहाती मे लगे खबरनवीसों की इस दौर में पौ-बारह है, या फ़िर कलम को किनारे रख कर खामोशी अख्तियार करने वाले पत्रकार सरकार की "नाक के बाल" बने हुए हैं। जमीनी तौर पर भले ही योजनाएँ हवा-हवाई हों, कागजों पर और आम जनमानस में सब कुछ चुस्त-दुरूस्त है। प्रचार के इस खेल में सत्ताधारी दल के तमाम छोटे-बड़े नेता, उनके सहयोगी, आरएसएस से जुड़े लोग और जनसम्पर्क महकमे के अधिकारियों के रिश्तेदार जम कर चाँदी काट रहे हैं। "सरकारी विज्ञापनों" की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए ना जाने कितने लोग रातोंरात पत्रकार बन गए है, जिन्हें ठीक से कलम पकड़ना भी नहीं आती।
हालत ये है कि ईमानदारी से काम करने वाले छोटे अखबारों को साल दर साल विज्ञापन नहीं दिया जाता। वहीं ऐसी पत्र-पत्रिकाओं की भरमार है, जो सब कुछ तय होने के बाद छापना शुरू की जाती हैं और अगले ही अंक से बीस से पच्चीस हजार के विज्ञापन मिलने लगते हैं। राजधानी में ऐसे प्रकाशनों की तादाद हजार से भी ज्यादा है। इसकी बानगी देखिये- राजधानी से कला एवं संस्कृति के नाम पर त्रैमासिक पत्रिका निकालने वाले को दूसरे ही अंक से आवरण पर अनवरत सरकारी विज्ञापन मिलने लगे, जबकि आरटीआई पर पाक्षिक समाचार पत्र निकालने वाले को पहले एक साल, फ़िर तीन साल और अब पाँच साल पूरा करने के नियम का हवाला दे कर टरकाया जा रहा है। हद तो ये है कि सांस्कृतिक संस्थाओं के कार्यक्रमों के आमंत्रण पत्रों पर सरकारी विज्ञापन छपने लगे हैं। कई लोगों को तो सरकारी विज्ञापनों की मलाई का चस्का कुछ ऐसा लगा है कि उन्होंने अपने गृह प्रदेशों से मुँह मोड़ कर भोपाल में ही डेरा जमा लिया है।
हर महीने-दो महीने में विदेशों की सैर और परदेशी मेजबानों को महँगे तोहफ़ों से नवाजने पर करोड़ों रूपए फ़ूँक देना तो जैस अब दस्तूर हो गया है। जनता पर तरह-तरह के टैक्स लादने के बावजूद पिछले कुछ सालों से प्रदेश सरकार की माली हालत खराब है। सरकार अक्सर बाजार से ऊँची दरों पर कर्ज उठा रही है। मगर उसकी शाहखर्ची है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही। "पाँव-पाँव वाले भैया" उड़न खटोले से नीचे पैर धरने को तैयार ही नहीं हैं।
आपराधिक छवि वाले संचालकों पर कृपा
जनसम्पर्क विभाग की रहमत उन चैनल मालिकों पर भी बरसी जो जेल की हवा खा रहे हैं या फिर आपराधिक मामले में संलिप्त हैं। मसलन पी7 के संचालक केसर सिंह पर आर्थिक अपराध के कई मामले चल रहे हैं। उनकी बंद पड़ी चैनल को सरकारी खजाने से 76 लाख रुपए की राशि दी गई है।
चिटफंड कंपनी साईं प्रसाद मीडिया लिमिटेड के चैनल को 23 करोड़ 33 लाख रुपए दिए गए हैं जिसमें कंपनी ने दो बार कंपनी और चैनल का नाम बदला। चैनल का मालिक भापकर मुंबई जेल में बंद है। खबर भारती, भारत समाचार और स्टेट न्यूज़ को क्रमशः 9 करोड़, 45 लाख और 1 करोड़ से नवाजा गया है। बात यहीं खत्म नहीं होती, प्रोडक्शन हाउस निकिता फिल्म्स को चैनल की आड़ में 61 लाख रुपए की रेवाड़ी बाँटी गयी है। कई नेशनल चैनल्स के प्रादेशिक ब्यूरो भी इस घोटाले की आड़ में भरी भरकम राशि ले कर उपकृत हुए हैं, इस घोटाले की फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है
जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख सचिव एस. के. मिश्रा ने मंत्रालय में इस घोटाले की जाँच के आदेश दिए हैं। वहीं काँग्रेस इस मामले के तार व्यापमं से जोड़ कर सरकार को घेरने में लग गई है काँग्रेस नेताओं ने प्रदेश सरकार पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को खरीदने का आरोप लगाया है उनका आरोप है कि सरकार मीडिया मैनजमेंट में जनधन लुटा कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को खरीदने की कोशिश में जुटी है।
विधानसभा में जनसंपर्क विभाग से इस बारे में सवाल करने वाले काँग्रेस विधायक बाला बच्चन का कहना है कि यह सारा पैसा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की छवि बचाये रखने के नाम पर हथियाया गया है। इस मामले में अपने लोगों को उपकृत करने तथा भारी कमीशनखोरी से इंकार नहीं किया जा सकता। श्री बच्चन ने कहा कि सूची में शामिल कुछ लोग वाजिब हैं जिनको विज्ञापन दिए जाने का हम स्वागत करते हैं, लेकिन सूची में शामिल कई नाम सन्देहास्पद हैं। वहीं काँग्रेस के मुख्य प्रवक्ता के. के. मिश्रा की इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया है। वे कहते हैं- "देश की आजादी में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानी मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी लेकिन लोकतंत्र के मूल्यों को भ्रष्टाचार से बचाने का प्रतिबिम्ब मीडिया भी शिवराज सिंह चौहान के बदनाम चेहरे को बचाने में इस्तेमाल हो गया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पहले डम्पर कांड, फिर व्यापमं घोटाल के कलंक को धोने के लिए लोकतंत्र के महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ की प्रतिमा और प्रतिभा को खंडित करने का दुस्साहस सरकारी खजाने से धन लूटा कर किया है।"
खींचो कमानों को, ना तलवार निकालो।
जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो।
मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी की ये पंक्तियाँ सच्चाई की उस ताकत को बयान करती हैं, जिसमें बड़े से बड़े हुक्मरानों से भी टकराने का माद्दा होता है। बड़े अदब और माफ़ी के साथ मध्यप्रदेश के सिलसिले में इस शेर को लगता है, नए सिरे से गढ़ना होगा-
खोलो ना तुम मुँह, कलम को छुपा दो।
गर छाई हो कड़की, तो अखबार निकालो।




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