गुरुवार, 30 अगस्त 2012

लोकतंत्र की दीमक


मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वक्त वो सब हो रहा है , जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । कल तक खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानकर शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ़ खेमेबंदी का झंडा उठाकर चलने वाले कैलाश विजयवर्गीय आज सरकार की झूठन समेट रहे हैं । चाहे वो मुरैना में हुई आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या का मामला हो , महज़ सात सालों में अरबपति बने दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के सीधे ताल्लुकात का मुद्दा हो या कोल ब्लॉक आवंटन मामले में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल हों । मुख्यमंत्री मुँह में दही जमा कर बैठे हैं और कैलाश विजयवर्गीय उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं । गोया कि सूबे के मुखिया बनने का ख्वाब हुआ हवा , अब तो आलम ये है कि कुर्सी बचाए रखने के लिए चौहान की चरणोदक पीने में भी गुरेज़ नहीं रहा ।

 रही सही कसर एमपीसीए के चुनाव में मिली करारी मात ने निकाल दी । धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए माधवराव सिंधिया ने क्लीन स्वीप कर दिया । कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र के सभी हथकंडे अपनाए ,मगर वो भूल गए कि गली-कूचों में “भिया और भिडु “ तैयार करके विधायकी हासिल करना अलग बात है , भद्र और कुलीन समाज का खेल माने जाने वाले क्रिकेट की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना और बात । 

इसी तरह देश के इतिहास में शायद ये पहला ही मौका होगा , जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो सौ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के हुजूम ने इंदौर में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल दिया । संघी मनोज परमार मामले के जाँच अधिकारी के एकाएक तबादले से नाराज़ थे । सूबे के मुखिया के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी कर रहे इन कार्यकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को प्रताड़ित कर रही है । इंदौर इन दिनों गैंगवार और माफ़िया की गिरफ़्त में फ़ँस कर कराह रहा है । मगर इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं । भाजपा समर्थक व्यापारी प्रशासन से गुँडाराज से छुटकारा दिलाने की गुहार लगा रहे हैं ।

प्रदेश के मुखिया हवाई सफ़र, विदेश भ्रमण, तीर्थाटन, देवदर्शन या फ़िर प्रदेश के रमणिक स्थलों पर परिवार के साथ सुस्ताने में व्यस्त रहते हैं । इन गतिविधियों से कभी कुछ वक्त मिल जाता है , तो मीडिया का चोंगा थाम कर देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपने “अनमोल वचन” प्रसारित करके उपस्थित दर्ज कराते रहते हैं । "मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थूकने" की प्रवृत्ति के पोषक मुख्यमंत्री प्रदेश की हर बड़ी घटना पर मुँह सिलकर बैठ जाते हैं । ऎसे मौके पर नरोत्तम मिश्र या कैलाश विजयवर्गीय को आगे कर दिया जाता है । लोग मायावती के प्रचार अभियान पर सरकारी खज़ाने के १२० करोड़ रुपए फ़ूँक दिए जाने पर गाल बजाते हैं । यदि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह की ब्रांडिंग पर जनसंपर्क, वन्या , खेल और तमाम अन्य महकमों के मद से लुटाए गए खज़ाने का अनुमान लाया जाए , तो ये किसी भी सूरत में ३५० करोड़ रुपए से कम नहीं बैठेगा ।

इसके अलावा यह भी एक दिलचस्प खबर है कि सूबे के मुखिया औसत हर रोज़ दो घंटे हवाई यात्रा में बिताते हैं । सब कुछ हवा में ही है, ज़मीन पर कुछ नहीं अगर है भी तो बस पोलपट्टी । यही नतीजा है कि भाजपा के ज़िला पदाधिकारी भी अपना सिर पीट रहे हैं । वे कहते हैं कि ज़िलों में ना सड़क है ना बिजली और ना ही पानी , बरसात में तो हालात बदतर हो चुके हैं , ऎसे में जनता को क्या जवाब दें ? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे चुनाव में जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएँगे ? अधिकांश पदाधिकारी मानते हैं कि इन्हीं मुद्दों को लेकर दिग्विजय सिंह को सत्ता से उखाड़ फ़ेंकने वाली जनता अब भाजपा को सबक सिखाने का मूड बना रही है । मगर दिल्ली की चाँडाल – चौकड़ी को हफ़्ता पहुँचाकर अपनी कुर्सी बचाए रखने वालों का जनता के सुख-दुख से क्या सरोकार ?

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ  के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी प्रदेश सरकार की कारगुज़ारियों पर अँगुली उठाते रहे हैं । ये अलग बात है कि  भाजपा सरकार की मुखालफ़त की उन्हें भारी कीमत चुकाना पड़ी । सच बोलने की सज़ा के तौर पर उन्हें असंवैधानिक तरीके से पद से हटा दिया गया , करीब पंद्रह दिन जेल की सलाखों के पीछे फ़ेंका गया सो अलग । हाल ही में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भोपाल में आयोजित अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम में पहुँचे श्री शर्मा ने प्रदेश सरकार को यूपीए सरकार से भी चार गुना ज़्यादा भ्रष्ट करार देकर सबको सकते में डाल दिया ।

 अपनी साफ़गोई के लिए पहचाने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा जैसे लोगों को सत्ता का रोग मानते हैं । खून- पसीने से पार्टी को सींच कर यहाँ तक पहुँचाने वालों की कतार में शामिल रहे श्री शर्मा का कहना है कि संकट के समय ये लोग नहीं दिखेंगे, उस समय काम आयेंगे त्यागी और सिद्धांतनिष्ठ कार्यकर्ता । मगर उनकी इस नसीहत की आखिर ज़रुरत किसे है? अपना तो क्या चाचा के मामा के ताऊ के फ़ूफ़ा  तक की पुश्तों का इंतज़ाम कर चुके इन सत्ताधीशों को क्या लेना देश से ,यहाँ की जनता से , भारत के लोकतंत्र से ।

दरअसल इस देश में इस तरह के लोकतंत्र की कोई ज़रुरत ही नहीं है । देश में भ्रष्टाचार के मूल में लोकतंत्र के नाम पर खड़े किये गये चूषक तंत्र ही हैं । मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आखिर इस देश में दिल्ली से लेकर गाँवों की गली-कूचों तक जनप्रतिनिधियों के नाम पर खड़े किए गए इन सत्ता के दलालों की ज़रुरत क्यों है ? अगर देश के नेता सिर्फ़ दलाली खाने के लिए ही हैं तो इनका खर्च जनता क्यों उठाए ? राष्ट्र्पति शासन में भी तो सरकारी मशीनरी बिना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बेहतर और सुचारु ढंग से काम करती है । गौर करने वाली बात यह भी है कि जब से नगर निगम और नगर पालिकाएँ बनीं तबसे अव्यवस्थाएँ और गंदगी फ़ैली । महापौर और पार्षद रातोंरात करोड़पति बन गए ,मगर शहरों की हालत बद से बदतर होती गई । यही हाल ग्राम स्वराज के नाम पर खड़ी की गई पंचायती राज व्यवस्था का है । पंच-सरपंच पजेरो में सैर कर रहे हैं लेकिन गरीब आदमी सूखे निवालों से भी महरुम है । यानी अब लोकतंत्र  की दीमकों से छुटकारा पाने के लिए सत्ता बदलने की नहीं , देश चलाने के लिए नय रास्ता तलाशने का वक्त है ।

शनिवार, 18 अगस्त 2012

अकेला कांडा ही तो दोषी नहीं


गीतिका खुदकुशी मामले में गोपाल कांडा को लेकर बवाल मचा हुआ है । लेकिन इस मामले का एक पहलू और भी है , जिसे नज़र अँदाज़ किया जा रहा है । हालाँकि इस ओर इंगित करने से अक्सर लोग घबराते हैं, बचते हैं । और इसकी वजह है लोकेषणा । लोगों को लगता है कि कहीं उन पर रुढ़िवादी या दकियानूसी होने का ठप्पा न लग जाए । खुद को प्रोग्रेसिव जताने की खोखली चाहत में समाज लगातार गर्त में जा रहा है । हम सब इस अधोपतन को मुँह बाये देख रहे हैं ।

 चारों तरफ़ से कांडा पर आरोपों की बारिश हो रही है । गीतिका का भाई चीख-चीख कर गोपाल कांडा की गिरफ़्तारी की माँग करता टीवी पर गाहे-बगाहे नज़र आ रहा है । लेकिन क्या गीतिका की मौत के लिए उसका परिवार भी बराबर का ज़िम्मेदार नहीं है ? विभिन्न शहरों में खिंचवाई गई तस्वीरें गीतिका के परिवार और कांडा के करीबी ताल्लुकात की तस्दीक करती हैं । एक सवाल ये भी कि महज़ सत्रह साल की उम्र में ज़रुरी योग्यता हासिल किए बगैर नौकरी की शुरुआत के लिए बाहर भेजने और एकाएक कामयाबी की सीढ़ी पर फ़र्राटा भरने के दौर में गीतिका का परिवार खामोश क्यों रहा ?

 बेटी के पैसों पर मौज उड़ाते वक्त क्या उस युवती के माता-पिता के ज़ेहन में एकबारगी ये ख्याल आया कि उनकी सुपुत्री पर एकाएक कामयाबी की बौछारें क्यों हो रही है । महँगी गाड़ी, मोबाइल तोहफ़े लेते समय क्या कभी उनके मन में सवाल नहीं उठे ? अगर शुरुआती दौर में ही इस सिलसिले को सख्ती से रोकने की कोशिश की जाती, तो शायद हालात कुछ और होते । इस मामले में कांडा के समर्थन में थाने पर प्रदर्शन का मामला भी समाज के विद्रूप चेहरे को सामने लाता है । समाज में नैतिकता का संकट इतना गहरा गया है कि लोग पैसे की खातिर रसूखदारों के हज़ारों गुनाहों पर पर्दा डालकर उन्हें "रॉबिनहुड" का जामा पहनाने में ना देरी करते हैं और ना ही कोई गुरेज़ ।

वक्त अभी भी पूरी तरह से हाथ से निकला नहीं है । समाज की उलझी डोर को सुलझाने का सिरा भले ही नहीं मिल पा रहा हो , मगर जहाँ से भी मुमकिन हो डोर को थाम लेने में ही सबकी भलाई है । निष्पक्ष रुप से देखें तो कांडा के साथ ही गीतिका के माता-पिता भी गीतिका की मौत के लिए बराबर के दोषी हैं । कानूनी तौर पर ना सही , सामाजिक रुप से वे इस खुदकुशी का ठीकरा कांडा पर अकेले कतई नहीं फ़ोड़ सकते । इसी तरह कांडा के साथ खड़े होने वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए ।

मीडिया को भी अपने तात्कालिक फ़ायदे के लिए समाज की बुनियाद को खोखला करने की प्रवृत्ति पर स्वप्रेरणा से आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया आज नहीं तो कल अपनाना ही होगी । वरना अनुराधा बाली, गीतिका , मधुमिता , भँवरी देवी जैसी महिलाएँ महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर यूँ ही आहुतियाँ देती रहेंगीं । नारी स्वातंत्र्य के नाम पर  उपभोग की वस्तु बन चुकी स्त्री को अपने अस्तित्व को पहचान कर समाज में योगदान देना चाहिए । बराबरी के हक की आड़ में पुरुषों के हाथ की कठपुतली बनने से कहीं बेहतर है अपने नैसर्गिक गुणों को पहचान कर परिवार में समग्र और रचनात्मक योगदान देना ।

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

ईमानदारी की दुहाई , पर ये है सच्चाई


 मध्य प्रदेश  को ’’शांति का टाप” कहा जाता है । बेशक कागज़ों पर यह बात लगातार सही साबित हो रही हो , मगर इस शांति के असली कारक सत्ता और विपक्ष की साँठ-गाँठ और मीडिया की मिलीभगत है । जून में बीजेपी से जुड़े दो कारोबारियों-दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के ठिकानों पर आयकर छापे में मिली अकूत दौलत की खबरें सामने आने के बाद एक बारगी जनता को भ्रष्टाचार से निजात मिलने के सपने पर ये यकीन हो चला था । लेकिन जल्दी ही काँग्रेस-भाजपा के गठबँधन ने इसे दिवास्वप्न में तब्दील कर दिया । सदन में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने के नाम पर नेता प्रतिपक्ष की लचर कार्रवाई और दो काँग्रेस विधायकों की विधानसभा से बर्खास्तगी के सुनियोजित ड्रामेबाज़ी ने एक गंभीर मामले को प्रहसन बना दिया । इस पूरे घटनाक्रम ने एक फ़िर साबित कर दिया है कि किस तरह सत्ता और विपक्ष पर्दे के पीछे एकजुट होकर जनता के हितों पर डाका डाल रहे हैं ।

इस मसले में काला धन वापस लाने की मुहिम में ज़ोरशोर से जुटे बाबा रामदेव  की नीयत पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है । विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बाबा रामदेव के साथ दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के फोटो जारी कर बाबा की सच्चाई को जगज़ाहिर कर दिया है । तस्वीरों में से एक में दिलीप सूर्यवंशी एक कार्यक्रम के दौरान बाबा के चरण छू रहे हैं। वहीं, दूसरी तस्वीर में बाबा के दायें-बायें छप्परफ़ाड़ तरीके से धनकुबेर बने सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा खड़े हैं  । सवाल है कि बाबा रामदेव भाजपाइयों के काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में मौन क्यों हैं?
  
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जब जापान, सिंगापुर और कोरिया की दस दिन के दौरे पर थे, तब आरएसएस नेता सुरेश सोनी के करीबी बीजेपी नेता सुधीर शर्मा और शिवराज के करीबी बिल्डर दिलीप सूर्यवंशी के 60 ठिकानों पर इनकम टैक्स ने छापे मारे और साढ़े छह करोड़ रुपये नकद, दस किलो सोना और सैकड़ों एकड़ जमीन के कागजात जब्त किए थे । सूर्यवंशी के घर से बड़ी तादाद में मंत्रियों की तबादले संबंधी नोटशीटस भीमिली थीं । इन सरकारी कागज़ात का मिलना साफ़ गवाही देता है कि सूर्यवंशी का सत्ता–साकेत में कितना और किस हद तक सीधा दखल था । सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि राखी सावंत से लेकर ओबामा और भोपाल की गली-कूँचों से लेकर वाशिंगटन तक के हर छोटे-बड़े मसले पर तत्काल बयान जारी करने वाले मुख्यमंत्री अपने रात-दिन के करीबी पर खामोशी अख्तियार किए बैठे हैं ।

उधर पूर्व प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता के.के. मिश्रा ने सीडी जारी कर दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के करीबी रिश्तों का खुलासा किया है  । सीडी में साल 2008 की एक वीडियो क्लिपिंग जिसमें सीएम का उदबोधन है और श्री सूर्यवंशी के संबंध में बात कही गई है  । इसमें मुख्यमंत्री चार साल पहले खुले मंच से दिलीप सूर्यवंशी और खनन माफिया सुधीर शर्मा से सीधे संबंध स्वीकारते दिखाई पड़ रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक कहा है कि मेरे बचपन के दौर के पालन पोषण में सूर्यवंशी परिवार का बड़ा योगदान रहा है।
सत्ताधीशों की करीबी पाकर लक्ष्मी की कृपादृष्टि पाने का खेल समझने के लिए इतना जानजा कीफ़ी है कि आठ साल पहले दिलीप सूर्यवंशी के पास  तेरह डंपर थे जिनकी संख्या बढ़कर १८२० हो गई है । इसी तरह सरस्वती शिशु मंदिर के शिक्षक  रहे सुधीर शर्मा पर कुबेर  की असीम अनुकंपा का नज़ारा कुछ  ऎसा  रहा कि “आचार्यजी” प्रदेश में सबसे ज़्यादा आयकर देने के बावजूद भी आयकर छापों के फ़ेर में उलझ गये । ज़ाहिर है इतनी अकूत संपदा इतनी छोटी सी अवधि में ईमानदारी और मेहनत से अर्जित कर पाना नामुमकिन है । साफ़ है कि लक्ष्मी और कुबेर से ज़्यादा इन पर सरकार के मुखिया और पार्टी के कुछ चुनिंदा नेताओं  की खास नज़रे इनायत रही ।
शुरुआती दौर में मध्य प्रदेश में इन कारोबारियों पर इनकम टैक्स छापों का मामला गंभीर होता नज़र आ रहा था । इस मुद्दे पर पोस्टर वॉर शुरू हो गया । एक बारगी तो ऎसा लगा मानो इस मुद्दे पर भाजपा को ना सिर्फ़ मुख्यमंत्री बदलना पड सकता है , बल्कि कर्नाटक के येदियुरप्पा के मामले से भी कई गुना ज़्यादा बड़े तमाम घोटालों पर किरकिरी झेलना पड़ सकती है । मगर भला हो काँग्रेस के नेताओं खास तौर पर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह , विधायक कल्पना परुलेकर और चौधरी राकेश सिंह का , जिन्होंने वक्त रहते सरकार के “साँच पर आँच” नहीं आने दी । हालांकि छापों के तुरंत बाद कांग्रेस ने भोपाल में पोस्टर लगाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ग्यारह सवाल पूछे थे। कांग्रेस का आरोप था कि जिन कारोबारियों के यहां छापे पड़े हैं, वे सब शिवराज सिंह के खास करीबी हैं और उनकी ही मेहरबानी से रातोंरात अरबपति बन गए हैं।

पोस्टरों में दावा किया गया था कि साढ़े छह साल पहले दिलीप सूर्यवंशी की कंपनी दिलीप बिल्डकॉन का टर्नओवर तेरह करोड़ रुपये था , आज जेट की रफ़्तार से एक हजार करोड़ रुपये तक जा पहुँचा है। उनकी कंपनी चार हजार करोड़ रुपये के ठेकों पर काम कर रही है। पोस्टर में सवाल पूछा गया कि क्या दिलीप सूर्यवंशी ने मुख्यमंत्री के अरेरा कॉलोनी के फ्लैट ई-3/163 की साज सज्जा पर बीते साल बीस लाख रुपये खर्च नहीं किए? मुख्यमंत्री के निजी सचिव का भाई दिलीप सूर्यवंशी के किस कारोबार में पार्टनर है? 
 
इन इन आरोपों के जवाब में मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष प्रभात झा का कहना था कि क्या बीजेपी के लोग व्यापार नहीं करेंगे? और व्यापार करेंगे तो क्या इनकम टैक्स वाले टैक्स नहीं मांगेगे। ये कोई अपराध नहीं है। मनुष्य की वृत्ति होती है टैक्स बचाना और इनकम टैक्स का काम होता है, ज्यादा इनकम होने पर टैक्स लेना और अपने अपने काम में सब लगे हैं।   



मीडिया मैनेजमेंट और निहित स्वार्थों के कारण विपक्ष के ढ़ीले पड़ते तेवरों से बेशक सूबे के मुखिया कुछ और वक्त तक अपना चेहरा चमकाए रख सकते हैं , लेकिन इस हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता कि सच्चाई को लम्बे वक्त तक दबाना या छिपाना किसी के बूते की बात नहीं है । गुज़रते वक्त के साथ सच्चाई खुद ब खुद बाहर आकर ही रहेगी । रसूख से लोगों का मुँह बंद किया जा सकता है । नोटों से समाज पर असर डालने वाले चंद लोगों को कुछ वक्त के लिये अपने पक्ष में खड़ा किया जा सकता है । इस सबके बावजूद वक्त की बदलती चाल दूध का दूध और पानी का पानी किए बिना नहीं रहती ।