शनिवार, 18 अगस्त 2012

अकेला कांडा ही तो दोषी नहीं


गीतिका खुदकुशी मामले में गोपाल कांडा को लेकर बवाल मचा हुआ है । लेकिन इस मामले का एक पहलू और भी है , जिसे नज़र अँदाज़ किया जा रहा है । हालाँकि इस ओर इंगित करने से अक्सर लोग घबराते हैं, बचते हैं । और इसकी वजह है लोकेषणा । लोगों को लगता है कि कहीं उन पर रुढ़िवादी या दकियानूसी होने का ठप्पा न लग जाए । खुद को प्रोग्रेसिव जताने की खोखली चाहत में समाज लगातार गर्त में जा रहा है । हम सब इस अधोपतन को मुँह बाये देख रहे हैं ।

 चारों तरफ़ से कांडा पर आरोपों की बारिश हो रही है । गीतिका का भाई चीख-चीख कर गोपाल कांडा की गिरफ़्तारी की माँग करता टीवी पर गाहे-बगाहे नज़र आ रहा है । लेकिन क्या गीतिका की मौत के लिए उसका परिवार भी बराबर का ज़िम्मेदार नहीं है ? विभिन्न शहरों में खिंचवाई गई तस्वीरें गीतिका के परिवार और कांडा के करीबी ताल्लुकात की तस्दीक करती हैं । एक सवाल ये भी कि महज़ सत्रह साल की उम्र में ज़रुरी योग्यता हासिल किए बगैर नौकरी की शुरुआत के लिए बाहर भेजने और एकाएक कामयाबी की सीढ़ी पर फ़र्राटा भरने के दौर में गीतिका का परिवार खामोश क्यों रहा ?

 बेटी के पैसों पर मौज उड़ाते वक्त क्या उस युवती के माता-पिता के ज़ेहन में एकबारगी ये ख्याल आया कि उनकी सुपुत्री पर एकाएक कामयाबी की बौछारें क्यों हो रही है । महँगी गाड़ी, मोबाइल तोहफ़े लेते समय क्या कभी उनके मन में सवाल नहीं उठे ? अगर शुरुआती दौर में ही इस सिलसिले को सख्ती से रोकने की कोशिश की जाती, तो शायद हालात कुछ और होते । इस मामले में कांडा के समर्थन में थाने पर प्रदर्शन का मामला भी समाज के विद्रूप चेहरे को सामने लाता है । समाज में नैतिकता का संकट इतना गहरा गया है कि लोग पैसे की खातिर रसूखदारों के हज़ारों गुनाहों पर पर्दा डालकर उन्हें "रॉबिनहुड" का जामा पहनाने में ना देरी करते हैं और ना ही कोई गुरेज़ ।

वक्त अभी भी पूरी तरह से हाथ से निकला नहीं है । समाज की उलझी डोर को सुलझाने का सिरा भले ही नहीं मिल पा रहा हो , मगर जहाँ से भी मुमकिन हो डोर को थाम लेने में ही सबकी भलाई है । निष्पक्ष रुप से देखें तो कांडा के साथ ही गीतिका के माता-पिता भी गीतिका की मौत के लिए बराबर के दोषी हैं । कानूनी तौर पर ना सही , सामाजिक रुप से वे इस खुदकुशी का ठीकरा कांडा पर अकेले कतई नहीं फ़ोड़ सकते । इसी तरह कांडा के साथ खड़े होने वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए ।

मीडिया को भी अपने तात्कालिक फ़ायदे के लिए समाज की बुनियाद को खोखला करने की प्रवृत्ति पर स्वप्रेरणा से आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया आज नहीं तो कल अपनाना ही होगी । वरना अनुराधा बाली, गीतिका , मधुमिता , भँवरी देवी जैसी महिलाएँ महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर यूँ ही आहुतियाँ देती रहेंगीं । नारी स्वातंत्र्य के नाम पर  उपभोग की वस्तु बन चुकी स्त्री को अपने अस्तित्व को पहचान कर समाज में योगदान देना चाहिए । बराबरी के हक की आड़ में पुरुषों के हाथ की कठपुतली बनने से कहीं बेहतर है अपने नैसर्गिक गुणों को पहचान कर परिवार में समग्र और रचनात्मक योगदान देना ।
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