रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सरकारी खज़ाने पर भारी पडता मुख्यमंत्री का उत्सवधर्म

यूँ तो हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी हैं । मौसम का मिजाज़ बदले या फ़िर जीवन से जुड़ा कोई भी पहलू हो, हम पर्व मनाने का बहाना तलाश ही लेते है। साल में जितने दिन होते हैं उससे कहीं ज़्यादा पर्व और त्योहार हैं। अब तक लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर पर्व मनाये जाते रहे हैं। मगर उत्सव धर्मी मुख्यमंत्री के शौक के चलते अब प्रदेश में बारहों महीने सरकारी त्योहार मनाने की नई परंपरा चल पड़ी है। गणपति स्थापना के साथ शुरू हुए उत्सवी माहौल में नवरात्रि आने तक राज्य सरकार ने “बेटी बचाओ अभियान” का जो रंग भरा है,वो जल्दी ही फ़ीका पडता नही दीखता। राज्य में शासन की ओर से “बेटी बचाओ अभियान” नए सिरे से शुरू किया गया है। सरकारी खज़ाने से सौ करोड़ रुपये खर्च कर लिंगानुपात में आ रहे अंतर को पाटना और बालिकाओं को प्रोत्साहन देना मुहिम का खास मकसद बताया जा रहा है।

तूफ़ानी तरीके से चलाये जा रहे इस अभियान के मकसद पर कई बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अभियान ने मीडिया, विज्ञापन और प्रिंटिंग कारोबार में नई जान फ़ूँक दी है। मध्यप्रदेश में कुछेक ज़िलों को छोड़कर शायद ही कोई इलाका ऎसा हो जहाँ लिंगानुपात के हालात इतने चिंताजनक हों। दरअसल लिंग अनुपात में असंतुलन का मुख्य कारण विलुप्त हो रही भारतीय परंपराएँ और संस्कृति है। वाहनों पर चस्पा पोस्टर, बैनर और सड़क किनारे लगे होर्डिंग बेटियाँ बचाने में कारगर साबित होते, तो शायद देश को अब तक तमाम सामाजिक बुराइयों से निजात मिल जाती । जनसंपर्क विभाग की साइट पर अभी कुछ समय पहले एक प्रेस विज्ञप्ति पर नज़र पड़ी, जिसमें बताया गया है कि सरकार ने पानी बचाओ अभियान में गोष्ठी, परिचर्चा, कार्यशाला, सेमिनार और रैली जैसे आयोजनों के ज़रिये जनजागरुकता लाने पर महज़ तीन सालों में करीब नौ सौ तेरह करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिये। पानी के मामले में प्रदेश के हालात पर अब कुछ भी कहना-सुनना बेमानी है। वैसे भी देखने में आया है कि जिस भी मुद्दे पर सरकारी तंत्र का नज़रे-करम हुआ, उसकी नियति तो स्वयं विधाता भी नहीं बदल सकते। कहते हैं,जहँ-जहँ पैर पड़े संतन के,तहँ-तहँ बँटाढ़ार।

कुछ साल पहले बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी से मोहभंग की स्थिति में इस्तीफ़ा देते वक्त पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि बीजेपी को अब टेंट-तंबू वाले चला रहे हैं। मध्यप्रदेश में यह बात शब्दशः साबित हो रही है। सरकारी आयोजनों का लाभ जनता को कितना मिल पा रहा है, यह तो जगज़ाहिर है। मगर मुख्यमंत्री की उत्सवधर्मिता से कुछ चुनिंदा व्यवसायों से जुड़े लोगों की पौ-बारह है। राजनीतिक टोटकों और शिगूफ़ेबाज़ी से जनता को लम्बे समय तक भरमाये रखने का अगर कोई खिताब हो तो देश में बेशक शिवराजसिंह चौहान इसके एकमात्र और निर्विवाद दावेदार साबित होंगे।

उत्सवधर्मिता निभाने में सूबे के शाहखर्च मुखिया किसी से कमतर नहीं हैं। सत्ता सम्हालने के बाद से ही प्रदेश में जश्न का कोई ना कोई बहाना जुट ही जाता है। पहले महापंचायतों का दौर चला, इसके बाद इन्वेस्टर्स मीट के बहाने जश्न मनाये गये। यात्राओं और मंत्रियों को कॉर्पोरेट कल्चर से वाकिफ़ कराने के नाम पर भी जनता के पैसे में खूब आग लगाई गई। फ़िर बारी आई मुख्यमंत्री निवास में करवा चौथ, होली, दीवाली, रक्षाबंधन, ईद, रोज़ा इफ़्तार, क्रिसमस त्योहार मनाने की। जनता के खर्च पर धार्मिक आयोजनों के ज़रिये पुण्य लाभ अपने खाते में डालने का सिलसिला भी खूब चला। “आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश” जैसी शिगूफ़ेबाज़ी से भरपायी सरकार ने “स्वर्णिम मध्यप्रदेश“ का नारा ज़ोर शोर से बुलंद किया। पिछले दो सालों में प्रदेश स्वर्णिम बन सका या नहीं इसकी गवाही सड़कों के गड्ढ़ों, बिजली की किल्लत, बढ़ते अपराधों और किसानो की खुदकुशी के आँकड़ों से बेहतर भला कौन दे सकेगा ? मगर इतना तो तय है कि इस राजनीतिक स्टंट से नेताओं, ठेकेदारों, माफ़ियाओं, दलालों, उद्योगपतियों और मीडिया से जुड़े चंद लोगों की तिजोरियाँ सोने की सिल्लियों से ज़रुर “फ़ुल“ हो गईं हैं।

इसी तरह सत्ता पर येनकेन प्रकारेण पाँच साल काबिज़ रहने में कामयाब रहे शिवराजसिंह चौहान और जेब कटी जनता की। मुख्यमंत्री पद पर पाँच साल पूरे होने की खुशी में पिछले साल करीब चार करोड़ रुपये खर्च कर गौरव दिवस समारोह मनाया गया। संगठन के मुखिया प्रभात झा की कुर्सी प्राप्ति का सालाना जश्न भी मुख्यमंत्री निवास में धूमधाम से मना।

प्रदेश में एक के बाद एक आयोजनों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। मालूम होता है मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस समारोह की रंगीनियाँ जल्दी ही बेटी बचाओ अभियान को पीछे छोड़ देंगी। अब तक रावण वध से लेकर दीपावली की शुभकामना संदेशों तक हर मौके पर बेटी बचाने का संदेश प्रसारित करने में व्यस्त मुख्यमंत्री जी जल्दी ही मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के लिये जनता का आह्वान करते नज़र आयेंगे। उनके इस बर्ताव को देखकर बस इतना ही कहना मुनासिब होगा-आधी छोड़ पूरी को ध्यावै आधी मिले ना पूरी पावै।

बहरहाल खबर है कि भोपाल में होने वाले मुख्य समारोह में बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की नृत्य नाटिका और आशा भोंसले के नग़्मे जश्न में चार चाँद लायेंगे। वहीं लेज़र शो आयोजन का खास आकर्षण होगा। हर जश्न में लेज़र शो की प्रस्तुति का नया ट्रेंड भी शोध का विषय है। आजकल हर सरकारी समारोह में लेज़र शो और आतिशबाज़ी का भव्य प्रदर्शन सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर इन दोनों कारोबारों के साथ ही इवेंट मैनेजमेंट में किन बड़े भाजपा नेताओं का पैसा लगा है ? सवाल लाज़मी है कि कर्मचारियों को वेतन-भत्ते या जनता को करों में रियायत देकर महँगाई पर अँकुश लगाने के मुद्दे पर हाथ खींचने वाली राज्य सरकार आखिर इन जश्नों पर पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ?

फ़िज़ूलखर्ची का आलम ये है कि समारोह को भव्य बनाने के लिये चार लाख निमंत्रण पत्र छपवाए गये हैं,जबकि आयोजन स्थल लाल परेड ग्राउंड में एक लाख लोग भी बमुश्किल समा पायेंगे। माले मुफ़्त दिले बेरहम की तर्ज़ पर सरकार ने चार लाख कार्डों की छपाई पर चालीस लाख रुपये खर्च किये हैं । अमूमन सरकारी आयोजनों में लोगों की दिलचस्पी कम ही होती है। शाहखर्ची को जस्टिफ़ाय करने के लिये लोगों को घर-घर जाकर निहोरे खा-खा कर समारोह में आमंत्रित किया जा रहा है। बदहाल और फ़टेहाल प्रदेश की छप्पनवीं सालगिरह पर संस्कृति विभाग तीन करोड़ रुपए खर्च करने का इरादा रखता है। इनमें से दो करोड़ रुपये की होली भोपाल के मुख्य समारोह में जलाई जायेगी। संस्कृति विभाग में एक तृतीय श्रेणी की हैसियत रखने वाले व्यक्ति को तमाम नियम कायदों के विपरीत जाकर संचालक पद से नवाज़ा गया है।  अपनी अदभुत जुगाड़ क्षमता और संघ को साधने में महारत के चलते एक गैर आईएएस व्यक्ति एक साथ संस्कृति संचालक,वन्या प्रकाशन और स्वराज संस्थान प्रमुख जैसे अहम पदों पर काबिज़ है । सरकारी खज़ाने में सेंध लगाने के आये दिन नायाब नुस्खे ढ़ूँढ़ लाने में माहिर यह अफ़सर सरकार और संघ की आँखों का तारा बना हुआ है।

पूरे प्रदेश में वन, खनन, शिक्षा, ज़मीन की बँदरबाँट और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऎतिहासिक धरोहरों की लूटखसोट मची है। ऎसे हालात में चारों तरफ़ जश्न के माहौल को देखकर रोम में बाँसुरी बजाते नीरो को याद करने की बजाय मगध में घनानंद के राजकाज की यादें ताज़ा होना स्वाभाविक ही है । ऎसे घटाटोप में चाणक्य और चंन्द्रगुप्त के अवतरण का बस इंतज़ार ही किया जा सकता है ।

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

सता रहा है डम्पर घोटाले का जिन्न


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सितारे भले ही बुलंद हों, मगर बलात बोतल में बंद किया गया “डम्पर घोटाले” का जिन्न गाहेबगाहे बाहर आने को बेताब हुआ जाता है लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट के आधार पर इसी साल अगस्त में जिला अदालत ने शिवराज सिंह चौहान और उनकी पत्नी को चार साल की बेचैनी के बाद इस मामले में राहत दी है तिकड़मों और उठापटक के गुणा भाग पर लगता है जल्दी ही शनि-मंगल, राहु -केतु की आड़ी-टेढ़ी चाल असर दिखाने वाली है ग्रहों की “वक्र दृष्टि” से बचने के लिये किये गये तमाम उपाय फ़ौरी राहत देते ज़रुर मालूम होते हैं, मगर समय की चाल बदलते ही चार डम्परों की घरघराहट एक बार फ़िर चौहान दम्पति की रातों की नींद उड़ा सकती है लोकायुक्त से काला-पीला कराकर हासिल की गई खात्मा रिपोर्ट पर सवाल उठाने वालों को रोकने की नीयत से लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू को आरटीआई के दायरे से बाहर करने के सरकार के फ़ैसले पर हाईकोर्ट ने हाल ही में सामान्य प्रशासन और आयुक्त आरटीआई से चार हफ़्तों में जवाब तलब किया है वहीं देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ काम करने वाली संस्था भारत पुर्नोत्थान अभियान (आईआरआई) अब इस मामले का परीक्षण कर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ ज़ोरशोर से आवाज़ उठाती नज़र आने वाली प्रदेश सरकार ने २५ अगस्त को अधिसूचना जारी कर लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर कर दिया अब इन दोनों जाँच एजेंसियों के बारे में इस कानून के तहत जानकारियाँ नहीं माँगी जा सकेंगी सच्चाई का गला गुपचुप घोंटने के लिये राज्य सरकार ने वही वक्त चुना जब देश में अन्ना हज़ारे के आँदोलन की लहर थी और शिवराज सिंह इस मुहिम का खुलकर समर्थन कर रहे थे मगर कहते हैं ना, हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और”  फ़िर सरकारें भी किसी हाथी से कम थोड़े ही हैं एक ओर जहाँ पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाई जा रही है, ऎसे में मध्यप्रदेश सरकार का यह कदम भ्रष्टाचार के संरक्षण की पहल से इतर क्या माना जा सकता है ?

हाल ही में मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार मिटाने के लिये विशेष अदालतें गठित करने को लेकर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से भी मुलाकात कर चुके हैं विशेष न्यायालय विधेयक में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह व्यवस्था की गई है लोकायुक्त को नख-दँत विहीन करने में जुटी सरकार का दावा है कि इसके दायरे में पंचायत प्रतिनिधि से लेकर सीएम तक आएँगे इसमें आरोपियों की संपत्ति राजसात करने का भी प्रावधान है प्रदेश में पिछले दिनों लगभग साठ सरकारी मुलाज़िमों को रिश्वत लेते या जबरन उगाही करते पकड़ा गया और उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया गया। ये सभी पुलिस आरक्षक, पटवारी,कार्यालयों के बाबू और वनरक्षक जैसे छोटे कर्मचारी हैं ,  लेकिन बड़ी मछलियाँ और मगरमच्छ अभी भी भ्रष्टाचार के महासागर बेखौफ़ छपाके लगा रहे हैं छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई को उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार के लिये “पापमोचिनी गंगा” बनाकर स्वच्छ प्रशासन की छबि गढ़ी जा रही है

लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देने वाली सरकार ने तीन साल पहले भी तत्कालीन लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल की सिफारिश पर ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त को आरटीआई से बाहर कर दिया था लेकिन मप्र के मुख्य सूचना आयुक्त पद्मपाणि तिवारी ने कड़ी आपत्ति की इसके बाद राज्य सरकार को नियम में संशोधन वापस लेना पड़ा था विधि विभाग के प्रमुख सचिव रह चुके श्री तिवारी का तर्क था कि लोक सेवकों के भ्रष्टाचार पर निगाह रखने वाली जाँच एजेंसी को सूचना के अधिकार से बाहर कैसे रखा जा सकता है ? इन संस्थाओं की तुलना आईबी और रॉ से नहीं की जा सकती लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू  सरकारी स्तर पर होने वाली आर्थिक अनियमितताओं की जाँच एजेंसियाँ हैं, जबकि गुप्तचर एजेंसियों को सुरक्षा कारणों से आरटीआई से बाहर रखा गया है ताजा बदलाव पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब एक बार फिर विवाद गर्मा गया है

सच पूछा जाए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान डंपर घोटाले से बरी ज़रूर हो गए हैं, लेकिन अंदर से अब भी डरे हुए हैं यही कारण है कि उनकी सरकार ने लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो को सूचना के अधिकार से बाहर रखने का फैसला किया है संभवतः वे यह नहीं चाहते कि कोई आरटीआई एक्टिविस्ट यह जानने की कोशिश  करे कि भ्रष्टों को बरी करने का आधार क्या है ? अभी लोकायुक्त ने मुख्यमंत्री और एक मंत्री को क्लीन चिट दी है कल उन सभी दर्जन भर मंत्रियों को क्लीन चिट दी जा सकती है, जिनके विरुध्द जाँच विचाराधीन है

लोकायुक्त पी.पी. नावलेकर ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी साधना सिंह को दिसम्बर 2010 में बहुचर्चित डंपर खरीदी कांड में क्लीन चिट दे दी थी लोकायुक्त पुलिस ने अदालत में मामले को खत्म करने की सिफारिश की थी,जिसके आधार पर भोपाल की विशेष अदालत ने उनके हक में फ़ैसला सुनाया था। पूर्व लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल भी डंपर मामले की जाँच के दौरान विवादों में फ़ँसे थे उन पर भोपाल की सांसद-विधायकों की शानदार आवासीय कॉलोनी रिवेयरा टाउनशिप में मकान आवंटन कराने का मामला कोर्ट तक पहुँचा था

MP 17 HH 0179, MP 17 HH 0180, MP 17 HH 0181 और MP 17 HH 0208  ये वो चार रजिस्ट्रेशन नंबर हैं जो आरटीओ के दफ्तर में साधना सिंह वाइफ ऑफ एस आर सिंह, जेपीनगर प्लांट, रीवा के नाम से दर्ज हुए थे उमा भारती के साथ बीजेपी से बाहर गये प्रहलाद पटेल ने ये जानकारी परिवहन विभाग की साइट से निकाली थी अब प्रहलाद पटेल वापस बीजेपी में चुके हैं बवाल मचने पर 26 मई 2006 को खरीदे गए डंपरों का मालिकाना हक आनन फ़ानन में बदल गया चारों डंपर जेपी एसोसिएट को ही बेच दिये गये सवाल उठा कि लाखों की खरीद के लिये शिवराज की पत्नी के पास पैसा कहाँ से आया, मामला अदालत पहुंचा। विशेष अदालत के आदेश पर चार साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी पत्नी साधना सिंह, जेपी एसोसिएट के डायरेक्टर सन्नी गौर समेत पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ लोकायुक्त पुलिस ने जाँच मे पाया कि डंपरों की कीमत दो करोड़ की बजाय तकरीबन 74 लाख रुपये है और पाँचों आरोपियों के खिलाफ़ कोई अपराध नहीं बनता है

याचिकाकर्ता के मुताबिक लोकायुक्त ने असली मुद्दों की जाँच ही नहीं की इस मामले में सवाल कई हैं जिनके जवाब अब भी तलाशे जा रहे हैं मसलन साधना सिंह ने अपने पति का नाम एस आर सिंह क्यों लिखा \ जबकि मुख्यमंत्री का हर जगह शिवराज सिंह चौहान नाम चलता है फ़िर अपने गाँव जैत, भोपाल या फिर विदिशा की बजाय रीवा का आधा-अधूरा पता क्यों दिया गया \ अगर रोजी रोटी कमाने के लिये डंपर खरीदे भी थे तो बवाल मचने के बाद अचानक बेच क्यों दिये \

उधर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के लिये समर्थन जुटाने भोपाल आये भारत पुर्नोत्थान अभियान संस्था के तीन सदस्यों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह,  पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस कृष्णास्वामी, केरल के पूर्व डीजीपी उपेन्द्र वर्मा को एक कार्यक्रम में डंपर मामले की जानकारी देकर मदद माँगी गई संस्था के पदाधिकारियों ने संबंधित सारे दस्तावेज माँगे हैं उनका कहना है कि  इस मामले में उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के सबूत होने पर आगे की लड़ाई में मदद दी जाएगी आईआरआई मामले का परीक्षण कर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है संस्था का मानना है कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की तरफ चलता है और जब तक सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त रहेंगे तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है

इस बीच आईएएस राघव चन्द्रा के मामले में लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट के खिलाफ़ आये  सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने भी मुख्यमंत्री की नींद उड़ा दी होगी जस्टिस जीएस सिंघवी और एचएल बत्तू ने इस मामले में लोकायुक्त की खात्मा रिपोर्ट को खारिज करते हुए केस रिओपन करने और चालान पेश करने के कटनी अदालत के आदेश को सही माना है। इस आदेश के बाद लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना चंद्रा के खिलाफ राज्य सरकार से अभियोजन स्वीकृति लेने की तैयारी कर रही है। कटनी के पूर्व कलेक्टर शहजाद खान और पूर्व कमिश्नर राघव चन्द्रा समेत पांच लोगों पर सुप्रीम कोर्ट ने भूमि घोटाले के आरोप में मामला दर्ज करने का आदेश दिया है वर्ष 2002 में कटनी के पूर्व कलेक्टर और पूर्व कमिश्नर के कार्यकाल में 10 लाख की जमीन अल्फर्ट कम्पनी द्वारा हाउसिंग बोर्ड को 7 करोड़ 20 में बेचने का मामला सामने आया था

 इसी तरह इंदौर के सुगनी देवी ज़मीन घोटाले में फ़रियादी सुरेश सेठ ने विशेष जज को लिखित में लोकायुक्त की निष्पक्षता से भरोसा उठने की बात कहकर सनसनी फ़ैला दी है लोकायुक्त पी पी नावलेकर के पुत्र संदीप नावलेकर की मुख्यमंत्री के नेतृत्व में चीन गए प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई यात्रा को लेकर काँग्रेस ने लोकायुक्त के खिलाफ कड़े तेवर अख्तियार करते हुए उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा तक माँग लिया इधर, सरकार ने सफाई दी है कि संदीप नावलेकर सीआईआई अध्यक्ष के तौर पर चीन गए थे और यात्रा का पूरा खर्च उनके द्वारा वहन किया गया प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने संदीप की चीन यात्रा को लेकर खड़े किए गए सवाल के बाद नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बयान जारी कर मुख्यमंत्री और लोकायुक्त के बीच साँठगाँठ का आरोप लगाया उन्होंने मुख्यमंत्री की चीन यात्रा को रहस्यमयी और संदेह के घेरे में करार देते हुए कहा कि लोकायुक्त अगस्त में डंपर कांड से मुख्यमंत्री को दोष मुक्त करते हैं और एक माह बाद ही उनके पुत्र मुख्यमंत्री के साथ सरकारी यात्रा पर चीन जाते हैं श्री सिंह ने कहा कि लोकायुक्त के पास सरकार के एक दर्जन मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की जाँच लंबित है, यह जाँच निष्पक्षता से होगी इसमें संदेह हैं

बहरहाल तमाम विरोधाभासों के बीच फ़िलहाल प्रदेश सरकार के मंसूबों की थाह पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ विशेष अदालतों के गठन के लिए विशेष न्यायालय विधेयक लाने को बेताब मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार क्या वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ तहेदिल से गंभीर है? अगर ऐसा ही है तो लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को आरटीआई की परिधि में रख कर उन्हें अधिकतम पारदर्शी बनाने से सरकार को आखिर परहेज क्यों है ?