मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

अकेले नौकरशाह ज़िम्मेदार नहीं

मध्यप्रदेश में आईएएस दंपति के लॉकर सोने- चाँदी और हीरे जवाहरात उगल रहे हैं । उनके बंगले से मिली पाँच सौ और हज़ार के नोटों की गड्डियों को गिनने के लिये आयकर विभाग के अमले को पसीने आ गये । आलम ये रहा कि नोट गिनने वाली मशीन को भी अपना काम अंजाम देने में घंटों लग गये । छापे से जहाँ नौकरशाही में हड़कंप मचा है , वहीं आम जनता हैरान है । कई लोग तो दबी ज़ुबान में कह रहे हैं कि इतना कैश घर में रखने की ज़रुरत ही क्या थी ? लेकिन कुछ लोग ऎसे भी हैं जिनकी राय में यह तो प्रदेश ही क्यों समूचे देश में मचे भ्रष्टाचार के तांडव की बानगी भर है ।


सूबे के मुखिया सारे काम धाम छोड़कर आये दिन प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के अभियान पर निकल पड़ते हैं । ग्रामीणों को भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनने की सीख देते हैं । लोगों को काली कमाई से दूर रहने की सौगंध दिलाते हैं और थके माँदे राजधानी लौटकर अफ़सरशाही की मदद से अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लग जाते हैं । मौजूदा दौर में ये माना जा चुका है कि काम करने से सरकार नहीं चलती । सरकार की स्थिरता के लिये अपने आकाओं की खुशामद ज़रुरी है ।

नितिन गडकरी की ताजपोशी के बावजूद बीजेपी में आज भी एक साथ कई मुखिया हैं । लिहाज़ा "कुर्सी बचाने" के लिये इन सभी तक "खर्चा-पानी" पहुँचाना ज़रुरी है । नौकरशाही को भी लगने लगा है कि नेताओं के लिये जब कमाई करना ही है , तो क्यों ना बहती गंगा में हम भी हाथ धो लें । वे भी जानते हैं कि एक गुनाह की भी वही सज़ा है , जो हज़ार गुनाहों की । "फ़ंड के फ़ंडे" में उलझे नेताओं की हकीकत को जानने के बाद अब नौकरशाही पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है ।

मुख्यमंत्री शासन - प्रशासन को स्वच्छ कर देने के दावे तो आये दिन करते रहते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है । किसानों को खाद - बीज देने का मामला हो या सिंचाई नहरों का, गरीब ग्रामीण बेहाल और नेता, ठेकेदार, अफ़सरान मालामाल । आँकड़े गवाही देते हैं कि किस तरह ग्रामीण अंचलों में बच्चे कुपोषण और भूख से मर रहे हैं, लेकिन पोषाहार सप्लाई में मची बँदरबाँट से लोकतंत्र का ताकतवर गठजोड़ दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होता जा रहा है । जनता की गाढ़ी कमाई से इकट्ठा काली कमाई तिजोरियों का पेट भर रही रही है और प्राण लेने पर उतारु महँगाई की मार झेल रहा आम आदमी दो वक्त की रोटी के लिये भी जद्दोजहद कर रहा है । गरीबों के कल्याण के लिये बनी नरेगा जैसी तमाम योजनाएँ समाज के उच्च वर्ग की रातों को रंगीन, नशीला और रुमानी बनाने वाली साबित हो रही हैं ।

प्राइवेट कंपनियों की बीमा पॉलिसियाँ कारोबारियों,अफ़सरों और नेताओं की काली कमाई को उजला बनाने की " फ़ेयर एंड लवली" साबित हो रही है । लोगों से जीने का बुनियादी हक छीनने वाले जीवन सुरक्षा में निवेश कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये "कारु का खज़ाना" तैयार कर रहे हैं । काँग्रेस के एकछत्र राज्य में मचे घटाटोप में बीजेपी एक उम्मीद की किरण बन कर आई थी, लेकिन नाकारा नेतृत्व और सत्ताधारी दल के साथ मिल बाँट कर खाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने आम जनता के भरोसे का खून कर दिया है ।

प्याज के मुद्दे पर सरकार हिला देने की ताकत रखने वाली लोकशाही में दाल-रोटी ही नहीं, बिजली-पानी भी महँगा हो गया है । बेतहाशा फ़ैलते प्रदूषण ने लोगों का साँस लेना भी दूभर कर दिया है । लेकिन आम आदमी की आवाज़ उठाने की किसी को फ़िक्र भी नहीं है और ना ही फ़ुर्सत है । महँगाई से परेशान लोगों के आँसू निकलने लगे हैं । चारों तरफ़ हाहाकार मचा है, ऎसे में विपक्ष की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है । कहीं ये मौन लोकतंत्र के किसी नये गठबंधन का संकेत तो नहीं ? कहीं ऎसा तो नहीं कि वोट लेने के बाद सत्ता और विपक्ष में साँठगाँठ हो गई है । क्या विपक्ष चुप्पी साधने की कीमत वसूल कर आम आदमी की पीड़ा से मुँह फ़ेर चुका है ?

मौजूदा हालात तो लोकतंत्र के इस बदनुमा चेहरे को ही उजागर कर रहे हैं । लेकिन नेताओं को जनता के सब्र का इतना भी इंम्तेहान नहीं लेना चाहिए कि तकलीफ़ें उन्हें सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दे । मगरुर नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पीड़ा से तड़पती जनता जब सड़कों पर आती है, तो कई वटवृक्षों को जड़ से उखाड़ने की ताकत रखती है । बीजेपी नेतृत्व को समझना होगा कि सता चाहे जितनी मदमस्त क्यों ना हो विपक्ष के मज़बूत और बुलंद इरादों के सामने उसे घुटने टेकना ही पड़ते हैं । जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठाने के लिये पार्टी को नैतिक मूल्यों को दोबारा से प्रतिष्ठित करना होगा और इसके लिये ज़रुरत होगी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा साहसिक फ़ैसले लेकर उन्हें अमलीजामा पहनाने की ।