गुरुवार, 19 अगस्त 2010

सरकारी धन को लूटने में जुटी सरकार

मध्यप्रदेश सरकार के फ़ैसलों को देखकर "अँधी पीसे-कुत्ते खाएँ" कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है । सत्ता के नशे में डूबी भाजपा को विपक्ष की निष्क्रियता ने निरंकुशता के पंख लगाकर भ्रष्टाचार के आसमान में लम्बी और ऊँची उड़ान भरने के लिये स्वतंत्र छोड़ दिया है । कैबिनेट के एक के बाद एक फ़ैसले बताते हैं कि किस तरह सरकारी खज़ाने का दुरुपयोग कर नेता अपने उद्योग धंधे आगे बढ़ा रहे हैं । इस तरह की योजनाएँ बनाई जा रही हैं, जिनमें उद्योग लगाने वालों को सरकारी पैसा मुफ़्त में मिल रहा है, जैसे वे अपना बिज़नेस प्रदेश में लाकर जनता पर बड़ा भारी एहसान कर रहे हैं । बेशकीमती ज़मीनों को औने-पौने में ठिकाने लगाने की मुहिम की अपार सफ़लता से उत्साहित राज्य सरकार अब यही फ़ार्मूला अन्य क्षेत्रों में भी आज़माने जा रही है । यकीन ना आये तो सरकार के हालिया फ़ैसलों को उठाकर देख लीजिये ।

मध्यप्रदेश सरकार ने निजी क्षेत्र के ऑपरेटरों के माध्यम से प्रदेश के प्रमुख शहरों को वायु सेवा से जोड़ने का निर्णय लिया है। चार बड़े शहरों समेत कई नगरों को हवाई सेवा से जोड़ने की योजना में निजी ऑपरेटरों को कई रियायतें देने की तैयारी को अंतिम रुप दे दिया गया है । निजी ऑपरेटर्स 9 सीटर विमान चलाएंगे। इसके लिए वे प्रत्येक सेक्टर में किराया तय करने के लिये स्वतंत्र होंगे। प्रत्येक सेक्टर के लिए विमान में कुछ सीटें राज्य शासन के उपयोग के लिये आरक्षित होंगी। इन सीटों पर प्रत्येक सीट का किराया निर्धारण निविदा के माध्यम से किया जाएगा, जिन पर राज्य शासन द्वारा अधिकृत अधिकारी यात्रा कर सकेंगे। अगर किसी सेक्टर में किसी समय शासकीय अधिकारी आरक्षित सीट पर यात्रा नहीं करेंगे तो ऎसी सीटें आपरेटर द्वारा प्राइवेट मार्केट में बेची जा सकेंगी ।

इस फ़ैसले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जो भी आरक्षित सीट खाली जाएगी उसका भुगतान राज्य सरकार करेगी । भुगतान अधिकतम चार खाली सीटों का होगा । इस पर 84 लाख महीना और सालाना करीब 8 से 9 करोड़ रूपए खर्च होंगे । सरकार तीन साल तक यह प्रोत्साहन राशि देगी । निजी आपरेटर को विमान में लगने वाले ईंधन में वैट से भी छूट मिलेगी । ये वही सरकार है जो महँगाई पर काबू पाने के लिये डीज़ल-पेट्रोल और रसोई गैस पर लगे करों को ज़रा भी कम करने को तैयार नहीं है । गौर करने वाली बात है कि मध्यप्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थ और रसोई गैस अन्य प्रदेशों की तुलना में तीस से पैंतीस फ़ीसदी तक महँगे हैं ।

औद्योगिक घरानों और व्यापारियों पर मेहरबान राज्य सरकार अपने कर्मचारियों का खून चूसने से भी बाज़ नहीं आ रही है । हाल ही में हुए खुलासे ने कर्मचारियों को हक्का बक्का कर दिया है । महंगाई की मार से दोहरे हो चुके कर्मचारियों की मकान किराया भत्ता, वाहन भत्ता जैसी मूलभूत सुविधाओं पर भी सरकार ने रोक लगा रखी है । बेहाल सरकारी मुलाज़िमों के हक के पैसे पर डाका डालकर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है । कर्मचारियों को सरकार की रीढ़ मानने का दावा करने वाली प्रदेश में बीते छह वर्षो में सत्तारूढ़ भाजपा साढे पांच लाख मुलाजिमों का दस हजार करोड़ रूपया डकार चुकी है। सरकारी खजाने में जमा यह राशि केंद्र की अनुशंसाओं को राज्य सरकार द्वारा देरी से लागू करने के अंतर की है । अप्रैल 2004 को केंद्र ने 50 फीसदी डीए मूल वेतन में शामिल कर दिया। राज्य ने इसे 1 अप्रैल 2007 में सम्मलित किया । केंद्रीय कर्मियों को 1 जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 के बीच छठे वेतनमान के एरियर का भुगतान डीए समेत किया । छठे वेतनमान में केंद्र ने 1 जनवरी 2006 से अपने कर्मचारियों को महंगाई भत्ते का भुगतान किया। राज्य ने एरियर तो दिया लेकिन बिना डीए का ।

जनतांत्रिक तरीके से चुनकर आई प्रदेश सरकार के सामंती और तानाशाही तेवरों का आलम यह है कि कर्मचारियों के जायज़ हक को नज़र अंदाज़ करने वाले वित्त मंत्री राघवजी अपने फ़ैसले को सही ठहरा रहे हैं । कर्मचारियों को वेतन-भत्ते देने के लिये सरकार के पास पैसा नहीं है, लेकिन सरकारी योजनाओं के नाम पर उद्योगपतियों को रियायतें देने के लिये सरकारी खज़ाना खाली करने में कोई संकोच नहीं है । वे कहते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि केंद्रीय तिथि से ही राज्य अपने कर्मियों को महंगाई भत्ता या अन्य लाभ दे। राज्य इस मामले में स्वतंत्र है। वित्त विभाग का दो टूक कहना है कि जरूरी नहीं है कि वह केंद्रीय तिथि से भुगतान करे।

तमाम हेराफ़ेरी के बावजूद सरकारी आँकड़े ही प्रदेश के वित्तीय हालात की चुगली करते दिखाई देते हैं । आंकड़े बयां कर रहे हैं कि किस तरह कर्मचारियों का पेट काटकर ही तिजोरी भरी गई है। राज्य सरकार के वित्तीय वर्ष 2009-10 के अंत में शुद्ध बचत रिजर्व बैंक के खजाने में बचत 5560 करोड़ रूपए थी, जबकि केंद्रीय तिथि से कर्मचारियों को भुगतान नहीं करने का सरकारी आंकड़ों में अंतर 10012 करोड़ रूपए है। इस तरह यदि कर्मचारियों को उनकी बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाए, तो खज़ाना भरा होने का सरकारी दावा पल भर में काफ़ूर हो जाए ।

स्वर्णिम प्रदेश बनाने का शिगूफ़ा छोड़ने वाले शिवराज के फ़ैसले अँधेर नगरी के.......राजा की याद ताज़ा कर देते हैं । आये दिन केन्द्र पर भेदभाव का आरोप मढ़कर जनता को बेवकूफ़ बनाने वाले मुख्यमंत्रीजी की शिकायत है कि इस साल उसे केंद्रीय सड़क निधि और अन्य योजनाओं में मिलने वाले 1000 से 1500 करोड़ रूपये नहीं मिले, इसलिए सड़कें बनाने के लिए धन की भारी कमी हो गई है। लेकिन शिवराज सरकार इन तात्कालिक बाधाओं के आगे घुटने टेकने वाली थोड़े ही है, लिहाज़ा इरादे के पक्के मुख्यमंत्री ने आनन-फ़ानन में फैसला ले लिया है कि करीब 2500 किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण के लिए वह ठेकेदारों से ही करीब 2000 करोड़ रूपये का लोन लिया जाएगा । यह राष्ट्रीयकृत बैंकों की मौजूदा ब्याज दर पर ही होगा और उसे 10 वर्षो में सालाना किश्तों में चुकता किया जाएगा ।

यहां गौर करने लायक बात यह है कि "एनयूटी मोड" के तहत बनने वाली ये वे सड़कें होंगी जहां टोल टैक्स की वसूली संभव नहीं है। अब एनयूटी मोड में सड़कें बनेंगी, यानी ठेकेदार सड़क बनाएगा और सरकार किस्तों में उसे ब्याज सहित लागत रकम लौटाएगी। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि इस तरह बनने वाली सड़कों में असल फायदा किसे होगा- सरकार को, ठेकेदार को या जनता को? क्योंकि बीओटी के तहत बनी सड़कों पर टोलटैक्स वसूली की हकीकत से सभी कभी न कभी दो-चार हुए हैं ।

सबसे गंभीर और हैरानी की बात यह है कि सारे सरकारी निर्माण कार्य घाटे में ही क्यों जाते हैं, जबकि सरकारी ठेके लेने वाले लोग हर स्तर पर मुट्ठी गर्म करने के बावजूद दिन दोगुनी रफ़्तार से श्री और समृद्धि हासिल करते हैं । जो आमतौर पर ठेकेदार किसी ना किसी रुप में नेताओं से जुड़े रहते हैं, फ़िर चाहे वो उनके सगे-संबंधी हों या उनके इष्टमित्र । अब तो वे सरकार की कृपा से साहूकार भी बनने जा रहे हैं। सरकारी धन की लूट की बढ़ती प्रवृत्ति कह रही है कि तो वह दिन दूर नहीं जब कर्ज के बोझ तले दबी सरकार ही किसी ठेकेदार के हाथ होगी ।
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