सोमवार, 21 दिसंबर 2009

चेहरा बदला, क्या चाल-चरित्र बदलेगा ....?

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में हाल के दोनों में दो अहम बदलाव हुए हैं । भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ लोकसभा में विपक्ष का नेता भी बदल गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अब लालकृष्ण आडवाणी नहीं सुषमा स्वराज होंगी, तो राजनाथ सिंह के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान नितिन गडकरी ने संभाली है। इस साल लोकसभा चुनाव में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व युवा नेताओं के हाथ में सौंपने की माँग उठ रही थी । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या इस बदलाव से भाजपा का कुछ भला हो पाएगा ? क्या पार्टी इनके नेतृत्व में बुरे दौर से निकल पाएगी ? क्या आडवाणी की राजनीतिक पारी भी समाप्ति की ओर है?


गौरतलब है कि आडवाणी के लिए संसदीय दल के संविधान में संशोधन करके काँग्रेस की तर्ज़ पर विशेष जगह बनाई गई है । उनका राजनीतिक कैरियर सुरक्षित करने की गरज से उठाये गये इस कदम की बदौलत लालकृष्ण आडवाणी अब संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बन गए हैं। यानि सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार अब भी उनके पास सुरक्षित है। भाजपा के इस लौहपुरूष को पिघलाना आसान बात नहीं है, यह बात एक बार फिर साबित हो गयी है। भले ही संसदीय दल का नेता नहीं होने के कारण कैबिनेट मंत्री का दर्जा छिन गया हो, मगर लालकृष्ण आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष के रूप में पार्टी पर वर्चस्व बनाए रखेंगे। आडवाणी की राजनीतिक बुलंदियाँ छूने की महत्वाकांक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं, यह मानना भूल होगी। हिन्दुत्व के एजेंडे को बुलंद करते हुए भाजपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में आडवाणी का हाथ रहा, बावजूद इसके वे कभी प्रधानमंत्री पद पर नहीं पहुँच पाए। लोकसभा में पार्टी की सिमटती सीटों के बावजूद हार उन्होंने नहीं मानी है, विरोधियों को चतुराई से किनारे किया और वे अब भी बैक सीट ड्राइविंग करते हुए एक तरह से पार्टी को अपनी पसंद की राह पर चलवा रहे हैं। भाजपा का युवा अवतार कितनी दूर तक वरिष्ठों के कहे अनुसार चलेगा, यह देखने वाली बात रहेगी।

भारतीय जनता पार्टी संक्रमण के दौर में है। नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर दोहरे संकट को झेलती पार्टी को पटरी पर लाने के लिये नितिन गडकरी को संघ के समर्थन का नैतिक बल ज़रुर हासिल होगा । लेकिन इससे उनकी राह बहुत आसान नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा बड़ी हो गई है और बदल भी गई है । भाजपा के संक्रमण का एक पहलू यह भी है कि मौजूदा चुनौतियों के संदर्भ में एक सैद्धांतिक आधारभूमि भी तलाशना है । जिससे वह ऊर्जा ग्रहण कर एक राजनीतिक दल के रुप में सार्थक हो सके और अपने समर्थकों को इतना वेगवान बना सके कि वे राजनीतिक शून्यता भरने में कामयाब हो सकें ।

इसके बारे में संघ जितना बेपरवाह है उससे कहीं ज़्यादा उदासीनता भरा रवैया भाजपा का रहा है। भाजपा में पार्टी प्रतिबद्धता का हाल यह है कि संघ नेतृत्व खुलेआम कहने लगा है कि वहाँ कोई भी राष्ट्रीय नेता ऐसा नहीं है ,जो पार्टी और उसके भविष्य की सोचता है । हर कोई अपने में सिमट गया है। भाजपा के जिस विशेषता के लिए जानी जाती थी वह उससे बहुत दूर हो गई है । इसे संघ चाहे भी तो कैसे दूर करेगा ? क्या कोई नया संगठन मंत्री आकर जादूका छड़ी फेर सकता है ? इस समय जो संगठन मंत्री हैं वे बिगड़ी भाजपा के चेहरे हो गए हैं ।

गडकरी की छबि व्यवहार कुशल नेता की है। विचार का जहाँ तक सवाल है वे स्वदेशी के पैरोकार हैं पर वैश्वीकरण से उन्हें बैर भी नहीं है । शनिवार को दिल्ली में पार्टी की कमान संभालने के बाद उन्होंने कहा कि वे पाँच सालों में पहली बार दिल्ली में रात बिताएंगे। यानि उनकी राजनीति महाराष्ट्र के इर्द-गिर्द ही रही। अब एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण और सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। यह समय गठबंधन राजनीति का है। इस नाते तरह-तरह के दलों से पार्टी के संबंधों को मजबूती देना उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। लगातार सिमट रहे जनाधार से पार्टी कार्यकर्ताओं के पस्त पड़े हौसलों को नयी ऊर्जा देना भी एक बड़ा काम रहेगा और सबसे बड़ी चुनौती रहेगी पार्टी के भीतर मौजूद दिग्गजों के अहं को संतुष्ट करते हुए आपसी तालमेल बनाए रखते हुए भाजपा की सभी प्रदेश ईकाइयों को नया जोश देना।

गडकरी के जरिए संघ, भाजपा पर नियंत्रण रखना चाहता है। हालाँकि बदलती परिस्थितियों में यह कितना कारगर होगा, यह कहना कठिन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अपनी पसंद के नितिन गडकरी को बीजेपी में ले तो आये हैं, वे अभी तक राज्य स्तर के नेता रहे हैं लेकिन देश के मुख्य विपक्षी दल का अध्यक्ष होने की पात्रता उनमें कितनी है, यह अभी रहस्य बना हुआ है। अगर वे असफल होते हैं तो यह संघ नेतृत्व की असफलता कही जाएगी और ये आरोप लगेगा कि संघ के महाराष्ट्रीय ब्राह्मण नेतृत्व ने एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण को पार्टी पर भी थोप दिया।

भाजपा इस समय एक ऐसी पार्टी बन चुकी है जिसे अपनी दिशा मालूम नहीं और दो लोकसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि हिन्दुत्व की लाइन पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुई है। आम जनता हिन्दुत्व की राजनीति की निरर्थकता को समझ चुकी है और अब इससे निकलना चाहती है। लोग शायद अब जातिवाद की राजनीति से भी ऊब चुके हैं और उससे भी बाहर आने का रास्ता तलाशाना चाहते हैं। भाजपा विकास से ज़्यादा धर्म के एजेंडे पर ध्यान देती आई है लेकिन देश का आम आदमी अब जागरुक हो चुका है। लोग देश का विकास, शिक्षा और रोजगार चाहते हैं। बढ़ती महंगाई और रोज़गार के घटते अवसरों के बीच लोग समझ चुके हैं कि धर्म से पेट नहीं भरता। खराब बुनियाद पर बने घर,साम्प्रदायिक और धार्मिक नीति की बुनियाद पर बने राष्ट्र और साम्प्रदायिक और धार्मिक सोच से चलती पार्टी का अस्तित्व बहुत दिनों तक नहीं कायम नहीं रहता है ।

भाजपा के दो प्रमुख पदों पर परिवर्तन से कुछ होने वाला नहीं है. पार्टी तभी मजबूत होगी जब पार्टी का एजेंडा बदला जाए ।  मुखौटा बदलने की बजाए भाजपा को विचारधारा बदलने की आवश्यकता है । अब तक तीन वैचारिक लाइन ली हैं । गांधीवादी समाजवाद. इसे 1985 में छोड़ा और एकात्मक मानववाद को अपनाया । 1987 से वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लाइन पर है । इसने भाजपा को अयोध्या आंदोलन में एक भूमिका दी । लेकिन भाजपा की समस्या इसी से शुरू होती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वो ऐसे ठोस नारे में नहीं बदल सकी है जो लोगों के गले उतरे । इसके लिए जिस तरह की सैद्धांतिक समझ और चारित्रिक दृढ़ता चाहिए वो आज ना भाजपा में है ना ही संघ में । सतही सत्ता के खेल में उलझी भाजपा का वैचारिक द्वंद उस समय बेक़ाबू हो गया जब वह चुनाव में हारने लगी । भाजपा की अनेक धाराएँ हो गई हैं । खुलकर बहस की गुंजाइश ख़त्म है । असहमति को वहाँ विरोध समझ लिया जाता है, गिरोहबंदी में फंसी भाजपा को संघ का हंटर कितना सुधार सकेगा?

बीजेपी को पटरी पर लाने के लिये गडकरी को चाँडाल चौकड़ी से छुटकारा पाना होगा । उन्होंने सेतुबन्ध बनाकर कई दुर्गम राहों पर सफ़र आसान बनाने की योजनाओं को सफ़लता से साकार किया है । विकास की राजनीति वक्त की ज़रुरत है लेकिन गडकरी को समझना होगा कि जर्जर बुनियाद पर मज़बूत इमारतें खड़ी करना नामुमकिन होता है । इमारत की बुलंदी काफ़ी हद तक बुनियाद की मज़बूती पर निर्भर करती है । ज़ाहिर बात है कि विकास के इतिहास में विध्वंस की कहानी भी दर्ज़ होती है । कई मर्तबा पुख्ता ज़मीन तैयार करने के लिये डायनामाइट लगाना ज़रुरी हो जाता है । बीजेपी के लाइलाज मर्ज़ से निपटने के लिये गडकरी को सर्जरी की दरकार होगी । कुशल डॉक्टर जानता है कि जीवन सुरक्षित रहे तो अंगदान करने वालों की कमी नहीं रहती ।
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