शनिवार, 5 दिसंबर 2009

गलत क्या कहा शिवराज ने ....?

मीडिया की मेहरबानी और ओछी राजनीति के चलते मध्यप्रदेश मे मुख्यमंत्री बैठे ठाले मुश्किल में पड़ गये हैं । स्थानीय लोगों को छोटॆ-मोटे रोज़गार की तलाश में अपना घर द्वार छोड़कर भटकना ना पड़े , इस इरादे से सूबे के मुखिया ने एक बात कह दी , जिसे मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मिर्च-मसाले के साथ परोस दिया । सियासी फ़ायदा उठाने वालों की तो जैसे बन आई । लिहाज़ा बिहार की अदालत में याचिका लगा दी गई । अब बेतिया ज़िले की अदालत के आदेश पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। बेतिया व्यवहार न्यायालय के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मिथिलेष कुमार द्विवेदी के आदेश पर मुख्यमंत्री के खिलाफ धारा 124 (ए), 153 (ए), 153 (बी), 181, 500 और 504 के तहत मामला कायम हुआ है। गौरतलब है कि नौ नवंबर को वकील मुराद अली ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में दाखिल याचिका में आरोप लगाया था कि सतना में बिहारियों के खिलाफ़ दिया गया शिवराज सिंह का भाषण मुख्यमंत्री बनने के समय लिए गए शपथ के विरूद्ध है । यह बिहारवासियों का अपमान है और इससे क्षेत्रवाद फैलेगा।


न्यायालय ने मामला दर्ज़ करने का आदेश दिया है,लेकिन इस पूरे मसले में शिवराजसिंह कहीं भी दोषी नज़र नहीं आते । मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिये मामले को बेवजह तूल दिया । उनके बयान को गौर से सुनें,तो उसमें ना तो कोई अलगाव पैदा करने वाली बात कही गई थी और ना ही मनसे नेता राज ठाकरे की तरह भड़काऊ बयान दिया गया था । उन्होंने सहज ही जो बात कही वो कतई गलत नहीं थी । बल्कि सूबे के मुखिया होने के नाते उनके नज़रिये में कोई खोट भी नहीं है ।

क्षेत्र में कारखाना और उद्योग लगे और वहाँ का युवा या कामगार दूसरी जगह जाकर काम की तलाश में भटके, तो फ़िर वही हालात पैदा होते हैं , जो फ़िलहाल यूपी-बिहार में हैं । बेरोज़गारी से पनपने वाला असंतोष सामाजिक असंतुलन और अपराधों का सबब बन जाता है । राज्य सरकारों का काम ही है अपने सूबे की तरक्की के लिये कोशिश करना । अगर मध्यप्रदेश में कारखाना लगेगा,तो ज़ाहिर सी बात है स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी ही जाना चाहिए । मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज ने स्थानीय लोगों को नौकरियों में पचास फ़ीसदी प्राथमिकता देने की बात कह भी दी ,तो कौन सा कहर ढ़हा दिया ?

यूपी और बिहार से आकर नौकरी करने वाले सरकारी अफ़सरों ने प्रदेश को लूटने खसोटने में जिस तरह के बुद्धि कौशल और चातुर्य का परिचय दिया है, उसने इन प्रदेशों की छबि देश भर में बिगाड़कर रख दी है । कहते हुए दिल दुखता है लेकिन भाई-भतीजावाद की इससे बेहतर मिसाल क्या होगी कि भिलाई स्टील प्लांट हो या बीएचईएल छोटे और औसत दर्ज़े के सत्तर से अस्सी फ़ीसदी पदों पर बाहरी लोगों का कब्ज़ा है, जबकि स्थानीय कामगार दूसरे शहरों की खाक छान रहे हैं ।
तकनीक के इस दौर में उच्च शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं के लिये देश ही नहीं विदेशों में भी रोज़गार के तमाम मौके हैं, मगर असंगठित और अप्रशिक्षित हाथों को दो जून की रोटी की तलाश में हज़ारों किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़े, महानगरों में नारकीय जीवन गुज़ारते हुए खोमचे लगाना पड़े या दिहाड़ी मज़दूरी करना पड़े,तो यह सरकारों की विकास योजनाओं पर करारे तमाचे से कमतर नहीं है । यूँ भी रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वालों की ज़्यादातर ऊर्जा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में खप जाती है । जिस क्षेत्र में कारखाना लगता है, वहाँ की आबोहवा, ज़मीन, जंगल, पानी पर उसी इलाके के लोगों का पहला हक है । यदि देश और समाज की तरक्की के लिये वे अपना हिस्सा सभी के साथ बाँटने को तैयार हैं,तो उनके जायज़ हक को सौंपने में इतनी तंगदिली क्यों ? किसी भी देश,प्रदेश या क्षेत्र को तरक्की करना है तो योग्यता के साथ-साथ स्थानीय प्रतिभा को प्राथमिकता देना ही चाहिए।

शिवराज के बयान को तंग नज़रिये से देखने की बजाय व्यापक दृष्टिकोण से समझने की ज़रुरत है । सरकारों को इस मुद्दे पर नीतिगत फ़ैसला लेना चाहिए । टटपूँजिये तरीके से बाल की खाल निकाल कर राजनीति तो चमकाई जा सकती है, लेकिन किस कीमत पर ? अब वो वक्त आ चुका है , जब देश के कालिदासों की सेनाओं को समझना चाहिए कि नोचने-खसोटने के लिये ज़्यादा कुछ बचा नहीं है । दमतोड़ते लोकतंत्र की लाश को नोचने की सीमा भी आने को है । सम्हलो-वरना जिस दिन देश का अनपढ़-अनगढ़ आदमी उठ खड़ा हुआ तो नेताओं की जमात का नामलेवा भी नहीं बचेगा ।
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