मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

आतंक और मौतों की सियासत

मध्यप्रदेश के खंडवा में एटीएस के आरक्षक सहित तीन लोगों को दिनदहाड़े गोलियों से भून देने के बाद सरकार ने जिस तरह घोषणाओं का पिटारा खोल दिया , उसमें मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदनाशीलता कम मामले का सियासी फ़ायदा उठाने की कुत्सित चेष्टा ज़्यादा दिखाई देती है । खंडवा में मारे गये लोगों की शवयात्रा को काँधा देने के लिये खुद मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, मंत्रिमंडल के कई और सदस्यों के साथ ही डीजीपी एस के राउत भी मौजूद थे । प्रशासन और पुलिस ने मामले में प्रतिबंधित संगठन सिमी का हाथ होने की बात कह कर सनसनी फ़ैला दी और सरकारी तंत्र पूरे लवाज़मे के साथ खंडवा पहुँच गया ।

अब तक पुलिस की गिरफ़्त से बाहर है । अब पुलिस "ऑपरेशन फ़ंदा" का ढ़ोंग करने में जुट गई है,मगर नतीजा सिफ़र ही है । कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया है ,लेकिन अब तक कुछ भी सामने नहीं आया है । अलबत्ता नगरीय निकायों के चुनाव ज़रुर सामने खड़े हैं । लिहाज़ा घोषणाओं का पिटारा खोलकर राजनीतिक माइलेज लेने में माहिर सूबे के मुखिया ने एक बार फ़िर बाज़ी मार ली । आनन फ़ानन में उन्होंने तीनों मृतकों को शहीद का दर्ज़ा दे डाला । सभी की राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई । आरक्षक के परिजनों को दस लाख रुपए और दो अन्य मृतकों के परिवारों को पाँच-पाँच लाख रुपए का मुआवज़ा और एक-एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति देने की घोषणा भी कर दी गई । गोया कि २६/११ के मुम्बई हमले से भी बड़ा कोई आतंकी हमला हो गया हो जिसमें आतंकियों से जूझते हुए आरक्षक सीताराम यादव , बैंक अधिकारी पारे और वकील पाल ने वीरगति प्राप्त की हो । सरकारी प्रेस नोट को पढ़ने के बाद तो कम से कम यही लगता है मानो सीमा पर रणबाँकुरों ने देश की हिफ़ाज़त के लिये प्राण न्यौछावर किये हों ।

आरक्षक यादव बेशक एटीएस के कर्तव्यपरायण और जाँबाज़ जवान रहे हैं । उनकी बहादुरी पर हम सभी को नाज़ है । इस बात से भी इंकार नहीं कि देश के लिये साहस के साथ अपने दायित्वों को निबाहने वालों को ना सिर्फ़ सम्मान मिलना चाहिए , बल्कि उनके परिजनों को बेहतर ज़िन्दगी देने का नैतिक दायित्व समाज और सरकार दोनों का होता है । लेकिन मूल सवाल यही है कि नेता आखिर कब तक बेहयाई से अपने फ़ायदे के लिये लोकतंत्र का बेहूदा मज़ाक बनाते रहेंगे । अभी तफ़्तीश चल रही है । फ़िलहाल कुछ भी साफ़ नहीं है । कल जाँच-पड़ताल के बाद मामला आपसी रंजिश या लेनदेन का निकले,तब सरकार कहाँ जाकर मुँह छिपाएगी ?

अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिये नेता लोकतंत्र और सत्ता को "चेरी" समझ बैठे हैं । उनका ध्यान समाज में व्यवस्था लाने से ज़्यादा अराजकता फ़ैलाकर चाँदी काटाने में लग गया है । गुज़रते वक्त के साथ मध्यप्रदेश में तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । मुख्यमंत्री खुद भरी सभा में मान चुके हैं कि सूबे में तरह - तरह के माफ़ियाओं का राज है । दोबारा सत्ता में आने के बाद से तो जैसे भाजपाइयों को "पर" ही लग गये हैं । भूमाफ़ियाओं का आतंक पूरे प्रदेश में फ़ैला हुआ है । इसकी परिणिति एक आईएएस अफ़सर एम जी रुसिया की मौत के रुप में सामने आ चुकी है । ऎसे कई मामले हैं जिनमें शक की सुई सीधे-सीधे सत्ताधारी दल के नेताओं पर आ टिकती है , लेकिन रुसिया की संदिग्ध हालात में हुई मौत के बाद से अफ़सरशाही चौकन्नी हो गई है । अब आलम यह है कि अधिकारी अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिये नियम - कायदों को ताक पर रख कर नेताओं की मनमानी को बर्दाश्त कर रहे हैं ।

राजधानी की व्यस्ततम सडक पर चलती कार में चार लोगों द्वारा में तथाकथित रेप का मामला प्रदेश के हालात बयान करने के लिये काफ़ी है । शहर में गैंगरेप जैसी कोई घटना हुई ही नहीं और पुलिस ने आरोपी भी ढ़ूँढ़ निकाला । पास के गाँव के एक निरीह और शरीफ़ इंसान से अपराध भी कबूलवा लिया । शायद उसकी किस्मत अच्छी थी जो गाँव के कुछ लोग उसके पक्ष में उठ खड़े हुए । करीब डेढ़ - दो महीने गुज़ारने के बाद एक बेकसूर युवक ज़मानत पर रिहा हो सका । बाद में पता चला कि कुछ लोगों को फ़ँसाकर रकम ऎंठने के इरादे से यह कहानी बुनी गई थी । इसे अँजाम देने के लिये मुम्बई के दलालों और कॉलगर्ल की मदद ली गई थी, वास्तव में ऎसी कोई वारदात उस रात भोपाल में हुई ही नहीं थी ।

ये एक बानगी है । खंडवा की वारदात के बाद आधी-अधूरी जानकारी के बूते सरकार की बेतहाशा घोषणाएँ करना गंभीर मसला है । आखिर नेता कब तक अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते रहेंगे । मुख्यमंत्री अपने अधकचरे सलाहकारों का मशविरा मानकर "इमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज़" के लिये जाने क्या-क्या घोषणाएँ करते रहते हैं । उन्हें अपने व्यक्तित्व में गंभीरता लाकर सोचना ही होगा कि जनता ने राज्य और समाज हित के कामों के लिये उन्हें सत्ता सौंपी थी । सरकारी खज़ाना उनकी निजी जायदाद या मिल्कियत नहीं है , जिसे वो जब चाहें ,जैसे चाहे लुटाते रहें , उड़ाते रहें । हालाँकि प्रदेश में विपक्षी दल काँग्रेस का निकम्मापन और मिल बाँटकर खाने की नीयत से साधी गई चुप्पी को सब भाँप चुके हैं , लेकिन हकीकत किसी ना किसी बहाने सामने आकर ही रहती है । अराजकता की सियासत के सहारे लम्बा सफ़र तय कर पाना नामुमकिन है ।
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